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Saturday, 14 February 2026

मज़दूर विमर्श, अंक- 2, फरवरी, 2026

 अनुक्रम 


1. कविता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता  और समाज : एक भौतिकवादी दृष्टि

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2. इतिहास, वर्ग और सत्ता की भौतिकता- औरंगजेब के संदर्भ में

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/2.html?m=1 

3. किलिंग फ़ील्ड्स

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/3.html?m=1 

4. रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/4.html?m=1 

5. सशस्त्र संघर्ष और क्रांतिकारी रणनीति का सवाल

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/5.html?m=1 

6. तर्क बनाम अंधविश्वास”— या सामाजिक यथार्थ से पलायन?

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/6.html?m=1 

7. अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/7.html?m=1 

8. UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस

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9. यात्रा वृतांत भाग - 1

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/9-1.html?m=1 

10. कविता - हड़तालनामा

https://kamgarlibrary.blogspot.com/2026/02/10.html?m=1 


10. कविता - हड़तालनामा

 हड़ताल कोई छुट्टी नहीं होती,

यह वह दिन है

जब कारख़ाने की साँस

मालिक की जेब पर सवाल रख देती है।


यह वह पल है

जब लोहे की मशीनें

पहली बार समझती हैं

कि उनका शोर

किसके हक़ में बजता है।


चिमनियाँ अचानक

ख़ामोश हो जाती हैं,

और घड़ियाँ—

जो अब तक मुनाफ़ा नापती थीं—

घबराकर

समय से पूछती हैं

“अब क्या होगा?”


हड़ताल मज़दूर को सिखाती है

कि उसका दुश्मन

कोई एक आदमी नहीं,

बल्कि वह व्यवस्था है

जिसकी जेब में

क़ानून भी है,

डंडा भी,

और संसद की कुर्सी भी।


जब मज़दूर अकेला होता है

तो मालिक

बड़ा रहमदिल दिखता है—

थोड़ी हमदर्दी,

दो चार आँसू,

और ढेर सारा झूठ।

हड़ताल

इस रहमदिली का

नक़ाब उतार देती है।


हड़ताल शुरू होते ही

क़ानून जाग उठता है—

डंडों की खड़खड़ाहट में,

एफ़आईआर की स्याही में,

और गोलियों की

बेआवाज़ दलील में।

तब मज़दूर समझता है

कि यह राज्य

उसकी भूख से नहीं,

मालिक के डर से चलता है।


हड़ताल बताती है—

कि भूख कोई निजी हादसा नहीं,

यह राजनीति की बनाई हुई

साज़िश है।

कि कम मज़दूरी

किस्मत नहीं,

मुनाफ़े की पूरी

तदबीर है।


हड़ताल में

मज़दूर पहली बार

अपनी ताक़त देखता है—

खाली हाथों में

इतिहास का बोझ,

और आँखों में

भविष्य की आग।


छोटी-छोटी हड़तालें

सीढ़ियाँ होती हैं—

जिन पर चढ़कर

वर्ग

खुद को पहचानता है,

और आईने में

पहली बार

अपना चेहरा देखता है।


और जब हड़ताल

कारख़ाने की दीवारें लाँघकर

सड़कों, खेतों और खदानों तक

फैल जाती है,

तो वह सिर्फ़ माँग नहीं रहती—

वह ऐलान बन जाती है।


ऐलान

कि उत्पादन

मज़दूर के बिना

एक काग़ज़ी सपना है,

कि दुनिया

पूँजी के बिना भी चल सकती है,

मगर मज़दूर के बिना नहीं।


जिस दिन मज़दूर समझ ले

कि उसकी ताक़त

उसकी गिनती में नहीं,

उसकी एकता में है,

उसके संगठन में है—

उस दिन हड़ताल

मशीनें ही नहीं रोकती,

वह इतिहास की दिशा

मोड़ देती है।


और जिस रोज़

मज़दूर

अपनी पार्टी,

अपना अख़बार,

अपना सपना

खड़ा कर ले—

उस दिन लाल झंडा

कपड़े का टुकड़ा नहीं रहता,

वह आने वाले कल का

नक़्शा बन जाता है।


हड़ताल

उसी नक़्शे की

पहली रेखा है—

जो लिखती है,

ख़ून और पसीने की स्याही से:


दुनिया भर के मेहनतकशो,

एक हो।


9. यात्रा वृतांत भाग - 1

 नामद्रोलिंग मठ : स्वर्णिम शांति के पीछे श्रम और निर्वासन का इतिहास

मैं जब बायलाकुप्पे पहुँचा, तो सड़क के दोनों ओर फैले खेत और बस्तियाँ मुझे यह याद दिला रही थीं कि यह धरती केवल ध्यान और मंत्रों की नहीं, बल्कि पसीने और निर्वासन की भी भूमि है। सामने नामद्रोलिंग मठ का स्वर्णिम शिखर चमक रहा था—ऐसा लगता था मानो धूप को सोने में ढाल दिया गया हो। पर यात्राएँ केवल देखने के लिए नहीं होतीं; वे समझने के लिए होती हैं। और समझ तब आती है, जब हम पत्थरों के नीचे दबी कहानी को पढ़ना सीखते हैं।

1963 में स्थापित यह मठ केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं है। यह उस इतिहास की जीवित निशानी है, जिसमें एक पूरी कौम को अपनी ज़मीन, अपनी भाषा और अपने पहाड़ छोड़कर निर्वासन की राह पकड़नी पड़ी। तिब्बती बौद्ध भिक्षु यहाँ शांति की साधना करते हैं, पर उनकी यह शांति संघर्ष और विस्थापन की राख से उपजी है। यह तथ्य कोई सजावटी सूचना नहीं, बल्कि इस मठ की आत्मा है।

मठ की वास्तुकला देखते ही यात्री ठिठक जाता है। ऊँचे स्तंभ, दीवारों पर उकेरी गई रंगीन कथाएँ, और प्रार्थना कक्ष में स्थापित बुद्ध शाक्यमुनि, गुरु पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ—ये सब केवल सौंदर्य के लिए नहीं हैं। ये प्रतीक हैं उस विचारधारा के, जो मनुष्य को हिंसा, लोभ और अज्ञान से मुक्त करना चाहती है।

यहाँ कला, धर्म से अलग नहीं है; वह शिक्षण का माध्यम है। दीवारों पर बने चित्र किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि चलती-फिरती किताबें हैं—जिन्हें पढ़ने के लिए आँखों के साथ विवेक भी चाहिए।

मुख्य प्रार्थना हॉल में खड़े बुद्ध शाक्यमुनि, पद्मसंभव और अमितायुस की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएँ श्रद्धा जगाती हैं। पर एक मज़दूर की आँख इन मूर्तियों के साथ-साथ उन हाथों को भी देखती है जिन्होंने इन्हें गढ़ा—राजमिस्त्री, चित्रकार, बढ़ई, रंग घोलते श्रमिक। इतिहास अक्सर देवताओं को याद रखता है, श्रमिकों को नहीं। राहुल सांकृत्यायन हमें सिखाते हैं कि यात्रा करते समय देवालय नहीं, मानव श्रम को पहले पढ़ो।

यहाँ पाँच हज़ार से अधिक भिक्षु और भिक्षुणियाँ रहते हैं। वे पढ़ते हैं, ध्यान करते हैं, अनुशासन में जीते हैं। लेकिन यह अनुशासन किसी स्वर्ग से नहीं उतरा—यह एक सामूहिक जीवन की आवश्यकता है, जहाँ भोजन, वस्त्र और अध्ययन श्रम और संगठन से संभव होते हैं। यह मठ हमें बताता है कि अध्यात्म भी बिना सामूहिक श्रम के जीवित नहीं रह सकता।

पर्यटक जब यहाँ आते हैं, तो शांति की तलाश में आते हैं। मंत्रों की ध्वनि, प्रार्थना-चक्रों की घूमती लय—सब उन्हें कुछ देर के लिए शहरों की थकान से मुक्त कर देते हैं। लेकिन यह शांति भी वर्गों में बँटी है। पर्यटक के पास समय है, कैमरा है; भिक्षु के पास अनुशासन है, अध्ययन है; और आसपास के खेतों में काम करने वाले मज़दूर के पास केवल दिन भर की मज़दूरी की चिंता। तीनों एक ही भूगोल में हैं, पर एक ही जीवन में नहीं।

नामद्रोलिंग मठ का प्रवेश निःशुल्क है—यह बात अच्छी लगती है। पर असली सवाल यह है कि क्या ज्ञान, संस्कृति और शांति तक पहुँच भी उतनी ही सहज है? या फिर यह भी वैसे ही सीमित है जैसे ज़मीन, शिक्षा और सत्ता?

राहुल सांकृत्यायन होते तो शायद लिखते—“यह मठ मुझे यह नहीं सिखाता कि शांति कहाँ मिलेगी, बल्कि यह सिखाता है कि बिना न्याय के शांति केवल कुछ लोगों की सुविधा होती है।”

नामद्रोलिंग मठ सुंदर है, प्रेरक है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी शिक्षा यह है कि अध्यात्म को इतिहास से अलग मत करो। जो शांति श्रम और विस्थापन को भूल जाए, वह देर तक टिक नहीं सकती। और जो यात्री इसे समझ ले—वह केवल पर्यटक नहीं रहता, वह सचमुच का पथिक बन जाता है।

कुरुवा द्वीप : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी के बीच खड़ा सवाल

केरल के वायनाड ज़िले में स्थित कुरुवा द्वीप—घने जंगलों, बाँस की पगडंडियों और काबिनी नदी के शांत जल से घिरा—आज हमें प्रकृति के सौंदर्य का एक निष्कलंक उदाहरण दिखाई देता है। लगभग 950 एकड़ में फैला यह निर्जन द्वीप, पहली नज़र में मानो मनुष्य के हस्तक्षेप से मुक्त कोई स्वप्नलोक हो। लेकिन इतिहास और समाज को भौतिक परिस्थितियों के आलोक में देखने वाली दृष्टि हमें सिखाती है कि कोई भी प्राकृतिक स्थल केवल “सुंदर दृश्य” नहीं होता—वह सामाजिक संबंधों, उत्पादन-प्रणाली और वर्गीय हितों से गहराई से जुड़ा होता है।

कुरुवा द्वीप का आज का स्वरूप—जहाँ बाँस की बेड़ों पर सैर कराई जाती है, ट्रैकिंग के नाम पर जंगल को ‘अनुभव’ में बदला जाता है, और पक्षी-दर्शन को मनोरंजन के रूप में परोसा जाता है—पूँजीवादी पर्यटन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें प्रकृति स्वयं एक वस्तु (कमोडिटी) बन जाती है। यहाँ शांति भी बिकती है, हरियाली भी बिकती है, और ‘निर्जनता’ भी टिकट के दाम में शामिल हो जाती है।

पर प्रश्न यह है कि इस सौंदर्य का सामाजिक मूल्य क्या है और इसका लाभ किसे मिलता है?

जिस द्वीप को आज “अनहैबिटेड” कहा जा रहा है, वह इतिहास में मानव श्रम और स्थानीय आदिवासी समुदायों की स्मृतियों से पूरी तरह अछूता नहीं रहा होगा। जंगलों का संरक्षण आवश्यक है—इसमें कोई विवाद नहीं—लेकिन जब संरक्षण और पर्यटन राज्य तथा बाज़ार के साझा उपक्रम में बदल जाते हैं, तब प्रकृति के साथ-साथ श्रम भी अदृश्य हो जाता है। टिकट की कीमत, सीमित प्रवेश और नियंत्रित समय—ये सब उस अनुशासन के औज़ार हैं जिनसे प्रकृति को ‘व्यवस्थित उपभोग’ के दायरे में रखा जाता है।

कहा जाता है कि कुरुवा द्वीप पर प्रतिदिन केवल 200 पर्यटकों को प्रवेश की अनुमति है। यह सीमा पर्यावरण-संरक्षण के नाम पर उचित ठहराई जाती है, किंतु यह भी देखना आवश्यक है कि क्या इसी अनुपात में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं? बसें तो मनंतवाड़ी से द्वीप तक आती हैं, लेकिन क्या उस रास्ते पर रहने वाले श्रमिक और आदिवासी इस पर्यटन अर्थव्यवस्था के निर्णायक हैं या केवल सस्ते श्रम के स्रोत?

कला, संस्कृति और प्रकृति—तीनों को उनके भौतिक आधार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। कुरुवा द्वीप की ‘शांति’ उस समाज में पैदा हुई है जहाँ शहरों का शोर, प्रदूषण और असमानता लगातार बढ़ रही है। इसलिए यह शांति भी एक सामाजिक उत्पाद है—जिसे वही वर्ग ख़रीद सकता है जिसके पास समय और धन दोनों हैं। छात्र रियायत में प्रवेश पा सकता है, लेकिन वह भी दर्शक ही रहता है, स्वामी नहीं।

यह लेख कुरुवा द्वीप के सौंदर्य का निषेध नहीं करता। प्रश्न सौंदर्य के उपभोग के सामाजिक ढाँचे पर है। यदि प्रकृति केवल देखने की वस्तु बनती गई, और उसके संरक्षण की कीमत आम जनता से वसूली जाती रही, तो यह मॉडल अंततः प्रकृति और मनुष्य—दोनों के विरुद्ध जाएगा।

कुरुवा द्वीप हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम प्रकृति को बचा रहे हैं, या उसे नए सिरे से बेच रहे हैं।

और यही सवाल—इतिहास, समाज और उत्पादन संबंधों की कसौटी पर—आज के हर ‘इको-टूरिज़्म’ मॉडल से पूछा जाना चाहिए।

थमारसेरी चुरम : प्रकृति, श्रम और इतिहास की चढ़ाई

थमारसेरी चुरम—जिसे लोग थमारसेरी घाट भी कहते हैं—केरल का वह पहाड़ी दर्रा है जिसे अक्सर केवल उसकी सुंदरता, घुमावदार सड़कों और हरियाली के लिए याद किया जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 766 पर स्थित यह रास्ता कोझिकोड को वायनाड से जोड़ता है और अपने नौ हेयरपिन मोड़ों के कारण पर्यटकों को रोमांचित करता है। लेकिन यदि हम केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित रहें, तो हम इतिहास के उस श्रम, संघर्ष और सत्ता-संबंधों को अनदेखा कर देते हैं, जिनसे यह रास्ता बना और जिनके भीतर आज भी यह सांस लेता है।

 प्रकृति स्वयं में कभी तटस्थ नहीं होती; मनुष्य और समाज उसके साथ जिस तरह का संबंध बनाते हैं, वही उसके अर्थ को तय करता है। थमारसेरी चुरम भी कोई “प्राकृतिक चमत्कार” मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक उत्पाद है—औपनिवेशिक सत्ता, स्थानीय जनजातीय श्रम और व्यापारिक हितों का संयुक्त परिणाम।

ब्रिटिश शासन के दौर में इस घाट का विकास इसलिए किया गया क्योंकि साम्राज्य को वायनाड के संसाधनों—कॉफी, मसाले, लकड़ी—को तटवर्ती बाज़ारों तक पहुँचाने के लिए एक सुगम मार्ग चाहिए था। अंग्रेज़ इंजीनियरों के नाम इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन जिन आदिवासी समुदायों ने अपनी पीठ, अपने हाथों और अपने जीवन से इस रास्ते को काटकर निकाला, उनका ज़िक्र केवल हाशिये पर मिलता है। यही औपनिवेशिक इतिहास की मूल प्रवृत्ति है—श्रम को अदृश्य बनाना और सत्ता को महिमामंडित करना।

आज थमारसेरी चुरम को एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लक्किडी व्यू पॉइंट, चेन ट्री, ट्रेकिंग और वाइल्डलाइफ वॉचिंग—ये सब उपभोक्ता संस्कृति के आकर्षक शब्द हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि इस पर्यटन से किसे लाभ होता है? स्थानीय आदिवासी और श्रमिक समुदायों को, या उन पूँजीगत संरचनाओं को जो प्रकृति को भी एक वस्तु में बदल देती हैं?

800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह घाट केवल भौगोलिक चढ़ाई नहीं है; यह उस ऐतिहासिक चढ़ाई का प्रतीक है, जहाँ श्रम नीचे रह गया और लाभ ऊपर चला गया। मानसून के महीनों में जब यह इलाका हरियाली से भर जाता है, तब वही बारिश स्थानीय मेहनतकशों के लिए जोखिम भी बन जाती है—भूस्खलन, सड़क दुर्घटनाएँ और रोज़गार की अस्थिरता।

यह सही है कि नवंबर से फरवरी का समय यहाँ घूमने के लिए अनुकूल माना जाता है, और जून से सितंबर में प्रकृति अपने सबसे जीवंत रूप में दिखाई देती है। लेकिन एक ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि यह सवाल उठाए बिना नहीं रह सकती कि “अनुकूल” किसके लिए? पर्यटक के लिए, या उस मज़दूर के लिए जो हर मौसम में इस सड़क को चलने लायक बनाए रखने के लिए काम करता है?

थमारसेरी चुरम हमें यह सिखाता है कि प्रकृति, इतिहास और समाज को अलग-अलग खानों में नहीं बाँटा जा सकता। यह घाट पश्चिमी घाट की सुंदरता का प्रतीक है, लेकिन साथ ही औपनिवेशिक शोषण, अदृश्य श्रम और आज के नवउदारवादी पर्यटन मॉडल का भी साक्ष्य है। यदि हमें सचमुच इस स्थान को समझना है, तो हमें केवल कैमरा और आरामदायक जूते ही नहीं, बल्कि इतिहास की चेतना और श्रम के प्रति सम्मान भी साथ लेकर चलना होगा।

क्योंकि किसी भी रास्ते की असली कहानी उसके मोड़ों में नहीं,

उन हाथों में छिपी होती है

जिन्होंने उसे बनाया और आज भी संभाले हुए हैं।

पूकोडे झील : प्रकृति, पर्यटन और पूँजी का अंतर्विरोध

केरल के वायनाड ज़िले में स्थित पूकोडे झील को अक्सर प्रकृति की एक शांत, सुंदर और निष्कलुष देन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हरी-भरी पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के घने वनों के बीच बसी यह मीठे पानी की झील, जिसका आकार भारत के भौगोलिक मानचित्र से मिलता-जुलता बताया जाता है, आज पर्यटन प्रचार का एक चमकदार प्रतीक बन चुकी है। झील की गहराई, उसकी जैव-विविधता, और उससे निकलने वाली पनमарам नदी—ये सब तथ्य पर्यटकों के लिए आकर्षण हैं, परंतु इन्हें केवल प्राकृतिक विशेषताओं के रूप में देखना एक अधूरा दृष्टिकोण होगा।

 प्रकृति, कला और संस्कृति—तीनों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं समझा जा सकता। इसी कसौटी पर यदि पूकोडे झील को देखा जाए, तो वह केवल एक सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि आधुनिक पर्यटन उद्योग और पूँजीवादी विकास की एक जीवंत प्रयोगशाला के रूप में सामने आती है।

प्रकृति का ऐतिहासिक रूपांतरण

पूकोडे झील का निर्माण किसी मानव योजना का परिणाम नहीं, बल्कि पश्चिमी घाट की भौगोलिक और जल-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का नतीजा है। यही झील पनमарам नदी का स्रोत है, जो आगे काबिनी नदी से मिलती है। अर्थात यह झील केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल-प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब प्रकृति को केवल “देखने” और “उपभोग करने” की वस्तु बना दिया जाता है, तब उसका सामाजिक महत्व गौण हो जाता है।

आज झील के चारों ओर बनी पगडंडियाँ, नौकायन सुविधाएँ, मछलीघर, बच्चों के पार्क और हस्तशिल्प की दुकानें—ये सब उस प्रक्रिया का संकेत हैं जिसमें प्रकृति को बाज़ार के अनुरूप ढाला जा रहा है। यहाँ प्रकृति स्वयं नहीं बोलती; उसकी ओर से पर्यटन विभाग बोलता है, मूल्य तय करता है और समय-सीमा निर्धारित करता है।

पर्यटन और वर्गीय यथार्थ

झील में नौकायन का आनंद लेने वाला पर्यटक अक्सर यह नहीं पूछता कि नाव चलाने वाला श्रमिक किस परिस्थिति में काम करता है, या आसपास के आदिवासी और किसान समुदायों का इस झील से क्या ऐतिहासिक संबंध रहा है। प्रवेश शुल्क, नौकायन शुल्क और “फुट स्पा” जैसी गतिविधियाँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि प्रकृति अब विश्राम का नहीं, बल्कि उपभोग का साधन बन चुकी है।

 यहाँ सौंदर्यबोध भी उत्पादन-संबंधों से नियंत्रित है। जो झील स्थानीय समुदाय के लिए पानी, मछली और जीवन का स्रोत रही होगी, वही आज मध्यमवर्गीय पर्यटन के लिए एक “वीकेंड डेस्टिनेशन” बन गई है।

जैव-विविधता और बाज़ार

पूकोडे झील में पाई जाने वाली स्थानीय मछली प्रजाति पेटिया पूकोडेन्सिस जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। परंतु जब इस जैव-विविधता को केवल “एक्वेरियम की वस्तु” या पर्यटन आकर्षण के रूप में देखा जाता है, तब संरक्षण का सवाल भी बाज़ार के अधीन हो जाता है।

संरक्षण तब तक सतही रहता है, जब तक वह स्थानीय समुदायों की जीवन-प्रणाली और उनके अधिकारों से नहीं जुड़ता।

पूकोडे झील हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का सौंदर्य अपने आप में निरपेक्ष नहीं होता। वह उस समाज की संरचना को प्रतिबिंबित करता है, जो उसे देखता और उपयोग करता है। यदि प्रकृति को केवल टिकट, शुल्क और “अनुभव” में बदल दिया जाएगा, तो अंततः वही संकट पैदा होगा, जिसे आज हम पर्यावरणीय विनाश के रूप में देख रहे हैं।

 ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टि से यह आवश्यक है कि हम पूकोडे झील को केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों के एक जटिल रूप में समझें—जहाँ प्रकृति, श्रम और पूँजी एक-दूसरे से टकराते हैं। वास्तविक संरक्षण और सौंदर्यबोध तभी संभव है, जब प्रकृति को बाज़ार की वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक धरोहर के रूप में देखा जाए।


बाणासुरा सागर बाँध : मिथक, प्रकृति और उत्पादन-संबंधों का द्वंद्व



केरल के वायनाड ज़िले में स्थित बाणासुरा सागर बाँध को प्रायः एक अद्भुत प्राकृतिक और तकनीकी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि यह भारत का सबसे बड़ा मिट्टी का बाँध है और एशिया में दूसरा सबसे बड़ा। इसका नाम बाणासुर पर रखा गया—एक पौराणिक असुर राजा, महाबली का पुत्र, जिसके बारे में कथा है कि उसने इन्हीं पहाड़ियों पर तपस्या की थी।

परंतु यदि हम इस बाँध को केवल मिथक, पर्यटन और सौंदर्य के चश्मे से देखें, तो हम उसके वास्तविक सामाजिक और ऐतिहासिक अर्थ को समझने में असफल रहेंगे। किसी भी सांस्कृतिक या भौतिक रचना को समझने के लिए हमें उसके पीछे काम कर रही उत्पादन-पद्धति और वर्गीय संबंधों को देखना होगा।

निर्माण और उद्देश्य : विकास की भौतिक ज़रूरत

1979 में निर्मित बाणासुरा सागर बाँध बाणासुरसागर परियोजना का हिस्सा था। इसका घोषित उद्देश्य था—सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन। यहाँ हमें स्पष्ट दिखता है कि यह बाँध किसी राजा की तपस्या का परिणाम नहीं, बल्कि आधुनिक राज्य और पूँजी की उस ज़रूरत का परिणाम है, जहाँ जल को एक प्राकृतिक संसाधन से बदलकर “नियंत्रित उत्पादन-तत्व” बना दिया गया।

38.5 मीटर ऊँचाई और 685 मीटर लंबाई वाला यह बाँध, तथा इसके साथ बने छह सैडल बाँध, इस बात के प्रतीक हैं कि आधुनिक समाज प्रकृति को समग्र रूप में नहीं, बल्कि खंडों में बाँटकर नियंत्रित करना चाहता है। जल अब नदी नहीं, बल्कि “जलाशय” है—एक ऐसी इकाई, जिसे मापा, बाँटा और उपयोग में लाया जा सकता है।

जलाशय और ऊर्जा : प्रकृति से मूल्य की निकासी

इस बाँध से बना विशाल जलाशय, जिसे आज “क्रिस्टल-क्लियर पानी” और “हरे-भरे टापुओं” के रूप में प्रचारित किया जाता है, दरअसल उस प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें प्रकृति को सौंदर्य नहीं, उपयोग-मूल्य के रूप में देखा जाता है।

231.75 मेगावाट की स्थापित विद्युत क्षमता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बाँध का केंद्रीय महत्व पर्यटन नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन है—और ऊर्जा आधुनिक पूँजीवादी समाज में सबसे निर्णायक उत्पादन-तत्व है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं कि बिजली पैदा होती है या नहीं, बल्कि यह है कि यह बिजली किसके लिए और किस कीमत पर पैदा होती है। क्या इससे वायनाड के आदिवासी और किसान समुदाय की जीवन-स्थितियाँ मूल रूप से बदलीं, या यह ऊर्जा मुख्यतः शहरी और औद्योगिक केंद्रों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रवाहित हुई?

पर्यटन : सौंदर्य का बाज़ारीकरण

आज बाणासुरा सागर बाँध को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है—नौकायन, ट्रेकिंग, फोटोग्राफी, वन्यजीव दर्शन। यह सब आधुनिक पूँजीवाद की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति को भी एक “उपभोक्ता वस्तु” में बदल दिया जाता है। पहाड़, पानी, पक्षी और फूल—सब कुछ देखने, खपत करने और तस्वीरों में कैद करने योग्य माल बन जाता है।

प्रवेश शुल्क, समय-सारिणी और “सर्वश्रेष्ठ मौसम”—ये सभी इस बात के संकेत हैं कि प्रकृति अब सामूहिक जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि नियंत्रित मनोरंजन का साधन है।

मिथक का उपयोग : वैचारिक आवरण

बाँध का नाम बाणासुर पर रखा जाना कोई मासूम सांस्कृतिक चयन नहीं है। मिथक यहाँ एक वैचारिक आवरण का काम करता है—जो आधुनिक तकनीकी हस्तक्षेप को प्राचीन गौरव से जोड़ देता है। इससे विकास की प्रक्रिया स्वाभाविक और निर्विवाद प्रतीत होती है, जबकि उसके पीछे के सामाजिक-आर्थिक प्रश्न—भूमि, विस्थापन, श्रम और असमानता—पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।

निष्कर्ष

बाणासुरा सागर बाँध न तो केवल एक इंजीनियरिंग चमत्कार है, न ही मात्र एक पर्यटन स्थल। यह उस ऐतिहासिक क्षण की अभिव्यक्ति है जहाँ आधुनिक राज्य, पूँजी और तकनीक ने प्रकृति को अपने अधीन कर लिया है। इस बाँध को समझने का सही तरीका यही है कि हम उससे जुड़े उत्पादन-संबंधों, वर्गीय हितों और वैचारिक आवरणों को पहचानें।

क्योंकि इतिहास में न बाँध तटस्थ होते हैं, न मिथक—

वे हमेशा किसी न किसी सामाजिक शक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं।


8. UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस

 कानून सिर्फ नैतिक जागृति से नहीं बनते; वे ठोस सामाजिक विरोधाभासों के उत्पाद होते हैं। मार्क्सवादियों ने बार-बार तर्क दिया कि "समाज की संरचना उसके संस्थानों के चरित्र को निर्धारित करती है।"


विश्वविद्यालय ज्ञान के तटस्थ मंदिर नहीं हैं; वे समाज के भौतिक संगठन में अंतर्निहित वैचारिक उपकरण हैं। भारत में, जहाँ जाति ने ऐतिहासिक रूप से श्रम विभाजन को नियंत्रित किया है, ज्ञान तक पहुँच अपने आप में सामाजिक शक्ति का एक रूप बन गई है।


इसलिए, भेदभाव-विरोधी रेगुलेशंस का उदय न केवल प्रशासनिक सुधार का संकेत देता है, बल्कि औपचारिक लोकतांत्रिक समानता और विरासत में मिली सामाजिक पदानुक्रम के बीच विरोधाभास के तेज होने का भी संकेत देता है। जब उत्पीड़ित समूह बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा में प्रवेश करते हैं - आरक्षण, छात्रवृत्ति और जन शिक्षा की मदद से - तो पुरानी संरचना को खुद को समायोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।


इस प्रकार, इन रेगुलेशंस को ऊपर से उदारता के बजाय नीचे से दबाव की प्रतिक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए।


मार्क्सवादी दृष्टिकोण से, सुधार अक्सर दोहरा कार्य करते हैं:


वे असमानता की सबसे कठोर अभिव्यक्तियों को कम करते हैं।


वे साथ ही मौजूदा व्यवस्था को स्थिर करते हैं।


मार्क्सवाद ने सुधारों को क्रांतिकारी परिवर्तनों के रूप में व्याख्या करने के खिलाफ चेतावनी दी है। मार्क्सवाद ने उन्हें बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के प्रति समाज के क्रमिक अनुकूलन के हिस्से के रूप में देखा है।


समान अवसर केंद्र, इक्विटी समितियाँ, और निगरानी तंत्र ठीक इसी तरह के अनुकूलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि भेदभाव मौजूद है - जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है - फिर भी वे शैक्षणिक शक्ति के भौतिक वितरण को मौलिक रूप से नहीं बदलते हैं, जैसे:


कौन फैकल्टी बनता है


कौन रिसर्च फंडिंग को नियंत्रित करता है


कौन "योग्यता" को परिभाषित करता है


कौन प्रशासनिक नेतृत्व संभालता है


इन संरचनात्मक पदों को बदले बिना, रेगुलेशन के परिवर्तनकारी होने के बजाय प्रक्रियात्मक बनने का जोखिम रहता है।


एक महत्वपूर्ण मार्क्सवादी आलोचना औपचारिक समानता और वास्तविक समानता के बीच अंतर से संबंधित है।


पूंजीवादी-लोकतांत्रिक समाज समान अधिकारों की घोषणा करते हैं, जबकि उन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बरकरार रखते हैं जो असमानता पैदा करती हैं। इसी तरह, विश्वविद्यालय भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर सकते हैं, जबकि पारिवारिक पूंजी, भाषा विशेषाधिकार, शहरी स्कूली शिक्षा और सामाजिक नेटवर्क में निहित लाभों को पुन: उत्पन्न करना जारी रखते हैं।


मार्क्सवाद ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय के विचार अक्सर प्रचलित सामाजिक व्यवस्था की जरूरतों को दर्शाते हैं। भेदभाव की परिभाषा का विस्तार - जिसमें OBC समूह शामिल हैं - यह बताता है कि राज्य का वैचारिक ढाँचा विकसित हो रहा है। हालाँकि, अकेले विचारधारा ऐतिहासिक रूप से जमी हुई पदानुक्रमों को भंग नहीं कर सकती है।


दूसरे शब्दों में: आप उन स्थितियों को बदले बिना सदियों के सामाजिक स्तरीकरण को कानून बनाकर खत्म नहीं कर सकते जो इसे बनाए रखती हैं।  


एक और चिंता यह है कि आधुनिक राज्य गहरी समस्याओं को नौकरशाही तरीकों से सुलझाने की कोशिश करते हैं। कमेटी, रिपोर्ट, कम्प्लायंस स्ट्रक्चर - ये सब प्रशासनिक तर्कसंगतता को दिखाते हैं। ये पारदर्शिता और जवाबदेही तो लाते हैं, लेकिन ये असल उत्पीड़न को सिर्फ कागजी कार्रवाई में बदलने का खतरा भी पैदा करते हैं।


इतिहास बताता है कि संस्थाएं अक्सर अपने मूल स्वभाव को बदले बिना आलोचना को अपना लेती हैं। एक यूनिवर्सिटी सालाना इक्विटी रिपोर्ट फाइल कर सकती है, जबकि मेंटरशिप नेटवर्क, मूल्यांकन में भेदभाव, या सांस्कृतिक अलगाव के ज़रिए अनौपचारिक रूप से भेदभाव जारी रख सकती है।


इसलिए, एक सवाल उठता है:


क्या राज्य समाज को बदल रहा है, या सिर्फ उसके झगड़ों को मैनेज कर रहा है?


मार्क्सवाद के अनुसार, सामाजिक प्रगति ऑब्जेक्टिव स्थितियों और मानवीय प्रयासों – खासकर सामूहिक संघर्ष – के बीच तालमेल से होती है।


ये नियम तभी असली मायने हासिल करेंगे जब उन्हें इनसे छात्र आंदोलन, फैकल्टी एक्टिविज़्म, लोकतांत्रिक निगरानी, सार्वजनिक बौद्धिक जुड़ाव को बढ़ावा मिले, नहीं तो, वे सिर्फ़ प्रतीकात्मक रियायतें बनकर रह जाएंगे।


सुधार ऐतिहासिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होते कि वे उत्पीड़न को खत्म करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे राजनीतिक मुकाबले के लिए नया मैदान खोलते हैं। एक बार जब समानता को एक सिद्धांत के रूप में घोषित कर दिया जाता है, तो हाशिए पर पड़े समूहों को संस्थानों को चुनौती देने के लिए एक मज़बूत वैचारिक हथियार मिल जाता है।


ये नियम आधुनिक लोकतंत्र के एक गहरे विरोधाभास को भी उजागर करते हैं।


वही राज्य जो असमान सामाजिक ढांचों पर शासन करता है, उसे न्याय की गारंटी देने वाला भी दिखना चाहिए। इससे वह बनता है जिसे मार्क्सवादी एक विरोधाभासी राज्य रूप कहते हैं – जो एक साथ सुरक्षात्मक और रूढ़िवादी होता है।


नियमों का पालन न करने पर सज़ा की धमकी देकर, UGC यह स्वीकार करता है कि भेदभाव आकस्मिक नहीं बल्कि सिस्टमैटिक है। फिर भी, रेगुलेटरी तरीका यह मानता है कि संस्थान सामाजिक शक्ति के व्यापक पुनर्वितरण के बिना खुद को ठीक कर सकते हैं।ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से, यह केवल आंशिक रूप से सच है।


मार्क्सवादी निष्कर्ष रोमांटिक आशावाद और सनकी अस्वीकृति दोनों से बचेगा।


ये नियम न तो क्रांतिकारी हैं और न ही बेकार। इन्हें सबसे अच्छे तरीके से एक बदलते हुए समाज के लक्षणों के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ पहले से बाहर रखे गए समूह कुलीन ज्ञान संरचनाओं के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।


उनका अंतिम महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वे प्रशासनिक सुरक्षा उपाय बने रहते हैं या शिक्षा के गहरे लोकतंत्रीकरण की दिशा में सीढ़ी बनते हैं।


जैसा कि मार्क्सवाद बताता है: "मानवीय संस्थाएँ तब बदलती हैं जब समाज का भौतिक जीवन उन्हें बदलने के लिए मजबूर करता है।"


यह नियम इस बात का सबूत है कि ऐसा दबाव मौजूद है।लेकिन इतिहास हमें सिखाता है कि कानूनी समानता संघर्ष की शुरुआत है – उसका अंत नहीं।


7. अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण

 अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर किया गया सैन्य आक्रमण—जिसे *“ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व”* कहा गया—को शासक वर्ग की सरकार ने “कानून-प्रवर्तन” की आड़ में वैध ठहराने का प्रयास किया। राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनके सहयोगियों पर *नार्को-टेररिज़्म* के आरोप लगाकर, उन्हें न्यूयॉर्क ले जाकर मुक़दमे के नाम पर प्रस्तुत करना, आधुनिक साम्राज्यवाद की उसी पुरानी पद्धति का उदाहरण है जिसमें दमन को न्याय और लूट को नैतिकता कहा जाता है।


यहाँ तथाकथित आरोप—कोकीन तस्करी, आतंकवादी समूहों से गठजोड़—वस्तुतः कारण नहीं, बल्कि बहाने हैं। वास्तविक कारण उत्पादन के साधनों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की वह अनिवार्यता है जो पूँजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों से जन्म लेती है। वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार, गैस, सोना और अन्य खनिज—ये ही वह भौतिक आधार हैं जिन पर अमरीकी पूँजी की भूख टिकी है। “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “क्षेत्रीय स्थिरता” की भाषा उसी वर्गीय स्वार्थ का वैचारिक आवरण है।


मदुरो की लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न उठाना भी उसी क्रम का हिस्सा है। इतिहास बताता है कि जब-जब किसी देश की राजनीतिक संरचना पूँजी के निर्बाध विस्तार में बाधा बनती है, तब-तब “लोकतंत्र” का तराजू उसी ओर झुका दिया जाता है जहाँ मुनाफ़ा अधिक हो। अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन यहाँ कोई अपवाद नहीं, बल्कि नियम है—क्योंकि क़ानून स्वयं वर्ग-शक्ति का संगठित रूप होता है।


तेल उद्योग में सक्रिय विदेशी कंपनियाँ—शेवरॉन, सीएनपीसी, साइनोपेक, रेप्सोल, एनी, रोसनेफ्ट, टोटलएनर्जीज़, बीपी, शेल—इस पूरे संघर्ष की आर्थिक नसें हैं। इनके निवेश, ऋण और संयुक्त उपक्रम वेनेजुएला को वैश्विक पूँजी के जाल में बाँधते हैं। प्रतिबंध, परिसंपत्ति ज़ब्ती और कूटनीतिक दबाव—ये सब उसी संघर्ष के औज़ार हैं जिसमें राज्य, पूँजी का कार्यकारी समिति बनकर काम करता है।


वैश्विक बाज़ार पर इसके प्रभाव—तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमरीकी ऊर्जा कंपनियों का लाभ, चीन के निवेशों का जोखिम, भारत जैसे देशों के लिए अवसर—यह सब पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की असमान और संकटग्रस्त प्रकृति को उजागर करता है। उत्पादन की अराजकता और मुनाफ़े की अंधी दौड़ देशों को युद्ध के कगार तक धकेलती है।


इसलिए वेनेजुएला की घटना को किसी एक व्यक्ति की गिरफ्तारी या किसी एक सरकार के पतन के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। यह उस ऐतिहासिक संघर्ष का एक अध्याय है जिसमें श्रम और पूँजी, संप्रभुता और साम्राज्यवाद, जनता और एकाधिकार आमने-सामने खड़े हैं। जब तक उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व और राज्य-शक्ति का वर्गीय चरित्र बना रहेगा, तब तक ऐसे “ऑपरेशन” पूँजी के तर्कसंगत परिणाम बने रहेंगे—और उनका प्रतिरोध भी, अनिवार्य रूप से, इतिहास की गति का हिस्सा होगा।

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6. तर्क बनाम अंधविश्वास”— या सामाजिक यथार्थ से पलायन?

 आजकल एक लोकप्रिय कथा गढ़ी जा रही है—कि भारत की समस्या “धर्म” है और समाधान “नास्तिकता”। कुछ लोग पाँच या दस नास्तिक विचारकों की सूची बनाकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि समाज जितना धार्मिक होगा, उतना ही पिछड़ा होगा; और जितना नास्तिक होगा, उतना ही प्रगतिशील और सुखी होगा।


मार्क्सवादी परंपरा ऐसी सरल व्याख्याओं को ऐतिहासिक रूप से सतही और दार्शनिक रूप से आदर्शवादी मानती है।


विचार नहीं, भौतिक जीवन स्थितियाँ इतिहास को चलाती हैं


 विचारधाराएँ आकाश से नहीं गिरतीं; वे समाज की भौतिक परिस्थितियों से पैदा होती हैं। इसलिए यह कहना कि “भारत में अंधविश्वास इसलिए है क्योंकि लोग तर्क नहीं करते” इतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि “गरीबी इसलिए है क्योंकि गरीब लोग मेहनत नहीं करते।”


यदि समाज में असुरक्षा, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट, शिक्षा की कमी और सामाजिक दमन मौजूद हैं, तो लोग सांत्वना और सुरक्षा के प्रतीक खोजेंगे—चाहे वह धर्म हो, जाति हो या राष्ट्रवाद। धर्म का प्रश्न पहले सामाजिक है, फिर दार्शनिक।


नास्तिकता अपने-आप में प्रगतिशील नहीं होती


इतिहास में कई नास्तिक शासक भी दमनकारी रहे हैं। और कई धार्मिक समाजों ने भी सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया है। मार्क्सवाद धर्म को केवल “गलत विचार” नहीं मानता; वह उसे सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी मानता है मार्क्स ने लिखा था— “धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है।” इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म आदर्श है—बल्कि यह कि धर्म को खत्म करने के लिए पहले उस पीड़ा की परिस्थिति को खत्म करना होगा जो उसे जन्म देती है।


स्कैंडिनेविया बनाम भारत — गलत तुलना


यह कहना कि “स्कैंडिनेवियाई देश नास्तिक हैं इसलिए खुश हैं” ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरुद्ध है। वास्तविक प्रश्न हैं: वहाँ मजबूत वेलफेयर स्टेट क्यों है? वहाँ शिक्षा सार्वभौमिक क्यों है? वहाँ स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक क्यों है? वहाँ श्रमिक अधिकार मजबूत क्यों हैं?


यदि कोई समाज आर्थिक सुरक्षा देता है, तो धार्मिक निर्भरता स्वाभाविक रूप से घटती है। तर्कवाद का विकास सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है— सिर्फ दार्शनिक प्रचार से नहीं।


भारत में तर्क और धर्म साथ-साथ क्यों बढ़ रहे हैं?


यह कोई विरोधाभास नहीं है, पूंजीवादी विकास असमान होता है। एक ही समाज में आप पाएँगे: 5G टेक्नोलॉजी और साथ में मध्यकालीन सामाजिक संबंध, क्योंकि आर्थिक विकास असमान है— शहर और गाँव, अमीर और गरीब, शिक्षित और वंचित — सब अलग गति से बदलते हैं।


“धर्म बनाम विज्ञान” — एक झूठा द्वंद्व है।


समस्या धर्म नहीं, समस्या है— जब धर्म सामाजिक शक्ति संरचनाओं का औज़ार बन जाता है। धर्म तब खतरनाक होता है जब: वह सामाजिक अन्याय को वैधता देता है, वह प्रश्न पूछने से रोकता है,  वह शोषण को पवित्र बना देता है। लेकिन केवल धर्म-विरोधी नारे लगाकर वैज्ञानिक समाज नहीं बनता।


भारतीय नास्तिक परंपरा 


अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन —इनका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि वे नास्तिक थे। उनका महत्व इसलिए था क्योंकि: उन्होंने सामाजिक शोषण को चुनौती दी, उन्होंने वर्ग और सत्ता संरचनाओं पर प्रश्न उठाए, उन्होंने मनुष्य की ऐतिहासिक भूमिका को समझा। यदि हम उन्हें केवल “नास्तिक आइकन” बना दें, तो हम उनके क्रांतिकारी सामाजिक संदर्भ को मिटा देते हैं, सावरकर से उनके फर्क को धूमिल कर देते है।


यदि किसी व्यक्ति को “तर्क का दर्पण” कहा जाता है, तो पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उसने क्या कहा, बल्कि यह होना चाहिए कि उसके विचारों ने किन सामाजिक शक्तियों को मजबूत किया और किन्हें कमजोर। सावरकर का तर्कवाद सार्वभौमिक मानवीय मुक्ति की ओर नही जाता है, वो केवल एक नए प्रभुत्वशाली राष्ट्रवादी ढाँचे को वैचारिक आधार देता है।

यदि कोई पशु पूजा का विरोध करता है तो यह यह अपने आप मे प्रगतिशील नही हो सकता। पर मार्क्सवादी दृष्टि यह पूछेगी: क्या यह आलोचना सामाजिक उत्पादन संबंधों की आलोचना तक जाती है? या केवल सांस्कृतिक सुधार तक सीमित रहती है?

यदि समाज में जाति, वर्ग, भूमि स्वामित्व और श्रम शोषण की संरचना जस की तस रहती है — तो केवल सांस्कृतिक सुधार समाज को मूल रूप से नहीं बदलते। सावरकर की ‘नास्तिकता’ की यही सीमा थी।

भाग्यवाद का विरोध ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील भूमिका निभाता रहा है। परंतु यदि भाग्यवाद की जगह आक्रामक राष्ट्रवाद या सैन्यवाद ले ले — तो समाज केवल एक नई प्रतिक्रियावादी वैचारिक संरचना में प्रवेश करता है। मार्क्सवादी दृष्टि में मानव मुक्ति केवल धार्मिक निष्क्रियता से बाहर निकलना नहीं है — बल्कि श्रम, उत्पादन और संसाधनों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण स्थापित करना है। अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन की तरह  सावरकर इस कसौटी पर खड़ा नही उतरते।

इतिहास में कई बार “तर्कवाद” का उपयोग राष्ट्रवादी लामबंदी के लिए किया गया है। यदि तर्कवाद वैज्ञानिक समाजवाद की दिशा में नहीं जाता, बल्कि सांस्कृतिक-राजनीतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करता है — तो वह ऐतिहासिक रूप से सीमित और अंतर्विरोधी भूमिका निभाता है। सावरकर इसके अपवाद नही थे।

अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और  सावरकर  की विरासत को समझने के लिए हमें यह देखना होगा:

क्या उनके विचार उत्पादन संबंधों को चुनौती देते हैं?



क्या वे श्रमिक वर्ग की ऐतिहासिक मुक्ति में योगदान करते हैं?



या वे केवल एक नए प्रभुत्वशाली सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को वैचारिक आधार देते हैं?



यदि तर्कवाद सामाजिक क्रांति से कट जाता है — तो वह केवल बुर्जुआ आधुनिकता का एक रूप बनकर रह जाता है। मार्क्सवादी परंपरा में सच्चा तर्कवाद वही है जो समाज को केवल सोच में नहीं, बल्कि भौतिक जीवन की संरचना में बदलव करे।

मार्क्सवादी परंपरा में तर्कवाद किताबों का शब्द नहीं, वह हथौड़ा है —जो उत्पादन संबंधों की जंजीरों पर पड़ता है। सच्चा तर्कवाद वह है जो केवल दिमाग़ नहीं बदलता, बल्कि रोटी, ज़मीन, श्रम और सत्ता के रिश्ते भी बदलता है।

और इतिहास को तोड़-मरोड़कर अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और सावरकर को सिर्फ “नास्तिकता” के धागे से बाँध देना — यह इतिहास नहीं, विचारधारा का धुंध फैलाना है।

क्रांतिकारी नास्तिकता सिर्फ भगवान से इंकार नहीं करती, वह शोषण से भी इंकार करती है। जो नास्तिकता वर्ग-सत्ता को चुनौती देती है — वह मुक्ति की राह बनाती है। और जो नास्तिकता सिर्फ सांस्कृतिक या राष्ट्रवादी ढाँचों की सेवा करे — वह जनता की चेतना को भटकाने का हथियार बन सकती है। क्रांतिकरी नास्तिकता का तर्क साफ है — धर्म से मुक्ति काफी नहीं, शोषण से मुक्ति ज़रूरी है। मिहनतकस जनता का इतिहास किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए माफ़ नहीं करता कि उसने मंदिर की जगह प्रयोगशाला की बात की हो। 

इसलिये, अजित केशकंबली, भगत सिंह, एम.एन. रॉय, राहुल सांकृत्यायन और  सावरकर को सिर्फ नास्तिकता के बहाने एक साथ दिखाना फासीवादी साजिस का ही हिस्सा है।


आधुनिक पूंजीवाद और धर्म का बाज़ारीकरण


आज धर्म क्यों बढ़ रहा है? क्योंकि आधुनिक पूंजीवाद असुरक्षा पैदा करता है: नौकरी अस्थिर, स्वास्थ्य महंगा, शिक्षा महंगी, भविष्य अनिश्चित। ऐसे समाज में धर्म “भावनात्मक बीमा” बन जाता है।

कॉरपोरेट पूंजी भी इसे समझती है— धर्म एक बाजार भी है, एक पहचान भी है, एक राजनीतिक उपकरण भी है।

शिक्षा व्यवस्था — असली सवाल

यदि शिक्षा आलोचनात्मक सोच नहीं सिखाती, तो समाज तर्कवादी नहीं बनेगा — चाहे वह धार्मिक हो या नास्तिक। सिर्फ STEM शिक्षा से तर्कवाद नहीं आता। सामाजिक विज्ञान, इतिहास, दर्शन — ये जरूरी हैं।


असली सवाल: तर्क या धर्म नहीं — शक्ति किसके पास है? मार्क्सवाद  का केंद्रीय तर्क यही होता: समाज को बदलने के लिए विचार बदलना जरूरी है, लेकिन उससे पहले भौतिक जीवन स्थितियाँ बदलनी होंगी।


यदि: आर्थिक असमानता घटे, सामाजिक सुरक्षा बढ़े, शिक्षा सार्वभौमिक हो, लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़े, तो तर्क स्वतः बढ़ेगा।


निष्कर्ष

भारत की समस्या “बहुत धर्म” नहीं है। भारत की समस्या है—असमान विकास,

सामाजिक दमन, और आर्थिक असुरक्षा। धर्म और अंधविश्वास लक्षण हैं, बीमारी नहीं। यदि समाज को तर्कवादी बनाना है,

तो केवल विचारधारा नहीं—सामाजिक ढांचा बदलना होगा।

अंततः मार्क्स शायद यही कहते: समाज को तर्क से नहीं, बल्कि उस समाज की परिस्थितियों को बदलकर तर्कवादी बनाया जाता है जिसमें लोग जीते हैं। और जब मनुष्य डर से नहीं, बल्कि गरिमा से जीने लगेगा—तब अंधविश्वास स्वतः कमजोर होता जाएगा।


5. सशस्त्र संघर्ष और क्रांतिकारी रणनीति का सवाल

 सशस्त्र संघर्ष न तो कोई नैतिक घोषणा है और न ही क्रांतिकारी साहस का प्रमाण पत्र। यह वर्ग संघर्ष के एक खास चरण का सवाल है - जो इच्छाशक्ति या नारों से नहीं, बल्कि ठोस ऐतिहासिक परिस्थितियों से पैदा होता है। लेनिन ने बार-बार चेतावनी दी थी कि हथियार उठाने का सवाल एक रणनीतिक सवाल है, और रणनीति हमेशा वर्ग शक्तियों के वास्तविक संतुलन से तय होती है, न कि अधीरता या रोमांस से।


तो, सशस्त्र संघर्ष मज़दूर वर्ग आंदोलन के एजेंडे में कब आता है?

यह तभी उभरता है जब:


1. शोषित वर्गों का भारी बहुमत राजनीतिक रूप से संगठित हो;

2. मज़दूर वर्ग के पास अपनी स्वतंत्र क्रांतिकारी पार्टी हो, जो एक स्पष्ट कार्यक्रम, संगठन और अनुशासन से लैस हो;

3. राज्य सत्ता का संकट परिपक्व हो गया हो, और शासक वर्ग अब पुराने तरीके से शासन नहीं कर सकता हो;

4. शांतिपूर्ण, सुधारवादी और कानूनी संघर्ष के सभी रास्ते ऐतिहासिक रूप से खत्म हो गए हों;

5. और सबसे निर्णायक रूप से - जब सशस्त्र संघर्ष एक जन आंदोलन का रूप ले लेता है, न कि छोटे समूहों के अलग-थलग "वीरता" का।


इन शर्तों के बिना, हथियार उठाना क्रांति नहीं बल्कि राजनीतिक रोमांच है - और रोमांच हमेशा प्रति-क्रांति की सेवा करता है।


यह हमें दूसरे सवाल पर लाता है:

आज, जब कोई क्रांतिकारी पार्टी मौजूद नहीं है, तो सशस्त्र संघर्ष का सवाल अर्थहीन क्यों हो जाता है?


यह अर्थहीन हो जाता है क्योंकि सशस्त्र संघर्ष पार्टी का विकल्प नहीं हो सकता। लेनिन ने स्पष्ट रूप से कहा था:


 "क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता।"


हमें यह जोड़ना होगा: एक क्रांतिकारी पार्टी के बिना, कोई भी सशस्त्र संघर्ष क्रांतिकारी नहीं हो सकता।


जब मज़दूर वर्ग राजनीतिक रूप से बंटा हुआ हो; जब ट्रेड यूनियन सुधारवाद में फंसी हों; जब किसान आंदोलन नेतृत्वहीन हों; जब बुद्धिजीवी वर्ग या तो सत्ता का नौकर हो या निराशा में डूबा हो - तब हथियार उठाने की अपील वर्ग संघर्ष को आगे नहीं बढ़ातीं। वे इसे छिटपुट सैन्य मुठभेड़ों में बांट देती हैं।


ऐसी परिस्थितियों में, सशस्त्र कार्रवाई:


* जनता को संगठित नहीं करती,

* राज्य सत्ता को गंभीरता से चुनौती नहीं देती,

* बल्कि इसके बजाय राज्य को दमन के लिए वैधता प्रदान करती है।


यही कारण है कि पार्टी की अनुपस्थिति में सशस्त्र संघर्ष पर बहस करना बिना नक्शे के युद्ध की योजना बनाने जैसा है। ऐसी बहसें क्रांति को आगे नहीं बढ़ातीं; वे ध्यान असली कामों से भटकाती हैं - और वे काम हैं:


मज़दूर वर्ग की राजनीतिक चेतना का निर्माण करना;  

एक आज़ाद, अनुशासित, वर्ग-चेतना वाली क्रांतिकारी पार्टी बनाना;

सुधारवाद, अराजकतावाद और सैन्य रोमांचवाद के खिलाफ बिना किसी समझौते के वैचारिक संघर्ष करना।


लेनिनवादी निष्कर्ष साफ़ है: आज सवाल यह नहीं है कि "हथियार कब उठाएँ," बल्कि यह है कि "किस वर्ग के नेतृत्व में, किस कार्यक्रम के साथ, और किस सत्ता के खिलाफ।" जो कोई भी इस क्रम को उलटता है - चाहे उसकी भाषा कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो - वह असल में क्रांति का एजेंट नहीं, बल्कि भ्रम फैलाने वाला बन जाता है।

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Friday, 13 February 2026

4. रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन

 रोसा लक्ज़मबर्ग और व्लादिमीर इलिच लेनिन को यदि केवल व्यक्तियों के रूप में देखा जाए, तो हम उनके मतभेदों में उलझकर रह जाते हैं। किंतु मार्क्सवाद की पद्धति हमें यह सिखाती है कि इतिहास को व्यक्तियों की मनोवृत्ति से नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से समझा जाए, जिनमें वे कार्य करते हैं। इस दृष्टि से देखें तो रोसा और लेनिन न तो प्रतिद्वंद्वी थे, न परस्पर विरोधी धाराओं के प्रतिनिधि—वे एक ही ऐतिहासिक कार्यभार के दो भिन्न रूप थे।

दोनों बीसवीं सदी की शुरुआत में उस दौर में खड़े थे, जब पूंजीवाद अपने साम्राज्यवादी चरण में प्रवेश कर चुका था, द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सड़ने लगा था, और सर्वहारा आंदोलन के सामने यह प्रश्न खड़ा था कि क्रांति को सुधार में घुलने दिया जाए या सत्ता तक पहुँचाया जाए। इस ऐतिहासिक दबाव की पृष्ठभूमि में लक्ज़मबर्ग और लेनिन को समझा जा सकता है।

एकता: ऐतिहासिक आवश्यकता की अभिव्यक्ति

मार्क्सवादी शब्दों में, “विचारधाराएँ आकस्मिक नहीं होतीं, वे सामाजिक संबंधों की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति होती हैं।” इस अर्थ में रोसा और लेनिन दोनों ही क्रांतिकारी मार्क्सवाद की अनिवार्य उपज थे।

सुधारवाद और अवसरवाद के विरुद्ध उनका संघर्ष कोई व्यक्तिगत जिद नहीं था, बल्कि उस समय के समाज-जनवादी आंदोलन की वर्गीय सड़ांध के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। बर्नस्टीन का संशोधनवाद वस्तुतः जर्मन पूंजीवाद की सापेक्ष स्थिरता और श्रमिक अभिजात वर्ग के उभार का वैचारिक प्रतिबिंब था। रोसा की Reform or Revolution? और लेनिन की What Is to Be Done? इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति के विरुद्ध दो मोर्चे थे—एक पश्चिमी यूरोप की परिस्थितियों से बोलता हुआ, दूसरा ज़ारवादी रूस की दमनकारी संरचना से।

प्रथम विश्व युद्ध के समय उनकी अंतरराष्ट्रीयता कोई नैतिक ऊँचाई नहीं, बल्कि वर्गीय स्थिति की तार्किक परिणति थी। जब अधिकांश समाजवादी नेता अपनी-अपनी बुर्जुआ सरकारों के पीछे खड़े हो गए, तब रोसा और लेनिन ने युद्ध को वही कहा जो वह था—साम्राज्यवादी लूट का हिंसक रूप। यहाँ उनका मिलन सिद्धांत का नहीं, बल्कि इतिहास का था।

अक्टूबर क्रांति के प्रति रोसा का समर्थन भी इसी ऐतिहासिक समझ से उपजा था। उन्होंने इसे “साहसिक छलांग” कहा—क्योंकि पिछड़े रूस में सर्वहारा सत्ता कोई आदर्श परिस्थिति नहीं, बल्कि मजबूरी थी। फिर भी उन्होंने समझा कि इतिहास हमेशा आदर्श परिस्थितियों में नहीं चलता, बल्कि संकटों के बीच रास्ता बनाता है।

मतभेद: भिन्न परिस्थितियों की उपज

मार्क्सवादी पद्धति हमें यह भी सिखाती है कि मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धांत नहीं, बल्कि परिस्थितियों के साथ विकसित होने वाली पद्धति है। इसलिए रोसा और लेनिन के मतभेदों को “सही–गलत” के नैतिक तराज़ू पर तौलना ऐतिहासिक भूल होगी।

पार्टी संगठन पर उनका विवाद मूलतः रूस और पश्चिमी यूरोप के भिन्न सामाजिक ढाँचों से निकला। ज़ारवादी दमन, अवैधता और पुलिस-राज्य की स्थितियों में लेनिन का केंद्रीकरण एक ऐतिहासिक आवश्यकता था। वहीं जर्मनी जैसे अपेक्षाकृत विकसित पूंजीवादी समाज में रोसा को यह केंद्रीकरण नौकरशाही खतरे की तरह दिखा। दोनों की दलीलें अपने-अपने संदर्भों में तर्कसंगत थीं।

राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का प्रश्न भी इसी तरह समझा जाना चाहिए। रोसा का राष्ट्रवाद-विरोध उस समय के पोलिश और जर्मन बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अनुभव से निकला था। लेनिन का समर्थन रूस जैसे बहुराष्ट्रीय साम्राज्य में उत्पीड़ित राष्ट्रों की वास्तविक स्थिति से। यहाँ कोई शाश्वत सत्य नहीं, बल्कि भिन्न ऐतिहासिक भूमियों पर खड़े मार्क्सवाद दिखाई देते हैं।

साम्राज्यवाद और पूंजी संचय पर विवाद भी इसी क्रम का हिस्सा है। रोसा ने पूंजीवाद के विस्तार की बाधाओं को उजागर किया, लेनिन ने उसके संगठनात्मक रूप—वित्त पूंजी, एकाधिकार और असमान विकास—को। लेनिन की तीखी आलोचनाएँ दरअसल इस बात का प्रमाण हैं कि वह रोसा को गंभीर सैद्धांतिक प्रतिद्वंद्वी मानते थे, न कि किसी भटकी हुई आत्मा को।

लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्तता पर मतभेद भी किसी नैतिक असहमति का नहीं, बल्कि क्रांति की गति और रूप को लेकर थे। रोसा जनता की सृजनात्मक शक्ति को उभारती थीं, लेनिन उसे दिशा देने वाली संगठनात्मक शक्ति पर जोर देते थे। इतिहास ने दिखाया कि दोनों के बिना क्रांति अपूर्ण रहती है।

लेनिन की श्रद्धांजलि: ऐतिहासिक न्याय

रोसा लक्ज़मबर्ग की मृत्यु के बाद लेनिन की प्रसिद्ध श्रद्धांजलि को यदि मार्क्सवादी की शैली में पढ़ें, तो वह व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक मूल्यांकन है। “ईगल और मुर्गियों” का रूपक इस बात को स्वीकार करता है कि रोसा की गलतियाँ भी एक ऊँचे स्तर की थीं—वे क्रांतिकारी प्रयास की गलतियाँ थीं, न कि सुधारवादी आत्मसमर्पण की।

यही ऐतिहासिक भौतिकवाद का निष्कर्ष है: रोसा लक्ज़मबर्ग और लेनिन के बीच मतभेद मार्क्सवाद की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। वे दोनों उस युग की संतान थे, जब इतिहास ने पूंजीवाद को चुनौती देने के लिए एक से अधिक रास्ते खोले थे।

और इसलिए, उन्हें अलग-अलग खाँचों में बाँटना नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक संघर्ष के दो रूपों के रूप में समझना—यही मार्क्सवाद की सच्ची विरासत है।

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3. किलिंग फ़ील्ड्स

 किलिंग फ़ील्ड्स के सामने खड़े होकर मनुष्य का सन्न रह जाना स्वाभाविक है। खोपड़ियों की मीनारें, सामूहिक कब्रें, बच्चों की टूटी हड्डियाँ—यह सब इतिहास नहीं, बल्कि मानवता का अभियोग-पत्र हैं।

लेकिन यहीं से पहली वैचारिक भूल शुरू होती है।

इतिहास को यदि हम नैतिक झटके से पढ़ते हैं, तो हम शैतानों की सूची बना सकते हैं, पर शैतान पैदा करने वाली व्यवस्था को नहीं समझ पाते।

पोल पॉट कोई पागल अपवाद नहीं था—

वह एक ऐतिहासिक परिस्थिति का उत्पाद था। कंबोडिया कोई शून्य में पड़ा देश नहीं था, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की बमबारी, वियतनाम युद्ध की तबाही, और औपनिवेशिक लूट से तबाह सामाजिक संरचना का परिणाम था।

मार्क्सवाद कहता है—“व्यक्ति इतिहास नहीं बनाता, इतिहास व्यक्ति के माध्यम से अपनी आवश्यकता प्रकट करता है।”

पोल पॉट की बर्बरता समाजवादी विचारधारा का निष्कर्ष नहीं, बल्कि विचारधारा से कटा हुआ सत्ता का उन्माद थी। वर्ग-संघर्ष को समझे बिना, उत्पादन संबंधों को बदले बिना, केवल “कृषि-यूटोपिया” थोप देना क्रांति नहीं—प्रतिक्रांति होती है।

अब आइए उस तुलना पर, जिसे बड़ी चालाकी से हथियार बनाया गया है।

“अकबर ने 55,000 सिर कटवाए, फिर भी भारत में उसे महान कहा जाता है।” यह तर्क भी इतिहास को नैतिक उपदेश में बदल देने की बीमारी से ग्रस्त है। अकबर को “महान” कहने वाली वह कौन-सी वर्गीय शक्ति थी? दरबारी इतिहासकार, ज़मींदार वर्ग, औपनिवेशिक इतिहासलेखन—इन सबने राज्य हिंसा को “सभ्यता” का नाम दिया।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि “किसने ज़्यादा सिर काटे?” प्रश्न यह है कि किस वर्ग के हित में हिंसा को वैध ठहराया गया।

जब आप कहते हैं— “हमने सड़कों, शहरों, यूनिवर्सिटीज़ के नाम लुटेरों पर रख दिए” तो आप सही गुस्से में हैं, लेकिन अधूरे विश्लेषण में फँस जाते हैं।

क्यों रखे गए ये नाम? इसलिए नहीं कि “हमारे पुरखे मूर्ख थे”, बल्कि इसलिए कि

हर शासक वर्ग अपने पूर्वजों को भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।

इतिहास की किताबें “हमारे मुँह पर थप्पड़” नहीं हैं— वे शासक वर्ग के मुक्के हैं, जो शिक्षा के माध्यम से मारे जाते हैं।

सबसे खतरनाक बात तब होती है जब पोल पॉट की बर्बरता को पूरे कम्युनिज़्म का पर्याय बना दिया जाता है, लेकिन औपनिवेशिक नरसंहार, दास व्यापार, हिरोशिमा–नागासाकी, इराक, वियतनाम, फिलिस्तीन—इन सबको “इतिहास की भूल” कहकर छोड़ दिया जाता है। यह चयनात्मक नैतिकता दरअसल साम्राज्यवादी नैरेटिव है।

मार्क्सवाद की दृष्टि हमें सिखाती है— इतिहास को रोष से नहीं, संरचना से पढ़ो। हिंसा को व्यक्ति की दुष्टता से नहीं, वर्गीय हित से जोड़ो। और सबसे ज़रूरी—यदि शैतान बार-बार पैदा होते हैं, तो समस्या शैतान नहीं, वह समाज है जो उन्हें जन्म देता है, पालता है और फिर उनकी मूर्तियाँ बनाता है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि— “कब शैतान बादशाह हो गए?” असल सवाल यह है— किस वर्ग ने उन्हें बादशाह बनाया, और आज भी क्यों बनाए जा रहे हैं?

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2. इतिहास, वर्ग और सत्ता की भौतिकता- औरंगजेब के संदर्भ में

 इतिहास को जब नैतिक कथाओं, धार्मिक सद्गुणों या “महान शासकों” की निजी तपस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब वह इतिहास नहीं रहता—वह विचारधारात्मक धुंध बन जाता है। मार्क्सवाद हमें चेतावनी देता है कि किसी भी युग, किसी भी शासक का मूल्यांकन उसकी निजी जीवन-शैली से नहीं, बल्कि उसके शासन की भौतिक संरचना, वर्ग-संबंधों और उत्पादन-संबंधों से किया जाना चाहिए।

औरंगज़ेब के टोपी सिलने या साधारण मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की कथा—यदि सत्य भी मान ली जाए—तो वह राज्य की वर्ग-प्रकृति को नहीं बदल देती। दासता, बेगार, लगान, जज़िया, ज़कात—ये सब राज्य द्वारा अधिशेष के अपहरण के रूप हैं। प्रश्न यह नहीं कि कर किससे कितना लिया गया, बल्कि यह है कि किस वर्ग के हित में लिया गया और किस वर्ग के श्रम से लिया गया।

साम्राज्य की भौगोलिक विशालता—चीन से बड़ा या छोटा—जनता की मुक्ति का प्रमाण नहीं होती। साम्राज्य का फैलाव अक्सर किसानों पर बढ़े लगान, सैनिक भर्ती और युद्ध-खर्च का पर्याय होता है। मुग़ल भारत की “25% वैश्विक GDP” जैसी संख्याएँ, यदि किसी हद तक सही भी हों, तो वे अधिशेष के केंद्रीकरण को दिखाती हैं—न कि श्रमिक-किसान की खुशहाली को। उत्पादन समाज करता है; अधिशेष सत्ता हथियाती है।


जज़िया और ज़कात की तुलना को नैतिक तराज़ू पर तौलना भटकाव है। कर का धार्मिक लेबल उसकी वर्गीय हिंसा को नहीं मिटाता। किसान—हिंदू हो या मुसलमान—लगान और बेगार की चक्की में पिसता रहा। राज्य का धर्म चाहे जो हो, राज्य की वर्ग-प्रकृति निर्णायक रहती है।


दरबार में हिंदू राजाओं का प्रतिशत बढ़ना—यह सत्ता की साझेदारी का संकेत हो सकता है, सत्ता की लोकतांत्रिकता का नहीं। सामंती व्यवस्था में विविध कुलीन समूहों की भागीदारी जनता की मुक्ति नहीं लाती; वह केवल शोषण के प्रबंधन को स्थिर करती है।


किसी एक मंदिर या मस्जिद को तोड़ने-बचाने की कथाएँ इतिहास का केंद्र नहीं होनी चाहिए। शासक अक्सर धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता को सत्ता-संतुलन के औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं। मार्क्सवाद के लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि इन निर्णयों ने किस वर्ग को लाभ पहुँचाया और किस वर्ग को नियंत्रित किया।


औपनिवेशिक लूट निर्विवाद है। पर यह कहना कि उससे पहले सब न्यायपूर्ण था—इतिहास का सरलीकरण है। ब्रिटिश पूँजीवाद ने पूर्व-पूँजीवादी शोषण को तोड़ा नहीं; उसने उसे वैश्विक बाज़ार से जोड़कर और तीखा किया।

1947 के बाद “भूरे अंग्रेज़ों” द्वारा टैक्स-हेवनों में पूँजी का पलायन—यह उसी पूँजीवादी निरंतरता का प्रमाण है, जहाँ राज्य जनता का नहीं, पूँजी का सेवक बना रहता है।


बहादूर शाह ज़फ़र की त्रासदी औपनिवेशिक दमन की गवाही है; 1857 का संघर्ष बहुवर्गीय विद्रोह था। पर उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सामंती राज्य जनता का राज्य था। शहादत व्यक्तिगत हो सकती है; राज्य-चरित्र संरचनात्मक होता है।


निष्कर्ष: इतिहास को वर्ग-दृष्टि से पढ़ें


औरंगज़ेब को न दानव बनाइए, न संत। मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि इतिहास नायकों की नैतिकता से नहीं, उत्पादन-संबंधों से चलता है। साम्राज्य—चाहे मुग़ल हों या ब्रिटिश—जब तक जनता के हाथ में सत्ता नहीं, तब तक वे अलग-अलग रूपों में एक ही शोषण-तंत्र हैं।

आज का काम यह नहीं कि पुराने शासकों की धार्मिक छवियाँ गढ़ी जाएँ, बल्कि यह कि पूँजीवादी राज्य की मौजूदा लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और वर्ग-विस्मृति को उजागर किया जाए। इतिहास का सही उपयोग वर्तमान संघर्ष के लिए होता है—न कि अतीत के शासकों की प्रशस्ति के लिए।


मार्क्सवादी दृष्टि हमें यही सिखाती है कि इतिहास न तो महान व्यक्तियों की नैतिक कथाएँ हैं, न ही धार्मिक प्रतीकों का युद्ध। इतिहास वर्गों के संघर्ष, उत्पादन के नियंत्रण और अधिशेष के वितरण की कहानी है। और जब तक इस बुनियादी सच को नहीं समझा जाएगा, तब तक औरंगज़ेब भी एक मिथक बने रहेंगे—और आज का शासक वर्ग भी अपने अपराधों को इतिहास की धूल में छिपाता रहेगा।


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Saturday, 28 June 2025

आलोकधन्वा

হিন্দি কবিতার এক বিরল প্রতিভা - আলোকধনবা

হিন্দি কবিতার এক বিরল প্রতিভার নাম আলোকধনবা। বিংশ শতাব্দীর সত্তর দশক ছিল এক আন্দোলিত ও উত্তাল দশক। সেই উত্তাল সত্তর দশকেরই সন্তান আলোকধনবা। সত্তর দশকে নকশাল আন্দোলনের জোয়ারে যখন পশ্চিমবঙ্গের প্রেসিডেন্সি এবং বিভিন্ন কলেজ থেকে সবথেকে উজ্জ্বল মেধাবি ছেলে-মেয়েরা বেরিয়ে এসে দলে দলে যোগ দিচ্ছেন আন্দোলনে – তার তাপ-উত্তাপ, তার নির্ঘোষ ছড়িয়ে পড়ে গোটা ভারতবর্ষ জুড়ে। বিহারেও তার যথেষ্ট প্রভাব পড়ে। এই আন্দোলনের দ্বারাই প্রভাবিত হয়ে উচ্চারিত হয় তাঁর প্রথম কবিতা "জনতা কা আদমি" (জনগণের মানুষ)  – এবং তা হিন্দি বলয়ে – পাটনা থেকে দিল্লি পর্যন্ত পাঠকদের মধ্যে ছড়িয়ে পড়ে। দিল্লি বিশ্ববিদ্যালয়ের দেয়ালে ছেলেরা সেই কবিতার থেকে উদ্ধৃতি তুলে দিতেন। জায়গায় জায়গায় তার কবিতা পাঠ করা হতো। রুশ দেশের বিখ্যাত কবি "মায়াকভস্কির মতোই আমাদের এই কবি বড় রাস্তার মোড়ে যখন নিজের কবিতা পাঠ করতেন হাজার হাজার পথচারী দাঁড়িয়ে মন্ত্রমুগ্ধের মতো শুনতেন। রীতিমতো দীর্ঘ কবিতা "জনতা কা আদমি" শুরু হয় এইভাবেঃ

"বরফ কাটার যন্ত্র থেকে মানুষ কাটার যন্ত্র পর্যন্ত 
কম্পমান জ্বলে ওঠা এক অমানবিক আলোর ঝলকের বিরুদ্ধে
আমার কবিতা জ্বলন্ত গ্রামগুলির মাঝখান দিয়ে যায়;
তীব্র আগুন আর তীক্ষ্ণ চিৎকারের সঙ্গে
যে নারীটি পুড়ছে
তার কাছে সর্বাগ্রে পৌঁছায় আমার কবিতা"

দীর্ঘ এই কবিতাটি বহুমাত্রিক – কোথাও বিদ্রোহের ডাক, কোথাও নিদারুণ ক্ষোভ, কোথাও ফ্যানটাসি, কোথাও ধ্রুপদীর স্থৈর্য - অসাধারণ সমস্ত চিত্রকল্প এবং কল্পনার বিবরণের বৈচিত্র্য পাঠককে চমৎকৃত করে।

আলোকধনবার কবিতা নিয়ে আমরা বিস্তৃত আলোচনায় পরে যাব, কিন্তু শুরুতেই জানাই যে, যে কবিতাগুলি তাঁর প্রাথমিক উত্থানের ও জনপ্রিয়তার কারণ, সেই দুটি কবিতার নাম "জনতা কা আদমি" এবং "গোলি দাগো পোস্টার"। সেই কবিতা দুটির বৈশিষ্ট্য ছিল তাদের সম্বোধনমূলক সোজাসুজি, সহজবোধ্য প্রখর জীবন্ত ভাষা যা শক্তিশালী চিত্রকল্পের জাদুতে ভরা। "জনতা কা আদমি" লেখা হয় ১৯৬৯ সালে এবং ১৯৭২ সালে শ্রী চন্দ্রভূষণ তিওয়ারি সম্পাদিত "বাম" নামক একটি পত্রিকায় প্রকাশিত হওয়ার পূর্বেই তা কিন্তু ছাত্র ও যুবদের মুখে মুখে ছড়িয়ে পড়ে পাটনা, লক্ষ্ণৌ থেকে দিল্লি পর্যন্তঃ

"আমি গভীর জলের শব্দের মতো নেমে এলাম
বাতাসে, রাস্তায়
হঠাৎ দমকল চালকরা আমাকে ঘিরে ধরে জিজ্ঞাসা করে—
এভাবে কী হবে তবে অক্ষরসমূহের ভবিষ্যৎ?
এভাবে কতদিন আমাদের ছুটন্ত দমকলের নামে মনে রাখা হবে?
অন্যদিকে, তরুণ ডোমরা এই দাবিতে ধর্মঘট শুরু করেছে যে
এখন থেকে আমরা শ্মশানে শুধু অকালমৃতদের দেহ পোড়াবো না
অকালমৃতদের বাড়িতেও যাব।

"কবিতা লিখতে বসে প্রায়শই আমার হাঁটু
কোন অজানা সমুদ্র-যাত্রীর নৌকার সাথে ধাক্কা খায়
আর তারপরেই শুরু হয় একটি নতুন দেশের সন্ধান 
সেই দেশের নাম ভিয়েতনাম হওয়া জরুরি নয়
সেই দেশের নাম বন্যায় ভেসে যাওয়া আমার পিতার নামও হতে পারে,
আমার গ্রামের নামও হতে পারে............." (-জনতা কা আদমি)

১৯৭২ সালেই "ফিলহাল" পত্রিকায় তাঁর দ্বিতীয় কবিতা "গোলি দাগো পোস্টার" প্রকাশিত হয় এবং একই ভাবে সাড়া ফেলে দেয় তরুণদের মধ্যে। দেখা যাক এই কবিতার থেকে কয়েকটি পংক্তি নিয়েই

এই জায়গাটা অনেক পুরনো
এখানে আজও শব্দের চেয়ে বেশি তামাক
ব্যবহার করা হয়
আকাশ এখানে নেহাত একটা শুয়োরের মতো উঁচু

এখানে জিভের ব্যবহার সব থেকে কম
এখানে চোখের ব্যবহার সব থেকে কম
এখানে কানের ব্যবহার সব থেকে কম 
এখানে নাকের ব্যবহার সব থেকে কম 

এখানে আছে শুধুই দাঁত আর পেট
আছে মাটিতে ধ্বসে থাকা হাত
মানুষ কোথাও নেই
আছে শুধু এক নীল খোল

যা শুধুই শস্য চায়
এক মুষলধারা বৃষটি থেকে
আরেক মুষলধারা বৃষ্টি পর্যন্ত

এখন আমার কাছে আমার কন্যা আর আমার ধর্মঘটের মধ্যে
এক চুলও পার্থক্য নেই................

তারা আমাকে কখনও রাজধানী পর্যন্ত পৌঁছতে দেয় না
জেলা শহরে আসতে না আসতে ওরা আমাকে ধরে নেয় 
সরকার নয়, এই দেশের সবথেকে
সস্তা সিগারেট আমাকে সঙ্গ দিয়েছে
 
বোনেদের পায়ের আশে পাশে
হলুদ রেড়ির শিশু তরুটির মতো
জেগেছিল আমার যে শৈশব
দারোগার মোষ এসে তাকে মাড়িয়ে 
ছিন্নভিন্ন করে দিয়েছে

মনুষত্বকে বাঁচিয়ে রাখার জন্য
এক দারোগার যদি গুলি ছোড়ার অধিকার থাকে
তাহলে আমার কেন থাকবে না?
যে মাটির ওপর বসে
আমি এখন কবিতা লিখছি

যে মাটির ওপর আমি হাঁটি
যে মাটিতে আমি লাঙল চালাই
যে মাটিতে আমি বীজ রোপণ করি
যে মাটি থেকে অন্ন বের করে আমি
গোদাম পর্যন্ত বয়ে নিয়ে যাই –

সেই মাটির জন্য গুলি দাগার অধিকার আমার
নাকি ওই জারজ জমিদারের
যে গোটা দেশটাকে সুদখোরের কুকুর
বানিয়ে ফেলতে চায়?

আলোকধনবা'র কবিতার এই প্রারম্ভিক পর্ব ছিল সামাজিক শোষণ ও নিপীড়নের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ ঘোষণা করা। যদিও প্রাথমিক পর্বের অনতিবিলম্বেই নকশাল আন্দোলনের কর্মকাণ্ডের প্রতি তিনি বিমুখ হন তবে সারা জীবন তিনি শ্রমিকশ্রেণির আন্দোলনের প্রতি এবং মার্ক্সবাদী দর্শনের প্রতি দৃঢ় অবস্থান রেখেছেন।   তিনি অত্যন্ত সুস্পষ্ট ভাবে সমাজের অবহেলিত, অপমানিত মানবিকতার পক্ষ অবলম্বন করেন। বিহারের সমাজ-জীবনে ও সামাজিক সংস্কৃতিতে সেই সময় সামন্ততন্ত্র বেশ ভালো ভাবেই উপস্থিত ছিল। অর্থনৈতিকভাবে যদিও উৎপাদন ব্যবস্থা ও উৎপাদন সম্পর্ক পুজিবাদের দিকে ঘুরছিল, কিন্তু শ্রেণিদ্বন্দ্বেরই এক সমান্তরাল বর্ণব্যবস্থা শ্রমজীবী মানুষের জীবনকে নিদারুণভাবে রক্তাক্ত করে তুলেছিল। আলোকধনবা নির্দ্বিধায় বঞ্চিত, রক্তাক্ত সেই শ্রমজীবী মানুষের পাশে দাঁড়িয়ে শাসকদের বিরুদ্ধে কলম দাগেন। তাঁর কবিতার জনপ্রিয়তা অবশ্যই লাঞ্ছিত, অপমানিত মানবিকতাকে শক্তি যোগাতে সক্ষম হয়।

হিন্দি সাহিত্য ও কবিতার জগতে আলোকধানবা আজ এক উজ্জ্বল নক্ষত্রের মতো বিরাজ করছেন। তাঁর জন্ম মুঙ্গের শহর থেকে কিছু দূরে অবস্থিত "বেলবিহমা"নামক গ্রামে ১৯৪৮ সালের ২রা জুলাই হয়। শৈশব থেকে তাঁর পড়াশুনার প্রতি ঘোর অনীহা ছিল। ফলে তিনি স্কুল ছেড়ে বাড়িতেই শিক্ষাগ্রহণ করেন। খুব অল্প বয়স থেকেই তাঁর সাহিত্য সংস্কৃতির প্রতি টান লক্ষ্য করা যায়।

সাহিত্য ও শিক্ষাক্ষেত্রে তাঁর বিশেষ অবদানের জন্য তিনি বিহার রাষ্ট্রভাষা পরিষদের 'সাহিত্য সম্মান', 'বনরসী প্রসাদ ভোজপুরী সম্মান' এবং 'পহল সম্মান' ছাড়াও আরও বহু সম্মান ও পুরস্কারে ভূষিত হয়েছেন। অলোকধানওয়ার নানান কবিতা বিভিন্ন বিশ্ববিদ্যালয়ে স্কুলের পাশাপাশি বিএ এবং এমএ-এর পাঠ্যক্রমেও পড়ানো হয়। অনেক গবেষক তাঁর সাহিত্যের উপর পিএইচডি ডিগ্রি অর্জন করেছেন। এর পাশাপাশি, হিন্দি বিষয়ের ইউজিসি/নেট পরীক্ষায় অংশগ্রহণকারী শিক্ষার্থীদের জন্য অলোক ধানওয়ার জীবনী এবং তাঁর রচনা অধ্যয়ন করা অনিবার্য।

ওনার কবিতা দেশ বিদেশ থেকে প্রকাশিত আন্তর্জাতিক জার্নালে আলোচিত হয়েছে। যেমন আমেথি বিশ্ববিদ্যালয় থেকে প্রকাশিত A SPL Journal of Literary Hermenutics পত্রিকায়  অধ্যাপক সার্থক যাদব তাঁর কবিতা নিয়ে লিখেছেনঃ A Study of Voices of the Voiceless in the Poetry of Alok Dhanwa। বিদেশি জার্নাল RUDN Journal of Studies in Literature and Journalism প্রকাশ করেছে রুশি ভাষায় Strelkova G.V. এবং Lesik K.A. কর্তৃক লিখিত প্রবন্ধ Socially-engaged narrative in contemporary Hindi poetry।   University of Chicago Press সম্প্রতি প্রকাশ করছেন তাঁর প্রথম কাব্যগ্রন্থ "দুনিয়া রোজ বনতি হয়"-এর ইংরেজি সংস্করণ "The World Is Made Up Every Day"।

১৯৭৪ সালে আলোকধনবা পাঞ্জাবে আমন্ত্রিত হয়ে কবিতা পাঠ করতে যান। পাঞ্জাবে তাঁকে গ্রেপ্তার করা হয়। আমন্ত্রণ জানিয়েছিলেন পাঞ্জাবের বিপ্লবী কবি অবতার সিং পাশ, কবি চন্দন এবং অন্যান্য কবিরা। তাঁর গ্রেপ্তারির বিরুদ্ধে সেখানকার কবি/বুদ্ধিজীবীরা তীব্র প্রতিবাদ জানান। পুলিশ তাঁকে ছেড়ে দিতে বাধ্য হয়।
২।। কবিতায় নতুন বাঁক
১৯৭৫ সালে আগস্ট মাসে পাটনায় ভয়াবহ বন্যা হয়। সারা শহর জলে ভাসমান। তাঁর অভিন্নহৃদয় বন্ধু কবি বিদ্যুৎ পাল সেই বন্যায় দুই বোন ও মা-বাবাকে নিয়ে একতলা বাড়ির ছাদের ওপর ১৫ দিন কাটান। বন্যার জল নামলে পরিবারের সকলকে তার পিতার কর্মস্থল জামসেদপুরে পাঠিয়ে বিদ্যুৎ পাল জ্বরসহ ভেজা দেওয়াল, জোঁক, পোকামাকড়ে ভর্তি বাড়িতে একা একা কাটাচ্ছিলেন। আলোকধনবা সেই জলের মধ্যেই বিদ্যুৎ পালের বাড়ি পৌছান এবং তাঁকে নিজের ফ্ল্যাটে থাকার আমন্ত্রণ জানান। তাঁর কাছেই শুনেছি পরবর্তী এক দশক, যখন তিনি রাতে আলোকধনবা'র ফ্ল্যাটেই থাকতেন সেই সময়কালে কবি ধনবা তাঁর তিনটি জনপ্রিয় কবিতা যথাক্রমে "পতঙ" (ঘুড়ি), "ভাগি হুই লড়কিঁয়া"(পালিয়ে যাওয়া মেয়েরা) এবং "কপড়ে কে জুতেঁ" (কাপড়ের জুতো) লেখেন। কবি ধনবার প্রতিটি কবিতাই দীর্ঘ এবং সেগুলি উনি লিখতেন দীর্ঘকাল ধরে, কখনও কখনও দু-তিন বছর ধরে। আমরা যারা মনে করি কবিতা এক ঘোরের মধ্যে একটানা লেখা হয়, তাঁদের কাছে কবি ধনবার এই দীর্ঘকালীন লিখন পদ্ধতি একটু বিস্ময় সৃষ্টি করবে। কবি শক্তি চট্টোপাধ্যায় শুনেছি একটানা লিখতেন। তবে জীবনানন্দ দাশ নিজে সেভাবে এ বিষয়ে কিছু না জানালেও তাঁর পাণ্ডুলিপিতে অসংখ্য খসড়া ও অসম্পূর্ণ রচনা পাওয়া গেছে, যা ইঙ্গিত দেয় যে তিনি দীর্ঘ সময় ধরে তাঁর কাজ পরিমার্জন করতেন। যদিও "রূপসী বাংলা"র কবিতাগুলি খুব অল্প সময়ের ব্যবধানেই লেখা হয়েছিল বলে বিশেষজ্ঞরা জানান। বিদেশি কবি রাইনে মারিয়া রিলকে তাঁর বিখ্যাত "ডুয়িনো এলিজি"র কবিতাগুলি দীর্ঘ দশ বছর ধরে লেখেন। 

"জনতা কা আদমি" এবং "গোলি দাগো পোস্টার" – এই দুটি কবিতায় আমরা বিহারের আধা-সামন্ততান্ত্রিক ব্যবস্থা, বৃহৎ ভূস্বামীদের বিরুদ্ধে কবিকে বিদ্রোহ ঘোষণা করতে দেখি। বিহারের আর্থ-সামাজিক ব্যবস্থায় পুরোপুরি না হলেও সামন্ততান্ত্রিক ব্যবস্থা বেশ জোরালো ভাবেই উপস্থিত ছিল। বিশেষ করে সাংস্কৃতিক ক্ষেত্রে সামন্ততান্ত্রিক মেজাজ ও মানসিকতা এখনও পুরোপুরি যায়নি। বাঙালিদের পক্ষে এটা উপলব্ধি করা কঠিন কেননা বাঙালি সমাজের একটা বড় অংশ পুরোপুরিই শহুরে – তাই তাঁদের মধ্যে প্রধানত বুর্জোয়া সংস্কৃতির প্রভাব ও মনোভাব থাকাটাই স্বাভাবিক। 

১৯৭০ এবং ১৯৯০ এর দশকের মধ্যে বিহার সামন্ততান্ত্রিক উৎপাদন সম্পর্কের থেকে পুঁজিবাদী উৎপাদন সম্পর্কের দিকে আংশিকভাবে পরিবর্তিত হয়। মূল পরিবর্তনগুলির মধ্যে ছিল ভূমি সংস্কারের আংশিক সাফল্য, অনগ্রসর বর্ণের মানুষদের মধ্যে থেকে ধনী কৃষকদের উত্থান, সবুজ বিপ্লবের প্রভাব এবং ক্ষেত মজুরদের বহির্গমন, যার ফলে মজুরি শ্রম এবং বাজার-ভিত্তিক কৃষিকাজ শুরু হয়। ভূমি কেন্দ্রীকরণ, বর্ণ-ভিত্তিক ক্ষমতা এবং বন্ধকী শ্রম (বন্ডেড লেবর) গ্রামীণ এলাকায় সামন্ততান্ত্রিক কাঠামোটাকে ধরে রাখে। এই সময়কালে বিহার আধা-সামন্ততান্ত্রিক এবং প্রাথমিক পুঁজিবাদী গতিশীলতার এক মিশ্র ব্যবস্থার অন্তর্গত ছিল। এই যে আধা-সামন্ততান্ত্রিক সংস্কৃতি থেকে পুজিবাদী আর্থ-সামাজিক ব্যবস্থার দিকে অগ্রগতি ও একই সঙ্গে সংস্কৃতির ক্ষেত্রেও সামন্ততান্ত্রিক ভাবনা-চিন্তা থেকে বূর্জোয়া ভাবনা-চিন্তা, বিশেষ করে বূর্জোয়া ও প্রলেতারিয় সংস্কৃতির দিকে উত্থানের যে পরিবর্তন, তা কিন্তু কবি আলোকধনবার কবিতায় আমরা প্রতিফলিত হতে দেখি। যেহেতু কবিরা অত্যন্ত সংবেদনশীলতার পরিচয় দিয়ে থাকেন তাই বিহারের সমাজে যে ধীর ও অদৃশ্যপ্রায় আর্থ-সামাজিক পরিবর্তন ঘটছিল তা অন্য কারও দৃষ্টি যতটা আকৃষ্ট করতে পেরেছিল তার থেকে অনেক বেশি কবি শিল্পীদের প্রভাবিত করেছিল। আলোকধনবার কবিতায় যে বাঁক আমরা এর পর দেখব – সেই বাঁক নেওয়ার আর্থ-সামাজিক প্রেক্ষিতটি এখানে অল্প কথায় আমরা রাখার চেষ্টা করলাম।
 
কবি বিদ্যুৎ পালের কাছেই আমরা জানতে পারি যে কবির পরিচিত কয়েকজন উল্লেখযোগ্য সাহিত্য পত্রিকার সম্পাদকরা বেশ কয়েকবার আলোকধনবার ফ্ল্যাটে এসে সারারাত কবিকে ফ্ল্যাটের বারান্দায় টেবিল চেয়ার দিয়ে বসিয়ে একেকটি কবিতা সম্পূর্ণ করিয়েছেন। যাই হোক, "পতঙ" কবিতাটি থেকে কবি ধনবার কবিতা রচনা-শৈলির মধ্যে কিন্তু একটা নতুন বাঁক লক্ষ্য করা যায়।

কবিতাটি শুরু হয় এইভাবেঃ
 ভাদ্রের সবচেয়ে ভারী বৃষ্টি চলে গেছে
সকাল হয়েছে
খরগোশের চোখের মতো লাল সকাল

শরত আসে ছোট ছোট সাঁকো পেরিয়ে 
তার নতুন চকচকে সাইকেল জোরে চালিয়ে
জোরে জোরে ঘন্টি বাজিয়ে
উজ্জ্বল ইশারায় ডাক দেয়
ঘুড়ি ওড়ানো শিশুদের দলটিকে –

আকাশটিকে এত নরম করে 
যেন ঘুড়িটি ওপরে উঠতে পারে
দুনিয়ার সবথেকে হাল্কা ও রঙিন জিনিস উড়তে পারে
দুনিয়ার সবথেকে পাতলা কাগজ উড়তে পারে
বাঁশের সবচেয়ে সরু কঞ্চি উড়তে পারে
যাতে শুরু হতে পারে
ছোটদের শিস, ও খিলখিলে হাসির হুল্লোড় 
আর প্রজাপতিদের নরম দুনিয়া

এই কবিতাটিতেই এক জায়গা কবি লিখছেন যে বাচ্চাগুলো ঘুড়ি ওড়াবার সময় যখন ছাদের বিপজ্জনক ধারে এসে পড়ে তখন নীচে পড়ে যাওয়ার থেকে তাদের বাঁচায়

    "সে সময় তাদের পড়ে যাওয়া থেকে বাঁচায়
     শুধু মাত্র তাদেরই রোমাঞ্চিত শরীরের সঙ্গীত

     ঘুড়ির স্পন্দিত উচ্চতা তাদের ধরে রাখে নেহাত এক সূতোর সাহায্যে
    ঘুড়ির সঙ্গে সঙ্গে তারাও ওড়ে।

আলোকধনবার এই কবিতাটি থেকে ক্রমশ বিমূর্ত অনুভূতিগুলি এক অপরূপ ভাষার বয়নে বাস্তব ছবির আকার নিতে শুরু করে যা তাঁর কবিতার সব থেকে গুরুত্বপূর্ণ ও সুন্দর দিক। এই যে ছাদের কিনারে এসেও ছেলেগুলি যে নীচে পড়ে যাচ্ছে না, সেটাকে উনি বলছেন "ঘুড়ির স্পন্দিত উচ্চতা তাঁদের ধরে রাখে নেহাত এক সূতোর সাহায্যে (पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे)।

আমরা দেখেছি যে "জনতা কা আদমি" এবং "গোলি দাগো পোস্টার" কবিতা দুটির মধ্যে যে জগত ধরা পড়ে তা ছিল - যদিও সার্বিকভাবে নয় কিন্তু মূলত সামন্ততান্ত্রিক (ফিউডাল)। অথচ "পতঙ" কবিতাটিতে যে জগতটা তিনি দেখাচ্ছেন, সেটি কিন্তু আর পুরনো সেই সামন্ত-জগত নয়। বাজারি অর্থনীতির এক আধুনিক জগত, ধারালো ও উজ্জ্বল এক পৃথিবী। সেখানে "শরৎ আসছে তার নতুন সাইকেল চালিয়ে, ঘন্টি বাজিয়ে, ছোট ছোট সাঁকো পেরিয়ে। এই তরতাজা আলোকোজ্জ্বল চিত্রকল্পে কিন্তু সামন্ততন্ত্র নেই– আছে বুর্জোয়া সমাজের আধুনিক অনুভূতি এবং বোধ। শরৎ কালের আসার বর্ণনার মধ্য দিয়ে তা দারুণ ভাবে ধরা দিয়েছে। জীবনানন্দ বলেছেন না "উপমাই কবিতা"। আলোকধনবা কবিতার ক্ষেত্রে কথাগুলি পুরোপুরি খাটে।

 "ভাগি হুই লড়কিঁয়া"(পালিয়ে যাওয়া মেয়েরা) তাঁর অন্যতম শ্রেষ্ঠ ও জনপ্রিয় কবিতা। এই কবিতায় সামন্ত সংস্কৃতির ক্রূরতা ও হিংসাকে তিনি একেবারে নগ্ন করে সমাজের সামনে তুলে ধরেন। কয়েক ভাগে বিভক্ত এই দীর্ঘ কবিতাটির প্রথম ভাগ শুরু হয় মাত্র তিনটি পংক্তি দিয়েঃ
 
বাড়ির শেকলগুলো
 কত বেশি স্পষ্ট হয়ে ওঠে

 যখন কোনও মেয়ে বাড়ি ছেড়ে পালায়!

পরবর্তী পংক্তিগুলিতে তিনি লিখছেনঃ
 "সেই রাতগুলি কি মনে পড়ছে
 পুরনো সিনেমায় যা বারবার দেখাত

 যখনই কোনও মেয়ে বাড়ি থেকে পালাত
 বৃষ্টি ঘেরা পাথরের একটি ল্যাম্পপোস্ট -
 যার চোখে - ব্যাকুলতা প্রায় স্বল্প আলো 

 রুপোলি পর্দায় প্রেমের উন্মাদনার সেই সব গান
 আজ নিজেরই বাড়িতে সত্যি হয়ে উঠল!
 আরও পরে তিনি লিখেছেনঃ
  ওকে মুছে ফেলবে
  পালিয়ে যাওয়া মেয়েটিকে তোমরা মুছে ফেলবে
তার কামরায় যে বাতাসটা ছিল
 তার থেকে মুছে ফেলবে তাকে

 তোমার ভেতরে তার যে শৈশবটা আছে
 সেখান থেকেও তাকে মুছে ফেলবে

 আমি জানি
 কুলীনদের হিংস্রতা!

কুলীন বলতে এখানে তিনি সামন্ততান্ত্রিক এলিটদের কথা বলতে চেয়েছেন। বিহারের যে সামন্ত সংস্কৃতি ছিল, যা এখনও পুরোপুরি অপসৃত হয়নি, তাকে তিনি প্রহারের পর প্রহারে লাঞ্ছিত করেছেন। উনি বলছেন যে একটি মেয়ে পালিয়ে গেছে মানেই এমন নয় যে কোনও ছেলেও বাড়ি ছেড়ে পালিয়েছে। অনেক কারণেই তো সে বাড়ি থেকে বেরিয়ে আসতে পারে। উনি বলছেন "महज़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है"। বাংলায় বললে "নেহাত জন্ম দেওয়াই স্ত্রী হওয়া নয়"। এই কথাটি যে আলোকধনবা মুক্ত কণ্ঠে এভাবে বলছেন, তিনি কিন্তু সামন্ততান্ত্রিক মনুবাদী ধ্যান-ধারণা আর সংস্কৃতির ওপর সচেতনভাবে আক্রমণ হেনেছেন – এর পরই তিনি পাঠককে নিয়ে আসেন এক অত্যন্ত আধুনিক জগতে যেখানে নারী নেহাৎ সন্তান প্রসব করার জন্যই এই পৃথিবীতে আসেনি সেখানে নারী তার স্বতন্ত্র মহিমা ও ব্যক্তিত্ব নিয়ে উপস্থিত। কবি বাড়ি থেকে পালিয়ে যাওয়া মেয়েটির বিষয়ে বলছেন যে

সে যে কোনও জায়গায় থাকতে পারে
সে ব্যর্থ হতে পারে
টুকরো টুকরো হয়ে ভেঙ্গে যেতে পারে
কিন্তু এই সবের মধ্যে সে নিজে অংশ নেবে

সে ভুলও করবে নিজেই
সে সব কিছু দেখবে শুরু থেকে শেষ তক
নিজের শেষও সে দেখে যাবে
অন্য কারও মৃত্যু সে মরবে না.................

 "তুমি, যে কিনা
স্ত্রীদের আলাদা রাখো
বেশ্যাদের থেকে
আর প্রেমিকাদের আলাদা রাখো
স্ত্রীদের থেকে
কী সাংঘাতিক আতঙ্কিত হও
যখন এক ভয়-ডরহীন নারী এখানে সেখানে 
ঘুরে বেড়ায়
নিজের ব্যক্তিত্ব খুঁজে নিতে
ব্যঙ্গ করে তিনি বলেন –
তোমার জন্য কি কোনও মেয়ে পালিয়েছে?

তোমার রাতগুলোতে কি
একটিও লাল মোরামের পথও নেই?

"ব্রুনোর মেয়েরা" (ব্রুনো কি বেঁটিঁয়া) তাঁর আরেকটি বিখ্যাত কবিতা। জিয়ার্দানো ব্রুনো ছিলেন ষোড়শ শতাব্দীর ইতালিয় দার্শনিক, কবি এবং সৃষ্টিতত্ত্ববিদ যিনি কোপারনিকাসের মতই এক সৌরজগতের কথা বলতেন যে জগতে সূর্য ছিল কেন্দ্রে স্থির এবং পৃথিবীসহ অন্যান্য গ্রহরা তাকে বেষ্টন করে ঘূর্ণমান। যেহেতু এই সব বৈজ্ঞানিক ব্যখ্যা ক্যাথলিক ধর্ম বিশ্বাসকেই নাকচ করত – তাই ব্রুনোকে পুড়িয়ে মারা হয়। কবিতাটি লেখা হয় সত্তর ও আশির দশকে বিহারে ভয়াবহ সব হত্যাকান্ড যেমন বেলচি গণহত্যা (১৯৭৭), পিপরা গণহত্যা (১৯৮০) এবং আরও বেশ কয়েকটি গণহত্যার প্রেক্ষাপটে। কবিতাটি শুরু হয় যে নারীদের পুড়িয়ে মারা হয় তাদের নিয়েই
"তারা চট আর কাদা দিয়ে তৈরি হয়নি
 তাদের মায়েরা ছিল
 তারা নিজেরাও মা ছিল
 তাদের নাম ছিল
 যে নামে তাদের ডাকা হতো
 শৈশব থেকে যেদিন তাঁদের হত্যা করা হয়েছে
 সেই দিন পর্যন্ত ডাকা হয়েছিল
 তাদেরও গলার স্বরে
 যারা তাদের হত্যা করেছে......

দীর্ঘ এই কবিতা থেকে অসংখ্য বিস্মিত করে দেওয়ার মত উদ্ধৃতি দেওয়া যায়, যা লিখতে গেলে একটি গ্রন্থ হয়ে যাবে। তাই শেষ কয়েকটি পংক্তি উল্লেখ করেই এই কবিতাটি নিয়ে আলোচনা শেষ করব-

 রাণীরা নিশ্চিহ্ন হয়েছে
                                              তাঁদের স্মৃতির মূল্য
 জংগ ধরা টিনেরও সমান আর নেই

                                                   রাণীরা নিশ্চিহ্ন হয়েছে
                                              মুছে গেছে

                                             কিন্তু দিগন্ত পর্যন্ত
 ফসল কাটা নারীরা
 ফসল কেটে চলেছে।

এই যে তিনি বলছেন যে রাণীরা নিশ্চিহ্ন হয়েছে তাঁদের স্মৃতির মূল্য জংগ ধরা টিনেরও সমান আর নেই – এই বলাটা এতটা চূড়ান্ত এক সত্য, যা আজকের দিনের গণতান্ত্রিক ব্যবস্থার কাছে প্রাচীন রাজতান্ত্রিক ব্যবস্থাকে বালখিল্য করে তোলে এবং একই সঙ্গে গণতান্ত্রিক ব্যবস্থার বিকাশকে এক বাস্তব হিসেবে উপস্থিত করে। ইতিহাসবোধকে কবিতায় এত সুন্দরভাবে আনা অবশ্যই আলোকধনবার কবিতার শৈলীর আরও এক উল্লেখযোগ্য বৈশিষ্ট্য।
 
আলোকধনবা'র অন্যতম জনপ্রিয় কবিতা "কাপড়ের জুতো" একটি অতি দীর্ঘ কবিতা। খুব অল্প অংশ নিয়েই আমরা আলোচনা করব – যদিও বিস্মিত করার মতো বহু ছত্র ও পংক্তি রয়েছে এই কবিতায়। প্রথম পংক্তিগুলি এরকমঃ
 
"চকচকে রেললাইনের ধারে
পড়ে আছে একটা পুরনো কাপড়ের জুতো

"কেউ একজন ফেলে গেছে
আর মাত্র এক ধাপ পরেই অদৃশ্য হয়েছে
কেননা জুতোর জগৎ মাত্র এক ধাপ পর্যন্ত"
 আরেক স্থানে কবি লিখছেনঃ
"আমি কল্পনা করতেই পারি কতবার
খেলার নির্ণয়কারী মুহূর্তে 
এই জুতাগুলো অবশ্যই সূর্যের মতো উত্তপ্ত হয়ে উঠেছিল!

বহু ধুলো আর পাহাড়ে ভরা রাস্তা
ছড়িয়ে আছে এই জুতার ভেতরে —
 খানিক পরেই কবি বলছেনঃ

"কতবার পথ ভুলে যাওয় ভবঘুরে আত্মা পায়ে পায়ে 
এই জুতার ভেতরে নেমে এসেছে

মাসের পর মাস ধরে এই জুতার ভেতরেই থেকেছে?
 আরেকটি অংশে কবি বলছেন
 জুতার জগৎ যেখান থেকে শুরু হয়েছিল—

রাখালরা নিশ্চয়ই সেই পর্যন্ত এসেছিল!
কেননা জুতোর ভেতরে একটা নিবিড়তা থাকে—
যাকে ধ্বংস করা যায় না

কেননা ভেড়ার ভেতরে একটা নিবিড়তা থাকে
যেখান থেকে সমুদ্রের গর্জন শোনা যায়

আর নিবিড়তা এক এমন স্থান—
যেখানে নিদ্রার বীজ নিরাপদ থাকে
 
এই রকমেরই বিস্ময় জাগানো চিত্রকল্পে ভরা এই দীর্ঘ কবিতাটি, যার ওপর আলোচনার এখানেই ইতি টানলাম। 

পূর্বেই এই কথা স্বীকার করা হয়েছে যে বিহারের আর্থ-সামাজিক চরিত্রে সত্তর দশকের পর আরও প্রায় তিন দশকে লক্ষণীয়ভাবে পরিবর্তন ঘটে গেছে। অর্থনৈতিকভাবে বিহারে সেভাবে কোনও অগ্রগতি না ঘটে থাকলেও ধনী কৃষকদের উত্থান ঘটে (বিশেষ করে পিছিয়ে থাকা বর্ণের চাষিদের মধ্যে) এবং কৃষিকাজে যন্ত্রের ব্যবহার বৃদ্ধি পায়। একদিকে পুজিবাদী বড় ভূস্বামীদের উত্থান আর অন্যদিকে ছোট কৃষকদের ক্ষেত মজুরে পরিণত হওয়া এবং তাঁদের মধ্যে একটি বেশ বড় অংশের পরিযায়ী শ্রমিকে পরিবর্তন হওয়া।

আমরা আলোকধনবার কবিতায় কিন্তু এই পরিবর্তন বেশ স্পষ্টভাবেই প্রত্যক্ষ করেছি। তাঁর সেই প্রথম কবিতা "জনতা কা আদমি" এবং "গোলি দাগো পোস্টার" পরবর্তী পর্যায়ে আমরা পেয়েছি "পতঙ" অথবা "ভাগি  হুই লড়কিঁয়া"-র মতো কবিতা। যেখানে তিনি তাঁর সামাজিক দায়বদ্ধতা প্রকাশের এক নতুন শৈলী পেয়ে যান – এবং যেখানে আমরা কবিতার এক উৎকৃষ্ট স্বাধীন বিকাশ লক্ষ্য করি। ১৯৯৮ সালে তাঁর ৫০ বছর বয়সে যেহেতু তিনি তাঁর প্রথম কাব্যগ্রন্থ প্রকাশিত করেন তাই সেই একই কাব্যগ্রন্থে তাঁর কবিতার যাত্রা পথে আমরা বেশ কয়েকটি বাঁক দেখতে পাই। সামন্ততান্ত্রিক ব্যবস্থার বিরুদ্ধে যিনি প্রথম কলম ধরেন, তিনিই কিন্তু প্রথম কাব্যগ্রন্থের এক পর্যায়ে এসে একটি কবিতা লিখেছেন যার নাম "জেলাধিশ" অর্থাৎ জেলা ম্যাজিস্ট্রেট। কবিতাটিতে আবেগের থেকে বাস্তব পরিস্থিতি এবং যুক্তি বেশি ফুটে উঠেছে। শুনুন আমাদের কবি কি বলছেনঃ
"এই যে মানুষটি 
টেবিলের ওপারে বসে তোমাকে শুনছে 
এত কাছ থেকে এত মন দিয়ে 
ও কোনও রাজা নয় - জেলা ম্যাজিস্ট্রেট

ও একজন জেলা ম্যাজিস্ট্রেট
যে সাধারণত রাজাদের থেকে 
অনেক বেশি শিক্ষিত

 রাজাদের থেকে অনেক বেশি সতর্ক ও নিবিষ্টমনা

ও কোনও দূরের দুর্গে নয় – ঐশ্বর্যের নির্জনতায় নয়
আমাদেরই গলিতে জন্মানো একটা ছেলে

ও আমাদের অসাফল্য আর ভুলত্রুটির মধ্যেই
লালিত হয়েছেো
আমাদের সাহস, আমাদের লোভগুলো - ওর ভালই জানা
রাজাদের থেকে ও অনেক বেশি ধৈর্য ও বুদ্ধি ধরে

ও অনেক বেশি বিভ্রান্ত করতে পারে আমাদের
ও আরও ভালো ভাবে আমাদের অধিকার থেকে
আমাদের বঞ্চিত করতে পারে

কড়া নজর রাখতে হবে
সরকারাধীন এই চমৎকার মস্তিষ্কের ওপর

কখনও কখনও তো ওর থেকে শিখতেও হবে
কবিতায় প্রশ্ন, যুক্তি-তর্ক

কবিতা মূলত এক ভাষা-শিল্প। একজন কবি কীভাবে একটি কথা বলছেন, সেই শৈলি বা স্টাইলই তাঁর সৃষ্টিকর্ম – সেটিই কবিতা। মাইকেল-রবীন্দ্রনাথ, জীবনানন্দ, শক্তি, বিনয় – সকলের ক্ষেত্রেই এই কথাটি নিদারুণভাবে সত্য। এঁদের প্রত্যেকেরই নিজস্ব চিন্তা-ভাবনা-দর্শন থাকতে পারে এবং অবশ্যই ছিল – কিন্তু সেই ভিন্নতা যত না তাঁদের ভিন্ন করে তোলে তার চেয়ে অনেক বেশি তাঁদের ভাষা, ভাষার স্টাইল তাঁদের কবি-চরিত্রকে বিশিষ্ট করে তোলে। আমাদের আলোচ্য কবির ক্ষেত্রেও প্রাসঙ্গিক সেই একই সত্য। যদিও কবি হিন্দিভাষী, তাই তাঁর ভাষার বিশেষত্ব একজন হিন্দিভাষী যতটা ভালোভাবে বুঝবেন অন্য ভাষাভাষীর পক্ষে ততটা সম্ভব নয়। কিন্তু আমরা আলোকধনবার কবিতার চলনটিকে লক্ষ্য করেছি যার দ্বারা কিন্তু বেশ খানিকটা বোঝা যায় যে কবির ভাষার ধরণটি কেমন। যেমন "পতঙ" কবিতায় শরতের আসাটা তিনি যে সমস্ত উপমা, যে স্টাইল ও ভাষার চলন দিয়ে বুঝিয়েছেন, "ভাদ্রের সবচেয়ে ভারী বৃষ্টি চলে গেছে / সকাল হয়েছে / খরগোশের চোখের মতো লাল সকাল......শরত আসে ছোট ছোট সাঁকো পেরিয়ে / তার নতুন চকচকে সাইকেল জোরে চালিয়ে / জোরে জোরে ঘন্টি বাজিয়ে.... তা থেকে আমরা বুঝতে পারি যে তাঁর ভাষা প্রয়োগ অনন্যসাধারণ। 

কিন্তু এ বাদেও আলোকধনবার কবিতায় আরেকটি এমন বিশেষত্ব আছে যা কবিতায় অত্যন্ত বিরল (এক্ষুনি একটি নামই স্মরণে আসছে, যিনি হলেন বিশ্ববিখ্যাত বের্টোল্ট ব্রেখট। পাবলো নেরুদা'র কবিতাতেও এই বিশেষত্ব আংশিকভাবে দেখা যায়)। কবিতা মাত্র আবেগসমৃদ্ধ হয়ে থাকে এবং আলোকধনবার কবিতায়ও আমরা প্রগাঢ় আবেগের মুখোমুখি বেশ কয়েকবার হয়েছি – কিন্তু এই আবেগের একেবারে বিপ্রতীপে আমরা দেখি তিনি কবিতায় প্রশ্ন করছেন, যুক্তি রাখছেন এবং তর্ক করছেন। যা পাঠক হয়তো তাঁর "জনতা কা আদমি" এবং "গোলি দাগো পোস্টার"-এ লক্ষ্য করে থাকবেন – যেখানে তিনি প্রশ্ন তোলেন, নিজের কথার সপক্ষে অথবা বিরোধী শক্তির বিরুদ্ধে যুক্তির অবতারণা করেন। উদাহরণের জন্য "জনতা কা আদমি" কবিতা থেকে উদ্ধৃত দিয়ে আমরা দেখতে পাবো তিনি সামাজিক অবস্থার সমালোচনা করেন কীভাবেঃ অন্যদিকে, তরুণ ডোমরা এই দাবিতে ধর্মঘট শুরু করেছে যে / এখন থেকে আমরা শ্মশানে শুধু অকালমৃতদের দেহ পোড়াবো না / অকালমৃতদের বাড়িতেও যাব। "গোলি দাগো পোস্টার" কবিতায় তিনি প্রশ্ন তোলেনঃ  মনুষত্বকে বাঁচিয়ে রাখার জন্য /এক দারোগার যদি গুলি ছোড়ার অধিকার থাকে তাহলে আমার কেন থাকবে না? সেই একই কবিতায় কয়েক লাইন পরে তিনি বলেন, প্রশ্ন তোলেনঃযে মাটি থেকে অন্ন বের করে আমি / গোদাম পর্যন্ত বয়ে নিয়ে যাই –সেই মাটির জন্য গুলি দাগার অধিকার আমার/ নাকি ওই জারজ জমিদারের / যে গোটা দেশটাকে সুদখোরের কুকুর বানিয়ে ফেলতে চায়? দুটি উদাহরণই দেখায় যে এই কবি নেহাৎ নিজের ব্যক্তিগত আবেগকেই প্রকাশ করেন না বরং সামাজিক অবস্থার সমালোচনা করেন, রীতিমত যুক্তি দিয়ে, তর্ক করেন এবং প্রশ্ন তোলেন।

ভাগি হুই লড়কিঁয়া (পালিয়ে যাওয়া মেয়েরা) নামক কবিতাটি পুরোটাই নারী স্বাধীনতার বিরোধী পুরনো সামন্ততান্ত্রিক সমাজের বিরুদ্ধে এক তীব্র কষাঘাত। গোটা কবিতাটিতেই কবি এক প্রাচীন সামন্ততান্ত্রিক বাস্তবতা, ও মূল্যবোধকে যুক্তি দিয়ে ব্যঙ্গাত্মক প্রশ্ন দিয়ে ক্ষতবিক্ষত করেছেন। একটি বাড়ি ছেড়ে পালিয়ে যাওয়া মেয়ের প্রতি একটি সামন্ততান্ত্রিক পরিবারের যে ক্রূরতা, যে প্রতিক্রিয়া তার প্রতি জাহির করা হয় তাকেই বিধ্বস্ত করেন আলোকধনবা - এক জায়গায় তিনি বলছেনঃ  
"তুমি, যে কিনা / স্ত্রীদের আলাদা রাখো / বেশ্যাদের থেকে / আর প্রেমিকাদের আলাদা রাখো / স্ত্রীদের থেকে / কী সাংঘাতিক আতঙ্কিত হও / যখন এক ভয়-ডরহীন নারী এখানে সেখানে / ঘুরে বেড়ায় / নিজের ব্যক্তিত্ব খুঁজে পেতে!

গোটা কবিতা জুড়ে তিনি এভাবেই যুক্তির কষাঘাতে নাস্তানাবুদ করেন পুরনো সংস্কারবাদী মানুষদের বোধ, অনুভূতি ও আবেগকে। অথচ বিস্ময়ের বিষয় যে এত প্রশ্ন, যুক্তি তাঁর কবিতাকে আরও শক্তিশালী করে তোলে, মানুষের আবেগকে জাগিয়ে তোলে। তাঁর ব্যঙ্গাত্মক প্রশ্ন একেবারে নগ্ন করে ফেলে বনেদি সমাজের মূল্যবোধকে। তিনি বলেনঃ
"তোমাকে কি দাম্পত্য দিয়ে দেওয়া হয়েছে?
তুমি কি তাকে তুলে এনেছ
নিজের পদমর্যাদা আর ক্ষমতার বলে
তুমি তুলে এনেছ এক বারেই
একটি নারীর সমস্ত রাতগুলিকে
তার মৃত্যুর পরেরও রাত! 
 
আলোকধনবার আরেকটি বিখ্যাত কবিতার নাম "সফেদ রাত" বাংলায় বললে "সাদা রাত"। যে কবিতায় শহুরে জীবনের "প্রকৃতি ও পূর্বসূরীদের গ্রামীণ সভ্যতা" থেকে Alienation ও নির্বাসনকে ঐতিহাসিক দর্শনের আলোকে, যে প্রতিভা এবং দক্ষতায় তুলে ধরা হয়েছে তা বিস্মিত করে ও আমাদের বিহ্বল করে। শহরে আমাদের অবস্থানটাই অনেকের ক্ষেত্রেই খুব গুছোনো নয়, আমাদের অবস্থা অনেকটা যেন শরণার্থীদের মতো, যেন একান্নবর্তী কোনও বৃহৎ পরিবার ভেঙ্গে আমাদের গ্রাম ছেড়ে শহরে আসা। আমরা যারা পুরনো শহুরে - হঠাৎ যেন  আবিষ্কার করি যে এই শহরে কোনও না কোনও দিন আমরাও তো এসেছি গ্রাম থেকে, খেত, বাগান, অরণ্য পেরিয়ে। শুনি কবি কী বলছেনঃ

"শহরে আমরা এমন ভাবে এসে বসত গড়লাম
যেন পারিবারিক ভাঙনই তার ভিত 
আমাদের সঙ্গে এলো না কেউই, না পূর্বপিতারা
না গ্রাম, না জঙ্গল, না পশুরা
শহরে উঠে আসার মানে কি
শহরেই শেষ হয়ে যাওয়া?

এক বিশাল শরণার্থী শিবিরের দৃশ্য
সর্বত্রই বসানো ভবিষ্যতহীন তাঁবু
এ আমরা কেমন সফরে বেরিয়েছি
যে আমাদের চেহারায় ছিন্ন মানুষের ছবি
শুধু বলার জন্যই কোনও একটি শহর নিজের শহর
কোনও একটা ঘর নিজস্ব ঘর
এর ভেতরেও প্রায়শ আমরা পথ হারিয়ে ফেলি।

 আমাদের শহুরে জীবনে কোন অতীতেই এই ইতিহাসবোধটা আমরা হারিয়ে ফেলেছি।

৩।। প্রেম
আলোকধনবা "বৃষ্টি" নামক একটি ছোট কবিতায় লিখেছিলেনঃ 
 বৃষ্টি একটি পথ
 নারীর কাছে যাওয়ার
তাঁর বেশির ভাগ কবিতায় নারী নানা ভাবে উপস্থিত থাকেন। নারীর প্রতি তাঁর মনে, হৃদয়ে গভীর শ্রদ্ধা, ভালোবাসা এবং অনুরাগ চিরকালই থেকেছে। তাঁর জীবনে বেশ কয়েকজন নারী এসেছেনও – যাঁদের সঙ্গে তাঁর গভীর সম্পর্ক গড়ে ওঠে।

তবে তাঁর একটি সম্পর্ক বিবাহে পরিণত হয়। নাটকে অভিনয় করতেন ক্রান্তি ভাট। বয়সে তরুণী এই মেয়েটি বয়সে কবির থেকে অনেকটাই ছোট। কিন্তু তাঁদের মধ্যে ভালোবাসা জন্ম নেয় এবং বয়সের পার্থক্য সত্বেও তাঁরা সামাজিক ভাবে, অনেক বন্ধু-বান্ধব, আত্মীয় স্বজনের উপস্থিতিতে মালা বদল করেন।

দুর্ভাগ্যবশত, তাঁদের এই সম্পর্ক দুই বছরের বেশি টেকেনি। তাঁরা আলাদা হয়ে যান। প্রেমের সম্পর্কের এই ভাঙন, কবি কিন্তু ভুলতে পারেননি। অনেক চেষ্টা করেছেন ভুলে যেতে কিন্তু ভুলতে পারেননি। "দেখা হওয়া" এবং "ভুলতে চাওয়ার লড়াই"- তাঁর এই দুটি অসামান্য কবিতায় আমরা তাঁর গভীর প্রেমের বড়ই যন্ত্রণাদায়ক বোধ ও অনুভূতির মুখোমুখি হয়ে পড়িঃ

"হটাৎ করে তুমি চলে এসো
এত ট্রেন চলে এই দেশে
যে কোনও সময়
যে কোনও জায়গা থেকেই তুমি আসতে পারো
আমার কাছে

কিছু দিন থেকো এই ঘরে
এ ঘর তোমারও তো 
........
কিছু দিন থেকো
যেন তুমি যাওনি কোথাও

.....................
সন্ধে নামা মাত্র
কত মহিলারা ফিরে আসেন
নিজের নিজের বাড়ি

কতবার তো সত্যি মনে হয়েছে
তুমি ওদের মধ্যে হয়তো
আসছ

সেই তন্বী শরীর
সূতির সরু খোলের
প্রিন্টেড শাড়ি

কাঁধ থেকে ঝুলছে 
ঝালর দেওয়া ঝুলি
আর পায়ে চটি
....
আমার সঙ্গে আরেকবার দেখা করে
ফিরে গেলে তোমারও কাজে বেশি মন বসবে
......
সুখ দুঃখ তো 
আসে যায়

সব কিছুই এখানে পার্থিব
কিন্তু দেখা সাক্ষাৎ পার্থিব নয়

তাদের টাটকা ভাব
থেকে যাবে এখানে হাওয়ায়
তার থেকে তৈরি হয় একটি নতুন জায়গা
একবার দেখা হওয়ার পর
আবার দেখা করার ইচ্ছে
পৃথিবীতে কখনও শেষ হবে না

ক্রান্তি ভাট নামক সেই তরুণীকে কবি কোনও দিনও ভুলতে পারেননি। তাকে ভুলে যেতে অনেক চেষ্টা করেছেন কিন্তু ভুলে যাওয়া সম্ভবপর হয়নি। "ভুলতে পারার জন্য লড়াই" সেই তরুণীকে নিয়ে আরেকটি কবিতা। তিনি লিখেছেনঃ

"তাকে ভুলে যাওয়ার লড়াই
 লড়ে চলি
 এই লড়াইও 
 অন্য কঠিন লড়াইয়ের মতো

 দুর্গম পথ যায় ওই দিকে
 তার সঙ্গে কাটানো দিনগুলির ভিতর থেকে
উঠে আসে যে প্রতিধ্বনি

সঙ্গে সঙ্গে চলবে আজীবন
এই রাস্তায় 
বাইরের কোনও সাহায্য পৌঁছতে পারে না
তার অকস্মাৎ ফিরে আসার ছায়া
দীর্ঘতর হয়ে চলেছে
অর্থাৎ কবি বুঝতে পারছেন যে সে আর কোনও দিন ফিরে আসবে না। এই কবিতা পড়ে যে কোনও পাঠকেরই হৃদয় বেদনায় ভরে উঠবে।

বিবিধ কবিতা
কবি আলোকধনবা তাঁর কবিতাযাপনে অনেক ছোট বড় কবিতা লিখেছেন, যেগুলির বিষয় বিবিধ, যেগুলিকে কোনও নির্দিষ্ট বিষয় অথবা ধরনের বলা যাবে না – যার জন্য পৃথক বিভাগ করা চলে না। যেমন নাক্ষত্রিক আকাশে কত না নক্ষত্র রয়েছে, যার মধ্যে বেশ কিছু হয়তো মৃত, কিছু কাছের, কিছু বহু দূরের। আমরা তাকে বলি না সপ্তর্ষি-মণ্ডল অথবা কালপুরুষ এক কথায় বলি তারা ভরা আকাশ।

সাধারণ মানুষের মনের ভেতরে সময়ে অসময়ে অসংখ্য অনুভূতি ও ভাব তৈরি হয়। তারা সব সময় তাকে ভাষায় প্রকাশ করতে পারে না। কবিরা এই কাজটি খুব ভালো করতে পারেন এবং তাই তাঁরা কবি। একজন কবির মন বিশ্ব-ব্রহ্মাণ্ডের মতই অনন্ত, গভীর ও রহস্যময়। তাই তার মনে অনেক নতুন ভাব ও অনুভূতির সৃষ্টি হয় – কবি তাঁর অনন্য কল্পনা শক্তির সাহায্যে অনেক এমন ভাব ও অনুভূতিও সৃষ্টি করেন, যা একেবারে নতুন এবং সৃষ্টিছাড়া। যা পূর্বে কখনও সেভাবে প্রকাশ পায়নি।

এই ধরনের ভাব অথবা জগত হিন্দি কবিতায় সৃষ্টি করেছিলেন মুক্তিবোধ অথবা বাংলা কবিতায় জীবনানন্দ দাশ। আলোকধনবা'র কবিতার জগতও অত্যন্ত মৌলিক – যদিও মুক্তিবোধ এবং জীবনানন্দের কবিতার জগত থেকে একেবারেই ভিন্ন।

আধুনিক সমাজে ব্যক্তিগত জীবন অথবা মানুষের সার্বিক জীবনে অনেক ভয়, দ্বিধা, সংকোচ, লজ্জার – বিভিন্ন ও বিচিত্র বোধ ও অনুভূতি লুকিয়ে থাকে – মানুষ তাকে ভাষা দিতে পারেন না। আলোকধনবা সেই চাপা পড়ে থাকা বোধগুলিকে আশ্চর্য নৈপুণ্যে, অত্যন্ত সহজবোধ্য ভাষা ও জীবন্ত চিত্রকল্পের মাধ্যমে ফুটিয়ে তোলেন। এই সৌন্দর্য ও শক্তি - শ্রোতা ও পাঠককে মুগ্ধ ও বিহ্বল করে।
 একটি ছোট কবিতা "পার্থক্য"। কবি বলছেন যে একদিন সন্ধেবেলা ঘুরতে বেরিয়ে আমি হয়তো আর ফিরলাম না। লোকে বলবে আমি নিজেকে শেষ করে ফেলেছি। তিনি তাঁর সহযোদ্ধাকে বলছেন যেঃ 
"তুমিও আবার বিশ্বাস করে নিয়ো না
 তুমি তো আমাকে খানিকটা জানো

তুমি যে আমার হৃদপিণ্ডের ঠিক পাশে
 অনেকবার লাল ঝান্ডার ব্যাজ পরিয়েছ
 তুমি আবার বিশ্বাস করে বোসো না
 নিজের দুর্বলতম মুহূর্তেও
 তুমি এমনটা ভেবো না
 যে আমার মস্তিষ্কের হয়তো বা মৃত্যু ঘটেছে
 না কখনও না

 হত্যা আর আত্মহত্যাকে এক রকমই করে দেওয়া হয়েছে
 এই আধো-অন্ধকার সময়ে

 পার্থক্য করে নিয়ো বন্ধু

কী অসাধারণ ভাবে ফুটিয়ে তুলেছেন এই সময়ের অন্ধকারকে তিনি এই কথাটি বলে যে 'হত্যা আর আত্মহত্যাকে এক রকমই করে দেওয়া হয়েছে / এই আধো-অন্ধকার সময়ে'। কেন এ দেশে হাজার হাজার নিরন্ন, অসহায়, মানুষের মৃত্যু ঘটে - কেন চিকিৎসার অভাবে, ওষুধের অভাবে লক্ষ লক্ষ মানুষের মৃত্যু ঘটে এই দেশে? এগুলি এই ব্যবস্থার মধ্যে হত্যা ছাড়া আর কী? কৃষকের আত্মহত্যার সংখ্যা এই শতকে তিন লক্ষ ছাড়িয়ে গেছে। এই আত্মহত্যাগুলি কি আসলে হত্যা নয়? 

"আকাশের মতো হাওয়ারা" কবিতায় কবি শুরু করছেনঃ
     "সমুদ্র
     তোমার কিনারা শরতের
     তুমি স্বয়ং 
 সূর্য আর লবনের

তোমার আওয়াজ
আন্দোলন আর গভীরতার

আর বাতাস – সে তো অনেক দেশ পেরিয়ে
তোমার ভিতরে পৌঁছায়
আকাশের মতো

তোমাকে পেরিয়ে যাওয়ার ইচ্ছে
সচরাচর হয় না
পথ হারিয়ে ফেলার ভয় সবসময়ই থাকে
"রেল" কবিতায় কবি বলছেনঃ
    প্রতিটি ভালো মানুষের একটা রেল থাকে
    যেটি তার মায়ের বাড়ির দিকে যায়
     সিটি বাজিয়ে
    ধোঁয়া উড়িয়ে
'বৃষ্টি' নামক কবিতাটি প্রথম দুটি লাইন ভারি সুন্দর। কবি লেখেনঃ 'বৃষ্টি এক পথ / নারীর কাছে যাওয়ার'। আরও কিছু কবিতা কখনও পূর্ণ কখনও অংশত এখানে রাখব মূলত কবির সূক্ষ্মতাবোধ এবং দক্ষতাকে দেখানোর জন্য।
রঙ
একটি পুরানো গাড়ি রঙ করা হচ্ছে
রঙ করা চলবে যতক্ষণ না রঙ চলকে ওঠে।

কোনও এক যুগের কবিতা
সেখানে ডালে ফল পাকত
আর তার থেকে আলো বেরোত

আমরা খুব জোরে দৌড়াতাম
মাঠ থেকে ঘরের দিকে
কখনও কখনও আমরা আগে আগে দৌড়তাম
আমাদের পিছনে পিছনে তাড়া করত বৃষ্টি

শরতের রাত
শরতের রাত
এতটাই হালকা এবং খোলা
যেন সন্ধ্যাটাই টানা চলে গেছ ভোর পর্যন্ত 

আর এই সন্ধ্যাগুলোর রাত আসবে
অন্য ঋতুতে।
 
জংশন
    আহা জংশন!
 ট্রেন যেখানে অনেকক্ষণ দাঁড়ায়
 বাকিটা পথের জন্য জল নেয়

 আমি খুঁজি সেখানে
 আমার পুরনো সফরসঙ্গী।

একটি কবিতার নাম "দাম"। কবি মনে হয় তাঁদের কথা বলেছেন, যাঁরা এক সময় কোনও আন্দোলনে ছিলেন, পরে হয় বিদেশে গিয়ে অথবা দেশ ভালো চাকরিতে যোগ দিয়ে এক আরামের জীবন বেছে নিয়েছেন।
 দাম
 এখন তো ভুলে যাওয়ারও ভালো দাম পাওয়া যায়
 এমনই তো করে লোভী ও ভ্রষ্ট লোকেরা

ছাদে দাঁড়িয়ে থাকা মেয়েরা

এখনও 
ছাদে এসে দাঁড়ায় মেয়েরা
তাদের ছায়া এসে পড়ে আমার জীবনে। 

অবশ্য মেয়েরা এসেছে সেই ছেলেগুলির জন্য
যারা নীচে গলিতে তাস খেলেছে

নর্দমার ওপর করা সিঁড়ির ধাপে
ফুটপাতে চায়ের দোকানের পাতা বেঞ্চে

তারা চা খাচ্ছে 
সেই ছেলেটিকে ঘিরে

ও মাউথ অর্গানে ভারি সুন্দর বাজায়
আওয়ারা এবং শ্রী ৪২০-এর চিরন্তন গানগুলো 

মাটিতে পাতা পত্রিকার দোকানে দাঁড়িয়ে
কিছু তরুণ খবরকাগজও পড়ছে

ওদের মধ্যে সকলেই ছাত্র নয়
কিছু বেকার আছে আর কিছু চাকরিজীবী

কিছু লোফারও রয়েছে
কিন্তু ওদের সকলের রক্তে
প্রতীক্ষা আছে একটি মেয়ের!
ওদের আশা ওই বাড়িগুলো ও ছাদ থেকে

কোনও এক সন্ধেবেলা প্রেম আসবে।

আমার প্রিয় কবি আলোকধনবা। তাঁর কবিতার ধরন-ধারণ আধুনিক বাংলা কবিতার থেকে ভিন্ন। তাছাড়া তাঁর কবিতায় একটা আদর্শ রয়েছে, যার প্রতি তিনি প্রতিবদ্ধ এবং যা তাঁর কবিতায় বারবার প্রতিফলিত ও প্রতিধ্বনিত হয়। ১৯ বছর বয়সে যে কবি তাঁর কবিতা লেখা শুরু করেছিলেন বিদ্রোহী হিসেবে, আজ তিনি ৭৭ বছর বয়সেও বিদ্রোহী - যদিও তার ধরনটা অনেকটাই ভিন্ন। আলোকধনবার কবিতা গভীর অনুভূতি ও আবেগ দিয়ে লেখা, যদিও তাঁর কবিতায় আরেকটি বিরাট দুর্লভ এবং কবিতার পক্ষে ধারণ করা কঠিন এক গুণ আছে, যা হলো তাঁর কবিতায় তিনি প্রশ্ন তোলেন, যুক্তি-তর্কে নামেন এবং তার ফলে তাঁর কবিতা এক ফোঁটাও তরল হয় না। পাঠকরা নিশ্চয়ই এই প্রবণতা এবং গুণগুলি তাঁর কবিতায় লক্ষ্য করেছেন অথবা দেখেছেন। যদিও আমি ভালো ভাবেই জানি যে কবিতা একটি এমন বিষয় যার অনুবাদ হয় না – তবুও অনুবাদ না করলে অন্য ভাষাভাষীরা সেই কবিতা পড়বেন কী করে। যাই হোক, এবার এই লেখার ইতি টানব, তবে কবির একটি কবিটা দিয়েই তা হোক। 
প্রতাপ সংবাদপত্র

গভীর রাতে
সেই কবে হারিয়ে গেছে সেই জায়গাটি
যেখানে দাঙ্গাবাজরা মেরেছিল
গণেশ শঙ্কর বিদ্যার্থীকে

অনেক পিছনে ছেড়ে গেছে
'প্রতাপ'-এর দপ্তর
যেখানে ভগৎ সিং ও তাঁর 
সঙ্গীরা আসতেন দেখা করতে
সেই যুগের স্বাধীনতা সেনানীরা
কবে হবে অত সুন্দর হিন্দুস্তানী
অত মানবিক ও স্বাভিমানী
গোটা ভারত গুঞ্জরিত হত
ফাসির বেদির দিকে যাওয়ার সময়
তাঁদের গাওয়া গানে
দেশের অর্থ তখন কত বড় ছিল
কালাপানির  পথে যাঁরা গিয়েছিলেন
ফিরে এলেন যখন
জীবিত ও গরিমাপূর্ণ
আমাদের জীবনের কোনও কাজের দ্বারা
কখনও কি আমাদের শহীদেরা 
আলোকিত হয়েছেন?
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Sunday, 4 May 2025

POST on DS



अपने समय के एक पेशेवर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के जीवन की त्रासदी!

कामरेड धनंजय सिंह नहीं रहे। उनकी मृत्यु के बाद या तो किसी ने कुछ नहीं लिखा या फिर उनके अंतिम समय के उनके त्रासदपूर्ण जीवन पर पुराने सहयोगी  के रूप में अपना क्षोभ मात्र व्यक्त किया। धनंजय सिंह के त्रासद पूर्ण जीवन से आने वाली पीढियां कई सबक ले सकती है। सामाजिक जीवन में रहने वाले किसी व्यक्ति के योगदान और उसकी कमियों के बारे में साफ़-साफ़ लिखा जाना चाहिए, ताकि क्रांतिकारी संघर्ष में लगे या कभी रहे किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन हो सके। एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में कई बुजुर्ग साथियों के साथ काम करने का हमारा अनुभव है ,लेकिन बी एस ए की  जिस पीढ़ी का मैं हूं,उस समय वे बीएस ए का हिस्सा नहीं थे। इसलिए उनके बारे में संयुक्त मोर्चा तथा दूसरे साथियों से उनके व्यवहार के बारे में मिली जानकारी ही उनके मूल्यांकन का आधार है।

 संक्षेप में उनके बारे में बताने की कोशिश कर रहा हूं।

 

कामरेड धनंजय सिंह बलदेव झा, अरविंद सिन्हा तथा बी एन शर्मा के साथ मिलकर 1972 में बी एस ए की स्थापना की थी। 1975 में संगठन में राजनीतिक तथा सांगठनिक मतभेदों के कारण धनंजय सिंह बी एस ए से अलग हो गए थे। 1979 से  साइंस कॉलेज के युवा छात्र सतीश कुमार के नेतृत्व में बी एस ए  से अलग होकर उनके साथ स्टडी सर्किल चलाने लगे थे। उनकी इस कोशिश से कई युवाओं को मार्क्सवाद लेनिनवाद तथा अन्य  क्लासिक पढ़ने की दिशा तथा उत्साह मिला। लेकिन बाद में व्यवहार में जाने से रोके जाने के कारण इन युवा साथियों का उनसे तीव्र अंतरविरोध शुरू हो गया। सांगठनिक जीवन में नियम कानून के प्रतिशत सख्त कामरेड धनंजय सिंह पारिवारिक जीवन में कई बार ब्राह्मणवादी विचारधारा के सामने आत्म समर्पण करते रहे उनका अंतिम संस्कार भी आत्म समर्पण से बनी पारिवारिक परंपरा के कारण ब्राह्मणवादी रीति रिवाज के साथ हुआ, जिसे लेकर के क्रांतिकारी जमात में क्षोभ है।


1996 में बिहार में क्रांतिकारी तथा जनवादी संगठनों के संयुक्त मोर्चा के गठन के बाद कामरेड धनंजय सिंह भी बाद के दिनों में सीपीआई (एमएल) जनसंवाद के नाम से बिहार में संयुक्त मोर्चा में कभी-कभी  भाग ले लिया करते थे।  2011 के बाद उनके कुछ बचे पुराने साथी उनकी निष्क्रियता के सैद्धांतिक लाइन से क्षुब्ध होकर उनसे अलग हो गए। इसके बाद वह पूरी तरह अपने परिवार के साथ रहने लगे थे।

साथी धनंजय सिंह अपने समय के प्रतिभा संपन्न नेतृत्व के लिए जाने जाते रहे हैं। क्रांतिकारी आंदोलन में न पढ़ने की  एडवेंचर की जगह युवा साथियों को उन्होंने पढ़ने लिखने की सलाह दी। लेकिन उनके नेतृत्व की सबसे भारी कमी यह रही कि जो भी उत्साही युवा साथी उनके साथ जुड़े, उन्हें व्यवहार तथा आंदोलन में जाने,  मेहनतकशों या छात्रों को संगठित कर संघर्ष में जाने से प्रत्यक्षतः उन्होंने रोका। इसके कारण 1995 के बाद लगभग सभी युवा साथीयों ने उनसे दूरी बना ली।

 अपने शुरुआती दिनों में जन संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले साथी धनंजय सिंह ने बाद के दिनों में जन आंदोलन तथा जन संगठन के व्यावहारिक कार्य से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। अपने समकालीनों से उनका कोई राजनीतिक संबंध नहीं रह गया था। सीपीआई(एमएल) जनसंवाद के नाम से अपना संगठन चलाने वाले कामरेड का लगभग सभी समकालीन कार्यकर्ताओं से संवाद अवरुद्ध हो चुका था।

--     नरेंद्र कुमार 

कम्युनिस्ट राजनीतिक कार्यकर्ता 

1979 के आंतरिक टूट के बाद बी एस ए (बिहार स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की एक  धारा का 1981 से 1984 तक महासचिव

https://www.facebook.com/share/p/187kVuvXPd/



Manoj Kumar Jha

सतही और अपूर्ण, उनके जीवन के एक बड़े भाग में किए गए अच्छा खासा योगदान पर मौन साध लिया गया है।

Narendra Kumar

Manoj Kumar Jha मैं ने कुछ भी मौन नहीं साधा है !

आप इन पंक्तियों को देख नहीं पा रहे हैं , " उनकी इस कोशिश से कई युवाओं को मार्क्सवाद लेनिनवाद तथा अन्य  क्लासिक पढ़ने की दिशा तथा उत्साह मिला।"

 यदि आप मेरी अपेक्षा इससे भी उनका बड़ा योगदान मानते हैं, तो  उन पर आपको लिखना चाहिए न कि सिर्फ क्षोभ व्यक्त कर मामले को उलझा देना चाहिए!

 जब मैं बीएसए से जुड़ा था, तो मैंने पाया कि बी एस ए संगठन की टूट में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। मैं उसपर लिखा सकता हूं लेकिन यहां मैं चुप रहा! उस टूट की पीड़ा को एक नये उत्साही युवक के रूप में झेला हूं! टूट की पीड़ा आप समझ सकते हैं! 

 उसके बाद उनसे जो लोग जुड़े थे, उसमें आप भी थे।  ,फिर हमसे यह उम्मीद क्यों कर रहे हैं कि मैं उनके उसे स्वर्णिम काल के बारे में लिखूं ? उसके बारे में तो आप जैसे लोगों को, जिसने उनकी उस प्रतिभा और कार्य प्रणाली से सीखा है, वही लिख सकता है। हमारी आलोचना के बजाय बेहतर होगा कि उनके सकारात्मक पक्ष पर आप विस्तार से लिखिए।

मुझे तो उनसे सिखने के लिए कुछ भी नहीं मिला! या यह मिला कि जन संगठन तथा जन संघर्ष में जुटे रहना सबसे आवश्यक है, जबकि मैं पढ़ते लिखते भी रहा हूं!

Narendra Kumar

Manoj Kumar Jha मैं ने कुछ भी मौन नहीं साधा है !

आप इन पंक्तियों को देख नहीं पा रहे हैं , " उनकी इस कोशिश से कई युवाओं को मार्क्सवाद लेनिनवाद तथा अन्य  क्लासिक पढ़ने की दिशा तथा उत्साह मिला।"

 यदि आप मेरी अपेक्षा इससे भी उनका बड़ा योगदान मानते हैं, तो  उन पर आपको लिखना चाहिए न कि सिर्फ क्षोभ व्यक्त कर मामले को उलझा देना चाहिए!

 जब मैं बीएसए से जुड़ा था, तो मैंने पाया कि बी एस ए संगठन की टूट में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। मैं उसपर लिखा सकता हूं लेकिन यहां मैं चुप रहा! उस टूट की पीड़ा को एक नये उत्साही युवक के रूप में झेला हूं! टूट की पीड़ा आप समझ सकते हैं! 

 उसके बाद उनसे जो लोग जुड़े थे, उसमें आप भी थे।  ,फिर हमसे यह उम्मीद क्यों कर रहे हैं कि मैं उनके उसे स्वर्णिम काल के बारे में लिखूं ? उसके बारे में तो आप जैसे लोगों को, जिसने उनकी उस प्रतिभा और कार्य प्रणाली से सीखा है, वही लिख सकता है। हमारी आलोचना के बजाय बेहतर होगा कि उनके सकारात्मक पक्ष पर आप विस्तार से लिखिए।

मुझे तो उनसे सिखने के लिए कुछ भी नहीं मिला! या यह मिला कि जन संगठन तथा जन संघर्ष में जुटे रहना सबसे आवश्यक है, जबकि मैं पढ़ते लिखते भी रहा हूं!


MK Azad उनके करीबी लोग पहले ही खुल कर लिख चुके है, आपको पहले भी लिंक भेजा था, फिर से दे रहा हूँ:


https://www.facebook.com/share/p/1FNLabVVBa/ 


By Parth Sarkar


Red Salute to Comrade Dhananjay Singh!


 कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (सी.सी.आई.) कॉमरेड धनंजय सिंह की स्मृति में अपने झंडे को झुकाता है, जिनका 13 अप्रैल, 2025 को निधन हो गया। कॉमरेड धनंजय सिंह बिहार के क्रांतिकारी छात्र आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे बिहार स्टूडेंट्स एशोसियेशन (बी.एस.ए.) के नेता थे, जिसको क्रांतिकारी आंदोलन के लिए कई पेशेवर क्रांतिकारी देने का श्रेय मिलता है। उन्होंने किसान जनता और मजदूर वर्ग के कई आंदोलनों और संघर्षों का नेतृत्व किया।

हालांकि वे जयप्रकाश नारायण की आलोचना करते थे, फिर भी उन्होंने 1974 के बिहार आंदोलन में भाग लिया और सत्ता के खिलाफ रोहतास जिले में छात्रों और युवाओं के स्वतंत्र जनसंघर्षों का संचालन किया। जब अधिकांश क्रांतिकारी नेतृत्व मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को नजरअंदाज़ कर रहा था और क्रांतिकारी आंदोलन में इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था, तब उन्होंने इसकी अहमियत पर ज़ोर दिया।

बाद में उन्होंने सीपीआई (एमएल), जनसंवाद के बैनर तले कार्य किया। हम उनकी कमियों से सीखते हुए भी उनके योगदान को उच्च सम्मान का स्थान देते हैं। उनके कई विचलनों और हमारे बीच उत्पन्न मतभेदों के बावजूद, हम अपने नेतृत्व की विरासत को उनके योगदान से जोड़ते हैं।


The Communist Centre of India dips its flag in memory of Comrade Dhananjay Singh, who passed away on April 13, 2025. Com. Dhananjay Singh was one of the leaders of the revolutionary students movement of Bihar. He was a leader of the Bihar Students Association which is credited with supplying the revolutionary movement with many professional revolutionaries. He led many agitations and movements of the peasant masses and the working class. Although critical of Jayprakash Narayan he participated in the 1974 agitation in Bihar and independently conducted mass struggles of students and youth in Rohtas district against the establishment. He stressed the importance of Marxist-Leninist theory at a time when it was neglected by most leaders in the revolutionary movement and was not taken seriously by the revolutionary movement as a whole. Later he worked under the banner of CPI (ML), Jansanwaad. We hold his contributions in high regard even while learning from his shortcomings. Despite his many deviations and consequent differences between us, we trace our legacy to his leadership.

https://www.facebook.com/share/p/1BrymbqTcN/ 

Dipon Mitra


আমার প্রয়াত অগ্রজ, প্রিয় বন্ধু, শিক্ষক ধনঞ্জয় সিং-এর প্রতি


কৈমুর পাহাড়তলে ছিল ছোট গ্রাম

বহুদূর বহুদূর থেকে আজ জানাই প্রণাম

সাশারাম স্টেশনের থেকে মেঠো গ্রাম্যপথে নেমে

বহু বহু পথ হেঁটে গোধূলির হাটে গেল থেমে

গোপন সঙ্ঘের শিক্ষাপ্রার্থীদের শেষ সঙ্ঘারামে

আমাদের যাত্রাপথ শেষ হলো অব্যর্থ মোকামে 


তুমিই শিক্ষক ছিলে, প্রিয়তম বন্ধু ছিলে তুমি

বিশাল হৃদয় ছিল সমুদ্রের - ভূমা, তুমি ভূমি

নৈরাজ্য-প্রণীত এই পৃথিবী নামক ছোট বাজারের চাবি

দিয়েছিলে আমাদের হাতে তুলে – করেছিলে দাবি

নরকের দরজা খোলো – আখ পেষা মেশিনের মতো

কোটি কোটি শ্রমীদের জ্যান্ত পিষে লক্ষ কোটি যত

উঠেছে প্রাসাদ, ব্রিজ, তৈরি হয় বিমান, রকেট

সোনার পণ্যের স্তুপে ঢাকা পড়ে অযুত নিরন্ন শিশু পেট


সে ভীষণ হত্যাযজ্ঞে পুড়িয়েছ আমাদের হৃদয় ও প্রাণ

হত্যাকারীদের তাই ললিত উৎসব থেকে বাঁচাই আপ্রাণ

নিজেকে, নিজের কৃষ্টি, নিজের আনন্দ, দুঃখ, ক্ষত

তুমি দিয়েছিলে প্রিয়, এ আত্মসম্মানবোধ, শিক্ষা অবিরত


সহসাই চলে গেলে আমার অগ্রজ, বন্ধু, আমার শিক্ষক

সঙ্গেই থাকবে তুমি, যুদ্ধরত, ধ্বংস হবে জ্বলন্ত নরক

Oh my late elder, dear friend, teacher Dhananjay Singh


There was a small village at the foot of Kaimur hills

Today I bow down from far, far away

From Sasharam station, I walked down the rural road

After walking for many miles, we stopped at the twilight market

At the last monastery of the secret cohort’s educational seekers

Our journey ended reaching unfailingly to our destination


You were the teacher, you were the dearest friend, 

you had a huge heart like the ocean – you the all-pervading, the earth 

you gave us the keys to this small market called the world 

Made out of chaos and the key held it in our hands - you demanded

Open the gates of hell - like a sugarcane crushing machine

Crushing the lives of millions of workers

Through the lives of millions of workers

Palaces, bridges, planes, rockets are built

The piles of gold products, hide from the view 

the stomachs of thousands of innocent children


You tempered our hearts and lives through those terrible massacre

So I try to save myself from the beautiful festivals of the murderers

I protect myself, my culture, my joy, sorrow, wounds

You gave me, my dear, this sense of self-respect, unremitting schooling


If suddenly you, my elder, my friend, my teacher  leave me, 

You will be with me, fighting, may the burning hell is destroyed.

इसके अलावे लोकपक्ष पत्रिका में भी उनके बारे में लेख और कविता(अंग्रेजी) में आई है।


Narendra Kumar Mk Azad सीसी आई ने ही सिर्फ मूल्यांकन किया है। बाकी कविता केरूप में भावनात्मक आदरांजलि है।


MK Azad Narendra Kumar I agree with CCI evaluation. And at the moment, I have nothing to add because I do not have his organisation(PPC)'s document on socialist revolution , the stand he took perhaps during 1975-79 negating semi-feudal semi-colonial characterisation of India. Also other documents like the working class on  Participative Management.


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*मेरे शिक्षक, मेरे मित्र –कॉमरेड धनंजय  को समर्पित*

 

कौमुर की ढलानों के नीचे

एक गाँव था – धूल, पसीने और सपनों से बना,

जहाँ से निकलते थे पगडंडी,

पर सिर्फ़ पढ़ने नहीं, लड़ने की राह में।


तुम थे—

हमारे बीच से उठे हुए,

ना किसी कुर्सी पर बैठे,

बल्कि गन्ने के खेत में,

मशीन के नीचे पिसते मज़दूर के साथ।


तुमने हमें दिया

एक दुनिया की चाबी—

जिसे लूट के बाजार ने बंद कर रखा था,

और कहा: खोलो नरक के दरवाज़े,

जिससे निकल सके

हमारा आत्मसम्मान,

हमारी भूख,

हमारा इतिहास।


आज तुम नहीं हो—

पर तुम्हारी बात

हर फैक्ट्री की दीवार पर गूंज रही है,

हर जले हुए खेत में सांस ले रही है।


तुम चले गए,

पर तुम्हारा होना

हमारी लड़ाई में ज़िंदा रहेगा—

जब तक ये जलता नरक

राख नहीं बन जाता।


*एम के आज़ाद*