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Wednesday, 11 January 2023

अंग्रेजों के राज में हुए परिवर्तन

#दोस्तों इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हमारे देश में अंग्रेजों, मुगलों और अन्य बहुत राजाओं ने राज किया, हमारे देश को लूटा गया और हमें गुलाम बनाया गया, लेकिन किसी भी आक्रमणकारी ने कोई भी परिवर्तन नहीं लाया‌, पर अंग्रेजों ने राज करने के साथ-साथ कुछ परिवर्तन भी लाए हैं। जो कि इस प्रकार से है👇

#ब्राह्मण_जज_पर_रोक 
सन 1919 ईस्वी में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनने पर रोक लगा दी थी, अंग्रेजों का कहना था कि इनका चरित्र न्यायिक नहीं होता। ये लोग हिंदू धर्म ग्रंथ मनुस्मृति वर्ण व्यवस्था जाति आधार पर न्याय करते हैं।

#सरकारी_सेवाओं_में_प्रतिनिधित्व 
अंग्रेजों ने शुद्र वर्ण की जातियों को सरकारी सेवाओं में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की। 

#गंगा_दान_प्रथा
शूद्रों के पहले लड़के को ब्राह्मण गंगा में दान करवा दिया करते थे क्योंकि वो जानते थे कि पहला बच्चा हष्ट पुष्ट होता है। अंग्रेजों ने इस प्रथा को रोकने के लिए 1835 में एक कानून बनाया था। 

#नववधू_शुद्धीकरण_प्रथा
1819 से पहले जब किसी शूद्र की शादी होती थी तो ब्राह्मण उसका शुद्धीकरण करने के लिए नववधू को 3 दिन अपने पास रखते थे, इस प्रथा को अंग्रेजों ने 1819 ईस्वी में बंद करवा दिया था।

#सम्पत्ति_का_अधिकार 
अंग्रेजों ने अधिनियम 11 के तहत शूद्रों को भी संपत्ति रखने का अधिकार दिया, पहले शूद्रों को संपत्ति एवं शिक्षा से वंचित रखा जाता था।

#देवदासी_प्रथा 
अंग्रेजों ने देवदासी प्रथा पर रोक लगाई थी, पहले मंदिरों में देवदासी रखी जाती थी जो कि दक्षिणी भारत में आज भी चोरी चुपके कहीं-कहीं पर जारी है, छोटी सी उम्र में लड़कियों को मंदिर में दान किया जाता था और 10-12 वर्ष की हो जाने पर पुजारी उनके साथ शारीरिक शोषण करना शुरू कर देते थे और उनसे जो बच्चा पैदा होता था उसे कोई भी पुजारी अपना नाम देने के लिए तैयार नहीं होता था और उन्हें हरि की संतान कहकर हरिजन नाम दिया जाता था, जो कि आज सुप्रीम कोर्ट ने हरिजन शब्द को प्रतिबंधित कर दिया है।

#सती_प्रथा_का_अंत
और सति प्रथा बंद करवाने मैं भी अंग्रेजों का काफी योगदान रहा है, पहले पति के मर जाने पर उनकी पत्नियों को जलती हुई चिता पर सती होना पड़ता था। जिसे 4 दिसंबर 1829 को ब्रिटिश सरकार ने रोक लगा दी थी।

#चरक_पूजा
अंग्रेजों ने 1863 ईस्वी में चरक पूजा बंद कराई थी, इसमें ये होता था कि कोई पुल या भवन बनने पर शूद्रों की नर बलि दी जाती थी। उनकी मान्यता थी की नर बलि देने से पुल और भवन ज्यादा समय तक टिके रहते हैं। 

#कुर्सी_पर_बैठने_का_अधिकार
शूद्रों को अंग्रेजों ने 1835 ईस्वी में कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया था, इससे पहले शूद्र कुर्सी पर नहीं बैठ सकते थे।

#शिक्षा_का_अधिकार
अंग्रेजों ने सबके लिए शिक्षा के दरवाजे खोले। पहले हिंदू धर्म ग्रंथ मनुस्मृति के अनुसार महिलाओं एवं शूद्र जातियों sc.st.obc को शिक्षा का अधिकार नहीं था। अंग्रेजों ने सबके लिए शिक्षा सम्मान कर दी।

अतः अंग्रेजों ने महिलाओं और शूद्र/अतिशूद्र जातियों के हितों को ध्यान में रखते हुए अनेक सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक सुधार किये हैं, महात्मा ज्योतिबा फुले ने तो यहाँ तक कहा कि अंग्रेज भारत में महिलाओं एवं शूद्र अतिशूद्र लोगों के लिए भाग्यविधाता बनकर आए थे, उन्हीं की वजह से मैं पढ़ पाया हूं। और अपनी पत्नी सावित्रीबाई को भी पढ़ा पाया हूं। 

और अंग्रेजों के रहते हुए संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने 25 दिसंबर 1927 को विषमता वादी कानून मनुस्मृति को भी जला दिया था। और 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू किया गया, जिसमें सभी जाति धर्म के लोगों को समानता का अधिकार दिया गया।

और आज कुछ पढ़े लिखे लोगों का मानना है कि हिन्दू सनातन धर्म में जातिवाद, छुआछूत नरबलि, पशुबलि, सतीप्रथा, देवदासी प्रथा, बाल विवाह, नियोगप्रथा, आदि कुप्रथाएं पुरानी बातें हैं जबकि पढ़े लिखे लोगों को ये भी अच्छी तरह से सोचना चाहिए था कि तंत्र मंत्र यज्ञ पूजा पाठ ये भी तो पुरानी बातें हैं। 

लेकिन आज अनपढ़ तो अनपढ़, कुछ पढ़े-लिखे लोग भी उन्हीं देवी देवताओं के भक्त बने हुए हैं जिन देवी-देवताओं ने महिलाओं और शूद्रों को अछूत समझा और उन्हें कभी अपने नजदीक तक नहीं आने दिया, उन लोगों को निर्जीव पत्थर की मूर्तियों में भगवान नजर आते हैं, माँ के रूप में गाय नजर आती है, निर्मल बाबा की लाल हरी चटनी में कृपा नजर आती हैं, आशाराम बापू को सन्त समझ लेते हैं, और हर संस्कार ब्राह्मणों से करवाते हैं और ज्योतिष में विश्वास करते हैं, और जो उपाय ब्राह्मण बताता है उसे बिना सोचे समझे मान लेते हैं, और जो ब्राह्मण मांगता है उससे बढ़ चढ़कर दान के रुप में दे देते हैं।

जब कि सूई से लेकर तागा, और मोबाइल से लेकर हवाई जहाज, यह सब विज्ञान की देन है। और हमें समानता से लेकर हर हक अधिकार भी संविधान ने दिए हैं। ना की किसी देवी-देवताओं ने, इसलिए विशेषकर पढ़े लिखे लोगों को अब समझ लेना चाहिए और अपने आप एवं अपने परिवार को शिक्षित करने में थोड़ा ध्यान देना चाहिए। और अंधविश्वास से हटकर मानवतावादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज का निर्माण कर लेना चाहिए।


WHAT DIFFERENCE

WHAT DIFFERENCE does it make whether man believes in a God or not?

It makes a big difference.
It makes all the difference in the world.
It is the difference between being right and being wrong.
It is the difference between truth and surmises—facts or delusion.
It is the difference between the earth being flat, and the earth being round.
It is the difference between the earth being the center of the universe, or a tiny speck in this vast and uncharted sea of multitudinous suns and galaxies.
It is the difference in the proper concept of life, or conclusions based upon illusion.
It is the difference between verified knowledge and the faith of religion.
It is a question of Progress or the Dark Ages.

The history of man proves that religion perverts man's concept of life and the universe, and has made him a cringing coward before the blind forces of nature.




Tuesday, 10 January 2023

उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो

उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दो
गर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
कुन्जिश्क-ए-फ़रोमाया को शाहीं से लड़ा दो
सुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़माना
जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आए मिटा दो
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
क्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्दे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो
हक़ रा ब-सजूदे सनमाँ रा ब-तवाफ़े
बेहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दो
मैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों से
मेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दो
तहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो ❤    
           -: अल्लामा इकबाल साहब✍️


गोरख पाण्‍डेय के स्मृति दिवस (29 जनवरी 1989) के अवसर पर उनकी पन्‍द्रह कविताएं


*गोरख पाण्‍डेय के स्मृति दिवस (29 जनवरी 1989)  के अवसर पर उनकी पन्‍द्रह कविताएं*
_________________________ 
*तटस्थ के प्रति*

चैन की बाँसुरी बजाइये आप
शहर जलता है और गाइये आप
हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं
असली सूरत ज़रा दिखाइये आप
(रचनाकाल :1978)
_________________________
*आँखें देखकर*

ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिये.
_________________________ 
*सच्चाई*

मेहनत से मिलती है
छिपाई जाती है स्वार्थ से
फिर, मेहनत से मिलती है.
_________________________
*वतन का गीत*

हमारे वतन की नई ज़िन्दगी हो
नई ज़िन्दगी इक मुकम्मिल ख़ुशी हो
नया हो गुलिस्ताँ नई बुलबुलें हों
मुहब्बत की कोई नई रागिनी हो
न हो कोई राजा न हो रंक कोई
सभी हों बराबर सभी आदमी हों
न ही हथकड़ी कोई फ़सलों को डाले
हमारे दिलों की न सौदागरी हो
ज़ुबानों पे पाबन्दियाँ हों न कोई
निगाहों में अपनी नई रोशनी हो
न अश्कों से नम हो किसी का भी दामन
न ही कोई भी क़ायदा हिटलरी हो
सभी होंठ आज़ाद हों मयक़दे में
कि गंगो-जमन जैसी दरियादिली हो
नये फ़ैसले हों नई कोशिशें हों
नयी मंज़िलों की कशिश भी नई हो.
_________________________ 
*इंकलाब का गीत*

हमारी ख्वाहिशों का नाम इन्क़लाब है !
हमारी ख्वाहिशों का सर्वनाम इन्क़लाब है !
हमारी कोशिशों का एक नाम इन्क़लाब है !
हमारा आज एकमात्र काम इन्क़लाब है !
ख़तम हो लूट किस तरह जवाब इन्क़लाब है !
ख़तम हो भूख किस तरह जवाब इन्कलाब है !
ख़तम हो किस तरह सितम जवाब इन्क़लाब है !
हमारे हर सवाल का जवाब इन्क़लाब है !
सभी पुरानी ताक़तों का नाश इन्क़लाब है !
सभी विनाशकारियों का नाश इन्क़लाब है !
हरेक नवीन सृष्टि का विकास इन्क़लाब है !
विनाश इन्क़लाब है, विकास इन्क़लाब है !
सुनो कि हम दबे हुओं की आह इन्कलाब है,
खुलो कि मुक्ति की खुली निग़ाह इन्क़लाब है,
उठो कि हम गिरे हुओं की राह इन्क़लाब है,
चलो, बढ़े चलो युग प्रवाह इन्क़लाब है ।
हमारी ख्वाहिशों का नाम इन्क़लाब है !
हमारी ख्वाहिशों का सर्वनाम इन्क़लाब है !
हमारी कोशिशों का एक नाम इन्क़लाब है !
हमारा आज एकमात्र काम इन्क़लाब है !
_________________________
*उनका डर*

वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और ग़रीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे ।
(रचनाकाल:1979)
_________________________ 
*अमीरों का कोरस*

जो हैं गरीब उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं जरूरतें तो मुसीबतें कम हैं
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं
वे नंगे रहते हैं बड़े मजे में
वे भूखों रह लेते हैं बड़े मजे में
हमको कपड़ों पर और चाहिए कपड़े
खाते-खाते अपनी नाकों में दम है
वे कभी कभी कानून भंग करते हैं
पर भले लोग हैं, ईश्वर से डरते हैं
जिसमें श्रद्धा या निष्ठा नहीं बची है
वह पशुओं से भी नीचा और अधम है
अपनी श्रद्धा भी धर्म चलाने में है
अपनी निष्ठा तो लाभ कमाने में है
ईश्वर है तो शांति, व्यवस्था भी है
ईश्वर से कम कुछ भी विध्वंस परम है
करते हैं त्याग गरीब स्वर्ग जाएँगे
मिट्टी के तन से मुक्ति वहीं पाएँगे
हम जो अमीर हैं सुविधा के बंदी हैं
लालच से अपने बंधे हरेक कदम हैं
इतने दुख में हम जीते जैसे-तैसे
हम नहीं चाहते गरीब हों हम जैसे
लालच न करें, हिंसा पर कभी न उतरें
हिंसा करनी हो तो दंगे क्या कम हैं
जो गरीब हैं उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं मुसीबतें, अमन चैन हरदम है
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं
_________________________
*तुम्हें डर है*

हज़ार साल पुराना है उनका गुस्सा
हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत
मैं तो सिर्फ़
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूँ
_________________________
*समय का पहिया*

समय का पहिया चले रे साथी
समय का पहिया चले
फ़ौलादी घोंड़ों की गति से आग बरफ़ में जले रे साथी
समय का पहिया चले
रात और दिन पल पल छिन
आगे बढ़ता जाय
तोड़ पुराना नये सिरे से
सब कुछ गढ़ता जाय
पर्वत पर्वत धारा फूटे लोहा मोम सा गले रे साथी
समय का पहिया चले
उठा आदमी जब जंगल से
अपना सीना ताने
रफ़्तारों को मुट्ठी में कर
पहिया लगा घुमाने
मेहनत के हाथों से
आज़ादी की सड़के ढले रे साथी
समय का पहिया चले
_________________________
*कला कला के लिए*

कला कला के लिए हो
जीवन को ख़ूबसूरत बनाने के लिए
न हो
रोटी रोटी के लिए हो
खाने के लिए न हो
मज़दूर मेहनत करने के लिए हों
सिर्फ़ मेहनत
पूंजीपति हों मेहनत की जमा पूंजी के
मालिक बन जाने के लिए
यानि,जो हो जैसा हो वैसा ही रहे
कोई परिवर्तन न हो
मालिक हों
ग़ुलाम हों
ग़ुलाम बनाने के लिए युद्ध हो
युद्ध के लिए फ़ौज हो
फ़ौज के लिए फिर युद्ध हो
फ़िलहाल कला शुद्ध बनी रहे
और शुद्ध कला के
पावन प्रभामंडल में
बने रहें जल्लाद
आदमी को
फाँसी पर चढ़ाने लिए.
_________________________
*अधिनायक वंदना*

जन गण मन अधिनायक जय हे !
जय हे हरित क्रांति निर्माता
जय गेहूँ हथियार प्रदाता
जय हे भारत भाग्य विधाता
अंग्रेज़ी के गायक जय हे ! जन...
जय समाजवादी रंग वाली
जय हे शांतिसंधि विकराली
जय हे टैंक महाबलशाली
प्रभुता के परिचायक जय हे ! जन...
जय हे ज़मींदार पूंजीपति
जय दलाल शोषण में सन्मति
जय हे लोकतन्त्र की दुर्गति
भ्रष्टाचार विधायक जय हे ! जन...
जय पाखंड और बर्बरता
जय तानाशाही सुन्दरता
जय हे दमन भूख निर्भरता
सकल अमंगलदायक जय हे ! जन...
(रचनाकाल : 1982)
_________________________
*समझदारों का गीत*

हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।
_________________________
*बंद खिड़कियों से टकराकर*

घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहाँ अर्चना होती उसकी
वहाँ देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है

लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

कानूनन समान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े-बड़ों क़ी नज़रों में तो
धन का एक यन्त्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है

उसे चहिए प्यार
चहिए खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना ?

घर-घर में शमशान-घाट है
घर-घर में फाँसी-घर है, घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकराकर
गिरती है वह

गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है

हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं ।
_________________________
*कुर्सीनामा*

1
जब तक वह ज़मीन पर था
कुर्सी बुरी थी
जा बैठा जब कुर्सी पर वह
ज़मीन बुरी हो गई।

2
उसकी नज़र कुर्सी पर लगी थी
कुर्सी लग गयी थी
उसकी नज़र को
उसको नज़रबन्द करती है कुर्सी
जो औरों को
नज़रबन्द करता है।

3
महज ढाँचा नहीं है
लोहे या काठ का
कद है कुर्सी
कुर्सी के मुताबिक़ वह
बड़ा है छोटा है
स्वाधीन है या अधीन है
ख़ुश है या ग़मगीन है
कुर्सी में जज्ब होता जाता है
एक अदद आदमी।

4
फ़ाइलें दबी रहती हैं
न्याय टाला जाता है
भूखों तक रोटी नहीं पहुँच पाती
नहीं मरीज़ों तक दवा
जिसने कोई ज़ुर्म नहीं किया
उसे फाँसी दे दी जाती है
इस बीच
कुर्सी ही है
जो घूस और प्रजातन्त्र का
हिसाब रखती है।

5
कुर्सी ख़तरे में है तो प्रजातन्त्र ख़तरे में है
कुर्सी ख़तरे में है तो देश ख़तरे में है
कुर्सी ख़तरे में है तु दुनिया ख़तरे में है
कुर्सी न बचे
तो भाड़ में जायें प्रजातन्त्र
देश और दुनिया।

6
ख़ून के समन्दर पर सिक्के रखे हैं
सिक्कों पर रखी है कुर्सी
कुर्सी पर रखा हुआ
तानाशाह
एक बार फिर
क़त्ले-आम का आदेश देता है।

7
अविचल रहती है कुर्सी
माँगों और शिकायतों के संसार में
आहों और आँसुओं के
संसार में अविचल रहती है कुर्सी
पायों में आग
लगने
तक।

8
मदहोश लुढ़ककर गिरता है वह
नाली में आँख खुलती है
जब नशे की तरह
कुर्सी उतर जाती है।

9
कुर्सी की महिमा
बखानने का
यह एक थोथा प्रयास है
चिपकने वालों से पूछिये
कुर्सी भूगोल है
कुर्सी इतिहास है।
_________________________ 
*समाजवाद*

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई, आँधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

रचनाकाल : 1978

समझदारों का गीत / गोरख पाण्डेय

हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।

सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख



सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा की प्रबल समर्थक थी। यह वह दौर था जब सामान्यतः ब्राह्मण एवं मौलवी अध्यापन का कार्य करते थे और उनका लगभग एकाधिकार था। हिन्दू और मुस्लिम शिक्षा व्यवस्थाओं में काफी मेल था और ये जनसाधारण के लिए अनुपलब्ध थी। दोनों को अपनी धर्मोन्मुख प्रकृति से बल मिलता था और अपरिवर्तनीय प्रभुत्व पर आधारित होने के कारण ये शिक्षा पद्धतियां स्वतंत्र अन्वेषण की भावना के प्रतिकूल थी।

ऐसे विकट माहौल में सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने आम एवम सदियों से उपेक्षित गरीब दलित समुदाय के लिये आधुनिक शिक्षा देने का क्रांतिकारी कार्य का सूत्रपात किया।

उनके स्कूल में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में वेद और शास्त्र जैसे ब्राह्मणवादी ग्रंथों या मुल्ला-मौलवियों द्वारा पढाये जा रहे धर्मिक ग्रन्थ के बजाय गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन शामिल थे।

सावित्रीबाई और फातिमा शेख ने टीचर्स ट्रेनिंग की और 1848 से ही जोतिराव फुले द्वारा खोले गए स्कूल में दोनों ने पढ़ाना शुरू किया। सावित्रीबाई, फातिमा शेख और सगुना बाई की मदद से जोतिराव फुले ने 1848 से 1852 के बीच 18 स्कूल खोले।

इस आधुनिक शिक्षा के द्वारा फुले दम्पति एवम फातिमा शेख हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय ज्ञान के क्षेत्र में गरीब एवम दलित समुदाय के लोगो, खास कर लड़कियों को  आधुनिक पाश्चात्य उपलब्धियों के सम्पर्क में ले आने का कार्य कर रहे थे। इस क्रांतिकारी कार्य का रूढ़िग्रस्त हिन्दू-मुस्लिम समाज द्वारा विरोध लाजिमी था।

फातिमा शेख और सावित्रीबाई को भारी विरोध झेलना पड़ा।  लेकिन इन दोनों ने हिम्मत नहीं हारी और घर घर जाकर लड़कियों को बुलाकर पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

इन्होंने छुआछूत का विरोध करते हुए सभी जाति की लड़कियों को एक साथ पढ़ाने और लड़कियों को आधुनिक शिक्षा- विज्ञान और गणित पढ़ाने का काम किया था।

सावित्रीबाई सिर्फ एक शिक्षिका ही नहीं समाज सुधारिका और कवियित्री भी थीं। उन्होंने छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। विधवा महिलाओं के लिए आश्रम खोला और कई सवर्ण विधवा, गर्भवती महिलाओं को आत्महत्या करने से बचाया। बिना दहेज और बिना पुरोहित अंतरजातीय विवाह करवाए। शुद्र, अतिशुद्र और महिलाओं की गुलामी के खिलाफ समाज में अभियान चलाया। अस्पताल खोला जहां प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए 1897 में सावित्रीबाई का निधन हुआ।

1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद भी बुर्जुवा सरकारों ने आधुनिक शिक्षा का विस्तार  गरीब समुदाय के दलित लोगों तक कर पाने में विफल रही है। आज मोदी सरकार के कार्यकाल में शिक्षा को इतना महंगा बनाया जा रहा है कि आम लोगों के लिए इसे हासिल करने के लिये सोच पाना भी असंभव होता जा रहा है। अगर आधुनिक शिक्षा को जनसाधारण तक पहुंचाना है, इसे और व्यापक करना है,  सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख के सपनों को साकार करना है तो हमें मजदूर वर्ग  के नेतृत्व में समाजवादी राज्य स्थापना करनी होगी। केवल समाजवादी राज्य ही शिक्षा को आम मेहनतकश जनता तक पहुंचा सकता है, इसे सर्वव्यापी सुलभ करा सकता है। सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख के सपनों को  हम इसी तरह साकार कर सकते हैं। 

Let America teach a lesson to us

.*Let America teach a lesson to us*
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*What happened in the United States, when  cooking at Home stopped ? Famous American Economists of the 1980s warned the American people*:
The Kitchen has already been outsourced to companies, and if the Elderly who used to give Childcare, is also outsourced, then family responsibilities and it's relevance, will be destroyed. "
*But very few people listened to their advice.*
Cooking at Home, has almost stopped.
*And the habit of ordering Food from outside ( it is now the Norm), has led to the extinction of American families as Experts had warned.*
Cooking with Love, means connecting with the Members of the family with affection.
*Culinary Art is not cooking alone. The Focal point is, family Culture.*
If there is no Kitchen, just a bedroom, it's not a family, it's an Hostel.
*What about American families who closed their Kitchen and thought that the bedroom alone is enough ?*
In 1971, almost 72% of U.S. Households had a Husband and Wife, living with their children.
*By 2020, it has fallen to 22%.*
Families that lived together earlier, are now living in Nursing homes (Old Age Homes).
*In the United States, women now make up 15% of single-member Households.*
Men make up 12% of single-family Homes in America
*19% of Homes in America, are owned either by a Father or a Mother living alone.*
6% of Households in America, are classified as Male-Female shelters. (living together).
*38% of all babies born today in America, are born to unmarried women.*
Half of them are Girls, going to schools in America.
*About 52% of first Marriages in the United States, end in a Divorce because of this mess.*
67% of second marriages, are problematic.
*The Bedroom is not just the Home. If there is no kitchen and only a bedroom exists, then it is not a complete Home.*
The United States is an example of the breakdown of the Institution of Marriage.
*Our Feminists will buy Sweets in shops and celebrate, even though the families in India, are gradually destroyed like the families in America.*
Mental and Physical health deteriorates, when families are destroyed.
Eating outside Food, can make the body Fat and susceptible to infections, besides unnecessary spending
*So Cooking at Home, is not the only reason for well-being of the Family.*
Physical health and Mental health are also essential to the country's Economy.
*That's why Elderly people in our house, used to advise us to Avoid eating outside*
But today we eat with our family in Restaurants ... ",
*Ordering and eating Food cooked by strangers Online through Swiggy & Zomato,*
is becoming fashionable even among the highly educated, Middle-class people.,
*This  Habit will be a long-term disaster ...*
*If those Online Companies that psychologically decide what we should eat ...*
Our Ancestors, before going on any outing, used to cook and carry Home-made Food
*So cook at Home, eat together and live happily. Apart from wholesome Food,  it has love and affection embedded*.