किलिंग फ़ील्ड्स के सामने खड़े होकर मनुष्य का सन्न रह जाना स्वाभाविक है। खोपड़ियों की मीनारें, सामूहिक कब्रें, बच्चों की टूटी हड्डियाँ—यह सब इतिहास नहीं, बल्कि मानवता का अभियोग-पत्र हैं।
लेकिन यहीं से पहली वैचारिक भूल शुरू होती है।
इतिहास को यदि हम नैतिक झटके से पढ़ते हैं, तो हम शैतानों की सूची बना सकते हैं, पर शैतान पैदा करने वाली व्यवस्था को नहीं समझ पाते।
पोल पॉट कोई पागल अपवाद नहीं था—
वह एक ऐतिहासिक परिस्थिति का उत्पाद था। कंबोडिया कोई शून्य में पड़ा देश नहीं था, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की बमबारी, वियतनाम युद्ध की तबाही, और औपनिवेशिक लूट से तबाह सामाजिक संरचना का परिणाम था।
मार्क्सवाद कहता है—“व्यक्ति इतिहास नहीं बनाता, इतिहास व्यक्ति के माध्यम से अपनी आवश्यकता प्रकट करता है।”
पोल पॉट की बर्बरता समाजवादी विचारधारा का निष्कर्ष नहीं, बल्कि विचारधारा से कटा हुआ सत्ता का उन्माद थी। वर्ग-संघर्ष को समझे बिना, उत्पादन संबंधों को बदले बिना, केवल “कृषि-यूटोपिया” थोप देना क्रांति नहीं—प्रतिक्रांति होती है।
अब आइए उस तुलना पर, जिसे बड़ी चालाकी से हथियार बनाया गया है।
“अकबर ने 55,000 सिर कटवाए, फिर भी भारत में उसे महान कहा जाता है।” यह तर्क भी इतिहास को नैतिक उपदेश में बदल देने की बीमारी से ग्रस्त है। अकबर को “महान” कहने वाली वह कौन-सी वर्गीय शक्ति थी? दरबारी इतिहासकार, ज़मींदार वर्ग, औपनिवेशिक इतिहासलेखन—इन सबने राज्य हिंसा को “सभ्यता” का नाम दिया।
यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि “किसने ज़्यादा सिर काटे?” प्रश्न यह है कि किस वर्ग के हित में हिंसा को वैध ठहराया गया।
जब आप कहते हैं— “हमने सड़कों, शहरों, यूनिवर्सिटीज़ के नाम लुटेरों पर रख दिए” तो आप सही गुस्से में हैं, लेकिन अधूरे विश्लेषण में फँस जाते हैं।
क्यों रखे गए ये नाम? इसलिए नहीं कि “हमारे पुरखे मूर्ख थे”, बल्कि इसलिए कि
हर शासक वर्ग अपने पूर्वजों को भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।
इतिहास की किताबें “हमारे मुँह पर थप्पड़” नहीं हैं— वे शासक वर्ग के मुक्के हैं, जो शिक्षा के माध्यम से मारे जाते हैं।
सबसे खतरनाक बात तब होती है जब पोल पॉट की बर्बरता को पूरे कम्युनिज़्म का पर्याय बना दिया जाता है, लेकिन औपनिवेशिक नरसंहार, दास व्यापार, हिरोशिमा–नागासाकी, इराक, वियतनाम, फिलिस्तीन—इन सबको “इतिहास की भूल” कहकर छोड़ दिया जाता है। यह चयनात्मक नैतिकता दरअसल साम्राज्यवादी नैरेटिव है।
मार्क्सवाद की दृष्टि हमें सिखाती है— इतिहास को रोष से नहीं, संरचना से पढ़ो। हिंसा को व्यक्ति की दुष्टता से नहीं, वर्गीय हित से जोड़ो। और सबसे ज़रूरी—यदि शैतान बार-बार पैदा होते हैं, तो समस्या शैतान नहीं, वह समाज है जो उन्हें जन्म देता है, पालता है और फिर उनकी मूर्तियाँ बनाता है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि— “कब शैतान बादशाह हो गए?” असल सवाल यह है— किस वर्ग ने उन्हें बादशाह बनाया, और आज भी क्यों बनाए जा रहे हैं?
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