Total Pageviews

Friday, 13 February 2026

2. इतिहास, वर्ग और सत्ता की भौतिकता- औरंगजेब के संदर्भ में

 इतिहास को जब नैतिक कथाओं, धार्मिक सद्गुणों या “महान शासकों” की निजी तपस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब वह इतिहास नहीं रहता—वह विचारधारात्मक धुंध बन जाता है। मार्क्सवाद हमें चेतावनी देता है कि किसी भी युग, किसी भी शासक का मूल्यांकन उसकी निजी जीवन-शैली से नहीं, बल्कि उसके शासन की भौतिक संरचना, वर्ग-संबंधों और उत्पादन-संबंधों से किया जाना चाहिए।

औरंगज़ेब के टोपी सिलने या साधारण मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की कथा—यदि सत्य भी मान ली जाए—तो वह राज्य की वर्ग-प्रकृति को नहीं बदल देती। दासता, बेगार, लगान, जज़िया, ज़कात—ये सब राज्य द्वारा अधिशेष के अपहरण के रूप हैं। प्रश्न यह नहीं कि कर किससे कितना लिया गया, बल्कि यह है कि किस वर्ग के हित में लिया गया और किस वर्ग के श्रम से लिया गया।

साम्राज्य की भौगोलिक विशालता—चीन से बड़ा या छोटा—जनता की मुक्ति का प्रमाण नहीं होती। साम्राज्य का फैलाव अक्सर किसानों पर बढ़े लगान, सैनिक भर्ती और युद्ध-खर्च का पर्याय होता है। मुग़ल भारत की “25% वैश्विक GDP” जैसी संख्याएँ, यदि किसी हद तक सही भी हों, तो वे अधिशेष के केंद्रीकरण को दिखाती हैं—न कि श्रमिक-किसान की खुशहाली को। उत्पादन समाज करता है; अधिशेष सत्ता हथियाती है।


जज़िया और ज़कात की तुलना को नैतिक तराज़ू पर तौलना भटकाव है। कर का धार्मिक लेबल उसकी वर्गीय हिंसा को नहीं मिटाता। किसान—हिंदू हो या मुसलमान—लगान और बेगार की चक्की में पिसता रहा। राज्य का धर्म चाहे जो हो, राज्य की वर्ग-प्रकृति निर्णायक रहती है।


दरबार में हिंदू राजाओं का प्रतिशत बढ़ना—यह सत्ता की साझेदारी का संकेत हो सकता है, सत्ता की लोकतांत्रिकता का नहीं। सामंती व्यवस्था में विविध कुलीन समूहों की भागीदारी जनता की मुक्ति नहीं लाती; वह केवल शोषण के प्रबंधन को स्थिर करती है।


किसी एक मंदिर या मस्जिद को तोड़ने-बचाने की कथाएँ इतिहास का केंद्र नहीं होनी चाहिए। शासक अक्सर धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता को सत्ता-संतुलन के औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं। मार्क्सवाद के लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि इन निर्णयों ने किस वर्ग को लाभ पहुँचाया और किस वर्ग को नियंत्रित किया।


औपनिवेशिक लूट निर्विवाद है। पर यह कहना कि उससे पहले सब न्यायपूर्ण था—इतिहास का सरलीकरण है। ब्रिटिश पूँजीवाद ने पूर्व-पूँजीवादी शोषण को तोड़ा नहीं; उसने उसे वैश्विक बाज़ार से जोड़कर और तीखा किया।

1947 के बाद “भूरे अंग्रेज़ों” द्वारा टैक्स-हेवनों में पूँजी का पलायन—यह उसी पूँजीवादी निरंतरता का प्रमाण है, जहाँ राज्य जनता का नहीं, पूँजी का सेवक बना रहता है।


बहादूर शाह ज़फ़र की त्रासदी औपनिवेशिक दमन की गवाही है; 1857 का संघर्ष बहुवर्गीय विद्रोह था। पर उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सामंती राज्य जनता का राज्य था। शहादत व्यक्तिगत हो सकती है; राज्य-चरित्र संरचनात्मक होता है।


निष्कर्ष: इतिहास को वर्ग-दृष्टि से पढ़ें


औरंगज़ेब को न दानव बनाइए, न संत। मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि इतिहास नायकों की नैतिकता से नहीं, उत्पादन-संबंधों से चलता है। साम्राज्य—चाहे मुग़ल हों या ब्रिटिश—जब तक जनता के हाथ में सत्ता नहीं, तब तक वे अलग-अलग रूपों में एक ही शोषण-तंत्र हैं।

आज का काम यह नहीं कि पुराने शासकों की धार्मिक छवियाँ गढ़ी जाएँ, बल्कि यह कि पूँजीवादी राज्य की मौजूदा लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और वर्ग-विस्मृति को उजागर किया जाए। इतिहास का सही उपयोग वर्तमान संघर्ष के लिए होता है—न कि अतीत के शासकों की प्रशस्ति के लिए।


मार्क्सवादी दृष्टि हमें यही सिखाती है कि इतिहास न तो महान व्यक्तियों की नैतिक कथाएँ हैं, न ही धार्मिक प्रतीकों का युद्ध। इतिहास वर्गों के संघर्ष, उत्पादन के नियंत्रण और अधिशेष के वितरण की कहानी है। और जब तक इस बुनियादी सच को नहीं समझा जाएगा, तब तक औरंगज़ेब भी एक मिथक बने रहेंगे—और आज का शासक वर्ग भी अपने अपराधों को इतिहास की धूल में छिपाता रहेगा।


https://www.facebook.com/share/p/1D2z52K3Nv/ 


No comments:

Post a Comment