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Tuesday, 19 March 2024

इलेक्टोरल बांड की नसीहत.... "रिलीजन, मनुष्यता के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है!"

इलेक्टोरल बांड की नसीहत....  
"रिलीजन, मनुष्यता के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है!" 

(जनगण की लूट और शोषण के उपकरण हैं, धर्म और आस्था ! धर्म की राजनीति का चोला ओढ़कर हमारे देश में लाखों करोड़ों की लूट से, यह बात तो खूब अच्छे से समझ में आ ही गई होगी।) 

महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स जब 17 वर्ष के थे,  उन्होंने जर्मनी की बॉन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। उनका ज़ेहन सवालों से भरा था। उनके पिता हाइनरिख़- जो ख़ुद बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति थे- ने उन्हें एक प​त्र लिखकर कहा कि "अगर ईश्वर ने चाहा तो तुम बहुत तरक़्क़ी करोगे और न केवल अपने और अपने​ परिवार, बल्कि मनुष्यता की भलाई के लिए भी बहुत काम करोगे।" युवा कार्ल को इन बातों पर अविश्वास न था, लेकिन ईश्वर की इच्छा उनके लिए एक अबूझ वस्तु थी। उन्होंने पिता से अपने संशय साझा किए। पिता ने एक और पत्र लिखकर कहा, "देखो कार्ल, मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ, लेकिन आज नहीं तो कल तुम्हें समझना होगा कि मनुष्य के लिए आस्था ज़रूरी है... न्यूटन और लाइबनीज़ जैसे महान वैज्ञानिक और दार्शनिक भी ईश्वर में विश्वास करते थे!"
लेकिन मार्क्स अपने पिता की इन बातों से राज़ी न हो सके। वे घोर बुद्धिवादी थे और अनास्था का ज्वार उनके भीतर उमड़ता था। वे यह भी देख रहे थे कि आस्था ने मनुष्य को बेड़ियों में बाँध रखा है और यह वर्चस्वशाली समूहों के द्वारा उसके शोषण का उपकरण सिद्ध हो रही है। बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश करने के बाद, 21 वर्ष की उम्र में जब मार्क्स ने पीएचडी डिग्री के लिए अपनी डॉक्टोरल ​थीसिस लिखने का निर्णय किया, तब तक उनके अनीश्वरवादी विचार बहुत पुख़्ता हो चुके थे। उनकी थीसिस एपिकुरस, डेमोक्रिटस और लुक्रिटस के दर्शन पर आधारित थी। यानी इतनी शुरुआत में ही- और फ़्यूएरबाख़ के प्रभाव-क्षेत्र में आने से पूर्व ही- मार्क्स भौतिकवाद की ओर अग्रसर हो चले थे। एपिकुरस के दर्शन में मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए जैसी छटपटाहट थी, उसने मार्क्स को मोह लिया था। अपनी पीएचडी थीसिस में मार्क्स ने एपिकुरस को गर्व से उद्धृत करते हुए लिखा :
"असंख्यजनों के द्वारा पूजे जाने वाले ईश्वरों को नकारने वाला नहीं, बल्कि वह जो उन ईश्वरों में आस्था रखता है, अपवित्र है!"
फिर उन्होंने प्रमिथियस- जिस आदि-विद्रोही से कार्ल मार्क्स की आजीवन तुलना की जाती रही- के हवाले से कहा : 
"मुझे ईश्वरों के झुण्ड से वितृष्णा है!"
अपनी थीसिस में मार्क्स ने निष्कर्ष निकाला कि ईश्वर में आस्था मनुष्य की चेतना के विकास का प्राथमिक-चरण है। यह मनुष्य की बुद्धि का आदिम स्तर है, जहाँ वह अपने इर्द-गिर्द हो रही घटनाओं को समझ नहीं पाता है तो उनकी व्याख्या करने के लिए तमाम तरह की बेसिरपैर की बातों का सहारा लेने लगता है। मार्क्स ने लिखा : "जिसे इस संसार का कोई कारण समझ नहीं आता, और जिसके स्वयं के होने का कोई कारण नहीं है, उसी के लिए ईश्वर का अस्तित्व हो सकता है!"
इसके कुछ वर्षों के बाद, 1845 में जब मार्क्स ब्रसेल्स में थे और अपनी किताब 'द जर्मन आइडियोलॉजी' पर एंगेल्स के साथ मिलकर काम कर रहे थे, तब उन्होंने उसकी प्रवेशिका लिखी। इस प्रवेशिका को ही कालान्तर में 'थीसिस ऑन फ़्यूएरबाख़' के नाम से जाना गया। इसके लिखे जाने तक वे अपने ऐतिहासिक भौतिकवाद के विचारों को अंतिम रूप दे चुके थे और इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि 'प्रोलिटेरियन एथीज़्म' यानी सर्वहारा वर्ग के द्वारा अंगीकार किया जाने वाला दुर्द्धर्ष अनीश्वरवाद ही समाज से रिलीजन नामक बुराई का अंत कर सकता है, और जब तक यह नहीं होगा, तब तक सामाजिक-संरचनाओं में क्रांति नहीं हो सकेगी।
"धर्म जनता की अफीम है-" यह प्रसिद्ध वाक्य मार्क्स ने 1843 में लिखा था। यह उनके अख़बार 'जर्मन-फ्रेंच एनल्स' (Deutsch–Französische Jahrbücher) में 'क्रिटीक ऑफ़ हेगेल्स फिलॉस्फ़ी ऑफ़ राइट : इंट्रोडक्शन' नामक लेख में 1844 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने लिखा कि "मनुष्यों ने धर्मों को बनाया है, धर्मों ने मनुष्यों को नहीं। मनुष्य कोई अमूर्त वस्तु नहीं है, वह समाज और राज्यसत्ता का एक अंग है। ये समाज और राज्यसत्ताएँ ही धर्म की रचना करती हैं, जो कि एक 'इनवर्टेड कांशियसनेस' है। रिलीजन एक इनवर्टेड दुनिया की थ्योरी है, यह एक नैतिक क़रार है, सांत्वना और औचित्य का वैश्विक आधार है। यह मनुष्यता के सारतत्त्व की एक कपोल-कल्पित वास्तविकता है। रिलीजन नामक काल्पनिक-सुख का उन्मूलन ही मनुष्य की वास्तविक ख़ुशी की शर्त है।"
मार्क्स ने जिस बात को रूपकात्म​क शैली में कहा था, उसे वर्षों बाद कॉमरेड व्ला.इ. लेनिन ने एक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया। 'द एटिट्यूड ऑफ़ द वर्कर्स पार्टी टु रिलीजन' में लेनिन ने लिखा, "धर्म जनता की अफीम है- इसमें रिलीजन के प्रति मार्क्सवाद की पूरी विचारधारा आ गई है। तमाम धर्मों और उनकी संस्थाओं को मार्क्सवाद में हमेशा बूर्ज्वा प्रतिक्रिया का एक अंग माना गया है और उनका उपयोग कामगारों का शोषण करने वाली व्यवस्था को क़ायम रखने के लिए किया जाता रहा है।" 
बोल्षेविक क्रांति के बाद सोवियत-संघ का गठन एक एथीस्ट-स्टेट के रूप में किया गया था। राज्यसत्ता का कोई धर्म नहीं था और दो-तिहाई जनता एथीस्ट हो चुकी थी। शासकीय प्रचार-सामग्री ईश्वर के विरोध में प्रकाशित की जाती थी। जब सोवियतों ने अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजा तो यूनियन ने पोस्टर जारी किया कि "हम अंतरिक्ष में जाकर पृथ्वी पर लौट आए लेकिन हमें वहाँ कोई ईश्वर नहीं मिला!" कल्पना करें जब राज्यसत्ता ही इस तरह के पोस्टर जारी करेगी तो आम जनता का शैक्षिक स्तर कैसा होगा। इसकी तुलना उन देशों की आम जनता के बौद्धिक स्तर से करें, जिनके नेता ही बिना किसी सार्वजनिक-संकोच और लज्जा के पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड में लिप्त रहते हैं!
धर्म का आधार मिथकीयता, पौराणिकता और कल्पना पर टिका है। अगर यह आत्मप्रवंचना भर ही होती तो कोई बात न थी, लेकिन धर्म एक संगठन भी है, वह लोगों को एकजुट करता है (चुनावी लोकतंत्र में इस समूहीकरण को 'वोटबैंक' कहते हैं), वह यथास्थितिवादी होता है, लोगों के लिए आचार-संहिताएँ जारी करता है और धर्मगुरुओं का गठजोड़ सदैव ही सत्ताधीशों और पूँजीपतियों से होता है। ये तीनों मिलकर सदियों से मानव-आत्मा का शोषण कर रहे हैं। ईश्वरों ने आज त​क किसी का हित किया हो, किसी को दंड दिया हो, कोई न्याय किया हो- इसका कोई प्रमाण नहीं है। स्वयं ईश्वर का ही कोई प्रमाण नहीं है! रिलीजन मनुष्यता के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है।
आज से लगभग दो सौ साल पूर्व कार्ल मार्क्स के द्वारा कही गई यह बात बिलकुल दुरुस्त है कि धर्म मनुष्य की चेतना के विकास का प्राथमिक और आदिम-चरण है। और जैसे-जैसे मनुष्य की तर्क-बुद्धि का विकास होगा- धर्म, उसकी सत्ता, उसकी राजनीति और उसके स्वघोषित प्रतिनिधियों का स्वत: ही उन्मूलन हो जावेगा।

पत्रकारिता करो तो कार्ल मार्क्स की तरह

'जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो', यह कहावत कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह से सटीक बैठती है, जिन्होंने आजीवन क़लम को ही तलवार की तरह भाँजा था। उन्होंने अख़बारों के लिए लेख लिखे, ख़ुद अख़बार निकाले, अपने समय के ज्वलंत सवालों पर जिरहें कीं, दुनिया में हो रही हलचलों पर पैनी नज़र रखकर उन पर रिपोर्टें लिखीं और सत्तातंत्र से वैर ठाना। उनके अख़बारों पर पाबंदियाँ लगाई गईं, प्रतियाँ ज़ब्त की गईं, उन्हें शहरबदर होना पड़ा, लेकिन वे अनवरत पढ़ते, सोचते और लिखते रहे। एक पत्रकार के रूप में ही मार्क्स ने इतना लेखन किया है कि 'मार्क्स-एंगेल्स कम्प्लीट वर्क्स' के 50 में से 10 खण्ड उनके द्वारा विभिन्न अख़बारों के लिए लिखे लेखों से भरे हैं। 500 से ज़्यादा लेख तो उन्होंने अकेले 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' के लिए ही लिखे थे।
पत्रकारिता की दुनिया से मार्क्स का पहला परिचय साल 1842 में हुआ, जब उन्होंने कोलोन से प्रकाशित होने वाले पत्र 'रीनिश न्यूज़पेपर' (Rheinische Zeitung) के लिए लिखना शुरू किया। जल्द ही वे इस अख़बार के सम्पादक नियुक्त हो गए। शुरू में इसकी केवल 400 प्रतियाँ थीं। मार्क्स इसे एक साल के भीतर ही बढ़ाकर 3400 प्रतियों तक ले आए और यह अख़बार प्रशिया की सीमाओं से बाहर भी पढ़ा जाने लगा। इंग्लैंड तक से फ्रेडरिक एंगेल्स इस अख़बार के लिए तब अपनी रिपोर्टें भेजा करते थे।
लेकिन प्रशियन हुकूमत ने इसे राज्यसत्ता के लिए ख़तरनाक बताते हुए बैन कर दिया। अख़बार में मार्क्स के द्वारा प्रेस फ्रीडम, लोकतंत्र के स्वरूप, निजी सम्पत्ति और ग़रीब-विरोधी क़ानूनों पर लिखे लेखों ने उस समय सनसनी पैदा कर दी थी। अख़बार पर रोक लगाए जाने की तत्कालीन राइनलैंड (जर्मनी का वह प्रांत, जहाँ से यह अख़बार निकलता था) में तीखी प्रतिक्रिया हुई और हस्ताक्षर अभियान चलाए गए। एक अख़बार ने एक कार्टून छापा, जिसमें मार्क्स को ग्रीक विप्लवी देवता प्रमिथियस की तरह चित्रित किया गया था। व्यंग्यचित्र में वे एक प्रिंटिंग​ प्रेस से बंधे थे और प्रशियन सेंसरशिप उन पर प्रहार कर रही थी।
मार्क्स ने तब प्रशिया छोड़ने का फ़ैसला किया, जब प्रशियन सरकार ने उन्हें घूस देने की कोशिश की। मार्क्स के पिता के एक मित्र ने उनके सामने प्रशियन सिविल सेवा में एक प्रभावी ओहदे की पेशकश रखी। जैसे ही स्वाभिमानी मार्क्स ने यह प्रस्ताव सुना, उन्होंने आहत होकर अपनी पत्नी जेनी से कहा, "चलो अब यहाँ से कहीं और चलते हैं।" वे प्रशिया छोड़कर पेरिस जा बसे।
पेरिस में मार्क्स ने अर्नाल्ड रूग के साथ फ़रवरी 1844 में एक और अख़बार निकाला- 'जर्मन-फ्रेंच एनल्स' (Deutsch–Französische Jahrbücher)। इसके दो ही अंक निकले, लेकिन इसमें मार्क्स के दो महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुए थे- 'ऑन द ज्यूइश क्वेश्चन' और 'क्रिटीक ऑफ़ हेगेल्स फिलॉस्फ़ी ऑफ़ राइट : इंट्रोडक्शन'। मार्क्स के इन लेखों में हेगेल के प्रभाव-क्षेत्र से बाहर निकलकर भौतिकवाद की ओर उनके बढ़ते रुख़ की स्पष्ट झलक दिखलाई दी थी। उस समय के महत्त्वपूर्ण जर्मन कवि हाइनरिख़ हाइने ने भी इस अख़बार के लिए लिखा। एंगेल्स सहित अन्य के लेख भी इसमें आए। इस अख़बार की प्रतियाँ सुदूर रूस तक पहुँची थीं। लेकिन इसकी 3000 प्रकाशित प्रतियों में से दो-तिहाई को प्रशियन पुलिस ने ज़ब्त कर लिया और मार्क्स की गिरफ़्तारी का आदेश जारी कर दिया।
चार साल बाद मार्क्स ने कोलोन से अपना सबसे महत्त्वपूर्ण अख़बार निकाला और अतीत में बैन किए गए 'रीनिश न्यूज़पेपर' की याद में उसे 'न्यू रीनिश न्यूज़पेपर' (Neue Rheinische Zeitung) कहकर पुकारा। यह अख़बार 1 जून 1848 से 19 मई 1849 त​क निकला। साल 1848 यूरोप में क्रांतियों का वर्ष था और 'न्यू रीनिश न्यूज़पेपर' को जर्मन-विप्लव का मुखपत्र कहकर पुकारा गया था। इसके 301 अंक निकले और इसकी प्रसार-संख्या 6000 प्रतियों तक पहुँची। एक बार फिर प्रशियन सत्ता ने अख़बार के काम में दख़ल दिया। सरकार के मुलाजिम अख़बार के एक लेखक को गिरफ़्तार करने प्रेस आ धमके। मार्क्स ने अपने लेखक को सरकार को सौंपने से इनकार कर दिया। आखिरकार इस अख़बार को भी बंद करना पड़ा। 19 मई 1849 को इसका अंतिम अंक मार्क्स ने लाल स्याही से प्रकाशित किया था। इसे 'लाल पन्ना' नाम से जाना गया। इस अख़बार में प्रकाशित मार्क्स के लेख पहली बार सवा सौ साल बाद 1977 में ही जाकर अंग्रेज़ी में अनूदित हो सके थे, जब प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मॉस्को ने 50 खण्डों में 'मार्क्स-एंगेल्स कलेक्टेड वर्क्स' निकाले। 'कलेक्टेड वर्क्स' का सातवाँ, आठवाँ और नौवाँ खण्ड पूर्णतया 'न्यू रीनिश न्यूज़पेपर' में प्रकाशित लेखों से निर्मित हुआ है।
लेकिन मार्क्स के पत्रकारिता-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय लंदन में लिखा गया, जब उन्होंने अमेरिका के 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' के लिए रिपोर्टें भेजना शुरू किया। उस समय पूरी दुनिया में हलचलें हो रही थीं। चीन में दूसरा ओपियम वॉर, भारत में 1857 का ग़दर, अमेरिका में गृहयुद्ध, यूरोप में क्रांतियों के बाद की उथलपुथल, इंग्लैंड में चुनाव आदि। मार्क्स ने इन तमाम विषयों पर अथक परिश्रम करके तथ्य-संकलन किए और लेख लिखे। उस समय यह स्थिति थी कि वे घंटों लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में बैठे रहते थे और संदर्भ खंगालते रहते थे। कई बार तो वे पढ़ते-पढ़ते अचेत हो जाते थे। इन लेखों को भाप के जहाज़ की मदद से न्यूयॉर्क भेजा जाता था और वे लिखे जाने के दस से पंद्रह दिन बाद ही प्रकाशित हो पाते थे। उस समय 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' दुनिया के प्रमुख अख़बारों में से था। वह अमेरिका में दासप्रथा के प्रतिरोध का मुखपत्र भी था। इसमें प्रकाशित मार्क्स के सैकड़ों लेखों ने उन्हें आँग्लभाषी वर्ग में पहचान दिलाई, क्योंकि मूलत: जर्मन में लिखी होने के कारण उनकी अधिकांश किताबों से अंग्रेज़ी के पाठक तब तक परिचित नहीं थे। स्वयं 'द कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो' का प्रकाशन मार्क्स के जीवनकाल में अंग्रेज़ी में नहीं हो सका था। यह सबसे पहले 1888 में ही जाकर प्रकाशित हुआ था।
उसी कालखण्ड में भारत के इतिहास और उसकी नियति में कार्ल मार्क्स की गहरी रुचि जगी और उन्होंने मध्यकालीन और समकालीन भारतीय इतिहास पर अनेक नोट्स लिए। 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' में प्रकाशित मार्क्स के लेखों के आधार पर ही भारत पर केंद्रित मार्क्स की किताबें 'द फ़र्स्ट इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस' और 'ऑन कलोनियलिज़्म' कालान्तर में प्रकाशित हुई हैं। भारत के पाठकों को मार्क्स की इन दो किताबों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। 
पत्रकारिता को इतिहास का पहला प्रारूप (फ़र्स्ट ड्राफ़्ट ऑफ़ हिस्ट्री) कहा गया है। इसका निष्पक्ष, तार्किक, शोधपूर्ण, प्रखर और सत्यान्वेषी होना सभ्य-समाज के लिए अत्यावश्यक है। वर्तमान में पत्रकारिता के पतन का जैसा शर्मनाक दौर चल रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में कार्ल मार्क्स को एक जर्नलिस्ट के रूप में याद करने का पृथक से महत्त्व है।
प्रोलिटेरियट, कार्ल मार्क्स के दर्शन का आधार-पद है। इसे ही सर्वहारा या श्रमजीवी भी कहते हैं। मार्क्स ने इसे रिवोल्यूशनरी क्लास बताया है, क्योंकि- जैसा कि मार्क्स-एंगेल्स ने 'कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो' में कहा था- "रूलिंग क्लास की ऊपरी परतों को पलटे बिना यह सर्वहारा वर्ग हिल तक नहीं सकता!" कोई दो सौ साल पहले गढ़ी गई यह थ्योरी आज कितनी कारगर या प्रासंगिक है, इसके लिए कुछ परिप्रेक्ष्यों को समझना होगा।
प्रोलिटेरियट वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस (उत्पादन के औज़ार) नहीं हैं। यानी अगर वह काम न करे तो भूखों मरेगा। उसके पास वैल्यू के रूप में अपना श्रम या कौशल भर है, जिसे बेचकर वह आजीविका चलाता है। बूर्ज्वा वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस हैं और उसे आजीविका के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं। मार्क्स के समय में यह कारख़ाने का मालिक था, आज सीईओ, एमडी, डायरेक्टर, चेयरमैन, और बेनेफिशियरी क्लास के तमाम मुफ़्तख़ोर परजीवी इसी वर्ग में आते हैं। पेटी-बूर्ज्वा वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस तो हैं, लेकिन वह ख़ुद भी काम करता है, जैसे किसी छोटी दुकान का संचालक। इसके हित सर्वहारा से ज़्यादा बूर्ज्वा से जुड़े होते हैं। लुम्पेनप्रोलिटेरियट वह है, जो नियतिवंचित है और औपचारिक-अर्थव्यवस्था के दायरों से बाहर संचालित होता है, जैसे ठग, अपराधी, भिखारी, नट, वेश्याएँ। 
इन सबके कारण समाज में आर्थिक आधार पर विभिन्न वर्ग निर्मित होते हैं और इन वर्गों में अपने हितों की रक्षा के लिए टकराव (क्लास-स्ट्रगल) चलता है।
प्रोलिटेरियट में जब वर्गचेतना (क्लास-कांशियसनेस) जागती है तो वह अपनी जातीय और साम्प्रदायिक चेतना से मुक्त होता है और सत्ताधीश यह नहीं चाहते, जो कि पूँजीपतियों के वित्तपोषण से फलते-फूलते हैं। धर्म इस तंत्र में अफ़ीम का काम करता है। वह सर्वहारा को उसकी वर्गचेतना से मुक्त कर उसके शोषण में अपना योगदान देता है। एक कारख़ाने में अगड़ा और पिछड़ा, हिन्दू और मुसलमान, यहूदी और ईसाई साथ काम कर रहे हो सकते हैं, लेकिन वे ख़ुद को एक वर्ग के रूप में नहीं देखते। और यह बात कारख़ाने के मालिक के हित में है।
पूँजी, धर्म और राजनैतिक सत्ता का चोली-दामन का सम्बंध है। ये तीनों बिज़नेस-पार्टनर्स हैं। यह हक़ीक़त दिन की रौशनी की तरह इतनी साफ़ है कि अंधा भी देख सकता है।
धर्म और राष्ट्रवाद की अफ़ीम चटा दी जाये तो ग़रीब आदमी भी धनकुबेर की शोभायात्रा में नाचकर और तालियाँ बजाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगता है- क्योंकि उसको उसकी क्लास-कांशियसनेस से वंचित कर दिया गया है।
मार्क्सवादी थ्योरी में बेस और सुपरस्ट्रक्चर की बात आती है। प्रोडक्शन आधार है, और कल्चर, रिलीजन, मीडिया, स्टेट ये सुपरस्ट्रक्चर हैं। अर्थतंत्र कल्चर को भी प्रभावित करता है, मीडिया को भी, स्टेट को भी, और रिलीजन उसका गठबंधन-सहयोगी है।
ये अकारण नहीं है कि देश में एक तरफ़ सत्ताधीश रोज़ मंदिरों में जाकर तस्वीरें खिंचवाने का ढोंग करता है और दूसरी तरफ़ सत्ता के उपकरण अदालत में यह अर्ज़ी देते हैं कि कृपया उन धनकुबेरों के नामों का खुलासा न करें, जिन्होंने चुनाव लड़ने के लिए मोटी रकम (इलेक्टोरल बॉन्ड) दी है। रिलीजन का सुपरस्ट्रक्चर इसी तरह से प्रोडक्शन के बेस को केमाफ़्लेज करता है। जनता को मगन रखने के लिए रिलीजन से अच्छी चटनी कोई दूसरी नहीं चटाई जा सकती।
एक तरफ़ देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयाँ नहीं हैं और गाँवों में बच्चे किसी विद्यालय-भवन के बिना खुले आकाश के नीचे बैठकर पढ़ते हैं, दूसरी तरफ़ धनकुबेर अपने बेटे की प्री-वेडिंग में अंतरराष्ट्रीय-नर्तकी को एक नाच के 74 करोड़ रुपए देता है- आर्थिक विषमता का यह खुल्ला खेल फ़र्रुख़ाबादी की तर्ज़ पर नंगा-नाच एक ऐसे समाज में ही सम्भव है, जिसमें प्रोलिटेरियट को उसकी वर्गचेतना से वंचित कर दिया गया हो और जिसमें सरकार का बूर्ज्वा को पूर्ण-प्रश्रय प्राप्त हो।
कार्ल मार्क्स के समय में इंडस्ट्री सबसे प्रमुख क्षेत्र था, वर्तमान में सर्विस अग्रणी सेक्टर बन गया है। मार्क्स के युग में कारख़ाने के मज़दूर, भूदास, बंधुआ श्रमिक प्रोलिटेरियट थे, आज इन सबके साथ ही (भूदास अब नहीं होते) गिग वर्कर्स, कॉल सेंटर में काम करने वाले, ब्लू कॉलर जॉब्स करने वाले, मामूली नौकरियों के वेतनयाफ़्ता विशेषकर निजी क्षेत्र के कर्मचारी प्रोलिटेरियट की श्रेणी में आने चाहिए। लेकिन इंटरनेट के उद्भव के बाद और एआई के ज़माने में सुपरस्ट्रक्चर अब बहुत बहुआयामी, जटिल और व्यापक हो गया है- इसे सर्वहारा की बुद्धि आसानी से बेध नहीं सकती।
कार्ल मार्क्स के समय में मोनार्की थी, आज डेमोक्रेसी है- मैं समझता हूँ आज का सर्वहारा इस मौजूदा परिप्रेक्ष्य में रिवोल्यूशनरी-क्लास नहीं हो सकता, वह इतना ज़रूर कर सकता है कि अपनी वर्गचेतना के प्रति सजग हो (इसके लिए शिक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण औज़ार है) और लोकतंत्र के उपकरणों का लाभ उठाकर स्टेट को भरसक प्रश्नांकित करे। 
मीडिया इस कार्य में प्रोलिटेरियट का मुखपत्र होना चाहिए, लेकिन अब वह न केवल सत्तातंत्र का भोंपू बन चुका है, बल्कि पूँजीवादी-उपभोगवादी शैली की बूर्ज्वा संस्कृति को ही नित्यप्रति प्रचारित करता रहता है। 
और लेखक? वो आज इस फिक्र में घुल रहा है कि विज्ञापन से धन कैसे कमाऊँ, ऐसी किताब लिखकर कैसे बिकूँ जो यथास्थिति का गुणगान करे और अपनी जीवनशैली को किसी कम्पनी के सीईओ-सरीखी कैसे बनाऊँ?
लेखक- जो हमेशा से प्रोलिटेरियट का प्रवक्ता था, अब स्वयं बूर्ज्वा जैसा होने, दिखने के लिए लोलुप है- वर्तमान में कार्ल मार्क्स के पुनर्पाठ का प्रबुद्ध-पाठक वर्ग के लिए इससे बड़ा कारण और क्या हो सकता है?
(सुधीर सिंह के एफबी वाल से संपादित अंश)

The Holy Family

Marx and Engels in Paris in 1844

The Holy Family
or Critique of Critical Criticism.
Against Bruno Bauer and Company
[1]

* * *

"When I visited Marx in Paris in the summer of 1844,
our complete agreement in all theoretical fields
became evident and our joint work dates from that time."
Frederick Engels

* * *

Written: between September and November 1844;
First Published: The book was first published in February 1845, Frankfurt am Main. The work was never translated into English in either man's lifetime;
Translated: This 1956 English translation is by Richard Dixon, and is taken from the 1845 German edition;
Transcribed by Peter Byrne and Andy Blunden;
Source: Foreign Languages Publishing House, Moscow 1956.


During Engels' short stay in Paris in 1844, Marx suggested the two of them should write a critique of the rage of their day, the Young Hegelians. In the doing was born the first joint writing project between the two men -- and a life-long association that would change the world.

At the end of August, 1844, Engels passed through Paris, en route to his employment in Manchester, England, from visiting his family in Barmen (Germany). During 10 days in the French capital, he met Marx (for the second time).

After talking, they began drawing up plans for a book about the Young Hegelian trend of thought very popular in academic circles. Agreeing to co-author the Foreword, they divided up the other sections. Engels finished his assigned chapters before leaving Paris. Marx had the larger share of work, and he completed it by the end of November 1844. (Marx would draw from his Economic and Philosophical Manuscripts, on which he'd been working the spring and summer of 1844.)

The foremost title line — "The Holy Family" — was added at the suggestion of the book publisher Lowenthal. It's a sarcastic reference to the Bauer brothers and their supporters.

The book made something of a splash in the newspapers. One paper noted, that it expressed socialist views since it criticised the "inadequacy of any half-measures directed at eliminating the social ailments of our time." The conservative press immediately recognized the radical elements inherent in its many arguments. One paper wrote that, in The Holy Family, "every line preaches revolt... against the state, the church, the family, legality, religion and property." It also noted that "prominence is given to the most radical and the most open communism, and this is all the more dangerous as Mr. Marx cannot be denied either extremely broad knowledge or the ability to make use of the polemical arsenal of Hegel's logic, what is customarily called 'iron logic.'𔄢

Lenin would later claim this work laid the foundations for what would develop into a scientific revolutionary materialist socialism.

Bruno Bauer attempted to rebut the book in the article "Charakteristik Ludwig Feuerbachs" — which was published in Wigand's Vierteljahrsschrift, Leipzig 1845. Bauer essentially claimed that Marx and Engels misunderstood what he was really saying. Marx would reply to that article with his own article — published in the journal Gesellschaftsspiegel, Elberfeld, January 1846. And the matter was also discussed in chapter 2 of The German Ideology.


Cover of 1845 edition of pamphlet

Table of Contents

Introduction, by Foreign Languages Publishers

Foreword, by Frederick Engels

Chapter 1: "Critical Criticism in the Form of as Master-Bookbinder", or Critical Criticism as Herr Reichardt (by Engels)

Chapter 2: "Critical Critcism" as a "Mill-Owner", or Critical Criticism as Herr Jules Faucher (by Engels)

Chapter 3: "The Thoroughness of Critical Criticism", or Critical Criticism as Herr J. (Jungnitz?) (by Engels)

Chapter 4: "Critical Citicism" as the Trnaquility of Knowledge, or "Critical Criticism" as Herr Edgar

1. Flora Tristan's Union Ouvriere (by Engels)
2. Beraud on Prostitutes (by Engels)
3. Marx and Engels in Paris in 1844, Love (by Marx)
4. Proudhon (by Marx)

Chapter 5: "Critical Criticism" as a Mystery-Monger, or "Critical Criticism" as Herr Szeliga (by Marx)

1. The Mystery of Degeneracy in Civilisation
2. The Mystery of Speculative Construction
3. The Mystery of Educated Society
4. The Mystery of Probity and Piety
5. Mystery, a Mockery
6. Turtle-Dove (Rigolette)
7. The World System of the Mysteries of Paris

Chapter 6: Absolute Critical Criticism, or Critical Criticism as Herr Bruno

1. Absolute Criticism's First Campaign (by Marx)

a. "Spirit" and "Mass"
b. The Jewish Question No. 1
c. Socialism and Philosophy

2. Absolute Cricitism's Second Campaign

a. "Criticism" and Feuerbach (by Engels)
b. The Jewish Question No. 2 (by Marx)

3. Absolute Criticism's Third Campaign (by Marx)

a. Its "political" Past
b. The Jewish Question No. 3
c. Critical Battle Against the French Revolution
d. Critical Battle Against French Materialism
e. Final Defeat of Socialism
f. Philosophy of Self-Consciousness

Chapter 7: Critical Criticism's Correspondence

1. The Critical Mass (by Marx)
2. The "Un-Critical Mass" and "Critical Criticism"

a. The "Obdurate Mass" and the "Unsatisfied Mass" (by Marx)
b. The "Soft-Hearted" Mass "Pining for Redemption" (by Engels)
c. Grace Bestowed on the Mass (by Marx)

3. The Un-Critically Critical Mass (by Marx)

Chapter 8: The Earthly Course and Transfiguration of "Critical Criticism", or "Critical Criticism" as Rudolph, Prince of Geroldstein (by Marx)

1. Critical Transformation of a Butcher into a Dog
2. Revelation of the Mystery of Critical Religion
3. Revelation of the Mysteries of Law
4. Revealed Mystery of the "Standpoint"
5. Revelation of Mystery of the Utilisation of Human Impulses
6. Revelation of Mystery of Emancipation of Women
7. Revelation of Political Economic Mysteries
8. Rudolph: Revealed Mystery of All Mysteries

Chapter 9: The Critical Last Judgement and Historical Epilogue (by Marx)

Excerpt: England and Materialist Philosophy.

Footnotes from the Foreign Languages Publishing House.

 


Marx/Engels Archive

Monday, 18 March 2024

कार्ल मार्क्स की 6 कविताएँ !

कार्ल मार्क्स की 6 कविताएँ !

मज़दूर वर्ग के शिक्षक व दोस्त कार्ल मार्क्स के जन्म दिवस (5 मई) के अवसर पर

जीवन-लक्ष्य / कार्ल मार्क्स

कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं,
नहीं, मेरे तूफ़ानी मन को यह स्वीकार नहीं।
मुझे तो चाहिए एक महान ऊँचा लक्ष्य
और, उसके लिए उम्रभर संघर्षों का अटूट क्रम।
ओ कला! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार
मेरे लिए खोल!
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं!
आओ,
हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्योंकि –
छिछला, निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन जीवन
हमें स्वीकार नहीं।
हम, ऊँघते, कलम घिसते हुए
उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे।
हम – आकांक्षा, आक्रोश, आवेग और
अभिमान में जियेंगे!
असली इंसान की तरह जियेंगे।


चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थी की तत्त्व-मीमांसा / कार्ल मार्क्स

आत्मा-वात्मा थी ही नहीं कभी
सांड रहे हर-हमेश अनुभव किए बिना, कभी भी, कभी उसकी
निकम्मी फंतासी है आत्मा
पेट में तो खोजी ही नहीं जा सकती वह,
और गर कोई उसको सत्य सिद्ध भी कर दे
अण्ड-बण्ड गोली भी छूमन्तर कर देगी उसे,
फिर नज़र आएंगी आत्माएँ
उभरती अन्तहीन प्रवाह में


चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थी का मनोविज्ञान / कार्ल मार्क्स

करेगा बियारी
जो मालपुओं और गुलगुलों की

भोगेगा बीमारी
दुःस्वप्नों, हुलहुलों, पुलपुलों की


आचार-संहिता चिकित्सा-शास्त्र के विद्यार्थियों की / कार्ल मार्क्स

पसीना नुकसान करे बेहतर है इससे तो
पहनना एक से ज़्यादा बंडियाँ यात्राओं में
सावधान रहो उन तमाम लालचों से जो
पैदा करें गड़बड़ियाँ तुम्हारे जठर-रस के लिए
ऐसी जगहों पर फटकने मत दो अपनी नज़रें
शोले उठा सकती हों जो तुम्हारी आँखों में
पानी मिलाओ शराब में
कॉफ़ी में हर बार लो दूध
और भूलना मत हमें याद करना भाई सा'ब
करने लगो कूच जब दूसरे जहान को


गणितीय चतुराई / कार्ल मार्क्स

घटा लिया है हमने
हर चीज़ को चिन्हों में
और तर्क करते यों पेश
जैसे सूत्र गणित के भिन्नों में

ईश्वर अगर बिन्दु है
तो लम्ब के समान गुज़र नहीं सकता वह
जैसे आप खड़े नहीं हो सकते सिर के बल
बैठे चूतड़ों पर।


जेनी के लिए / कार्ल मार्क्स

एक

जेनी, चिढ़ा सकती हो तुम मुझे यह पूछकर
मेरे गीतों का शीर्षक "जेनी के लिए" होता है क्योंकर
जब सिर्फ़ तुम्हारे लिए नाड़ी मेरी चलती है तेज़ ख़ास
जब गीत मेरे सिर्फ़ तुम्हारे लिए हैं उदास
जब सिर्फ़ तुम फूँक सकती हो उनके दिल में जान
जब तुम्हारा नाम हर हिज्जा लेता मान
जब तुम दो हर सुर को सुरीलापन
जब देवी से हो न किसी साँस की भटकन?
ऐसा इसलिए कि प्यारा नाम सुन पड़ता है मीठा कितना
और इसकी लय-तान मुझसे कहती है इतना
कितना भरा-पूरा, मधुर है इसका गुँजन
जैसे कि दूर कहीँ आत्माओं का कम्पन
जैसे लय-संगति सोने के तारोंवाले सिदर्न की
जैसे कोई चमत्कार भरी ज़िन्दगी जादू की

दो

देखो, भर सकता हूँ मैं किताबें कई हज़ार
लिख-लिख सिर्फ़ "जेनी" हर पंक्ति में बार-बार
फिर भी होगा छिपा उनमें विचार जगत
शाश्वत कृत्य और अपरिवर्तनीय संकल्प
मधुर पद्य जो करता हो अब भी कोमलता से आस
ईथर की सारी चमक और सारा प्रकाश
बेचैन दुःख की पीड़ा और अपूर्व आनन्द-भान
सारा जीवन और सारा है जो मेरा ज्ञान
पढ़ सकता हूँ मैं इसे दूर के तारों में
आता है वापस यह मुझ तक पछुआ-बयारों में
भीषण लहरों की गर्जना के होने में
सच, लिखूँगा मैं इसे हर एक कोने में
कि देख सकें आनेवाली सदियाँ सभी
है प्यार जेनी, प्यार का नाम है जेनी

Saturday, 16 March 2024

15 करोड़ का चंदा

पांच साल पहले की बात है। उस वक्त महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार थी। 

एक दिन सीएम ने एक कंपनी को 285 करोड़ के प्रॉपर्टी टैक्स से छूट का ऐलान कर दिया। 

अब इलेक्टोरल बॉन्ड की लिस्ट से पता चला है कि वह कंपनी बीजेपी को 185 करोड़ का चंदा दे चुकी है। 

यानी 100 करोड़ कंपनी ने फिर भी बचा लिए। 

इस कंपनी के मालिक सुधीर मेहता हैं, जिनका नरेंद्र मोदी से करीबी रिश्ता है। हाथ यूं ही नहीं पकड़ा है।

कौन सुधीर मेहता? वही जो 2002 के गुजरात नरसंहार के बाद नरेंद्र मोदी के साथ खड़े थे। 

सुधीर मेहता टॉरेंट पॉवर और टॉरेंट फार्मा के मालिक हैं। सुधीर का गौतम अदानी से भी करीबी रिश्ता है। 

37 हजार करोड़ की इस गुजराती कंपनी को नरेंद्र मोदी ने कुर्सी पर बैठते ही सौगातों से नवाजा था। 

बदले में 7 और 10 मई 2019 को टॉरेंट ने करीब 15 करोड़ का चंदा दिया। किस्तों में चंदा देने का खेल इस साल तक चला। 

नरेंद्र मोदी ने मेरे, आपके पैसे से टॉरेंट को रेवड़ियां बांटी। 

तस्वीरें गवाह हैं। मजा लीजिए और भोट मोदी को दीजिए। 

देश पूरा बिकना ही चाहिए।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳

चंदा दो, धंधा लो

*एसबीआई की ओर से कुल 22,217 इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए। हर बॉन्ड के पीछे एक घोटाला है। कुछ नजीर देखिए-*

*केस नंबर 1* 

2 अप्रैल 2022 : फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज की 409 करोड़ की संपत्ति ED ने अटैच की। 

7 अप्रैल 2022 : कंपनी ने 100 करोड़ का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर चंदा दिया। किसको दिया होगा? रेड फिर क्यों नहीं पड़ी? 

*केस नंबर 2* 

अप्रैल 2023 : मेघा इंजीनियरिंग ने करोड़ों का चंदा दिया।

मई 2023 : मेघा इंजीनियरिंग को 14,400 करोड़ का प्रोजेक्ट मिल गया। 

इन्हें चंदा मिला, उन्हें धंधा मिला। 

*केस नंबर 3* 

18 अगस्त 2022 : सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मालिक पूनावाला ने एक ही दिन में 52 करोड़ का चंदा दिया। 

22 अगस्त 2022 : मोदी ने उनसे मुलाकात की। फिर क्या तमाशा हुआ, देश जानता है।  कोविड वैक्सीन पर सीरम इंस्टीट्यूट को मोनोपोली बख्शी गई। 

*केस नंबर 4* 

खनन समूह वेदांता ने 400 करोड़ रुपये से ज्यादा के इलेक्टोरल बॉन्ड दान किए। 

फिर सरकारी कंपनी BPCL वेदांता को सौंप दी गई। 

सरगना को मिला चंदा, पंटर को मिला धंधा 

*केस नंबर 5* 

नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी ने 90 करोड़ के बॉन्ड खरीदे। 

यही कंपनी उत्तराखंड में सुरंग बना रही थी। 41 मजदूर 17 दिनों के लिए फंस गए। 

मामले की जांच तक नहीं हुई। 

*केस नंबर 6* 

गाजियाबाद स्थित यशोदा हॉस्पिटल पर कोविड के दौरान जनता से वसूली के आरोप लगे। यशोदा पर छापा पड़ा। 

यशोदा हॉस्पिटल ने 162 करोड़ बॉन्ड खरीदे और दान करके वॉशिंग मशीन में धुल गया। 

*केस नंबर 7*

टोरेंट पॉवर नाम की कंपनी ने 86.5 करोड़ का चंदा दिया। 

कंपनी को गुजरात में 47000 करोड़ का सरकारी प्रोजेक्ट मिल गया। 

ठेके कौन देता है? फिर चंदा किसको मिला? 

चंदा दो, धंधा लो। 

*केस नंबर 8* 

IRB Infrastructure नाम की कंपनी ने जुलाई 2023 में करोड़ों का चंदा दिया।

कंपनी को अगले कुछ महीनों में लगभग 6000 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला। 

*केस नंबर 9* 

भाजपा सरकार ने मित्तल ग्रुप को गुजरात में सबसे बड़ा धंधा दिया। 

मित्तल ग्रुप ने इलेक्टोरल बॉन्ड से भाजपा को चांप कर चंदा दिया। 

*केस नंबर 10*

पुलवामा हमले के बाद Hub Power Company नाम की पाकिस्तानी कंपनी ने भारत में इलेक्टोरल बॉन्ड क्यों खरीदा और किसे चंदा दिया, इसकी जांच नहीं होगी। जैसे पुलवामा हमले की जांच कभी नहीं हुई। 

*केस नंबर 11* 

दिसंबर, 2023 : शिरडी साई इलेक्ट्रिकल लिमिटेड पर छापा पड़ा। 

जनवरी 2023 : शिरडी साई ने छप्पर फाड़कर चंदा दिया।

*केस नंबर 12*
अदानी — मगर उसका तो नाम ही इस लिस्ट में कहीं नहीं है?

*आप समझे नहीं। चंदा दूसरों को दिया जाता है, अपने आप को नहीं!*

छापा डालने वाले का नाम तो है, छपा डलवाने वाले का नाम क्या है? जरा सोचिए!

Friday, 15 March 2024

On March 13, 1930, the Moscow Labor Exchange closed.

94 साल पहले 13 मार्च 1930 को मॉस्को लेबर एक्सचेंज बंद हो गया था।  अंतिम कार्य असाइनमेंट मैकेनिक मिखाइल शकुनोव को दिया गया था।  सोवियत संघ पूंजीवाद की विरासत बेरोजगारी को समाप्त करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया।

"4 वर्षों में पंचवर्षीय योजना की मुख्य उपलब्धियों में से एक यह है कि हमने बेरोजगारी को समाप्त कर दिया और यूएसएसआर के श्रमिकों को इसकी भयावहता से बचाया" (स्टालिन आई.वी., "लेनिनवाद के प्रश्न")। 94 years ago, on March 13, 1930, the Moscow Labor Exchange closed. The last job assignment was given to mechanic Mikhail Shkunov. The Soviet Union became the first country in the world to end unemployment, a legacy of capitalism.

"One of the main achievements of the five-year plan in 4 years is that we abolished unemployment and saved the workers of the USSR from its horrors" (Stalin I.V., "Questions of Leninism"). 

Thursday, 14 March 2024

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के जन्म दिवस 14 मार्च के अवसर पर प्रस्तुत है उनके योगदान बताता यह महत्वपूर्ण लेख


*महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के जन्म दिवस 14 मार्च के अवसर पर प्रस्तुत है उनके योगदान बताता यह महत्वपूर्ण लेख*

*आइंस्टीन होने का मतलब*

*वे 1905 के बसन्त के दिन थे, जब विज्ञान की दुनिया में एक छब्बीस वर्षीय युवा ने सहसा गुमनामी के अंधेरे से कालातीत ख्याति के क्षितिज की ओर एक लम्बी छलाँग लगाई। समूची बीसवीं शताब्दी महान अन्वेषणों और महान वैज्ञानिकों की शताब्दी थी, लेकिन 1905 में सापेक्षिकता के विशेष सिद्धान्‍त की खोज के चन्द एक वर्षों  बाद ही आइन्स्टीन की ख्याति और महत्ता की तुलना शताब्दी-सीमान्तों का अतिक्रमण करके की जाने लगी।* 

विज्ञान के इतिहास में आइन्स्टीन का स्थान न्यूटन और चार्ल्स डार्विन के समकक्ष माना जाने लगा था और आज भी यह  एक निर्विवाद मान्यता है। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के जन्म के साथ ही विज्ञान अब वैसा एकदम नहीं रह गया जैसा कि वह पहले था। क्लासिकी भौतिकी का युग बीत चुका था। 

*प्रकृति विज्ञान के अन्य महत्वपूर्ण मूलभूत सिद्धान्तों की ही भाँति सापेक्षिकता सिद्धान्‍त ने भी समाज-विज्ञान की सैद्धान्तिकी के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला और कई महत्वपूर्ण बहसों को जन्म दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर आइन्स्टीन का मात्र परोक्ष सैद्धान्तिक प्रभाव ही नहीं था। वह एक उत्कट मानवतावादी और गहन सामाजिक सरोकारों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त साम्राज्यवादी युद्धों, अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद-रंगभेदवाद का मुखर विरोध किया, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था के परभक्षी चरित्र, पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में अन्तर्निहित अराजकता और उससे बेरोजगारी, भुखमरी जैसी समस्याओं, विभीषिकाओं के अनिवार्यतः पैदा होने की प्रक्रिया की भी तीखी आलोचना प्रस्तुत की।* नागरिक स्वतंत्रता, समानता और विश्व शांति के बारे में आइन्स्टीन की सोच बीसवीं शताब्दी के कमोबेश तीसरे दशक तक यूटोपियाई और अनुभववादी थी। चौथे दशक से लेकर पाँचवे दशक तक उनका सामाजिक चिन्तन इस दिशा में विकसित हुआ कि वह अंततः दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ पूँजीवादी उत्पादन और विनिमय प्रणाली को मानने लगे थे और इसका एकमात्र एवं अनिवार्य विकल्प समाजवाद को मानने लगे थे, हालाँकि तब भी समाजवाद की उनकी अवधारणा इस मायने में यूटोपियाई ही थी कि वह समाजवाद की स्थापना के लिए वर्ग-संघर्ष के द्वारा पूँजीवादी राज्य सत्ता के ध्वंस की ऐतिहासिक अनिवार्यता के बारे में स्पष्ट नहीं थे, या कहा जा सकता है कि शंकालु थे। अपने इन वैचारिक अन्तरविरोधों के बावजूद आइन्स्टीन निस्सन्देह साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के धुर विरोधी, पूरी दुनिया की आम जनता के हितों और न्याय- स्वतंत्रता-समानता के मूल्यों के निष्कपट पक्षधर थे। वह आजीवन फ़ासीवाद, नस्लवाद और हर प्रकार के सर्वसत्तावाद का विरोध करने वाले क्रान्तिकारी जनवादी और जुझारू मानवतावादी थे। हालाँकि वह एक सुसंगत मार्क्सवादी (द्वंद्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ से लैस) नहीं थे, लेकिन एक अकुण्ठ भौतिकवादी थे और मनुष्य के भाग्य नियन्ता के रूप में किसी भी दैवी सत्ता के अस्तित्व को कदापि स्वीकार नहीं करते थे।

बहरहाल, आइन्स्टीन के सामाजिक सरोकारों की चर्चा से पहले उस सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की संक्षिप्त परिचयात्मक चर्चा उचित होगी, जिसकी सौवीं वर्षगांठ पूरी दुनिया में 'भौतिकी के वर्ष' के रूप में मनाई जा रही है।

1905 में जब आइन्स्टीन के चार युगान्तरकारी शोधपत्र भौतिकी की अग्रणी जर्मन शोधपत्रिका 'अनालेस डेर फ़िज़िक' में प्रकाशित हुए, उस समय वह अकादमिक दुनिया से अलग बर्न स्थित स्विस पेटेण्ट ऑफ़िस में नौकरी कर रहे थे। जर्मनी में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद अनिवार्य सैनिक सेवा से बचने के लिए उन्होंने 1896 में अपनी जर्मन नागरिकता छोड़ दी थी। आगे की शिक्षा उन्होंने स्विट्जरलैण्ड में हासिल की और 1901 में वहाँ की नागरिकता भी ले ली थी। 1903 में शादी के बाद वह एक बच्ची के पिता भी बन चुके थे। दो वर्ष अस्थायी तौर पर अध्यापन का काम और फ़िर पेटेण्ट ऑफ़िस की नौकरी करते हुए आइन्स्टीन का महान मस्तिष्क लगातार विज्ञान के एक नए युग के उद्घोष की तैयारी में लगा हुआ था। 1905 में चार युगान्तरकारी शोधपत्रों के प्रकाशन के कुछ ही वर्षों बाद उस महान वर्ष को 1543 (जब कोपरनिकस की महान वैज्ञानिक कृति 'दे रेवोल्यूशनिवस ऑर्बियम कोएलेस्टियम' प्रकाशित हुई) और 1686 (जब न्यूटन ने अपनी कृति 'प्रिंसिपिया' पूरी की) के समकक्ष रखा जाने लगा। कॉपरनिकन क्रान्ति के बाद भी न्यूटोनियन भौतिकी में प्रकृति के मूलभूत नियमों और स्थूल इन्द्रियानुभूति के बीच जो सुकूनतलब रिश्ता अब तक मौजूद था वह सदा के लिए विलुप्त हो गया। आइन्स्टीन ने उस युग की शुरुआत कर दी थी, जब, जैसा कि वह स्वयं कहा करते थे, विज्ञान की मूलभूत अवधारणाएँ ''प्रत्यक्ष अनुभव के दायरे से और अधिक दूर हट गई थीं।'' इसका श्रेय भी मुख्यतः आइन्स्टीन को ही जाता है कि उनके द्वारा प्रवर्तित राह पर भौतिकी आज इतना आगे निकल आई है और इसके सीमान्त इतने अधिक विस्तारित हो गए हैं कि नए विद्यार्थियों के लिए ख़तरा इस बात का है कि प्रकृति की हमारी बुनियादी समझदारी में आइन्स्टीन द्वारा लाए गए असाधारण परिवर्तन को शायद वे समझ ही न सकें।

1905 में प्रकाशित शोधपत्रों की श्रृंखला में से पहले शोधपत्र में आइन्स्टीन ने प्रकाश के कणों या क्वाण्टमों या फ़ोटॉनों के बारे में नया सिद्धान्‍त प्रस्तुत किया। इसके पूर्व क्वाण्टम सिद्धान्‍त का मैक्स प्लांक द्वारा सूत्रपात हो चुका था। लेकिन सच पूछें तो आइन्स्टीन का यह शोधपत्र ही क्वाण्टम क्रान्ति का पहला तोप का धमाका था। इस शोधपत्र में आइन्स्टीन ने यह युक्तियुक्त परिकल्पना प्रस्तुत की कि प्रकाश पदार्थ के साथ अपनी अर्न्तक्रिया के दौरान अपनी फ्रीक्वेंसी के समानुपातिक ऊर्जा की एक सुनिश्चित मात्र या 'क्वाण्टम' से युक्त कण के समान व्यवहार करता है। अगले दो दशकों के दौरान प्रयोगों ने फ़ोटॉन की इस परिकल्पना को सही सिद्ध किया और इसके लिए आइन्स्टीन को 1921 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। उसी वर्ष 18 जुलाई को प्रकाशित होने वाला आइन्स्टीन का दूसरा शोधपत्र ब्राउनियन गति की व्याख्या से सम्बन्धित था जिसने परमाणुओं की वास्तविक स्थिति को निर्णायक रूप से स्पष्ट करने के साथ ही ऐसी पद्धतियाँ विकसित कीं जो आज भी आधुनिक सांख्यिकीय भौतिकी के बुनियादी अवयव हैं।

सापेक्षिकता के विशेष सिद्धान्‍त से सम्बन्धित आइन्स्टीन के दो शोधपत्र क्रमशः सितम्बर और नवम्बर 1905 में 'अन्नालेस डेर फ़िज़िक' में प्रकाशित हुए। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त ने दिक् (स्पेस) और काल के अन्तर्सम्बधों पर पुनर्विचार करते हुए उनके एकीकरण की क्रान्तिकारी अवधारणा निरूपित की। प्रकाशिकी और विद्युत गतिकी के विकास के फ़लस्वरूप निरपेक्ष काल, निरपेक्ष समक्षणिकता (साइमल्टेनिटी) और निरपेक्ष दिक् की अवधारणाओं का परित्याग कर दिया गया। विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के अनुसार, काल का प्रवाह किसी प्रणाली की गति पर निर्भर करता है और काल के अन्तराल (और दिक् के आयाम भी) इस तरह से परिवर्तित होते हैं कि सम्ब) प्रणाली में प्रकाश का वेग प्रणाली की गति के अनुसार परिवर्तित नहीं होता। यानी प्रकाश का वेग, इसके उत्सर्जन के वेग से स्वतंत्र, हमेशा स्थिर या अचर होता है। इस पूर्वाधार पर बहुत बड़ी संख्या में वे युगान्तरकारी भौतिक निष्कर्ष निकाले गए, जिन्हें सामान्यतः ''सापेक्षकीय'' कहा जाता है। अपने चौथे शोधपत्र में प्रतिपादित आइन्स्टीन का यह निष्कर्ष सभी पूर्व धारणाओं को उलट-पुलट कर नाभिकीय भौतिकी की नई आधारशिला सिद्ध हुआ कि किसी पिण्ड का द्रव्यमान उसकी ऊर्जा का समानुपातिक होता है और इस समानुपातिकता का नियतांक प्रकाश की गति का वर्ग फ़ल होता है (म्त्रउब्2)।

दिक् और काल के एकीकरण की अवधारणा ने न्यूटोनियन यांत्रिकी को बीते युग की चीज़ बना दिया। 1915 में सापेक्षिता के विशेष सिद्धान्‍त का सामान्यीकरण करते हुए आइन्स्टीन ने सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्‍त विकसित किया और न्यूटोनियन यांत्रिकी के युग का निर्णायक रूप से अवसान हो गया। क्लासिकीय भौतिकी से निर्णायक प्रस्थान का यह दूसरा चरण था। सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्‍त गुरुत्वाकर्षण का एक नया सिद्धान्‍त प्रस्तुत करता है, जिसके अनुसार, द्रव्यमान को दिक्-काल की वक्रता के रूप में देखा जाता है। यानी सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त दिक्-काल की वक्रता और गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों की क्रिया को एक मानता है। यह इस पूर्वधारणा पर आधारित है कि चतुआर्यामी दिक्-काल सातत्य, जिसमें गुरुत्वाकर्षण की शक्तियाँ काम करती हैं, अयूक्लीडीय ज्यामिति के सहसम्बन्धों के अधीन होता है। आइन्स्टीन चतुआर्यामी दिक्-काल में ज्यामितीय सहसम्बन्धों के यूक्लीडीय सहसम्बन्धों से विचलन को ही दिक्-काल की वक्रता मानते थे और उसे ही द्रव्यमान के रूप में देखते थे। 1919 के सूर्यग्रहण अभियान से प्राप्त आँकड़ों ने आइन्स्टीन के इस सिद्धान्‍त की प्रायोगिक धरातल पर पुष्टि कर दी, जब यह पाया गया कि किसी सीधी रेखा के 'प्रोटोटाइप' के रूप में तारों से आती प्रकाश की किरणें सूर्य के निकट गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में मुड़कर वक्र हो जाती हैं।

यहाँ यह उल्लेख दिलचस्प और प्रासंगिक है कि सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के दार्शनिक निष्कर्ष मार्क्स-एंगेल्स द्वारा निरूपित द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मूल स्थापनाओं की पुष्टि करते हैं और उन्हें समृद्ध बनाते हैं। यह सिद्धान्‍त दिक्-काल अन्तराल की एकिलत अवधारणा के माध्यम से दिक् और काल के बीच के अटूट सम्बन्धों को प्रदर्शित करता है। साथ ही, यह भौतिक गति और उसके अस्तित्व के दिक्-काल रूपों के बीच के अटूट सम्बन्धों को भी प्रदर्शित करता है। पदार्थ की गति की विशेषताओं (काल का ''धीमा होना'' और दिक् की ''वक्रता'') पर आश्रित दिक्-काल के गुणों की व्याख्या ने निरपेक्ष दिक् और काल के सम्बन्ध में क्लासिकीय भौतिकी की अवधारणाओं की संकीर्णता स्पष्ट कर दी और यह भी स्पष्ट कर दिया कि दिक्-काल की अवधारणाओं को गतिशील पदार्थ की अवधारणा से पृथक नहीं किया जा सकता। सापेक्षिकता सिद्धान्‍त क्लासिकीय यांत्रिकी का युक्तियुक्त सामान्यीकरण बन गया। उसने क्लासिकीय यांत्रिकी के सिद्धान्तों को प्रकाश के वेग के समीप पहुँचते वेगों से गतिमान पिण्डों के क्षेत्र तक विस्तारित कर दिया। यूँ कहें कि सापेक्षिकता सिद्धान्‍त क्लासिकीय यांत्रिकी की तुलना में यथार्थ का अधिक सटीक परावर्तन है।

पूँजीवादी दर्शन की प्रत्ययवादी या भाववादी (आइडियलिस्ट)  और प्रत्यक्षवादी (पॉज़िटिविस्ट) धाराओं ने सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की निष्पत्तियों को विकृत करते हुए इसे अपने इस दावे को पुष्ट करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की कि विज्ञान का मूल चरित्र मनोगत (सब्जेक्टिव) होता है तथा भौतिक प्रक्रियाएँ प्रेक्षण पर निर्भर करती हैं। यथार्थ की निरपेक्षता की अस्वीकृति को उन्होंने यथार्थ के वस्तुगत चरित्र की अस्वीकृति में बदल दिया और इस तरह सापेक्षिकता सिद्धान्‍त को दार्शनिक सापेक्षवाद (रिलेटिविज़्म) के साथ उलझा दिया। इस मायने में आइन्स्टीन की अवस्थिति सुस्पष्ट भौतिकवादी थी। काण्ट के क्लासिकीय जर्मन प्रत्ययवाद में निहित अनुभवनिरपेक्षता के वह पहले से ही प्रखर आलोचक थे। प्रख्यात फ्रांसीसी गणितज्ञ प्वाइंकारे (जो 1905 में विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त की कुछ निष्पत्तियों तक स्वतंत्र रूप से आइन्स्टीन के साथ-साथ पहुँचे थे) और कुछ अन्य लोगों ने जब यह कहा कि वैज्ञानिक सत्य ''सोपाधिक'' (कण्डीशनल) होता है तो आइन्स्टीन ने उनका कड़ा विरोध किया और संसार के वस्तुगत तथा ज्ञेय होने में तथा प्रकृति की सभी क्रियाओं की कारणात्मक परस्पर निर्भरता में अपना दृढ़ विश्वास प्रकट किया। आस्ट्रियाई भौतिकवादी एवं अन्र्स्ट माख़ भी वस्तुओं को ''संवेदनों का समुच्चय'', संकल्पनाओं को ''संवेदनाओं के समुच्चय'' का प्रतीक और विज्ञान को प्राकल्पनाओं का योग मानता था और इसकी जगह प्रत्यक्ष पर्यावलोकन को स्थापित करने की बात करता था। माख़ के इस मनोगत प्रत्ययवाद और आलोचनात्मक अनुभववाद की सुसंगत आलोचना लेनिन ने अपनी कृति 'भौतिकवाद तथा आलोचनात्मक अनुभववाद' में प्रस्तुत की थी। आइन्स्टीन हालाँकि शुरू में माख़ से प्रभावित थे, लेकिन बाद में, माख़वाद को उन्होंने दृढ़तापूर्वक ठुकरा दिया और 1920 में माख़ को एक ''घटिया दार्शनिक'' कहा।

क्वाण्टम यांत्रिकी की प्रत्यक्षवादी व्याख्या (खासकर कोपेनहेगेन स्कूल के प्रवर्तक एवं अनुयाई वैज्ञानिकों द्वारा) का भी आइन्स्टीन ने पुरज़ोर विरोध किया और एक भौतिकवादी अवस्थिति अपनाई। लेकिन यह बहस न केवल वैज्ञानिक, बल्कि दार्शनिक स्तर पर भी एक जटिल बहस थी, जिससे जुड़े कई मूलभूत प्रश्नों का उत्तर तब आइन्स्टीन के पास भी नहीं था और उनकी तर्क-प्रणाली के अन्तरिम विन्यास में कई बातें अधूरी और ग़लत भी थीं। क्वाण्टम यांत्रिकी का विषय-केंद्र प्रकृति की सूक्ष्म परिघटनाओं का अध्ययन था। पूरी बीसवीं शताब्दी के दौरान क्वाण्टम सिद्धान्‍त के सही-सटीक होने के प्रमाण रोज़-बरोज़ मिलते रहे। आज क्वाण्टम यांत्रिकी ने न केवल भौतिकी, रसायन और जैविकी में परिघटनाओं की व्यापक परिधि का विज्ञान सम्मत स्पष्टीकरण सम्भव बना दिया है, बल्कि वह इंजीनियरिंग की एक शाखा भी बन गई है, लेकिन इस क्रान्तिकारी सिद्धान्‍त के दार्शनिक गूढ़ार्थों पर बहस-विवाद आज भी जारी हैं। कहा जा सकता है कि क्वाण्टम यांत्रिकी ने सूक्ष्म जगत की गति के जिन रूपों से परिचय कराया, उसका लाभ उठाकर अभूतपूर्व वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति हासिल कर लेने में तो सफ़लता मिल गई, लेकिन उस गति की बुनियादी नियम संगति को आज भी बहुत थोड़े अंश में ही समझा जा सका है।

क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार किसी घटना या परिणाम की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, बल्कि केवल उसकी प्रायिकता (प्रोबेबिलिटी) बताई जा सकती है। इस स्थापना की भौतिकवादी व्याख्या वैज्ञानिक सत्य के अवगाहन की प्रक्रिया के और अधिक द्वंद्वात्मक हो जाने के रूप में की जाती है, जहाँ पर्यवेक्षण के सूक्ष्म स्तर पर निश्चितता और अनिश्चितता का द्वंद्व (घटना या परिणाम की प्रायिकता के रूप में) मौजूद रहता है, लेकिन इस बात को भी लगातार ध्यान में रखना होगा कि पर्यवेक्षण स्वयं ज्यादा से ज्यादा सूक्ष्म धरातल पर उतरता जाता है। यानी क्वाण्टम यांत्रिकी यांत्रिक निर्धारणवाद का खण्डन करता है, न कि कारण-कार्य सम्बन्ध या कारणिक निर्धारणवाद (कॉज़ल डेटरमिनिज़्म) का। क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार, अन्योन्य क्रिया करने वाली वस्तुओं की प्रणाली में सक्रिय हस्तक्षेप के बिना अनुसन्धानकर्ता को उसका पर्याप्त ज्ञान नहीं हो सकता। कोपेनहेगेनपंथ के वैज्ञानिकों ने इस स्थापना की प्रत्यक्षवादी व्याख्या की। उन्होंने सूक्ष्म जगत के यथार्थ को केवल संज्ञान और मापन की प्रक्रिया का प्रतिफ़ल बताया, ''पर्यवेक्षक'' की भूमिका की गलत व्याख्या की तथा ''कारणता के धराशायी होने'' और ''इलेक्ट्रॉन की स्वतंत्र इच्छा'' जैसे दावों तक जा पहुँचे। इस संदर्भ में भौतिकवादी अवस्थिति यह है कि क्वाण्टम यांत्रिकी की यह स्थापना विषय (ऑब्जेक्ट) और विषयी (सब्जेक्ट) के बीच, वस्तुगत पहलू और मनोगत पहलू के बीच, पहले के प्राथमिक और दूसरे के द्वितीयक होने के सिद्धान्‍त का खण्डन नहीं करती, बल्कि इनके अन्तर्सम्बन्धों की घनिष्ठता एवं संश्लिष्टता को और अधिक बारीकी के साथ उजागर करती है। क्वाण्टम यांत्रिकी सहित सम्पूर्ण भौतिकी के उत्तरवर्ती विकास ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते यह सिद्ध कर दिया कि अभी भी ''भौतिकी की आधारभूत भौतिकवादी भावना'' (व्ला. ई. लेनिन: 'भौतिकवाद और अनुभववादी आलोचना') का पलड़ा ही भारी है। लेकिन आइन्स्टीन के समय स्थिति ऐसी नहीं थी। चूँकि आइन्स्टीन एक सुसंगत द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दार्शनिक नहीं थे और चूँकि क्वाण्टम यांत्रिकी अभी प्रायोगिक सत्यापन के प्रारम्भिक स्तर पर थी, इसलिए आइन्स्टीन क्वाण्टम यांत्रिकी की प्रत्यक्षवादी व्याख्याओं का विरोध करते हुए इस अतिवादी निष्कर्ष तक जा पहुँचे कि क्वाण्टम यांत्रिकी के सिद्धान्‍त विसंगतियों से भरे हुए हैं। धीरे-धीरे वह इस धारणा से तो मुक्त हुए लेकिन इतना वह अंत तक मानते रहे कि यह एक अधूरा सिद्धान्‍त है और एक मायने में अपने पूर्वाग्रहों के बावजूद, उनकी यह धारणा सही भी कही जा सकती है।

1926 तक क्वाण्टम सिद्धान्‍त और सापेक्षिकता का विशेष सिद्धान्‍त अपने अलग-अलग प्रायोगिक सत्यापनों के बावजूद एक-दूसरे से सामंजस्य नहीं रखते थे। उस समय की क्वाण्टम यांत्रिकी परमाणु स्तर की जिन परिघटनाओं की व्याख्या कर रही थी, उनमें सूक्ष्म कणों की गति प्रकाश की गति से बहुत धीमी थी और इसलिए उनकी व्याख्या और उनसे जुड़े प्रयोगों के लिए दिक्-काल की क्लासिकी अवधारणा काफ़ी थी। लेकिन कण-भौतिकी (पार्टिकल फ़िज़िक्स) के उद्भव और विकास के साथ ही सूक्ष्म जगत के अधिक ऊर्जावान रूपों से-प्रायः प्रकाश की गति के निकट की गति वाले सूक्ष्म कणों से वास्ता पड़ा तो गैर-सापेक्षिक क्वाण्टम यांत्रिकी की सीमाएँ सामने आ गईं। इस समस्या के समाधान के लिए विशेष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के साथ क्वाण्टम यांत्रिकी के मेल के प्रयास 1928 में पॉल डिराक द्वारा एक 'क्वाण्टम फ़ील्ड थियरी' के रूप में सापेक्षिक क्वाण्टम यांत्रिकी विकसित करने के साथ शुरू हुए, जिन्हें 1949 में रिचर्ड फ़ाइनमैन, जूलियन श्विंगर और सिन इतिरो टोमोनागा के प्रयोगों ने तार्किक परिणति तक पहुँचाया।

लेकिन आइन्स्टीन के सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त के साथ क्वाण्टम यांत्रिकी का मेल करा पाना अभी आज तक सम्भव नहीं हो पाया है। चूँकि सामान्य सापेक्षिकता सिद्धान्‍त द्वारा प्रस्तुत गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्‍त ही आज का प्रमाणित गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्‍त है, अतः कहा जा सकता है कि अभी तक गुरुत्वाकर्षण का क्वाण्टम सिद्धान्‍त मौजूद नहीं है। यही आज की सैद्धान्तिक भौतिकी का केन्द्रीय एजेण्डा है। चूँकि इस सिद्धान्‍त के खोज लिए जाने के बाद प्रकृति के चार मूल बलों के एकीकरण का क्वाण्टम सिद्धान्‍त पूरा हो जाएगा, इसीलिए वैज्ञानिक इसे ''सबकुछ का सिद्धान्‍त'' (थियरी ऑफ़ एवरीथिंग) का नाम दे रहे हैं। क्वाण्टम यांत्रिकी के प्रति अपनी आशंकाओं-पूर्वाग्रहों के चलते आइन्स्टीन प्रिंसटन के उच्च अध्ययन संस्थान में काम करते हुए, गत शताब्दी के चौथे-पाँचवे दशक के दौरान भौतिकी की मुख्य धारा में काफ़ी हद तक अलग-थलग पड़ गए थे। गुरुत्वाकर्षण और विद्युत चुम्बकत्व के एकीकृत सिद्धान्‍त की खोज के उनके प्रयास तब सफ़ल नहीं हो सके थे, लेकिन यह उन्हीं का व्यापकतर विज़न था, जिसने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर अब तक की सैद्धान्तिक भौतिकी का एजेण्डा-सभी मूल बलों के एकीकरण के सिद्धान्‍त की खोज के रूप में तय किया है। निश्चित ही अपनी असफ़लताओं में भी आइन्स्टीन उतने ही महान थे।

आइन्स्टीन जीवन भर अविराम वैज्ञानिक शोध-कार्य में रत रहे। उन्होंने तीन सौ से भी अधिक शोध-निबन्ध लिखे, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। साथ ही दार्शनिक विषयों में भी उनकी रुचि उसी समय से थी, जब बारह वर्ष की उम्र में उनके पारिवारिक मित्र मैक्स तालमुद ने, जो एक दार्शनिक और गणितज्ञ थे, इम्मैनुअल काण्ट की कृति 'विशुद्ध तर्कणा की समालोचना' से उनका परिचय कराया था। प्राकृतिक परिघटनाओं के अध्ययन ने आइन्स्टीन की विश्व दृष्टि को क्रमशः ज्यादा से ज्यादा सुसंगत भौतिकवादी बनाने का काम किया था, लेकिन चूँकि सामाजिक अध्ययन और प्रयोग उनका मुख्य क्षेत्र नहीं था, इसलिए वह अपनी विश्व दृष्टि को राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में सुसंगत ढंग से लागू नहीं कर सके और समाजवाद तथा तत्कालीन सोवियत संघ के अन्तर्गत जनवाद और नौकरशाही के विशेषधिकारों को लेकर वह सदैव शंकालु रहे। लेकिन आनुभविक स्तर पर वह अंधराष्ट्रवाद, सैन्यवाद, फ़ासीवाद, साम्राज्यवादी युद्ध और हर तरह के नस्लवादी- रंगभेदवादी उत्पीड़न का जीवन पर्यन्त जमकर विरोध करते रहे और मानवाधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में लगातार दृढ़तापूर्वक आवाज़ बुलन्द करते रहे। उनका मानना था कि जब तक राष्ट्रों की सम्प्रभु सत्ताएँ बनी रहेंगी, तब तक दुनिया में युद्ध लाज़िमी तौर पर होते रहेंगे, इसलिए विश्व शान्ति और निश्शस्त्रीकरण के लिए उन्होंने एक विश्व सरकार की स्थापना का यूटोपियाई विकल्प प्रस्तुत किया और इसके लिए प्रयास भी किए, जिन्हें लाज़िमी तौर पर असफ़ल होना ही था। अपने जीवन के अन्तिम दशक में उनके विचारों में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे थे। मंदी, बेरोजगारी, भुखमरी, असमानता और युद्धों के साथ-साथ समाज में बढ़ते अलगाव का मूलभूत कारण वह पूँजीवादी उत्पादन एवं विनिमय प्रणाली की अराजकता में तथा मुनाफ़े की गलाकाटू प्रतिस्‍पर्धा में देखने लगे थे तथा यह मानने लगे थे कि इसका एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है। अपनी इन प्रस्थापनाओं को उन्होंने 1949 में 'समाजवाद ही क्यों?' नामक प्रसिद्ध लेख में प्रस्तुत किया जो पॉल स्वीज़ी द्वारा निकाली जाने वाली मार्क्सवादी पत्रिका, 'मंथली रिव्यू' के प्रवेशांक में प्रकाशित हुआ था। इससे भी पहले 1935-36 में 'विज्ञान और समाज़'  शीर्षक से अपने निबन्ध में उन्होंने लिखा था कि पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्थाओं के अन्तर्गत हर प्रौद्योगिक विकास अनिवार्यतः बेरोजगारी और आवर्ती संकटों को जन्म देता है तथा आधुनिक शस्त्र और संचार के साधन मिलकर शरीर और आत्मा को एक केन्द्रीय सत्ता का बन्धुआ बना देते हैं।

आइन्स्टीन केवल प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के प्राणी नहीं थे। कई शताब्दियों में पैदा होने वाला एक चिंतक-वैज्ञानिक होने के बावजूद वह रोज़मर्रे के सामाजिक-राजनीतिक जीवन की समस्याओं से गहरा सरोकार रखते थे। किताबी कीड़ों और अपने आविष्कारों की परिणतियों से असम्पृक्त वैज्ञानिकों की जमातों के वह कटु आलोचक थे। न्याय के पक्ष में जारी संघर्ष में वह उस समय से ही भागीदारी करते रहे, जब वह एक वैज्ञानिक के रूप में अपना जीवन शुरू कर रहे थे और गहनतम शोध के दौर से गुज़र रहे थे।

उनके जर्मनी छोड़कर स्विस नागरिक बनने के पीछे भी मूल कारण जर्मन सैन्यवाद का विरोध था। 1917 में उन्होंने जिस समय जर्मन सैन्यवाद के विरुद्ध जर्मन बुद्धिजीवियों के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया, उस समय वह वहाँ के 'कैसर विल्हेल्म सैद्धान्तिक भौतिकी संस्थान' के निदेशक थे। पहले विश्वयुद्ध में जर्मनी की भूमिका का मुखर विरोध करने के कारण बर्लिन पुलिस ने उनका नाम काली सूची में डाल रखा था। वह उन चार वैज्ञानिकों में से एक थे जिन्होंने युद्ध के विरुद्ध तथा युद्धों के उन्मूलन के लिए एक एकीकृत यूरोप की स्थापना के लिए जारी 'यूरोपीय लोगों के घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किया था। इसी उद्देश्य से गठित 'न्यू फ़ादरलैण्ड लीग़' की भी आइन्स्टीन ने सदस्यता ली थी। उन्होंने युद्ध की समाप्ति और जर्मनी में गणतंत्र की स्थापना का स्वागत किया और छात्रों की एक सभा में भाषण दिया, जिसके बाद, कम्युनिस्टों से मतभेदों के बावजूद, जर्मन पुलिस उन्हें रैडिकल समाजवादी मानने लगी थी।

1919 में विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय और जर्मन मजदूर आंदोलन के निर्मम दमन एवं बिखराव के बाद वहाँ फ़ासीवाद के विकास की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1933 में हिटलर के सत्तासीन होने के बाद अपनी पराकाष्ठा पर जा पहुँची। आइन्स्टीन इस दौरान फ़ासीवाद के युद्धोन्माद और नागरिक दमन का विरोध करते हुए लगातार शान्तिवाद और युद्धों की समाप्ति के लिए एक विश्व सरकार के पक्ष में प्रचार करते रहे। हालाँकि उनके द्वारा प्रस्तुत समाधान समस्या की जड़ साम्राज्यवाद और पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में न देख पाने के कारण अव्यावहारिक और काल्पनिक ही था, लेकिन फ़िर भी नात्सी सत्ता उन्हें वामपंथी और ''यहूदी देशद्रोही'' मानकर उनपर कड़ी नजर रखने लगी। उनके सिद्धान्तों को ''बोल्शेविक षड़यंत्र'' कहा जाने लगा। 1939 में, यहूदी आबादी के व्यापक दमन की चपेट में ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवी भी आने लगे थे। आइन्स्टीन (दुबारा) जर्मन नागरिकता छोड़कर 1933 से ही अमेरिका के प्रिंसटन स्थित उच्च अध्ययन संस्थ्शान में काम कर रहे थे। 1939 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ले ली। लेकिन वहाँ भी उनका दम घुटने लगा। उन्होंने देखा कि किस तरह अमेरिका ने स्पेन में गणतंत्रवादी शक्तियों को कुचलने में मदद की, फ़ासीवादी फ्रांको का समर्थन किया और सोवियत संघ के विरुद्ध षड़यंत्र किए। स्वयं अमेरिका के भीतर अश्वेत और लातिनी मूल के मज़दूरों व आम आदमी का दमन भी वहाँ के बुर्जुआ जनवाद की असलियत उघाड़ रहा था और आइन्स्टीन उसके विरुद्ध भी खुलकर आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन चूँकि वह फ़ासीवाद को पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मान रहे थे और जर्मनी द्वारा परमाणु बम के विकास का उन्हें अंदाजा हो गया था इसलिए परमाणु बम विकास परियोजना के पक्ष में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को एक पत्र लिखा। आइन्स्टीन इस बम को सिर्फ़ शक्ति सन्तुलन का एक साधन मानते थे, लेकिन फ़ासीवादी धुरी की पराजय आसन्न होने के बावजूद, पूरी दुनिया पर चौधराहट जमाने की नीयत से अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने की घटना से आइन्स्टीन एकदम विचलित हो गए। विश्व शान्ति की मुहिम में वह और भी अधिक जोर-शोर से सक्रिय हो गए, लेकिन साम्राज्यवाद के चरित्र के ज्यादा से ज्यादा नंगा होते जाने के साथ ही उनकी चिन्तन-प्रक्रिया में अब महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे थे और युद्धों तथा तमाम मानवीय आपदाओं की जड़ अब वह पूँजीवादी प्रणाली में देखने लगे थे। हालाँकि सोवियत संघ के बारे में उनकी शंकाएँ थीं और समाजवादी संक्रमण की प्रकृति एवं समस्याओं का अध्ययन नहीं होने के कारण वह समाजवाद के अन्तर्गत नौकरशाही के निरंकुश अधिकार सम्पन्न होने के बारे में चिन्तित रहते थे, फ़िर भी पाँचवे दशक के उत्तरार्द्ध तक वह मानने लगे थे कि पूँजीवाद का एकमात्र तार्किक और सम्भव विकल्प समाजवाद ही है।

यह शीतयुद्ध का दौर था जब अमेरिका कम्युनिज़्म-विरोध के कुख्यात मैकार्थीवादी उन्माद की गिरफ़्त में था। तमाम ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवियों तक को वामपंथी होने के आरोप में गिरफ़्तार किया जा रहा था, तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा था और गायब तक करवा दिया जा रहा था। आइन्स्टीन पर भी निगाह थी, लेकिन वह निर्भीकतापूर्वक वामपंथियों के दमन के विरुद्ध तथा अश्वेतों और आम आबादी के नागरिक आज़ादी के लिए आवाज़ उठा रहे थे और अमेरिकी आक्रामक सैन्यवाद की निन्दा भी कर रहे थे। जूलियस और इथेल रोज़ेनबर्ग नामक वैज्ञानिक दम्पति को वामपंथी होने के कारण जब सोवियत जासूस बता कर फ़ाँसी की सज़ा दी गई तो आइन्स्टीन ने इसका जमकर विरोध किया था। उन्होंने तमाम बुद्धिजीवियों का आह्वान किया कि वे मैकार्थी की 'आन्तरिक सुरक्षा समिति' के सामने गवाही देने के लिए न जाएँ। आइन्स्टीन फ़ासीवाद और विश्वयुद्ध के दौर में यहूदियों के अभूतपूर्व नरसंहारों से अन्दर तक विचलित थे और इज़राइल में एक यहूदी होमलैण्ड के निर्माण के प्रबल समर्थक थे, लेकिन वह एक अविभाजित फ़िलिस्तीन में अरबों-यहूदियों के सहअस्तित्व के समर्थक थे और इसकी विफलता के पीछे साम्राज्यवादियों की 'बाँटो और राज करो' की नीति को मुख्य कारण मानते थे।

अप्रैल, 1955 में अपनी मृत्यु के समय तक आइन्स्टीन अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवादियों के लिए अपने विचारों के चलते लगातार परेशानी का सबब बने रहे। अपनी विश्वव्यापी प्रसिद्धि और लोकप्रियता के चलते ही शायद वह जेल और यंत्रणा से बचे रह सके। यह वर्ष सापेक्षिकता सिद्धान्‍त का शताब्दी वर्ष होने के साथ ही आइन्स्टीन का पचासवाँ पुण्य तिथि वर्ष भी है। उनका जीवन हमें लगातार अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रह कर निर्भीक आचरण करने और अपने बौद्धिक कार्यों को लगातार सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की शिक्षा देता है।

आखिर क्या कारण था जो आइन्स्टीन को लगातार धारा के विरुद्ध खड़े होकर और अधिकारी-सत्ताधारी जमातों के बीच अलोकप्रिय बनकर भी अपनी मान्यताओं पर डटे रहने और निर्भीकतापूर्वक न्याय और जनता के पक्ष में आवाज़ उठाते रहने के लिए प्रेरित करता था? शायद उनकी वैज्ञानिक स्पिरिट का मानवीय दायरों तक विस्तार ही वह मूल कारण था, जैसा कि बीसवीं शताब्दी में विज्ञान के अन्य शिखिर पुरुष नील्स बोर ने उनके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा था: ''आइन्स्टीन के अवदान केवल विज्ञान के दायरे तक ही सीमित नहीं हैं। हमारे सबसे बुनियादी और अभ्यस्त अभिधारणाओं तक में से अब तक अदृष्ट अभिधारणाओं को देख लेने की उनकी प्रवृत्ति सभी लोगों को प्रत्येक राष्ट्रीय संस्कृति में अन्तर्निहित, गहराई से जड़ जमाए पूर्वाग्रहों और आत्म सन्तुष्टियों की शिनाख़्त करने और उनके विरुद्ध संघर्ष करने के लिए एक नया प्रोत्साहन देती है।'' आज भारत के युवाओं को भी इस नए प्रोत्साहन की सख़्त ज़रूरत है और शायद सबसे अधिक ज़रूरत है।

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प्रस्‍तुति - Uniting Working Class