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Sunday, 10 July 2022

तेजाब से चमकाया जाता है अदरक

तेजाब से चमकाया जाता है अदरक को
कई रिपोर्ट्स में इस बात का खुलासा हो चुका है कि तेजाब से अदरक को धोकर उस पर चमक लाई जाती है। गंदी और भद्दी दिखने वाली अदरक को तेजाब से चमकाया जाता है, क्योंकि बाजार में जब भी आप अदरक खरीदने के लिए जाएंगे तब आप वही अदरक खरीदेंगे जो देखने में ठीक लग रहा हो। रिपोर्ट के अनुसार, एक लीटर तेजाब से करीब 400 किलो अदरक धोकर चमकाई जाती है।

हो सकता है कैंसर तक
तेजाब से अदरक को धोने पर उसके ऊपर का भद्दा हिस्सा या गन्दा छिलका निकल जाता और अदरक में चमक आ जाती है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस बात का खुलासा हो चुका है कि देश की कई मंडियों में तेजाब से साफ की हुई अदरक सप्लाई की जा रही है, जो लोकल मार्केट से होकर आपके घरों में जाती है। इसके बाद यह आपके पेट में जाकर जहर बना रही है। डॉक्टरों का कहना है कि ज्यादा मात्रा में तेजाब वाली चाय पीने से आपकी मौत हो सकती है। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि बहुत लंबे समय तक अगर इसको खाया जाए तो कैंसर तक हो सकता है।

भिखारी ठाकुर के दो नाटक



अपने बचपन के दिनों में मुझे भोजपुरी साहित्य के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के दो नाटकोंको देखने का सौभाग्य मिला ।एक नाटक उनका था विदेशिया। विदेशिया का पाठ अदा करते हुए मुझे उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त है। दूसरा नाटकतथा  भाई विरोध । इनका एक नाटक  लोकप्रिय था" बेटी बेचवा। ,"ऐसा कहा जाता है हजारीबाग में वे जब इस नाटक कोअभिनीत कर रहे  थे तोदर्शक महिलाएं रो रही थी। यह नाटक बेमेल विवाह पर आधारित है लड़की रो रो कर अपनी अपनी व्यथा को यह गा गा कर प्रकट कर रही है सचमुच यह गीत ह्रदय विदारक है। विदेशिया नाटक में पति अपनी पत्नीको छोड़कर कोलकाता चला जाता है और जब वह लौटता है उसके साथ उसकी दूसरी पत्नी और बच्चे होते हैं पहली पत्नी अपने पति को पाकर खुश है और अपने सौतनऔर उसके बच्चे को भी अपना लेती है। उन दिनों मजदूर वर्ग के लोग घर परिवार छोड़कर कोलकाता कमाने  के लिए चले जाते थे। नवविवाहिता पत्नी अपनी विरह वेदना को   किसतरह से व्यक्त करती है, इसका सजीव वर्णन भिखारी ठाकुर ने अपने इस नाटक में की है । उनका एक और नाटक है जालिम सिंहजोपटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित हुआ था। इस नाटक में जालिम सिंह जो एक सिपाही है एक महादलित लड़की से विवाह करता है ।लड़की अपनी सास को बात बात में बदला देती है वह महादलित परिवार की है ।फिर तो परिवार में कोहराम मच जाता है। उन दोनों को परिवार से अलग कर दिया जाता है ।अपने  बीमार ससुर की सेवा गोरखपुर के अस्पताल मे  करती है। उनकीजिंदगी बच जाती है। अस्पताल से घर आने पर अब वह अपने पतोहू को बेटी का  दर्जा देकर फिर से परिवार में शामिल कर  लेते हैं । उन्होंने इस नाटक में अंतरजातीय विवाह की मान्यता समाज में  दिलाने की कोशिश की है और महादलित  को समाज में सम्मान दिलवाने की कोशिश की है।

           उनके निर्माण दिवस पर उन्हें शत-शत नमन और प्रणाम ।

Wednesday, 6 July 2022

बहादुरशाह ज़फर

जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दुस्तान' रखा, हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा। अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में। 'राम चरित मानस' भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी।

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था।

टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर,,,  बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं। अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते।

यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युँ ना हो।

बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रैजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना। भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये।

ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि - "हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं।"

बेवकूफ थे बहादुरशाह ज़फर। आज उनकी पुश्तें भीख माँग रहीं हैं।

अपने इस हिन्दुस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये। अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी ! सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ? 

ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता।

क्या इनके नाम पर हुआ ?

नहीं ना ? इसीलिए कहा कि अंग्रेजों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना कैद मिलती ना कैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही कैद में लिखा :

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।
कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥
......Kamran Khan

अगर किसी नाटक के पात्र मुसलमान हैं तो उसका मंचन कहां करना चाहिए?



अगर किसी नाटक के पात्र मुसलमान हैं तो उसका मंचन कहां करना चाहिए? 

मुस्लिम के स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम में?

क्या इसके मंचन के लिए हिंदू के स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम से परहेज़ करना चाहिए?
(नाटक के निर्देशक हिंदू हों तो भी?)

कर्नाटक के शिमोगा में बजरंग दल वालों ने यह कहते हुए जयंत कैकिनी का नाटक जोतेगिरुवानु चंदिरा का मंचन बीच में रोक दिया कि इसमें पात्र मुस्लिम हैं और हिंदू (वीराशैव हिंदू) स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम में इसका मंचन नहीं हो सकता। 

बजरंग दल ने जब हस्तक्षेप किया, तब तक नाटक को शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मतलब, ऑडिटोरियम के मलिकान को नाटक पर कोई एतराज़ नहीं था।

जयंत कैकिनी लिखित जोतेगिरुवानु चंदिरा जोसफ स्टीन के बहुचर्चित उपन्यास द फिडलर ऑन द रूफ का कन्नड़ नाट्य रूपांतरण है। इसका मंचन रंगाबेलाकू थिएटर ग्रुप कर रहा था।

ख़ुद जोसफ स्टीन ने इसे शोलेम अलेखेम की बहुचर्चित कहानी तेवये एंड हिज डॉटर्स से डेवलप किया है। 

मूल कहानी 1905 के लगभग की है और ज़ार के राज वाले रूस के एक काल्पनिक गांव अनातेवका के दूध बेचने वाले तेवये पर केंद्रित है। तेवये यहूदी है। उसका परिवार बाहरी सामाजिक सांस्कृतिक प्रभावों से जूझ रहा है और वह अपनी यहूदी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को बचाने की कोशिश कर रहा है। इन्ही परिस्थितियों में वह अपनी पांच बेटियों की शादी को ले कर चिंतित है।

बजरंग दल की परेशानी अब आप समझ सकते हैं।

यह उस देश में हो रहा है, जहां एक वक्त कुरान  हिंदू स्वामित्व वाले प्रिटिंग प्रेस में छपा करता था।

Saturday, 2 July 2022

मुफ्त इलाज

आपके मरीज की सर्जरी मुफ्त हो सकती है। प्लेटिनम अस्पताल वसई में निःशुल्क परामर्श और चिकित्सा परीक्षण प्राप्त करें। मातोश्री गंगूबाई संभाजी शिंदे अस्पताल में राज्य सरकार की योजना के तहत परीक्षण, सर्जरी लागत, दवा शुल्क, बिस्तर शुल्क, भोजन और सर्जरी की पूरी लागत मुफ्त प्रदान की जाएगी। अपॉइंटमेंट के लिए 9320835528 या 9987229960 पर कॉल करें

Thursday, 30 June 2022

लेकिन यहां ईडी ईडी क्यों नहीं? *


  1) पंकजा मुंडे 206 करोड़ चिक्की घोटाला
2) पंकजा मुंडे 7200 करोड़ THR घोटाला
3) देवेंद्र फडणवीस- ​​1700 करोड़ सिडको खारघर भूमि घोटाला
4) देवेंद्र फडणवीस- ​​मुंबई डीपी घोटाला
5) देवेंद्र फडणवीस: 2800 करोड़ यूएलसी भूमि घोटाला
6) देवेंद्र फडणवीस: महा ई-परीक्षा पोर्टल घोटाला
7) प्रकाश मेहता: एमपी मिल कंपाउंड एफएसआई घोटाला 1200 करोड़
8) सुभाष देशमुख: 2000 करोड़ का घोटाला
9) सुभाष देशमुख: लोकमंगल फर्जी दस्तावेज अनुदान धोखाधड़ी घोटाला
10) जयकुमार रावल तोरणमल हिल रिज़ॉर्ट घोटाला 49 करोड़ रु
11) जयकुमार रावल का रावल बैंक घोटाला 369 करोड़ रु
12) जयकुमार रावल गढ़ किला होटल बेचने का कांड
13) विनोद तावड़े अग्निशामक खरीद घोटाला 191 करोड़ रु
14) विनोद तावड़े 114 करोड़ रुपये राष्ट्रपुरुष चित्र और अर्ली रीडर्स पुस्तक खरीद घोटाला
15) विष्णु सावर आदिवासी छात्र साहित्य खरीद घोटाला
16) गिरीश बापट तुर्दल घोटाला
17) आंगनबाडी मोबाइल खरीद, सेनेटरी नैपकिन घोटाला
18) बीएमसी सड़क घोटाला, सफाई न करने वाला घोटाला
19) धर्म पाटिल मंत्रालय किसान आत्महत्या मामले में दोंडई भूमि अधिग्रहण घोटाला
20) चंद्रकांत पाटिल पुणे भूमि घोटाला
21) देवेंद्र फडणवीस, चंद्रकांत पाटिल, मेटे ने बिना एक ईंट रखे 80 करोड़ शिवसेना स्मारक घोटाला किया।
 22) वैद्यनाथ चीनी कारखाना पंकजताई के अध्यक्ष के साथ लगभग 900 करोड़ रुपये बकाया है। सैकड़ों करोड़ का नुकसान।

अगर उन्हें ईडी दिया गया तो बीजेपी को बड़ी इनकम कैसे मिलेगी?
 बीजेपी के करोड़ों करोड़?
*बीजेपी - मतभेद वाली पार्टी*

Wednesday, 29 June 2022

तो आप लेखक बनना चाहते हैं चार्ल्स बुकोवस्की »



मत लिखो —
अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो।

अगर बिना पूछे-बताए ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबाँ और पेट से
मत लिखो।

अगर घण्टों बैठना पड़े
अपने कम्प्यूटर को ताकते 
या टाइपराइटर पर बोझ बने हुए
खोजते कमीने शब्दों को
मत लिखो।

अगर पैसे के लिए
या शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो।

अगर लिख रहे हो
कि ये रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो।

अगर बैठ के तुम्हें
बार-बार करने पड़ते हैं सुधार
जाने दो।

अगर लिखने की बात सोचते ही
होने लगता है तनाव
छोड़ दो।

अगर किसी और की तरह
लिखने की फ़िराक़ में हो
तो भूल ही जाओ
अगर वक़्त लगता है
कि चिंघाड़े तुम्हारी अपनी आवाज़
तो उसे वक़्त दो
पर ना चिंघाड़े ग़र फिर भी
तो सामान बाँध लो।

अगर पहले पढ़ के सुनाना पड़ता है
अपनी बीवी या प्रेमिका या प्रेमी
या माँ-बाप या अजनबी आलोचक को
तो तुम कच्चे हो अभी।

अनगिनत लेखकों से मत बनो
उन हज़ारों की तरह
जो कहते हैं खुद को 'लेखक'
उदास और खोखले और नक्शेबाज़
स्व-मैथुन के मारे हुए।
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकी हैं
तुम्हारी क़ौम से 
मत बढ़ाओ इसे।

दुहाई है, मत बढ़ाओ।
जब तक तुम्हारी आत्मा की ज़मीन से
लम्बी-दूरी के मारक रॉकेट जैसे
नहीं निकलते लफ़्ज़,
जब तक चुप रहना
तुम्हें पूरे चाँद की रात के भेड़िए-सा
नहीं कर देता पागल या हत्यारा,
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो।

क्यूंकि जब वक़्त आएगा
और तुम्हें मिला होगा वो वरदान
तुम लिखोगे और लिखते रहोगे
जब तक भस्म नहीं हो जाते
तुम या यह हवस।

कोई और तरीका नहीं है
कोई और तरीका नहीं था कभी।

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : विवेक मिश