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Thursday, 9 March 2023

चारुलता और पाथेर पंचाली का विरोध


*सत्यजीत रॉय की फ़िल्म चारुलता और पाथेर पंचाली का आरएसएस का विरोध*

अच्छा है आज का दिन देखने के लिए 'सत्यजीत रे' जिंदा नहीं हैं

कटक में होने वाले फ़िल्म फेस्टिवल में आर.एस.एस. से जुड़े संगठनों ने 4 फिल्मों के दिखाए जाने पर विरोध जताया है और आयोजनकर्ताओं को धमकी दी है। इनमें से 2 फिल्में सत्यजीत रे की कालजयी फिल्में 'पाथेर पांचाली' और 'चारुलता' है। 
'पाथेर पांचाली' के बारे में  इन कट्टरपंथी संगठनों की राय यह है कि इसमे भारत की गरीबी का महिमामंडन किया गया है और 'चारुलता' के बारे में कहना है कि इसमें प्रकारांतर से परिवार के भीतर यौन संबंधों (incest) को दिखाया गया है।
शायद यह पहली बार है, जब किसी संगठन ने सत्यजीत रे की फ़िल्म पर आपत्ति उठायी है।
हम कहां आ गए हैं? 
मुझे इस वक़्त शिद्दत से 'फ़हमीदा रियाज़' याद आ रही हैं-

"तुम बिल्कुल हम जैसे निकले 

अब तक कहाँ छुपे थे भाई 

वो मूरखता वो घामड़-पन 

जिस में हम ने सदी गँवाई 

आख़िर पहुँची द्वार तुहारे 

अरे बधाई बहुत बधाई 

प्रेत धर्म का नाच रहा है 

क़ाएम हिन्दू राज करोगे 

सारे उल्टे काज करोगे 

अपना चमन ताराज करोगे 

तुम भी बैठे करोगे सोचा 

पूरी है वैसी तय्यारी 

कौन है हिन्दू कौन नहीं है 

तुम भी करोगे फ़तवा जारी 

होगा कठिन यहाँ भी जीना 

दाँतों आ जाएगा पसीना 

जैसी-तैसी कटा करेगी 

यहाँ भी सब की साँस घुटेगी 

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा 

अब जाहिल-पन के गन गाना 

आगे गढ़ा है ये मत देखो 

वापस लाओ गया ज़माना 

मश्क़ करो तुम आ जाएगा 

उल्टे पाँव चलते जाना 

ध्यान न दूजा मन में आए 

बस पीछे ही नज़र जमाना 

एक जाप सा करते जाओ 

बारम-बार यही दोहराओ 

कैसा वीर महान था भारत 

कितना आली-शान था भारत 

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे 

बस परलोक पहुँच जाओगे 

हम तो हैं पहले से वहाँ पर 

तुम भी समय निकालते रहना 

अब जिस नर्क में जाओ वहाँ से 

चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना"

https://youtu.be/uazeXZHTfGQ पाथेर पंचाली
https://youtu.be/RmKu7VE4IBA चारुलता 





Wednesday, 8 March 2023

आध्यात्मिक बाबाओं और चुनावी मदारियों का याराना



अपने एतिहासिक रूप में धर्म मनुष्य के अज्ञान, बेबसी और डर की उपज है। प्रकृति के प्रति अपने अज्ञान में से वह इसका दैवीकरण करता है और खद को कमज़ोर मानते हुए इसके आगे झुकता है। दैवीकरण का अर्थ है प्रकृति के बर्ताव को किसी अदृश्य, रहस्यमय और पराभौतिक शक्ति की इच्छा का नतीजा मान लेना। मध्य युग या जागीरदारी के समय धर्म शासक वर्ग के हाथ में जनता की अधीनता का हथियार बना रहा। एक तरफ़ धर्म राजा की सत्ता को दैवी सत्ता का प्रतीक बताते हुए उसे क़बूल करने का उपदेश देता था, और दूसरी तरफ़ जनता के हालात को उनके भगवान की इच्छा और उनके पिछले जन्मों के कर्मों का फल बताते हुए सब कुछ स्वीकार करके जीने की सलाह देता था। इसी सामंती समाज के गर्भ में एक नया पूँजीवादी समाज भी जन्म लेने लगा। अस्तित्व में आ रहे इस नए पूँजीवादी समाज के लिए ज़रूरी था कि वह सामंती आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को तबाह कर दे। इसलिए उभर रहे पूँजीवाद ने तर्कशीलता को अपना दर्शन बनाया, जिसके द्वारा मध्यकालीन मूल्य-मान्यताओं के साथ-साथ धर्म पर भी चोट की गई। जनवाद, तर्कशीलता जनता की चेतना का हिस्सा बने, तो उन्होंने धर्म आधारित सामाजिक, राजनीतिक सत्ता भी तबाह कर दी। इसने धर्म को ख़त्म तो नहीं किया, लेकिन सत्ता और धर्म के गठबंधन को तोड़ दिया। काफ़ी हद तक धर्म निजी मामला बनकर रह गया और धर्म-निरपेक्ष राज्य अस्तित्व में आए। लेकिन यह केवल वहीं हुआ, जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था सामंतशाही के साथ संघर्ष की प्रक्रिया से गुज़रकर क्रांतिकारी ढंग से सत्ता में आई। बहुत से देशों में सामंतशाही से पूँजीवाद का बदलाव ऊपर से लागू किए गए धीमे सुधारों से हुआ। इस तरह आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में तो पूँजीवादी तौर-तरीके़ लागू हो गए, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में सामंती विचार काफ़ी हद तक हावी रहे। इन देशों में लोकतंत्र और तर्कशीलता जैसी अवधारणा आम सामाजिक चेतना का हिस्सा ना बन सकी। ऐसे देशों में धर्म की जकड़, अंधविश्वास और मध्यकालीन पिछड़ेपन का ख़ासा असर रहा।

भारत में पूँजीवादी विकास भी ऐसे ही ऊपर से लागू किए गए सुधारों के ज़रि‍ए हुआ, जिसकी वजह से यहाँ भी सांस्कृतिक पिछड़ापन हावी है। एक तरफ़ हम आधुनिक मशीनी उद्योग, गगनचुंबी इमारतें, कंप्यूटर, हवाई जहाज़, विज्ञान अनुसंधान केंद्र देख सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ धागे-ताबीज़ और जादू-टोना जैसे अंधविश्वास भी बहुत ज़्यादा मिल जाते हैं। एक तरफ़ सार्विक वयस्क मताधिकार आधारित संसद है, तो दूसरी तरफ़ खाप पंचायतें और घर के बड़े-बुजुर्गों के प्रभुत्व वाले परिवार देखते हैं, जहाँ नौजवानों को अपने फ़ैसले तक ख़ुद नहीं करने दिए जाते। आधुनिकता और पिछड़ेपन का यह मिश्रण यहाँ के ऊपरी सुधारों की वजह से हुए पिछड़े पूँजीवादी विकास का नतीजा है। इसीलिए यहाँ अंधविश्वास और धर्म की पकड़ बहुत मज़बूत है। हालाँकि संविधान धर्म-निरपेक्षता का दावा करता है, मगर असलियत में सत्ता और धर्म का गठबंधन अभी भी बहुत गहरा है। इसीलिए यहाँ सांप्रदायिक राजनीति की ज़मीन बहुत उपजाऊ है। यहाँ पर बाबाओं, संतों और डेरों की बहुतायत है, जो आज भी जनता को अंधविश्वास में उलझाए रखते हैं। पूँजीवादी युग की यह संतगिरी एक तरफ़ बड़ी कमाई करने वाला धंधा भी है और दूसरी तरफ़ यह सत्ता के साथ घी-खिचड़ी हुआ भी दिखाई देता है।

ऐसा ही एक बाबा इन दिनों मुख्यधारा मीडिया, ख़ासकर ख़बरी टी.वी. चैनलों पर छाया रहा है। छाया नहीं, बल्कि उभारा गया है। यह बाबा 26 साल का धीरेंद्र शास्त्री है, जो मध्यप्रदेश के छत्रपुर जि़ला के गाँव गड़ा से आया है। इसे बागेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह बाबागिरी का धंधा पिछले 4-5 साल से मध्यप्रदेश से चला रहा है। इसी समय के दौरान इसने कई राजनीतिक नेता, ख़ासकर भाजपा के साथ नज़दीकियाँ बढ़ाई हैं। बहुत से भाजपा नेता उसके डेरे पर जाते हुए देखे जा सकते हैं। यह इसके पास चौकी भरने आए लोगों में से किसी एक को अपने पास बुलाकर उसके नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि, बीमारी और दूसरी समस्याओं के बारे में बताने की जादूगरी करता है। इस जादूगरी को वह हनुमान की कृपा से हुआ चमत्कार बताता है। भाजपा के मीडिया की बदौलत उसका धंधा अच्छा चल रहा है। पिछले साल भी यह थोड़ा चर्चा में आया था, जब उसने अपने पाँव छूने की कोशिश करते हुए एक दलित व्यक्ति को छूआछूत की बात करते हुए पाँव छूने से मना कर दिया था।

पिछले कुछ समय से अपनी धार्मिक सभा में वह राजनीतिक टीका-टिप्पणी करने लगा है, जिसकी वजह से मीडिया उसे चर्चा का केंद्र बना रहा है। इस समय वह छत्तीसगढ़ में काफ़ी सरगर्म है। छत्तीसगढ़ में इस समय कांग्रेस की सरकार है और कुछ महीनों में यहाँ विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। इस मौके़ पर भाजपा के पक्ष में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में धीरेंद्र शास्त्री अहम भूमिका निभा रहा है। वह कहता है कि ईसाई यहाँ "जबरन" धर्म परिवर्तन कर रहे हैं और इसके लिए वह कांग्रेस सरकार को दोषी बताता है। वह कहता है कि वह उनकी "घर वापसी" के लिए काम कर रहा है। सनातनी हिंदुओं को चाहिए कि वे ईसाइयों को सबक़ सिखाएँ। मुसलमानों के विरुद्ध वह कहता है कि "हिंदुओं पर पत्थर फेंकने वालों को बुलडोज़र से कुचलना होगा", और "सरकार कब तक बुलडोज़र से उनके घर गिराती रहेगी, यह काम हिंदुओं को करना होगा।" वह यह भी आह्वान करता है कि "तुम मेरा साथ दो, हम हिंदू राष्ट्र बनाएँगे।" यानी आजकल वह पूरी तरह ईसाई, मुसलमान विरोधी और हिंदू राष्ट्र बनाने की संघ-भाजपा की सिखाई गई बोली बोल रहा है। भाजपा के इशारे पर ही मीडिया इसे चर्चा का विषय बना रहा है। हैरानी की बात नहीं है कि मीडिया के जो चैनल ख़ास तौर पर भाजपा के भौंपू बने हुए हैं, वही इस बाबा के बारे में जोर-शोर से चर्चा कर रहे हैं।

पिछले दिनों उसने महाराष्ट्र में कुछ दिन लगातार चलने वाला बाबागिरी का कार्यक्रम रखा हुआ था। मीडिया ने जब इसके "चमत्कारों" के दावों की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू किए तो अखिल भारतीय अंधविश्वास निर्मूलन समिति के नेता प्रो. श्याम मानव ने चुनौती दी कि वह उनकी शर्तों के तहत चमत्कार करके दिखाए। इस चुनौती से बौखलाया शास्त्री मीडिया में बहुत गरजा, मगर प्रो. श्याम मानव की चुनौती क़बूल करने की हिम्मत ना जुटा सका। बल्कि डर के मारे अपना नागपुर का कार्यक्रम समय से पहले ही ख़त्म करके वापिस छत्तीसगढ़ चला गया।

इस बाबा के श्रद्धालू या इसके मददगार कुछ राजनीतिक नेताओं की तरफ़ एक नज़र डालने की ज़रूरत है। इनमें भाजपा का केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र का उप मुख्यमंत्री देविंद्र फड़नवीस, छत्तीसगढ़ से भाजपा का पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत और भी कई राज्य स्तरीय और केंद्रीय नेता शामिल हैं। इसके सिवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा विश्व हिंदू परिषद और संघ की कठपुत्ली बाबा रामदेव भी उसके हिमायती हैं। इस तरह यह बाबा इस बात का सबूत है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ और ख़ास तौर पर भाजपा का कैसे आध्यात्मिक ठगों, मदारियों, बाबाओं के साथ इतना गहरा नाता है।

भाजपा के साथ संबंध रखने वाले ऐसे बाबाओं की सूची काफ़ी लंबी है। इनमें से 2013 में एक नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में जेल में कै़द आसाराम बापू, सतलोक आश्रम का संत रामपाल, मध्यवर्गीय बाबा श्री-श्री रवि शंकर, बाबा रामदेव, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, नित्यानंद और रामभद्राचार्य जैसे सैकड़ों छोटे-बड़े बाबा, संत शामिल हैं। योगी अदित्यनाथ तो भाजपा का उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना बैठा है। 2015 में हरियाणा सरकार ने बाबा रामदेव को मंत्री बनाने की पेशकश की थी, तो उसने यह कहकर पेशकश ठुकरा दी थी कि "अब तो प्रधानमंत्री भी अपना, पूरी कैबिनेट अपनी, हरियाणा का मुख्यमंत्री भी अपना, अब मुझे बस बाबागिरी करने दो।" हरियाणा के डेरा सिरसा मुखी को भाजपा सरकार ने पहले पंजाब चुनाव के समय पैरोल दी थी और अब पिछले एक साल में उसे चार बार पैरोल दी जा चुकी है। यानी अगले चुनाव में उसे वोटों की फ़सल काटने के लिए तैयार किया जा रहा है।

इस तरह सभी धार्मिक डेरे, साधु-संत पूँजीवादी राजनीति के साथ गठबंधन और चुनावी पार्टियों की राजनीतिक शह पर ही फलते-फूलते हैं। पूँजीवादी राजनीतिक पार्टियों के लिए डेरे, साधु, संत और धर्मगुरु सब चुनाव जीतने के लिए एक बहुत मज़बूत वोट बैंक हैं, दूसरा जनता में पहचान बनाने और अपनी साख़ सुधारने का भी साधन हैं। इसके सिवा ये जनता में फूट डालने, निहत्थे करने का साधन हैं। इन धार्मिक गुरुओं, डेरों के साधु-संतों को राजनीतिक गठबंधन रखने का यह फ़ायदा होता है कि इन्हें क़ानूनी तौर पर परेशान नहीं किया जाता, बल्कि सरकारी और दूसरी विरोधी शक्तियों से राजनीतिक शक्ति इनका बचाव करती है, दूसरा इससे उनके श्रद्धालु और आमदनी का घेरा भी फैलता है। वैसे तो सभी पूँजीवादी राजनीतिक पार्टियों का अलग-अलग डेरों, धार्मिक गुरुओं और साधु-संतों से गठबंधन होता है, लेकिन भाजपा बिना शक इस मामले में सबसे आगे है।

मुख्यधारा का या सत्ताधारी वर्ग का मीडिया पूँजीपतियों के विचारों के दबदबे और उनकी राजनीति को आगे बढ़ाने वाला औजार होता है। इसी लिए यह मीडिया तर्कशील, जनवादी मूल्य-मान्यताओं का प्रचार-प्रसार नहीं करता, बल्कि अंधविश्वास, पिछड़ापन, सांप्रदायिकतावादी जुनून फैलाने और इन बाबाओं के पक्ष में जनता की राय बनाने का ही काम करता है। रवि शंकर, रामदेव, निर्मल बाबा और अब धीरेंद्र शास्त्री जैसे आधुनिक युग के इन बाबाओं का धंधा फैलाने में इस मीडिया ने जी-जान से अपनी भूमिका निभाई है और निभाता रहेगा।

जिस समाज की बुनियाद ही ग़ैर-बराबरी, लूट और दमन पर टिकी हो, वहाँ जनता को पिछड़ेपन, अज्ञानता, अंधविश्वास और धर्म की पकड़ में कै़द रखना सत्ताधारी वर्ग की ज़रूरत होती है, जिसके दम पर जनता पर अपना दमनकारी शासन बरकरार रखा जा सके। यह समाज की वर्गीय बँटवारे से जन्मी समस्याओं को हल करने की बजाय जनता को वर्ग संघर्ष की जगह आध्यात्मिक, स्वर्ग और धर्म जैसी अफ़ीम के नशे की राहत देते हैं। इस तरह पूँजीवादी विकास के बावजूद यहाँ आध्यात्मिक गुरु और सत्ता परस्पर प्यार का झूला झूलते रहते हैं। मीडिया, प्रशासन, क़ानून सभी इनकी सेवा में हाज़िर रहते हैं। इस शोषण-उत्पीड़न पर आधारित समाज को बदलने की जद्दोजहद में आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष के साथ ही वैचारिक संघर्ष करना भी मेहनतकश जनता की अहम ज़रूरत है। इस वैचारिक संघर्ष के हिस्से के रूप में अंधविश्वास, धर्म, डेरे और बाबाओं के चंगुल से मेहनतकश जनता को मुक्ति दिलवाना और उन्हें तर्कशीलता और वैज्ञाविक सोच के साथ जोड़ना समाज की क्रांतिकारी शक्तियों का अहम कार्यभार है।

– गुरप्रीत

मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 28 ♦ मार्च  2023 में प्रकाशित

Monday, 6 March 2023

फ़िल्म 'सुसमन'

फ़िल्म 'सुसमन' : श्याम बेनेगल (1987)
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"झीनी झीनी बिनी रे चदरिया" गाने वाले क्रांतिकारी कवि कबीर जुलाहा थे।अपने समय की सामाजिक विसंगतियों पर उन्होंने मुखरता से चोट किया।कबीर जिस दौर में थे वह एक हद तक व्यापारिक पूंजीवाद का दौर था, जिसमे सीमित अर्थ में वर्ण व्यवस्था का विघटन हो रहा था, बाज़ार में गतिशीलता थी। खासकर नगरों में। वह दौर उत्पादन के परंपरागत साधन का दौर था, जिसमे जुलाहा कर्म भी हस्तकरघा पर आधारित था।यह व्यवस्था लंबे समय तक चली और बाजार में वस्त्रों की आपूर्ति हथकरघा से बने कपड़ो से होती रही।

औद्योगिक क्रांति के बाद के दौर में उत्पादन के साधनों में युगान्तकारी परिवर्तन आया। उत्पादन मशीनों से होने लगा,जिससे कम समय और श्रम में अधिक उत्पादन होने लगा।इससे जहां एक ओर पूँजी की केन्द्रीयता बढ़ने लगी,सीमित व्यक्ति धनवान होने लगें वहीं बहुसंख्यक कामगारों की रोजी-रोटी बंद होने लगी।मशीनी अर्थव्यवस्था उन्हें बाज़ार से अपदस्थ करने लगा। इस व्यवस्था को पूंजीवाद कहा गया।

इस मशीनी उत्पादन पद्धति से हस्तचालित बहुत से काम खत्म होने लगें, जिसमे हस्तकरघा से कपड़ा बुनने वाले बुनकरों का काम भी है।यों यह यकायक खत्म नहीं हुआ मगर धीरे-धीरे संकट गहराने लगा और बीसवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते यह चरम पर आ गया। मगर इस दौरान एक दूसरी प्रवृत्ति भी दिखाई दी। मशीनों के अंधाधुंध उत्पादन ने जरूर बाजार को 'माल' से भर दिया था मगर उसमे एक यांत्रिकता थी,नीरसता थी। इससे।लोगों में एक ऊब भी पैदा होने लगी और वे नएपन की तलाश में पुराने की तलाश करने लगे।

इस तरह हस्तनिर्मित वस्तुओं के सौंदर्य मूल्य की पहचान तो हुई और फैशन के रूप में उसका महत्व भी बढ़ा मगर इसका लाभ कारीगरों को नहीं मिला। सारा लाभ व्यापारी और बिचौलिए ही हड़पने लगे,कारीगरों की स्थिति दयनीय ही बनी रही।यह स्थिति फ़िल्म 'सुसमन' के समय(1987) थी, आज भी है।

फ़िल्म में 'रामुलु' एक कुशल बुनकर है।परिवार में पत्नी,बेटी और बेटा है। साथ भाई और उसकी पत्नी भी है। एक तरह से संयुक्त परिवार।सब मिलजुलकर काम करते हैं मगर आय इतनी नहीं हो पाती की घर का खर्च ठीक-ठाक निकल सके।काम की कमी है,और जो है वह बिना बिचौलियों में बुनकरों तक पहुंच नहीं पाता। कहने को तो उनके हितों की रक्षा के लिए सहकारी समिति का गठन भी हुआ है मगर वहां भी भ्रष्टाचार पसरा हुआ है।

रामुलु का हुनर केवल प्रतिष्ठा की बात रह गयी है, वह रोटी नहीं दे पाता। वह कपड़े बुनता है मगर अपनी बेटी के लिए साड़ी बुन सके उसके लिए धागे नहीं है।पूरी फिल्म में उसके घर मे अंधेरा छाया हुआ है।यह अंधेरा जैसे उसके जीवन का है। बेबसी इस कदर कि वह इस व्यवसाय को चाह कर भी छोड़ नहीं पा रहा है, और इस खीझता में एक बार करघा को आग लगाने की कोशिश करता है। उसका बेटा कभी उसके काम मे रुचि लेता है तो डाँटकर उसे मना करता है और पढ़ने कहता है।वह बार-बार अपने हुनरमंद हथेलियों को हैरानी से देखता है मानो इस विडम्बना को समझ नहीं पा रहा हो।मानो ये वे हाथ नहीं है जिसमे 'जादू' हुआ करता था।मानो कुछ अनपेक्षित घटित हो गया है जिसे वह समझ नहीं पा रहा है।अंततः वह जैसे परिस्थिति से हार मानकर खमोश हो जाता है,उसमे जैसे अनामिकता का भाव आ जाता है।

पत्नी 'गौरम्मा' बार-बार स्थिति को संभालने का प्रयास करती है, मगर कब तक। रामुलु के मना करने पर भी आर्डर के कुछ धागे बचाकर बेटी के लिए साड़ी बुनती है, मगर उसे दे भी नहीं पाती और पैसों के लिए बेचने का प्रयास करती है। मगर प्रकट हो जाने पर रामुलु को अपमानित होना पड़ता है।रामुलु तो खून के घूंट पीकर खामोश हो जाता है मगर गौरम्मा वह भी नहीं कर सकती! घर को बचाने के लिए उसे 'व्यावहारिक' होना पड़ता है।

यह स्थिति केवल रामुलु और उसके परिवार की नहीं है पूरे गांव की है। कुछ लोग काम की तलाश में शहर जाते हैं मगर वहां भी स्थिति बेहतर नहीं है।रहने को खोली तक नसीब नहीं, सुविधाएं तो दूर की बात है।फिर भी लोग जाते हैं!बेहतर की उम्मीद में एक बेबसी को छोड़कर अंततः दूसरी बेबसी में चले जाते हैं।

फ़िल्म के अंत में रामुलु को उसके हुनर के सम्मान में पेरिस जाने का मौका मिलता है। उससे जब प्रश्न पूछा जाता है कि क्या वह इस काम से खुश है तो वह कोई जवाब नहीं देता। फिर यह पूछने पर की मशीनों के बढ़ते जाने से क्या यह कला खत्म हो जाएगी? इस पर वह कहता है जिंदगी ढंग से कट तो हम यह काम छोड़कर क्यों जाएंगे, क्योंकि जो संतुष्टि हाथ से काम करने में है वह मशीन में नहीं। उसकी चाह बड़ी नहीं है,मगर बाज़ार की चाह तो बड़ी है!वहां भावना नहीं व्यावहारिकता से काम होता है। और व्यावहारिकता यह है कि यहां कला बिकती तो है मगर उसका मूल्य कलाकार को नहीं मिल पाता। और चूंकि यह व्यवस्था ऐसी है कि बिचौलियों को खत्म तो क्या उसे और बढ़ावा देती है,इसलिए उससे उम्मीद बेमानी है।

फ़िल्म में बुनकरों की स्थिति के अलावा ग्रामीण लोकजीवन और कुछ हद तक शहरी कामगार वर्ग के जीवन तथा उनकी समस्याओं की झांकी भी है।फ़िल्म का नाम 'सुसमन' कबीर के पद "झीनी झीनी बिनी रे चदरिया" में उल्लेखित सुसमन को लिया गया है जो 'सुषुम्ना' नाड़ी का बिगड़ा रूप है।यह योग का शब्दावली है। कबीर आत्मा के शरीर रूपी चादर का निर्माण जिस धागे से करते हैं उसमे 'सुसमन' प्रमुख है।मगर यह धागा आज कमजोर होता जा रहा है और इसलिए 'झीनी चादर' की सम्भावना भी।

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[2022]
●अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छत्तीसगढ़)
 मो.9893728320

*औरतों की ईद*

हम औरतें केवल सेक्स और देह पर ही ट्रोल नहीं होती हैं. अपने मन की किसी भी बात पर ट्रोल होने का हमारा पूरा हक है. हर होली, दीवली या किसी भी समय मुझे अरशााना अज़मत की यह कविता याद आती रहती है. यह कविता मात्र ईद के लिए नहीं है, हर पर्व, त्यौहार या किसी भी खास मौके पर हर आम औरत की हकीकत बयान करती है.  आप भी पढिए. 

*अरशाना अज़मत*

औरतों की ईद  यानी .. 
रोज के मुकाबले जल्दी जगने का दिन .. 
बावर्चीखाने में ज्यादा खटने का दिन .. 
ज्यादा खाना पकाने का दिन.. 
ज्यादा तरह के खाने पकाने का दिन .. 
ज्यादा बर्तन धोने का दिन.. 
ज्यादा सफाई करने का दिन.. 

औरतों की ईद यानी .. 
रोज के मुकाबले देर से खाने का दिन.. 
देर से नहाने का दिन.. 
देर से बिस्तर में जाने का दिन.. 
देर से टीवी देखने या न देखने का दिन.. 

ज्यादातर औरतें नहीं जानतीं कि ईद पर रिलीज होती है सलमान खान की पिक्चर.. 
ज्यादातर नहीं जाती सिनेमा हॉल में पिक्चर देखने...
 
ज्यादातर को ईदी भी नहीं मिलती.. 
ज्यादातर नहीं खरीद पातीं अपनी पसंद की झुमकियां... 
ज्यादतार दूसरे दिन पहनती हैं चाव से सिलवाया सूट और चूड़ियां.. 

औरतें बनाती हैं देग भर बिरयानी और खाती हैं मुट्ठी भर चावल... 
वो भी अक्सर सबके खा लेने के बाद.. .
रायता, चटनी और सलाद खत्म हो जाने के बाद.. 

औरतें सुबह सूरज निकलने से पहले बनाती हैं सेवंई .. 
औरतें शाम को सूरज ढलने के बाद खाती हैं सेवंई .. 

ज्यादातर ईद के दिन घर से नहीं निकलतीं.. 
ज्यादातर किसी से ईद मिलने नहीं जातीं.. 
ज्यादातर से ईद मिलने कोई नहीं आता.. 
उंगलियों पर गिनने लायक होते हैं औरतों के मेहमान... 

कहानियों में भी .. 
औरतें अमीना होती हैं वे घर में रहती हैं .. 
औरतें हामिद नहीं होतीं, वे मेले में नहीं जातीं .. 
औरतों को चिमटे की जरूरत होती है ... 
और जरूरत पूरी करने के लिए हामिद की.. 
औरतें खुद नहीं खरीदतीं अपने लिए चिमटा.. 

औरतें शामिल होती हैं इबादत में .. 
तैयारियों में ...
खरीदारी में ...
बाजार भर में दिखती हैं औरतें ...

औरतें गायब हो जाती हैं ईद के जश्न से ...

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यह रचना अरशाना अज़मत की है। अरशाना पत्रकार हैं। लखनऊ में रहती हैं।"

विभा रानी जी से साझा पोस्ट

Sunday, 5 March 2023

होलिका दहन


1. {होलिका दहन} 


कभी दिमाग पे

जोर डाला

होलिका दहन कर

क्यों खुशीयाँ

मना रहे है

अनभिज्ञ हो सत्य से

रूढीवादी परम्परा का

केवल निर्वाह कर रहे है।


ऐसा क्या किया

एक स्त्री ने

कि सदियों से

प्रत्येक वर्ष

उसे आग में

खाक कर रहे है

क्यों पौरूष विहीन

हुआ आज भी पुरूष

डर कर युगों बाद भी

पाप कर्मों को छुपा रहे है।


दहेज रूपी आग में

जलती असंख्य नारी देह

उसके लिए किसको हम 

दोषी ठहरा रहे है

क्या स्त्रीयों को जलाना ही 

सभ्य समाज की पहचान है

होलिका दहन से जिसको 

हम मजबूत बना रहे है।


क्यों नहीं करते कभी

उनका भी होलिका दहन

जो बलात्कार,हत्या ,

भ्रष्टाचार खूब कर रहे है 

लेकर जन्म

स्त्री की कोख से ही 

स्त्रीयों का ही अपमान

खुलेआम कर रहे है ।


क्या इनमें भी ज्यादातर

हिरण्यकश्यप मुलनिवासी के

ही दुश्मन छिपे बैठे है

जो समय समय पे भेष बदल रहे है

उलझा ब्राह्मणवाद के जाल में 

राजा बली के वंशजों को

देखो आँखे खोलकर

कैसे घर घर ठग रहे है।।

©anil_bidlyan



2. घोर निंदनीय और विछुब्ध करने वाली घटना है ये।

 

ऐसी घटनाएं उस हिन्दू मान्यता/दावे का पोल खोलती है कि होलिका दहन द्वारा हिन्दू समाज स्वयं अपने अंदर की बुराई को जलाता है।

         

दलित राजनीति करने वाले कुछ लोग इसे स्त्री विरोधी त्योहार बताते है।उनके अनुसार होली किसी स्त्री को जिंदा जला कर जश्न मनाने की सांकेतिक पुनरावृति है। इसलिए होलिका दहन और होली का वे विरोध करते है।


दलित मेहनतकस  न केवल इस तरह के घृणित सामाजिक उत्पीड़न का व्यापक विरोध करते है बल्कि इन ग्रामीण धनपशुओं  को उनकी निजी सम्पत्ति, जमीन जायदाद से उन्हें बेदख़ल कर सामाजिक  संपत्ति में बदलने का कार्यभार भी अपने सामने रखते है। इसी तरह इन धनपशुओं के दबंगई का होलिका दहन किया जा सकता है।



3. #होलिका! #मेरी_परदादी

***********************

होलिका मेरी मां की मां की मां…

मेरी परदादी

तुम पहली स्त्री थी

जिसे आग में झोंकर जलाया गया

फिर तो

स्त्री को जलाने की परंपरा चल पड़ी

कभी सती के नाम पर

कभी कुलटा के नाम पर

कभी दहेज के लिए


मेरी परदादी

दहेज के लिए

तुम्हारी हजारों बेटियां

साल- दर-साल जलाई जाती हैं

जलाने की परंपरा आज भी जारी है

जिसका शिकार

मेरी लाडली बेटी 

तुम्हारी पोती भी हो सकती है


तुम्हारे जिस्म के जलने की चिरांध

मुझे आज भी बेचैन करती है 

तुम्हारी छटपटाहट

मैं आज भी महसूस करता हूं 

घेरकर तुम्हें जलाया गया

तुम्हारे चिल्लान की आवाज

आज भी मुझे सुनाई देती है


मेरी परदादी

वे आज भी हर वर्ष

तुम्हें जलाने का जश्न मनाते हैं

जिसे वे होलिका दहन कहते हैं

जलाने के इस जश्न में

सब शामिल होते हैं

यहां तक तुम्हारी बेटियां-पोतियां भी


मेरी दादी, मनु पुत्रों ने

उमंग, खुशी और रंगों के त्योहार को

होलिकोत्सव नाम दे दिया


मेरी परदादी

तुम्हारा अपराध क्या था

तुमसे इतनी घृणा क्यों

साल-दर-साल 

तुम्हें जलाने का जश्न क्यों

जब तक तुम्हें जलाने का जश्न

मनाया जाता रहेगा

कोई-न-कोई स्त्री जलाई जाती रहेगी

क्या तुम्हें जलाए बिना 

रंगों का उत्सव नहीं बनाया जा सकता?



4. रात मे होलिका जलाते हो


अस्मत लूट कर, जश्न मनाते हो 

जिस्म जलाकर, जश्न मनाते हो 

अरे मनु के औलादों, 

कैसा प्रपंच रचाते हो 

करके बलात्कार 

पीड़िता पे सवाल उठाते हो

वहशी दरिंदों, बेशर्मों 

अपने कुकर्मों को छुपाते हो

इतना पाक साफ रहते हो तो

रात मे क्यों जलाते हो

दबे कूचले लोगों पर,

सितम तुम उठाते हो

कर्मो से नीच तुम,

औरों को नीच बताते हो

ढोंग, पाखंड से बना

कहानी तुम सुनाते हो 

होलिका भी जली, 

मनीषा भी जली 

पर मनीषा को जलाकर

होलिका की याद दिलाते हो

अरे, मनु के औलादों, जानते है

औरों की बहन, बेटियों की

अस्मत लूट कर,

अपने कुकर्मों को छुपाने

रात मे होलिका जलाते हो ।


डॉ. अनिता कुर्रे ।


5. होलिका दहन


कभी दिमाग पे

जोर डाला

होलिका दहन कर

क्यों खुशीयाँ

मना रहे है

अनभिज्ञ हो सत्य से

रूढीवादी परम्परा का

केवल निर्वाह कर रहे है।


ऐसा क्या किया

एक स्त्री ने

कि सदियों से

प्रत्येक वर्ष

उसे आग में

खाक कर रहे है

क्यों पौरूष विहीन

हुआ आज भी पुरूष

डर कर युगों बाद भी

पाप कर्मों को छुपा रहे है।


दहेज रूपी आग में

जलती असंख्य नारी देह

उसके लिए किसको हम 

दोषी ठहरा रहे है

क्या स्त्रीयों को जलाना ही 

सभ्य समाज की पहचान है

होलिका दहन से जिसको 

हम मजबूत बना रहे है।


क्यों नहीं करते कभी

उनका भी होलिका दहन

जो बलात्कार,हत्या ,

भ्रष्टाचार खूब कर रहे है 

लेकर जन्म

स्त्री की कोख से ही 

स्त्रीयों का ही अपमान

खुलेआम कर रहे है ।


क्या इनमें भी ज्यादातर

हिरण्यकश्यप मुलनिवासी के

ही दुश्मन छिपे बैठे है

जो समय समय पे भेष बदल रहे है

उलझा ब्राह्मणवाद के जाल में 

राजा बली के वंशजों को

देखो आँखे खोलकर

कैसे घर घर ठग रहे है।।

©anil_bidlyan


6. आओ होलिका से माफी मांगे!



हमें इस बात से,

कुछ लेना देना नहीं,

कि प्रहलाद किसकी भक्ति करता था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

कि हिरण्याकश्यप अमर था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

विष्णु ने अमर हिरण्या कश्यप को नरसिम्हा बनकर मार डाला,

हमें अगर लेना है तो इस बात से लेना है,

कि होलिका के पास जो अग्नि में ना जलने वाला वस्त्र था,

जिसे ओढ़कर प्रहलाद मौत के मुंह से निकल आया था,


वह अग्निमुक्त वस्त्र कहां है?

उसको बनाने की तकनीक कहां है?

हिरण्या कश्यप और होलिका वैज्ञानिक रूप से,

इतने स्रमद्ध थे कि उन्होंने अग्नि मुक्त वस्त्र बना डाला?

ऐसा लगता है,

उस अग्निमुक्त वस्त्र की जानकारी,

विष्णु को नहीं थी,

होती तो वह होलिका को जिन्दा नहीं जलने देता!

सोच कर देखिए,

प्रहलाद और नरसिंह ने समाज को क्या दिया?

जिस अग्निमुक्त वस्त्र की तकनीक से पूरी दुनिया का भला हो सकता था,

उसे नष्ट कर दिया,

ऐसे भगवान और भक्त को तो भूल जाना ही भला!

एक निर्दोष नारी को जिन्दा जलाया जाना,

नारी का ही नहीं,

बल्कि धर्म का भी अपमान है,

ये ही दुष्टों का अभिमान है,

आओ,

समाज और मानवता की भलाई के लिए,

अग्निमुक्त वस्त्र बनाने वाले,

हिरण्यकश्यप और

होलिका से माफी मांगे!

होली के त्योहार को मन से त्यागें!


*जोगेन्दर सिंह*


7. रंगों से डर नही लगता है साहब


रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से 

उसके चक्रान्त से 

उसके अन्जाम से उसके पहचान से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


डर लगता है उस दृष्टान्त को सोचकर 

कैसे तड़पाये होंगे 

कैसे नोच नोच खायें होंगे 

कैसे, कैसे उनके साथ पेश आये होंगे 

कैसे ज़बरन आग पे बैठाये होंगे 

कैसे चिन्गारी सुलगाये होंगे 

कैसे खुद को बचाने के लिए तिलमिलाये होंगे 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


रंगों से डर नही लगता है साहब, 

डर लगता है उसके वहशीपन से 

डर लगता है उसके चिन्तन मनन से 

डर लगता है उसके मदिरा सेवन से 

डर लगता है उस कलुषित अन्धेरी रात से 

डर लगता है घटी घटनाओं की रात से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से ।


रंगों से डर नही लगता है साहब, 

डर लगता है त्योहार के उपनाम से 

डर लगता है उसके हरकतों शैतान से 

डर लगता है उसके पीछे शैतान से 

डर लगता है उसके पीछे छुपे इमान से 

रंगों से डर नही लगता है साहब 

डर लगता है उसके पीछे छुपे राज से 


कवि_ सूरज पाशवाँ टीटागढ पं बंगाल 


शीर्षक _रंगों से डर नही लगता है साहब


8. आओ होलिका से माफी मांगे!


हमें इस बात से,

कुछ लेना देना नहीं,

कि प्रहलाद किसकी भक्ति करता था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

कि हिरण्याकश्यप अमर था,

हमें इस बात से भी कुछ लेना देना नहीं,

विष्णु ने अमर हिरण्या कश्यप को नरसिम्हा बनकर मार डाला,

हमें अगर लेना है तो इस बात से लेना है,

कि होलिका के पास जो अग्नि में ना जलने वाला वस्त्र था,

जिसे ओढ़कर प्रहलाद मौत के मुंह से निकल आया था,


वह अग्निमुक्त वस्त्र कहां है?

उसको बनाने की तकनीक कहां है?

हिरण्या कश्यप और होलिका वैज्ञानिक रूप से,

इतने स्रमद्ध थे कि उन्होंने अग्नि मुक्त वस्त्र बना डाला?

ऐसा लगता है,

उस अग्निमुक्त वस्त्र की जानकारी,

विष्णु को नहीं थी,

होती तो वह होलिका को जिन्दा नहीं जलने देता!

सोच कर देखिए,

प्रहलाद और नरसिंह ने समाज को क्या दिया?

जिस अग्निमुक्त वस्त्र की तकनीक से पूरी दुनिया का भला हो सकता था,

उसे नष्ट कर दिया,

ऐसे भगवान और भक्त को तो भूल जाना ही भला!

एक निर्दोष नारी को जिन्दा जलाया जाना,

नारी का ही नहीं,

बल्कि धर्म का भी अपमान है,

ये ही दुष्टों का अभिमान है,

आओ,

समाज और मानवता की भलाई के लिए,

अग्निमुक्त वस्त्र बनाने वाले,

हिरण्यकश्यप और

होलिका से माफी मांगे!

होली के त्योहार को मन से त्यागें!


*जोगेन्दर सिंह*


9. होलिका दहन का बहिष्कार करें दलित-बहुजन, कंवल भारती ने बताए ये अहम कारण

डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म" में एक जगह लिखा है, "आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और इसलिए हैं, क्योंकि वे उसके वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से भयभीत हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष की भूमि रहा है, बल्कि वर्ग-संग्राम की भी भूमि रहा है."
अब एक साक्षी ऋग्वेद (१०,२२-८) से लेते हैं, "हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञ-कर्म से शून्य, किसी (ईश्वरीय सत्ता) को न मानने वाले, वेद-स्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले दस्यु हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनका नाश करो."
स्पष्ट है कि यह वर्गसंघर्ष और वर्गसंग्राम भारत के लिए नया नहीं हैं. वैदिक काल में जो देवासुर संग्राम शुरू हुआ, वह आज तक, इस इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी, चल रहा है. देवों ने न केवल अपने विरोधी असुरों को मारा, बल्कि उसे उन्होंने अपने धर्म की जीत भी घोषित किया और व्यापक स्तर पर उसका जश्न मनाया. लगभग सभी हिंदू त्यौहारों की बुनियाद में यही देवासुरसंग्राम है, चाहे वह दुर्गापूजा हो, दशहरा हो, दिवाली हो, या होली हो. ये सारे त्यौहार असुरों की मौत पर देवों अर्थात ब्राह्मणों के जश्न हैं. ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध चलने वाली विचारधारा को पसंद नहीं किया. भारत के जनजातीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों ने अपना ब्राह्मण राज्य कायम करने की हर संभव कोशिश की. इस योजना में वे सबसे पहले अपने धर्मगुरुओं को वहाँ भेजते थे, जो वहाँ अपने आश्रम बनाकर यज्ञयागादि की गतिविधियों आरंभ करते थे, उनका जो विरोध करते, उनको वे मरवा देते थे, कुछ जन जातीय लोगों को वे प्रलोभन देकर मिशन से भी जोड़ लेते थे. ऐसा वे आज भी करते हैं. आज भी दलित-पिछड़े समुदायों के बहुत से बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के फोल्ड में हैं. उन्हीं की मदद से उन्होंने अपनी योजना को आगे बढ़ाया और विरोधियों का राज्य समाप्त करके वहाँ अपना उपनिवेश कायम किया. बलि, हिरण्यकश्यप, शम्बर, दिवोदास, रावण से लेकर मौर्य राज्य की स्थापना तक उनका यही मिशन चला. किसी ने ठीक ही कहा है, इतिहास अपने को दुहराता है. ठीक उसी मिशनरी रास्ते से मुगलों और ब्रिटिश ने भी भारत को अपना उपनिवेश बनाया. हालाँकि उन उपनिवेशों में भी ब्राह्मण ही प्रभुत्त्वशाली थे.
आज जिस तरह हिन्दूराष्ट्रवादी वर्ग ने अपनी विद्यार्थी परिषद के द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में दलित-वाम शक्ति के खिलाफ वर्गयुद्ध छेड़ा हुआ है, ठीक वैसा ही वर्गयुद्ध हमें पुराणों में असुर राजाओं और उनकी संस्थाओं के खिलाफ मिलता है. मैं यहाँ हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करूँगा. महाभारत के अनुसार, प्रह्लाद ने देवासुरसंग्राम में इंद्र को परस्त कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था. वह अपनी जनता में अपने धार्मिक सद्गुणों से इतना लोकप्रिय था कि इंद्र उससे अपना राज्य वापिस नहीं ले सकता था. अत: इंद्र ब्राह्मण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास गया, और उससे अपना धर्म सिखाने की प्रार्थना की. इंद्र की प्रार्थना पर प्रह्लाद ने इंद्र को अपने सनातन धर्म की शिक्षा दी. अपने शिष्य से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने इंद्र से वरदान मांगने को कहा, और ब्राह्मण भेष बनाए हुए इंद्र ने कहा, 'मेरी इच्छा तुम्हारे सद्गुण पाने की है,' इंद्र प्रहलाद का गुण और धर्म अपने साथ लेकर चला गया. और प्रह्लाद के धर्म पर चलकर इंद्र ने उसकी सारी कीर्ति खत्म कर दी.

देव-विरोधी असुरों के साथ ब्राह्मण-छल की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंदू कथाओं में, जिसे वे इतिहास कहते हैं, ब्राह्मणों के छल की ऐसी अनेक कहानियां हैं. यही छल एकलव्य के साथ किया गया था, जिसका अंगूठा मांगकर गुरु द्रोणाचार्य ने उसको विद्या-रहित कर दिया था. ठीक उसी तरह प्रहलाद से उसका धर्म लेकर उसका सर्वस्व ले लिया गया था. प्रहलाद ने जिस सनातन धर्म की शिक्षा दी थी, वह वैदिक वर्णव्यवस्था वाला धर्म नहीं था, क्योंकि इंद्र उसे क्यों सीखता, जबकि वह उसी धर्म से आता था? दरअसल, इंद्र ने प्रहलाद से देव-विरोधी असुर धर्म को त्यागने का वरदान माँगा था. अपने धर्म को त्यागने के बाद प्रह्लाद अपने समुदाय की नजर में गिर गया था, और इंद्र ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त कर लिया था. ठीक यही तरीका हमें बलि की कहानी में मिलता है, जिसमे विष्णु ने बौने वामन का रूप धारण करके एक वरदान के जरिये उसका समस्त राज्य छीन लिया था. बलि राजा से जुड़े अनेक मिथकों से पता चलता है कि प्रह्लाद ने, जो रिश्ते में बलि का दादा था, बलि को सावधान किया था कि यह बौना वामन असल में विष्णु है. एक अन्य कथा में प्रह्लाद बहुत ही तीखे शब्दों में प्रतिवाद करता है कि विष्णु ने बौना बनकर उसके पोते बलि के साथ धोखा किया है और उसे लूटा है. (देवीभागवतपुराण). एक और मिथक, जो एकलव्य से जुड़ा है, बताता है कि किस तरह स्वयं इंद्र ने बलि के पिता विरोचन से भी वरदान के जरिये उसका सिर मांग लिया था. इंद्र ने कहा था, "मुझे अपना सिर दे दो." और विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को सौंप दिया था. (स्कन्दपुराण).
मिथक इतिहास नहीं हैं, यह सच है, पर उनमें भारत के मूल निवासी असुरों के साथ हुए वर्गयुद्धों और उस युद्ध में शहीद हुए असुर राजाओं की नृशंस हत्याओं का पूरा राजनीतिशास्त्र है. कोई भी व्यक्ति न अपने हाथ से अपना अंगूठा काटकर किसी को देगा, और न अपना सिर काटकर देगा. किसी का भी अपने हाथ से अपना सिर काटना, और फिर, उस कटे सिर को अपने ही हाथ में लेकर दूसरे को सौंपना—ये दोनों ही बातें अविश्वसनीय है. हकीकत में एकलव्य का जबरन अंगूठा काटा गया था, और विरोचन की हत्या की गयी थी. आज भी धर्म के लिए की गयीं हत्याओं को मिथकीय रंग दे दिया जाता है, पुराणों ने भी यही काम किया था. पर उसने एक कदम आगे बढ़कर देव-विरोधी असुरों को जनता का खलनायक बनाने का भी काम किया.
प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु की हत्या तो और भी बड़ी क्रूरता है. उसे उसी के महल में घुसकर नरसिंह ने मारा था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस असुर राजा का पूरा वंश ही ब्राह्मणों के निशाने पर था, और उसका बीजनाश करके ही उन्होंने दम लिया था. इसकी जो मिथकीय कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलती, उसके अनुसार, देवविरोधी हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से यह वरदान मिला हुआ था कि वह न मनुष्य के द्वारा, न देवताओं के द्वारा, न पशु के द्वारा, न भीतर, न बाहर, न दिन में, न रात में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न शस्त्र से, न अस्त्र से मारा जायेगा. अपनी अमृत्यु से निश्चिंत होकर उसने पृथ्वी और स्वर्ग में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. किन्तु, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था. सो, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने की धमकी दी, जो विष्णु को सर्वव्यापी ईश्वर मानने पर जोर देता था. तब हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे में लात मारकर पूछा, "क्या वह इसमें भी है?" अचानक उसी समय खम्बा फाड़कर शेर जैसा मनुष्य (नरसिंह) प्रगट हुआ. और उसने हिरण्यकशिपु को अपने घुटनों पर रखकर अपने लम्बे नाखूनों से फाड़कर मार डाला. उसके बाद विष्णु-भक्त प्रह्लाद असुरों का राजा बना और अपनी देवविरोधी प्रकृति को त्यागकर देवों के प्रति समर्पित हो गया.
यह बहुत ही सामान्य कहानी है, जो अनेक असुरों पर दुहराई गयी है. महाभारत में वर्णित इंद्र और असुर वृत्र (अथवा नमुची) की कहानी भी इसी तरह की है, जिसे गोधूलि (न दिन और रात) में समुद्र के किनारे (न भूमि और न समुद्र) मारा गया था. रावण और महिष की हत्याओं की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.
इस कहानी में प्रकृति को ही चुनौती दी गयी है. सभी वस्तुएं और जीवजन्तु मरणशील हैं, कोई भी अमर नहीं है. इस पौराणिक कहानी में इसी प्रकृति का खंडन किया गया है. यह माया हिन्दूधर्म में ही है कि देवता मनुष्यों को अमर होने का वरदान देते हैं, पर इसके बावजूद कोई अमर नहीं रहता है. दूसरी बात यह विचारणीय है कि जो प्रह्लाद राजा बलि को चेता रहा है, वह खुद विष्णु-भक्त कैसे हो सकता है? तीसरी बात यह कि अगर प्रह्लाद इतना परम विष्णु-भक्त था कि उसके लिए वह खम्बा फाड़ कर नरसिंह के रूप में प्रगट हुए, तो उसने अपने पिता को बचाने को क्यों नहीं कहा? उसने अपने पिता की हत्या कैसे बर्दाश्त कर ली? यह कहानी यह साबित करने की कोशिश है कि प्रह्लाद ने अपनी ब्राह्मण-भक्ति में अपने असुर-धर्म, अपनी असुर-संस्कृति और अपने पिता तक को कुर्बान कर दिया.
हकीकत यह है कि हिरण्यकशिपु ने बलि और विरोचन की तरह ब्राह्मणों के आगे घुटने नहीं टेके थे, और उसने अंत तक असुरों के हित में संघर्ष और युद्ध किया था. जब उसके पुत्र प्रहलाद को ब्राह्मणों ने राज्य का लालच देकर अपने ब्राह्मण राष्ट्रवाद में शामिल कर लिया था, तो भी हिरण्यकशिपु ने हथियार नहीं डाले थे. किन्तु यही विष्णु-भक्ति प्रह्लाद के भी पतन का कारण बनी थी. ब्राह्मण-भक्ति की जो भूमिका विभीषण ने निभाई थी, वही प्रह्लाद ने निभाई थी.
इस सम्बन्ध में महात्मा जोतिबा फुले का मत भी गौरतलब है. सम्भवतः फुले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दू मिथकों का बहुत ही वैज्ञानिक विश्लेषण किया है. वे नरसिंह के विषय में "गुलामगीरी" में लिखते हैं, 'वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना था. सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया. उसने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि उसको मारे वगैर उसका उसे मिलने वाला नहीं था. उसने अपने एक द्विज शिक्षक के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया. इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी. प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं. तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया. पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई. अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखोटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया. और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर बना नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी.' महात्मा फुले ने यह भी लिखा है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया. जब क्षत्रियों को पता चला तों वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर 'विप्रिय' (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया. बाद में इसी 'विप्रिय' शब्द से उनका नाम 'विप्र' पड़ा.
हिरण्यकशिपु के प्रकरण में अभी होलिका का प्रवेश होना बाकी है. यह शायद किंवदंती है, जिसमें कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त था. उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी, जो आग में नहीं जलती थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी इसी बहिन की सहायता से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई. होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धू-धू करती आग में जा बैठी. किन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, और होलिका जलकर भस्म हो गयी. कहते हैं कि तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.
क्या इस कहानी पर यकीन किया जा सकता है? वास्तव में इसकी अंतर्कथा यह है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन ने देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और प्रह्लाद को भी उसने चेताया था कि ब्राह्मण राष्ट्रवाद समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है. वह देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखोटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे. अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला. उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए. आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं. आज लाठी-डंडों की जगह उनके हाथों में गन्ने होते हैं, पर ढोल-डीजे का शोर तो होता ही हैं.

(कंवल भारती के फेसबुक से साभार)

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