Total Pageviews

Sunday, 5 March 2023

होलिका दहन


1. {होलिका दहन} 


कभी दिमाग पे

जोर डाला

होलिका दहन कर

क्यों खुशीयाँ

मना रहे है

अनभिज्ञ हो सत्य से

रूढीवादी परम्परा का

केवल निर्वाह कर रहे है।


ऐसा क्या किया

एक स्त्री ने

कि सदियों से

प्रत्येक वर्ष

उसे आग में

खाक कर रहे है

क्यों पौरूष विहीन

हुआ आज भी पुरूष

डर कर युगों बाद भी

पाप कर्मों को छुपा रहे है।


दहेज रूपी आग में

जलती असंख्य नारी देह

उसके लिए किसको हम 

दोषी ठहरा रहे है

क्या स्त्रीयों को जलाना ही 

सभ्य समाज की पहचान है

होलिका दहन से जिसको 

हम मजबूत बना रहे है।


क्यों नहीं करते कभी

उनका भी होलिका दहन

जो बलात्कार,हत्या ,

भ्रष्टाचार खूब कर रहे है 

लेकर जन्म

स्त्री की कोख से ही 

स्त्रीयों का ही अपमान

खुलेआम कर रहे है ।


क्या इनमें भी ज्यादातर

हिरण्यकश्यप मुलनिवासी के

ही दुश्मन छिपे बैठे है

जो समय समय पे भेष बदल रहे है

उलझा ब्राह्मणवाद के जाल में 

राजा बली के वंशजों को

देखो आँखे खोलकर

कैसे घर घर ठग रहे है।।

©anil_bidlyan



2. घोर निंदनीय और विछुब्ध करने वाली घटना है ये।

 

ऐसी घटनाएं उस हिन्दू मान्यता/दावे का पोल खोलती है कि होलिका दहन द्वारा हिन्दू समाज स्वयं अपने अंदर की बुराई को जलाता है।

         

दलित राजनीति करने वाले कुछ लोग इसे स्त्री विरोधी त्योहार बताते है।उनके अनुसार होली किसी स्त्री को जिंदा जला कर जश्न मनाने की सांकेतिक पुनरावृति है। इसलिए होलिका दहन और होली का वे विरोध करते है।


दलित मेहनतकस  न केवल इस तरह के घृणित सामाजिक उत्पीड़न का व्यापक विरोध करते है बल्कि इन ग्रामीण धनपशुओं  को उनकी निजी सम्पत्ति, जमीन जायदाद से उन्हें बेदख़ल कर सामाजिक  संपत्ति में बदलने का कार्यभार भी अपने सामने रखते है। इसी तरह इन धनपशुओं के दबंगई का होलिका दहन किया जा सकता है।



3. #होलिका! #मेरी_परदादी

***********************

होलिका मेरी मां की मां की मां…

मेरी परदादी

तुम पहली स्त्री थी

जिसे आग में झोंकर जलाया गया

फिर तो

स्त्री को जलाने की परंपरा चल पड़ी

कभी सती के नाम पर

कभी कुलटा के नाम पर

कभी दहेज के लिए


मेरी परदादी

दहेज के लिए

तुम्हारी हजारों बेटियां

साल- दर-साल जलाई जाती हैं

जलाने की परंपरा आज भी जारी है

जिसका शिकार

मेरी लाडली बेटी 

तुम्हारी पोती भी हो सकती है


तुम्हारे जिस्म के जलने की चिरांध

मुझे आज भी बेचैन करती है 

तुम्हारी छटपटाहट

मैं आज भी महसूस करता हूं 

घेरकर तुम्हें जलाया गया

तुम्हारे चिल्लान की आवाज

आज भी मुझे सुनाई देती है


मेरी परदादी

वे आज भी हर वर्ष

तुम्हें जलाने का जश्न मनाते हैं

जिसे वे होलिका दहन कहते हैं

जलाने के इस जश्न में

सब शामिल होते हैं

यहां तक तुम्हारी बेटियां-पोतियां भी


मेरी दादी, मनु पुत्रों ने

उमंग, खुशी और रंगों के त्योहार को

होलिकोत्सव नाम दे दिया


मेरी परदादी

तुम्हारा अपराध क्या था

तुमसे इतनी घृणा क्यों

साल-दर-साल 

तुम्हें जलाने का जश्न क्यों

जब तक तुम्हें जलाने का जश्न

मनाया जाता रहेगा

कोई-न-कोई स्त्री जलाई जाती रहेगी

क्या तुम्हें जलाए बिना 

रंगों का उत्सव नहीं बनाया जा सकता?



4. रात मे होलिका जलाते हो


अस्मत लूट कर, जश्न मनाते हो 

जिस्म जलाकर, जश्न मनाते हो 

अरे मनु के औलादों, 

कैसा प्रपंच रचाते हो 

करके बलात्कार 

पीड़िता पे सवाल उठाते हो

वहशी दरिंदों, बेशर्मों 

अपने कुकर्मों को छुपाते हो

इतना पाक साफ रहते हो तो

रात मे क्यों जलाते हो

दबे कूचले लोगों पर,

सितम तुम उठाते हो

कर्मो से नीच तुम,

औरों को नीच बताते हो

ढोंग, पाखंड से बना

कहानी तुम सुनाते हो 

होलिका भी जली, 

मनीषा भी जली 

पर मनीषा को जलाकर

होलिका की याद दिलाते हो

अरे, मनु के औलादों, जानते है

औरों की बहन, बेटियों की

अस्मत लूट कर,

अपने कुकर्मों को छुपाने

रात मे होलिका जलाते हो ।


डॉ. अनिता कुर्रे ।


5. होलिका दहन


कभी दिमाग पे

जोर डाला

होलिका दहन कर

क्यों खुशीयाँ

मना रहे है

अनभिज्ञ हो सत्य से

रूढीवादी परम्परा का

केवल निर्वाह कर रहे है।


ऐसा क्या किया

एक स्त्री ने

कि सदियों से

प्रत्येक वर्ष

उसे आग में

खाक कर रहे है

क्यों पौरूष विहीन

हुआ आज भी पुरूष

डर कर युगों बाद भी

पाप कर्मों को छुपा रहे है।


दहेज रूपी आग में

जलती असंख्य नारी देह

उसके लिए किसको हम 

दोषी ठहरा रहे है

क्या स्त्रीयों को जलाना ही 

सभ्य समाज की पहचान है

होलिका दहन से जिसको 

हम मजबूत बना रहे है।


क्यों नहीं करते कभी

उनका भी होलिका दहन

जो बलात्कार,हत्या ,

भ्रष्टाचार खूब कर रहे है 

लेकर जन्म

स्त्री की कोख से ही 

स्त्रीयों का ही अपमान

खुलेआम कर रहे है ।


क्या इनमें भी ज्यादातर

हिरण्यकश्यप मुलनिवासी के

ही दुश्मन छिपे बैठे है

जो समय समय पे भेष बदल रहे है

उलझा ब्राह्मणवाद के जाल में 

राजा बली के वंशजों को

देखो आँखे खोलकर

कैसे घर घर ठग रहे है।।

©anil_bidlyan


6. आओ होलिका से माफी मांगे!



हमें इस बात से,

कुछ लेना देना नहीं,

कि प्रहलाद किसकी भक्ति करता था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

कि हिरण्याकश्यप अमर था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

विष्णु ने अमर हिरण्या कश्यप को नरसिम्हा बनकर मार डाला,

हमें अगर लेना है तो इस बात से लेना है,

कि होलिका के पास जो अग्नि में ना जलने वाला वस्त्र था,

जिसे ओढ़कर प्रहलाद मौत के मुंह से निकल आया था,


वह अग्निमुक्त वस्त्र कहां है?

उसको बनाने की तकनीक कहां है?

हिरण्या कश्यप और होलिका वैज्ञानिक रूप से,

इतने स्रमद्ध थे कि उन्होंने अग्नि मुक्त वस्त्र बना डाला?

ऐसा लगता है,

उस अग्निमुक्त वस्त्र की जानकारी,

विष्णु को नहीं थी,

होती तो वह होलिका को जिन्दा नहीं जलने देता!

सोच कर देखिए,

प्रहलाद और नरसिंह ने समाज को क्या दिया?

जिस अग्निमुक्त वस्त्र की तकनीक से पूरी दुनिया का भला हो सकता था,

उसे नष्ट कर दिया,

ऐसे भगवान और भक्त को तो भूल जाना ही भला!

एक निर्दोष नारी को जिन्दा जलाया जाना,

नारी का ही नहीं,

बल्कि धर्म का भी अपमान है,

ये ही दुष्टों का अभिमान है,

आओ,

समाज और मानवता की भलाई के लिए,

अग्निमुक्त वस्त्र बनाने वाले,

हिरण्यकश्यप और

होलिका से माफी मांगे!

होली के त्योहार को मन से त्यागें!


*जोगेन्दर सिंह*


7. रंगों से डर नही लगता है साहब


रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से 

उसके चक्रान्त से 

उसके अन्जाम से उसके पहचान से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


डर लगता है उस दृष्टान्त को सोचकर 

कैसे तड़पाये होंगे 

कैसे नोच नोच खायें होंगे 

कैसे, कैसे उनके साथ पेश आये होंगे 

कैसे ज़बरन आग पे बैठाये होंगे 

कैसे चिन्गारी सुलगाये होंगे 

कैसे खुद को बचाने के लिए तिलमिलाये होंगे 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


रंगों से डर नही लगता है साहब, 

डर लगता है उसके वहशीपन से 

डर लगता है उसके चिन्तन मनन से 

डर लगता है उसके मदिरा सेवन से 

डर लगता है उस कलुषित अन्धेरी रात से 

डर लगता है घटी घटनाओं की रात से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


रंगों से डर नही लगता है साहब, 

डर लगता है त्योहार के उपनाम से 

डर लगता है उसके हरकतों शैतान से 

डर लगता है उसके पीछे शैतान से 

डर लगता है उसके पीछे छुपे इमान से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से 


कवि_ सूरज पाशवाँ टीटागढ पं बंगाल 


शीर्षक _रंगों से डर नही लगता है साहब


8. आओ होलिका से माफी मांगे!


हमें इस बात से,

कुछ लेना देना नहीं,

कि प्रहलाद किसकी भक्ति करता था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

कि हिरण्याकश्यप अमर था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

विष्णु ने अमर हिरण्या कश्यप को नरसिम्हा बनकर मार डाला,

हमें अगर लेना है तो इस बात से लेना है,

कि होलिका के पास जो अग्नि में ना जलने वाला वस्त्र था,

जिसे ओढ़कर प्रहलाद मौत के मुंह से निकल आया था,


वह अग्निमुक्त वस्त्र कहां है?

उसको बनाने की तकनीक कहां है?

हिरण्या कश्यप और होलिका वैज्ञानिक रूप से,

इतने स्रमद्ध थे कि उन्होंने अग्नि मुक्त वस्त्र बना डाला?

ऐसा लगता है,

उस अग्निमुक्त वस्त्र की जानकारी,

विष्णु को नहीं थी,

होती तो वह होलिका को जिन्दा नहीं जलने देता!

सोच कर देखिए,

प्रहलाद और नरसिंह ने समाज को क्या दिया?

जिस अग्निमुक्त वस्त्र की तकनीक से पूरी दुनिया का भला हो सकता था,

उसे नष्ट कर दिया,

ऐसे भगवान और भक्त को तो भूल जाना ही भला!

एक निर्दोष नारी को जिन्दा जलाया जाना,

नारी का ही नहीं,

बल्कि धर्म का भी अपमान है,

ये ही दुष्टों का अभिमान है,

आओ,

समाज और मानवता की भलाई के लिए,

अग्निमुक्त वस्त्र बनाने वाले,

हिरण्यकश्यप और

होलिका से माफी मांगे!

होली के त्योहार को मन से त्यागें!


*जोगेन्दर सिंह*


9. होलिका दहन का बहिष्कार करें दलित-बहुजन, कंवल भारती ने बताए ये अहम कारण

डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म" में एक जगह लिखा है, "आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और इसलिए हैं, क्योंकि वे उसके वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से भयभीत हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष की भूमि रहा है, बल्कि वर्ग-संग्राम की भी भूमि रहा है."
अब एक साक्षी ऋग्वेद (१०,२२-८) से लेते हैं, "हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञ-कर्म से शून्य, किसी (ईश्वरीय सत्ता) को न मानने वाले, वेद-स्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले दस्यु हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनका नाश करो."
स्पष्ट है कि यह वर्गसंघर्ष और वर्गसंग्राम भारत के लिए नया नहीं हैं. वैदिक काल में जो देवासुर संग्राम शुरू हुआ, वह आज तक, इस इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी, चल रहा है. देवों ने न केवल अपने विरोधी असुरों को मारा, बल्कि उसे उन्होंने अपने धर्म की जीत भी घोषित किया और व्यापक स्तर पर उसका जश्न मनाया. लगभग सभी हिंदू त्यौहारों की बुनियाद में यही देवासुरसंग्राम है, चाहे वह दुर्गापूजा हो, दशहरा हो, दिवाली हो, या होली हो. ये सारे त्यौहार असुरों की मौत पर देवों अर्थात ब्राह्मणों के जश्न हैं. ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध चलने वाली विचारधारा को पसंद नहीं किया. भारत के जनजातीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों ने अपना ब्राह्मण राज्य कायम करने की हर संभव कोशिश की. इस योजना में वे सबसे पहले अपने धर्मगुरुओं को वहाँ भेजते थे, जो वहाँ अपने आश्रम बनाकर यज्ञयागादि की गतिविधियों आरंभ करते थे, उनका जो विरोध करते, उनको वे मरवा देते थे, कुछ जन जातीय लोगों को वे प्रलोभन देकर मिशन से भी जोड़ लेते थे. ऐसा वे आज भी करते हैं. आज भी दलित-पिछड़े समुदायों के बहुत से बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के फोल्ड में हैं. उन्हीं की मदद से उन्होंने अपनी योजना को आगे बढ़ाया और विरोधियों का राज्य समाप्त करके वहाँ अपना उपनिवेश कायम किया. बलि, हिरण्यकश्यप, शम्बर, दिवोदास, रावण से लेकर मौर्य राज्य की स्थापना तक उनका यही मिशन चला. किसी ने ठीक ही कहा है, इतिहास अपने को दुहराता है. ठीक उसी मिशनरी रास्ते से मुगलों और ब्रिटिश ने भी भारत को अपना उपनिवेश बनाया. हालाँकि उन उपनिवेशों में भी ब्राह्मण ही प्रभुत्त्वशाली थे.
आज जिस तरह हिन्दूराष्ट्रवादी वर्ग ने अपनी विद्यार्थी परिषद के द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में दलित-वाम शक्ति के खिलाफ वर्गयुद्ध छेड़ा हुआ है, ठीक वैसा ही वर्गयुद्ध हमें पुराणों में असुर राजाओं और उनकी संस्थाओं के खिलाफ मिलता है. मैं यहाँ हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करूँगा. महाभारत के अनुसार, प्रह्लाद ने देवासुरसंग्राम में इंद्र को परस्त कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था. वह अपनी जनता में अपने धार्मिक सद्गुणों से इतना लोकप्रिय था कि इंद्र उससे अपना राज्य वापिस नहीं ले सकता था. अत: इंद्र ब्राह्मण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास गया, और उससे अपना धर्म सिखाने की प्रार्थना की. इंद्र की प्रार्थना पर प्रह्लाद ने इंद्र को अपने सनातन धर्म की शिक्षा दी. अपने शिष्य से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने इंद्र से वरदान मांगने को कहा, और ब्राह्मण भेष बनाए हुए इंद्र ने कहा, 'मेरी इच्छा तुम्हारे सद्गुण पाने की है,' इंद्र प्रहलाद का गुण और धर्म अपने साथ लेकर चला गया. और प्रह्लाद के धर्म पर चलकर इंद्र ने उसकी सारी कीर्ति खत्म कर दी.

देव-विरोधी असुरों के साथ ब्राह्मण-छल की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंदू कथाओं में, जिसे वे इतिहास कहते हैं, ब्राह्मणों के छल की ऐसी अनेक कहानियां हैं. यही छल एकलव्य के साथ किया गया था, जिसका अंगूठा मांगकर गुरु द्रोणाचार्य ने उसको विद्या-रहित कर दिया था. ठीक उसी तरह प्रहलाद से उसका धर्म लेकर उसका सर्वस्व ले लिया गया था. प्रहलाद ने जिस सनातन धर्म की शिक्षा दी थी, वह वैदिक वर्णव्यवस्था वाला धर्म नहीं था, क्योंकि इंद्र उसे क्यों सीखता, जबकि वह उसी धर्म से आता था? दरअसल, इंद्र ने प्रहलाद से देव-विरोधी असुर धर्म को त्यागने का वरदान माँगा था. अपने धर्म को त्यागने के बाद प्रह्लाद अपने समुदाय की नजर में गिर गया था, और इंद्र ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त कर लिया था. ठीक यही तरीका हमें बलि की कहानी में मिलता है, जिसमे विष्णु ने बौने वामन का रूप धारण करके एक वरदान के जरिये उसका समस्त राज्य छीन लिया था. बलि राजा से जुड़े अनेक मिथकों से पता चलता है कि प्रह्लाद ने, जो रिश्ते में बलि का दादा था, बलि को सावधान किया था कि यह बौना वामन असल में विष्णु है. एक अन्य कथा में प्रह्लाद बहुत ही तीखे शब्दों में प्रतिवाद करता है कि विष्णु ने बौना बनकर उसके पोते बलि के साथ धोखा किया है और उसे लूटा है. (देवीभागवतपुराण). एक और मिथक, जो एकलव्य से जुड़ा है, बताता है कि किस तरह स्वयं इंद्र ने बलि के पिता विरोचन से भी वरदान के जरिये उसका सिर मांग लिया था. इंद्र ने कहा था, "मुझे अपना सिर दे दो." और विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को सौंप दिया था. (स्कन्दपुराण).
मिथक इतिहास नहीं हैं, यह सच है, पर उनमें भारत के मूल निवासी असुरों के साथ हुए वर्गयुद्धों और उस युद्ध में शहीद हुए असुर राजाओं की नृशंस हत्याओं का पूरा राजनीतिशास्त्र है. कोई भी व्यक्ति न अपने हाथ से अपना अंगूठा काटकर किसी को देगा, और न अपना सिर काटकर देगा. किसी का भी अपने हाथ से अपना सिर काटना, और फिर, उस कटे सिर को अपने ही हाथ में लेकर दूसरे को सौंपना—ये दोनों ही बातें अविश्वसनीय है. हकीकत में एकलव्य का जबरन अंगूठा काटा गया था, और विरोचन की हत्या की गयी थी. आज भी धर्म के लिए की गयीं हत्याओं को मिथकीय रंग दे दिया जाता है, पुराणों ने भी यही काम किया था. पर उसने एक कदम आगे बढ़कर देव-विरोधी असुरों को जनता का खलनायक बनाने का भी काम किया.
प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु की हत्या तो और भी बड़ी क्रूरता है. उसे उसी के महल में घुसकर नरसिंह ने मारा था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस असुर राजा का पूरा वंश ही ब्राह्मणों के निशाने पर था, और उसका बीजनाश करके ही उन्होंने दम लिया था. इसकी जो मिथकीय कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलती, उसके अनुसार, देवविरोधी हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से यह वरदान मिला हुआ था कि वह न मनुष्य के द्वारा, न देवताओं के द्वारा, न पशु के द्वारा, न भीतर, न बाहर, न दिन में, न रात में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न शस्त्र से, न अस्त्र से मारा जायेगा. अपनी अमृत्यु से निश्चिंत होकर उसने पृथ्वी और स्वर्ग में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. किन्तु, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था. सो, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने की धमकी दी, जो विष्णु को सर्वव्यापी ईश्वर मानने पर जोर देता था. तब हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे में लात मारकर पूछा, "क्या वह इसमें भी है?" अचानक उसी समय खम्बा फाड़कर शेर जैसा मनुष्य (नरसिंह) प्रगट हुआ. और उसने हिरण्यकशिपु को अपने घुटनों पर रखकर अपने लम्बे नाखूनों से फाड़कर मार डाला. उसके बाद विष्णु-भक्त प्रह्लाद असुरों का राजा बना और अपनी देवविरोधी प्रकृति को त्यागकर देवों के प्रति समर्पित हो गया.
यह बहुत ही सामान्य कहानी है, जो अनेक असुरों पर दुहराई गयी है. महाभारत में वर्णित इंद्र और असुर वृत्र (अथवा नमुची) की कहानी भी इसी तरह की है, जिसे गोधूलि (न दिन और रात) में समुद्र के किनारे (न भूमि और न समुद्र) मारा गया था. रावण और महिष की हत्याओं की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.
इस कहानी में प्रकृति को ही चुनौती दी गयी है. सभी वस्तुएं और जीवजन्तु मरणशील हैं, कोई भी अमर नहीं है. इस पौराणिक कहानी में इसी प्रकृति का खंडन किया गया है. यह माया हिन्दूधर्म में ही है कि देवता मनुष्यों को अमर होने का वरदान देते हैं, पर इसके बावजूद कोई अमर नहीं रहता है. दूसरी बात यह विचारणीय है कि जो प्रह्लाद राजा बलि को चेता रहा है, वह खुद विष्णु-भक्त कैसे हो सकता है? तीसरी बात यह कि अगर प्रह्लाद इतना परम विष्णु-भक्त था कि उसके लिए वह खम्बा फाड़ कर नरसिंह के रूप में प्रगट हुए, तो उसने अपने पिता को बचाने को क्यों नहीं कहा? उसने अपने पिता की हत्या कैसे बर्दाश्त कर ली? यह कहानी यह साबित करने की कोशिश है कि प्रह्लाद ने अपनी ब्राह्मण-भक्ति में अपने असुर-धर्म, अपनी असुर-संस्कृति और अपने पिता तक को कुर्बान कर दिया.
हकीकत यह है कि हिरण्यकशिपु ने बलि और विरोचन की तरह ब्राह्मणों के आगे घुटने नहीं टेके थे, और उसने अंत तक असुरों के हित में संघर्ष और युद्ध किया था. जब उसके पुत्र प्रहलाद को ब्राह्मणों ने राज्य का लालच देकर अपने ब्राह्मण राष्ट्रवाद में शामिल कर लिया था, तो भी हिरण्यकशिपु ने हथियार नहीं डाले थे. किन्तु यही विष्णु-भक्ति प्रह्लाद के भी पतन का कारण बनी थी. ब्राह्मण-भक्ति की जो भूमिका विभीषण ने निभाई थी, वही प्रह्लाद ने निभाई थी.
इस सम्बन्ध में महात्मा जोतिबा फुले का मत भी गौरतलब है. सम्भवतः फुले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दू मिथकों का बहुत ही वैज्ञानिक विश्लेषण किया है. वे नरसिंह के विषय में "गुलामगीरी" में लिखते हैं, 'वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना था. सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया. उसने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि उसको मारे वगैर उसका उसे मिलने वाला नहीं था. उसने अपने एक द्विज शिक्षक के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया. इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी. प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं. तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया. पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई. अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखोटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया. और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर बना नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी.' महात्मा फुले ने यह भी लिखा है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया. जब क्षत्रियों को पता चला तों वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर 'विप्रिय' (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया. बाद में इसी 'विप्रिय' शब्द से उनका नाम 'विप्र' पड़ा.
हिरण्यकशिपु के प्रकरण में अभी होलिका का प्रवेश होना बाकी है. यह शायद किंवदंती है, जिसमें कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त था. उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी, जो आग में नहीं जलती थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी इसी बहिन की सहायता से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई. होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धू-धू करती आग में जा बैठी. किन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, और होलिका जलकर भस्म हो गयी. कहते हैं कि तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.
क्या इस कहानी पर यकीन किया जा सकता है? वास्तव में इसकी अंतर्कथा यह है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन ने देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और प्रह्लाद को भी उसने चेताया था कि ब्राह्मण राष्ट्रवाद समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है. वह देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखोटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे. अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला. उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए. आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं. आज लाठी-डंडों की जगह उनके हाथों में गन्ने होते हैं, पर ढोल-डीजे का शोर तो होता ही हैं.

(कंवल भारती के फेसबुक से साभार)

https://www.dalitdastak.com/opinion-holi-kanwal-bharti/



प्रगतिशील साहित्य सदन

देश में अब बहुत ही कम प्रगतिशील पुस्तक की दुकान बची है, जिसमें से एक है बिहार की राजधानी पटना स्थित 'प्रगतिशील साहित्य सदन', जिसके संचालक हैं Suman Ji 

ये तमाम आर्थिक परेशानियों का सामना करते हुए भी अपनी प्रगतिशील दुकान को बचाये रखे हैं, इनकी दुकान में आपको लगभग प्रगतिशील किताबें मिल जाएंगी। ऑनलाइन बाजार की दुनिया में इनके लिए प्रगतिशील साहित्य की दुकान चलाना एक बहुत बड़ी चुनौती है और तमाम परेशानियों के बावजूद अभी तक इन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया है। सुमन जी को इन्कलाबी सलाम ✊

इनकी दुकान पर अब मेरी जेल डायरी 'कैदखाने का आईना' भी उपलब्ध है, पटना के दोस्त यहाँ से ले सकते हैं।

Thursday, 2 March 2023

मुफ्त इलाज

Pl circulate 
Many people come to Bombay for  medical treatment. This may be useful information. Please keep it saved:

*Radhakishan Damani*, the promoter of *DMart*, has created a facility at *Gopal Mansion* near *Metro Cinema Queens Road Mumbai* containing 53 rooms for stay of family of patients undergoing treatment in Mumbai. It was inaugurated yesterday. It's very nicely done.  May refer for any such genuine need for well wishers. 
Address:
Gopal Mansion
50, Queen Road (Cinema Lane)
Near Metro Cinema
Mumbai 400 020
Contact Details:
Whattsup App. Mobile
91 88799 86893
e.mail:
Tel No: 022 22055001/02
Rates are 
Very Reasonable
Breakfast 30
Lunch Thaali 75
Dinner Thaali  75
Rooms at   800
Kitchen and Dining Very Spacious.
Please share widely. Hi All..
If you have relatives in Mumbai then pl. share this information to all. *We provide TIFFIN to  patients & relatives without any charges.* Area - South Mumbai
Hospitals:- Jaslok, Saifee, Bombay, Nair, J.J, all near to Mumbai Central and VT....
Contact details:-
U can also WhatsApp us
*Kalpesh Lodha 9967236006*
*Manoj Patwari 9820645070*
*Amrat Jain 9029373751*
At least forward to people who might be able to help by forwarding to others.
*R.K. Charitable Trust* have started Home Medical Equipment like
* *Wheelchair*
* *Suction Machine*
* *Waterbed*
* *Airbed*
* *Walker* 
Free of cost for use (with Refundable Deposit)
Contact person:-
*Sanjay Shah 9322516628*
*Chintan Pandya :- 7666311942*
*Add:-17-D, Nisarga Apt. Near IDBI bank, Mahavir Nagar, Kandivali West Mumbai 67* 
*SAI VILAYATRAI CHARITABLE POLYCLINIC*
"Kambar Darbar" Shantilal Modi Road, Opp Bhurabbhai Hall, Kandivali(W), Mumbai.
*T: 02265811644*
*0222865 9615*
*DAY TIME CHGES*
1. *General OPD* ₹1/- only with medicines
Daily _11-30 am & 4-30 pm_
2. *X-Ray*  ₹100/-
Daily _9 am to 5-00 pm_  
3. *ECG* ₹70.00 
Daily _*9.00 am to11.00 am*_
4. *Pathology*  Highly subsidised rates. CBC ₹20/- only.
Daily _8.30 am to 12.00 noon_ 
5. *Eye Checkup* ₹20/- 
Daily _3.30 pm_
Morn _9am: Wed, Fri, Sat._ 
Cataract Surgery: FREE with best Indian lens.
Lazer (Phaco) surgery: 
₹5,300/- US imported non-foldable lens
₹10,000/- UK imported foldable aspheric lens.(Outside rateRs 40,000/-
6. *Gynecology/ IVF/ Hysteroscopy*
_Tue/Thur/Fri. 1 pm._  
7. *Skin Spl.*  ₹20.00
Mon _3.30 pm_
8. *Orthopedic* ₹20.00
Tue _3.30 pm_
9. *Diabetic & Cardio*  ₹20.00 
Wed _4.30 pm_
10. *Child Spl.*  ₹20.00
Fri  _5.30 pm_    
11.Ear / Nose / Throat*  ₹20.00 
Wed / Friday _3.30 pm_
12. *Dental* Nominal Charges R C charges: ₹750/-.
Daily _9.00 am to 1.00 pm_Daily _2.00 pm to 5.00 pm_
13. *Dialysis* Free for BPL patients  
Daily ( Phone: 28067645 )
14. *Cervical cancer* (Uterus Cancer) Test Free
15. *Anti Cancer Injection* for Girls aged 14 yrs to 24 yrs. 
16. *Hearing Aids* for Sr. Citizens @ 50% of the actual cost. Free for deserving children by Birth.
17. *Notebooks and other staionery items* to all students on discounted rates during summer vacation.
18. *Scholarship* for Higher Education for deserving candidates for *BE MBBS CA CS BPHARM MCA & selected  MBA students.*Visit*
www.kambarda bar.org & submit Form with all required enclosures. 
Kindly contact on email p_zijn zasainani@rediffmail.com 
*NO NEED OF ANY  RECOMMENDATIONS.*KINDLY SHARE*

*Message shared as Received*

Wednesday, 1 March 2023

नौसैनिक विद्रोह की वर्षगांठ पर : जब सागर की लहरों से उठा इंकलाब



☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️

1946 का नौसैनिक विद्रोह भारत की आजादी के आंदोलन का एक स्वर्णिम अध्याय है। राष्ट्रीय आंदोलन के जबर्दस्त उभार के दौर में और उसी पृष्ठभूमि में हुआ यह विद्रोह अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। नौसैनिक विद्रोह उस दौर में अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ व्यापक जनउभार व साम्राज्यवादी विरोधी चेतना से प्रभावित तो था ही साथ ही उस दौर के क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन से भी यह काफी प्रभावित था।

1946 का वर्ष भारत में अंग्रेजी शासन के अवसान की आखिरी घड़ी थी। अंग्रेज वैसे तो भारत को सदा-सर्वदा के लिए अपना उपनिवेश बनाना चाहते थे लेकिन भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ बढ़ते हुए जन आंदोलन खासतौर पर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान पैदा हुए व्यापक जनउभार ने भारत में उनके शासन की चूलें ढीली कर दी थीं। सशस्त्र सेनाओं में विद्रोह खासकर पहले वायु सैनिकों की जनवरी 1946 बम्बई में हुई हड़ताल और फिर 'शाही भारतीय नौसेना' (रायल इंडियन नेवी) के नाविकों की हड़ताल ने भारत में अंग्रेजी शासकों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटने के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया।

सेना में विद्रोह की शुरूआत चंद्र सिंह के नेतृत्व में गढ़वाल रेजीमेण्ट 1930 में ही कर चुकी थी। वायु सैनिकों ने इस परम्परा को जारी रखा और उस कड़ी में नौसैनिकों ने व्यापक और संगठित विद्रोह के माध्यम से इस परम्परा को आगे बढ़ाया। पहले के विद्रोहों के मुकाबले नौसैनिक विद्रोह का आयाम व स्वरूप काफी व्यापक था। यह मुम्बई से लेकर करांची व कलकत्ता तक फैल गया और दूसरे शब्दों में पूरी शाही नौसेना या नौसेना का बड़ा हिस्सा इस विद्रोह में शामिल हो गया। यह विद्रोह भले ही भारतीय नौसैनिकों के साथ भेदभाव और बेहतर भत्तों आदि की मांग से शुरू हुआ हो लेकिन शीघ्र ही भारत में ब्रिटिश राज के खात्मे की ओर लक्षित हो गया। मजदूरों के क्रांतिकारी आंदोलन ने इससे एकजुटता प्रदर्शित की और भारी संख्या में नौसैनिकों के समर्थन में बम्बई की अंग्रेज पुलिस व सशस्त्र बलों से लोहा लिया। नौसैनिक विद्रोह हिन्दू-मुस्लिम एकता का भी प्रतीक बनकर उभरा। कुल मिलाकर अपने संघर्ष के स्वरूप, लक्ष्य व व्यापकता में यह भारतीय सशस्त्र बलों का एक क्रांतिकारी संघर्ष था।

इस विद्रोह की जड़ें काफी गहरी थीं; जो भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत होने वाले शोषण, उत्पीड़न, अन्याय व गुलामी के बोध से जुड़ी थीं। तात्कालिक तौर पर भारतीय नौसैनिकों के साथ होने वाला भेदभाव इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण बना। इसी भेदभाव को लेकर 1946 में बम्बई में वायुसेना के सैनिकों ने हड़ताल की। हड़ताली वायुसैनिकों ने मांग की कि उन्हें भी अंग्रेज वायुसैनिकों के समान अधिकार दिये जायें। इस हड़ताल में 1500 से ज्यादा वायु सेना के कर्मचारी शामिल हुए थे। हड़ताल एक भारतीय वायुसैनिक के साथ अंग्रेज अधिकारी के दुर्व्यवहार करने के कारण शुरू हुई। लेकिन यह लम्बे समय से दबे आक्रोश का परिणाम थी।

इसी के अगले महीने फरवरी 1946 में नौसेना ने विद्रोह कर दिया। भारतीय समुद्र तट की रक्षा करने वाले जंगी जहाज पहले ब्रिटिश नौसेना के अधीन थे। दूसरे 'महायुद्ध' के ठीक पहले इन्हें नौसेना से अलग कर दिया गया और 'रायल इंडियन नेवी' यानी शाही भारतीय नौसेना गठित की इस शाही सेना में प्रायः सभी बड़े अफसर अंग्रेज होते थे। अंग्रेज अधिकारी अक्सर भारतीय नौसैनिकों का अपमान करते थे। उन्हें बहुत घटिया खाना दिया जाता था और नौसेना से छंटनी होने पर बहुत कम भत्ता दिया जाता था। छंटनी होने पर उन्हें अपनी वर्दी भी वापस करनी होती थी। नौसैनिकों के बार-बार अनुरोध करने पर भी उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

फरवरी 1946 में शाही नौसेना के कुछ नाविकों की ट्रेनिंग बम्बई में युद्धपोत 'तलवार' पर हो रही थी। जहाज पर नौसैनिकों को बेहद खराब खाना दिया जा रहा था। इसकी शिकायत नाविकों ने जब अंग्रेज अधिकारी से की तो उसने इनकी शिकायत पर ध्यान देने के बजाय इनका मजाक उड़ाते हुए कहा, ''भिखमंगों के पास चुनने का अधिकार नहीं होता (Beggers have no choice)।'' उसने यह भी कहा कि नाविकों को कंकड़-पत्थर वाला चावल ही मिलेगा, जिसे यह नहीं खाना हो वह खुद अपने हाथ से साफ कर ले। नाविकों ने अफसर की इस बात का विरोध किया। शीघ्र ही यह विरोध बैरक में फैल गया। नाविकों ने बैरकों की दीवारों पर 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' और 'हिन्दुस्तान जिन्दाबाद' के नारे लिख दिये। कमाण्डर ने इस सबके लिए रेडियो ऑपरेटर दत्त को जिम्मेदार माना और उसे कम्युनिस्ट कहकर गिरफ्तार कर लिया। इसके जवाब में नाविकों ने 18 जुलाई को भूख हड़ताल शुरू कर दी।

यह हड़ताल बैरक के नाविकों से शुरू हुई। दोपहर तक 'तलवार' के सभी नाविक हड़ताल में शामिल हो गये। उस वक्त बम्बई में नौसेना के 22 जहाज थे। 19 फरवरी को इन सब जहाजों के नाविकों ने हड़ताल का समर्थन कर दिया। जहाजों के मस्तूल से बरतानवी झंड़े यूनियन जैक को उतार दिया गया। उसकी जगह नाविकों ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग व कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे एक साथ फहरा दिये। इस तरह हड़ताल ने ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीक को हटाकर एक विद्रोह का ऐलान कर दिया।  

इसके बाद हड़तालियों ने बम्बई शहर में वर्दी पहन कर जुलूस निकाला। जुलूस-प्रदर्शनों का यह सिलसिला लगातार जारी रहा। नाविकों के प्रदर्शन में तीन झंड़े एक साथ चलते थे- कांग्रेस का तिरंगा, मुस्लिम लीग का हरा झंड़ा और उनके बीच में कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंड़ा। कांग्रेस और लीग के झंड़े राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता के प्रतीक थे, तो कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंडा मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ एकजुटता का प्रतीक था। 

नाविकों के प्रदर्शनों में प्रमुख नारे थे- 'जय हिन्द', 'इंकलाब-जिन्दाबाद', 'हिन्दू-मुस्लिम एक हो', 'ब्रिटिश साम्राज्यवादी मुर्दाबाद', 'आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों व अन्य राजनीतिक बंदियों को रिहा करो', 'हिन्देशिया से भारतीय सैनिक वापस बुलाओ', 'हमारी मांगें पूरी करो' आदि।

जिस-जिस रास्ते पर जुलूस गया वहां से अंग्रेज सैनिक व अफसर हटा लिये गये। विदेशी फर्मों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं। हड़ताल मद्रास व करांची के नौसैनिकों में भी फैल गयी। कैसल और फोर्ट स्थित बैरकों के नौसैनिक इसमें शामिल हो गये। अन्य युद्धपोतों के साथ करांची के 'हिन्दुस्तान' युद्धपोत के नाविकों ने भी हड़ताल की दी। इस युद्धपोत ने बाद में अंग्रेज सेना के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया।

19 फरवरी को दोपहर के बाद अंग्रेज फ्लैग ऑफिसर रोथ रॉय 'तलवार' पर आया। उसने नाविकों से उनकी मांगें पूछीं ताकि उन्हें सदर दफ्तर भेजा जा सके। उसने वादा किया कि हड़ताली नेता गिरफ्तार नहीं किये जायेंगे। इस वायदे के साथ एक नौसैनिक केन्द्रीय हड़ताल समिति का चुनाव किया गया। हड़ताल समिति ने सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं। इसमें प्रमुख मांगें थीं-

1. भारतीयों के साथ नस्लवादी (गोरे-काले) और जातिगत (यूरोपीय बनाम भारतीय) भेदभाव बंद किया जाये।

2. अंग्रेज अफसरों को हटाकर भारतीय अफसर नियुक्त किये जायें।

3. भारतीय जहाजियों को बेहतर खाना मिले।

4. भारतीय जहाजियों को गोरे जहाजियों के बराबर वेतन व अधिकार मिलें।

5. परिवार भत्ता बढ़ाया जाये।

6. नौसेना में छंटनी के बाद दूसरे काम का बंदोबस्त किया जाये।

7. आजाद हिन्द फौज के सैनिकों समेत सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाये।

8. हिन्दचीन (Indochina) व जावा से भारतीय सेना वापस बुलायी जाये।

लेकिन रोथा रॉय ने उसी दिन अपना वादा तोड़ दिया। अंग्रेजों ने खमलिया जहाज के 300 नाविकों को गिरफ्तार करने का हुक्म जारी कर दिया। वे नाविक उस समय तट पर थे।

अंग्रेजों के इस व्यवहार से हड़ताल ने और जोर पकड़ा और जहाजों की मरम्मत करने वाले कारखानों तक यह फैल गयी। गोदी मजदूर भी हड़ताली नाविकों के साथ आकर मिल गये। 19 फरवरी की रात 10 बजे विभिन्न जहाजों के प्रतिनिधियों ने हड़ताल कमेटी की बैठक की; जिसमें पांच लोगों की कार्यकारिणी कमेटी चुनी गयी। 'तलवार' में इसका सदर दफ्तर बनाने का फैसला हुआ।

20 फरवरी को हड़ताल अन्य बंदरगाहों और शहरों में भी फैल गयी। बम्बई के पास थाना शहर में नौसेना की बैरकें थीं। इन बैरकों में 'अकबर' नामक गस्ती जहाज के 300 नाविक थे, जो उसी दिन हड़ताल में शामिल हो गये। 'इंडिया' नामक युद्धपोत के नाविकों ने हड़ताल कर दी। यह युद्धपोत उस समय रॉयल इंडियन नेवी के जनरल स्टाफ का काम करता था। करांची, कलकत्ता, विशाखापट्टनम और दूसरे बंदरगाहों पर खड़े जहाज भी हड़ताल में शामिल हो गये। 22 फरवरी तक देश के सभी नौसैनिक अड्डों में विद्रोह फैल चुका था। करीब 78 जहाज, 20 नौसैनिक केन्द्र और 20 हजार सैनिक विद्रोह में शामिल थे। इसी के साथ सारी भारतीय नौसेना इस विद्रोह में शामिल हो चुकी थी।

हड़ताल को इस तरह फैलता देख अंग्रेज अधिकारी बुरी तरह घबरा गये। उन्होंने हड़तालियों को सबक सिखाने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया। हड़ताली सैनिकों ने साहसपूर्वक अंग्रेजी दमन का मुकाबला किया। बम्बई ही नहीं दूर-दराज के इलाकों में यह मुकाबला हुआ। ब्रिटिश सेना की बख्तरबंद गाड़ियों ने नाविकों की बैरकों को घेर लिया। हड़ताली जहाजों व युद्धपोतों को हवाई जहाजों व बमवर्षक जहाजों ने घेर लिया। लेकिन ब्रिटिश सेना में शामिल हिन्दुस्तानी सैनिकों ने विद्रोही नाविकों पर गोली चलाने से मना कर दिया। इन बागी सैनिकों को हटाकर विशुद्ध गोरी पलटनों को विद्रोह के दमन के लिए तैनात किया गया। 21 फरवरी को सुबह भारतीय सेना और अंग्रेज सैनिकों में लड़ाई छिड़ गयी। लड़ाई की शुरूआत अंग्रेजी सेना ने की तथा बैरक से बाहर निकल रहे सैनिकों पर गोलियां चला दीं। इस पर अपनी रक्षा में शस्त्रागार से हथियार निकाल कर नौसैनिक मैदान में आ डटे।

ब्रिटिश तोपों ने भारी गोलीबारी कर युद्धपोत सिंध पर 4 नाविकों को मार डाला। नाविकों ने भी अपने युद्धपोतों को हमलावर ब्रिटिश सेना की तरफ मोड़ दिया। सात घंटे तक भीषण संग्राम चला जो 21 फरवरी की शाम युद्ध विराम घोषित होने तक जारी रहा।

21 फरवरी को तीसरे पहर एडमिरल गॉडफ्रे ने रेडियो पर नौसैनिकों को आत्मसमर्पण का अल्टीमेटम दिया। ऐसा न करने पर उसने कठोरतम और प्रबलतम कार्यवाही की धमकी देते हुए कहा कि इस कार्यवाही में पूरी नौसेना भी नष्ट हो जाये तो उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं।

गॉडफ्रे के इस अल्टीमेटम पर नौसैनिकों ने सभी राजनीतिक दलों से सहायता की अपील की। उन्होंने बम्बई में मजदूरों व जनता से भी सहयोग की अपील की। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने नौसैनिकों की हड़ताल व विद्रोह का खुलकर समर्थन किया। कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी ट्रेड यूनियनों में मजदूरों व आम मेहनतकशों से हड़ताल के समर्थन व नौसैनिकों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए हड़ताल की अपील की। अरुणा आसफ अली व अन्य नेताओं ने हड़ताल का नेतृत्व किया। कांग्रेस व लीग के ज्यादातर बड़े नेताओं ने नौसैनिकों के विद्रोह से दूरी बनाये रखी।

21 फरवरी को नौसैनिकों के समर्थन में बम्बई के 3 लाख मजदूरों ने हड़ताल में भाग लिया। शहर में जुलूसों व प्रदर्शनों का तांता लग गया। छात्रों ने भी हड़ताल में साथ दिया। बम्बई के कामगार मैदान में एक बड़ी सभा हुई जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य श्रीपाद अमृत डांगे प्रधान वक्ता थे।

नौसैनिकों के पक्ष में मजदूर वर्ग व आम जनता का समर्थन देख अंग्रेज बुरी तरह घबरा गये। उन्होंने मजदूरों पर बर्बर हमला किया। मजदूरों के घरों में घुस कर हमले किये गये। भारी संख्या में मजदूरों को गोली से उड़ा दिया। हजारों घायल हुए। शांति व्यवस्था के नाम पर सेना की दो बटालियनें तैयार कर दी गयीं। पुलिस व सेना ने मजदूरों का किस कदर दमन किया। उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 21 से 23 फरवरी के बीच 250 लोग मार डाले गये। गैर सरकारी आंकड़ों में हताहतों की संख्या हजारों में थी।

नौसैनिकों के विद्रोह को देश भर में भारतीय जनता का अभूतपूर्ण समर्थन मिला। देश भर में हड़ताल-आंदोलन होने लगे। 23 फरवरी को जबलपुर स्थित भारतीय सिग्नल कोर में हड़ताल हो गयी। करांची में मजदूरों और छात्रों ने मिलकर नौसैनिकों का समर्थन किया। सेना व पुलिस ने प्रदर्शनकारियों का बर्बर दमन किया। कई लोग हताहत हुए, कई लोग गिरफ्तार हुए।

प्रदर्शनकारियों में हिन्दू व मुसलमान दोनों थे। नौसैनिकों के पक्ष में मजदूर महिलायें व लड़कियां भी साहस के साथ आगे आयीं। जब अंग्रेजों ने पोस्टर व पर्चों पर प्रतिबंध लगाया तो लड़कियों व मजदूर महिलाओं ने इन्हें आम जनता तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। वे पर्चों को खाने के डिब्बों में भरकर ले जातीं और फिर कारखानों व मजदूर मोहल्लों में जाकर बांट देती थीं। भारी दमन का मुकाबला करते हुए वे यह जोखिमपूर्ण कार्य करती थीं।

भारतीय सैनिकों की सहानुभूति भी नौसैनिकों के साथ थीं। सैनिक, नौसेना विद्रोह को दबाने में सरकार की मदद से इंकार कर रहे थे। 23 फरवरी को जबलपुर स्थित भारतीय सिग्नल कोर में हड़ताल हो गयी। अप्रैल महीने में बिहार व दिल्ली पुलिस ने भी हड़ताल कर दी। इस दौरान देश के अन्य हिस्सों में भी किसान आंदोलन भी चल रहे थे। इस तरह यह विद्रोह भारत में अंग्रेजी शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित होने जा रहा था।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इस हड़ताल का समर्थन नहीं किया। पटेल जैसे नेता नौसैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए कहते रहे। अंत में मुकदमा न लगने देने का उनका आश्वासन फर्जी साबित हुआ।

नौसैनिक विद्रोह ने देश की आजादी की लड़ाई में जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करने के साथ इस लड़ाई को एक नये मुकाम पर पहुंचा दिया, जहां अंग्रेजों को भारत में और अधिक दिन शासन करना खतरे से खाली नहीं लगा। और शीघ्र ही वे भारत छोड़ने को मजबूर हुए और देश आजादी हुआ। नौसैनिक हड़ताल कमेटी ने अपने अंतिम संदेश में कहा था और बहुत ठीक कहा था- ''हमारी हड़ताल इस देश के जीवन में ऐतिहासिक घटना है। पहली बार वर्दीधारी सैनिक और आम जनता का खून एक समान मकसद के लिए गलियों में एक साथ बहा।'' 

साभार : 'परचम' त्रैमासिक पत्रिका