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Monday, 18 March 2024

कार्ल मार्क्स की 6 कविताएँ !

कार्ल मार्क्स की 6 कविताएँ !

मज़दूर वर्ग के शिक्षक व दोस्त कार्ल मार्क्स के जन्म दिवस (5 मई) के अवसर पर

जीवन-लक्ष्य / कार्ल मार्क्स

कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं,
नहीं, मेरे तूफ़ानी मन को यह स्वीकार नहीं।
मुझे तो चाहिए एक महान ऊँचा लक्ष्य
और, उसके लिए उम्रभर संघर्षों का अटूट क्रम।
ओ कला! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार
मेरे लिए खोल!
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं!
आओ,
हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्योंकि –
छिछला, निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन जीवन
हमें स्वीकार नहीं।
हम, ऊँघते, कलम घिसते हुए
उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे।
हम – आकांक्षा, आक्रोश, आवेग और
अभिमान में जियेंगे!
असली इंसान की तरह जियेंगे।


चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थी की तत्त्व-मीमांसा / कार्ल मार्क्स

आत्मा-वात्मा थी ही नहीं कभी
सांड रहे हर-हमेश अनुभव किए बिना, कभी भी, कभी उसकी
निकम्मी फंतासी है आत्मा
पेट में तो खोजी ही नहीं जा सकती वह,
और गर कोई उसको सत्य सिद्ध भी कर दे
अण्ड-बण्ड गोली भी छूमन्तर कर देगी उसे,
फिर नज़र आएंगी आत्माएँ
उभरती अन्तहीन प्रवाह में


चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थी का मनोविज्ञान / कार्ल मार्क्स

करेगा बियारी
जो मालपुओं और गुलगुलों की

भोगेगा बीमारी
दुःस्वप्नों, हुलहुलों, पुलपुलों की


आचार-संहिता चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थियों की / कार्ल मार्क्स

पसीना नुकसान करे बेहतर है इससे तो
पहनना एक से ज़्यादा बंडियाँ यात्राओं में
सावधान रहो उन तमाम लालचों से जो
पैदा करें गड़बड़ियाँ तुम्हारे जठर-रस के लिए
ऐसी जगहों पर फटकने मत दो अपनी नज़रें
शोले उठा सकती हों जो तुम्हारी आँखों में
पानी मिलाओ शराब में
कॉफ़ी में हर बार लो दूध
और भूलना मत हमें याद करना भाई सा'ब
करने लगो कूच जब दूसरे जहान को


गणितीय चतुराई / कार्ल मार्क्स

घटा लिया है हमने
हर चीज़ को चिन्हों में
और तर्क करते यों पेश
जैसे सूत्र गणित के भिन्नों में

ईश्वर अगर बिन्दु है
तो लम्ब के समान गुज़र नहीं सकता वह
जैसे आप खड़े नहीं हो सकते सिर के बल
बैठे चूतड़ों पर।


जेनी के लिए / कार्ल मार्क्स

एक

जेनी, चिढ़ा सकती हो तुम मुझे यह पूछकर
मेरे गीतों का शीर्षक "जेनी के लिए" होता है क्योंकर
जब सिर्फ़ तुम्हारे लिए नाड़ी मेरी चलती है तेज़ ख़ास
जब गीत मेरे सिर्फ़ तुम्हारे लिए हैं उदास
जब सिर्फ़ तुम फूँक सकती हो उनके दिल में जान
जब तुम्हारा नाम हर हिज्जा लेता मान
जब तुम दो हर सुर को सुरीलापन
जब देवी से हो न किसी साँस की भटकन?
ऐसा इसलिए कि प्यारा नाम सुन पड़ता है मीठा कितना
और इसकी लय-तान मुझसे कहती है इतना
कितना भरा-पूरा, मधुर है इसका गुँजन
जैसे कि दूर कहीँ आत्माओं का कम्पन
जैसे लय-संगति सोने के तारोंवाले सिदर्न की
जैसे कोई चमत्कार भरी ज़िन्दगी जादू की

दो

देखो, भर सकता हूँ मैं किताबें कई हज़ार
लिख-लिख सिर्फ़ "जेनी" हर पंक्ति में बार-बार
फिर भी होगा छिपा उनमें विचार जगत
शाश्वत कृत्य और अपरिवर्तनीय संकल्प
मधुर पद्य जो करता हो अब भी कोमलता से आस
ईथर की सारी चमक और सारा प्रकाश
बेचैन दुःख की पीड़ा और अपूर्व आनन्द-भान
सारा जीवन और सारा है जो मेरा ज्ञान
पढ़ सकता हूँ मैं इसे दूर के तारों में
आता है वापस यह मुझ तक पछुआ-बयारों में
भीषण लहरों की गर्जना के होने में
सच, लिखूँगा मैं इसे हर एक कोने में
कि देख सकें आनेवाली सदियाँ सभी
है प्यार जेनी, प्यार का नाम है जेनी

Saturday, 16 March 2024

15 करोड़ का चंदा

पांच साल पहले की बात है। उस वक्त महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार थी। 

एक दिन सीएम ने एक कंपनी को 285 करोड़ के प्रॉपर्टी टैक्स से छूट का ऐलान कर दिया। 

अब इलेक्टोरल बॉन्ड की लिस्ट से पता चला है कि वह कंपनी बीजेपी को 185 करोड़ का चंदा दे चुकी है। 

यानी 100 करोड़ कंपनी ने फिर भी बचा लिए। 

इस कंपनी के मालिक सुधीर मेहता हैं, जिनका नरेंद्र मोदी से करीबी रिश्ता है। हाथ यूं ही नहीं पकड़ा है।

कौन सुधीर मेहता? वही जो 2002 के गुजरात नरसंहार के बाद नरेंद्र मोदी के साथ खड़े थे। 

सुधीर मेहता टॉरेंट पॉवर और टॉरेंट फार्मा के मालिक हैं। सुधीर का गौतम अदानी से भी करीबी रिश्ता है। 

37 हजार करोड़ की इस गुजराती कंपनी को नरेंद्र मोदी ने कुर्सी पर बैठते ही सौगातों से नवाजा था। 

बदले में 7 और 10 मई 2019 को टॉरेंट ने करीब 15 करोड़ का चंदा दिया। किस्तों में चंदा देने का खेल इस साल तक चला। 

नरेंद्र मोदी ने मेरे, आपके पैसे से टॉरेंट को रेवड़ियां बांटी। 

तस्वीरें गवाह हैं। मजा लीजिए और भोट मोदी को दीजिए। 

देश पूरा बिकना ही चाहिए।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳

चंदा दो, धंधा लो

*एसबीआई की ओर से कुल 22,217 इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए। हर बॉन्ड के पीछे एक घोटाला है। कुछ नजीर देखिए-*

*केस नंबर 1* 

2 अप्रैल 2022 : फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज की 409 करोड़ की संपत्ति ED ने अटैच की। 

7 अप्रैल 2022 : कंपनी ने 100 करोड़ का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर चंदा दिया। किसको दिया होगा? रेड फिर क्यों नहीं पड़ी? 

*केस नंबर 2* 

अप्रैल 2023 : मेघा इंजीनियरिंग ने करोड़ों का चंदा दिया।

मई 2023 : मेघा इंजीनियरिंग को 14,400 करोड़ का प्रोजेक्ट मिल गया। 

इन्हें चंदा मिला, उन्हें धंधा मिला। 

*केस नंबर 3* 

18 अगस्त 2022 : सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मालिक पूनावाला ने एक ही दिन में 52 करोड़ का चंदा दिया। 

22 अगस्त 2022 : मोदी ने उनसे मुलाकात की। फिर क्या तमाशा हुआ, देश जानता है।  कोविड वैक्सीन पर सीरम इंस्टीट्यूट को मोनोपोली बख्शी गई। 

*केस नंबर 4* 

खनन समूह वेदांता ने 400 करोड़ रुपये से ज्यादा के इलेक्टोरल बॉन्ड दान किए। 

फिर सरकारी कंपनी BPCL वेदांता को सौंप दी गई। 

सरगना को मिला चंदा, पंटर को मिला धंधा 

*केस नंबर 5* 

नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी ने 90 करोड़ के बॉन्ड खरीदे। 

यही कंपनी उत्तराखंड में सुरंग बना रही थी। 41 मजदूर 17 दिनों के लिए फंस गए। 

मामले की जांच तक नहीं हुई। 

*केस नंबर 6* 

गाजियाबाद स्थित यशोदा हॉस्पिटल पर कोविड के दौरान जनता से वसूली के आरोप लगे। यशोदा पर छापा पड़ा। 

यशोदा हॉस्पिटल ने 162 करोड़ बॉन्ड खरीदे और दान करके वॉशिंग मशीन में धुल गया। 

*केस नंबर 7*

टोरेंट पॉवर नाम की कंपनी ने 86.5 करोड़ का चंदा दिया। 

कंपनी को गुजरात में 47000 करोड़ का सरकारी प्रोजेक्ट मिल गया। 

ठेके कौन देता है? फिर चंदा किसको मिला? 

चंदा दो, धंधा लो। 

*केस नंबर 8* 

IRB Infrastructure नाम की कंपनी ने जुलाई 2023 में करोड़ों का चंदा दिया।

कंपनी को अगले कुछ महीनों में लगभग 6000 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला। 

*केस नंबर 9* 

भाजपा सरकार ने मित्तल ग्रुप को गुजरात में सबसे बड़ा धंधा दिया। 

मित्तल ग्रुप ने इलेक्टोरल बॉन्ड से भाजपा को चांप कर चंदा दिया। 

*केस नंबर 10*

पुलवामा हमले के बाद Hub Power Company नाम की पाकिस्तानी कंपनी ने भारत में इलेक्टोरल बॉन्ड क्यों खरीदा और किसे चंदा दिया, इसकी जांच नहीं होगी। जैसे पुलवामा हमले की जांच कभी नहीं हुई। 

*केस नंबर 11* 

दिसंबर, 2023 : शिरडी साई इलेक्ट्रिकल लिमिटेड पर छापा पड़ा। 

जनवरी 2023 : शिरडी साई ने छप्पर फाड़कर चंदा दिया।

*केस नंबर 12*
अदानी — मगर उसका तो नाम ही इस लिस्ट में कहीं नहीं है?

*आप समझे नहीं। चंदा दूसरों को दिया जाता है, अपने आप को नहीं!*

छापा डालने वाले का नाम तो है, छपा डलवाने वाले का नाम क्या है? जरा सोचिए!

Friday, 15 March 2024

On March 13, 1930, the Moscow Labor Exchange closed.

94 साल पहले 13 मार्च 1930 को मॉस्को लेबर एक्सचेंज बंद हो गया था।  अंतिम कार्य असाइनमेंट मैकेनिक मिखाइल शकुनोव को दिया गया था।  सोवियत संघ पूंजीवाद की विरासत बेरोजगारी को समाप्त करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया।

"4 वर्षों में पंचवर्षीय योजना की मुख्य उपलब्धियों में से एक यह है कि हमने बेरोजगारी को समाप्त कर दिया और यूएसएसआर के श्रमिकों को इसकी भयावहता से बचाया" (स्टालिन आई.वी., "लेनिनवाद के प्रश्न")। 94 years ago, on March 13, 1930, the Moscow Labor Exchange closed. The last job assignment was given to mechanic Mikhail Shkunov. The Soviet Union became the first country in the world to end unemployment, a legacy of capitalism.

"One of the main achievements of the five-year plan in 4 years is that we abolished unemployment and saved the workers of the USSR from its horrors" (Stalin I.V., "Questions of Leninism"). 

Thursday, 14 March 2024

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के जन्म दिवस 14 मार्च के अवसर पर प्रस्तुत है उनके योगदान बताता यह महत्वपूर्ण लेख


*महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के जन्म दिवस 14 मार्च के अवसर पर प्रस्तुत है उनके योगदान बताता यह महत्वपूर्ण लेख*

*आइंस्टीन होने का मतलब*

*वे 1905 के बसन्त के दिन थे, जब विज्ञान की दुनिया में एक छब्बीस वर्षीय युवा ने सहसा गुमनामी के अंधेरे से कालातीत ख्याति के क्षितिज की ओर एक लम्बी छलाँग लगाई। समूची बीसवीं शताब्दी महान अन्वेषणों और महान वैज्ञानिकों की शताब्दी थी, लेकिन 1905 में सापेक्षिकता के विशेष सिद्धान्‍त की खोज के चन्द एक वर्षों  बाद ही आइन्स्टीन की ख्याति और महत्ता की तुलना शताब्दी-सीमान्तों का अतिक्रमण करके की जाने लगी।* 

विज्ञान के इतिहास में आइन्स्टीन का स्थान न्यूटन और चार्ल्स डार्विन के समकक्ष माना जाने लगा था और आज भी यह  एक निर्विवाद मान्यता है। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के जन्म के साथ ही विज्ञान अब वैसा एकदम नहीं रह गया जैसा कि वह पहले था। क्लासिकी भौतिकी का युग बीत चुका था। 

*प्रकृति विज्ञान के अन्य महत्वपूर्ण मूलभूत सिद्धान्तों की ही भाँति सापेक्षिकता सिद्धान्‍त ने भी समाज-विज्ञान की सैद्धान्तिकी के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला और कई महत्वपूर्ण बहसों को जन्म दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर आइन्स्टीन का मात्र परोक्ष सैद्धान्तिक प्रभाव ही नहीं था। वह एक उत्कट मानवतावादी और गहन सामाजिक सरोकारों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त साम्राज्यवादी युद्धों, अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद-रंगभेदवाद का मुखर विरोध किया, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था के परभक्षी चरित्र, पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में अन्तर्निहित अराजकता और उससे बेरोजगारी, भुखमरी जैसी समस्याओं, विभीषिकाओं के अनिवार्यतः पैदा होने की प्रक्रिया की भी तीखी आलोचना प्रस्तुत की।* नागरिक स्वतंत्रता, समानता और विश्व शांति के बारे में आइन्स्टीन की सोच बीसवीं शताब्दी के कमोबेश तीसरे दशक तक यूटोपियाई और अनुभववादी थी। चौथे दशक से लेकर पाँचवे दशक तक उनका सामाजिक चिन्तन इस दिशा में विकसित हुआ कि वह अंततः दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ पूँजीवादी उत्पादन और विनिमय प्रणाली को मानने लगे थे और इसका एकमात्र एवं अनिवार्य विकल्प समाजवाद को मानने लगे थे, हालाँकि तब भी समाजवाद की उनकी अवधारणा इस मायने में यूटोपियाई ही थी कि वह समाजवाद की स्थापना के लिए वर्ग-संघर्ष के द्वारा पूँजीवादी राज्य सत्ता के ध्वंस की ऐतिहासिक अनिवार्यता के बारे में स्पष्ट नहीं थे, या कहा जा सकता है कि शंकालु थे। अपने इन वैचारिक अन्तरविरोधों के बावजूद आइन्स्टीन निस्सन्देह साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के धुर विरोधी, पूरी दुनिया की आम जनता के हितों और न्याय- स्वतंत्रता-समानता के मूल्यों के निष्कपट पक्षधर थे। वह आजीवन फ़ासीवाद, नस्लवाद और हर प्रकार के सर्वसत्तावाद का विरोध करने वाले क्रान्तिकारी जनवादी और जुझारू मानवतावादी थे। हालाँकि वह एक सुसंगत मार्क्सवादी (द्वंद्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ से लैस) नहीं थे, लेकिन एक अकुण्ठ भौतिकवादी थे और मनुष्य के भाग्य नियन्ता के रूप में किसी भी दैवी सत्ता के अस्तित्व को कदापि स्वीकार नहीं करते थे।

बहरहाल, आइन्स्टीन के सामाजिक सरोकारों की चर्चा से पहले उस सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की संक्षिप्त परिचयात्मक चर्चा उचित होगी, जिसकी सौवीं वर्षगांठ पूरी दुनिया में 'भौतिकी के वर्ष' के रूप में मनाई जा रही है।

1905 में जब आइन्स्टीन के चार युगान्तरकारी शोधपत्र भौतिकी की अग्रणी जर्मन शोधपत्रिका 'अनालेस डेर फ़िज़िक' में प्रकाशित हुए, उस समय वह अकादमिक दुनिया से अलग बर्न स्थित स्विस पेटेण्ट ऑफ़िस में नौकरी कर रहे थे। जर्मनी में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद अनिवार्य सैनिक सेवा से बचने के लिए उन्होंने 1896 में अपनी जर्मन नागरिकता छोड़ दी थी। आगे की शिक्षा उन्होंने स्विट्जरलैण्ड में हासिल की और 1901 में वहाँ की नागरिकता भी ले ली थी। 1903 में शादी के बाद वह एक बच्ची के पिता भी बन चुके थे। दो वर्ष अस्थायी तौर पर अध्यापन का काम और फ़िर पेटेण्ट ऑफ़िस की नौकरी करते हुए आइन्स्टीन का महान मस्तिष्क लगातार विज्ञान के एक नए युग के उद्घोष की तैयारी में लगा हुआ था। 1905 में चार युगान्तरकारी शोधपत्रों के प्रकाशन के कुछ ही वर्षों बाद उस महान वर्ष को 1543 (जब कोपरनिकस की महान वैज्ञानिक कृति 'दे रेवोल्यूशनिवस ऑर्बियम कोएलेस्टियम' प्रकाशित हुई) और 1686 (जब न्यूटन ने अपनी कृति 'प्रिंसिपिया' पूरी की) के समकक्ष रखा जाने लगा। कॉपरनिकन क्रान्ति के बाद भी न्यूटोनियन भौतिकी में प्रकृति के मूलभूत नियमों और स्थूल इन्द्रियानुभूति के बीच जो सुकूनतलब रिश्ता अब तक मौजूद था वह सदा के लिए विलुप्त हो गया। आइन्स्टीन ने उस युग की शुरुआत कर दी थी, जब, जैसा कि वह स्वयं कहा करते थे, विज्ञान की मूलभूत अवधारणाएँ ''प्रत्यक्ष अनुभव के दायरे से और अधिक दूर हट गई थीं।'' इसका श्रेय भी मुख्यतः आइन्स्टीन को ही जाता है कि उनके द्वारा प्रवर्तित राह पर भौतिकी आज इतना आगे निकल आई है और इसके सीमान्त इतने अधिक विस्तारित हो गए हैं कि नए विद्यार्थियों के लिए ख़तरा इस बात का है कि प्रकृति की हमारी बुनियादी समझदारी में आइन्स्टीन द्वारा लाए गए असाधारण परिवर्तन को शायद वे समझ ही न सकें।

1905 में प्रकाशित शोधपत्रों की श्रृंखला में से पहले शोधपत्र में आइन्स्टीन ने प्रकाश के कणों या क्वाण्टमों या फ़ोटॉनों के बारे में नया सिद्धान्‍त प्रस्तुत किया। इसके पूर्व क्वाण्टम सिद्धान्‍त का मैक्स प्लांक द्वारा सूत्रपात हो चुका था। लेकिन सच पूछें तो आइन्स्टीन का यह शोधपत्र ही क्वाण्टम क्रान्ति का पहला तोप का धमाका था। इस शोधपत्र में आइन्स्टीन ने यह युक्तियुक्त परिकल्पना प्रस्तुत की कि प्रकाश पदार्थ के साथ अपनी अर्न्तक्रिया के दौरान अपनी फ्रीक्वेंसी के समानुपातिक ऊर्जा की एक सुनिश्चित मात्र या 'क्वाण्टम' से युक्त कण के समान व्यवहार करता है। अगले दो दशकों के दौरान प्रयोगों ने फ़ोटॉन की इस परिकल्पना को सही सिद्ध किया और इसके लिए आइन्स्टीन को 1921 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। उसी वर्ष 18 जुलाई को प्रकाशित होने वाला आइन्स्टीन का दूसरा शोधपत्र ब्राउनियन गति की व्याख्या से सम्बन्धित था जिसने परमाणुओं की वास्तविक स्थिति को निर्णायक रूप से स्पष्ट करने के साथ ही ऐसी पद्धतियाँ विकसित कीं जो आज भी आधुनिक सांख्यिकीय भौतिकी के बुनियादी अवयव हैं।

सापेक्षिकता के विशेष सिद्धान्‍त से सम्बन्धित आइन्स्टीन के दो शोधपत्र क्रमशः सितम्बर और नवम्बर 1905 में 'अन्नालेस डेर फ़िज़िक' में प्रकाशित हुए। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त ने दिक् (स्पेस) और काल के अन्तर्सम्बधों पर पुनर्विचार करते हुए उनके एकीकरण की क्रान्तिकारी अवधारणा निरूपित की। प्रकाशिकी और विद्युत गतिकी के विकास के फ़लस्वरूप निरपेक्ष काल, निरपेक्ष समक्षणिकता (साइमल्टेनिटी) और निरपेक्ष दिक् की अवधारणाओं का परित्याग कर दिया गया। विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के अनुसार, काल का प्रवाह किसी प्रणाली की गति पर निर्भर करता है और काल के अन्तराल (और दिक् के आयाम भी) इस तरह से परिवर्तित होते हैं कि सम्ब) प्रणाली में प्रकाश का वेग प्रणाली की गति के अनुसार परिवर्तित नहीं होता। यानी प्रकाश का वेग, इसके उत्सर्जन के वेग से स्वतंत्र, हमेशा स्थिर या अचर होता है। इस पूर्वाधार पर बहुत बड़ी संख्या में वे युगान्तरकारी भौतिक निष्कर्ष निकाले गए, जिन्हें सामान्यतः ''सापेक्षकीय'' कहा जाता है। अपने चौथे शोधपत्र में प्रतिपादित आइन्स्टीन का यह निष्कर्ष सभी पूर्व धारणाओं को उलट-पुलट कर नाभिकीय भौतिकी की नई आधारशिला सिद्ध हुआ कि किसी पिण्ड का द्रव्यमान उसकी ऊर्जा का समानुपातिक होता है और इस समानुपातिकता का नियतांक प्रकाश की गति का वर्ग फ़ल होता है (म्त्रउब्2)।

दिक् और काल के एकीकरण की अवधारणा ने न्यूटोनियन यांत्रिकी को बीते युग की चीज़ बना दिया। 1915 में सापेक्षिता के विशेष सिद्धान्‍त का सामान्यीकरण करते हुए आइन्स्टीन ने सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्‍त विकसित किया और न्यूटोनियन यांत्रिकी के युग का निर्णायक रूप से अवसान हो गया। क्लासिकीय भौतिकी से निर्णायक प्रस्थान का यह दूसरा चरण था। सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्‍त गुरुत्वाकर्षण का एक नया सिद्धान्‍त प्रस्तुत करता है, जिसके अनुसार, द्रव्यमान को दिक्-काल की वक्रता के रूप में देखा जाता है। यानी सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त दिक्-काल की वक्रता और गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों की क्रिया को एक मानता है। यह इस पूर्वधारणा पर आधारित है कि चतुआर्यामी दिक्-काल सातत्य, जिसमें गुरुत्वाकर्षण की शक्तियाँ काम करती हैं, अयूक्लीडीय ज्यामिति के सहसम्बन्धों के अधीन होता है। आइन्स्टीन चतुआर्यामी दिक्-काल में ज्यामितीय सहसम्बन्धों के यूक्लीडीय सहसम्बन्धों से विचलन को ही दिक्-काल की वक्रता मानते थे और उसे ही द्रव्यमान के रूप में देखते थे। 1919 के सूर्यग्रहण अभियान से प्राप्त आँकड़ों ने आइन्स्टीन के इस सिद्धान्‍त की प्रायोगिक धरातल पर पुष्टि कर दी, जब यह पाया गया कि किसी सीधी रेखा के 'प्रोटोटाइप' के रूप में तारों से आती प्रकाश की किरणें सूर्य के निकट गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में मुड़कर वक्र हो जाती हैं।

यहाँ यह उल्लेख दिलचस्प और प्रासंगिक है कि सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के दार्शनिक निष्कर्ष मार्क्स-एंगेल्स द्वारा निरूपित द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मूल स्थापनाओं की पुष्टि करते हैं और उन्हें समृद्ध बनाते हैं। यह सिद्धान्‍त दिक्-काल अन्तराल की एकिलत अवधारणा के माध्यम से दिक् और काल के बीच के अटूट सम्बन्धों को प्रदर्शित करता है। साथ ही, यह भौतिक गति और उसके अस्तित्व के दिक्-काल रूपों के बीच के अटूट सम्बन्धों को भी प्रदर्शित करता है। पदार्थ की गति की विशेषताओं (काल का ''धीमा होना'' और दिक् की ''वक्रता'') पर आश्रित दिक्-काल के गुणों की व्याख्या ने निरपेक्ष दिक् और काल के सम्बन्ध में क्लासिकीय भौतिकी की अवधारणाओं की संकीर्णता स्पष्ट कर दी और यह भी स्पष्ट कर दिया कि दिक्-काल की अवधारणाओं को गतिशील पदार्थ की अवधारणा से पृथक नहीं किया जा सकता। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त क्लासिकीय यांत्रिकी का युक्तियुक्त सामान्यीकरण बन गया। उसने क्लासिकीय यांत्रिकी के सिद्धान्तों को प्रकाश के वेग के समीप पहुँचते वेगों से गतिमान पिण्डों के क्षेत्र तक विस्तारित कर दिया। यूँ कहें कि सापेक्षिकता सिद्धान्‍त क्लासिकीय यांत्रिकी की तुलना में यथार्थ का अधिक सटीक परावर्तन है।

पूँजीवादी दर्शन की प्रत्ययवादी या भाववादी (आइडियलिस्ट)  और प्रत्यक्षवादी (पॉज़िटिविस्ट) धाराओं ने सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की निष्पत्तियों को विकृत करते हुए इसे अपने इस दावे को पुष्ट करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की कि विज्ञान का मूल चरित्र मनोगत (सब्जेक्टिव) होता है तथा भौतिक प्रक्रियाएँ प्रेक्षण पर निर्भर करती हैं। यथार्थ की निरपेक्षता की अस्वीकृति को उन्होंने यथार्थ के वस्तुगत चरित्र की अस्वीकृति में बदल दिया और इस तरह सापेक्षिकता सिद्धान्‍त को दार्शनिक सापेक्षवाद (रिलेटिविज़्म) के साथ उलझा दिया। इस मायने में आइन्स्टीन की अवस्थिति सुस्पष्ट भौतिकवादी थी। काण्ट के क्लासिकीय जर्मन प्रत्ययवाद में निहित अनुभवनिरपेक्षता के वह पहले से ही प्रखर आलोचक थे। प्रख्यात फ्रांसीसी गणितज्ञ प्वाइंकारे (जो 1905 में विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की कुछ निष्पत्तियों तक स्वतंत्र रूप से आइन्स्टीन के साथ-साथ पहुँचे थे) और कुछ अन्य लोगों ने जब यह कहा कि वैज्ञानिक सत्य ''सोपाधिक'' (कण्डीशनल) होता है तो आइन्स्टीन ने उनका कड़ा विरोध किया और संसार के वस्तुगत तथा ज्ञेय होने में तथा प्रकृति की सभी क्रियाओं की कारणात्मक परस्पर निर्भरता में अपना दृढ़ विश्वास प्रकट किया। आस्ट्रियाई भौतिकवादी एवं अन्र्स्ट माख़ भी वस्तुओं को ''संवेदनों का समुच्चय'', संकल्पनाओं को ''संवेदनाओं के समुच्चय'' का प्रतीक और विज्ञान को प्राकल्पनाओं का योग मानता था और इसकी जगह प्रत्यक्ष पर्यावलोकन को स्थापित करने की बात करता था। माख़ के इस मनोगत प्रत्ययवाद और आलोचनात्मक अनुभववाद की सुसंगत आलोचना लेनिन ने अपनी कृति 'भौतिकवाद तथा आलोचनात्मक अनुभववाद' में प्रस्तुत की थी। आइन्स्टीन हालाँकि शुरू में माख़ से प्रभावित थे, लेकिन बाद में, माख़वाद को उन्होंने दृढ़तापूर्वक ठुकरा दिया और 1920 में माख़ को एक ''घटिया दार्शनिक'' कहा।

क्वाण्टम यांत्रिकी की प्रत्यक्षवादी व्याख्या (खासकर कोपेनहेगेन स्कूल के प्रवर्तक एवं अनुयाई वैज्ञानिकों द्वारा) का भी आइन्स्टीन ने पुरज़ोर विरोध किया और एक भौतिकवादी अवस्थिति अपनाई। लेकिन यह बहस न केवल वैज्ञानिक, बल्कि दार्शनिक स्तर पर भी एक जटिल बहस थी, जिससे जुड़े कई मूलभूत प्रश्नों का उत्तर तब आइन्स्टीन के पास भी नहीं था और उनकी तर्क-प्रणाली के अन्तरिम विन्यास में कई बातें अधूरी और ग़लत भी थीं। क्वाण्टम यांत्रिकी का विषय-केंद्र प्रकृति की सूक्ष्म परिघटनाओं का अध्ययन था। पूरी बीसवीं शताब्दी के दौरान क्वाण्टम सिद्धान्‍त के सही-सटीक होने के प्रमाण रोज़-बरोज़ मिलते रहे। आज क्वाण्टम यांत्रिकी ने न केवल भौतिकी, रसायन और जैविकी में परिघटनाओं की व्यापक परिधि का विज्ञान सम्मत स्पष्टीकरण सम्भव बना दिया है, बल्कि वह इंजीनियरिंग की एक शाखा भी बन गई है, लेकिन इस क्रान्तिकारी सिद्धान्‍त के दार्शनिक गूढ़ार्थों पर बहस-विवाद आज भी जारी हैं। कहा जा सकता है कि क्वाण्टम यांत्रिकी ने सूक्ष्म जगत की गति के जिन रूपों से परिचय कराया, उसका लाभ उठाकर अभूतपूर्व वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति हासिल कर लेने में तो सफ़लता मिल गई, लेकिन उस गति की बुनियादी नियम संगति को आज भी बहुत थोड़े अंश में ही समझा जा सका है।

क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार किसी घटना या परिणाम की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, बल्कि केवल उसकी प्रायिकता (प्रोबेबिलिटी) बताई जा सकती है। इस स्थापना की भौतिकवादी व्याख्या वैज्ञानिक सत्य के अवगाहन की प्रक्रिया के और अधिक द्वंद्वात्मक हो जाने के रूप में की जाती है, जहाँ पर्यवेक्षण के सूक्ष्म स्तर पर निश्चितता और अनिश्चितता का द्वंद्व (घटना या परिणाम की प्रायिकता के रूप में) मौजूद रहता है, लेकिन इस बात को भी लगातार ध्यान में रखना होगा कि पर्यवेक्षण स्वयं ज्यादा से ज्यादा सूक्ष्म धरातल पर उतरता जाता है। यानी क्वाण्टम यांत्रिकी यांत्रिक निर्धारणवाद का खण्डन करता है, न कि कारण-कार्य सम्बन्ध या कारणिक निर्धारणवाद (कॉज़ल डेटरमिनिज़्म) का। क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार, अन्योन्य क्रिया करने वाली वस्तुओं की प्रणाली में सक्रिय हस्तक्षेप के बिना अनुसन्धानकर्ता को उसका पर्याप्त ज्ञान नहीं हो सकता। कोपेनहेगेनपंथ के वैज्ञानिकों ने इस स्थापना की प्रत्यक्षवादी व्याख्या की। उन्होंने सूक्ष्म जगत के यथार्थ को केवल संज्ञान और मापन की प्रक्रिया का प्रतिफ़ल बताया, ''पर्यवेक्षक'' की भूमिका की गलत व्याख्या की तथा ''कारणता के धराशायी होने'' और ''इलेक्ट्रॉन की स्वतंत्र इच्छा'' जैसे दावों तक जा पहुँचे। इस संदर्भ में भौतिकवादी अवस्थिति यह है कि क्वाण्टम यांत्रिकी की यह स्थापना विषय (ऑब्जेक्ट) और विषयी (सब्जेक्ट) के बीच, वस्तुगत पहलू और मनोगत पहलू के बीच, पहले के प्राथमिक और दूसरे के द्वितीयक होने के सिद्धान्‍त का खण्डन नहीं करती, बल्कि इनके अन्तर्सम्बन्धों की घनिष्ठता एवं संश्लिष्टता को और अधिक बारीकी के साथ उजागर करती है। क्वाण्टम यांत्रिकी सहित सम्पूर्ण भौतिकी के उत्तरवर्ती विकास ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते यह सिद्ध कर दिया कि अभी भी ''भौतिकी की आधारभूत भौतिकवादी भावना'' (व्ला. ई. लेनिन: 'भौतिकवाद और अनुभववादी आलोचना') का पलड़ा ही भारी है। लेकिन आइन्स्टीन के समय स्थिति ऐसी नहीं थी। चूँकि आइन्स्टीन एक सुसंगत द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दार्शनिक नहीं थे और चूँकि क्वाण्टम यांत्रिकी अभी प्रायोगिक सत्यापन के प्रारम्भिक स्तर पर थी, इसलिए आइन्स्टीन क्वाण्टम यांत्रिकी की प्रत्यक्षवादी व्याख्याओं का विरोध करते हुए इस अतिवादी निष्कर्ष तक जा पहुँचे कि क्वाण्टम यांत्रिकी के सिद्धान्‍त विसंगतियों से भरे हुए हैं। धीरे-धीरे वह इस धारणा से तो मुक्त हुए लेकिन इतना वह अंत तक मानते रहे कि यह एक अधूरा सिद्धान्‍त है और एक मायने में अपने पूर्वाग्रहों के बावजूद, उनकी यह धारणा सही भी कही जा सकती है।

1926 तक क्वाण्टम सिद्धान्‍त और सापेक्षिकता का विशेष सिद्धान्‍त अपने अलग-अलग प्रायोगिक सत्यापनों के बावजूद एक-दूसरे से सामंजस्य नहीं रखते थे। उस समय की क्वाण्टम यांत्रिकी परमाणु स्तर की जिन परिघटनाओं की व्याख्या कर रही थी, उनमें सूक्ष्म कणों की गति प्रकाश की गति से बहुत धीमी थी और इसलिए उनकी व्याख्या और उनसे जुड़े प्रयोगों के लिए दिक्-काल की क्लासिकी अवधारणा काफ़ी थी। लेकिन कण-भौतिकी (पार्टिकल फ़िज़िक्स) के उद्भव और विकास के साथ ही सूक्ष्म जगत के अधिक ऊर्जावान रूपों से-प्रायः प्रकाश की गति के निकट की गति वाले सूक्ष्म कणों से वास्ता पड़ा तो गैर-सापेक्षिक क्वाण्टम यांत्रिकी की सीमाएँ सामने आ गईं। इस समस्या के समाधान के लिए विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के साथ क्वाण्टम यांत्रिकी के मेल के प्रयास 1928 में पॉल डिराक द्वारा एक 'क्वाण्टम फ़ील्ड थियरी' के रूप में सापेक्षिक क्वाण्टम यांत्रिकी विकसित करने के साथ शुरू हुए, जिन्हें 1949 में रिचर्ड फ़ाइनमैन, जूलियन श्विंगर और सिन इतिरो टोमोनागा के प्रयोगों ने तार्किक परिणति तक पहुँचाया।

लेकिन आइन्स्टीन के सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के साथ क्वाण्टम यांत्रिकी का मेल करा पाना अभी आज तक सम्भव नहीं हो पाया है। चूँकि सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त द्वारा प्रस्तुत गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्‍त ही आज का प्रमाणित गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्‍त है, अतः कहा जा सकता है कि अभी तक गुरुत्वाकर्षण का क्वाण्टम सिद्धान्‍त मौजूद नहीं है। यही आज की सैद्धान्तिक भौतिकी का केन्द्रीय एजेण्डा है। चूँकि इस सिद्धान्‍त के खोज लिए जाने के बाद प्रकृति के चार मूल बलों के एकीकरण का क्वाण्टम सिद्धान्‍त पूरा हो जाएगा, इसीलिए वैज्ञानिक इसे ''सबकुछ का सिद्धान्‍त'' (थियरी ऑफ़ एवरीथिंग) का नाम दे रहे हैं। क्वाण्टम यांत्रिकी के प्रति अपनी आशंकाओं-पूर्वाग्रहों के चलते आइन्स्टीन प्रिंसटन के उच्च अध्ययन संस्थान में काम करते हुए, गत शताब्दी के चौथे-पाँचवे दशक के दौरान भौतिकी की मुख्य धारा में काफ़ी हद तक अलग-थलग पड़ गए थे। गुरुत्वाकर्षण और विद्युत चुम्बकत्व के एकीकृत सिद्धान्‍त की खोज के उनके प्रयास तब सफ़ल नहीं हो सके थे, लेकिन यह उन्हीं का व्यापकतर विज़न था, जिसने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर अब तक की सैद्धान्तिक भौतिकी का एजेण्डा-सभी मूल बलों के एकीकरण के सिद्धान्‍त की खोज के रूप में तय किया है। निश्चित ही अपनी असफ़लताओं में भी आइन्स्टीन उतने ही महान थे।

आइन्स्टीन जीवन भर अविराम वैज्ञानिक शोध-कार्य में रत रहे। उन्होंने तीन सौ से भी अधिक शोध-निबन्ध लिखे, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। साथ ही दार्शनिक विषयों में भी उनकी रुचि उसी समय से थी, जब बारह वर्ष की उम्र में उनके पारिवारिक मित्र मैक्स तालमुद ने, जो एक दार्शनिक और गणितज्ञ थे, इम्मैनुअल काण्ट की कृति 'विशुद्ध तर्कणा की समालोचना' से उनका परिचय कराया था। प्राकृतिक परिघटनाओं के अध्ययन ने आइन्स्टीन की विश्व दृष्टि को क्रमशः ज्यादा से ज्यादा सुसंगत भौतिकवादी बनाने का काम किया था, लेकिन चूँकि सामाजिक अध्ययन और प्रयोग उनका मुख्य क्षेत्र नहीं था, इसलिए वह अपनी विश्व दृष्टि को राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में सुसंगत ढंग से लागू नहीं कर सके और समाजवाद तथा तत्कालीन सोवियत संघ के अन्तर्गत जनवाद और नौकरशाही के विशेषधिकारों को लेकर वह सदैव शंकालु रहे। लेकिन आनुभविक स्तर पर वह अंधराष्ट्रवाद, सैन्यवाद, फ़ासीवाद, साम्राज्यवादी युद्ध और हर तरह के नस्लवादी- रंगभेदवादी उत्पीड़न का जीवन पर्यन्त जमकर विरोध करते रहे और मानवाधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में लगातार दृढ़तापूर्वक आवाज़ बुलन्द करते रहे। उनका मानना था कि जब तक राष्ट्रों की सम्प्रभु सत्ताएँ बनी रहेंगी, तब तक दुनिया में युद्ध लाज़िमी तौर पर होते रहेंगे, इसलिए विश्व शान्ति और निश्शस्त्रीकरण के लिए उन्होंने एक विश्व सरकार की स्थापना का यूटोपियाई विकल्प प्रस्तुत किया और इसके लिए प्रयास भी किए, जिन्हें लाज़िमी तौर पर असफ़ल होना ही था। अपने जीवन के अन्तिम दशक में उनके विचारों में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे थे। मंदी, बेरोजगारी, भुखमरी, असमानता और युद्धों के साथ-साथ समाज में बढ़ते अलगाव का मूलभूत कारण वह पूँजीवादी उत्पादन एवं विनिमय प्रणाली की अराजकता में तथा मुनाफ़े की गलाकाटू प्रतिस्‍पर्धा में देखने लगे थे तथा यह मानने लगे थे कि इसका एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है। अपनी इन प्रस्थापनाओं को उन्होंने 1949 में 'समाजवाद ही क्यों?' नामक प्रसिद्ध लेख में प्रस्तुत किया जो पॉल स्वीज़ी द्वारा निकाली जाने वाली मार्क्सवादी पत्रिका, 'मंथली रिव्यू' के प्रवेशांक में प्रकाशित हुआ था। इससे भी पहले 1935-36 में 'विज्ञान और समाज़'  शीर्षक से अपने निबन्ध में उन्होंने लिखा था कि पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्थाओं के अन्तर्गत हर प्रौद्योगिक विकास अनिवार्यतः बेरोजगारी और आवर्ती संकटों को जन्म देता है तथा आधुनिक शस्त्र और संचार के साधन मिलकर शरीर और आत्मा को एक केन्द्रीय सत्ता का बन्धुआ बना देते हैं।

आइन्स्टीन केवल प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के प्राणी नहीं थे। कई शताब्दियों में पैदा होने वाला एक चिंतक-वैज्ञानिक होने के बावजूद वह रोज़मर्रे के सामाजिक-राजनीतिक जीवन की समस्याओं से गहरा सरोकार रखते थे। किताबी कीड़ों और अपने आविष्कारों की परिणतियों से असम्पृक्त वैज्ञानिकों की जमातों के वह कटु आलोचक थे। न्याय के पक्ष में जारी संघर्ष में वह उस समय से ही भागीदारी करते रहे, जब वह एक वैज्ञानिक के रूप में अपना जीवन शुरू कर रहे थे और गहनतम शोध के दौर से गुज़र रहे थे।

उनके जर्मनी छोड़कर स्विस नागरिक बनने के पीछे भी मूल कारण जर्मन सैन्यवाद का विरोध था। 1917 में उन्होंने जिस समय जर्मन सैन्यवाद के विरुद्ध जर्मन बुद्धिजीवियों के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया, उस समय वह वहाँ के 'कैसर विल्हेल्म सैद्धान्तिक भौतिकी संस्थान' के निदेशक थे। पहले विश्वयुद्ध में जर्मनी की भूमिका का मुखर विरोध करने के कारण बर्लिन पुलिस ने उनका नाम काली सूची में डाल रखा था। वह उन चार वैज्ञानिकों में से एक थे जिन्होंने युद्ध के विरुद्ध तथा युद्धों के उन्मूलन के लिए एक एकीकृत यूरोप की स्थापना के लिए जारी 'यूरोपीय लोगों के घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किया था। इसी उद्देश्य से गठित 'न्यू फ़ादरलैण्ड लीग़' की भी आइन्स्टीन ने सदस्यता ली थी। उन्होंने युद्ध की समाप्ति और जर्मनी में गणतंत्र की स्थापना का स्वागत किया और छात्रों की एक सभा में भाषण दिया, जिसके बाद, कम्युनिस्टों से मतभेदों के बावजूद, जर्मन पुलिस उन्हें रैडिकल समाजवादी मानने लगी थी।

1919 में विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय और जर्मन मजदूर आंदोलन के निर्मम दमन एवं बिखराव के बाद वहाँ फ़ासीवाद के विकास की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1933 में हिटलर के सत्तासीन होने के बाद अपनी पराकाष्ठा पर जा पहुँची। आइन्स्टीन इस दौरान फ़ासीवाद के युद्धोन्माद और नागरिक दमन का विरोध करते हुए लगातार शान्तिवाद और युद्धों की समाप्ति के लिए एक विश्व सरकार के पक्ष में प्रचार करते रहे। हालाँकि उनके द्वारा प्रस्तुत समाधान समस्या की जड़ साम्राज्यवाद और पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में न देख पाने के कारण अव्यावहारिक और काल्पनिक ही था, लेकिन फ़िर भी नात्सी सत्ता उन्हें वामपंथी और ''यहूदी देशद्रोही'' मानकर उनपर कड़ी नजर रखने लगी। उनके सिद्धान्तों को ''बोल्शेविक षड़यंत्र'' कहा जाने लगा। 1939 में, यहूदी आबादी के व्यापक दमन की चपेट में ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवी भी आने लगे थे। आइन्स्टीन (दुबारा) जर्मन नागरिकता छोड़कर 1933 से ही अमेरिका के प्रिंसटन स्थित उच्च अध्ययन संस्थ्शान में काम कर रहे थे। 1939 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ले ली। लेकिन वहाँ भी उनका दम घुटने लगा। उन्होंने देखा कि किस तरह अमेरिका ने स्पेन में गणतंत्रवादी शक्तियों को कुचलने में मदद की, फ़ासीवादी फ्रांको का समर्थन किया और सोवियत संघ के विरुद्ध षड़यंत्र किए। स्वयं अमेरिका के भीतर अश्वेत और लातिनी मूल के मज़दूरों व आम आदमी का दमन भी वहाँ के बुर्जुआ जनवाद की असलियत उघाड़ रहा था और आइन्स्टीन उसके विरुद्ध भी खुलकर आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन चूँकि वह फ़ासीवाद को पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मान रहे थे और जर्मनी द्वारा परमाणु बम के विकास का उन्हें अंदाजा हो गया था इसलिए परमाणु बम विकास परियोजना के पक्ष में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को एक पत्र लिखा। आइन्स्टीन इस बम को सिर्फ़ शक्ति सन्तुलन का एक साधन मानते थे, लेकिन फ़ासीवादी धुरी की पराजय आसन्न होने के बावजूद, पूरी दुनिया पर चौधराहट जमाने की नीयत से अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने की घटना से आइन्स्टीन एकदम विचलित हो गए। विश्व शान्ति की मुहिम में वह और भी अधिक जोर-शोर से सक्रिय हो गए, लेकिन साम्राज्यवाद के चरित्र के ज्यादा से ज्यादा नंगा होते जाने के साथ ही उनकी चिन्तन-प्रक्रिया में अब महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे थे और युद्धों तथा तमाम मानवीय आपदाओं की जड़ अब वह पूँजीवादी प्रणाली में देखने लगे थे। हालाँकि सोवियत संघ के बारे में उनकी शंकाएँ थीं और समाजवादी संक्रमण की प्रकृति एवं समस्याओं का अध्ययन नहीं होने के कारण वह समाजवाद के अन्तर्गत नौकरशाही के निरंकुश अधिकार सम्पन्न होने के बारे में चिन्तित रहते थे, फ़िर भी पाँचवे दशक के उत्तरार्द्ध तक वह मानने लगे थे कि पूँजीवाद का एकमात्र तार्किक और सम्भव विकल्प समाजवाद ही है।

यह शीतयुद्ध का दौर था जब अमेरिका कम्युनिज़्म-विरोध के कुख्यात मैकार्थीवादी उन्माद की गिरफ़्त में था। तमाम ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवियों तक को वामपंथी होने के आरोप में गिरफ़्तार किया जा रहा था, तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा था और गायब तक करवा दिया जा रहा था। आइन्स्टीन पर भी निगाह थी, लेकिन वह निर्भीकतापूर्वक वामपंथियों के दमन के विरुद्ध तथा अश्वेतों और आम आबादी के नागरिक आज़ादी के लिए आवाज़ उठा रहे थे और अमेरिकी आक्रामक सैन्यवाद की निन्दा भी कर रहे थे। जूलियस और इथेल रोज़ेनबर्ग नामक वैज्ञानिक दम्पति को वामपंथी होने के कारण जब सोवियत जासूस बता कर फ़ाँसी की सज़ा दी गई तो आइन्स्टीन ने इसका जमकर विरोध किया था। उन्होंने तमाम बुद्धिजीवियों का आह्वान किया कि वे मैकार्थी की 'आन्तरिक सुरक्षा समिति' के सामने गवाही देने के लिए न जाएँ। आइन्स्टीन फ़ासीवाद और विश्वयुद्ध के दौर में यहूदियों के अभूतपूर्व नरसंहारों से अन्दर तक विचलित थे और इज़राइल में एक यहूदी होमलैण्ड के निर्माण के प्रबल समर्थक थे, लेकिन वह एक अविभाजित फ़िलिस्तीन में अरबों-यहूदियों के सहअस्तित्व के समर्थक थे और इसकी विफलता के पीछे साम्राज्यवादियों की 'बाँटो और राज करो' की नीति को मुख्य कारण मानते थे।

अप्रैल, 1955 में अपनी मृत्यु के समय तक आइन्स्टीन अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवादियों के लिए अपने विचारों के चलते लगातार परेशानी का सबब बने रहे। अपनी विश्वव्यापी प्रसिद्धि और लोकप्रियता के चलते ही शायद वह जेल और यंत्रणा से बचे रह सके। यह वर्ष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त का शताब्दी वर्ष होने के साथ ही आइन्स्टीन का पचासवाँ पुण्य तिथि वर्ष भी है। उनका जीवन हमें लगातार अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रह कर निर्भीक आचरण करने और अपने बौद्धिक कार्यों को लगातार सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की शिक्षा देता है।

आखिर क्या कारण था जो आइन्स्टीन को लगातार धारा के विरुद्ध खड़े होकर और अधिकारी-सत्ताधारी जमातों के बीच अलोकप्रिय बनकर भी अपनी मान्यताओं पर डटे रहने और निर्भीकतापूर्वक न्याय और जनता के पक्ष में आवाज़ उठाते रहने के लिए प्रेरित करता था? शायद उनकी वैज्ञानिक स्पिरिट का मानवीय दायरों तक विस्तार ही वह मूल कारण था, जैसा कि बीसवीं शताब्दी में विज्ञान के अन्य शिखिर पुरुष नील्स बोर ने उनके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा था: ''आइन्स्टीन के अवदान केवल विज्ञान के दायरे तक ही सीमित नहीं हैं। हमारे सबसे बुनियादी और अभ्यस्त अभिधारणाओं तक में से अब तक अदृष्ट अभिधारणाओं को देख लेने की उनकी प्रवृत्ति सभी लोगों को प्रत्येक राष्ट्रीय संस्कृति में अन्तर्निहित, गहराई से जड़ जमाए पूर्वाग्रहों और आत्म सन्तुष्टियों की शिनाख़्त करने और उनके विरुद्ध संघर्ष करने के लिए एक नया प्रोत्साहन देती है।'' आज भारत के युवाओं को भी इस नए प्रोत्साहन की सख़्त ज़रूरत है और शायद सबसे अधिक ज़रूरत है।

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प्रस्‍तुति - Uniting Working Class

Friday, 1 March 2024

एमएसपी मुद्दे पर एसकेएम पत्रक 3

*एमएसपी मुद्दे पर एसकेएम पत्रक 3* 

 *एमएसपी पर बहस - भाजपा के दोहरे रुख की निंदा करें* 

 *कानूनी रूप से सुनिश्चित खरीद की किसानों की मांग जायज है* 

 *एमएसपी गारंटी का मतलब यह नहीं है कि सरकार को सभी फसलें खरीदनी होंगी* 

 *स्रकार को कॉरपोरेट और किसान के बीच राजनीतिक चयन करना होगा* 

भारत सरकार केवल 23 फसलों के लिए एमएसपी प्रदान करती है और इस मूल्य पर खरीद की गारंटी नहीं करती है। गेहूं और धान के लिए पंजाब, हरियाणा, म.प्र. और उ.प्र. में कुछ मंडियां मौजूद हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और अन्य राज्यों में धान की कुछ सरकारी खरीद होती। भारतीय कपास प्राधिकरण द्वारा विभिन्न प्रकार से कपास की खरीद की जाती है। सरकारी तौल केंद्रों के माध्यम से मिलों में बिक्री से गन्ने की कीमत का आश्वस्त की जाती है। नाफेद कुछ दालें खरीदता है। खरीद एक समान नहीं है, उदाहरण के लिए, सरकार अपने गेहूं का 70% केवल पंजाब और म.प्र. से खरीदती है, जो पंजाब के उत्पादन का 70% और म.प्र. के उत्पादन का 35% है, लेकिन उ.प्र. के उत्पादन का केवल 15% सरकारी द्वारा खरीदा जाता है।

इसका नतीजा यह हुआ कि धान का एमएसपी जो 2023 में 2183 रुपये प्रति क्विंटल था, बिहार और पूर्वी उ.प्र. में व्यवसाईयों द्वारा 1200 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत तक खरीदा गया, क्योंकि वहां कोई सरकारी खरीद नहीं है। इसी तरह, 2023-24 के लिए गेहूं का एमएसपी 2125 रुपये था, और कई क्षेत्रों में 1800 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदा गया था। इसके अलावा 2 साल पहले मक्के का एमएसपी 1900 रुपये प्रति क्विंटल था और 1100 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका। कीमत में यह गिरावट इसलिए आती है क्योंकि खरीद की कोई गारंटी नहीं है। एमएसपी बाजार में मौलिक दर निर्धारित कर देता है और कॉर्पोरेट व्यापारिक कंपनियों से जुड़े बिचौलिए बाजार पर राज करते हैं क्योंकि किसानों के पास रखने और भंडारण करने की क्षमता नहीं होती है, जिससे उन्हें संकटग्रस्त बिक्री करनी पड़ती है। बिहार से खरीदा गया धान पंजाब और हरियाणा में एमएसपी दर पर बेचे जाने और प्रति क्विंटल लगभग 800 रुपये से अधिक का लाभ मिलने की घटनाएं ज्ञात हैं। इसलिए सभी राज्यों में मंडियों की स्थापना की मांग की गयी है।

मंडियों में अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार, 100 रुपये प्रति क्विंटल की वसूली और 40 रुपये प्रति क्विंटल का वजन शुल्क एक और मुद्दा है।

 *स्वामीनाथन फार्मूले के अनुसार सी - 2+50% का न्यूनतम समर्थन मूल्य:* 

भाजपा 2014 में किए गए अपने चुनावी वादे से पीछे हटकर किसानों को धोखा दे रही है। 2023-24 के लिए घोषित गेहूं और धान का एमएसपी 2125 रुपये प्रति क्विंटल और 2183 रुपये प्रति क्विंटल था। क्रमशः इसकी गणना ए - 2 + एफ एल लागत पर की गई थी। ए - 2 भुगतान लागत है, यानी, किसान बीज और सिंचाई सहित अन्य लागत के लिए कितना भुगतान करता है। एफ एल प्रति सीजन केवल 8 दिनों के काम के लिए पारिवारिक श्रम की अनुमानित लागत है। सी - 2, ये व्यापक लागत है जिसमें भूमि किराया, ट्रैक्टर सहित कृषि उपकरणों का मूल्यह्रास, पूर्ण श्रम लागत और निवेशित पूंजी पर ब्याज भी शामिल करता है। आम तौर पर कहें तो इससे लागत में लगभग 25-30% का इजाफा हो जाएगा। सी - 2+50% पर घोषित एमएसपी तदनुसार बढ़ जाएगा, यानी, गेहूं के लिए 2762 रुपये/क्विंटल और धान के लिए 2838 रुपये/क्विंटल।

भारत सरकार अब दुर्भावनापूर्वक तर्क दे रही है कि यह संभव नहीं है। लेकिन 2023 के राज्य चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना के लोगों से भाजपा और कांग्रेस द्वारा किए गए वादों को देखें। भाजपा ने धान के लिए 3100 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया, जबकि कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में 3200 रुपये और मध्य प्रदेश में चावल के लिए 2500 रुपये का वादा किया। भाजपा ने राजस्थान और म.प्र. में गेहूं के लिए 2700 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया था, जबकि कांग्रेस ने 2600 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया था। ये वादे किसानों की मांग के करीब हैं और उससे भी ज्यादा। स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल जानते हैं कि सही एमएसपी क्या होना चाहिए, लेकिन भाजपा जानबूझकर किसानों को धोखा दे रही है और देश को बेवकूफ बना रही है।

 *सरकार झूठ बोल रही है कि अगर सभी फसलों के लिए एमएसपी दिया जाता है तो सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा*

सरकार लोगों से स्पष्ट रूप से झूठ बोल रही है कि सुनिश्चित खरीद के साथ सभी फसलों के लिए एमएसपी के लिए उस पर बोझ लगभग 10 से 17 लाख करोड़ रुपये होगा। यदि सरकार सभी कृषि उपज की एकमात्र व्यापारी बन जाती है तो निश्चित तौर पर यह लागत बहुत अधिक होगी। सरकारी को सभी उपज नहीं खरीदना होगा, इतनी उपज खरीद कर यह करेगी क्या? सभी कृषि वस्तुओं का विशाल हिस्सा खुले बाजार में कारोबार किया जाता है, जिसका उपभोग कंपनियां लागत के रूप में या आम लोगों द्वारा उपभोग किया जाता है। लगभग 70% से अधिक गेहूं, चावल और अनाज खुले बाजार में बेचे जाते हैं, दालों और तिलहन के लिए यह 90% से अधिक है और अगर हम सहकारी व सरकारी मिलों को स्वतंत्र उद्यम मान लें तो गन्ना, सब्जियां, फल, डेयरी, मुर्गीपालन, मछली की बिक्री 100% के करीब है। इसलिए कृषि उपज का बड़ा हिस्सा बाजार में ही खपता है। एमएसपी गारंटी का मतलब यह नहीं है कि सरकार को सभी फसलें खरीदनी होंगी। 

 *एमएसपी और गारंटीकृत खरीद की भूमिका कीमतों को स्थिर करना है* 

यदि बाजार मूल्य एमएसपी से ऊपर चला जाता है, तो सरकार पर कोई बोझ नहीं पड़ता है। यदि यह एमएसपी से नीचे आता है, तो यह कम मांग और अधिक आपूर्ति के कारण होता है। केवल ऐसे मामलों में सरकार को अतिरिक्त स्टॉक को तुरंत खरीदकर इस हद तक हस्तक्षेप करना होगा कि आपूर्ति मांग से नीचे आ जाए, उदाहरण के लिए, यदि कुल दालों की मांग 30 लाख टन है और आपूर्ति 35 लाख टन है, सरकार को बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए एमएसपी पर केवल 7 लाख टन की खरीद करनी होगी। हाल के क्रिसिल द्वारा किये गये विश्लेषण में 2023 के लिए केवल 23 फसलों का आंकड़ा 21,000 करोड़ रुपये रखा है! भविष्य के कारोबार, ब्रांडिंग और कार्टेल गठन जैसे बाजार में हेरफेर के कारण मूल्य में गिरावट की स्थिति में, ऐसी गलत प्रथाओं को नियंत्रित और प्रतिबंधित करना सरकार की जिम्मेदारी है।

एक योग्य एमएसपी बाजार में मौलिक मूल्य को बढ़ा देता है और व्यापारिक बेईमानी को रोकता है। मुख्य घाटे में बड़े व्यापारी और कॉरपोरेट होंगे। जाहिर है, सरकार को कंपनियों और किसानों के बीच राजनीतिक चयन करना होगा।

 *सी 2+50% का एमएसपी से भोजन महंगा होने का तर्क गलत ह; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के खर्च का बोझ; लागत के मूल्य सस्ते करने से दिए खाद्य कीमतें घटेंगी।* 

खेती पर खर्च, लागत सामग्री, श्रम और सेवाओं की कीमत पर निर्भर करती है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक, पंपिंग सेट, ट्रैक्टर/उपकरण, डीजल और बिजली बेचने वाली कंपनियां पूर्व निर्धारित कीमतों पर बेचकर अप्रत्याशित लाभ कमाती हैं। सरकार कृषि उपकरणों पर 28% का उच्चतम जीएसटी भी वसूलती है। यदि ये लागत कम हो जाती है तो किसानों और लोगों, दोनों को आसानी होगी और C - 2+50% मूल्य भी घट जाएगा। सरकार यह जानती है, इसीलिए 2023 में बीजेपी ने तेलंगाना के किसानों को 18,000 रुपये प्रति एकड़ उर्वरक सब्सिडी देने का वादा किया और कांग्रेस ने 15,000 रुपये प्रति एकड़ के साथ-साथ प्रत्येक भूमिहीन परिवार को 12,000 रुपये देने का वादा किया।

सस्ते भोजन का खाद्य सब्सिडी और राशन वितरण कल्याण योजना से भी गहरा संबंध है। 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक के इस खर्च को किसानों की सब्सिडी के रूप में गिनना गलत और शरारतपूर्ण है। यह उपभोक्ताओं के लिए खाद्य सब्सिडी है, किसानों के लिए नहीं। यह सामाजिक कल्याण आवश्यकताओं के साथ-साथ मजदूरों के वेतन को कम रखने की कॉर्पोरेट आवश्यकताओं को पूरा करता है। भोजन की ऊंची लागत से वेतन में भारी वृद्धि होगी। सरकार द्वारा आम लोगों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी पूरी न करना और इसकी जगह किसानों द्वारा उठायी जा रही लाभदायक उत्पादन की मांग कि विपरी तर्क देना बेहद अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण है। वह खाद्यान्न सस्ता रखने का बोझ किसानों पर नहीं डाल सकती।

एसकेएम लगातार लागत सामग्री के दाम घटाने, जीएसटी को समाप्त करने और खेती के लिए मुफ्त बिजली व ग्रामीण घरों और दुकानों के लिए 300 यूनिट मुफ्त बिजली के साथ-साथ प्री-पेड मीटर पर प्रतिबंध की मांग करता रहा है।

 *एमएसपी के खिलाफ कॉर्पोरेट समर्थक अर्थशास्त्रियों के पक्ष:* 

 सरकारी निकायों ने तर्क दिया है कि एमएसपी से केवल 8.8% किसानों को लाभ होता है, इसलिए इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। स्पष्टतः इस तर्क का अर्थ यह है कि एमएसपी को इसलिए समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि 91.2% किसानों को इसका फायदा नहीं मिलता है, यानी अस्पतालों में सभी मुफ्त इलाज इसलिए बंद कर देना चाहिए क्योंकि ज्यादातर लोगों को यह नहीं मिल सकता है।

इसी तरह, उनका कहना है कि एमएसपी केवल 2 फसलों के लिए प्रभावी है, अन्य किसानों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। वे गलत हैं। आज पूरा देश अपनी उपज के लिए एमएसपी की मांग कर रहा है।

उनका यह भी तर्क है कि जहां अनाज एमएसपी के साथ केवल 1 से 2% की दर से बढ़ रहा है, वहीं एमएसपी के बिना पूरे दुग्ध क्षेत्र की वृद्धि 5% से अधिक, मत्स्य पालन 7% से अधिक और मुर्गीपालन 8% से अधिक है। इसका मतलब यह नहीं है कि ये क्षेत्र किसानों के लिए लाभदायक हैं। अनाज भारी घाटे पर इसलिए भी उगाया जाता है क्योंकि भोजन का कोई विकल्प नहीं है। इन विशेषज्ञों का दृष्टिकोण खाद्य उत्पादन में कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी का है।

 *फसल विविधीकरण के लिए सरकार का प्रस्ताव:* 

हाल ही में सरकार ने कुछ पूर्व शर्तों के साथ 5 फसलों, उड़द, मसूर, अरहर, मक्का और कपास की गारंटीकृत खरीद के साथ फसल विविधीकरण का प्रस्ताव दिया है। पारिस्थितिकी को बचाने, पर्यावरण और कई क्षेत्रों में जल स्तर को सुरक्षित रखने के लिए फसल विविधीकरण एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब सरकार वास्तव में सभी किसानों को समान स्तर पर कमाई करने में सक्षम बनाने के लिए सभी फसलों के लिए उचित एमएसपी की गारंटी दे। सरकार की सशर्त पेशकश और वह भी कुछ फसलों के लिए, समस्या का समाधान नहीं करती।

 *किसानों की आय बढ़ाना:*

 एमएसपी पर पूरी बहस किसानों की आय बढ़ाने और खेती करने वाले लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाकर भारतीय बाजारों को फिर से जीवंत करने के बारे में है, जो खरीददारों का 50ः से अधिक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य ऑनलाइन सेवाओं की बढ़ती लागत के कारण किसान और उनके बच्चे केवल कृषि आय पर जीवित नहीं रह सकते। 2.15 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (सितंबर 2022) की गरीबी रेखा के प्रति व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय व्यय मानकों पर, किसानों को प्रति व्यक्ति प्रति माह कम से कम 5,500 रुपये या प्रति परिवार 27,500 रुपये कमाना चाहिए।

इसलिए, किसानों को जीवित रहने के लिए कुछ अतिरिक्त आय का आश्वासन देना होगा। यह तभी आ सकता है जब सहकारी समितियों और सरकारी समर्थन संरचना द्वारा सभी कृषि वस्तुओं का प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन किसानों के बच्चों द्वारा किया जा सके। यह वही मुख्य क्षेत्र है, जिसमें ''कंपनियों द्वारा फसल कटाई परान्त निवेश'' को सरकार लक्षित कर रही है और जिस पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े निगमों की नजर है। वर्तमान में यह प्रति वर्ष 30,000 करोड़ रुपये का बाजार है, इसके कुछ वर्षों में 2.1 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ने की उम्मीद है। इस बाजार को निजी बड़ी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से बचाया जाना चाहिए। इससे खरीद पर सरकार का बोझ भी कम होगा। किसानों की बढ़ी हुई आय निश्चित रूप से भारतीय बाजारों का कायाकल्प करेगी।

 *संक्षेप में, सरकार को सभी फसलों के लिए ब्2़50ः पर एमएसपी घोषित करके और पूरे भारत में समान रूप से खरीद केंद्र स्थापित करके अपने किसानों का समर्थन करना चाहिए। दुनिया भर में सभी विकसित देश अपनी खेती पर भारी सब्सिडी देते हैं। और भारत में, जब सत्तारूढ़ दल चुनाव से पहले घोषणाएं कर रहे हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।* 

 *(अंत)*

मोदी बने देश को सबसे ज्यादा कर्ज में डुबाने वाले पहले प्रधानमंत्री*


*मोदी बने देश को सबसे ज्यादा कर्ज में डुबाने वाले पहले प्रधानमंत्री*

नरेन्द्र मोदी अब तक के सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले प्रधानमंत्री हैं। ये कांग्रेसियों या वामपंथियों के IT सेल की रिपोर्ट नहीं, बल्कि विश्व बैंक की रिपोर्ट है जो World Bank की Official Website पर उपलब्ध है....
सोशल मीडिया पर यह मिथ्या ख़बर पिछले 4 महीनों से फैलाई जा रही है कि हमारी सरकार बिना विश्व बैंक से लोन लिए ऐतिहासिक विकास कर रही है...

ये भ्रम से बाहर आकर यह जानने का वक़्त है, कि नरेन्द्र मोदी अब तक के सबसे ज्यादा विदेशी कर्ज लेने वाले प्रधानमंत्री हैं। ये कांग्रेसियों या वामपंथियों के IT सेल का रिपोर्ट नहीं, बल्कि विश्व बैंक का रिपोर्ट है जो World Bank की Official Website पर उपलब्ध है।

बीजेपी आईटी सेल के द्वारा फैलाये गए भ्रामक ख़बरों के आधार पर प्रधानमंत्री समर्थकों द्वारा बुलंद आवाज में सामान्य लोगों के बीच इस भ्रम को और भी विस्तार से फैलाया जाता रहा है कि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने शासन की बागडोर संभालने के बाद से वर्ष 2015, 2016 एवं 2017 तक विश्व बैंक से एक रुपये का भी कर्ज नहीं लिया है।

सोशल मीडिया पर यह मिथ्या ख़बर पिछले 4 महीनों से फैलाई जा रही है कि हमारी सरकार बिना विश्व बैंक से लोन लिए ऐतिहासिक विकास कर रही है। लेकिन हकीकत ये है कि भारत जैसे अर्थव्यस्था का पूर्णतः स्वाबलंबी हो पाना असंभव है, खासकर ऐसी स्थिति में जब डालर के मुकाबले रुपये के मूल्य निरंतर गिरते रहे हैं।

बाजार में प्रति बैरल तेल के दाम की तुलना में भारत में तेल के मूल्य में निरंतर वृद्धि हो रही है और सर्वाधिक महत्वपूर्ण ये है कि भारतीय निर्यात इसके आयात के मुकाबले कम ही रही है। यह भी सत्य है कि भारत जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था है, और स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक सामाजिक संरचना, रक्षा, वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक विकास के क्षेत्र में जिन किन्ही परेशानियों से जूझ रहा उसमे पूंजी की कमी सर्वाधिक ध्यान देने योग्य है।

ऐसे में विश्व बैंक, IBRD, IDA, एसियन डेवलपमेंट बैंक सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों पर इसका निर्भर होना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। चाहे सरकार या तंत्र किसी के भी हाथ में हो मगर इसके निरूपण, संचालन, रखरखाव व राजकोषीय कमी को पूरा करने के लिए ऐसे संस्थानों पर निर्भरता बेहद स्वाभाविक हो जाता है।

*हास्यास्पद ये है कि आम जनता को जागरूक बनाने की बजाय सत्ताधारी दल के समर्थकों द्वारा बढ़ चढ़ कर यह अवांछित व झूठी ख़बरों को व्हाट्सएप, ट्वीटर व फेसबुक यूनिवर्सिटी पर धड़ल्ले से परोसा जा रहा है, ताकि आम जनता को लुभा सके। सत्ता की भूख ने नैतिकता को इतना बेबस कर दिया कि राजनेता से लेकर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता इन्ही ख़बरों के सहारे वोट बटोरने की जुगत में लगे हैं।*

मीडिया में बीजेपी समर्थकों से लेकर टेलीविजन स्क्रीन पर बैठे प्रवक्ताओं द्वारा लगातार हर विफलताओं के लिए कांग्रेस को कोसे जाने क्रम से आप भी अवगत हैं। एक भी सवाल जो सत्ताधारी दल के योजनाओं व कार्यों को लेकर इनके समक्ष खड़े किए जाते हैं उसका जवाब कांग्रेस के नाम का सहारा लिए बगैर संभव नही हो पाता या फिर सवाल की दिशा बदल दिए जाते हैं।

*आए दिनों यत्र-तत्र व्हाट्सएप व फेसबुक जैसे प्लेटफोर्म पर यह ख़बरें खुमते हुए पायी जा रही है कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने विश्व बैंक से कर्जा लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था को दवाब में ला खडा किया है। यही नहीं साथ में यह भी कि नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने विश्व बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया है। लेकिन जब इसकी पड़ताल की, तो पता चला कि इस अफवाह के पीछे का सच कुछ और ही है।*

बैंक की वेबसाइट पर साफ तौर पर लिखा गया है कि भारत और विश्व बैंक के बीच इसी साल 2 फरवरी 2018 को एक करार हुआ है। इसके तहत विश्व बैंक ने भारत को वाराणसी से हल्दिया के बीच 1360 किमी का जलमार्ग बनाने के लिए 375 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया है।

इस करार पर भारत की ओर से इनलैंड वॉटरवेज अथॉरिटी के वाइस चेयरमैन प्रवीर पांडेय, भारत सरकार वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के जॉइंट सेक्रेटरी समीर कुमार खरे, और भारत में विश्व बैंक के डायरेक्टर जुनैद अहमद ने हस्ताक्षर किए हैं।

गौरतलब यह है कि साल 2013 में भारत पर कूल विदेशी कर्ज का भार 409.4 अरब डॉलर (GDP का 11.1 %) था जो 2014 में बढ़ कर 446.2 अरब डॉलर (GDP का 10.4 %) तथा 2015 में 474.7 अरब डॉलर (GDP का 8.8 %) हो गई और आगे यही भार प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में मार्च 2018 में 529 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया जिससे भारत का कूल विदेशी कर्ज में 12.4 % की वृद्दि दर्ज की गई।

यह अब तक की सर्वाधिक सालाना वृद्धि है। यही नहीं यह भार इतनी अधिक हो गई कि GDP का 20.9 % के बराबर पहुच गयी है। ऐसे में इस साल GDP में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि के जो आकड़े देश के सामने प्रस्तुत करके भ्रम फैलाए गए हैं यह भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का कितना विकृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हमें यह समझने की जरुरत है सरकार GDP के आंकिक आंकड़े की आड़ में अपनी तमाम आर्थिक विफलताओं को ढकने की कोशिश कर रही।

उपलब्ध आंकड़े के आधार पर यह बात सामने आती है कि स्किल इंडिया, स्वच्छ भारत, गंगा की सफाई, प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) शिक्षा, ऊर्जा क्षेत्र आदि के विकास के नाम पर अकेले प्रधानमंत्री मोदी ने तक़रीबन 78 अरब डॉलर का कर्ज अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से 2014 से 2018 के बीच लिया है। वर्ल्ड बैक के ही रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ल्ड बैंक एवं IBRD जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से विश्व में सर्वाधिक लोन लेने वाला देश के रूप में अपनी पहचान रखता है।

ट्वीटर पर जून 2018 को sagarika4india द्वारा संचालित ट्वीटर अकाउंट द्वारा जो गलत सुचना शेयर किया गया था कि भारत के 70 सालों के इतिहास में केवल 3 साल ऐसे हैं जब भारत ने वर्ल्ड बैंक से कर्ज नहीं लिया है 2015, 2016, 2017. इस पर हजारों लाइक्स और रिट्विट हुए जिसमें प्रधानमंत्री को हीरो बताया गया।

यही नही 2 जून को यह फेसबुक के राजनीति नामक पेज पर पोस्ट किया गया, जिसे 25,000 से ज्यादा लोगों ने शेयर किया। और फिर वहां से बीजेपी IT सेल द्वारा सक्रियता से इस झूठी खबर को आम जनता तक सोशल मीडिया के माध्यम से पहुचाया जाने लगा। बाद में Zee News Fan Group द्वारा भी यह ख़बरें खूब फैलाई गई। इस खबर की सत्यता को जांचे परखे बगैर आम जनता के बीच ये धारणा बनने लगी की मोदी ने सच में बीते 3 वर्षों में वर्ल्ड बैक से एक भी पैसा कर्ज स्वरूप नहीं लिया।

मगर सत्य कितना भयावह है कि इस दौरान ही सरकार ने 96.56 अरब डॉलर (6952.32 अरब) का विशाल कर्ज लिया। यह बेहद आश्चर्य पैदा करता है कि हम शिक्षित समाज का हिस्सा होने के बावजूद भी बर्बाद को आबाद पढने लगे हैं।

2018 में लिए गए लोन के अलावा मोदी सरकार ने विश्व बैंक से जिन प्रमुख मुद्दों को परोस कर लोन लिया है उनका विवरण निम्नवत हैं :

लोन लेने की तिथि लोन लेने के उद्देश्य लोन का आकार

23 जनवरी 2018 उत्तराखंड में जल आपूर्ति 120 मिलियन डॉलर (8 अरब)

31 जनवरी 2018 तमिलनाडु के गांवों के हालत सुधार 100 मिलियन डॉलर (6.5 अरब रु)

24 अप्रैल 2018 म.प्र. के गांवों की सड़कें दुरुस्त करना 210 मिलियन डॉलर (करीब 14 अरब रु)

अप्रैल 2018 दवाई बनाने व गुणवत्ता में सुधार हेतु 125 मिलियन डॉलर (8 अरब 36 करोड़ रु)

8 मई 2018 राष्ट्रीय कुपोषण मिशन के लिए 200 मिलियन डॉलर (13.5 अरब रु)

29 मई 2018 राजस्थान के लिए 21.7 मिलियन डॉलर (1.5 अरब रु)

स्रोत : वर्ल्ड बैंक विभिन्न दस्तावेज, फाइनेंसियल 365

इसके अतिरिक्त अगर पिछले साल की बात करें तो उनमें कुछ चुनिंदा लोन में भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश में टूरिजम को विकसित करने के लिए 40 मिलियन डॉलर (2 अरब 67 करोड़ रुपये) का कर्ज, 21 नवंबर 2017 को सोलर पार्क प्रोजेक्ट के लिए 100 मिलियन डॉलर (6.5 अरब रुपये) का कर्ज, 31 अक्टूबर 2017 को असम में ग्रामीण परिवहन के लिए 200 मिलियन डॉलर (13.5 अरब रुपये) का कर्ज, 30 जून 2017 को नेशनल बायोफार्मा मिशन के लिए 125 मिलियन डॉलर (8 अरब 36 करोड़ रुपये) का कर्ज आदि सम्मिलित हैं, जो बीजेपी IT सेल व समर्थकों सहित आम जनता की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है।

यही नहीं, गंगा नदी जिसकी सफाई के लिए भारत अब तक विश्व बैंक से हजारों करोड़ रुपये का लोन ले चुका है। विश्व बैंक से कर्ज लेना सरकार की विफलता या कमजोरी नही कहा जा सकता मगर, झूठी ख़बरों को प्रचारित प्रसारित कर वास्तविक स्थिति से लोगों का ध्यान हटाने का यह प्रयास सरकार की तमाम विफलताओं की तरफ इशारा करती है इसमें कोई संशय नहीं।

हालांकि मात्र 3 वर्षों में अगर इतनी बड़ी मात्रा में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से लों लिए गए तो इसका हिसाब कहाँ, और काम कितना हुआ है ये आप तय कीजिये। और अगर काम नही हो सके हैं तो आखिर ये लोन के पैसे गए कहाँ ? याद रखिये इसे अंततः भारत को ही चुकाने हैं।