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Friday, 13 February 2026

4. रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन

 रोसा लक्ज़मबर्ग और व्लादिमीर इलिच लेनिन को यदि केवल व्यक्तियों के रूप में देखा जाए, तो हम उनके मतभेदों में उलझकर रह जाते हैं। किंतु मार्क्सवाद की पद्धति हमें यह सिखाती है कि इतिहास को व्यक्तियों की मनोवृत्ति से नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से समझा जाए, जिनमें वे कार्य करते हैं। इस दृष्टि से देखें तो रोसा और लेनिन न तो प्रतिद्वंद्वी थे, न परस्पर विरोधी धाराओं के प्रतिनिधि—वे एक ही ऐतिहासिक कार्यभार के दो भिन्न रूप थे।

दोनों बीसवीं सदी की शुरुआत में उस दौर में खड़े थे, जब पूंजीवाद अपने साम्राज्यवादी चरण में प्रवेश कर चुका था, द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सड़ने लगा था, और सर्वहारा आंदोलन के सामने यह प्रश्न खड़ा था कि क्रांति को सुधार में घुलने दिया जाए या सत्ता तक पहुँचाया जाए। इस ऐतिहासिक दबाव की पृष्ठभूमि में लक्ज़मबर्ग और लेनिन को समझा जा सकता है।

एकता: ऐतिहासिक आवश्यकता की अभिव्यक्ति

मार्क्सवादी शब्दों में, “विचारधाराएँ आकस्मिक नहीं होतीं, वे सामाजिक संबंधों की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति होती हैं।” इस अर्थ में रोसा और लेनिन दोनों ही क्रांतिकारी मार्क्सवाद की अनिवार्य उपज थे।

सुधारवाद और अवसरवाद के विरुद्ध उनका संघर्ष कोई व्यक्तिगत जिद नहीं था, बल्कि उस समय के समाज-जनवादी आंदोलन की वर्गीय सड़ांध के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। बर्नस्टीन का संशोधनवाद वस्तुतः जर्मन पूंजीवाद की सापेक्ष स्थिरता और श्रमिक अभिजात वर्ग के उभार का वैचारिक प्रतिबिंब था। रोसा की Reform or Revolution? और लेनिन की What Is to Be Done? इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति के विरुद्ध दो मोर्चे थे—एक पश्चिमी यूरोप की परिस्थितियों से बोलता हुआ, दूसरा ज़ारवादी रूस की दमनकारी संरचना से।

प्रथम विश्व युद्ध के समय उनकी अंतरराष्ट्रीयता कोई नैतिक ऊँचाई नहीं, बल्कि वर्गीय स्थिति की तार्किक परिणति थी। जब अधिकांश समाजवादी नेता अपनी-अपनी बुर्जुआ सरकारों के पीछे खड़े हो गए, तब रोसा और लेनिन ने युद्ध को वही कहा जो वह था—साम्राज्यवादी लूट का हिंसक रूप। यहाँ उनका मिलन सिद्धांत का नहीं, बल्कि इतिहास का था।

अक्टूबर क्रांति के प्रति रोसा का समर्थन भी इसी ऐतिहासिक समझ से उपजा था। उन्होंने इसे “साहसिक छलांग” कहा—क्योंकि पिछड़े रूस में सर्वहारा सत्ता कोई आदर्श परिस्थिति नहीं, बल्कि मजबूरी थी। फिर भी उन्होंने समझा कि इतिहास हमेशा आदर्श परिस्थितियों में नहीं चलता, बल्कि संकटों के बीच रास्ता बनाता है।

मतभेद: भिन्न परिस्थितियों की उपज

मार्क्सवादी पद्धति हमें यह भी सिखाती है कि मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धांत नहीं, बल्कि परिस्थितियों के साथ विकसित होने वाली पद्धति है। इसलिए रोसा और लेनिन के मतभेदों को “सही–गलत” के नैतिक तराज़ू पर तौलना ऐतिहासिक भूल होगी।

पार्टी संगठन पर उनका विवाद मूलतः रूस और पश्चिमी यूरोप के भिन्न सामाजिक ढाँचों से निकला। ज़ारवादी दमन, अवैधता और पुलिस-राज्य की स्थितियों में लेनिन का केंद्रीकरण एक ऐतिहासिक आवश्यकता था। वहीं जर्मनी जैसे अपेक्षाकृत विकसित पूंजीवादी समाज में रोसा को यह केंद्रीकरण नौकरशाही खतरे की तरह दिखा। दोनों की दलीलें अपने-अपने संदर्भों में तर्कसंगत थीं।

राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का प्रश्न भी इसी तरह समझा जाना चाहिए। रोसा का राष्ट्रवाद-विरोध उस समय के पोलिश और जर्मन बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अनुभव से निकला था। लेनिन का समर्थन रूस जैसे बहुराष्ट्रीय साम्राज्य में उत्पीड़ित राष्ट्रों की वास्तविक स्थिति से। यहाँ कोई शाश्वत सत्य नहीं, बल्कि भिन्न ऐतिहासिक भूमियों पर खड़े मार्क्सवाद दिखाई देते हैं।

साम्राज्यवाद और पूंजी संचय पर विवाद भी इसी क्रम का हिस्सा है। रोसा ने पूंजीवाद के विस्तार की बाधाओं को उजागर किया, लेनिन ने उसके संगठनात्मक रूप—वित्त पूंजी, एकाधिकार और असमान विकास—को। लेनिन की तीखी आलोचनाएँ दरअसल इस बात का प्रमाण हैं कि वह रोसा को गंभीर सैद्धांतिक प्रतिद्वंद्वी मानते थे, न कि किसी भटकी हुई आत्मा को।

लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्तता पर मतभेद भी किसी नैतिक असहमति का नहीं, बल्कि क्रांति की गति और रूप को लेकर थे। रोसा जनता की सृजनात्मक शक्ति को उभारती थीं, लेनिन उसे दिशा देने वाली संगठनात्मक शक्ति पर जोर देते थे। इतिहास ने दिखाया कि दोनों के बिना क्रांति अपूर्ण रहती है।

लेनिन की श्रद्धांजलि: ऐतिहासिक न्याय

रोसा लक्ज़मबर्ग की मृत्यु के बाद लेनिन की प्रसिद्ध श्रद्धांजलि को यदि मार्क्सवादी की शैली में पढ़ें, तो वह व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक मूल्यांकन है। “ईगल और मुर्गियों” का रूपक इस बात को स्वीकार करता है कि रोसा की गलतियाँ भी एक ऊँचे स्तर की थीं—वे क्रांतिकारी प्रयास की गलतियाँ थीं, न कि सुधारवादी आत्मसमर्पण की।

यही ऐतिहासिक भौतिकवाद का निष्कर्ष है: रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन के बीच मतभेद मार्क्सवाद की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। वे दोनों उस युग की संतान थे, जब इतिहास ने पूंजीवाद को चुनौती देने के लिए एक से अधिक रास्ते खोले थे।

और इसलिए, उन्हें अलग-अलग खाँचों में बाँटना नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक संघर्ष के दो रूपों के रूप में समझना—यही मार्क्सवाद की सच्ची विरासत है।

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