अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण—जिसे *“ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व”* कहा गया—को शासक वर्ग की सरकार ने “कानून-प्रवर्तन” की आड़ में वैध ठहराने का प्रयास किया। राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनके सहयोगियों पर *नार्को-टेररिज़्म* के आरोप लगाकर, उन्हें न्यूयॉर्क ले जाकर मुक़दमे के नाम पर प्रस्तुत करना, आधुनिक साम्राज्यवाद की उसी पुरानी पद्धति का उदाहरण है जिसमें दमन को न्याय और लूट को नैतिकता कहा जाता है।
यहाँ तथाकथित आरोप—कोकीन तस्करी, आतंकवादी समूहों से गठजोड़—वस्तुतः कारण नहीं, बल्कि बहाने हैं। वास्तविक कारण उत्पादन के साधनों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की वह अनिवार्यता है जो पूँजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों से जन्म लेती है। वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार, गैस, सोना और अन्य खनिज—ये ही वह भौतिक आधार हैं जिन पर अमरीकी पूँजी की भूख टिकी है। “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “क्षेत्रीय स्थिरता” की भाषा उसी वर्गीय स्वार्थ का वैचारिक आवरण है।
मदुरो की लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न उठाना भी उसी क्रम का हिस्सा है। इतिहास बताता है कि जब-जब किसी देश की राजनीतिक संरचना पूँजी के निर्बाध विस्तार में बाधा बनती है, तब-तब “लोकतंत्र” का तराजू उसी ओर झुका दिया जाता है जहाँ मुनाफ़ा अधिक हो। अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन यहाँ कोई अपवाद नहीं, बल्कि नियम है—क्योंकि क़ानून स्वयं वर्ग-शक्ति का संगठित रूप होता है।
तेल उद्योग में सक्रिय विदेशी कंपनियाँ—शेवरॉन, सीएनपीसी, साइनोपेक, रेप्सोल, एनी, रोसनेफ्ट, टोटलएनर्जीज़, बीपी, शेल—इस पूरे संघर्ष की आर्थिक नसें हैं। इनके निवेश, ऋण और संयुक्त उपक्रम वेनेजुएला को वैश्विक पूँजी के जाल में बाँधते हैं। प्रतिबंध, परिसंपत्ति ज़ब्ती और कूटनीतिक दबाव—ये सब उसी संघर्ष के औज़ार हैं जिसमें राज्य, पूँजी का कार्यकारी समिति बनकर काम करता है।
वैश्विक बाज़ार पर इसके प्रभाव—तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमरीकी ऊर्जा कंपनियों का लाभ, चीन के निवेशों का जोखिम, भारत जैसे देशों के लिए अवसर—यह सब पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की असमान और संकटग्रस्त प्रकृति को उजागर करता है। उत्पादन की अराजकता और मुनाफ़े की अंधी दौड़ देशों को युद्ध के कगार तक धकेलती है।
इसलिए वेनेजुएला की घटना को किसी एक व्यक्ति की गिरफ्तारी या किसी एक सरकार के पतन के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। यह उस ऐतिहासिक संघर्ष का एक अध्याय है जिसमें श्रम और पूँजी, संप्रभुता और साम्राज्यवाद, जनता और एकाधिकार आमने-सामने खड़े हैं। जब तक उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व और राज्य-शक्ति का वर्गीय चरित्र बना रहेगा, तब तक ऐसे “ऑपरेशन” पूँजी के तर्कसंगत परिणाम बने रहेंगे—और उनका प्रतिरोध भी, अनिवार्य रूप से, इतिहास की गति का हिस्सा होगा।
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