नामद्रोलिंग मठ : स्वर्णिम शांति के पीछे श्रम और निर्वासन का इतिहास
मैं जब बायलाकुप्पे पहुँचा, तो सड़क के दोनों ओर फैले खेत और बस्तियाँ मुझे यह याद दिला रही थीं कि यह धरती केवल ध्यान और मंत्रों की नहीं, बल्कि पसीने और निर्वासन की भी भूमि है। सामने नामद्रोलिंग मठ का स्वर्णिम शिखर चमक रहा था—ऐसा लगता था मानो धूप को सोने में ढाल दिया गया हो। पर यात्राएँ केवल देखने के लिए नहीं होतीं; वे समझने के लिए होती हैं। और समझ तब आती है, जब हम पत्थरों के नीचे दबी कहानी को पढ़ना सीखते हैं।
1963 में स्थापित यह मठ केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं है। यह उस इतिहास की जीवित निशानी है, जिसमें एक पूरी कौम को अपनी ज़मीन, अपनी भाषा और अपने पहाड़ छोड़कर निर्वासन की राह पकड़नी पड़ी। तिब्बती बौद्ध भिक्षु यहाँ शांति की साधना करते हैं, पर उनकी यह शांति संघर्ष और विस्थापन की राख से उपजी है। यह तथ्य कोई सजावटी सूचना नहीं, बल्कि इस मठ की आत्मा है।
मठ की वास्तुकला देखते ही यात्री ठिठक जाता है। ऊँचे स्तंभ, दीवारों पर उकेरी गई रंगीन कथाएँ, और प्रार्थना कक्ष में स्थापित बुद्ध शाक्यमुनि, गुरु पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ—ये सब केवल सौंदर्य के लिए नहीं हैं। ये प्रतीक हैं उस विचारधारा के, जो मनुष्य को हिंसा, लोभ और अज्ञान से मुक्त करना चाहती है।
यहाँ कला, धर्म से अलग नहीं है; वह शिक्षण का माध्यम है। दीवारों पर बने चित्र किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि चलती-फिरती किताबें हैं—जिन्हें पढ़ने के लिए आँखों के साथ विवेक भी चाहिए।
मुख्य प्रार्थना हॉल में खड़े बुद्ध शाक्यमुनि, पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ श्रद्धा जगाती हैं। पर एक मज़दूर की आँख इन मूर्तियों के साथ-साथ उन हाथों को भी देखती है जिन्होंने इन्हें गढ़ा—राजमिस्त्री, चित्रकार, बढ़ई, रंग घोलते श्रमिक। इतिहास अक्सर देवताओं को याद रखता है, श्रमिकों को नहीं। राहुल सांकृत्यायन हमें सिखाते हैं कि यात्रा करते समय देवालय नहीं, मानव श्रम को पहले पढ़ो।
यहाँ पाँच हज़ार से अधिक भिक्षु और भिक्षुणियाँ रहते हैं। वे पढ़ते हैं, ध्यान करते हैं, अनुशासन में जीते हैं। लेकिन यह अनुशासन किसी स्वर्ग से नहीं उतरा—यह एक सामूहिक जीवन की आवश्यकता है, जहाँ भोजन, वस्त्र और अध्ययन श्रम और संगठन से संभव होते हैं। यह मठ हमें बताता है कि अध्यात्म भी बिना सामूहिक श्रम के जीवित नहीं रह सकता।
पर्यटक जब यहाँ आते हैं, तो शांति की तलाश में आते हैं। मंत्रों की ध्वनि, प्रार्थना-चक्रों की घूमती लय—सब उन्हें कुछ देर के लिए शहरों की थकान से मुक्त कर देते हैं। लेकिन यह शांति भी वर्गों में बँटी है। पर्यटक के पास समय है, कैमरा है; भिक्षु के पास अनुशासन है, अध्ययन है; और आसपास के खेतों में काम करने वाले मज़दूर के पास केवल दिन भर की मज़दूरी की चिंता। तीनों एक ही भूगोल में हैं, पर एक ही जीवन में नहीं।
नामद्रोलिंग मठ का प्रवेश निःशुल्क है—यह बात अच्छी लगती है। पर असली सवाल यह है कि क्या ज्ञान, संस्कृति और शांति तक पहुँच भी उतनी ही सहज है? या फिर यह भी वैसे ही सीमित है जैसे ज़मीन, शिक्षा और सत्ता?
राहुल सांकृत्यायन होते तो शायद लिखते—“यह मठ मुझे यह नहीं सिखाता कि शांति कहाँ मिलेगी, बल्कि यह सिखाता है कि बिना न्याय के शांति केवल कुछ लोगों की सुविधा होती है।”
नामद्रोलिंग मठ सुंदर है, प्रेरक है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी शिक्षा यह है कि अध्यात्म को इतिहास से अलग मत करो। जो शांति श्रम और विस्थापन को भूल जाए, वह देर तक टिक नहीं सकती। और जो यात्री इसे समझ ले—वह केवल पर्यटक नहीं रहता, वह सचमुच का पथिक बन जाता है।
कुरुवा द्वीप : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी के बीच खड़ा सवाल
केरल के वायनाड ज़िले में स्थित कुरुवा द्वीप—घने जंगलों, बाँस की पगडंडियों और काबिनी नदी के शांत जल से घिरा—आज हमें प्रकृति के सौंदर्य का एक निष्कलंक उदाहरण दिखाई देता है। लगभग 950 एकड़ में फैला यह निर्जन द्वीप, पहली नज़र में मानो मनुष्य के हस्तक्षेप से मुक्त कोई स्वप्नलोक हो। लेकिन इतिहास और समाज को भौतिक परिस्थितियों के आलोक में देखने वाली दृष्टि हमें सिखाती है कि कोई भी प्राकृतिक स्थल केवल “सुंदर दृश्य” नहीं होता—वह सामाजिक संबंधों, उत्पादन-प्रणाली और वर्गीय हितों से गहराई से जुड़ा होता है।
कुरुवा द्वीप का आज का स्वरूप—जहाँ बाँस की बेड़ों पर सैर कराई जाती है, ट्रैकिंग के नाम पर जंगल को ‘अनुभव’ में बदला जाता है, और पक्षी-दर्शन को मनोरंजन के रूप में परोसा जाता है—पूँजीवादी पर्यटन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें प्रकृति स्वयं एक वस्तु (कमोडिटी) बन जाती है। यहाँ शांति भी बिकती है, हरियाली भी बिकती है, और ‘निर्जनता’ भी टिकट के दाम में शामिल हो जाती है।
पर प्रश्न यह है कि इस सौंदर्य का सामाजिक मूल्य क्या है और इसका लाभ किसे मिलता है?
जिस द्वीप को आज “अनहैबिटेड” कहा जा रहा है, वह इतिहास में मानव श्रम और स्थानीय आदिवासी समुदायों की स्मृतियों से पूरी तरह अछूता नहीं रहा होगा। जंगलों का संरक्षण आवश्यक है—इसमें कोई विवाद नहीं—लेकिन जब संरक्षण और पर्यटन राज्य तथा बाज़ार के साझा उपक्रम में बदल जाते हैं, तब प्रकृति के साथ-साथ श्रम भी अदृश्य हो जाता है। टिकट की कीमत, सीमित प्रवेश और नियंत्रित समय—ये सब उस अनुशासन के औज़ार हैं जिनसे प्रकृति को ‘व्यवस्थित उपभोग’ के दायरे में रखा जाता है।
कहा जाता है कि कुरुवा द्वीप पर प्रतिदिन केवल 200 पर्यटकों को प्रवेश की अनुमति है। यह सीमा पर्यावरण-संरक्षण के नाम पर उचित ठहराई जाती है, किंतु यह भी देखना आवश्यक है कि क्या इसी अनुपात में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं? बसें तो मनंतवाड़ी से द्वीप तक आती हैं, लेकिन क्या उस रास्ते पर रहने वाले श्रमिक और आदिवासी इस पर्यटन अर्थव्यवस्था के निर्णायक हैं या केवल सस्ते श्रम के स्रोत?
कला, संस्कृति और प्रकृति—तीनों को उनके भौतिक आधार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। कुरुवा द्वीप की ‘शांति’ उस समाज में पैदा हुई है जहाँ शहरों का शोर, प्रदूषण और असमानता लगातार बढ़ रही है। इसलिए यह शांति भी एक सामाजिक उत्पाद है—जिसे वही वर्ग ख़रीद सकता है जिसके पास समय और धन दोनों हैं। छात्र रियायत में प्रवेश पा सकता है, लेकिन वह भी दर्शक ही रहता है, स्वामी नहीं।
यह लेख कुरुवा द्वीप के सौंदर्य का निषेध नहीं करता। प्रश्न सौंदर्य के उपभोग के सामाजिक ढाँचे पर है। यदि प्रकृति केवल देखने की वस्तु बनती गई, और उसके संरक्षण की कीमत आम जनता से वसूली जाती रही, तो यह मॉडल अंततः प्रकृति और मनुष्य—दोनों के विरुद्ध जाएगा।
कुरुवा द्वीप हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम प्रकृति को बचा रहे हैं, या उसे नए सिरे से बेच रहे हैं।
और यही सवाल—इतिहास, समाज और उत्पादन संबंधों की कसौटी पर—आज के हर ‘इको-टूरिज़्म’ मॉडल से पूछा जाना चाहिए।
थमारसेरी चुरम : प्रकृति, श्रम और इतिहास की चढ़ाई
थमारसेरी चुरम—जिसे लोग थमारसेरी घाट भी कहते हैं—केरल का वह पहाड़ी दर्रा है जिसे अक्सर केवल उसकी सुंदरता, घुमावदार सड़कों और हरियाली के लिए याद किया जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 766 पर स्थित यह रास्ता कोझिकोड को वायनाड से जोड़ता है और अपने नौ हेयरपिन मोड़ों के कारण पर्यटकों को रोमांचित करता है। लेकिन यदि हम केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित रहें, तो हम इतिहास के उस श्रम, संघर्ष और सत्ता-संबंधों को अनदेखा कर देते हैं, जिनसे यह रास्ता बना और जिनके भीतर आज भी यह सांस लेता है।
प्रकृति स्वयं में कभी तटस्थ नहीं होती; मनुष्य और समाज उसके साथ जिस तरह का संबंध बनाते हैं, वही उसके अर्थ को तय करता है। थमारसेरी चुरम भी कोई “प्राकृतिक चमत्कार” मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक उत्पाद है—औपनिवेशिक सत्ता, स्थानीय जनजातीय श्रम और व्यापारिक हितों का संयुक्त परिणाम।
ब्रिटिश शासन के दौर में इस घाट का विकास इसलिए किया गया क्योंकि साम्राज्य को वायनाड के संसाधनों—कॉफी, मसाले, लकड़ी—को तटवर्ती बाज़ारों तक पहुँचाने के लिए एक सुगम मार्ग चाहिए था। अंग्रेज़ इंजीनियरों के नाम इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन जिन आदिवासी समुदायों ने अपनी पीठ, अपने हाथों और अपने जीवन से इस रास्ते को काटकर निकाला, उनका ज़िक्र केवल हाशिये पर मिलता है। यही औपनिवेशिक इतिहास की मूल प्रवृत्ति है—श्रम को अदृश्य बनाना और सत्ता को महिमामंडित करना।
आज थमारसेरी चुरम को एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लक्किडी व्यू पॉइंट, चेन ट्री, ट्रेकिंग और वाइल्डलाइफ वॉचिंग—ये सब उपभोक्ता संस्कृति के आकर्षक शब्द हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि इस पर्यटन से किसे लाभ होता है? स्थानीय आदिवासी और श्रमिक समुदायों को, या उन पूँजीगत संरचनाओं को जो प्रकृति को भी एक वस्तु में बदल देती हैं?
800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह घाट केवल भौगोलिक चढ़ाई नहीं है; यह उस ऐतिहासिक चढ़ाई का प्रतीक है, जहाँ श्रम नीचे रह गया और लाभ ऊपर चला गया। मानसून के महीनों में जब यह इलाका हरियाली से भर जाता है, तब वही बारिश स्थानीय मेहनतकशों के लिए जोखिम भी बन जाती है—भूस्खलन, सड़क दुर्घटनाएँ और रोज़गार की अस्थिरता।
यह सही है कि नवंबर से फरवरी का समय यहाँ घूमने के लिए अनुकूल माना जाता है, और जून से सितंबर में प्रकृति अपने सबसे जीवंत रूप में दिखाई देती है। लेकिन एक ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि यह सवाल उठाए बिना नहीं रह सकती कि “अनुकूल” किसके लिए? पर्यटक के लिए, या उस मज़दूर के लिए जो हर मौसम में इस सड़क को चलने लायक बनाए रखने के लिए काम करता है?
थमारसेरी चुरम हमें यह सिखाता है कि प्रकृति, इतिहास और समाज को अलग-अलग खानों में नहीं बाँटा जा सकता। यह घाट पश्चिमी घाट की सुंदरता का प्रतीक है, लेकिन साथ ही औपनिवेशिक शोषण, अदृश्य श्रम और आज के नवउदारवादी पर्यटन मॉडल का भी साक्ष्य है। यदि हमें सचमुच इस स्थान को समझना है, तो हमें केवल कैमरा और आरामदायक जूते ही नहीं, बल्कि इतिहास की चेतना और श्रम के प्रति सम्मान भी साथ लेकर चलना होगा।
क्योंकि किसी भी रास्ते की असली कहानी उसके मोड़ों में नहीं,
उन हाथों में छिपी होती है
जिन्होंने उसे बनाया और आज भी संभाले हुए हैं।
पूकोडे झील : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी का अंतर्विरोध
केरल के वायनाड ज़िले में स्थित पूकोडे झील को अक्सर प्रकृति की एक शांत, सुंदर और निष्कलुष देन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हरी-भरी पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के घने वनों के बीच बसी यह मीठे पानी की झील, जिसका आकार भारत के भौगोलिक मानचित्र से मिलता-जुलता बताया जाता है, आज पर्यटन प्रचार का एक चमकदार प्रतीक बन चुकी है। झील की गहराई, उसकी जैव-विविधता, और उससे निकलने वाली पनमарам नदी—ये सब तथ्य पर्यटकों के लिए आकर्षण हैं, परंतु इन्हें केवल प्राकृतिक विशेषताओं के रूप में देखना एक अधूरा दृष्टिकोण होगा।
प्रकृति, कला और संस्कृति—तीनों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं समझा जा सकता। इसी कसौटी पर यदि पूकोडे झील को देखा जाए, तो वह केवल एक सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि आधुनिक पर्यटन उद्योग और पूँजीवादी विकास की एक जीवंत प्रयोगशाला के रूप में सामने आती है।
प्रकृति का ऐतिहासिक रूपांतरण
पूकोडे झील का निर्माण किसी मानव योजना का परिणाम नहीं, बल्कि पश्चिमी घाट की भौगोलिक और जल-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का नतीजा है। यही झील पनमарам नदी का स्रोत है, जो आगे काबिनी नदी से मिलती है। अर्थात यह झील केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल-प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब प्रकृति को केवल “देखने” और “उपभोग करने” की वस्तु बना दिया जाता है, तब उसका सामाजिक महत्व गौण हो जाता है।
आज झील के चारों ओर बनी पगडंडियाँ, नौकायन सुविधाएँ, मछलीघर, बच्चों के पार्क और हस्तशिल्प की दुकानें—ये सब उस प्रक्रिया का संकेत हैं जिसमें प्रकृति को बाज़ार के अनुरूप ढाला जा रहा है। यहाँ प्रकृति स्वयं नहीं बोलती; उसकी ओर से पर्यटन विभाग बोलता है, मूल्य तय करता है और समय-सीमा निर्धारित करता है।
पर्यटन और वर्गीय यथार्थ
झील में नौकायन का आनंद लेने वाला पर्यटक अक्सर यह नहीं पूछता कि नाव चलाने वाला श्रमिक किस परिस्थिति में काम करता है, या आसपास के आदिवासी और किसान समुदायों का इस झील से क्या ऐतिहासिक संबंध रहा है। प्रवेश शुल्क, नौकायन शुल्क और “फुट स्पा” जैसी गतिविधियाँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि प्रकृति अब विश्राम का नहीं, बल्कि उपभोग का साधन बन चुकी है।
यहाँ सौंदर्यबोध भी उत्पादन-संबंधों से नियंत्रित है। जो झील स्थानीय समुदाय के लिए पानी, मछली और जीवन का स्रोत रही होगी, वही आज मध्यमवर्गीय पर्यटन के लिए एक “वीकेंड डेस्टिनेशन” बन गई है।
जैव-विविधता और बाज़ार
पूकोडे झील में पाई जाने वाली स्थानीय मछली प्रजाति पेटिया पूकोडेन्सिस जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। परंतु जब इस जैव-विविधता को केवल “एक्वेरियम की वस्तु” या पर्यटन आकर्षण के रूप में देखा जाता है, तब संरक्षण का सवाल भी बाज़ार के अधीन हो जाता है।
संरक्षण तब तक सतही रहता है, जब तक वह स्थानीय समुदायों की जीवन-प्रणाली और उनके अधिकारों से नहीं जुड़ता।
पूकोडे झील हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का सौंदर्य अपने आप में निरपेक्ष नहीं होता। वह उस समाज की संरचना को प्रतिबिंबित करता है, जो उसे देखता और उपयोग करता है। यदि प्रकृति को केवल टिकट, शुल्क और “अनुभव” में बदल दिया जाएगा, तो अंततः वही संकट पैदा होगा, जिसे आज हम पर्यावरणीय विनाश के रूप में देख रहे हैं।
ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि से यह आवश्यक है कि हम पूकोडे झील को केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों के एक जटिल रूप में समझें—जहाँ प्रकृति, श्रम और पूँजी एक-दूसरे से टकराते हैं। वास्तविक संरक्षण और सौंदर्यबोध तभी संभव है, जब प्रकृति को बाज़ार की वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक धरोहर के रूप में देखा जाए।
बाणासुरा सागर बाँध : मिथक, प्रकृति और उत्पादन-संबंधों का द्वंद्व
केरल के वायनाड ज़िले में स्थित बाणासुरा सागर बाँध को प्रायः एक अद्भुत प्राकृतिक और तकनीकी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि यह भारत का सबसे बड़ा मिट्टी का बाँध है और एशिया में दूसरा सबसे बड़ा। इसका नाम बाणासुर पर रखा गया—एक पौराणिक असुर राजा, महाबली का पुत्र, जिसके बारे में कथा है कि उसने इन्हीं पहाड़ियों पर तपस्या की थी।
परंतु यदि हम इस बाँध को केवल मिथक, पर्यटन और सौंदर्य के चश्मे से देखें, तो हम उसके वास्तविक सामाजिक और ऐतिहासिक अर्थ को समझने में असफल रहेंगे। किसी भी सांस्कृतिक या भौतिक रचना को समझने के लिए हमें उसके पीछे काम कर रही उत्पादन-पद्धति और वर्गीय संबंधों को देखना होगा।
निर्माण और उद्देश्य : विकास की भौतिक ज़रूरत
1979 में निर्मित बाणासुरा सागर बाँध बाणासुरसागर परियोजना का हिस्सा था। इसका घोषित उद्देश्य था—सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन। यहाँ हमें स्पष्ट दिखता है कि यह बाँध किसी राजा की तपस्या का परिणाम नहीं, बल्कि आधुनिक राज्य और पूँजी की उस ज़रूरत का परिणाम है, जहाँ जल को एक प्राकृतिक संसाधन से बदलकर “नियंत्रित उत्पादन-तत्व” बना दिया गया।
38.5 मीटर ऊँचाई और 685 मीटर लंबाई वाला यह बाँध, तथा इसके साथ बने छह सैडल बाँध, इस बात के प्रतीक हैं कि आधुनिक समाज प्रकृति को समग्र रूप में नहीं, बल्कि खंडों में बाँटकर नियंत्रित करना चाहता है। जल अब नदी नहीं, बल्कि “जलाशय” है—एक ऐसी इकाई, जिसे मापा, बाँटा और उपयोग में लाया जा सकता है।
जलाशय और ऊर्जा : प्रकृति से मूल्य की निकासी
इस बाँध से बना विशाल जलाशय, जिसे आज “क्रिस्टल-क्लियर पानी” और “हरे-भरे टापुओं” के रूप में प्रचारित किया जाता है, दरअसल उस प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें प्रकृति को सौंदर्य नहीं, उपयोग-मूल्य के रूप में देखा जाता है।
231.75 मेगावाट की स्थापित विद्युत क्षमता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बाँध का केंद्रीय महत्व पर्यटन नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन है—और ऊर्जा आधुनिक पूँजीवादी समाज में सबसे निर्णायक उत्पादन-तत्व है।
यहाँ प्रश्न यह नहीं कि बिजली पैदा होती है या नहीं, बल्कि यह है कि यह बिजली किसके लिए और किस कीमत पर पैदा होती है। क्या इससे वायनाड के आदिवासी और किसान समुदाय की जीवन-स्थितियाँ मूल रूप से बदलीं, या यह ऊर्जा मुख्यतः शहरी और औद्योगिक केंद्रों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रवाहित हुई?
पर्यटन : सौंदर्य का बाज़ारीकरण
आज बाणासुरा सागर बाँध को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है—नौकायन, ट्रेकिंग, फोटोग्राफी, वन्यजीव दर्शन। यह सब आधुनिक पूँजीवाद की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति को भी एक “उपभोक्ता वस्तु” में बदल दिया जाता है। पहाड़, पानी, पक्षी और फूल—सब कुछ देखने, खपत करने और तस्वीरों में कैद करने योग्य माल बन जाता है।
प्रवेश शुल्क, समय-सारिणी और “सर्वश्रेष्ठ मौसम”—ये सभी इस बात के संकेत हैं कि प्रकृति अब सामूहिक जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि नियंत्रित मनोरंजन का साधन है।
मिथक का उपयोग : वैचारिक आवरण
बाँध का नाम बाणासुर पर रखा जाना कोई मासूम सांस्कृतिक चयन नहीं है। मिथक यहाँ एक वैचारिक आवरण का काम करता है—जो आधुनिक तकनीकी हस्तक्षेप को प्राचीन गौरव से जोड़ देता है। इससे विकास की प्रक्रिया स्वाभाविक और निर्विवाद प्रतीत होती है, जबकि उसके पीछे के सामाजिक-आर्थिक प्रश्न—भूमि, विस्थापन, श्रम और असमानता—पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।
निष्कर्ष
बाणासुरा सागर बाँध न तो केवल एक इंजीनियरिंग चमत्कार है, न ही मात्र एक पर्यटन स्थल। यह उस ऐतिहासिक क्षण की अभिव्यक्ति है जहाँ आधुनिक राज्य, पूँजी और तकनीक ने प्रकृति को अपने अधीन कर लिया है। इस बाँध को समझने का सही तरीका यही है कि हम उससे जुड़े उत्पादन-संबंधों, वर्गीय हितों और वैचारिक आवरणों को पहचानें।
क्योंकि इतिहास में न बाँध तटस्थ होते हैं, न मिथक—
वे हमेशा किसी न किसी सामाजिक शक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं।