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Wednesday, 21 September 2022

एक ज़रूरी फिल्म : ग्रेप्स ऑफ़ राथ



आज जब अपना देश और पूरी दुनिया जबरदस्त मंदी में गोते लगा रही है तो 1929-30 की विकराल मंदी की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'The Grapes of Wrath' शिद्दत से याद आ रही है. अमरीका के मशहूर डायरेक्टर 'जान फोर्ड' द्वारा 1940 में बनायी गयी यह फिल्म इसी नाम के 'जान स्टीनबेग' के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित है। 
1929-30 की मन्दी की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म मानव जाति के अन्तहीन दुखों और उसके शाश्वत संघर्ष और बेहतर जीवन के प्रति उसकी दुर्धष जिजीविषा की अद्भुत कहानी है।
मन्दी के चक्रव्यूह में फंस कर या यो कहें कि फंसा कर जब बड़े पैमाने पर किसानों की जमीनें बड़े-बड़े फार्मरों और पूंजीपतियों के पास चली गयी तो उनके पास पेट की भूख मिटाने के लिए बड़े शहरों  की ओर कूच करना उनकी मजबूरी बन गयी। अमेरिका में विकसित पूंजीवाद की जो भव्य तस्वीर खींची जाती है, उसकी नींव इन्हीं गरीब किसानों के दुखों, उनकी बेबसी, उनके दर्द और उनके खून पसीने से बनी है। यह फिल्म ऐसे ही किसान परिवार की कहानी कहती है जो एक कम्पनी के हाथों अपनी ज़मीन छिन जाने के बाद मजदूरी करने के लिए कैलीफोर्निया की ओर चल देता है। इस यात्रा के दौरान बहुत से हृदय विदारक दृश्य उत्पन्न होते हैं। फिल्म का यह यथार्थ अभी कुछ दिन पहले ही भारत का यथार्थ था, जब क्रूर लाकडाउन के बाद लाखों मजदूर हज़ारो किलोमीटर की यात्रा अपने नन्हे बच्चों गर्भवती महिलाओं, बूढ़े माता-पिताओं के साथ करने को मजबूर कर दिए गए थे.

बहरहाल फिल्म में परिवार का सबसे बूढ़ा बुजुर्ग किसी भी स्थिति में अपनी धरती नहीं  छोड़ना चाहता। वह इस तर्क को कतई नहीं समझ पाता कि पीढ़ियों से जिस जमीन पर अपना मेहनत व पसीना बहाया वह आज अपनी क्यों नहीं है। इसी गम में रास्ते में ही उसकी मौत हो जाती है।
70 के दौरान बनी फिल्म 'गर्महवा' का वह दृश्य याद कीजिये जिसमें परिवार की बूढ़ी अम्मा अपना पुश्तैनी घर किसी कीमत पर छोड़ कर नहीं जाना चाहती।  हालांकि विस्थापन का वह एक अलग पहलू था। ये दोनो दृश्य दर्शक को भीतर तक हिला देते हैं।
आगे चलकर बूढ़े दादा के गम में बूढ़ी दादी भी चल बसती हैं। परिवार के दो सबसे अहम और प्रिय लोगों को खोकर वे अन्ततः कैलीफोर्निया पहुंचते हैं। कैलीफोर्निया में इसी परिवार की तरह लाखों और परिवार अपना भविष्य तलाशने के लिए पहले से ही उपस्थित हैं। उन्हें मजबूरन शहर के बाहर बनी झुग्गियों में आश्रय लेना पड़ता है। जिसकी कल्पना आप अपने शहर की झुग्गी-झोपडि़यों से आसानी से कर सकते हैं। कैलीफोर्निया शहर में बेरोजगारों की भीड़ है। वेतन नाममात्र का है। लेकिन वहां मजदूरों के संघर्ष भी हैं। इन संघर्षों के सम्पर्क में आकर परिवार का बड़ा बेटा 'टाम' उससे प्रभावित हो जाता है और विस्थापन बेरोजगारी, झुग्गी-झोपडि़यों व पूंजीवाद को एक नए कोण से देखना शुरू करता है। उसके इस रूपान्तरण से परिवार कई बार संकट में भी पड़ जाता है और उन्हें तत्काल वह जगह छोड़नी पड़ती है। लेकिन उसकी मां अपने बेटे की इस भावना को समझती है और दिल से उसके साथ होती है। मां-बेटे का यह रिश्ता फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। फिल्म के अन्त में जब बेटा परिवार छोड़कर जा रहा होता है तो वह मां से कहता है मेरी जरूरत इस परिवार से ज्यादा उन जगहों पर है जहां अन्याय, शोषण और अत्याचार है। अन्ततः उसकी बातों से सहमति जताते हुए मां उसे भारी मन से विदा कर देती है। बेटे से मां के बिछड़ने का यह दृश्य भीतर तक हिला देता है और फिल्म को एक नया आयाम देता है।
फिल्म में मां का किरदार बेहद सशक्त है। वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमेशा आशावान बनी रहती है। ज्यादातर मांओं की तरह वह हर समय संघर्षरत रहते हुए जीने की राह निकाल ही लेती है।
फिल्म को देखकर हमें अपने आस-पास भी वही तस्वीर नज़र आती है जो उस वक्त के अमेरिका की थी। तथाकथित विकास के नाम पर हर तरफ लोगों को जल-जंगल-जमीन से बेदखल किया जा रहा है। यानी आदिम संचय की जो प्रक्रिया अमेरिका में अपनायी गयी, वही प्रक्रिया और भी क्रूर रूप में आज भारत में अपनायी जा रही है।
दृश्य दर दृश्य फिल्म रोंगटे खड़े कर देती है। अपने देश में भी हालात आज यही कहानी कह रहे हैं। अपने जल-जंगल और जमीन के एक-एक इंच के लिए संघर्षरत जनता के हालात एक-एक करके उसमें जुड़ते जाते हैं। फिल्म देखकर लगता है कि दमन और प्रतिरोध का वह मुसलसल सिलसिला अब तक जारी है। कुछ ही फिल्में ऐसी होती हैं जो दुनिया भर की संघर्षरत जनता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह फिल्म भी उनमें से एक है। फिल्म के पात्र और उनका सांस्कृतिक परिवेश यदि बदल दिया जाए वह अनिवार्य रूप से किसी भी समाज का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं। फिल्म के अंत में एक स्वप्न है. समाजवाद का स्वप्न.

आज की परिस्थिति बहुत कुछ 1929-30 की परिस्थिति से मिलती है. लेकिन आज हमारे पास जिस एक महत्वपूर्ण चीज की कमी है, वह है एक यूटोपिया की, एक स्वप्न की. हमें भी एक यूटोपिया की, एक स्वप्न की आज सख्त जरूरत है. जैसा की वेणुगोपाल अपनी कविता में कहते है-

न हो कुछ
सिर्फ एक सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और
ये शुरुआत ही तो है
कि
यहाँ एक सपना है....

#मनीषआज़ाद

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लिंक

344 हिंदी फिल्मों का लिंक


344 फिल्मों में से बहुत सी होंगी जो आपने नहीं देखी होंगी। हिंदी सिनेमा में १९४० से १९७० तक इस अवधि की 344 फिल्मों की एक सूची यहाँ दी जा रही है। इसमें से जो आप  देखना चाहते हैं उस फिल्म पर क्लिक करें।


https://youtube.com/playlist?list=PLafSq5UblCNWcweoEqCDqZ76FmADCuGSf 




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वेर्नर हर्ज़ोग



"जब आप किसी के बारे में सोचते हैं, आप उसे बचा रहे होते हैं" – अर्जेन्टीना के कवि रोबेर्तो हुआर्रोज़ की एक कविता की पंक्ति है.      


सन 1974 की सर्दियों की बात है. छियत्तर साल की लॉटे आइसनर बहुत बीमार थीं. पेरिस के एक अस्पताल में भर्ती कराई गई इस महिला के लेखन ने पिछले तीस सालों के जर्मन सिनेमा की दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी. हिटलर और दूसरे विश्वयुद्ध ने जर्मन सिनेमा को भारी नुकसान पहुंचाया था. इन बीस सालों में संसार भर का सिनेमा बहुत विकसित हो चुका था जबकि जर्मनी के फिल्मकारों ने राख से शुरू करना था. ऐसे में खुद किसी तरह बच गयी इस यहूदी महिला ने अपने लेखों से सिनेमा की नई परिभाषा गढ़ने की राह तैयार की. दुनिया भर के बड़े फिल्म निर्देशक उसके मुरीद थे. इन मुरीदों मे जर्मनी का एक युवा फिल्मकार भी था जिसकी प्रतिभा को लॉटे आइसनर ने तब सराहा था जब कोई उसका नाम भी नहीं जानता था.


इस युवा का नाम था वेर्नर हर्ज़ोग. पेरिस में रहने वाले एक दोस्त ने 23 नवम्बर 1974 के दिन उसको फोन कर के बताया कि लॉटे आइसनर मृत्युशैय्या पर हैं. इस खबर से गहरे व्यथित हुए हर्ज़ोग ने अपने आप से कहा – "मैं उन्हें मरने की इजाजत नहीं दे सकता. उन्हें जीना होगा. वो अभी नहीं मरेंगी. हमें उनकी जरूरत है."


उस समय वेर्नर हर्जोग म्यूनिख में था. बाहर बर्फ गिर रही थी और तापमान जीरो से दस डिग्री नीचे था. हर्जोग ने हाल ही में खरीदे गए अपने जूतों को ध्यान से देखा. वे काफी मजबूत लग रहे थे. उसने एक पिठ्ठू निकाला, जरूरत का सामान उसमें भरा और यूरोप का नक्शा उठाकर बिना कुछ सोचे सड़क पर आ गया. उसकी आत्मा उसे बता रही थी कि अगर वह  लॉटे आइसनर को देखने पेरिस जाना चाहता है तो उसने किसी रेल या जहाज से नहीं बल्कि अपने पैरों से चलकर, पांच सौ मील दूर पेरिस पहुंचना चाहिए. न जाने कितने साक्षात्कारों में हर्जोग कह चुके हैं – "मुझे साफ़ पता था कि अगर मैं ऐसा कर सका तो वे ज़िंदा रहेंगी."


तीन सप्ताह तक बर्फीले, सर्द मौसम में पैदल चलते हुए हर्जोग जब 14 दिसम्बर 1974 को पेरिस पहुंचे, लॉटे आइसनर हस्पताल से ठीक होकर अपने घर जा चुकी थीं. इस पूरी यात्रा के दौरान हर्जोग ने हर रात डायरी भी लिखी जो बाद में एक किताब की सूरत में छपी. 


आठ साल बाद लॉटे आइसनर ने उन्हें पेरिस बुलवाया और कहा- "देखो मैं तकरीबन अंधी हो चुकी हूँ. अपने जीवन के सबसे अच्छे काम यानी पढ़ना और सिनेमा देख सकना, अब मुझसे नहीं होते. मैं बहुत मुश्किल से चल पाती हूं. वह भी बैसाखियों के सहारे से." 


इसके बाद ठीक जिस तरह संसार की बुनियाद रखने वाले हजरत नूह ने आठ सौ बीस साल की जिन्दगी जी चुकने के बाद भगवान से कहा होगा, उन्होंने हर्जोग से कहा – "मैं जीवन से पूरी तरह भर चुकी हूँ. लेकिन मेरे जीवन को तुमने जैसे किसी मन्त्र से बांधा हुआ है. क्या तुम मुझे मुक्त कर सकते हो?"


हर्जोग ने स्वीकृति में सर हिलाया. आठ दिन बाद लॉटे आइसनर चली गईं.


आप वेर्नर हर्जोग का लिखा हुआ पढ़िए, उसकी फ़िल्में देखिये. वह आदमी जैसे किसी दूसरी दुनिया में रहता है. उसके लिए हर चीज, हर घटना किसी महान उद्देश्य की तरफ इशारा कर रही होती हैं. उस इशारे को, उसमें छिपी चुनौती को पूरी तरह समझने का काम उसने पूरी जिन्दगी सिर्फ अपनी इच्छाशक्ति और जिद के बल पर किया है. बेवजह नहीं है कि उसे दुनिया के पिछले सौ सालों के सबसे महत्वपूर्ण सौ लोगों की तकरीबन हर लिस्ट में जगह मिलती है. 


सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं और वेर्नर हर्ज़ोग की फ़िल्में नहीं देखी हैं तो समझिये आपने कुछ भी नहीं देखा है.

Forwarded


असलियत गौतम अडानी की

यह है असलियत गौतम अडानी की !.....जिनके दो नंबरी अमीर बनने पर भक्त लहालौट हो रहे हैं यह तस्वीर बता रही है कि वित्तीय वर्ष 2019-20  में देश के ख़ज़ाने में टैक्स अदा करने वाली प्रमुख कंपनियों की सूची में अडानी की एक भी कंपनी नहीं है!

यह जी हां यह सच है कि टैक्स देने वाली टॉप 20 कंपनियों में एक भी कंपनी अडानी की नही है और कल ख़बर आई है कि गौतम अडाणी के नेतृत्व वाली कंपनी समूह पूंजीकरण के लिहाज से देश में नंबर वन बन गया है
अडाणी समूह ने 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) के साथ सूचीबद्ध टाटा समूह (जिसमें 27 फर्में शामिल हैं) को पीछे छोड़ दिया और मुकेश अंबानी की नौ कंपनियों का समूह 17 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बाजार पूंजीकरण के साथ सूची में तीसरे स्थान पर चला गया है.

आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले ख़बर आई थी कि अनिल अंबानी की रिलायंस एनर्जी को अडानी ट्रांसमिशन ने 18,800 करोड़ रुपये में खरीद लिया ......इस बारे में सूचना अधिकार कार्यकर्ता अनिल गलगली ने आरटीआई के तहत जानकारी मांगी तो पता चला कि रिलायंस एनर्जी ने 1451.69 करोड़ रुपये के कई करों का भुगतान महाराष्ट्र सरकार को नहीं किया है. जबकि कंपनी ने यह पैसा उपभोक्ताओं से सरचार्ज, टॉस, ग्रीन सेस और सेल्स टैक्स आदि के नाम पर वसूले थे

गलगली ने बताया कि आरटीआई दायर करने के बाद महाराष्ट्र सरकार हरकत में आई और रिलायंस एनर्जी को नोटिस भेजा. बीते तीन नवंबर को डिविजन इंस्पेक्टर मीनाक्षी ने रिलायंस के जनरल मैनेजर को नोटिस भेज बकाया पैसा जमा करने को कहा. गलगली ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर कहा कि रिलायंस एनर्जी के बैंक एकाउंट को फ्रीज़ कर मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. 'अगर अब रिलायंस एनर्जी को अडानी ट्रांसमिशन ने ख़रीद लिया है तो 1451.69 करोड़ रुपये का भुगतान कौन करेगा? क्या इस नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ताओं को बिजली की ज़्यादा कीमत चुकानी पडेगी. कि इतनी बड़ी रकम बकाया होने के बावजूद भी रिलायंस कैसे अडानी को कंपनी बेच सकती है. सरकार को बकाया राशि पर 24 प्रतिशत का ब्याज लेना चाहिए और ज़रूरी कार्रवाई करने का आदेश देना चाहिए. वरना यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि आख़िर टैक्स का पैसा कौन भरेगा.'

अडानी ने होल्सिम के साथ को अल्ट्रा टेक कम्पनी की डील की है उसमें भी टैक्स भरने को होलसिम वालो ने मना कर दिया है यानि वहा भी लोचा है

इससे पहले भी कई बार अडानी की कंपनियों के बारे में टैक्स चोरी के मामले सामने आए हैं लेकिन सब पर पर्दा डाल दिया गया वजह सब जानते हैं ...... कि सैंया भए कोतवाल तब डर काहे का........

Tuesday, 20 September 2022

स्तालिन के सवाल पर (महान बहस का ये अंश प्रस्तुत है।)


स्तालिन के सोच-विचार और उनके कार्य का समग्रता में सार-संकलन करने पर हर ईमानदार कम्युनिस्ट जो इतिहास का कुछ सम्मान करता है, निश्चय ही पहले यह देखेगा कि स्तालिन में क्या मुख्य था। इसलिए, जब स्तालिन की भूलों का सही मूल्यांकन और सही आलोचना की जा रही हो और उन पर विजय हासिल की जा रही हो तो यह आवश्यक है कि स्तालिन के जीवन में जो मुख्य था उसकी हिफाजत की जाय, मार्क्सवाद-लेनिनवाद की हिफाजत की जाय जिसकी उन्होंने रक्षा की और जिसे उन्होंने विकसित किया।
स्तालिन की भूलों को, जो कि केवल गौण थीं, यदि ऐतिहासिक सबक की तरह लिया जाय ताकि सोवियत संघ तथा अन्य देशों के कम्युनिस्ट इससे चेतावनी ले सकें और उन भूलों को दुहराने से बच सकें या कम भूलें करें तो यह लाभदायक होगा । सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के ऐतिहासिक सबक सभी कम्युनिस्टों के लिए लाभदायक हैं, बशर्ते कि वे सही ढंग से लिये जायें और वे ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप हों, उन्हें तोड़ें मरोड़ें नहीं।
लेनिन ने यह कई बार बताया कि बेबेल और रोजा लक्जेमबर्ग जैसे लोगों के प्रति अपने रुख में जो कि अपनी सारी गलतियों के बावजूद महान सर्वहारा क्रान्तिकारी थे, मार्क्सवादी दूसरे इण्टरनेशनल के संशोधनवादियों से पूरी तरह भिन्न थे। मार्क्सवादियों ने इन लोगों की गलतियों को छुपाया नहीं, बल्कि इन उदाहरणों से यह सीख ली कि "किस तरह उनसे (गलतियों से -अनु.) बचें और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद की अधिक सख्त अपेक्षाओं पर खरे उतरें''।' इसके विपरीत, संशोधनवादियों ने बेबेल और रोजा लक्जेमबर्ग की गलतियों पर भारी "काँव-काँव" और "कूँ-कूँ" मचाया। संशोधनवादियों का मजाक उड़ाते हुए लेनिन ने इस सन्दर्भ में एक रूसी कथा का उद्धरण दिया। "कभी-कभी गरुड़ मुर्गियों से नीचे उड़ सकते हैं, लेकिन मुर्गियां कभी भी गरुड़ की ऊंचाई तक नहीं उठ सकतीं।''  और रोजा लक्जेमबर्ग "महान कम्युनिस्ट" थे और अपनी गलतियों के बावजूद वे "गरुड़" ही रहे जबकि संशोधनवादी '"मजदूर वर्ग के आन्दोलन के पिछवाड़े, गोबर के ढेर के बीच '' रहने वाली "मुर्गियों" के झुण्ड थे।
ऐतिहासिक भूमिका से तुलनीय नहीं है। स्तालिन, एक पूरे ऐतिहासिक युग के दौरान, सर्वहारा बेबेल और रोजा लक्जेम्बर्ग की ऐतिहासिक भूमिका किसी भी प्रकार से स्तालिन की के अधिनायकत्व और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के ऐतिहासिक महान नेता थे, और उनके मूल्यांकन में अधिक सावधानी बरती जानी चाहिए।

सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर स्तालिन की "रक्षा" का आरोप लगाया है। हां, हम स्तालिन की रक्षा करते हैं। जब   ख्रुश्चेव इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते हैं और स्तालिन को पूरी तरह नकारते हैं, तो निस्संदेह यह हमारा अनिवार्य कर्तव्य हो जाता है कि अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के हित के लिए हम आगे आयें और स्तालिन की रक्षा करें।

स्तालिन की रक्षा करने में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी उनके सही पक्ष की रक्षा करती है, सर्वहारा के अधिनायकत्व वाले उस पहले राज्य के संघर्षों के गौरवशाली इतिहास की रक्षा करती है जिसका जन्म अक्तूबर क्रान्ति में हुआ था; वह सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के संघर्षों के गौरवशाली इतिहास की रक्षा करती है; वह पूरी दुनिया के मेहनतकश लोगों के बीच अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की प्रतिष्ठा की रक्षा करती है। संक्षेप में, वह मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धान्त और व्यवहार की रक्षा करती है। केवल चीनी कम्युनिस्ट ही ऐसा नहीं कर रहे हैं; मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति समर्पित सभी कम्युनिस्ट, सभी पक्के क्रान्तिकारी और सभी विवेकशील लोग ऐसा कर रहे हैं।
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स्तालिन ने जब कभी कोई गलती की तो वे स्वयं की आलोचना करने में समर्थ थे। उदाहरण के लिए, चीनी क्रान्ति के सन्दर्भ में उन्होंने कुछ गलत सुझाव दिये चीनी क्रान्ति की विजय के बाद उन्होंने अपनी गलती स्वीकारी। स्तालिन ने 1939 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) की अठारहवीं कांग्रेस को दी गयी अपनी रिपोर्ट में पार्टी कतारों के शुद्धिकरण के कार्य में हुई अपनी कुछ गलतियों को भी स्वीकारा। लेकिन ख्रुश्चोव? वे यह जानते ही नहीं कि आत्मालोचना होती क्या है, वे कुल यही करते हैं कि सारा दोष दूसरों पर डाल देते हैं और सारा श्रेय अपने लिये रख लेते हैं।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि खुश्चोव के ये गन्दे कारनामे ऐसे समय में किये गये हैं जब आधुनिक संशोधनवाद का तूफान आया हुआ है। जैसा कि लेनिन ने 1915 में दूसरे इण्टरनेशनल के संशोधनवादियों की मार्क्सवाद के साथ उनके विश्वासघात के लिए आलोचना करते हुए कहा था : 'शब्दों को भुला दिये जाने, उसूलों के खो जाने, दर्शनों के उलट दिये जाने और प्रस्तावों और पवित्र प्रतिज्ञाओं को परित्यक्त कर देने के इस समय में यह बिलकुल आश्चर्य की बात नहीं है'।



मिलिटेंट ट्रेड यूनियनिज़्म से प्रॉब्लम

CPIM यानी कैपिटलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया - मुनाफ़ावादी के CM को मिलिटेंट ट्रेड यूनियनिज़्म से प्रॉब्लम है, होगी ही!

बर्नस्टीन, काउत्स्की, ख्रुश्चेव, देंग की राजनीतिक औलादें जो ठहरे, जिनकी सही जगह इनके संशोधनवादी पूर्वजों की तरह ही इतिहास के कूड़ेदान में निहित है!
#Shame

Revisionist trade union

एक ओर मजदूरों की हडताल, दूसरी ओर जुझारू ट्रेड यूनियनों की निंदा (क्योंकि इससे पूंजीपति नाराज हो जायेंगे)। हडताल में शामिल होने वाले सरकारी कर्मचारियों पर अनुशासन की कार्रवाई का आदेश भी जारी किया गया है।

Mukesh Asim