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Saturday, 14 February 2026

10. कविता - हड़तालनामा

 हड़ताल कोई छुट्टी नहीं होती,

यह वह दिन है

जब कारख़ाने की साँस

मालिक की जेब पर सवाल रख देती है।


यह वह पल है

जब लोहे की मशीनें

पहली बार समझती हैं

कि उनका शोर

किसके हक़ में बजता है।


चिमनियाँ अचानक

ख़ामोश हो जाती हैं,

और घड़ियाँ—

जो अब तक मुनाफ़ा नापती थीं—

घबराकर

समय से पूछती हैं

“अब क्या होगा?”


हड़ताल मज़दूर को सिखाती है

कि उसका दुश्मन

कोई एक आदमी नहीं,

बल्कि वह व्यवस्था है

जिसकी जेब में

क़ानून भी है,

डंडा भी,

और संसद की कुर्सी भी।


जब मज़दूर अकेला होता है

तो मालिक

बड़ा रहमदिल दिखता है—

थोड़ी हमदर्दी,

दो चार आँसू,

और ढेर सारा झूठ।

हड़ताल

इस रहमदिली का

नक़ाब उतार देती है।


हड़ताल शुरू होते ही

क़ानून जाग उठता है—

डंडों की खड़खड़ाहट में,

एफ़आईआर की स्याही में,

और गोलियों की

बेआवाज़ दलील में।

तब मज़दूर समझता है

कि यह राज्य

उसकी भूख से नहीं,

मालिक के डर से चलता है।


हड़ताल बताती है—

कि भूख कोई निजी हादसा नहीं,

यह राजनीति की बनाई हुई

साज़िश है।

कि कम मज़दूरी

किस्मत नहीं,

मुनाफ़े की पूरी

तदबीर है।


हड़ताल में

मज़दूर पहली बार

अपनी ताक़त देखता है—

खाली हाथों में

इतिहास का बोझ,

और आँखों में

भविष्य की आग।


छोटी-छोटी हड़तालें

सीढ़ियाँ होती हैं—

जिन पर चढ़कर

वर्ग

खुद को पहचानता है,

और आईने में

पहली बार

अपना चेहरा देखता है।


और जब हड़ताल

कारख़ाने की दीवारें लाँघकर

सड़कों, खेतों और खदानों तक

फैल जाती है,

तो वह सिर्फ़ माँग नहीं रहती—

वह ऐलान बन जाती है।


ऐलान

कि उत्पादन

मज़दूर के बिना

एक काग़ज़ी सपना है,

कि दुनिया

पूँजी के बिना भी चल सकती है,

मगर मज़दूर के बिना नहीं।


जिस दिन मज़दूर समझ ले

कि उसकी ताक़त

उसकी गिनती में नहीं,

उसकी एकता में है,

उसके संगठन में है—

उस दिन हड़ताल

मशीनें ही नहीं रोकती,

वह इतिहास की दिशा

मोड़ देती है।


और जिस रोज़

मज़दूर

अपनी पार्टी,

अपना अख़बार,

अपना सपना

खड़ा कर ले—

उस दिन लाल झंडा

कपड़े का टुकड़ा नहीं रहता,

वह आने वाले कल का

नक़्शा बन जाता है।


हड़ताल

उसी नक़्शे की

पहली रेखा है—

जो लिखती है,

ख़ून और पसीने की स्याही से:


दुनिया भर के मेहनतकशो,

एक हो।


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