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Friday, 7 October 2022

भारतीय वायु सेना का 90वा दिवस

8 अक्टूबर 2022 और भारतीय वायु सेना का 90वा दिवस याद रखा जाएगा क्योकि भारी विरोध के बावजूद इसी साल इसमें अग्निवीर वायु को शामिल किया गया है। इस साल दिसंबर में,  शुरुआती प्रशिक्षण के लिए 3,000 अग्निवीर वायु को शामिल किया जाएगा। आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ेगी। 

अग्निपथ योजना के तहत इंडियन आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में सैनिकों की 4 साल के लिए भर्ती की जा रही है। वायुसेना के अग्निवीरों को अग्निवीरवायु का नाम दिया गया है। 4 साल के बाद 75 फीसदी सैनिकों को घर भेज दिया जाएगा। शेष 25 फीसदी अग्निवीरों को स्थायी जवान नियुक्त किया जाएगा।

 इस योजना के दुष्परिणाम डराने वाले हैं।

Thursday, 6 October 2022

दिवंगत कॉमरेड अरविंद सिंह के नाम पर एक ट्रस्ट

दिवंगत कॉमरेड अरविंद सिंह के नाम पर एक ट्रस्ट बना था, जिसमें बतौर ट्रस्टी मेरा भी नाम था। लेकिन, अब मैं खुद को धतकरमी लाला शशिप्रकाश के गिरोह से किसी भी प्रकार से सम्बद्ध नहीं पाता तो क्या ही बेहतर होगा कि ट्रस्टीशिप से मुझे अलग कर दिया जाए। लाला शशिप्रकाश ने अपनी इकटंगड़ी, गिरि-लंघी औलाद की खिदमत के लिए जांबियों की फौज तैयार की है, जो मेरी तरह साधारण मनुष्य थे सब भाग खड़े हुए और जो सत्यम वर्मा की तरह के जांबी थे सब मज़बूती से लाला की इकलौती औलाद की चड्ढी धो रहे हैं। पैसा कमाने के लिए लाला-गिरोह अगर गाँजा बेचता, पेडलर-सप्लायर का काम करता तो शायद फिर भी क्षम्य होता लेकिन मार्क्सवाद को बेचकर जलेबी खाने के हुनर को तो हिकारत की नज़र से ही देखा जाएगा।


फ़ासीवाद के खिलाफ सांस्कृतिक मार्च से प्रारंभ होगा जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन Dr. A. K Rai October 6, 2022



रायपुर में जुटेंगे देश के पांच सौ से ज्यादा लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी



रायपुर। लेखक-संस्कृतिकर्मियों के महत्वपूर्ण संगठन "जन संस्कृति मंच" का 16 वां दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन 8 अक्टूबर से रायपुर में पंजाब केसरी भवन में आयोजित है। इस दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर से 500 से अधिक प्रतिनिधियों के अलावा जाने माने साहित्यकार, लेखक, संस्कृतिकर्मी भाग लेंगे।
यह जानकारी जन संस्कृति मंच छत्तीसगढ़ के संयोजक सियाराम शर्मा ने दी। उन्होंने बताया कि जन संस्कृति मंच का यह सम्मेलन फ़ासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध, आजादी और लोकतंत्र की संस्कृति के लिए जैसे महत्वपूर्ण विषय पर केन्द्रित है।
सम्मेलन में लेखक-संस्कृतिकर्मी फ़ासीवाद के खिलाफ सांस्कृतिक शक्तियों को एकजुट करने और सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूपों पर गहनता से विचार विमर्श कर योजना व रणनीति बनाएंगे।
कार्यक्रम का शुभारंभ 8 अक्टूबर को प्रातः आठ बजे सांस्कृतिक मार्च के साथ सम्मेलन प्रारंभ होगा। देशभर के लेखक, संस्कृतिकर्मियों और कलाकारों का यह मार्च बैरनबाजार स्थित आशीर्वाद भवन से प्रारम्भ होकर आंबेडकर चौक और फिर वहां से शंकर नगर स्थित भगत सिंह चौक तक जायेगा उसके बाद सभी प्रतिनिधि जोरा स्थित पंजाब केसरी भवन पहुंचेंगे.
सम्मेलन के पहले दिन तीन सत्र होंगे। दोपहर 12 बजे पहला सांगठनिक सत्र होगा और अपरान्ह चार बजे सम्मेलन का उद्घाटन होगा। सम्मेलन में उद्घाटन वक्तव्य प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार देंगे। मुख्य अतिथि के रूप में जाने माने कवि देवी प्रसाद मिश्र होंगें। विशिष्ट अतिथि के बतौर जुझारू आदिवासी एक्टिविस्ट सोनी सोरी, प्रसिद्ध फिल्मकार मेघनाथ और 'मैं एक कारसेवक था' जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक भंवर मेघवंशी और किसान आंदोलन में ट्राली टाइम्स अखबार निकालकर देश-विदेश में चर्चित हुईं युवा एक्टिविस्ट नवकिरन नट्ट सम्मेलन को सम्बोधित करेंगी‌। शाम साढ़े छह बजे से सांस्कृतिक सत्र शुरू होगा जिसमें वसु गंधर्व और अजुल्का द्वारा हिंदी कविताओं की सांगीतिक प्रस्तुति दी जाएगी। इस सत्र में शशिकला और उनके साथी छत्तीसगढ़ी प्रतिनिधि गीतों की और निवेदिता शंकर सितार वादन की प्रस्तुति देंगी। पटना के कोरस नाट्य दल द्वारा रजिया सज्जाद जहीर की कहानी और मात्सी शरण के निर्देशन में नमक नाटक का मंचन व झारखंड की सांस्कृतिक मंडली द्वारा नृत्य-गीत प्रस्तुत किया जायेगा। इसके अलावा विभिन्न राज्यों से आ रहे जन गायक-नीतिश राय, बाबुनी मजूमदार (पश्चिम बंगाल), अनिल अंशुमन, प्रमोद यादव, सिंहासन यादव, कृष्ण कुमार निर्माही, संतोष झा, राजू रंजन (बिहार) और बृजेश यादव (उत्तर प्रदेश) जनगीत और लोक गीत प्रस्तुत करेंगे।

सम्मेलन के दूसरे दिन दोपहर 12 बजे फासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध के रूप विषय पर वैचारिक सत्र होगा। इस सत्र में वरिष्ठ कवि लाल्टू, चर्चित उपन्यासकार रणेन्द्र, गुजराती लेखक भरत मेहता, नई पीढ़ी की सशक्त कवि रूपम मिश्र, पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक कार्यकर्ता दीपक मित्रा, तेलंगाना से के लेखक एनआर श्याम, उड़ीसा के राधाकांत सेठी का वक्तव्य होगा। सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध मार्क्सवादी चिंतक रामजी राय करेंगे। इसके उपरान्त प्रतिनिधि राष्ट्रीय परिषद, कार्यकारिणी व पदाधिकारियों का चुनाव किया जायेगा। शाम को बिहार के बेगुसराय का नाट्य दल रंगनायक द लेफ्ट थियेटर की नाट्य प्रस्तुति अमृतसर आ गया है, का मंचन, कविता पाठ और रायपुर के युवा साथियो के इंडियन रोलर बैंड का कार्यक्रम सम्पन्न होगा।
सम्मेलन में चार प्रकाशकों-नवारूण, समकालीन जनमत, वैभव प्रकाशन, एकलव्य प्रकाशन व सेतु प्रकाशन द्वारा पुस्तक प्रदर्शनी लगायी जाएगी। कवि, लेखक एवं जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य अजय कुमार की चित्र प्रदर्शनी के संभावना कला मंच गाजीपुर व कोलकाता से आ रहे चर्चित युवा चित्रकार अनुपम राय अपनी कला चित्रों की प्रदर्शनी लगाएंगे तो वहीं कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों और पत्रिकाओं का विमोचन भी होगा।

सम्मेलन में जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र कुमार, रांची से वरिष्ठ लेखक रविभूषण, कथाकार शिवमूर्ति, आलोचक प्रणय कृष्ण, कवि बल्ली सिंह चीमा, प्रख्यात रंगकर्मी जहूर आलम, उमा राग, शालिनी बाजपेयी, अनुपम सिंह, प्रीति प्रभा, बलभद्र, राजेश कमल, सुरेंद्र प्रसाद सुमन, दीपक सिन्हा, केके पांडेय मीना राय, समता राय, सोनी तिरिया सहित कई नामचीन लेखक-कवि-कलाकार शामिल हो रहे हैं। मुक्तिबोध और प्रख्यात मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की स्मृति में स्वागत द्वार बनाए जाएंगे। प्रख्यात रंगकर्मी हवीब तनवीर की स्मृति में सम्मेलन स्थल को हबीब तनवीर स्मृति परिसर, प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल की स्मृति में सभागर का नाम मंगलेश डबराल सभागार, जन संस्कृति मंच के महासचिव रहे बृजबिहारी पांडेय व प्रसिद्ध रामनिहाल गुंजन की स्मृति में सभा मंच का नाम बृजबिहारी पांडेय-रामनिहाल गुंजन स्मृति मंच रखा गया है‌। पुस्तक प्रदर्शनी को प्रसिद्ध नारीवादी कार्यकर्ता व लेखिका कमला भसीन और चित्र-कला प्रदर्शनी को युवा चित्रकार राकेश दिवाकर की स्मृति में समर्पित किया गया है।

Wednesday, 5 October 2022

नई शिक्षा नीति -शिक्षकों का शोषण, कॉर्पोरेट निवेशकों का पोषण


1. अधिकांश मिहनतकस गरीब लोग चाहते है कि उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़े लेकिन उन जैसों के लिए प्राइवेट स्कूल में बच्चों को  पढा पाना बहुत मुश्किल है। बड़े प्राइवेट स्कूलों में बच्चे पढ़ाने से तो आधे से ज्यादा वेतन खत्म हो जाएगा और सरकारी स्कूल में  पढाई अच्छी नही है।

2. सरकार शिक्षा का निजीकरण कर रही है, इसका सीधा मतलब है- शिक्षा सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोगो के लिये मुनाफा कमाने का अवसर प्रदान करेगा जब कि विशाल गरीब मिहनतकस जनता अपने बच्चों को आर्थिक कारणो से इन निजी स्कूलों में भेजने में असमर्थ रहेगी। 

3. नई शिक्षा नीति में सरकारी स्कूलों की शिक्षा में सुधार या उनकी संख्या में वृद्धि को ले कर कोई चर्चा नही है जबकि इस देश बहुसंख्यक मजदूर जनता के बच्चे अपनी शिक्षा इन्ही सरकारी स्कूलों से ले पाते है।

4. 'नई शिक्षा नीति' का दस्तावेज खुद स्वीकार करता है कि देश में अब भी 25% यानी 30 करोड़ से ऊपर लोग अनपढ़ हैं फिर भी इसमें शिक्षा की सार्वभौमिकता का पहलू छोड़ दिया गया है। यानी शिक्षा की पहुंच को आखिरी आदमी तक ले जाने की कोई ज़रूरत नहीं।

5. सरकार का सारा ध्यान इस बात पर है कि शिक्षा के क्षेत्र को एक मुनाफे का सेक्टर (Profitable Sector) बनाने के लिये सरकारी खर्च  बढाना (वर्तमान 3% से 6% करने का प्रस्ताव) ताकि शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते  कॉर्पोरेट और निजी निवेश का मुनाफा सुनिश्चित किया जा सके।

6. नई शिक्षा नीति में शिक्षा के क्षेत्र में निवेश कर रहे शेयर होल्डरों, कॉर्पोरेट निवेशकों के हितों को प्राथमिकता दी गयी है, "सबको शिक्षा"  का राष्टीय उद्देश्य अब बहुत पीछे छूट गया है, शिक्षा अब बाजार में बिकने वाला एक माल बन गया है। शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे अधिकांश शिक्षकों का बेतहासा शोषण और कॉर्पोरेट निवेशकों के मुनाफे का पोषण- यह है नई शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य।

7. कोरोनाकाल मे डिजिटल तकनीक के प्रयोग की बाध्यता के चलते बहुत सारे प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक सड़क पे आ चुके हैं। नई शिक्षा नीति डिजिटल तकनीक के व्यापक प्रयोग की बात करता है। यह शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त बेरोजगारी को और बढ़ाएगी। इसके अलावे, बहुत से बच्चे डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट अफ़्फोर्ड नही करने के चलते इस तरह की शिक्षा से वंचित हो जाने को विवश हो जाते है।

रावण

22 रावण बेहमई वाले(जिन्होंने फूलन देवी को निर्वस्त्र करके पूरे गांव में घुमाया और बंदी बनाकर तीन सप्ताह तक उनके साथ गैंग रैप करते रहे ) जैसे.......
आज भी कई रावण उस रावण का पुतला दहन किए होंगे,जिस रावण ने सीता माता को छुआ तक नहीं था।

हम होंगे कामयाब


हम होंगे कामयाब 

आ.. आ.. आ..
होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो हो मन मे है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन

हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो हो मन मे है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन


(होगी शांति चारो ओर)-3
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होगी शांति चारो ओर एक दिन

(होंगी शांति चारो ओर)-3
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होगी शांति चारो ओर एक दिन

आ.. आ..

(हम चलेंगे साथ-साथ
लेके हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन)-2

(नहीं डर किसी का आज
नहीं डर किसी का आज
नहीं डर किसी का आज एक दिन
हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज एक दिन)-2

(हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो हो मन मे है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन)-2

(हम होंगे कामयाब एक दिन)-3

https://youtu.be/aGTUFbxRbgk


2. CHEMICAL WORKERS' SONG (1964)


Click to listen: https://youtu.be/GzcGOgxDoEk

(Version: Recorded by 'Great Big Sea' in 1995)


The poor safety and health conditions workers endured in the chemical industry are the theme of "The ICI Song", also known as

"The Chemical Worker's Song" and "Process Man".  The song was written and recorded in 1964 by Ron Angel in Cleveland, UK, an

area known for its chemical industry.

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LYRICS:


And it's go boys, go

They'll time your every breath

And every day you're in this place

You're two days nearer death

But you go


Well, a Process Man am I and I'm tellin' you no lie

I work and breathe among the fumes that trail across the sky

There's thunder all around me and there's poison in the air

There's a lousy smell that smacks of hell and dust all in me hair


And it's go boys, go

They'll time your every breath

And every day you're in this place

You're two days nearer death

But you go


Well, I've worked among the spinners, and I breathe the oily smoke

I've shovelled up the gypsum and it nigh on makes you choke

I've stood knee deep in cyanide, got sick with a caustic burn

Been workin' rough, I've seen enough to make your stomach turn


And it's go boys, go

They'll time your every breath

And every day you're in this place

You're two days nearer death

But you go


There's overtime and bonus opportunities galore

The young men like their money and they all come back for more

But soon you're knockin' on and you look older than you should

For every bob made on the job, you pay with flesh and blood


And it's go boys, go

They'll time your every breath

And every day you're in this place

You're two days nearer death

But you go


Tuesday, 4 October 2022

गाँधी: एक पुनर्मूल्‍यांकन - कात्‍यायनी


गाँधी का व्‍यक्तित्‍व विराट था और उसके व्‍यक्तित्‍व और चिन्‍तन के अन्‍तरविरोध भी उतने ही गहरे थे। दार्शनिक स्‍तर पर उनका चिन्‍तन रस्किन, थोरो और तोल्‍स्‍तोय की जमीन पर खड़ा था, लेकिन इन चिन्‍तकों के मानवतावादी यूटोपिया को भारतीय रूपरंग में ढालते हुए गाँधी ने हिन्‍दू धर्म की पारम्‍परिक कूपमण्‍डूकताओं, अंधविश्‍वासों, संकीर्णताओं से उसे सराबोर कर दिया था। वह अपने को सनातन धर्म का अनुयायी मानते थे और आचरण से एक उदार हिन्‍दू थे। चातुर्वर्ण्‍य को वे आदर्शीकृत करके सामाजिक श्रम-विभाजन के रूप में स्‍थापित करना चाहते थे और अस्‍पृश्‍यता को समाप्‍त करना चाहते थे। जाहिर है कि यह एक उदार हिन्‍दू का यूटोपिया था। व्‍यवहारत: धर्म के उदारीकरण की नेक से नेक कोशिश धर्म के सामाजिक आधार और स्‍वीकार्यता को ही मजबूत बनाती है और अमली तौर पर हमारे सामाजिक जीवन में धर्म के दखल (चाहे जितने भी उदार रूप में) जब बढ़ती है तो अंततोगत्‍वा धार्मिक वर्जनाओं, रूढ़ि‍यों और संस्‍कारों के दबाव कठोर और कट्टर रूप में ही सामने आते हैं, जिनके सर्वाधिक शिकार शोषित-उत्‍पीडि़त आम आबादी और स्त्रियाँ ही होती हैं। गाँधी धर्मनिरपेक्षता की जगह सर्वधर्म समभाव की बात करते थे। एक बहुधार्मिक समाज में सामाजिक-राजनीतिक दायरों से धर्म को य‍दि पूरी तरह अलग नहीं किया जाये, तो सर्वधर्म समभाव की लाख दुहाई देने के बावजूद, बहुसंख्‍या के धर्म का प्रभाव अन्‍ततोगत्‍वा वर्चस्‍वकारी रूपों में सामने आयेगा ही, और वस्‍तुगत तौर पर धार्मिक बहुसंख्‍यावाद की ज़मीन मजबूत होगी ही।

गाँधी के ग्राम स्‍वराज्‍य की अवधारणा उत्‍पादन की पिछड़ी हुई पुरानी तकनीक के आधार पर स्‍वावलम्‍बी-स्‍वायत्‍त ग्राम समुदायों की अर्थव्‍यवस्‍था का यूटोपिया पेश करती थी, लेकिन सामंती भूस्‍वामियों से बलात् भूस्‍वामित्‍व छीनने के बजाय वे उन्‍हें समझा-बुझाकर कायल करने के पक्षधर थे। इसी कारण से, एक ओर तो काश्‍तकार किसानों की पिछड़ी चेतना वाली, धर्मभीरु और ज़मीनों का मालिक बनने की आकांक्षी भारी आबादी गाँधी के पीछे लामबंद हुई, दूसरी ओर किसान विद्रोहों की संभावना से भयभीत सामंतों को भी गाँधी का यूटोपिया फिलहाली तौर पर अपने लिए मुफीद जान पड़ा और गाँधी उनके खुले विरोध को रोक पाने में काफी हद तक सफल रहे। देश के बहुतेरे सामंत कांग्रेस में शामिल भी हुए या कम से कम उसका विरोध नहीं किया, क्‍योंकि उन्‍हें भरोसा था कि स्‍वाधीनता य‍दि गाँधीवादी नेतृत्‍व में हासिल होगी तो बलात् उनकी भूसम्‍पत्ति छीनी नहीं जायेगी और य‍दि भूमि-सुधार किसी रूप में होंगे भी तो उनके हितों की हिफाज़त का पूरा खयाल रखा जायेगा।

गाँधी श्रम और पूँजी के बीच के अन्‍तरविरोध को हल करने की स्‍वाभाविक क्रान्तिकारी प्रक्रिया को अपनाने के बजाय उनके बीच सामंजस्‍य का सिद्धान्‍त प्रस्‍तुत करते थे। ट्रस्‍टीशिप का सिद्धान्‍त पूँजीपतियों को इस बात का कायल करने की बात करता था कि वे स्‍वयं को सामाजिक सम्‍पदा का ट्रस्‍टी और मज़दूरों का संरक्षक/अभिभावक समझें।  जाहिर है कि दार्शनिक स्‍तर पर बहुत भोंड़े किस्‍म के प्रत्‍ययवादी होने के साथ ही गाँधी राजनीतिक अर्थशास्‍त्र का ककहरा भी नहीं जानते-समझते थे। मार्क्‍सवाद तो उन्‍होंने एकदम पढ़ा ही नहीं था ( इसीलिए समाजवाद और कम्‍युनिज्‍़म की उन्‍होंने जहाँ कहीं भी आलोचना की है, वह बेहद चलताऊ और सतही अनुभववादी किस्‍म की थी ), एडम स्मिथ और रिकार्डो के क्‍लासिकी बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्‍त्र से भी उनका कोई परिचय नहीं था। अमूर्त वैज्ञानिक अवधारणाओं से प्रस्‍थान करने और पूँजीवाद को उत्‍पादन का एक शाश्‍वत और प्राकृतिक रूप मानने के बावजूद क्‍लासिकी बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्‍त्र की सबसे बड़ी उपलब्धि थी 'मूल्‍य के श्रम सिद्धान्‍त' (लेबर थियरी ऑफ वैल्‍यू) की खोज। गाँधी ने अगर इसका थोड़ा भी अध्‍ययन किया होता तो ट्रस्‍टीशिप के अपने सिद्धान्‍त का प्रतिपादन कत्‍तई नहीं करते।

गाँधी उत्‍पादक शक्तियों के निरंतर विकास और तदनुरूप उत्‍पादन-सम्‍बन्‍धों में बदलाव के साथ युग-परिवर्तन की ऐतिहासिक गति की कोई समझ नहीं रखते थे। पूँजीवाद की तमाम विभीषिकाओं के लिए गाँधी उत्‍पादन के साधनों के निजी स्‍वामित्‍व और माल-उत्‍पादन (मुनाफे के लिए उत्‍पादन) को जिम्‍मेदार मानने की जगह कारखाना-उत्‍पादन में उन्‍नत तकनोलॉजी, मशीनों और स्‍वचालन को‍ जिम्‍मेदार मानते थे और इसके विकल्‍प के तौर पर छोटे पैमाने के उत्‍पादन (हस्‍तशिल्‍प, कुटीर उद्योग, ग्रामीण किसानी अर्थव्‍यवस्‍था) पर बल देते थे। हालाँकि उनके इस सिद्धान्‍त और व्‍यवहार का एक अहम अन्‍तरविरोध यह था कि भारत के जो बड़े पूँजीपति कांग्रेस के और गाँधी की विभिन्‍न संस्‍थाओं के वित्‍तपोषक थे, उनमें से एक को भी गाँधी छोटे पैमाने के उत्‍पादक उपक्रमों की ओर नहीं मोड़़ सके। उल्‍टे गाँधी के जीवनकाल में कांग्रेस समर्थक भारतीय पूँजीपतियों के स्‍वामित्‍व वाले बड़े उद्योगों का लगातार तेज गति से विकास हुआ। बहरहाल, सिद्धान्‍त और व्‍यवहार के इस अन्‍तरविरोध को दरकिनार करके हम गाँधी के इस आर्थिक चिन्‍तन की पड़ताल करें। विज्ञान और तकनोलॉजी का विकास उत्‍पादक शक्तियों के निरंतर विकास की नैसर्गिक प्रक्रिया का अंग है जो मानव सभ्‍यता के प्रारम्‍भ काल से ही निरंतर जारी है। उत्‍पादन की प्रक्रिया के दौरान मनुष्‍य सुनिश्चित उत्‍पादन-सम्‍बन्‍धों में बँधते हैं और यही उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध जब उत्‍पादक शक्तियों के विकास को अवरुद्ध करने लगते हैं तो उत्‍पादक शक्तियाँ उन्‍हें नष्‍ट कर नये उत्‍पादन-सम्‍बन्‍धों का निर्माण करती हैं और इतिहास नये युग में प्रवेश करता है। इतिहास की इसी स्‍वाभाविक गति से सामन्‍ती उत्‍पादन-सम्‍बन्‍धों को तोड़कर पूँजीवादी उत्‍पादन-सम्‍बन्‍ध अस्तित्‍व में आये। पूँजीवाद के अन्‍तर्गत समस्‍या वे मशीनें नहीं हैं जो सामूहिक तौर पर लोगों को बड़े पैमाने पर उत्‍पादन में सक्षम बनाती हैं, बल्कि समस्‍या उत्‍पादन और वितरण के वे सम्‍बन्‍ध हैं जिनके अन्‍तर्गत उत्‍पादन के साधनों के स्‍वामी सामाजिक उपयोगिता को नहीं बल्कि मुनाफे को केन्‍द्र में रखकर उत्‍पादन करते हैं, नयी-नयी मशीनों का इस्‍तेमाल केवल उत्‍पादक वर्गों से ज्‍यादा से ज्‍यादा अधिशेष निचोड़ने और मुनाफे की दर को बढ़ाने के लिए करते हैं तथा लूट की आपसी होड़ में युद्धों और पर्यावरण की तबाही को जन्‍म देते हैं। पनचक्‍की, करघा, रहट आदि भी मशीनें ही हैं, फर्क बस यह है कि वे पुराने ज़माने की मशीनें हैं। गाँधी पूँजीवाद की आन्‍तरिक गतिकी को नहीं समझ पाने के कारण, तमाम पूँजीवादी विभीषिकाओं का कारण मशीनों और स्‍वचालन को मान बैठते थे और इतिहास के चक्‍के को ठेलकर पीछे ले जाने की वकालत करते थे। यह एक प्रतिक्रियावादी यूटोपिया था। गाँधी से काफी पहले, ऐसा ही यूटोपियाई नज़रिया उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में स्विस अर्थशास्‍त्री सिसमोंदी ने और फिर फ्रांसीसी अर्थशास्‍त्री जोसेफ प्रूधों ने (गाँधी से अधिक परिष्‍कृत तर्कों के साथ) प्रस्‍तुत किया था और फिर इन्‍हीं विचारों का नया संस्‍करण उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के उत्‍तरार्द्ध में रूस में नरोदवादियों ने प्रस्‍तुत किया था। निम्‍नपूँजीवादी दृष्टिकोण से पूँजीवाद की समालोचना प्रस्‍तुत करने वाला सिसमोंदी आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में स्‍वच्‍छंदतावाद (रोमैण्टिसिज्‍़म) का एक 'टिपिकल' प्रतिनिधि था जो मानता था कि पूँजीवाद के अन्‍तर्गत मेहनतकश जनता की तबाही और आर्थिक संकट अपरिहार्य हैं, लेकिन पूँजीवाद के बुनियादी अन्‍तरविरोधों और आन्‍तरिक गतिकी को नहीं समझ पाने के कारण, समाधान के तौर पर वह छोटे पैमाने के उत्‍पादन की ओर लौटने की बात करता था और इसतरह इतिहास-चक्र को पीछे की ओर लौटाने का नुस्‍खा सुझाने लगता था। सिसमोंदी, प्रूधों और नरोदवादियों के विचारों की विस्‍तृत आलोचना मार्क्‍स-एंगेल्‍स, प्‍लेखानोव और लेनिन ने प्रस्‍तुत की थी। निम्‍न-पूँजीवादी राजनीतिक अ‍र्थशास्‍त्र के इन प्रतिनिधियों का पद्धतिशास्‍त्र द्वैतवादी और सारसंग्रहवादी तथा दृष्टिकोण प्रत्‍ययवादी था। सामाजिक उत्‍पादन-प्रणाली के विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं समझ पाने के कारण ये अर्थशास्‍त्री उसकी बुनियाद "अच्‍छा" और "न्‍याय" जैसे नैतिक आदर्शों में ढूँढ़ने की कोशिश करते थे। उनके इस प्रतिक्रियावादी यूटोपिया के बरक्‍स यूटोपियाई समाजवादियों का यूटोि‍पया प्रगतिशील था जो मानता था कि मेहनतकश जनता का उसके श्रम के सम्‍पूर्ण उत्‍पाद पर अधिकार है और इसी लक्ष्‍य-प्राप्ति के लिए सामाजिक ढॉंचे का पुनर्गठन अनिवार्य है। गाँधी का यूटोपिया सिसमोंदी और प्रूधों के प्रतिक्रियावादी यूटोपिया का एक भोंडा भारतीय संस्‍करण था। आगे चलकर चरणसिंह ने अपनी पुस्‍तकों'गाँधियन पाथ' और 'इकोनॉमिक नाइटमेयर ऑफ इण्डिया' में इसी गाँधीवादी यूटोपिया को अधिक परिष्‍कृत ढंग से प्रस्‍तुत किया लेकिन वे भी सिसमोंदी और नरोदवादियों के तर्कों से रंचमात्र भी आगे नहीं बढ़ पाये।

अब हम गाँधी के अहिंसा के सिद्धान्‍त पर आते हैं। इतिहास के तथ्‍य इस सत्‍य की गवाही देते हैं कि नयी सामाजिक व्‍यवस्‍था के जन्‍म में बल की भूमिका हमेशा से धाय की होती रही है। हेराल्‍ड लास्‍की के शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते हुए कहा जा सकता है कि हर राजनीतिक-सामाजिक ढाँचागत बदलाव में हिंसा या हिंसा का तथ्‍य (फैक्‍ट ऑफ वॉयलेंस) अन्‍तर्निहित होता है।  हर सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को शासक वर्ग के हितों की दृष्टि से राज्‍यसत्‍ता ही संचालित और नियंत्रित करती है। सामाजिक-आर्थिक ढाँचों को बदलने का काम शासित वर्ग पुरानी राज्‍यसत्‍ता का बलात् ध्‍वंस करके और नयी राज्‍यसत्‍ता का निर्माण करके ही कर सकते हैं। गाँधी के चिन्‍तन में सामाजिक संरचना और राज्‍यसत्‍ता के वर्ग चरित्र की ऐतिहासिक समझ नहीं थी। उनकी यह समझ थी कि कुछ सुनिश्चित आदर्शों को शासन करने वाले लोग य‍दि निजी जीवन की तरह सार्वजनिक जीवन में भी लागू करें तो आदर्श समाज का निर्माण किया जा सकता है। उनका प्रत्‍ययवादी चिन्‍तन समाज विकास के सुनिश्चित वस्‍तुगत नियमों की अनदेखी करके उसके अमूर्त नैतिक आदर्शों और उनका अनुपालन करने वाले व्‍यक्तियों के आचरण द्वारा संचालित और नियंत्रित होने में विश्‍वास रखता था और निजी जीवन के स्‍पेस और राजनीतिक जीवन के सार्वजनिक स्‍पेस के अन्‍तर को पूरी तरह मिटा देता था। गाँधी का इतिहास-बोध मूलत: धार्मिक विश्‍व-दृष्टिकोण पर आधारित था जो अमूर्त-निरपेक्ष नैतिक आदर्शों और उनका पालन करने वाले नायकों को इतिहास की चालक शक्ति के रूप में देखता था। यही कारण है कि अपने आन्‍तरिक तर्क और व्‍यवहार में उनका अहिंसा का सिद्धान्‍त तमाम अन्‍तरविरोधों के मकड़जाल में उलझ जाता था। स्‍वयं गाँधी ही इस बात को मानते थे कि हिंसा का मतलब केवल रक्‍तपात ही नहीं होता, किसी भी रूप में य‍दि दबाव और बलप्रयोग किया जाता है तो वह हिंसा है। अहिंसा का सिद्धान्‍त केवल नैतिक दृष्टि से कायल कर देने या हृदय-परिवर्तन को ही सही ठहराता है। सत्‍याग्रह और उपवास को गाँधी इसीका साधन मानते थे। लेकिन व्‍यवहारत: गाँधी की राजनीति आद्यंत 'समझौता-दबाव-समझौता' की राजनीति ही बनी रही। गाँधी के ही नेतृत्‍व में किसी आन्‍दोलन ने अंग्रेजों को य‍दिद रियायतें देने के लिए बाध्‍य किया तो इसका कारण अंग्रेजों का हृदय-परिवर्तन या नैतिक पराजय का अहसास नहीं था, बल्कि किसी संभावित देशव्‍यापी जनउभार और परिणतियों का भय था। अंग्रेज इस देश को हृदय-परिवर्तन या नैतिक पराजय के कारण छोड़कर नहीं गये, बल्कि उसके पीछे तत्‍कालीन विश्‍व-परिस्थितियों का और देशव्‍यापी उग्र जनसंघर्षों का बाध्‍यताकारी दबाव था। उपनिवेशवादी इस बात को समझ चुके थे कि य‍दि अब भी वे भारतीय बुर्जुआ वर्ग की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस को सत्‍ता हस्‍तांतरित करके भारत को राजनीतिक आजा़दी नहीं देंगे तो उन्‍हें किसी उग्र जनक्रान्ति का सामना करना पड़ेगा।

अतीत में भी गाँधी का व्‍यवहार हमेशा उनके अहिंसा सिद्धान्‍त के अनुरूप नहीं दीखता। दक्षिण अफ्रीका प्रवास के समय गाँधी ने बोअर युद्ध में जब ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का सक्रिय समर्थन किया था, उस समय रस्किन और तोल्‍स्‍तोय के प्रभाव में वे अहिंसा के सिद्धान्‍त को अपना चुके थे। 1906 में जुलू विद्रोह को बर्बरतापूर्वक कुचल रहे उपनिवेशवादियों का साथ देने और "उपनिवेश की रक्षा में अपनी भूमिका निभाने के लिए" उन्‍होंने सभी भारतीयों का आह्वान किया था और उनकी इस सक्रिय भूमिका के लिए औपनिवेशिक शासकों ने उन्‍हें 'सार्जेण्‍ट मेजर' भी नियुक्‍त किया था। इन दोनों प्रसंगों में तब गाँधी का तर्क यह था कि ऐसा करना शासन के प्रति प्रजा के कर्तव्‍य का नैतिक तकाजा था। बाद में 1920 में अपनी आत्‍मकथा में जुलू विद्रोह के दमन में अपनी भूमिका पर लीपापोती करते हुए गाँधी ने लिखा था : "जुलू लोगों से मुझे कोई शिकायत नहीं थी। उन्‍होंने किसी भारतीय को नुकसान नहीं पहुँचाया था। स्‍वयं 'विद्रोह' के बारे में भी मेरे सन्‍देह थे।" उन्‍होंने यह दावा भी किया कि, "मेरा हृदय जुलू लोगों के साथ था।" सत्‍ता के प्रति निष्‍ठा को जनता का कर्तव्‍य मानने वाला गाँधी का सिद्धान्‍त उस स्थिति में भी इस कर्तव्‍यपालन पर बल देता था, जबकि सरकार जनता द्वारा चुनी गयी न हो। इस मायने में जनवाद की गाँधी की समझ नितान्‍त बोदी थी और वॉल्‍तेयर, दिदेरो, रूसो, टॉमस पेन, बेंजामिन फ्रेंकलिन,वाशिंगटन, जैफर्सन आदि‍ के राजनीतिक दर्शन से उनका कोई लेना-देना नहीं था।‍  यही नहीं, बाद की कई घटनाएँ भी बताती हैं कि राज्‍यसत्‍ता के प्रति नागरिेक की निष्‍ठा के अपने इस सिद्धान्‍त को गाँधी अपने अहिंसा सिद्धान्‍त के ऊपर रखते थे। पहले विश्‍वयुद्ध के दौरान उन्‍होंने अंग्रेज सरकार के सभी युद्धकालीन प्रयासों का एक वफादार प्रजा के रूप में पूरा समर्थन दिया, यहाँ तक कि 1918 में अंग्रेजों की सहायता के लिए धन तथा सेना भरती हेतु आदमी जुटाने के लिए गाँव-गाँव का दौरा भी किया। फिर द्वितीय विश्‍वयुद्ध शुरू होने के बाद, जुलाई, 1940 में अपने पूना अधिवेशन में कांग्रेस ने इस शर्त पर ब्रिटिश युद्धप्रयास का समर्थन करते हुए प्रस्‍ताव पारित किया कि युद्ध के बाद भारत को स्‍वतंत्रता प्रदान कर दी जायेगी। यानी स्‍वतंत्रता की शर्त पर गाँधी साम्राज्‍यवादी युद्ध की भीषण हिंसा में एक साम्राज्‍यवादी शक्ति के पक्ष से भागीदारी के लिए तैयार थे। फिर सोवियत संघ पर जर्मनी के हमले के बाद युद्ध का चरित्र बदल गया और विश्‍व स्‍तर के अन्‍तरविरोधों से गलत ढंग से अपने कार्यभार निगमित करते हुए कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने राष्‍ट्रीय मुक्ति संघर्ष को युद्धकाल के दौरान स्‍थगित करने का निर्णय लिया।  भारतीय बुर्जुआ वर्ग को सत्‍ता-प्राप्ति के लिए उपनिवेशवादियों पर निर्णायक दबाव बनाने का यह उचित अवसर लगा और जुलाई, 1942 की वर्धा बैठक में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'भारत छोड़ो आन्‍दोलन' का प्रस्‍ताव पारित किया। तब गाँधी ने यह घोषणा की थी कि यह आन्‍दोलन, जो व्‍यापक नागरिक अवज्ञा आन्‍दोलन का रूप लेगा, अहिंसा की सीमाओं के बाहर भी जा सकता है। 1942 के 'भारत छोड़ो' आन्‍दोलन के दौरान छिटपुट हिंसा की बहुतेरी घटनाएँ घटी, लेकिन चौरीचौरा काण्‍ड के बाद सत्‍याग्रह वापस लेने वाले गाँधी ने इस बार आन्‍दोलन वापस नहीं लिया। इससे स्‍पष्‍ट हो जाता है कि अहिंसा गाँधी के लिए सिद्धान्‍त से अधिक रणनीति का प्रश्‍न था। जनान्‍दोलनों के दौरान य‍दि हिंसा नियंत्रित हो और राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के नेतृत्‍व पर कांग्रेसी वर्चस्‍व को कोई खतरा न हो (कम्‍युनिस्‍टों की चुनौती उससमय सामने नहीं थी), तो गाँधी को हिंसा से विशेष परहेज नहीं था।

एक बात और गौरतलब है। गाँधी प्रजानिष्‍ठा के सिद्धान्‍त के तहत शासक वर्ग की हिंसा के पक्ष में तो कई बार खड़े हुए, लेकिन क्रान्तिकारी हिंसा उन्‍हें किसी भी रूप में स्‍वीकार्य नहीं थी। गाँधी-इरविन समझौते के दौरानभगतसिंह और उनके साथियों की फाँसी रुकवाने के लिए अनुकूल स्थिति होने पर भी दबाव न बनाना ए‍क ऐसा ऐतिहासिक तथ्‍य है, जो गाँधी के राजनीतिक व्‍यवहार पर गम्‍भीर प्रश्‍न खड़े करता है। जो गाँधी क्रान्तिकारियों की हिंसात्‍मक कार्रवाइयों के कटु आलोचक थे, उन्‍होंने क्रान्तिकारियों को फाँसी देने वाली शासक वर्ग की हिंसा के विरुद्ध आन्‍दोलन करना तो दूर, कोई आलोचनात्‍मक वक्‍तव्‍य तक नहीं दिया। चन्‍द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्‍व में गढ़वाल रेजिमेण्‍ट के विद्रोह की और 1946 के नौसेना विद्रोह की भी उन्‍होंने कड़े शब्‍दों में भर्त्‍सना की थी। मज़दूर हड़तालों को वे हिंसात्‍मक कार्रवाई मानते थे और शुरू से ही उनका विरोध करते आये थे। फिर भी हम यह नहीं मानते कि गाँधी एक पाखण्‍डी व्‍यक्ति थे। अहिंसा-सिद्धान्‍त में उनकी गहरी आस्‍था थी, लेकिन राजनीतिक व्‍यवहार के दौरान इसी को लेकर वे सर्वाधिक अन्‍तरविरोधों के शिकार होते थे और जब चुनने का सवाल आता था तो एक कुशल व्‍यवहारवादी (प्रैग्‍मेटिस्‍ट) बुर्जुआ राजनीतिज्ञ की तरह वे सिद्धान्‍त की जगह उस व्‍यवहारिकता को प्राथमिकता देते थे जो बुर्जुआ वर्गहित की दृष्टि से हालात का तका़जा़ होता था। राजनीति की दुनिया ठोस व्‍यवहार की दुनिया होती है। सिद्धान्‍तों के अमूर्त अन्‍तरविरोध वहाँ दिन के उजाले की तरह साफ हो जाते हैं और विशेष वर्गहित का दबाव किसी इतिहास-पुरुष को भी अमूर्त आदर्शों को तिलांजलि देकर ठोस व्‍यवहार की ज़मीन पर उतरने के लिए बाध्‍य कर देता है। गाँधी य‍दि साहित्‍यकार होते, तो शायद भारत के तोल्‍स्‍तोय होते। तोल्‍स्‍तोय य‍दि भारत में पैदा होकर (और हिन्‍दू के रूप में पैदा होकर) राजनीति की दुनिया में होते, तो शायद, काफी हद तक, गाँधी सरीखे ही होते। बीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध के भारत में, क्‍लासिकी बुर्जुआ मानवतावाद राजनीति और समाज-नीति में गाँधी के मानवतावाद के रूप में ही मूर्त हो सकता था।

स्‍त्री के बारे में भी गाँधी की जो सोच थी, वह हिन्‍दू धर्म की रूढियों और पूर्वाग्रहों में लिथड़ी हुई एक ऐसी मानवतावादी सोच थी, जो शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान, नृतत्‍वशास्‍त्र और इतिहास की तमाम आधुनिक वैज्ञानिक स्‍थापनाओं से एकदम अपरिचित थी। घरेलू कामों और पति की सेवा को गाँधी स्त्रियों की विशिष्‍ट जिम्‍मेदारी मानते थे और निजी जीवन में भी उनका आचरण ऐसा ही था। वे प्रकृति से ही स्त्रियों को पुरुषों से सर्वथा भिन्‍न मानते थे। सामाजिक-राजनीतिक कार्यों में स्त्रियों की भागीदारी और स्‍त्री-शिक्षा का पक्षधर होते हुए भी वे स्त्रियों को प्राकृतिक रूप से पुरुषों की बराबरी के काबिल नहीं मानते थे और उन्‍हें संरक्षण देना पुरुषों का कर्तव्‍य मानते थे। स्‍त्री उनके लिए एक ऐसा जीव थी जो स्‍वाभाविक तौर पर पुरुषों की दया, करुणा और संरक्षण की हक़दार थी। नैतिकता और यौन-सम्‍बन्‍धों के बारे में गाँधी की सोच हिन्‍दू धर्म की रूढि़यों के साथ ही विक्‍टोरियन मूल्‍य-व्‍यवस्‍था से भी प्रभावित थी। वे यह मानते ही नहीं थे कि स्‍त्री के भीतर भी यौनिक कामना या काम भावना होती है। स्‍त्री का सारा सुख पुरुष को सुख या आनन्‍द देने में ही निहित होता है, वह मात्र संतानोत्‍पत्ति और पुरुष की कामक्षुधापूर्ति का साधन होती है। इसलिए ज्‍यादा से ज्‍यादा छूट देकर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि वे स्‍त्री को ब्रह्मचर्य-प्रयोग का मात्र एक 'पैस्सिव' उपादान समझते थे और यह अहसास ही नहीं कर पाते थे कि यह उसका इस हद तक मानसिक उत्‍पीड़न कर सकता है कि उसके पूरे जीवन और मनोजगत को ही अस्‍तव्‍यस्‍त और विश्रृंखलित कर सकता है। निस्‍संदेह, गाँधी की इस सोच और आचरण के पीछे उनके अवचेतन में मौजूद कुछ जटिल यौन-ग्रंथियों की भी शिनाख्‍त की जा सकती है और उसकी जड़ें उनके व्‍यक्तिगत जीवन में ढूँढ़ी जा सकती है, लेकिन यह मनोविज्ञान का विषय है और किन्‍हीं स्थितियों में यह अटकलबाजी भी हो सकती है जो गाँधी के दार्शनिक-राजनीतिक-सामाजिक-नैतिक विचारों और व्‍यवहार के ऐतिहासिक मूल्‍यांकन में असंतुलन या मनोगतता ला सकता है, इसलिए इसकी चर्चा यहाँ करना हम उचित नहीं समझते।

जिस देशकाल में किसी वर्ग की जैसी बनावट-बुनावट तथा ताकत और कमजोरी होती है, इतिहास उसे वैसा ही वैचारिक-राजनीतिक प्रतिनिधि देता है। भारतीय बुर्जुआ वर्ग के जन्‍म और विकास की प्रक्रिया कृषि से दस्‍तकारी में मैन्‍यूफैक्‍चरिंग वाली यात्रा नहीं थी, 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति' वाली यात्रा नहीं थी। भारत में पूँजीवाद के नैसर्गिक विकास के भ्रूणों को तो उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया 1740 से 1857 के दौरान ही नष्‍ट कर चुकी थी। वर्तमान भारतीय पूँजीवाद औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की कोख से जन्‍मा और साम्राज्‍यवादी विश्‍व-परिवेश में पल-बढ़कर वयस्‍क हुआ। इस रुग्‍ण, जन्‍मना विकलांग पूँजीवाद ने एक चतुर बौने जैसा आचरण करते हुए पुराने मूल्‍यों से समझौता किया तथा जनसंघर्षों के दबाव और साम्राज्‍यवाद के संकट एवं अन्‍तरविरोधों का इस्‍तेमाल करते हुए, 'समझौता-दबाव-समझौता' की रणनीति का इस्‍तेमाल करते हुए राजनीतिक सत्‍ता-प्राप्ति तक की यात्रा तय की। ऐसे वर्ग के सिद्धान्‍तकार दिदेरो, रूसो, वाल्‍तेयर, टॉमस पेन आ‍दि जैसे लोग और राजनीतिक प्रतिनिधि वांशिगटन, जैफर्सन, लिंकन आ‍दि जैसे लोग हो ही नहीं सकते थे। गाँधी जैसा व्‍यक्तित्‍व ही इसका सिद्धान्‍तकार और राजनीतिक प्रतिनिधि हो सकता था। गाँधी के धार्मिक यूटोपियाई आदर्श भारतीय जनमानस को सहज स्‍वीकार्य हो सकते थे। व्‍यापक जन समुदाय को विदेशी सत्‍ता के विरुद्ध जागृत और संगठित करने की अपील, नारे और नीतियाँ गाँधी के पास थीं और उनके पास वह व्‍यावहारिक कौशल और 'अथॉरिटी' भी थी कि जनसंघर्षों की ऊर्जा को वे बुर्जुआ वर्गहितों की चौहद्दी में बाँधे रह सके।

गाँधी एक विचारक के रूप में पंगु "भारतीय" बुर्जुआ मानवतावाद के मूर्त रूप थे। वे बुर्जुआ वर्ग के सिद्धान्‍तकार और नीति-निर्माता थे। और इससे भी आगे, बुर्जुआ वर्ग के 'मास्‍टर स्‍ट्रैटेजिस्‍ट' और 'मास्‍टर टैक्टीशियन' के रूप में वे एक निहायत बेरहम व्‍यावहारवादी (प्रैग्‍मेटिस्‍ट) व्‍यक्ति थे, जो समय-समय पर अपनी उद्देश्‍य-पूर्ति के लिए अपनी सैद्धान्तिक निष्‍ठाओं-प्रतिबद्धताओं के विपरीत भी जा खड़े होता था।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2015