आजकल एक लोकप्रिय कथा गढ़ी जा रही है—कि भारत की समस्या “धर्म” है और समाधान “नास्तिकता”। कुछ लोग पाँच या दस नास्तिक विचारकों की सूची बनाकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि समाज जितना धार्मिक होगा, उतना ही पिछड़ा होगा; और जितना नास्तिक होगा, उतना ही प्रगतिशील और सुखी होगा।
मार्क्सवादी परंपरा ऐसी सरल व्याख्याओं को ऐतिहासिक रूप से सतही और दार्शनिक रूप से आदर्शवादी मानती है।
विचार नहीं, भौतिक जीवन स्थितियाँ इतिहास को चलाती हैं
विचारधाराएँ आकाश से नहीं गिरतीं; वे समाज की भौतिक परिस्थितियों से पैदा होती हैं। इसलिए यह कहना कि “भारत में अंधविश्वास इसलिए है क्योंकि लोग तर्क नहीं करते” इतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि “गरीबी इसलिए है क्योंकि गरीब लोग मेहनत नहीं करते।”
यदि समाज में असुरक्षा, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट, शिक्षा की कमी और सामाजिक दमन मौजूद हैं, तो लोग सांत्वना और सुरक्षा के प्रतीक खोजेंगे—चाहे वह धर्म हो, जाति हो या राष्ट्रवाद। धर्म का प्रश्न पहले सामाजिक है, फिर दार्शनिक।
नास्तिकता अपने-आप में प्रगतिशील नहीं होती
इतिहास में कई नास्तिक शासक भी दमनकारी रहे हैं। और कई धार्मिक समाजों ने भी सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया है। मार्क्सवाद धर्म को केवल “गलत विचार” नहीं मानता; वह उसे सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी मानता है मार्क्स ने लिखा था— “धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है।” इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म आदर्श है—बल्कि यह कि धर्म को खत्म करने के लिए पहले उस पीड़ा की परिस्थिति को खत्म करना होगा जो उसे जन्म देती है।
स्कैंडिनेविया बनाम भारत — गलत तुलना
यह कहना कि “स्कैंडिनेवियाई देश नास्तिक हैं इसलिए खुश हैं” ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरुद्ध है। वास्तविक प्रश्न हैं: वहाँ मजबूत वेलफेयर स्टेट क्यों है? वहाँ शिक्षा सार्वभौमिक क्यों है? वहाँ स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक क्यों है? वहाँ श्रमिक अधिकार मजबूत क्यों हैं?
यदि कोई समाज आर्थिक सुरक्षा देता है, तो धार्मिक निर्भरता स्वाभाविक रूप से घटती है। तर्कवाद का विकास सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है— सिर्फ दार्शनिक प्रचार से नहीं।
भारत में तर्क और धर्म साथ-साथ क्यों बढ़ रहे हैं?
यह कोई विरोधाभास नहीं है, पूंजीवादी विकास असमान होता है। एक ही समाज में आप पाएँगे: 5G टेक्नोलॉजी और साथ में मध्यकालीन सामाजिक संबंध, क्योंकि आर्थिक विकास असमान है— शहर और गाँव, अमीर और गरीब, शिक्षित और वंचित — सब अलग गति से बदलते हैं।
“धर्म बनाम विज्ञान” — एक झूठा द्वंद्व है।
समस्या धर्म नहीं, समस्या है— जब धर्म सामाजिक शक्ति संरचनाओं का औज़ार बन जाता है। धर्म तब खतरनाक होता है जब: वह सामाजिक अन्याय को वैधता देता है, वह प्रश्न पूछने से रोकता है, वह शोषण को पवित्र बना देता है। लेकिन केवल धर्म-विरोधी नारे लगाकर वैज्ञानिक समाज नहीं बनता।
भारतीय नास्तिक परंपरा
अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन —इनका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि वे नास्तिक थे। उनका महत्व इसलिए था क्योंकि: उन्होंने सामाजिक शोषण को चुनौती दी, उन्होंने वर्ग और सत्ता संरचनाओं पर प्रश्न उठाए, उन्होंने मनुष्य की ऐतिहासिक भूमिका को समझा। यदि हम उन्हें केवल “नास्तिक आइकन” बना दें, तो हम उनके क्रांतिकारी सामाजिक संदर्भ को मिटा देते हैं, सावरकर से उनके फर्क को धूमिल कर देते है।
यदि किसी व्यक्ति को “तर्क का दर्पण” कहा जाता है, तो पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उसने क्या कहा, बल्कि यह होना चाहिए कि उसके विचारों ने किन सामाजिक शक्तियों को मजबूत किया और किन्हें कमजोर। सावरकर का तर्कवाद सार्वभौमिक मानवीय मुक्ति की ओर नही जाता है, वो केवल एक नए प्रभुत्वशाली राष्ट्रवादी ढाँचे को वैचारिक आधार देता है।
यदि कोई पशु पूजा का विरोध करता है तो यह यह अपने आप मे प्रगतिशील नही हो सकता। पर मार्क्सवादी दृष्टि यह पूछेगी: क्या यह आलोचना सामाजिक उत्पादन संबंधों की आलोचना तक जाती है? या केवल सांस्कृतिक सुधार तक सीमित रहती है?
यदि समाज में जाति, वर्ग, भूमि स्वामित्व और श्रम शोषण की संरचना जस की तस रहती है — तो केवल सांस्कृतिक सुधार समाज को मूल रूप से नहीं बदलते। सावरकर की ‘नास्तिकता’ की यही सीमा थी।
भाग्यवाद का विरोध ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील भूमिका निभाता रहा है। परंतु यदि भाग्यवाद की जगह आक्रामक राष्ट्रवाद या सैन्यवाद ले ले — तो समाज केवल एक नई प्रतिक्रियावादी वैचारिक संरचना में प्रवेश करता है। मार्क्सवादी दृष्टि में मानव मुक्ति केवल धार्मिक निष्क्रियता से बाहर निकलना नहीं है — बल्कि श्रम, उत्पादन और संसाधनों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण स्थापित करना है। अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन की तरह सावरकर इस कसौटी पर खड़ा नही उतरते।
इतिहास में कई बार “तर्कवाद” का उपयोग राष्ट्रवादी लामबंदी के लिए किया गया है। यदि तर्कवाद वैज्ञानिक समाजवाद की दिशा में नहीं जाता, बल्कि सांस्कृतिक-राजनीतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करता है — तो वह ऐतिहासिक रूप से सीमित और अंतर्विरोधी भूमिका निभाता है। सावरकर इसके अपवाद नही थे।
अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और सावरकर की विरासत को समझने के लिए हमें यह देखना होगा:
क्या उनके विचार उत्पादन संबंधों को चुनौती देते हैं?
क्या वे श्रमिक वर्ग की ऐतिहासिक मुक्ति में योगदान करते हैं?
या वे केवल एक नए प्रभुत्वशाली सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को वैचारिक आधार देते हैं?
यदि तर्कवाद सामाजिक क्रांति से कट जाता है — तो वह केवल बुर्जुआ आधुनिकता का एक रूप बनकर रह जाता है। मार्क्सवादी परंपरा में सच्चा तर्कवाद वही है जो समाज को केवल सोच में नहीं, बल्कि भौतिक जीवन की संरचना में बदलव करे।
मार्क्सवादी परंपरा में तर्कवाद किताबों का शब्द नहीं, वह हथौड़ा है —जो उत्पादन संबंधों की जंजीरों पर पड़ता है। सच्चा तर्कवाद वह है जो केवल दिमाग़ नहीं बदलता, बल्कि रोटी, ज़मीन, श्रम और सत्ता के रिश्ते भी बदलता है।
और इतिहास को तोड़-मरोड़कर अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और सावरकर को सिर्फ “नास्तिकता” के धागे से बाँध देना — यह इतिहास नहीं, विचारधारा का धुंध फैलाना है।
क्रांतिकारी नास्तिकता सिर्फ भगवान से इंकार नहीं करती, वह शोषण से भी इंकार करती है। जो नास्तिकता वर्ग-सत्ता को चुनौती देती है — वह मुक्ति की राह बनाती है। और जो नास्तिकता सिर्फ सांस्कृतिक या राष्ट्रवादी ढाँचों की सेवा करे — वह जनता की चेतना को भटकाने का हथियार बन सकती है। क्रांतिकरी नास्तिकता का तर्क साफ है — धर्म से मुक्ति काफी नहीं, शोषण से मुक्ति ज़रूरी है। मिहनतकस जनता का इतिहास किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए माफ़ नहीं करता कि उसने मंदिर की जगह प्रयोगशाला की बात की हो।
इसलिये, अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और सावरकर को सिर्फ नास्तिकता के बहाने एक साथ दिखाना फासीवादी साजिस का ही हिस्सा है।
आधुनिक पूंजीवाद और धर्म का बाज़ारीकरण
आज धर्म क्यों बढ़ रहा है? क्योंकि आधुनिक पूंजीवाद असुरक्षा पैदा करता है: नौकरी अस्थिर, स्वास्थ्य महंगा, शिक्षा महंगी, भविष्य अनिश्चित। ऐसे समाज में धर्म “भावनात्मक बीमा” बन जाता है।
कॉरपोरेट पूंजी भी इसे समझती है— धर्म एक बाजार भी है, एक पहचान भी है, एक राजनीतिक उपकरण भी है।
शिक्षा व्यवस्था — असली सवाल
यदि शिक्षा आलोचनात्मक सोच नहीं सिखाती, तो समाज तर्कवादी नहीं बनेगा — चाहे वह धार्मिक हो या नास्तिक। सिर्फ STEM शिक्षा से तर्कवाद नहीं आता। सामाजिक विज्ञान, इतिहास, दर्शन — ये जरूरी हैं।
असली सवाल: तर्क या धर्म नहीं — शक्ति किसके पास है? मार्क्सवाद का केंद्रीय तर्क यही होता: समाज को बदलने के लिए विचार बदलना जरूरी है, लेकिन उससे पहले भौतिक जीवन स्थितियाँ बदलनी होंगी।
यदि: आर्थिक असमानता घटे, सामाजिक सुरक्षा बढ़े, शिक्षा सार्वभौमिक हो, लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़े, तो तर्क स्वतः बढ़ेगा।
निष्कर्ष
भारत की समस्या “बहुत धर्म” नहीं है। भारत की समस्या है—असमान विकास,
सामाजिक दमन, और आर्थिक असुरक्षा। धर्म और अंधविश्वास लक्षण हैं, बीमारी नहीं। यदि समाज को तर्कवादी बनाना है,
तो केवल विचारधारा नहीं—सामाजिक ढांचा बदलना होगा।
अंततः मार्क्स शायद यही कहते: समाज को तर्क से नहीं, बल्कि उस समाज की परिस्थितियों को बदलकर तर्कवादी बनाया जाता है जिसमें लोग जीते हैं। और जब मनुष्य डर से नहीं, बल्कि गरिमा से जीने लगेगा—तब अंधविश्वास स्वतः कमजोर होता जाएगा।
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