Total Pageviews

Tuesday, 27 June 2023

आर्थिक मंदी



आर्थिक मंदी

मौजूदा व्यवस्था के रहते हमारे देश में चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का उत्पादन सम्भव नहीं है क्योंकि यदि पूँजीपति वर्ग अपने उद्योगों का विस्तार करके चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का उत्पादन करता है तो एक हद तक सस्ता माल तैयार हो सकता है और सस्ते मालों के बल पर कुछ समय के लिए चीन को टक्कर दिया जा सकता है। मगर हमारे देश का पूँजीपति वर्ग चीन के टक्कर में बड़े पैमाने पर उत्पादन कर ही नहीं सकता क्योंकि-
1- उसके पास पूँजी का अभाव है।
2- उसके पास आन्तरिक बाजार नहीं है क्योंकि यहाँ लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं है। 
3- आर्थिक मंदी के कारण उसका माल अन्तर्राश्ट्रीय बाजार में भी नहीं बिक सकता।

अब यंहा फिर प्रश्न उठता है कि क्या कोई पूँजीवादी अर्थव्यवस्था वाला विकसित देश भी चीन के टक्कर में बड़े पैमाने का औद्योगीकरण नहीं कर सकता है? तो कोई कितना भी विकसित पूँजीवादी देश क्यों न हो वह चीन के टक्कर में विराट पैमाने का उत्पादन नहीं कर पा रहा है और कर भी नहीं पायेगा, क्योंकि समाजवादी देशों  में जल, जंगल, जमीन कल-कारखाना, खान-खदान, यातायात, शिक्षा, चिकित्सा, बीमा और बैंक सरकारी हैं इसका मतलब सारी पूँजी सरकार द्वारा नियंत्रित होती है। एफ.डी.आई., एफ.आई.आई.... आदि के जरिये जो विदेशी पूँजी आती है वह भी सरकार के नियंत्रण में ही रहती है। इस प्रकार सारी पूँजी एक जगह से नियंतित्र होती है। इसी कारण चीन की पूँजी पूरी दुनिया में फैली होने के बावजूद भी संगठित है। इसीलिये वह बड़े से बड़ा उद्योग लगाने में सक्षम है इसके विपरीत पूँजीवादी देशों  की पूँजी में तीन कमजोरियाँ होती हैं-
1- उत्पादन के संसाधनों के निजी मालिकाने के कारण पूँजीवादी देशों  की सारी पूँजी बिखरी हुई होती है।
2- पूँजीपति वर्गों में आपसी तालमेल नहीं होता। लाखों पूँजीपति अपनी-अपनी पूँजी को अपने-अपने ढंग से जहाँ चाहते हैं वहाँ लगाते हैं। वे अपनी पूँजी को अलग-अलग नियंत्रित करते हैं।
3- पूंजीपति एक दूसरे से अधिक मुनाफा कमाने के लिये आपस में होड़ करते हैं तथा एक दूसरे के विरुद्ध गलाकाट प्रतिस्पर्धा करते हैं। 
इन तीन कारणों से पूँजीवादी देशों की पूँजी से विराट पैमाने का उत्पादन संभव ही नहीं है। विश्व के सारे पूँजीवादी देशों  का सरगना अमेरिका भी चीन की तुलना में बड़े से बड़ा उद्योग लगाने में सक्षम नहीं हैं।
वालमार्ट अमेरिका की बहुत बड़ी कम्पनी है, जो दुनिया भर में शापिंग माल खोल कर चीन का सस्ता माल बेच रही है। और भारी मुनाफा कमा रही है। यदि वालमार्ट कम्पनी अपना कारखाना खोलकर माल पैदा करके बेचती तो उसे जोखिम ज्यादा उठाना पड़ता। और जोखिम के मुकाबले उतना भारी मुनाफा नहीं मिलता। बाजार में चीन के सस्ते मालां के मुकाबले उसका माल नहीं बिक पाता तो उसे भारी घाटा हो सकता था, और उसकी पूँजी डूब सकती थी। यही भय भारत के पूँजीपतियों को भी है। 

पूँजीवादी तरीके से समाजवादी उत्पादन का मुकाबला करना सम्भव नहीं रह गया है क्यांकि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली अनियंत्रित बाढ़ अथवा सूखे की तरह होती है। पूँजीवादी उत्पादन हमेशा ही सीमित पैमाने का उत्पादन होता है। पूँजीवादी उत्पादन जितना ही ज्यादा बढा़ते हैं उतनी ही ज्यादा भयानक मन्दी आती है। पूँजीवादी व्यवस्था में जितना ही भारी पैमाने का उत्पादन करेंगे, पूँजीपतियों के बीच निजी स्वामित्व के कारण उतनी ही भयानक प्रतिस्पर्धा होगी। वे अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लागत मूल्य घटायेंगे। लागत मूल्य घटाने के लिए बड़ी से बड़ी मशीनें लगायेंगे जिससे कम मजदूरों द्वारा ज्यादा माल पैदा कर सकेंगे। बड़ी मशीनें लगा कर पैदावार को बढ़ा देते हैं, परन्तु मजदूरों की छँटनी कर देते हैं। इस प्रकार खरीदने वालों की संख्या घटा देते हैं। दरअसल काम से हटाये गये मजदूर तनख्वाह नहीं पाते हैं, अतः खरीददारी नहीं कर पाते इस प्रकार पूँजीपति माल की पैदावार तो बढ़ा देता है परन्तु साथ ही साथ खरीदने वालों की संख्या घटा देता है। जिसके कारण अनिवार्य रूप से एक ऐसा समय आता है, जब बाजार माल से पट जाता है और खरीदने वाले बहुत कम रह जाते हैं। इस प्रकार आर्थिक मंदी आ जाती है। पूँजीपति जितने ही बड़े पैमाने का उत्पादन करते हैं उतनी ही भयानक आर्थिक मंदी आती है। पूँजीवाद विकसित होकर साम्राज्यवाद में बदल जाता है तब अति उत्पादन के कारण नहीं बल्कि उत्पादन ठप्प या कम होने के कारण भी मंदी आती है। इस दौर में औद्योगिक पूँजी वित्तीय पूँजी के रूप में बदलती जाती है। वह वित्तीय पूँजी उन तमाम गैर जरूरी चीजों के उत्पादन को बढ़ावा देती है, जिसमें कम से कम समय, कम से कम लागत में अधिक से अधिक मुनाफा हो। तब वह वित्तीय पूँजी मनुश्य की बुनियादी जरूरतों- रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सम्बन्धी वस्तुओं का उत्पादन करने की बजाय हथियार, शराब आदि नशीले पदार्थ, गंदी फिल्में, गंदे गाने तथा कामुकता बढ़ाने की दवायें एवं उपकरण आदि के उत्पादन को बढ़ावा देती है। और अपने मजबूत प्रचार तंत्रों के जरिये अपने इन गैर जरूरी उत्पादों को खरीदने के लिए लोगो के मन में कृत्रिम जरूरत पैदा करती है।

आर्थिक मंदी के दौरान अपना मुनाफा बरकरार रखने के लिए जब पूँजीपति लोग मजदूरों की छँटनी करते हैं  तो मंदी और बढ़ जाती है। मंदी के दौरान मुनाफा बढ़ाने के लिए जब पूँजीपति महँगाई बढ़ाते हैं तो चीन का सस्ता माल और अधिक तेजी से उन्हें बाजार से बाहर खदेड़ता है। महँगाई बढ़ने से खर्च भी बढ़ जाता है। तब बढ़े हुए खर्च को पूरा करने के लिए भ्रष्टाचार भी बढ़ता है। जहाँ पूँजीपति वर्ग प्राकृतिक संसाधनों एवं टैक्स की चोरी आदि से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है वहीं सरकारी अधिकारी व कर्मचारी अपने कानूनी अधिकारों को बेचकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते रहते हैं। यदि आर्थिक मंदी से उबरने के लिए विदेशों  से कर्ज लेते हैं, तो कर्ज देने वाले देश की शर्तों को मानना पड़ता है, जिससे साम्राज्यवादी शोषण व गुलामी की जकड़न और अधिक बढ़ जाती है, जिससे जनाक्रोश बढ़ता है, जनता विकल्प तलाशती है तो पूँजीपति वर्ग जनता को भुलावा देने के लिए चुनाव करवाता है। चुनाव का खर्च जनता से वसूलने के लिए टैक्स बढ़ाया जाता है जिससे महँगाई बढती है। और यह महँगाई आर्थिक मंदी को और बढ़ाती है। अतः पूँजीपति वर्ग समाजवादी उत्पादन के मुकाबले भारी पैमाने का उद्योग चला ही नहीं सकता। इसलिए पूँजीवादी उत्पादन द्वारा समाजवादी उत्पादन के मुकाबले सस्ता माल नहीं तैयार किया जा सकता। 
समाजवादी उत्पादन का मुकाबला करने में पूँजीपतियों की पूँजी निश्चित ही डूब जायेगी। क्योंकि समाजवादी उत्पादन में आर्थिक मंदी नहीं आती जबकि पूँजीवादी उत्पादन में हर छठवें-सातवें.... दसवें-पन्द्रहवें.... साल तक अनिवार्य रूप से आर्थिक मंदी आती ही है। पहले जब आर्थिक मंदी आती थी तो धीरे-धीरे साल दो साल में दूर हो जाया करती थी परन्तु जब पूँजीवादी मंदी का फायदा उठाने में समाजवादी अर्थव्यवस्था सक्षम हो जाती है तब पूँजीवादी मंदी प्रायः महामंदी में बदल जाती है और उस महामंदी के दूर होने की संभावना खत्म होती जाती है। ऐसी परिस्थिति में अल्प विकसित देशों  की बात ही छोडि़ये, अमेरिका जैसे विकसित पूँजीवादी साम्राज्यवादी देश की पूँजी को सौ गुना बड़ा कर दिया जाय तो भी उसकी पूँजी भागकर चीन की तरफ जायेगी। पूँजीवाद की आर्थिक मंदी का फायदा उठाकर समाजवादी उत्पादन उससे बहुत आगे बढ़ता जायेगा और इतना बड़ा हो जायेगा कि पूँजीवादी उद्योगों को ही निगल जायेगा। अतः समाजवादी उत्पादन के मुकाबले पूँजीवादी उद्योग लगाकर पूँजीपति वर्ग मुनाफा कमाने की बात छोडि़ये अपना उद्योग भी नहीं बचा पायेगा। और बिना मुनाफा के वह कोई जोखिम उठा ही नहीं पायेगा। इसलिए उसके सामने एक ही उपाय होता है कि वह अपने उद्योग बन्द कर समाजवादी उद्योगों का माल खरीदे और बेचे।
तो फिर  चीन में बड़े पैमाने का उत्पादन करने के बावजूद भी आर्थिक मंदी क्यों नहीं आती? क्योंकि चीन का सामाजिक संगठन पूँजीवादी देशों के सामाजिक संगठन से अलग तरह का है। वहाँ दास और दास मालिक वाला समाज नहीं है, वहाँ राजा-प्रजा या मजदूर-मालिक वाला समाज नहीं है। वहां पूरा समाज ही उत्पादन के साधनों का मालिक है। श्रमिक वर्ग के सामूहिक नेतृत्व में कारखाने चल रहे हैं। श्रमिक वर्ग आपस में मुनाफाखोरी के लिए होड़ नहीं करता। वह समाज की आवष्यकताओं को ध्यान में रखकर "योजनाबद्ध तरीके" से उत्पादन करता है। और भारी पैमाने के उद्योगां के बल पर सस्ता सामान सबके लिए उपलब्ध कराता है। इसी वजह से बडे़ पैमाने का उत्पादन होने के बावजूद भी चीन में आर्थिक मंदी नहीं आती और न ही वहाँ महँगाई और बेरोजगारी की गुंजाइश बन पाती है। ऐंगेल्स ने घोशणा-पत्र में पेज 80 पर लिखा है-''.... इस तरह, बड़े पैमाने के उद्योग का ठीक वह गुण जो आज के समाज में सारी गरीबी और सारे व्यापार संकटों को जन्म देता है, ही बिल्कुल वह गुण है जो भिन्न सामाजिक संगठन में उस दरिद्रता को तथा इन विनाशकारी उतार-चढ़ावों को नश्ट कर देगा।'' अर्थात बड़े पैमाने के उद्योग द्वारा किये जाने वाले भारी पैमाने के उत्पादन पूँजीपति वर्ग के अधीन होते हैं तो विनाशकारी उतार-चढ़ावों (आर्थिक मंदी) को जन्म देते हैं जिससे तमाम छोटे कारखानेदार तबाह हो जाते हैं और लाखों मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। महँगाई बढ़ती है तो भ्रष्टाचार भी बढ़ता है और कर्ज, युद्ध एवं दिवालियापन का संकट भी बढ़ता है परन्तु बड़े पैमाने के वही उद्योग जब समाज के अधीन रह कर उत्पादन का असीम विस्तार करते हैं तो विकास होता है तथा आर्थिक मंदी भी नहीं आती और महँगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि तमाम संकट दूर हो जाते हैं। 

*रजनीश भारती*
*राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा*

➖➖➖➖➖➖➖➖


Sunday, 25 June 2023

Disha Ravi, Sophie Scholl and the Unravelling of Indian Fascism

Disha Ravi, a 21-year-old climate activist from Bangalore has been arrested for editing a toolkit in support of the farmers' agitation in India against the farm laws passed by the government without any discussion in the parliament which will make the farmers squatters in their own land. These laws also will make the farmers contract farmers for the big agri-corporations of the world. Disha Ravi has been charged with sedition, a colonial law, which was slapped on Mahatma Gandhi and several other freedom fighters. The Delhi police who arrested Disha says that by her action she brought 'disaffection' to the country. It is interesting to note that Disha Ravi was arrested for a toolkit (Google Doc) tweeted by Greta Thunberg. If the government of India had the jurisdiction to arrest Greta it would have arrested Greta! Instead, it arrested her compatriot Disha Ravi.


Hindutva has Strong Links with Fascism – But Today’s Leaders Want to Forget Them

Last month, a teacher of political science in Uttar Pradesh's Sharda University posed this examination question to his students: "Do you find any similarities between Fascism/ Nazism and Hindu right-wing (Hindutva)? Elaborate with the argument." The teacher was suspended by the university authorities, on the grounds that the very posing of the question was "totally averse" to the "great national identity" of our country and "may have the potential for fomenting social discord".

Saturday, 24 June 2023

तमाम एनजीओ पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के रक्षा कवच बन गए हैं

तमाम एनजीओ पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के रक्षा कवच बन गए हैं 
***********************************"*********

        ,,,,, मुनेश त्यागी

     1920 के दशक में समाजवाद, साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए एनजीओ यानी non-governmental organisation यानी गैर सरकारी संगठन को अमेरिकी पूंजीपति रॉकफेलर ने सबसे पहले बनाया था। इस संगठन को एनजीओ का नाम, जनता और दुनिया को गुमराह करने के लिए जानपूछ कर दिया गया था।
     ये संगठन दुनिया के बड़े बड़े पूंजीपतियों ने बनाए हैं जैसे फोर्ड फाउंडेशन, बिलगेट्स फाउंडेशन, pepsi-cola फाउंडेशन, आदि आदि हजारों लाखों एनजीओ दुनियाभर में पूंजीपतियों ने बना रखे हैं। भारत के बड़े एकाधिकारी पूंजीपति भी इस दौड़ से बाहर नहीं हैं, टाटा फाउंडेशन, बिरला फाउंडेशन, रिलायंस फाउंडेशन आदि हजारों एनजीओ भारत में भी काम कर रहे हैं।
     दिखाने के लिए एनजीओ को गैर राजनीतिक संगठन बताया जाता है, मगर दुनिया भर में इनकी गतिविधियां और कामों को देख कर यह निश्चित है कि पूंजीवादी दुनिया से त्रस्त परेशान लोग, छात्र, नौजवान, बेरोजगार, वामपंथ और समाजवाद की ओर ना चले जाएं और संकटग्रस्त पूंजीवादी दुनिया को पलटने के संघर्ष और अभियान में ना लग जाए और समाजवादी विचारों को अपनाकर समाजवादी व्यवस्था के निर्णय निर्माण में ना लग जाए, अतः लोगों को वहां जाने से रोकने के लिए, पूंजीपतियों ने एनजीओ का रास्ता अपनाया था ताकि इस समस्याग्रस्त तबके को एनजीओ के जाल में फंसा कर, अपने भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।
     दुनिया के जितने भी एनजीओ हैं ये सारे के सारे एकाधिकारी पूंजीपतियों ने बना रखे हैं। इनकी सारी नीतियां, इनका संचालन और खर्चा, इन पूंजीपतियों द्वारा ही उठाया जाता है। इन तमाम एनजीओ की सारी राजनीति और कार्यक्रमों की पूरी रूपरेखा इन पूंजीपतियों और उनके द्वारा संरक्षित लोगों द्वारा तैयार की जाती है। इन्हीं नीतियों के अनुसार ये एनजीओ के लोग काम करते हैं। ये तमाम एनजीओ अपना स्वतंत्र एजेंडा तैयार नहीं कर सकते, इनकी अपनी कोई स्वतंत्र औकात नहीं है। इनको पूंजीपतियों द्वारा तैयार किए गए एजेंडे पर ही चलना पड़ता है।
    इन एनजीओ का मुख्य कार्य है कि संकटग्रस्त और समस्याग्रस्त नौजवानों को समाजवादी व्यवस्था और सोच की ओर जाने से रोका जाए, समाजवाद और वामपंथ के उभार को रोका जाए और उस जनसमर्थक क्रांतिकारी आंदोलन को बढ़ने से रोका जाए।
     हमने व्यवहार में देखा है कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त लोग समाजवादी व्यवस्था की ओर जाने की बजाए, इन एनजीओ के जाल में फंस जाते हैं जिन्हें क्रांति करनी चाहिए और क्रांतिकारी आंदोलन को दिशा, विस्तार और गति देकर आगे बढ़ाना चाहिए था, वे अपनी पेट पूजा के लिए जाने अंजाने क्रांति के विरोध में, पूंजीवाद की हिफाजत और सुरक्षा में लग जाते हैं। 
        ये एनजीओ वैज्ञानिक समाजवाद के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरे हैं। ये तमाम एनजीओ संकटग्रस्त पूंजीवाद के बुझते दियों की लौ को बचा लेना चाहते हैं। ये समाजवाद की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं, इन्होंने समाजवाद की ओर बढ़ते जन सैलाब को रोक दिया है, उन्हें गुमराह कर दिया है।
     थोड़े काल के लिए जनता को भरमाने के लिए ये एनजीओ लोकलुभावन कदम उठा कर जनता को गुमराह कर सकते हैं, मगर अंतिम रूप से इनका मुख्य काम समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन को रोकना और पूंजीवादी साम्राज्यवाद व्यवस्था को बरकरार रखना है। सारे के सारे एनजीओ साम्राज्यवादी एजेंट की भूमिका अदा करते हैं।
     इन्हें जनता की बुनियादी समस्याओं,,, शोषण, अन्याय, भेदभाव, बढ़ती असमानता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई पर कभी भी वार्ता करते नहीं देखा होगा। पूंजीवादी लूट के खिलाफ आवाज उठाते नही देखा गया है। ये पूंजीवादी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के रक्षा कवच का काम कर हैं और साम्राज्यवाद के वाहक और प्रहरी बन गए हैं। यह भी देखा गया है कि ये एनजीओ के लोग कई बार भोले भाले और नये वामपंथी कार्यकर्ताओं को गुमराह करते हैं, उन्हें इनाम तमगे और शील्ड भी दिलवा देते हैं और अंत में उन्हें वामपंथी पार्टियों से अलग-थलग कर उन्हें एनजीओ का पिछलग्गू बनादेते हैं।
     आजकल एनजीओ में काम कर रहे लोग, क्रांति के रुझान के नौजवानों और लोगों को भटका कर और गुमराह कर, एनजीओ में जाने और उनको ज्वाइन करने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील है। ये लोग समय के अनुसार समाजवाद और क्रांति का भी चोला पहनकर जनता को धोखा देते हैं और दे रहे हैं, कई बार तो यह भी देखा गया है कि जो लोग कम्युनिस्ट पार्टियों से किन्ही मुद्दों को लेकर विवाद ग्रस्त हो जाते हैं, तो ये एनजीओ के लोग उन लोगों के पास जाते हैं और उन्हें एनजीओ में खींचने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी तो एनजीओ को रजिस्टर्ड करवाने के पैसे भी ये लोग ही दे देते हैं। इन लोगों का बस एक ही मकसद है कि किसी भी तरह से नौजवान क्रांतिकारियों को वामपंथी संगठनों से अलग-थलग किया जाए। जनता को इनसे बहुत-बहुत सावधान होने की जरूरत है।

भगत सिंह

क्रांति का सच्चा सिपाही, एक सच्चा कम्युनिस्ट बनने  के लिए सिर्फ आँखों में जुल्मो सितम के खिलाफ नफ़रत और हाथों में पत्थर नहीं, पास में वैज्ञानिक समाजवाद की किताबे, उसे समझने की उत्कट इच्छा  और भगत सिंह की तरह क्रांति की राह में मर मिटने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए.

एक सही क्रन्तिकारी पार्टी का हिस्सा बन कर क्रन्तिकारी काम करने के लिए बहुत बड़े श्रेणी का बुद्धिजीवी होना कोई जरुरी नहीं है, दर्द होना चाहिय, पूँजी के विरुद्ध खड़ा होने का साहस होना चाहिए, जुल्मो सितम के खिलाफ घृणा होनी चाहिए और कुछ करने का जज्बा होना चाहिए. सही क्रन्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में मिहनतकास वर्ग  के महान संघर्ष, समाजवादी समाज की स्थापना के लिए संघर्ष  से जुड़ कर ही आज नवजवान अपने को गर्वान्वित कर सकता है, अपनी अकर्मंन्यता से मुक्ति पा सकता है

कॉफ़ी हाउसी-फेसबुकी-ब्लॉ गबहादुर रणछोड़ ''वामपंथियों'', पीत पत्रकारों, एन.जी.ओ.-पंथियों और कैरियरवादी निठल्लेव बुद्धिजीवियों की आदि के पांतो में शामिल हो कर कोई भी युआ व्यर्थ में अपने बौद्धिक और चारित्रिक पतन के सिवा कुछ भी हासिल नहीं कर सकता. संशय और अविश्वा स का माहौल बनाकर, युवाओं को दुनियादारी की नसीहत देकर उन्हें  निरुत्सा हित करने  की कोई भी कोशिस पूंजीवादी शोषण और दमन से त्रस्त युवाओं को सर्वहारा वर्ग के महान लक्ष्य के लिए चलने वाले संघर्ष से विमुख नहीं कर सकता क्योकि आज पूँजी की निरंकुश और जुल्मी व्यवस्था हर रोज नवजवानों को इस अन्याय पूर्ण व्यवस्था से लड़ने के लिए, इसे उखाड़ फेकने के लिए मजबूर कर रही है, उन्हें वैज्ञानिक समाजवाद का, मार्क्सवाद-लेनिनवाद  का  हथियार उठाने के लिए, समाजवाद के लिए मिहनतकास जनता के महान वर्ग संघर्ष में कूद पड़ने के लिए ललकार रही है.

एक सही क्रन्तिकारी पार्टी का हिस्सा बनने के पहले उसकी पहचान करना जरुरी है, विचारधारा और कार्यक्रम के ऊपर उनकी अवस्थिति को समझना जरुरी है. यह भी जानना जरुरी है कि हर सवाल का  वे खुले दिमाग से और क्रन्तिकारी भावना से जबाब देने को तत्पर है या नहीं. या फिर लफ्फाजी भरी बाते ही करना जानते है, सवाल उठाने पर वे वेचैनी महसूस तो नहीं करते या अनावश्यक प्रचारात्मक  टिपण्णी करने में ही  ज्यादा मशगूल रहते है.

सैनिकों

सैनिकों! अपने आप को इन वहशी जानवरों के हवाले मत करो - वे लोग जो आपसे नफ़रत करते हैं - आपको गुलाम बनाते हैं - जो आपके जीवन पर नियंत्रण रखते हैं - आपको बताते हैं कि क्या करना है - क्या सोचना है और क्या महसूस करना है! जो तुम्हें ड्रिल करते हैं - तुम्हें आहार देते हैं - तुम्हारे साथ मवेशियों जैसा व्यवहार करते हैं, और तुम्हें तोप के चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं. अपने आप को इन दोगले लोगों के हवाले मत कीजिए - मशीनी दिमाग और मशीनी दिल वाले मशीनी लोग! आप मशीन नहीं हैं! आप जानवर नहीं हैं! आप इंसान हैं! आपके हृदय में मानवता के प्रति प्रेम है! आप नफरत नहीं कर सकते! केवल घटिया लोग ही नफ़रत करते हैं – बदनुमा और बनावटी लोग! सैनिकों! गुलामी के लिए मत लड़ो! आज़ादी के लिए लड़ो!

महान कलाकार चार्ली चैपलिन, 'द ग्रेट डिक्टेटर' में

Monday, 19 June 2023

Human Rights, a Mask of Imperialism


Human Rights, a Mask of Imperialism


In the realm of politics and might,

Imperialism wears a mask so tight.

They speak of Human Rights, they claim,

But their actions serve finance's aim.


Trump, Biden, Putin, and Xi,

Leaders who dance to the capital key.

Their talk of "democracy" is just a guise,

To conceal their crimes and human despise.


Taliban, ISIS, creations of the West,

Terrorist organizations, a dangerous nest.

Capitalist imperialism, a contradiction profound,

Resorting to wars, destruction all around.


Ukraine, a theater of power and strife,

Factions rallying, fueling a fascist life.

Blackmail and coups, the rise is grand,

Dictatorial regimes gaining command.


Afghanistan, India, Saudi, and more,

Targeted nations, exploited to the core.

Their leaders and bourgeoisie, filled with glee,

As they plunder the working class, carefree.


Behold the hypocrisy of the US Empire,

Foreign ministers scheming, fueling the fire.

In China, to halt aid to Russia's plight,

While inviting India to join the fight.


EU, a pawn in the strategic game,

Working to defeat Russia, to its own shame.

China's market control, they seek to cease,

Imperialists plotting for power and peace.


Revolutionary forces, their task so clear,

Among the oppressed, they spread hope and cheer.

Building an alternative, a society free,

From exploitation, through social transformation spree.



https://www.huffpost.com/entry/human-rights-groups-blast-white-house-for-modi-visit-shame-on-you_n_648c9832e4b025003ee42ef4?fbclid=IwAR0TQ10YZsRPd6woc3G66pYEh4DeiZGluBdVnvCJ0ZIZ2Z6xPu2-ZOKzv0w