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Saturday, 14 February 2026

मज़दूर विमर्श, अंक- 2, फरवरी, 2026

 अनुक्रम 


1. कविता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता  और समाज : एक भौतिकवादी दृष्टि

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2. इतिहास, वर्ग और सत्ता की भौतिकता- औरंगजेब के संदर्भ में

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/2.html?m=1 

3. किलिंग फ़ील्ड्स

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/3.html?m=1 

4. रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/4.html?m=1 

5. सशस्त्र संघर्ष और क्रांतिकारी रणनीति का सवाल

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/5.html?m=1 

6. तर्क बनाम अंधविश्वास”— या सामाजिक यथार्थ से पलायन?

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/6.html?m=1 

7. अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/7.html?m=1 

8. UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस

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9. यात्रा वृतांत भाग - 1

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/9-1.html?m=1 

10. कविता - हड़तालनामा

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/10.html?m=1 


10. कविता - हड़तालनामा

 हड़ताल कोई छुट्टी नहीं होती,

यह वह दिन है

जब कारख़ाने की साँस

मालिक की जेब पर सवाल रख देती है।


यह वह पल है

जब लोहे की मशीनें

पहली बार समझती हैं

कि उनका शोर

किसके हक़ में बजता है।


चिमनियाँ अचानक

ख़ामोश हो जाती हैं,

और घड़ियाँ—

जो अब तक मुनाफ़ा नापती थीं—

घबराकर

समय से पूछती हैं

“अब क्या होगा?”


हड़ताल मज़दूर को सिखाती है

कि उसका दुश्मन

कोई एक आदमी नहीं,

बल्कि वह व्यवस्था है

जिसकी जेब में

क़ानून भी है,

डंडा भी,

और संसद की कुर्सी भी।


जब मज़दूर अकेला होता है

तो मालिक

बड़ा रहमदिल दिखता है—

थोड़ी हमदर्दी,

दो चार आँसू,

और ढेर सारा झूठ।

हड़ताल

इस रहमदिली का

नक़ाब उतार देती है।


हड़ताल शुरू होते ही

क़ानून जाग उठता है—

डंडों की खड़खड़ाहट में,

एफ़आईआर की स्याही में,

और गोलियों की

बेआवाज़ दलील में।

तब मज़दूर समझता है

कि यह राज्य

उसकी भूख से नहीं,

मालिक के डर से चलता है।


हड़ताल बताती है—

कि भूख कोई निजी हादसा नहीं,

यह राजनीति की बनाई हुई

साज़िश है।

कि कम मज़दूरी

किस्मत नहीं,

मुनाफ़े की पूरी

तदबीर है।


हड़ताल में

मज़दूर पहली बार

अपनी ताक़त देखता है—

खाली हाथों में

इतिहास का बोझ,

और आँखों में

भविष्य की आग।


छोटी-छोटी हड़तालें

सीढ़ियाँ होती हैं—

जिन पर चढ़कर

वर्ग

खुद को पहचानता है,

और आईने में

पहली बार

अपना चेहरा देखता है।


और जब हड़ताल

कारख़ाने की दीवारें लाँघकर

सड़कों, खेतों और खदानों तक

फैल जाती है,

तो वह सिर्फ़ माँग नहीं रहती—

वह ऐलान बन जाती है।


ऐलान

कि उत्पादन

मज़दूर के बिना

एक काग़ज़ी सपना है,

कि दुनिया

पूँजी के बिना भी चल सकती है,

मगर मज़दूर के बिना नहीं।


जिस दिन मज़दूर समझ ले

कि उसकी ताक़त

उसकी गिनती में नहीं,

उसकी एकता में है,

उसके संगठन में है—

उस दिन हड़ताल

मशीनें ही नहीं रोकती,

वह इतिहास की दिशा

मोड़ देती है।


और जिस रोज़

मज़दूर

अपनी पार्टी,

अपना अख़बार,

अपना सपना

खड़ा कर ले—

उस दिन लाल झंडा

कपड़े का टुकड़ा नहीं रहता,

वह आने वाले कल का

नक़्शा बन जाता है।


हड़ताल

उसी नक़्शे की

पहली रेखा है—

जो लिखती है,

ख़ून और पसीने की स्याही से:


दुनिया भर के मेहनतकशो,

एक हो।


9. यात्रा वृतांत भाग - 1

 नामद्रोलिंग मठ : स्वर्णिम शांति के पीछे श्रम और निर्वासन का इतिहास

मैं जब बायलाकुप्पे पहुँचा, तो सड़क के दोनों ओर फैले खेत और बस्तियाँ मुझे यह याद दिला रही थीं कि यह धरती केवल ध्यान और मंत्रों की नहीं, बल्कि पसीने और निर्वासन की भी भूमि है। सामने नामद्रोलिंग मठ का स्वर्णिम शिखर चमक रहा था—ऐसा लगता था मानो धूप को सोने में ढाल दिया गया हो। पर यात्राएँ केवल देखने के लिए नहीं होतीं; वे समझने के लिए होती हैं। और समझ तब आती है, जब हम पत्थरों के नीचे दबी कहानी को पढ़ना सीखते हैं।

1963 में स्थापित यह मठ केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं है। यह उस इतिहास की जीवित निशानी है, जिसमें एक पूरी कौम को अपनी ज़मीन, अपनी भाषा और अपने पहाड़ छोड़कर निर्वासन की राह पकड़नी पड़ी। तिब्बती बौद्ध भिक्षु यहाँ शांति की साधना करते हैं, पर उनकी यह शांति संघर्ष और विस्थापन की राख से उपजी है। यह तथ्य कोई सजावटी सूचना नहीं, बल्कि इस मठ की आत्मा है।

मठ की वास्तुकला देखते ही यात्री ठिठक जाता है। ऊँचे स्तंभ, दीवारों पर उकेरी गई रंगीन कथाएँ, और प्रार्थना कक्ष में स्थापित बुद्ध शाक्यमुनि, गुरु पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ—ये सब केवल सौंदर्य के लिए नहीं हैं। ये प्रतीक हैं उस विचारधारा के, जो मनुष्य को हिंसा, लोभ और अज्ञान से मुक्त करना चाहती है।

यहाँ कला, धर्म से अलग नहीं है; वह शिक्षण का माध्यम है। दीवारों पर बने चित्र किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि चलती-फिरती किताबें हैं—जिन्हें पढ़ने के लिए आँखों के साथ विवेक भी चाहिए।

मुख्य प्रार्थना हॉल में खड़े बुद्ध शाक्यमुनि, पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ श्रद्धा जगाती हैं। पर एक मज़दूर की आँख इन मूर्तियों के साथ-साथ उन हाथों को भी देखती है जिन्होंने इन्हें गढ़ा—राजमिस्त्री, चित्रकार, बढ़ई, रंग घोलते श्रमिक। इतिहास अक्सर देवताओं को याद रखता है, श्रमिकों को नहीं। राहुल सांकृत्यायन हमें सिखाते हैं कि यात्रा करते समय देवालय नहीं, मानव श्रम को पहले पढ़ो।

यहाँ पाँच हज़ार से अधिक भिक्षु और भिक्षुणियाँ रहते हैं। वे पढ़ते हैं, ध्यान करते हैं, अनुशासन में जीते हैं। लेकिन यह अनुशासन किसी स्वर्ग से नहीं उतरा—यह एक सामूहिक जीवन की आवश्यकता है, जहाँ भोजन, वस्त्र और अध्ययन श्रम और संगठन से संभव होते हैं। यह मठ हमें बताता है कि अध्यात्म भी बिना सामूहिक श्रम के जीवित नहीं रह सकता।

पर्यटक जब यहाँ आते हैं, तो शांति की तलाश में आते हैं। मंत्रों की ध्वनि, प्रार्थना-चक्रों की घूमती लय—सब उन्हें कुछ देर के लिए शहरों की थकान से मुक्त कर देते हैं। लेकिन यह शांति भी वर्गों में बँटी है। पर्यटक के पास समय है, कैमरा है; भिक्षु के पास अनुशासन है, अध्ययन है; और आसपास के खेतों में काम करने वाले मज़दूर के पास केवल दिन भर की मज़दूरी की चिंता। तीनों एक ही भूगोल में हैं, पर एक ही जीवन में नहीं।

नामद्रोलिंग मठ का प्रवेश निःशुल्क है—यह बात अच्छी लगती है। पर असली सवाल यह है कि क्या ज्ञान, संस्कृति और शांति तक पहुँच भी उतनी ही सहज है? या फिर यह भी वैसे ही सीमित है जैसे ज़मीन, शिक्षा और सत्ता?

राहुल सांकृत्यायन होते तो शायद लिखते—“यह मठ मुझे यह नहीं सिखाता कि शांति कहाँ मिलेगी, बल्कि यह सिखाता है कि बिना न्याय के शांति केवल कुछ लोगों की सुविधा होती है।”

नामद्रोलिंग मठ सुंदर है, प्रेरक है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी शिक्षा यह है कि अध्यात्म को इतिहास से अलग मत करो। जो शांति श्रम और विस्थापन को भूल जाए, वह देर तक टिक नहीं सकती। और जो यात्री इसे समझ ले—वह केवल पर्यटक नहीं रहता, वह सचमुच का पथिक बन जाता है।

कुरुवा द्वीप : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी के बीच खड़ा सवाल

केरल के वायनाड ज़िले में स्थित कुरुवा द्वीप—घने जंगलों, बाँस की पगडंडियों और काबिनी नदी के शांत जल से घिरा—आज हमें प्रकृति के सौंदर्य का एक निष्कलंक उदाहरण दिखाई देता है। लगभग 950 एकड़ में फैला यह निर्जन द्वीप, पहली नज़र में मानो मनुष्य के हस्तक्षेप से मुक्त कोई स्वप्नलोक हो। लेकिन इतिहास और समाज को भौतिक परिस्थितियों के आलोक में देखने वाली दृष्टि हमें सिखाती है कि कोई भी प्राकृतिक स्थल केवल “सुंदर दृश्य” नहीं होता—वह सामाजिक संबंधों, उत्पादन-प्रणाली और वर्गीय हितों से गहराई से जुड़ा होता है।

कुरुवा द्वीप का आज का स्वरूप—जहाँ बाँस की बेड़ों पर सैर कराई जाती है, ट्रैकिंग के नाम पर जंगल को ‘अनुभव’ में बदला जाता है, और पक्षी-दर्शन को मनोरंजन के रूप में परोसा जाता है—पूँजीवादी पर्यटन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें प्रकृति स्वयं एक वस्तु (कमोडिटी) बन जाती है। यहाँ शांति भी बिकती है, हरियाली भी बिकती है, और ‘निर्जनता’ भी टिकट के दाम में शामिल हो जाती है।

पर प्रश्न यह है कि इस सौंदर्य का सामाजिक मूल्य क्या है और इसका लाभ किसे मिलता है?

जिस द्वीप को आज “अनहैबिटेड” कहा जा रहा है, वह इतिहास में मानव श्रम और स्थानीय आदिवासी समुदायों की स्मृतियों से पूरी तरह अछूता नहीं रहा होगा। जंगलों का संरक्षण आवश्यक है—इसमें कोई विवाद नहीं—लेकिन जब संरक्षण और पर्यटन राज्य तथा बाज़ार के साझा उपक्रम में बदल जाते हैं, तब प्रकृति के साथ-साथ श्रम भी अदृश्य हो जाता है। टिकट की कीमत, सीमित प्रवेश और नियंत्रित समय—ये सब उस अनुशासन के औज़ार हैं जिनसे प्रकृति को ‘व्यवस्थित उपभोग’ के दायरे में रखा जाता है।

कहा जाता है कि कुरुवा द्वीप पर प्रतिदिन केवल 200 पर्यटकों को प्रवेश की अनुमति है। यह सीमा पर्यावरण-संरक्षण के नाम पर उचित ठहराई जाती है, किंतु यह भी देखना आवश्यक है कि क्या इसी अनुपात में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं? बसें तो मनंतवाड़ी से द्वीप तक आती हैं, लेकिन क्या उस रास्ते पर रहने वाले श्रमिक और आदिवासी इस पर्यटन अर्थव्यवस्था के निर्णायक हैं या केवल सस्ते श्रम के स्रोत?

कला, संस्कृति और प्रकृति—तीनों को उनके भौतिक आधार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। कुरुवा द्वीप की ‘शांति’ उस समाज में पैदा हुई है जहाँ शहरों का शोर, प्रदूषण और असमानता लगातार बढ़ रही है। इसलिए यह शांति भी एक सामाजिक उत्पाद है—जिसे वही वर्ग ख़रीद सकता है जिसके पास समय और धन दोनों हैं। छात्र रियायत में प्रवेश पा सकता है, लेकिन वह भी दर्शक ही रहता है, स्वामी नहीं।

यह लेख कुरुवा द्वीप के सौंदर्य का निषेध नहीं करता। प्रश्न सौंदर्य के उपभोग के सामाजिक ढाँचे पर है। यदि प्रकृति केवल देखने की वस्तु बनती गई, और उसके संरक्षण की कीमत आम जनता से वसूली जाती रही, तो यह मॉडल अंततः प्रकृति और मनुष्य—दोनों के विरुद्ध जाएगा।

कुरुवा द्वीप हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम प्रकृति को बचा रहे हैं, या उसे नए सिरे से बेच रहे हैं।

और यही सवाल—इतिहास, समाज और उत्पादन संबंधों की कसौटी पर—आज के हर ‘इको-टूरिज़्म’ मॉडल से पूछा जाना चाहिए।

थमारसेरी चुरम : प्रकृति, श्रम और इतिहास की चढ़ाई

थमारसेरी चुरम—जिसे लोग थमारसेरी घाट भी कहते हैं—केरल का वह पहाड़ी दर्रा है जिसे अक्सर केवल उसकी सुंदरता, घुमावदार सड़कों और हरियाली के लिए याद किया जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 766 पर स्थित यह रास्ता कोझिकोड को वायनाड से जोड़ता है और अपने नौ हेयरपिन मोड़ों के कारण पर्यटकों को रोमांचित करता है। लेकिन यदि हम केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित रहें, तो हम इतिहास के उस श्रम, संघर्ष और सत्ता-संबंधों को अनदेखा कर देते हैं, जिनसे यह रास्ता बना और जिनके भीतर आज भी यह सांस लेता है।

 प्रकृति स्वयं में कभी तटस्थ नहीं होती; मनुष्य और समाज उसके साथ जिस तरह का संबंध बनाते हैं, वही उसके अर्थ को तय करता है। थमारसेरी चुरम भी कोई “प्राकृतिक चमत्कार” मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक उत्पाद है—औपनिवेशिक सत्ता, स्थानीय जनजातीय श्रम और व्यापारिक हितों का संयुक्त परिणाम।

ब्रिटिश शासन के दौर में इस घाट का विकास इसलिए किया गया क्योंकि साम्राज्य को वायनाड के संसाधनों—कॉफी, मसाले, लकड़ी—को तटवर्ती बाज़ारों तक पहुँचाने के लिए एक सुगम मार्ग चाहिए था। अंग्रेज़ इंजीनियरों के नाम इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन जिन आदिवासी समुदायों ने अपनी पीठ, अपने हाथों और अपने जीवन से इस रास्ते को काटकर निकाला, उनका ज़िक्र केवल हाशिये पर मिलता है। यही औपनिवेशिक इतिहास की मूल प्रवृत्ति है—श्रम को अदृश्य बनाना और सत्ता को महिमामंडित करना।

आज थमारसेरी चुरम को एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लक्किडी व्यू पॉइंट, चेन ट्री, ट्रेकिंग और वाइल्डलाइफ वॉचिंग—ये सब उपभोक्ता संस्कृति के आकर्षक शब्द हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि इस पर्यटन से किसे लाभ होता है? स्थानीय आदिवासी और श्रमिक समुदायों को, या उन पूँजीगत संरचनाओं को जो प्रकृति को भी एक वस्तु में बदल देती हैं?

800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह घाट केवल भौगोलिक चढ़ाई नहीं है; यह उस ऐतिहासिक चढ़ाई का प्रतीक है, जहाँ श्रम नीचे रह गया और लाभ ऊपर चला गया। मानसून के महीनों में जब यह इलाका हरियाली से भर जाता है, तब वही बारिश स्थानीय मेहनतकशों के लिए जोखिम भी बन जाती है—भूस्खलन, सड़क दुर्घटनाएँ और रोज़गार की अस्थिरता।

यह सही है कि नवंबर से फरवरी का समय यहाँ घूमने के लिए अनुकूल माना जाता है, और जून से सितंबर में प्रकृति अपने सबसे जीवंत रूप में दिखाई देती है। लेकिन एक ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि यह सवाल उठाए बिना नहीं रह सकती कि “अनुकूल” किसके लिए? पर्यटक के लिए, या उस मज़दूर के लिए जो हर मौसम में इस सड़क को चलने लायक बनाए रखने के लिए काम करता है?

थमारसेरी चुरम हमें यह सिखाता है कि प्रकृति, इतिहास और समाज को अलग-अलग खानों में नहीं बाँटा जा सकता। यह घाट पश्चिमी घाट की सुंदरता का प्रतीक है, लेकिन साथ ही औपनिवेशिक शोषण, अदृश्य श्रम और आज के नवउदारवादी पर्यटन मॉडल का भी साक्ष्य है। यदि हमें सचमुच इस स्थान को समझना है, तो हमें केवल कैमरा और आरामदायक जूते ही नहीं, बल्कि इतिहास की चेतना और श्रम के प्रति सम्मान भी साथ लेकर चलना होगा।

क्योंकि किसी भी रास्ते की असली कहानी उसके मोड़ों में नहीं,

उन हाथों में छिपी होती है

जिन्होंने उसे बनाया और आज भी संभाले हुए हैं।

पूकोडे झील : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी का अंतर्विरोध

केरल के वायनाड ज़िले में स्थित पूकोडे झील को अक्सर प्रकृति की एक शांत, सुंदर और निष्कलुष देन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हरी-भरी पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के घने वनों के बीच बसी यह मीठे पानी की झील, जिसका आकार भारत के भौगोलिक मानचित्र से मिलता-जुलता बताया जाता है, आज पर्यटन प्रचार का एक चमकदार प्रतीक बन चुकी है। झील की गहराई, उसकी जैव-विविधता, और उससे निकलने वाली पनमарам नदी—ये सब तथ्य पर्यटकों के लिए आकर्षण हैं, परंतु इन्हें केवल प्राकृतिक विशेषताओं के रूप में देखना एक अधूरा दृष्टिकोण होगा।

 प्रकृति, कला और संस्कृति—तीनों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं समझा जा सकता। इसी कसौटी पर यदि पूकोडे झील को देखा जाए, तो वह केवल एक सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि आधुनिक पर्यटन उद्योग और पूँजीवादी विकास की एक जीवंत प्रयोगशाला के रूप में सामने आती है।

प्रकृति का ऐतिहासिक रूपांतरण

पूकोडे झील का निर्माण किसी मानव योजना का परिणाम नहीं, बल्कि पश्चिमी घाट की भौगोलिक और जल-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का नतीजा है। यही झील पनमарам नदी का स्रोत है, जो आगे काबिनी नदी से मिलती है। अर्थात यह झील केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल-प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब प्रकृति को केवल “देखने” और “उपभोग करने” की वस्तु बना दिया जाता है, तब उसका सामाजिक महत्व गौण हो जाता है।

आज झील के चारों ओर बनी पगडंडियाँ, नौकायन सुविधाएँ, मछलीघर, बच्चों के पार्क और हस्तशिल्प की दुकानें—ये सब उस प्रक्रिया का संकेत हैं जिसमें प्रकृति को बाज़ार के अनुरूप ढाला जा रहा है। यहाँ प्रकृति स्वयं नहीं बोलती; उसकी ओर से पर्यटन विभाग बोलता है, मूल्य तय करता है और समय-सीमा निर्धारित करता है।

पर्यटन और वर्गीय यथार्थ

झील में नौकायन का आनंद लेने वाला पर्यटक अक्सर यह नहीं पूछता कि नाव चलाने वाला श्रमिक किस परिस्थिति में काम करता है, या आसपास के आदिवासी और किसान समुदायों का इस झील से क्या ऐतिहासिक संबंध रहा है। प्रवेश शुल्क, नौकायन शुल्क और “फुट स्पा” जैसी गतिविधियाँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि प्रकृति अब विश्राम का नहीं, बल्कि उपभोग का साधन बन चुकी है।

 यहाँ सौंदर्यबोध भी उत्पादन-संबंधों से नियंत्रित है। जो झील स्थानीय समुदाय के लिए पानी, मछली और जीवन का स्रोत रही होगी, वही आज मध्यमवर्गीय पर्यटन के लिए एक “वीकेंड डेस्टिनेशन” बन गई है।

जैव-विविधता और बाज़ार

पूकोडे झील में पाई जाने वाली स्थानीय मछली प्रजाति पेटिया पूकोडेन्सिस जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। परंतु जब इस जैव-विविधता को केवल “एक्वेरियम की वस्तु” या पर्यटन आकर्षण के रूप में देखा जाता है, तब संरक्षण का सवाल भी बाज़ार के अधीन हो जाता है।

संरक्षण तब तक सतही रहता है, जब तक वह स्थानीय समुदायों की जीवन-प्रणाली और उनके अधिकारों से नहीं जुड़ता।

पूकोडे झील हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का सौंदर्य अपने आप में निरपेक्ष नहीं होता। वह उस समाज की संरचना को प्रतिबिंबित करता है, जो उसे देखता और उपयोग करता है। यदि प्रकृति को केवल टिकट, शुल्क और “अनुभव” में बदल दिया जाएगा, तो अंततः वही संकट पैदा होगा, जिसे आज हम पर्यावरणीय विनाश के रूप में देख रहे हैं।

 ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि से यह आवश्यक है कि हम पूकोडे झील को केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों के एक जटिल रूप में समझें—जहाँ प्रकृति, श्रम और पूँजी एक-दूसरे से टकराते हैं। वास्तविक संरक्षण और सौंदर्यबोध तभी संभव है, जब प्रकृति को बाज़ार की वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक धरोहर के रूप में देखा जाए।


बाणासुरा सागर बाँध : मिथक, प्रकृति और उत्पादन-संबंधों का द्वंद्व



केरल के वायनाड ज़िले में स्थित बाणासुरा सागर बाँध को प्रायः एक अद्भुत प्राकृतिक और तकनीकी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि यह भारत का सबसे बड़ा मिट्टी का बाँध है और एशिया में दूसरा सबसे बड़ा। इसका नाम बाणासुर पर रखा गया—एक पौराणिक असुर राजा, महाबली का पुत्र, जिसके बारे में कथा है कि उसने इन्हीं पहाड़ियों पर तपस्या की थी।

परंतु यदि हम इस बाँध को केवल मिथक, पर्यटन और सौंदर्य के चश्मे से देखें, तो हम उसके वास्तविक सामाजिक और ऐतिहासिक अर्थ को समझने में असफल रहेंगे। किसी भी सांस्कृतिक या भौतिक रचना को समझने के लिए हमें उसके पीछे काम कर रही उत्पादन-पद्धति और वर्गीय संबंधों को देखना होगा।

निर्माण और उद्देश्य : विकास की भौतिक ज़रूरत

1979 में निर्मित बाणासुरा सागर बाँध बाणासुरसागर परियोजना का हिस्सा था। इसका घोषित उद्देश्य था—सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन। यहाँ हमें स्पष्ट दिखता है कि यह बाँध किसी राजा की तपस्या का परिणाम नहीं, बल्कि आधुनिक राज्य और पूँजी की उस ज़रूरत का परिणाम है, जहाँ जल को एक प्राकृतिक संसाधन से बदलकर “नियंत्रित उत्पादन-तत्व” बना दिया गया।

38.5 मीटर ऊँचाई और 685 मीटर लंबाई वाला यह बाँध, तथा इसके साथ बने छह सैडल बाँध, इस बात के प्रतीक हैं कि आधुनिक समाज प्रकृति को समग्र रूप में नहीं, बल्कि खंडों में बाँटकर नियंत्रित करना चाहता है। जल अब नदी नहीं, बल्कि “जलाशय” है—एक ऐसी इकाई, जिसे मापा, बाँटा और उपयोग में लाया जा सकता है।

जलाशय और ऊर्जा : प्रकृति से मूल्य की निकासी

इस बाँध से बना विशाल जलाशय, जिसे आज “क्रिस्टल-क्लियर पानी” और “हरे-भरे टापुओं” के रूप में प्रचारित किया जाता है, दरअसल उस प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें प्रकृति को सौंदर्य नहीं, उपयोग-मूल्य के रूप में देखा जाता है।

231.75 मेगावाट की स्थापित विद्युत क्षमता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बाँध का केंद्रीय महत्व पर्यटन नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन है—और ऊर्जा आधुनिक पूँजीवादी समाज में सबसे निर्णायक उत्पादन-तत्व है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं कि बिजली पैदा होती है या नहीं, बल्कि यह है कि यह बिजली किसके लिए और किस कीमत पर पैदा होती है। क्या इससे वायनाड के आदिवासी और किसान समुदाय की जीवन-स्थितियाँ मूल रूप से बदलीं, या यह ऊर्जा मुख्यतः शहरी और औद्योगिक केंद्रों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रवाहित हुई?

पर्यटन : सौंदर्य का बाज़ारीकरण

आज बाणासुरा सागर बाँध को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है—नौकायन, ट्रेकिंग, फोटोग्राफी, वन्यजीव दर्शन। यह सब आधुनिक पूँजीवाद की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति को भी एक “उपभोक्ता वस्तु” में बदल दिया जाता है। पहाड़, पानी, पक्षी और फूल—सब कुछ देखने, खपत करने और तस्वीरों में कैद करने योग्य माल बन जाता है।

प्रवेश शुल्क, समय-सारिणी और “सर्वश्रेष्ठ मौसम”—ये सभी इस बात के संकेत हैं कि प्रकृति अब सामूहिक जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि नियंत्रित मनोरंजन का साधन है।

मिथक का उपयोग : वैचारिक आवरण

बाँध का नाम बाणासुर पर रखा जाना कोई मासूम सांस्कृतिक चयन नहीं है। मिथक यहाँ एक वैचारिक आवरण का काम करता है—जो आधुनिक तकनीकी हस्तक्षेप को प्राचीन गौरव से जोड़ देता है। इससे विकास की प्रक्रिया स्वाभाविक और निर्विवाद प्रतीत होती है, जबकि उसके पीछे के सामाजिक-आर्थिक प्रश्न—भूमि, विस्थापन, श्रम और असमानता—पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।

निष्कर्ष

बाणासुरा सागर बाँध न तो केवल एक इंजीनियरिंग चमत्कार है, न ही मात्र एक पर्यटन स्थल। यह उस ऐतिहासिक क्षण की अभिव्यक्ति है जहाँ आधुनिक राज्य, पूँजी और तकनीक ने प्रकृति को अपने अधीन कर लिया है। इस बाँध को समझने का सही तरीका यही है कि हम उससे जुड़े उत्पादन-संबंधों, वर्गीय हितों और वैचारिक आवरणों को पहचानें।

क्योंकि इतिहास में न बाँध तटस्थ होते हैं, न मिथक—

वे हमेशा किसी न किसी सामाजिक शक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं।


8. UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस

 कानून सिर्फ नैतिक जागृति से नहीं बनते; वे ठोस सामाजिक विरोधाभासों के उत्पाद होते हैं। मार्क्सवादियों ने बार-बार तर्क दिया कि "समाज की संरचना उसके संस्थानों के चरित्र को निर्धारित करती है।"


विश्वविद्यालय ज्ञान के तटस्थ मंदिर नहीं हैं; वे समाज के भौतिक संगठन में अंतर्निहित वैचारिक उपकरण हैं। भारत में, जहाँ जाति ने ऐतिहासिक रूप से श्रम विभाजन को नियंत्रित किया है, ज्ञान तक पहुँच अपने आप में सामाजिक शक्ति का एक रूप बन गई है।


इसलिए, भेदभाव-विरोधी रेगुलेशंस का उदय न केवल प्रशासनिक सुधार का संकेत देता है, बल्कि औपचारिक लोकतांत्रिक समानता और विरासत में मिली सामाजिक पदानुक्रम के बीच विरोधाभास के तेज होने का भी संकेत देता है। जब उत्पीड़ित समूह बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा में प्रवेश करते हैं - आरक्षण, छात्रवृत्ति और जन शिक्षा की मदद से - तो पुरानी संरचना को खुद को समायोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।


इस प्रकार, इन रेगुलेशंस को ऊपर से उदारता के बजाय नीचे से दबाव की प्रतिक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए।


मार्क्सवादी दृष्टिकोण से, सुधार अक्सर दोहरा कार्य करते हैं:


वे असमानता की सबसे कठोर अभिव्यक्तियों को कम करते हैं।


वे साथ ही मौजूदा व्यवस्था को स्थिर करते हैं।


मार्क्सवाद ने सुधारों को क्रांतिकारी परिवर्तनों के रूप में व्याख्या करने के खिलाफ चेतावनी दी है। मार्क्सवाद ने उन्हें बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के प्रति समाज के क्रमिक अनुकूलन के हिस्से के रूप में देखा है।


समान अवसर केंद्र, इक्विटी समितियाँ, और निगरानी तंत्र ठीक इसी तरह के अनुकूलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि भेदभाव मौजूद है - जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है - फिर भी वे शैक्षणिक शक्ति के भौतिक वितरण को मौलिक रूप से नहीं बदलते हैं, जैसे:


कौन फैकल्टी बनता है


कौन रिसर्च फंडिंग को नियंत्रित करता है


कौन "योग्यता" को परिभाषित करता है


कौन प्रशासनिक नेतृत्व संभालता है


इन संरचनात्मक पदों को बदले बिना, रेगुलेशन के परिवर्तनकारी होने के बजाय प्रक्रियात्मक बनने का जोखिम रहता है।


एक महत्वपूर्ण मार्क्सवादी आलोचना औपचारिक समानता और वास्तविक समानता के बीच अंतर से संबंधित है।


पूंजीवादी-लोकतांत्रिक समाज समान अधिकारों की घोषणा करते हैं, जबकि उन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बरकरार रखते हैं जो असमानता पैदा करती हैं। इसी तरह, विश्वविद्यालय भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर सकते हैं, जबकि पारिवारिक पूंजी, भाषा विशेषाधिकार, शहरी स्कूली शिक्षा और सामाजिक नेटवर्क में निहित लाभों को पुन: उत्पन्न करना जारी रखते हैं।


मार्क्सवाद ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय के विचार अक्सर प्रचलित सामाजिक व्यवस्था की जरूरतों को दर्शाते हैं। भेदभाव की परिभाषा का विस्तार - जिसमें OBC समूह शामिल हैं - यह बताता है कि राज्य का वैचारिक ढाँचा विकसित हो रहा है। हालाँकि, अकेले विचारधारा ऐतिहासिक रूप से जमी हुई पदानुक्रमों को भंग नहीं कर सकती है।


दूसरे शब्दों में: आप उन स्थितियों को बदले बिना सदियों के सामाजिक स्तरीकरण को कानून बनाकर खत्म नहीं कर सकते जो इसे बनाए रखती हैं।  


एक और चिंता यह है कि आधुनिक राज्य गहरी समस्याओं को नौकरशाही तरीकों से सुलझाने की कोशिश करते हैं। कमेटी, रिपोर्ट, कम्प्लायंस स्ट्रक्चर - ये सब प्रशासनिक तर्कसंगतता को दिखाते हैं। ये पारदर्शिता और जवाबदेही तो लाते हैं, लेकिन ये असल उत्पीड़न को सिर्फ कागजी कार्रवाई में बदलने का खतरा भी पैदा करते हैं।


इतिहास बताता है कि संस्थाएं अक्सर अपने मूल स्वभाव को बदले बिना आलोचना को अपना लेती हैं। एक यूनिवर्सिटी सालाना इक्विटी रिपोर्ट फाइल कर सकती है, जबकि मेंटरशिप नेटवर्क, मूल्यांकन में भेदभाव, या सांस्कृतिक अलगाव के ज़रिए अनौपचारिक रूप से भेदभाव जारी रख सकती है।


इसलिए, एक सवाल उठता है:


क्या राज्य समाज को बदल रहा है, या सिर्फ उसके झगड़ों को मैनेज कर रहा है?


मार्क्सवाद के अनुसार, सामाजिक प्रगति ऑब्जेक्टिव स्थितियों और मानवीय प्रयासों – खासकर सामूहिक संघर्ष – के बीच तालमेल से होती है।


ये नियम तभी असली मायने हासिल करेंगे जब उन्हें इनसे छात्र आंदोलन, फैकल्टी एक्टिविज़्म, लोकतांत्रिक निगरानी, सार्वजनिक बौद्धिक जुड़ाव को बढ़ावा मिले, नहीं तो, वे सिर्फ़ प्रतीकात्मक रियायतें बनकर रह जाएंगे।


सुधार ऐतिहासिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होते कि वे उत्पीड़न को खत्म करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे राजनीतिक मुकाबले के लिए नया मैदान खोलते हैं। एक बार जब समानता को एक सिद्धांत के रूप में घोषित कर दिया जाता है, तो हाशिए पर पड़े समूहों को संस्थानों को चुनौती देने के लिए एक मज़बूत वैचारिक हथियार मिल जाता है।


ये नियम आधुनिक लोकतंत्र के एक गहरे विरोधाभास को भी उजागर करते हैं।


वही राज्य जो असमान सामाजिक ढांचों पर शासन करता है, उसे न्याय की गारंटी देने वाला भी दिखना चाहिए। इससे वह बनता है जिसे मार्क्सवादी एक विरोधाभासी राज्य रूप कहते हैं – जो एक साथ सुरक्षात्मक और रूढ़िवादी होता है।


नियमों का पालन न करने पर सज़ा की धमकी देकर, UGC यह स्वीकार करता है कि भेदभाव आकस्मिक नहीं बल्कि सिस्टमैटिक है। फिर भी, रेगुलेटरी तरीका यह मानता है कि संस्थान सामाजिक शक्ति के व्यापक पुनर्वितरण के बिना खुद को ठीक कर सकते हैं।ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से, यह केवल आंशिक रूप से सच है।


मार्क्सवादी निष्कर्ष रोमांटिक आशावाद और सनकी अस्वीकृति दोनों से बचेगा।


ये नियम न तो क्रांतिकारी हैं और न ही बेकार। इन्हें सबसे अच्छे तरीके से एक बदलते हुए समाज के लक्षणों के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ पहले से बाहर रखे गए समूह कुलीन ज्ञान संरचनाओं के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।


उनका अंतिम महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वे प्रशासनिक सुरक्षा उपाय बने रहते हैं या शिक्षा के गहरे लोकतंत्रीकरण की दिशा में सीढ़ी बनते हैं।


जैसा कि मार्क्सवाद बताता है: "मानवीय संस्थाएँ तब बदलती हैं जब समाज का भौतिक जीवन उन्हें बदलने के लिए मजबूर करता है।"


यह नियम इस बात का सबूत है कि ऐसा दबाव मौजूद है।लेकिन इतिहास हमें सिखाता है कि कानूनी समानता संघर्ष की शुरुआत है – उसका अंत नहीं।


7. अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण

 अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण—जिसे *“ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व”* कहा गया—को शासक वर्ग की सरकार ने “कानून-प्रवर्तन” की आड़ में वैध ठहराने का प्रयास किया। राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनके सहयोगियों पर *नार्को-टेररिज़्म* के आरोप लगाकर, उन्हें न्यूयॉर्क ले जाकर मुक़दमे के नाम पर प्रस्तुत करना, आधुनिक साम्राज्यवाद की उसी पुरानी पद्धति का उदाहरण है जिसमें दमन को न्याय और लूट को नैतिकता कहा जाता है।


यहाँ तथाकथित आरोप—कोकीन तस्करी, आतंकवादी समूहों से गठजोड़—वस्तुतः कारण नहीं, बल्कि बहाने हैं। वास्तविक कारण उत्पादन के साधनों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की वह अनिवार्यता है जो पूँजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों से जन्म लेती है। वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार, गैस, सोना और अन्य खनिज—ये ही वह भौतिक आधार हैं जिन पर अमरीकी पूँजी की भूख टिकी है। “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “क्षेत्रीय स्थिरता” की भाषा उसी वर्गीय स्वार्थ का वैचारिक आवरण है।


मदुरो की लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न उठाना भी उसी क्रम का हिस्सा है। इतिहास बताता है कि जब-जब किसी देश की राजनीतिक संरचना पूँजी के निर्बाध विस्तार में बाधा बनती है, तब-तब “लोकतंत्र” का तराजू उसी ओर झुका दिया जाता है जहाँ मुनाफ़ा अधिक हो। अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन यहाँ कोई अपवाद नहीं, बल्कि नियम है—क्योंकि क़ानून स्वयं वर्ग-शक्ति का संगठित रूप होता है।


तेल उद्योग में सक्रिय विदेशी कंपनियाँ—शेवरॉन, सीएनपीसी, साइनोपेक, रेप्सोल, एनी, रोसनेफ्ट, टोटलएनर्जीज़, बीपी, शेल—इस पूरे संघर्ष की आर्थिक नसें हैं। इनके निवेश, ऋण और संयुक्त उपक्रम वेनेजुएला को वैश्विक पूँजी के जाल में बाँधते हैं। प्रतिबंध, परिसंपत्ति ज़ब्ती और कूटनीतिक दबाव—ये सब उसी संघर्ष के औज़ार हैं जिसमें राज्य, पूँजी का कार्यकारी समिति बनकर काम करता है।


वैश्विक बाज़ार पर इसके प्रभाव—तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमरीकी ऊर्जा कंपनियों का लाभ, चीन के निवेशों का जोखिम, भारत जैसे देशों के लिए अवसर—यह सब पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की असमान और संकटग्रस्त प्रकृति को उजागर करता है। उत्पादन की अराजकता और मुनाफ़े की अंधी दौड़ देशों को युद्ध के कगार तक धकेलती है।


इसलिए वेनेजुएला की घटना को किसी एक व्यक्ति की गिरफ्तारी या किसी एक सरकार के पतन के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। यह उस ऐतिहासिक संघर्ष का एक अध्याय है जिसमें श्रम और पूँजी, संप्रभुता और साम्राज्यवाद, जनता और एकाधिकार आमने-सामने खड़े हैं। जब तक उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व और राज्य-शक्ति का वर्गीय चरित्र बना रहेगा, तब तक ऐसे “ऑपरेशन” पूँजी के तर्कसंगत परिणाम बने रहेंगे—और उनका प्रतिरोध भी, अनिवार्य रूप से, इतिहास की गति का हिस्सा होगा।

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6. तर्क बनाम अंधविश्वास”— या सामाजिक यथार्थ से पलायन?

 आजकल एक लोकप्रिय कथा गढ़ी जा रही है—कि भारत की समस्या “धर्म” है और समाधान “नास्तिकता”। कुछ लोग पाँच या दस नास्तिक विचारकों की सूची बनाकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि समाज जितना धार्मिक होगा, उतना ही पिछड़ा होगा; और जितना नास्तिक होगा, उतना ही प्रगतिशील और सुखी होगा।


मार्क्सवादी परंपरा ऐसी सरल व्याख्याओं को ऐतिहासिक रूप से सतही और दार्शनिक रूप से आदर्शवादी मानती है।


विचार नहीं, भौतिक जीवन स्थितियाँ इतिहास को चलाती हैं


 विचारधाराएँ आकाश से नहीं गिरतीं; वे समाज की भौतिक परिस्थितियों से पैदा होती हैं। इसलिए यह कहना कि “भारत में अंधविश्वास इसलिए है क्योंकि लोग तर्क नहीं करते” इतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि “गरीबी इसलिए है क्योंकि गरीब लोग मेहनत नहीं करते।”


यदि समाज में असुरक्षा, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट, शिक्षा की कमी और सामाजिक दमन मौजूद हैं, तो लोग सांत्वना और सुरक्षा के प्रतीक खोजेंगे—चाहे वह धर्म हो, जाति हो या राष्ट्रवाद। धर्म का प्रश्न पहले सामाजिक है, फिर दार्शनिक।


नास्तिकता अपने-आप में प्रगतिशील नहीं होती


इतिहास में कई नास्तिक शासक भी दमनकारी रहे हैं। और कई धार्मिक समाजों ने भी सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया है। मार्क्सवाद धर्म को केवल “गलत विचार” नहीं मानता; वह उसे सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी मानता है मार्क्स ने लिखा था— “धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है।” इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म आदर्श है—बल्कि यह कि धर्म को खत्म करने के लिए पहले उस पीड़ा की परिस्थिति को खत्म करना होगा जो उसे जन्म देती है।


स्कैंडिनेविया बनाम भारत — गलत तुलना


यह कहना कि “स्कैंडिनेवियाई देश नास्तिक हैं इसलिए खुश हैं” ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरुद्ध है। वास्तविक प्रश्न हैं: वहाँ मजबूत वेलफेयर स्टेट क्यों है? वहाँ शिक्षा सार्वभौमिक क्यों है? वहाँ स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक क्यों है? वहाँ श्रमिक अधिकार मजबूत क्यों हैं?


यदि कोई समाज आर्थिक सुरक्षा देता है, तो धार्मिक निर्भरता स्वाभाविक रूप से घटती है। तर्कवाद का विकास सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है— सिर्फ दार्शनिक प्रचार से नहीं।


भारत में तर्क और धर्म साथ-साथ क्यों बढ़ रहे हैं?


यह कोई विरोधाभास नहीं है, पूंजीवादी विकास असमान होता है। एक ही समाज में आप पाएँगे: 5G टेक्नोलॉजी और साथ में मध्यकालीन सामाजिक संबंध, क्योंकि आर्थिक विकास असमान है— शहर और गाँव, अमीर और गरीब, शिक्षित और वंचित — सब अलग गति से बदलते हैं।


“धर्म बनाम विज्ञान” — एक झूठा द्वंद्व है।


समस्या धर्म नहीं, समस्या है— जब धर्म सामाजिक शक्ति संरचनाओं का औज़ार बन जाता है। धर्म तब खतरनाक होता है जब: वह सामाजिक अन्याय को वैधता देता है, वह प्रश्न पूछने से रोकता है,  वह शोषण को पवित्र बना देता है। लेकिन केवल धर्म-विरोधी नारे लगाकर वैज्ञानिक समाज नहीं बनता।


भारतीय नास्तिक परंपरा 


अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन —इनका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि वे नास्तिक थे। उनका महत्व इसलिए था क्योंकि: उन्होंने सामाजिक शोषण को चुनौती दी, उन्होंने वर्ग और सत्ता संरचनाओं पर प्रश्न उठाए, उन्होंने मनुष्य की ऐतिहासिक भूमिका को समझा। यदि हम उन्हें केवल “नास्तिक आइकन” बना दें, तो हम उनके क्रांतिकारी सामाजिक संदर्भ को मिटा देते हैं, सावरकर से उनके फर्क को धूमिल कर देते है।


यदि किसी व्यक्ति को “तर्क का दर्पण” कहा जाता है, तो पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उसने क्या कहा, बल्कि यह होना चाहिए कि उसके विचारों ने किन सामाजिक शक्तियों को मजबूत किया और किन्हें कमजोर। सावरकर का तर्कवाद सार्वभौमिक मानवीय मुक्ति की ओर नही जाता है, वो केवल एक नए प्रभुत्वशाली राष्ट्रवादी ढाँचे को वैचारिक आधार देता है।

यदि कोई पशु पूजा का विरोध करता है तो यह यह अपने आप मे प्रगतिशील नही हो सकता। पर मार्क्सवादी दृष्टि यह पूछेगी: क्या यह आलोचना सामाजिक उत्पादन संबंधों की आलोचना तक जाती है? या केवल सांस्कृतिक सुधार तक सीमित रहती है?

यदि समाज में जाति, वर्ग, भूमि स्वामित्व और श्रम शोषण की संरचना जस की तस रहती है — तो केवल सांस्कृतिक सुधार समाज को मूल रूप से नहीं बदलते। सावरकर की ‘नास्तिकता’ की यही सीमा थी।

भाग्यवाद का विरोध ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील भूमिका निभाता रहा है। परंतु यदि भाग्यवाद की जगह आक्रामक राष्ट्रवाद या सैन्यवाद ले ले — तो समाज केवल एक नई प्रतिक्रियावादी वैचारिक संरचना में प्रवेश करता है। मार्क्सवादी दृष्टि में मानव मुक्ति केवल धार्मिक निष्क्रियता से बाहर निकलना नहीं है — बल्कि श्रम, उत्पादन और संसाधनों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण स्थापित करना है। अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन की तरह  सावरकर इस कसौटी पर खड़ा नही उतरते।

इतिहास में कई बार “तर्कवाद” का उपयोग राष्ट्रवादी लामबंदी के लिए किया गया है। यदि तर्कवाद वैज्ञानिक समाजवाद की दिशा में नहीं जाता, बल्कि सांस्कृतिक-राजनीतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करता है — तो वह ऐतिहासिक रूप से सीमित और अंतर्विरोधी भूमिका निभाता है। सावरकर इसके अपवाद नही थे।

अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और  सावरकर  की विरासत को समझने के लिए हमें यह देखना होगा:

क्या उनके विचार उत्पादन संबंधों को चुनौती देते हैं?



क्या वे श्रमिक वर्ग की ऐतिहासिक मुक्ति में योगदान करते हैं?



या वे केवल एक नए प्रभुत्वशाली सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को वैचारिक आधार देते हैं?



यदि तर्कवाद सामाजिक क्रांति से कट जाता है — तो वह केवल बुर्जुआ आधुनिकता का एक रूप बनकर रह जाता है। मार्क्सवादी परंपरा में सच्चा तर्कवाद वही है जो समाज को केवल सोच में नहीं, बल्कि भौतिक जीवन की संरचना में बदलव करे।

मार्क्सवादी परंपरा में तर्कवाद किताबों का शब्द नहीं, वह हथौड़ा है —जो उत्पादन संबंधों की जंजीरों पर पड़ता है। सच्चा तर्कवाद वह है जो केवल दिमाग़ नहीं बदलता, बल्कि रोटी, ज़मीन, श्रम और सत्ता के रिश्ते भी बदलता है।

और इतिहास को तोड़-मरोड़कर अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और सावरकर को सिर्फ “नास्तिकता” के धागे से बाँध देना — यह इतिहास नहीं, विचारधारा का धुंध फैलाना है।

क्रांतिकारी नास्तिकता सिर्फ भगवान से इंकार नहीं करती, वह शोषण से भी इंकार करती है। जो नास्तिकता वर्ग-सत्ता को चुनौती देती है — वह मुक्ति की राह बनाती है। और जो नास्तिकता सिर्फ सांस्कृतिक या राष्ट्रवादी ढाँचों की सेवा करे — वह जनता की चेतना को भटकाने का हथियार बन सकती है। क्रांतिकरी नास्तिकता का तर्क साफ है — धर्म से मुक्ति काफी नहीं, शोषण से मुक्ति ज़रूरी है। मिहनतकस जनता का इतिहास किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए माफ़ नहीं करता कि उसने मंदिर की जगह प्रयोगशाला की बात की हो। 

इसलिये, अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और  सावरकर को सिर्फ नास्तिकता के बहाने एक साथ दिखाना फासीवादी साजिस का ही हिस्सा है।


आधुनिक पूंजीवाद और धर्म का बाज़ारीकरण


आज धर्म क्यों बढ़ रहा है? क्योंकि आधुनिक पूंजीवाद असुरक्षा पैदा करता है: नौकरी अस्थिर, स्वास्थ्य महंगा, शिक्षा महंगी, भविष्य अनिश्चित। ऐसे समाज में धर्म “भावनात्मक बीमा” बन जाता है।

कॉरपोरेट पूंजी भी इसे समझती है— धर्म एक बाजार भी है, एक पहचान भी है, एक राजनीतिक उपकरण भी है।

शिक्षा व्यवस्था — असली सवाल

यदि शिक्षा आलोचनात्मक सोच नहीं सिखाती, तो समाज तर्कवादी नहीं बनेगा — चाहे वह धार्मिक हो या नास्तिक। सिर्फ STEM शिक्षा से तर्कवाद नहीं आता। सामाजिक विज्ञान, इतिहास, दर्शन — ये जरूरी हैं।


असली सवाल: तर्क या धर्म नहीं — शक्ति किसके पास है? मार्क्सवाद  का केंद्रीय तर्क यही होता: समाज को बदलने के लिए विचार बदलना जरूरी है, लेकिन उससे पहले भौतिक जीवन स्थितियाँ बदलनी होंगी।


यदि: आर्थिक असमानता घटे, सामाजिक सुरक्षा बढ़े, शिक्षा सार्वभौमिक हो, लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़े, तो तर्क स्वतः बढ़ेगा।


निष्कर्ष

भारत की समस्या “बहुत धर्म” नहीं है। भारत की समस्या है—असमान विकास,

सामाजिक दमन, और आर्थिक असुरक्षा। धर्म और अंधविश्वास लक्षण हैं, बीमारी नहीं। यदि समाज को तर्कवादी बनाना है,

तो केवल विचारधारा नहीं—सामाजिक ढांचा बदलना होगा।

अंततः मार्क्स शायद यही कहते: समाज को तर्क से नहीं, बल्कि उस समाज की परिस्थितियों को बदलकर तर्कवादी बनाया जाता है जिसमें लोग जीते हैं। और जब मनुष्य डर से नहीं, बल्कि गरिमा से जीने लगेगा—तब अंधविश्वास स्वतः कमजोर होता जाएगा।


5. सशस्त्र संघर्ष और क्रांतिकारी रणनीति का सवाल

 सशस्त्र संघर्ष न तो कोई नैतिक घोषणा है और न ही क्रांतिकारी साहस का प्रमाण पत्र। यह वर्ग संघर्ष के एक खास चरण का सवाल है - जो इच्छाशक्ति या नारों से नहीं, बल्कि ठोस ऐतिहासिक परिस्थितियों से पैदा होता है। लेनिन ने बार-बार चेतावनी दी थी कि हथियार उठाने का सवाल एक रणनीतिक सवाल है, और रणनीति हमेशा वर्ग शक्तियों के वास्तविक संतुलन से तय होती है, न कि अधीरता या रोमांस से।


तो, सशस्त्र संघर्ष मज़दूर वर्ग आंदोलन के एजेंडे में कब आता है?

यह तभी उभरता है जब:


1. शोषित वर्गों का भारी बहुमत राजनीतिक रूप से संगठित हो;

2. मज़दूर वर्ग के पास अपनी स्वतंत्र क्रांतिकारी पार्टी हो, जो एक स्पष्ट कार्यक्रम, संगठन और अनुशासन से लैस हो;

3. राज्य सत्ता का संकट परिपक्व हो गया हो, और शासक वर्ग अब पुराने तरीके से शासन नहीं कर सकता हो;

4. शांतिपूर्ण, सुधारवादी और कानूनी संघर्ष के सभी रास्ते ऐतिहासिक रूप से खत्म हो गए हों;

5. और सबसे निर्णायक रूप से - जब सशस्त्र संघर्ष एक जन आंदोलन का रूप ले लेता है, न कि छोटे समूहों के अलग-थलग "वीरता" का।


इन शर्तों के बिना, हथियार उठाना क्रांति नहीं बल्कि राजनीतिक रोमांच है - और रोमांच हमेशा प्रति-क्रांति की सेवा करता है।


यह हमें दूसरे सवाल पर लाता है:

आज, जब कोई क्रांतिकारी पार्टी मौजूद नहीं है, तो सशस्त्र संघर्ष का सवाल अर्थहीन क्यों हो जाता है?


यह अर्थहीन हो जाता है क्योंकि सशस्त्र संघर्ष पार्टी का विकल्प नहीं हो सकता। लेनिन ने स्पष्ट रूप से कहा था:


 "क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता।"


हमें यह जोड़ना होगा: एक क्रांतिकारी पार्टी के बिना, कोई भी सशस्त्र संघर्ष क्रांतिकारी नहीं हो सकता।


जब मज़दूर वर्ग राजनीतिक रूप से बंटा हुआ हो; जब ट्रेड यूनियन सुधारवाद में फंसी हों; जब किसान आंदोलन नेतृत्वहीन हों; जब बुद्धिजीवी वर्ग या तो सत्ता का नौकर हो या निराशा में डूबा हो - तब हथियार उठाने की अपील वर्ग संघर्ष को आगे नहीं बढ़ातीं। वे इसे छिटपुट सैन्य मुठभेड़ों में बांट देती हैं।


ऐसी परिस्थितियों में, सशस्त्र कार्रवाई:


* जनता को संगठित नहीं करती,

* राज्य सत्ता को गंभीरता से चुनौती नहीं देती,

* बल्कि इसके बजाय राज्य को दमन के लिए वैधता प्रदान करती है।


यही कारण है कि पार्टी की अनुपस्थिति में सशस्त्र संघर्ष पर बहस करना बिना नक्शे के युद्ध की योजना बनाने जैसा है। ऐसी बहसें क्रांति को आगे नहीं बढ़ातीं; वे ध्यान असली कामों से भटकाती हैं - और वे काम हैं:


मज़दूर वर्ग की राजनीतिक चेतना का निर्माण करना;  

एक आज़ाद, अनुशासित, वर्ग-चेतना वाली क्रांतिकारी पार्टी बनाना;

सुधारवाद, अराजकतावाद और सैन्य रोमांचवाद के खिलाफ बिना किसी समझौते के वैचारिक संघर्ष करना।


लेनिनवादी निष्कर्ष साफ़ है: आज सवाल यह नहीं है कि "हथियार कब उठाएँ," बल्कि यह है कि "किस वर्ग के नेतृत्व में, किस कार्यक्रम के साथ, और किस सत्ता के खिलाफ।" जो कोई भी इस क्रम को उलटता है - चाहे उसकी भाषा कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो - वह असल में क्रांति का एजेंट नहीं, बल्कि भ्रम फैलाने वाला बन जाता है।

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Friday, 13 February 2026

4. रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन

 रोसा लक्ज़मबर्ग और व्लादिमीर इलिच लेनिन को यदि केवल व्यक्तियों के रूप में देखा जाए, तो हम उनके मतभेदों में उलझकर रह जाते हैं। किंतु मार्क्सवाद की पद्धति हमें यह सिखाती है कि इतिहास को व्यक्तियों की मनोवृत्ति से नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से समझा जाए, जिनमें वे कार्य करते हैं। इस दृष्टि से देखें तो रोसा और लेनिन न तो प्रतिद्वंद्वी थे, न परस्पर विरोधी धाराओं के प्रतिनिधि—वे एक ही ऐतिहासिक कार्यभार के दो भिन्न रूप थे।

दोनों बीसवीं सदी की शुरुआत में उस दौर में खड़े थे, जब पूंजीवाद अपने साम्राज्यवादी चरण में प्रवेश कर चुका था, द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सड़ने लगा था, और सर्वहारा आंदोलन के सामने यह प्रश्न खड़ा था कि क्रांति को सुधार में घुलने दिया जाए या सत्ता तक पहुँचाया जाए। इस ऐतिहासिक दबाव की पृष्ठभूमि में लक्ज़मबर्ग और लेनिन को समझा जा सकता है।

एकता: ऐतिहासिक आवश्यकता की अभिव्यक्ति

मार्क्सवादी शब्दों में, “विचारधाराएँ आकस्मिक नहीं होतीं, वे सामाजिक संबंधों की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति होती हैं।” इस अर्थ में रोसा और लेनिन दोनों ही क्रांतिकारी मार्क्सवाद की अनिवार्य उपज थे।

सुधारवाद और अवसरवाद के विरुद्ध उनका संघर्ष कोई व्यक्तिगत जिद नहीं था, बल्कि उस समय के समाज-जनवादी आंदोलन की वर्गीय सड़ांध के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। बर्नस्टीन का संशोधनवाद वस्तुतः जर्मन पूंजीवाद की सापेक्ष स्थिरता और श्रमिक अभिजात वर्ग के उभार का वैचारिक प्रतिबिंब था। रोसा की Reform or Revolution? और लेनिन की What Is to Be Done? इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति के विरुद्ध दो मोर्चे थे—एक पश्चिमी यूरोप की परिस्थितियों से बोलता हुआ, दूसरा ज़ारवादी रूस की दमनकारी संरचना से।

प्रथम विश्व युद्ध के समय उनकी अंतरराष्ट्रीयता कोई नैतिक ऊँचाई नहीं, बल्कि वर्गीय स्थिति की तार्किक परिणति थी। जब अधिकांश समाजवादी नेता अपनी-अपनी बुर्जुआ सरकारों के पीछे खड़े हो गए, तब रोसा और लेनिन ने युद्ध को वही कहा जो वह था—साम्राज्यवादी लूट का हिंसक रूप। यहाँ उनका मिलन सिद्धांत का नहीं, बल्कि इतिहास का था।

अक्टूबर क्रांति के प्रति रोसा का समर्थन भी इसी ऐतिहासिक समझ से उपजा था। उन्होंने इसे “साहसिक छलांग” कहा—क्योंकि पिछड़े रूस में सर्वहारा सत्ता कोई आदर्श परिस्थिति नहीं, बल्कि मजबूरी थी। फिर भी उन्होंने समझा कि इतिहास हमेशा आदर्श परिस्थितियों में नहीं चलता, बल्कि संकटों के बीच रास्ता बनाता है।

मतभेद: भिन्न परिस्थितियों की उपज

मार्क्सवादी पद्धति हमें यह भी सिखाती है कि मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धांत नहीं, बल्कि परिस्थितियों के साथ विकसित होने वाली पद्धति है। इसलिए रोसा और लेनिन के मतभेदों को “सही–गलत” के नैतिक तराज़ू पर तौलना ऐतिहासिक भूल होगी।

पार्टी संगठन पर उनका विवाद मूलतः रूस और पश्चिमी यूरोप के भिन्न सामाजिक ढाँचों से निकला। ज़ारवादी दमन, अवैधता और पुलिस-राज्य की स्थितियों में लेनिन का केंद्रीकरण एक ऐतिहासिक आवश्यकता था। वहीं जर्मनी जैसे अपेक्षाकृत विकसित पूंजीवादी समाज में रोसा को यह केंद्रीकरण नौकरशाही खतरे की तरह दिखा। दोनों की दलीलें अपने-अपने संदर्भों में तर्कसंगत थीं।

राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का प्रश्न भी इसी तरह समझा जाना चाहिए। रोसा का राष्ट्रवाद-विरोध उस समय के पोलिश और जर्मन बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अनुभव से निकला था। लेनिन का समर्थन रूस जैसे बहुराष्ट्रीय साम्राज्य में उत्पीड़ित राष्ट्रों की वास्तविक स्थिति से। यहाँ कोई शाश्वत सत्य नहीं, बल्कि भिन्न ऐतिहासिक भूमियों पर खड़े मार्क्सवाद दिखाई देते हैं।

साम्राज्यवाद और पूंजी संचय पर विवाद भी इसी क्रम का हिस्सा है। रोसा ने पूंजीवाद के विस्तार की बाधाओं को उजागर किया, लेनिन ने उसके संगठनात्मक रूप—वित्त पूंजी, एकाधिकार और असमान विकास—को। लेनिन की तीखी आलोचनाएँ दरअसल इस बात का प्रमाण हैं कि वह रोसा को गंभीर सैद्धांतिक प्रतिद्वंद्वी मानते थे, न कि किसी भटकी हुई आत्मा को।

लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्तता पर मतभेद भी किसी नैतिक असहमति का नहीं, बल्कि क्रांति की गति और रूप को लेकर थे। रोसा जनता की सृजनात्मक शक्ति को उभारती थीं, लेनिन उसे दिशा देने वाली संगठनात्मक शक्ति पर जोर देते थे। इतिहास ने दिखाया कि दोनों के बिना क्रांति अपूर्ण रहती है।

लेनिन की श्रद्धांजलि: ऐतिहासिक न्याय

रोसा लक्ज़मबर्ग की मृत्यु के बाद लेनिन की प्रसिद्ध श्रद्धांजलि को यदि मार्क्सवादी की शैली में पढ़ें, तो वह व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक मूल्यांकन है। “ईगल और मुर्गियों” का रूपक इस बात को स्वीकार करता है कि रोसा की गलतियाँ भी एक ऊँचे स्तर की थीं—वे क्रांतिकारी प्रयास की गलतियाँ थीं, न कि सुधारवादी आत्मसमर्पण की।

यही ऐतिहासिक भौतिकवाद का निष्कर्ष है: रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन के बीच मतभेद मार्क्सवाद की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। वे दोनों उस युग की संतान थे, जब इतिहास ने पूंजीवाद को चुनौती देने के लिए एक से अधिक रास्ते खोले थे।

और इसलिए, उन्हें अलग-अलग खाँचों में बाँटना नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक संघर्ष के दो रूपों के रूप में समझना—यही मार्क्सवाद की सच्ची विरासत है।

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3. किलिंग फ़ील्ड्स

 किलिंग फ़ील्ड्स के सामने खड़े होकर मनुष्य का सन्न रह जाना स्वाभाविक है। खोपड़ियों की मीनारें, सामूहिक कब्रें, बच्चों की टूटी हड्डियाँ—यह सब इतिहास नहीं, बल्कि मानवता का अभियोग-पत्र हैं।

लेकिन यहीं से पहली वैचारिक भूल शुरू होती है।

इतिहास को यदि हम नैतिक झटके से पढ़ते हैं, तो हम शैतानों की सूची बना सकते हैं, पर शैतान पैदा करने वाली व्यवस्था को नहीं समझ पाते।

पोल पॉट कोई पागल अपवाद नहीं था—

वह एक ऐतिहासिक परिस्थिति का उत्पाद था। कंबोडिया कोई शून्य में पड़ा देश नहीं था, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की बमबारी, वियतनाम युद्ध की तबाही, और औपनिवेशिक लूट से तबाह सामाजिक संरचना का परिणाम था।

मार्क्सवाद कहता है—“व्यक्ति इतिहास नहीं बनाता, इतिहास व्यक्ति के माध्यम से अपनी आवश्यकता प्रकट करता है।”

पोल पॉट की बर्बरता समाजवादी विचारधारा का निष्कर्ष नहीं, बल्कि विचारधारा से कटा हुआ सत्ता का उन्माद थी। वर्ग-संघर्ष को समझे बिना, उत्पादन संबंधों को बदले बिना, केवल “कृषि-यूटोपिया” थोप देना क्रांति नहीं—प्रतिक्रांति होती है।

अब आइए उस तुलना पर, जिसे बड़ी चालाकी से हथियार बनाया गया है।

“अकबर ने 55,000 सिर कटवाए, फिर भी भारत में उसे महान कहा जाता है।” यह तर्क भी इतिहास को नैतिक उपदेश में बदल देने की बीमारी से ग्रस्त है। अकबर को “महान” कहने वाली वह कौन-सी वर्गीय शक्ति थी? दरबारी इतिहासकार, ज़मींदार वर्ग, औपनिवेशिक इतिहासलेखन—इन सबने राज्य हिंसा को “सभ्यता” का नाम दिया।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि “किसने ज़्यादा सिर काटे?” प्रश्न यह है कि किस वर्ग के हित में हिंसा को वैध ठहराया गया।

जब आप कहते हैं— “हमने सड़कों, शहरों, यूनिवर्सिटीज़ के नाम लुटेरों पर रख दिए” तो आप सही गुस्से में हैं, लेकिन अधूरे विश्लेषण में फँस जाते हैं।

क्यों रखे गए ये नाम? इसलिए नहीं कि “हमारे पुरखे मूर्ख थे”, बल्कि इसलिए कि

हर शासक वर्ग अपने पूर्वजों को भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।

इतिहास की किताबें “हमारे मुँह पर थप्पड़” नहीं हैं— वे शासक वर्ग के मुक्के हैं, जो शिक्षा के माध्यम से मारे जाते हैं।

सबसे खतरनाक बात तब होती है जब पोल पॉट की बर्बरता को पूरे कम्युनिज़्म का पर्याय बना दिया जाता है, लेकिन औपनिवेशिक नरसंहार, दास व्यापार, हिरोशिमा–नागासाकी, इराक, वियतनाम, फिलिस्तीन—इन सबको “इतिहास की भूल” कहकर छोड़ दिया जाता है। यह चयनात्मक नैतिकता दरअसल साम्राज्यवादी नैरेटिव है।

मार्क्सवाद की दृष्टि हमें सिखाती है— इतिहास को रोष से नहीं, संरचना से पढ़ो। हिंसा को व्यक्ति की दुष्टता से नहीं, वर्गीय हित से जोड़ो। और सबसे ज़रूरी—यदि शैतान बार-बार पैदा होते हैं, तो समस्या शैतान नहीं, वह समाज है जो उन्हें जन्म देता है, पालता है और फिर उनकी मूर्तियाँ बनाता है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि— “कब शैतान बादशाह हो गए?” असल सवाल यह है— किस वर्ग ने उन्हें बादशाह बनाया, और आज भी क्यों बनाए जा रहे हैं?

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2. इतिहास, वर्ग और सत्ता की भौतिकता- औरंगजेब के संदर्भ में

 इतिहास को जब नैतिक कथाओं, धार्मिक सद्गुणों या “महान शासकों” की निजी तपस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब वह इतिहास नहीं रहता—वह विचारधारात्मक धुंध बन जाता है। मार्क्सवाद हमें चेतावनी देता है कि किसी भी युग, किसी भी शासक का मूल्यांकन उसकी निजी जीवन-शैली से नहीं, बल्कि उसके शासन की भौतिक संरचना, वर्ग-संबंधों और उत्पादन-संबंधों से किया जाना चाहिए।

औरंगज़ेब के टोपी सिलने या साधारण मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की कथा—यदि सत्य भी मान ली जाए—तो वह राज्य की वर्ग-प्रकृति को नहीं बदल देती। दासता, बेगार, लगान, जज़िया, ज़कात—ये सब राज्य द्वारा अधिशेष के अपहरण के रूप हैं। प्रश्न यह नहीं कि कर किससे कितना लिया गया, बल्कि यह है कि किस वर्ग के हित में लिया गया और किस वर्ग के श्रम से लिया गया।

साम्राज्य की भौगोलिक विशालता—चीन से बड़ा या छोटा—जनता की मुक्ति का प्रमाण नहीं होती। साम्राज्य का फैलाव अक्सर किसानों पर बढ़े लगान, सैनिक भर्ती और युद्ध-खर्च का पर्याय होता है। मुग़ल भारत की “25% वैश्विक GDP” जैसी संख्याएँ, यदि किसी हद तक सही भी हों, तो वे अधिशेष के केंद्रीकरण को दिखाती हैं—न कि श्रमिक-किसान की खुशहाली को। उत्पादन समाज करता है; अधिशेष सत्ता हथियाती है।


जज़िया और ज़कात की तुलना को नैतिक तराज़ू पर तौलना भटकाव है। कर का धार्मिक लेबल उसकी वर्गीय हिंसा को नहीं मिटाता। किसान—हिंदू हो या मुसलमान—लगान और बेगार की चक्की में पिसता रहा। राज्य का धर्म चाहे जो हो, राज्य की वर्ग-प्रकृति निर्णायक रहती है।


दरबार में हिंदू राजाओं का प्रतिशत बढ़ना—यह सत्ता की साझेदारी का संकेत हो सकता है, सत्ता की लोकतांत्रिकता का नहीं। सामंती व्यवस्था में विविध कुलीन समूहों की भागीदारी जनता की मुक्ति नहीं लाती; वह केवल शोषण के प्रबंधन को स्थिर करती है।


किसी एक मंदिर या मस्जिद को तोड़ने-बचाने की कथाएँ इतिहास का केंद्र नहीं होनी चाहिए। शासक अक्सर धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता को सत्ता-संतुलन के औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं। मार्क्सवाद के लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि इन निर्णयों ने किस वर्ग को लाभ पहुँचाया और किस वर्ग को नियंत्रित किया।


औपनिवेशिक लूट निर्विवाद है। पर यह कहना कि उससे पहले सब न्यायपूर्ण था—इतिहास का सरलीकरण है। ब्रिटिश पूँजीवाद ने पूर्व-पूँजीवादी शोषण को तोड़ा नहीं; उसने उसे वैश्विक बाज़ार से जोड़कर और तीखा किया।

1947 के बाद “भूरे अंग्रेज़ों” द्वारा टैक्स-हेवनों में पूँजी का पलायन—यह उसी पूँजीवादी निरंतरता का प्रमाण है, जहाँ राज्य जनता का नहीं, पूँजी का सेवक बना रहता है।


बहादूर शाह ज़फ़र की त्रासदी औपनिवेशिक दमन की गवाही है; 1857 का संघर्ष बहुवर्गीय विद्रोह था। पर उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सामंती राज्य जनता का राज्य था। शहादत व्यक्तिगत हो सकती है; राज्य-चरित्र संरचनात्मक होता है।


निष्कर्ष: इतिहास को वर्ग-दृष्टि से पढ़ें


औरंगज़ेब को न दानव बनाइए, न संत। मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि इतिहास नायकों की नैतिकता से नहीं, उत्पादन-संबंधों से चलता है। साम्राज्य—चाहे मुग़ल हों या ब्रिटिश—जब तक जनता के हाथ में सत्ता नहीं, तब तक वे अलग-अलग रूपों में एक ही शोषण-तंत्र हैं।

आज का काम यह नहीं कि पुराने शासकों की धार्मिक छवियाँ गढ़ी जाएँ, बल्कि यह कि पूँजीवादी राज्य की मौजूदा लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और वर्ग-विस्मृति को उजागर किया जाए। इतिहास का सही उपयोग वर्तमान संघर्ष के लिए होता है—न कि अतीत के शासकों की प्रशस्ति के लिए।


मार्क्सवादी दृष्टि हमें यही सिखाती है कि इतिहास न तो महान व्यक्तियों की नैतिक कथाएँ हैं, न ही धार्मिक प्रतीकों का युद्ध। इतिहास वर्गों के संघर्ष, उत्पादन के नियंत्रण और अधिशेष के वितरण की कहानी है। और जब तक इस बुनियादी सच को नहीं समझा जाएगा, तब तक औरंगज़ेब भी एक मिथक बने रहेंगे—और आज का शासक वर्ग भी अपने अपराधों को इतिहास की धूल में छिपाता रहेगा।


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