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Tuesday, 10 May 2022

कामरेड कैफ़ी आज़मी★ को उनके स्मृति दिवस पर लाल सलाम!

आज मशहूर शायर व गीतकार, पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, वामपंथी विचारधारा से लैश एक सच्चे कम्युनिस्ट, प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों मे से एक ★कामरेड कैफ़ी आज़मी★ को उनके स्मृति दिवस पर लाल सलाम!
     हम उनकी एक प्रसिद्ध कविता ★दूसरा वनवास★ से उनको याद करते हैं-
 
               ★दूसरा वनवास★
                  
राम बनवास से जब लौटकर घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये

धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन
घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आये

पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आये वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे।

Monday, 9 May 2022

पाकिस्तानी उर्दू लेखक और व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद युसूफी के हास्य और व्यंग्य

हिन्दुस्तान में जन्मे जाने-माने पाकिस्तानी उर्दू लेखक और व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद युसूफी हास्य और व्यंग्य के ग़ालिब माने जाते थे। आइये, उनकी कुछ व्यंग्यभरी वनलाइनर्स पर नज़र डालें :


"इस्लाम के लिये सबसे ज़्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है।"


"मर्द की आंख, और औरत की ज़ुबां का दम सब से आख़िर में निकलता है।"


"इस्लामिक वर्ल्ड में आज तक कोई बकरा नेचुरल डेथ नहीं मरा।"


"दुश्मनी के लिहाज़ से दुश्मनों के तीन दर्ज़े होते हैं... दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।"


"आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो ज़िन्दगीभर प्रोफेसर ही रहता है... चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।"


"उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं, कि गर मुख़्तलिफ़ जीन्स (opposite sex) आमने-सामने हो जायें... तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती।"


"वो ज़हर दे के मारती तो दुनिया की नज़र में आ जाती, अंदाज़-ए-क़त्ल तो देखो...हमसे शादी कर ली।"


"दुनिया में ग़ालिब वो अकेला शायर है... जो समझ में ना आया तो दुगना मज़ा देता है।"


"कुछ लोग इतने मज़हबी होते हैं... कि जूता पसंद करने के लिये भी मस्ज़िद का रुख़ करते हैं।"


"मेरा तआल्लुक उस भोली-भाली नस्ल से है... जो ये समझती है कि बच्चे बुज़ुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।"


"हमारे ज़माने में तरबूज़ इस तरह खरीदा जाता था, जैसे आजकल शादी होती है... सिर्फ सूरत देखकर।"


"सिर्फ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाकी 1 प्रतिशत भी बदनाम हैं।"


"हुकूमतों के अलावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक्की से खुश नहीं होता।"


"फूल जो कुछ ज़मीं से लेते हैं... उससे कहीं ज़्यादा लौटा देते हैं।"


"हमारे मुल्क की अफ़वाहों की सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि वो सच निकलती हैं।"

Salman Arshad जी की वॉल से
वाया Kanupriya जी

Comrade R. B. More

Above article on Comrade R. B. More published in C P I Weekly New Age in current issue. On occasion of Com R. B. More death anniversary, which is on 11 May.

मुंबई की झोपड़पट्टी से जेएनयू तक का सफ़र...


अब जेएनयू से अमेरिका का सफ़र...
मेरा अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों में चयन हुआ है यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वाशिंग्टन मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया को वरीयता दी है। मुझे इस यूनिवर्सिटी ने मेरी मेरिट और अकादमिक रिकॉर्ड के आधार पर अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित फ़ेलोशिप में से एक 'चांसलर फ़ेलोशिप' दी है।
 
मुंबई की झोपड़पट्टी, जेएनयू , कैलिफ़ोर्निया, चांसलर फ़ेलोशिप,अमेरिका और हिंदी साहित्य... कुछ सफ़र के अंत में  हम भावुक हो उठते हैं क्योंकि ये ऐसा सफ़र है जहाँ मंजिल की चाह से अधिक उसके साथ की चाह अधिक सुकून देती हैं। हो सकता है आपको यह कहानी अविश्वसनीय लगे लेकिन यह मेरी कहानी है मेरी अपनी कहानी। मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से हूँ लेकिन मेरा जन्म और मेरी परवरिश मुंबई में हुयी। मैं भारत के जिस वंचित समाज से आई हूँ वह भारत के करोड़ो लोगो की नियति है लेकिन आज यह एक सफल कहानी इसलिए बन पाई है क्योंकि मैं यहाँ तक पहुंची हूँ। जब आप किसी अंधकारमय समाज में पैदा होते हैं तो उम्मीद की वह मध्यम रौशनी जो दूर से रह -रहकर आपके जीवन में टिमटिमाती रहती है वही आपका सहारा बनती है। मैं भी उसी टिमटिमाती हुयी शिक्षा रूपी रौशनी के पीछे चल पड़ी। मैं ऐसे समाज में पैदा हुयी जहाँ भुखमरी, हिंसा, अपराध, गरीबी और व्यवस्था का अत्याचार हमारे जीवन का सामान्य हिस्सा था। हमें कीड़े-मकोड़ो के अतिरिक्त कुछ नही समझा जाता था, ऐसे समाज में मेरी उम्मीद थे मेरे माता-पिता और मेरी पढाई। मेरे पिताजी मुंबई के सिग्नल्स पर खड़े होकर फूल बेचते हैं। मैं आज भी जब दिल्ली के सिग्नल्स पर गरीब बच्चों को गाड़ी के पीछे भागते हुए कुछ बेचते हुए देखती हूँ तो मुझे मेरा बचपन याद आता और मन में यह सवाल उठता है कि क्या ये बच्चे कभी पढ़ पाएंगे? इनका आनेवाला भविष्य कैसा होगा? जब हम सब भाई- बहन त्यौहारों पर पापा के साथ सड़क के किनारे बैठकर फूल बेंचते थे तब हम भी गाड़ी वालो के पीछे ऐसे ही फूल लेकर दौड़ते थे। पापा उस समय हमें समझाते थे कि हमारी पढ़ाई ही हमें इस श्राप से मुक्ति दिला सकती है। अगर हम नही पढेंगे तो हमारा पूरा जीवन खुद को जिन्दा रखने के लिए संघर्ष करने और भोजन की व्यवस्था करने में बीत जायेगा। हम इस देश और समाज को कुछ नही दे पायेंगे और उनकी तरह अनपढ़ रहकर समाज में अपमानित होते रहेंगे। मैं यह सब नही कहना चाहती हूँ लेकिन मैं यह भी नही चाहती कि सड़क किनारे फूल बेचते किसी बच्चे की उम्मीद टूटे उसका हौसला ख़त्म हो। इसी भूख अत्याचार, अपमान और आसपास होते अपराध को देखते हुए २०१४ में मैं जेएनयू हिंदी साहित्य में मास्टर्स करने आई। सही पढ़ा आपने 'जेएनयू' वही जेएनयू जिसे कई लोग बंद करने की मांग करते हैं, जिसे आतंकवादी, देशद्रोही, देशविरोधी पता नही क्या क्या कहतें हैं लेकिन जब मैं इन शब्दों को सुनती हूँ तो भीतर एक उम्मीद टूटती है। कुछ ऐसी ज़िंदगियाँ यहाँ आकर बदल सकती हैं और बाहर जाकर अपने समाज को कुछ दे सकती हैं यह सुनने के बाद मैं उनको ख़त्म होते हुए देखती हूँ। यहाँ के शानदार अकादमिक जगत, शिक्षकों और प्रगतिशील छात्र राजनीति ने मुझे इस देश को सही अर्थो में समझने और मेरे अपने समाज को देखने की नई दृष्टि दी। जेएनयू ने मुझे सबसे पहले इंसान बनाया. यहाँ की प्रगतिशील छात्र राजनीति जो न केवल किसान-मजदूर, पिछडो, दलितों, आदिवासियों, गरीबों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के हक़ के लिए आवाज उठाती है बल्कि इसके साथ - साथ उनके लिए अहिंसक प्रतिरोध करना का साहस भी देती है. जेएनयू ने मुझे वह इंसान बनाया, जो समाज में व्याप्त हर तरह के शोषण के खिलाफ बोल सके। मैं बेहद उत्साहित हूँ कि जेएनयू ने अब तक जो कुछ सिखाया उसे आगे अपने शोध के माध्यम से पूरे विश्व को देने का एक मौका मुझे मिला है। २०१४ में 20 साल की उम्र में मै JNU मास्टर्स करने आई थी और अब यहाँ से MA, M.PhiL की डिग्री लेकर इस वर्ष PhD जमा करने के बाद मुझे अमेरिका में दोबारा PhD करने और वहां पढ़ाने का मौका मिला है। पढाई को लेकर हमेशा मेरे भीतर एक जूनून रहा है। 22 साल की उम्र में मैंने शोध की दुनिया में कदम रखा था। खुश हूँ कि यह सफ़र आगे 7 वर्षो के लिए अनवरत जारी रहेगा।
अब तक मेरे जीवन में मुझे ऐसे शिक्षक मिले जिन्होंने न केवल मुझे पढाया बल्कि  हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया मेरे यहाँ तक पहुँचने में इन गुरुजनों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। मैं सर्वप्रथम अपने स्कूल के शिक्षक Rajiv Singh Sir को धन्यवाद् देना चाहूंगी, सोमैया कॉलेज के मेरे शिक्षक Dr. Satish Pandey Sir, JNU में मेरे शोध निर्देशक Professor Devendra Kumar Chaubey, Professor Om Prakash Singh, Professor Raman Prasad Sinha, Professor Rambux Jat, मेरे सह - शोध निर्देशक Dr. Harish Wankhede, Dr. Pradeep Shinde Sir और महारष्ट्र से मेरे शोध में हमेशा मेरी सहायता करने वाले Dr. Manohar Bhandare Sir इन सभी का मैं ह्रदय से आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। इसके अतिरिक्त जिन सीनियर्स ,जूनियर्स और दोस्तों से मैंने बहुत कुछ सीखा और इन्होंने इस सफ़र को खुबसूरत बनाया उन्हें भी इस पोस्ट में टैग कर रही हूँ इसे वे अपने प्रति मेरा प्रेम और सम्मान समझें.

Sunday, 8 May 2022

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविन्द न आयेंगे।
कब तक आस लगाओगी तुम
बिके हुए अखबारों से।
कैसी रक्षा मांग रही हो
दु:शासन दरबारों से।
स्वंय जो लज्जाहीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे।
उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोबिन्द न आयेंगे।
कल तक केवल अंधा राजा
अब गूंगा बहरा भी है।
होंठ सिल दिये हैं जनता के
कानों पर पहरा भी है।
तुम्ही कहो ये अश्रु तुम्हारे
किसको क्या समझायेंगे।
उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोबिन्द न आयेंगे।
छोड़ो मेंहदी भुजा संम्भालो
खुद ही अपना चीर बचा लो।
द्यूत बिठाये बैठे शकुनि
मस्तक सब बिक जायेंगे।
उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविद न आयेंगे।😢

भूत मेला'

झारखंडः सात सालों में डायन बता मार दिए गए 231 लोग, फिर भी क्यों लग रहा है 'भूत मेला'
बीबीसी हिंदी

झारखंड के पलामू ज़िले में एक तपती दोपहरी और लू के बीच गोबर के उपले में लगे आग में कोई चावल फेंक रहा था तो कोई नारियल

दूसरी ओर, वहां काले बकरे को लाल टीका लगाया जा रहा था. कबूतर को कीलें चुभोई जा रही थीं. किसी महिला के शरीर में धागा बांधा जा रहा था.

वहीं, बगल में एक पंडित कुछ मंत्र जाप करते हुए मुर्गे को चावल खिला रहे थे. वहां पास बैठी महिलाएं कुछ चूजे को पकड़ कर अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थीं.

इन लोगों को लग रहा था कि इनके शरीर पर किसी डायन ने भूत लगा दिया है. और सब उसका इलाज कराने वहां पहुंचे थे, क्योंकि वहां 'भूत मेला' लगा था.

पुलिस प्रशासन के सामने ये मेला उस राज्य (झारखंड) में होता है, जहां सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ बीते सात सालों में डायन बताकर 231 लोगों की हत्या कर दी गई है और मरने वालों में अधिकांश महिलाएं हैं.

कब और कहां लगता है ये भूत मेला
ये मेला चैती नवरात्र के समय बीते कई दशकों से लगता आ रहा है.

रांची ज़िला मुख्यालय से 252 किलोमीटर दूर पलामू ज़िले के हैदरनगर में हज़ारों लोग हर दिन आ-जा रहे थे. इस आयोजन की देखरेख के लिए पुलिस तक तैनात किए गए.

पलामू प्रमंडल के कमिश्नर जटाशंकर चौधरी के मुताबिक़, उन्हें इसकी जानकारी पहली बार मिली है.

वहीं रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइकाइट्री एंड अलाइड साइंस (रिनपास) के निदेशक डॉक्टर सुभाष सोरेन कहते हैं कि 21वीं सदी में इस तरह का आयोजन होना ही नहीं चाहिए.

इस मेले में एक ओझा के सामने एक महिला बैठी दिखी, जो लगातार गर्दन हिलाए जा रही थी. ओझा कथित तौर पर उनका इलाज कर रहे थे. उन्होंने पूछने पर अपना पूरा नाम नहीं बताया.

बस इतना कहा कि उनका नाम पांडेय जी है. वो यूपी के बनारस से यहां आए हैं. वो कहते हैं कि इस महिला के ऊपर शैतान आकर खेल रही है. इसलिए वह झूल रही है.

लेकिन कैसे पता चला कि इस महिला के ऊपर भूत है?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "मां भगवती के कृपा से पता चलता है. वही खड़ा होकर बोलती हैं कि शैतान है. और ये केवल यहीं आकर पता चलता है. बाहर पता नहीं चलता है कि भूत है."

'...भूत कबूतर में समा गया'
वहीं पास में ही बिहार के रोहतास से आए एक और ओझा संजय भगत के अगल-बगल महिलाओं, बच्चों और पुरुषों की भीड़ जमा थी. लाल चुनरी ओढ़े, आंखों में काजल लगाए संजय लगातार नाच रहे थे.

थोड़ी देर बाद उनके एक सहयोगी ने उनके हाथ में दो कबूतर लाकर रख दिया. कुछ मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने कबूतर के बदन में तीन-चार कीलें चुभों दी. उसके बाद उसे उड़ा दिया. दावा किया कि भूत कबूतर में समा गया और उड़ गया.

हालांकि कबूतर ज्यादा उड़ नहीं पाया. मुश्किल से पांच मीटर की उड़ान के बाद वह गिर पड़ा. पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे पकड़ अपने तौलिये में लपेटा और आगे बढ़ गए. उनकी जेब में शराब की बोतल थी.

संजय बताते हैं, "ये काम मैं पिछले 32 साल से कर रहा हूं. जो भक्त कबूतर लेकर आया था, उसके ऊपर शैतानी हरक़त थी. कबूतर के शरीर में किल चुभोने से उसका कल्याण हो गया. अब वो ठीक हो जाएगा. कई राज्यों के लोग शैतानी हरक़त दूर कराने उनके पास आते हैं. वो दावा करते हैं कि ये सब दवाई से ठीक नहीं होता."

वहीं सासाराम से आए सहयोगी मंटू चंद्रवंशी, संजय की बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, "उनके पास ज्यादातर लोग वही आते हैं, जो दिमाग़ से डिस्टर्ब हैं. इलाज़ करा कर थक जाते हैं. तंत्र आदिकाल से चलता आ रहा है. साइंस इसको नहीं मानता, साइंस के हिसाब से चलिएगा तो ये ग़लत है. वेद में भी भूत-पिशाच दिखाया गया है."

क्या वेद आपने पढ़ा है? इसके जवाब में वो कहते हैं, "चलिए ठीक है, आगे पूछिए." फिर मंटू सवाल करते हैं, "साइंस अगर भूत-प्रेत नहीं मानती, सरकार नहीं मानती, तो इसे बंद क्यों नहीं करवाती है."

मंटू के अलावा संजय के कई सहयोगी वहां दिखे. जो भूत भगाने आए लोगों से बीमारी के हिसाब के 10-15 हज़ार रुपये तक वसूल रहे थे.

किसी से कम लेने पर संजय अपने सहयोगियों को डांट भी रहे थे. पैसे का हिसाब मंदिर परिसर से बाहर किया जा रहा था. हालांकि इलाज का रेट पूछने पर सब ने कहा कि भक्त जो इच्छा के अनुसार दे देते हैं, वही रखते हैं.

मंदिर परिसर में मज़ार भी है. यहां इलाज कर रहे आशिक़ अली ने बताया कि मज़ार पर शैतान भगाने सभी धर्म के लोग आते हैं. फ़ातिहा पढ़ने से शैतान भाग जाता है.

आख़िर इतना अंधविश्वास क्यों?
यूपी के सोनभद्र ज़िले के दुधी गांव से आए रोशन कुमार बताते हैं, "मैं पढ़ने में ठीक-ठाक छात्र था. अचानक दिमाग़ ख़राब हो गया. मैं पागल की तरह करने लगा, क्योंकि मेरी चाची ने मेरे ऊपर भूत छोड़ दिया था."

रोशन अपने गांव की ही महिला ओझा मंगरी देवी के साथ यहां आए हैं. मंगरी देवी ने उनका इलाज किया है. दुबले शरीर वाले रोशन ने भावराउ देवरस राजकीय पीजी कॉलेज से हिन्दी और प्राचीन इतिहास विषय से बीए पास किया है.

वहीं डेहरी ऑन सोन से आई राजकुमारी देवी कहती हैं, "ठीक है सरकार ने इस पर बैन लगा दिया है. लेकिन क्या सरकार हमलोगों का इलाज करेगी? घर घर आएगी हम लोगों को देखने के लिए? हम लोग मर रहे हैं, सरकार आ रही है देखने? हॉस्पिटल भी जाते हैं, वहां ठीक नहीं होता है तो हम तांत्रिक के पास जाते हैं."

अंधविश्वास का स्तर इतना गहरा है कि राजकुमारी दावा करती हैं कि उन्होंने भूत को देखा है.

बिहार के सासाराम के चंद्रमा विश्वकर्मा का अपना अनुभव है.

चंद्रमा विश्वकर्मा कहते हैं, "मेरे हाथ में एक दिन अचानक बिजली के करेंट जैसा झटका महसूस हुआ. हाथ सुन्न होने के साथ काफ़ी भारी हो गया. सात साल इलाज कराए, लेकिन ठीक नहीं हुए. लेकिन मेरी एक मामी थी जिसने दुआ (तंत्र-मंत्र) किया और मैं ठीक हो गया. मैं कैसे मान लूं कि सब इलाज दवाई से ही होता है. मैं तो मानता हूं कि भूत होता है."

झारखंड में पिछले 32 सालों से डायन हत्या के ख़िलाफ़ काम कर रहे आशा संस्था के प्रमुख अजय जायसवाल का अपना अलग अनुभव है.

वो बताते हैं, "ओझाओं के पास जब रोगी पहुंचते हैं, तब उस दिन इलाज नहीं किया जाता. अगले 10 दिन बाद का समय दिया जाता है."

इस दौरान उनके सहयोगी उस रोगी के गांव जाकर सब कुछ मालूम कर आते हैं कि अमुक परिवार किसको डायन बताना चाह रहा है, उनके घर में क्या-क्या है.

वो कहते हैं कि 10 दिन बाद जब रोगी उस तांत्रिक के पास पहुंचता है, तो बिना पूछे तांत्रिक वही सब जानकारी देने लगता है. ऐसे में रोगी चौंक जाता है और उनका विश्वास अटूट हो जाता है.

आखिर बंद क्यों नहीं हो रहा है यह मेला
पलामू प्रमंडल के कमिश्नर जटाशंकर चौधरी बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "मैंने देखा नहीं है, बस इसके बारे में सुना है. पता चला कि वर्षों से चला आ रहा है. ये एक अंधविश्वास होता है. प्रशासन को कैंपेन चलाना होगा. झारखंड के अलावा पड़ोसी राज्यों में भी कैंपेन चलाना होगा."

"जहां तक बात प्रशासन की ओर से दी जानेवाली सुरक्षा का है, तो मैं नहीं मानता हूं कि प्रशासन की देखरेख में ऐसा चल रहा है. वहां पहुंचनेवाले लोगों की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस बल की तैनाती की गई है."

वो आगे कहते हैं, 'जैसे-जैसे लोगों का शैक्षणिक स्तर बढ़ेगा, तब लोगों का इस मेले में आना कम होगा.'

मेला प्रबंधन समिति के सचिव रामाश्रय सिंह बताते हैं कि इस भूत मेले में झारखंड के अलावा, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश से लोग आते हैं.

वो कहते हैं, "दवा के साथ-साथ दुआ भी कोई चीज़ होती है. अगर कोई बीमारी दवा से ठीक नहीं हो रही और यहां आने से ठीक हो जाती है, तो क्या दिक़्क़त है?"

जबकि स्थानीय पत्रकार जितेंद्र रावत इसका दूसरा पक्ष बताते हैं. उनके मुताबिक़, कभी भी प्रशासनिक और सामाजिक तौर पर इसे बंद करने का प्रयास नहीं किया गया. अगर प्रयास किया भी जाएगा तो इस बात की संभावना है कि विद्रोह हो सकता है, क्योंकि ओझा, उनके सहयोगी, मेला प्रबंधन समिति के लोगों को चढ़ावा जाता है.

झारखंड पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़, 2015 से 2022 तक राज्य में डायन-बिसाही मामले में कुल 231 लोगों की हत्या हुई है. उसमें अधिकतर महिलाएं हैं. वहीं, साल 2015 से 2020 तक कुल 4,560 मामले दर्ज किए गए थे.

वहीं अजय कुमार जायसवाल के मुताबिक़, पिछले 26 सालों में केवल झारखंड में लगभग 1,800 महिलाएं मारी गई हैं. फिर भी राज्य सरकार ऐसे आयोजनों पर रोक नहीं लगा पा रही है.

वो आगे बताते हैं, "आशा संस्था की तरफ से 2018 में हमने आठ ज़िलों के 332 गावों में सर्वे किया गया. उसमें पाया कि 258 महिलाओं को समाज ने डायन घोषित कर दिया था. इस दौरान, 103 ऐसे व्यक्ति भी मिले, जो ख़ुद को तांत्रिक बता रहे थे. "

इस संस्था की प्रमुख सहयोगी छुटनी देवी को डायन हत्या के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के लिए 2020 में भारत सरकार ने पद्मश्री से भी नवाज़ा.

कहीं ये लोग मानसिक रोग तो नहीं
झारखंड में मानसिक रोग के इलाज के लिए दो अस्पताल हैं. एक रिनपास और दूसरा सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइकाइट्री, रांची (सीआईपी).

फोन पर हुई बातचीत में रिनपास के निदेशक कहते हैं, "अगर ये आयोजन हो रहा है तो सरकार को वहां टीम भेजकर स्टडी करानी चाहिए. क्या वाकई मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या है या फिर केवल अंधविश्वास का मसला है."

उनके मुताबिक़, "रिनपास में कोविड से पहले हर साल 350-400 रोगी इलाज कराने आते थे. लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद फिर से मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है. इसमें झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल के रोगी भी होते हैं."

मेंटल हेल्थ को लेकर काम कर रही संस्था मारीवाला हेल्थ इनिशिएटिव के एडवोकेशी मैनेजर भवेश झा के मुताबिक़, "भारत सरकार ने साल 2020-21 में मेंटल हेल्थ मद में मात्र 40 करोड़ रुपया देश भर के लिए जारी किया गया. इसमें से 20 करोड़ रुपया ही ख़र्च हो पाया. इसी से सरकार की प्राथमिकता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. जबकि डबल्यूएचओ भी कहता है कि कम्यूनिटी आधारित मेंटल हेल्थ प्रोग्राम होना चाहिए."

वो कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में अन्य स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है, इस वजह से भी लोग इलाज के लिए ओझाओं के पास जाते हैं."

रात के आठ बज चुके हैं. खेत में लगे प्लास्टिक के तंबुओं में भीड़ जमा है. हरेक तांत्रिक का अपना तंबू है. जिन लोगों ने इन तात्रिकों से अपना इलाज करा लिया है, वो ईंट से चूल्हा बनाकर खाना बना रहे हैं, तो कोई खुले में ही सो रहे हैं. सुबह ये अपने घर चले जाएंगे, लेकिन तांत्रिकों के चेले फिर से नए मरीज़ की तलाश में जुट जाएंगे.

Anwar Barelvi 

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Saturday, 7 May 2022

अनुसूचित जाति के दूल्हे को घोड़े से उतारा

कितने भी भगवा झंडे लहराये जाये 
असल में हिन्दू हित रक्षकों के राज में
इंसानियत खतरे में है
लगातार दलित उत्पीडन के
समाचार मिलते जा रहें हैं

सामंती-रूढ़िवादी ताकतें
अनपे पूर्वाग्रहों को
सनातन हिन्दू परम्परा के पीछे
पाल-पोस रहीं हैं