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Monday, 11 July 2022

पूँजीवाद में 'प्रेस की स्‍वतंत्रता' के खोखले जुमले पर लेनिन के विचार



पूँजीपतियों ने हमेशा से ही ''स्‍वतंत्रता'' शब्‍द को अमीरों के और अमीर होने और मज़दूूरों के भूखे मरने की स्‍वतंत्रता के रूप में इस्‍तेमाल किया है। पूँजीवादी मायने में प्रेस की स्‍वतंत्रता का अर्थ है: प्रेस को रिश्‍वत देने की अमीरों की स्‍वतंत्रता, उनके द्वारा तथाकथित जनमत का निर्माण करने के लिए अपनी सम्‍पत्ति का इस्‍तेमाल करने की स्‍वतंत्रता। इस सन्‍दर्भ में भी ''शुद्ध लोकतंत्र'' के हिमायती एक निहायत ही घटिया और भ्रष्‍ट तंत्र की हिमायत करते हैं जो अमीरों को मास मीडिया पर नियंत्रण करने देता है। वे जनता की आँँख में धूल झोंकने का काम करते हैं और और सुनने में अच्‍छे व तर्कसंगत लगने वाले लेकिन पूरी तरह से झूठे जुमलों के ज़रिये प्रेस को पूँजीवादी ग़ुलामी से मुक्‍त करने के ठोस ऐतिहासिक कार्यभार से लोगों का ध्‍यान भटकाते हैं।

- लेनिन

Sunday, 10 July 2022

सिर्फ धार्मिक कट्टरता नहीं, सरकार का रवैया भी ज़िम्मेदार

सिर्फ धार्मिक कट्टरता नहीं, सरकार का रवैया भी ज़िम्मेदार
( 'हस्तक्षेप', राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित) 

इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब से जुड़ी एक घटना बेहद लोकप्रिय है. यह न केवल लोकप्रिय है, बल्कि इस्लाम का अर्थ इसी घटना के संदेश में छिपा है. असल में, दिन के पांचों वक्त की नमाज़ मोहम्मद साहब की दिनचर्या का हिस्सा थी. जब वो नमाज़ के लिए अपने घर से मस्जिद को जाते, तो रास्ते में एक वृद्ध महिला (जो तब तक इस्लाम की अनुयायी नहीं थी) हर रोज छत से उन पर कूड़ा डाल दिया करती. लेकिन, वो इससे कभी गुस्सा नहीं होते. कपड़े पर पड़े कूड़े को छाड़ देते और चुपचाप मस्जिद की ओर चल पड़ते. एक दिन ऐसा हुआ कि उस महिला ने कूड़ा नहीं डाला. यह देख कर मोहम्मद साहब बहुत हैरान हुए. इसकी वजह जानने के लिए वो उस महिला के घर चले गए. पता चला कि आज वो बीमार है. इजाजत लेकर मोहम्मद साहब उस महिला के करीब गए और उनकी तबियत का जायजा लिया. मोहम्मद साहब की इस रहमदिली को देख कर वृद्ध महिला बहुत प्रभावित हुई. हदीसों में लिखा है कि इसके बाद वृद्ध महिला ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया. यह एक ऐसी घटना है जिससे यह समझना बेहद आसान है कि एक मुस्लिम की जिंदगी किन राहों पर और किन तौर-तरीकों पर गुजरनी चाहिए. उदयपुर की घटना तो इस्लाम की शिक्षा के बिलकुल उलट है. जब इतनी बदतमीजियों के बाद भी मोहम्मद साहब वृद्ध महिला की हाल पूछने जा रहे हैं, तो उनके बारे में एक अभद्र टिप्पणी करने वाले की जान ले लेना तो उनकी शिक्षाओं का ही अपमान है. जो मजहब एक कत्ल को पूरी इंसानियत के कत्ल के बराबर करार देता हो, उस मजहब के अनुयायी इस घटना के पक्षधर कभी नहीं हो सकते. यानी उदयपुर में हुई हत्या बेहद निंदनीय और गंभीर है. जाहिर है, इसको अंजाम देने वाला व्यक्ति सही अर्थों में इस्लामिक नहीं हो सकता.

नुपुर शर्मा द्वारा मोहम्मद साहब पर अभद्र टिप्पणी और उसके बाद जन्मी परिस्थितियों और पूरी बहस का तो यह एक पक्ष है. इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी कोई कम गंभीर और चिंताजनक नहीं है. इस दूसरे पक्ष में शासन और प्रशासन की हीलाहवाली है जिसके चलते सरकार की मंशा ही कटघरे में है. असल में, जब नुपूर शर्मा ने मोहम्मद साहब के खिलाफ भावनाएं भड़काने वाली टिप्पणी की, तब से उन पर दिल्ली समेत कई राज्यों में पुलिस केस दर्ज हैं. लेकिन, पुलिस उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है. दूसरी ओर, मोहम्मद जुबैर नामक एक पत्रकार को हाल ही में दिल्ली पुलिस ने धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. दिलचस्प बात यह है कि नुपूर और जुबैर दोनों पर एक जैसी धाराओं में केस दर्ज है. धारा 295ए (किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करना) और 153ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत दोनों आरोपी हैं. लेकिन, दोनों मामलों में कार्रवाई को लेकर पुलिस का रवैया बिलकुल अलग है. यह मामला इतना साफ है कि एक मामूली समझ रखने वाला व्यक्ति भी सरकार के मंसूबों को समझ सकता है. यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार पर कार्रवाई करने में भेदभाव के आरोप लग रहे हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने और पुख्ता कर दिया है. नुपूर शर्मा की एक याचिका को खारिज करते हुए जज ने कहा- "क्या कारण है कि इतने मुकदमे के बावजूद पुलिस आपको छू नहीं पा रही और आपकी शिकायत पर आरोपी को गिरफ्तार किया जा रहा है".

यह बताने की जरूरत नहीं है कि नुपूर शर्मा के बयान के बाद देश के कई हिस्सों में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हुई. विरोध प्रदर्शनों में आगजनी हुई. यहाँ तक कि कुछ लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी. उदयपुर और अमरावती में दो हत्याकांड हुए और दोनों ही मामलों के पीछे नुपूर शर्मा की टिप्पणी को वजह बताई गई. ऐसा कह कर इन हत्याकांड को जायज नहीं ठहराया जा रहा है, लेकिन हैरतअंगेज बात है कि इन तमाम मामलों के बावजूद नुपूर शर्मा पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. वहीं, जिस मोहम्मद जुबैर की ट्विटर पोस्ट से किसी हिंसा की खबर नहीं है, वह जेल की सलाखों के पीछे है. बात सिर्फ़ नुपूर शर्मा की नहीं है. हालिया वर्षों में देखा गया है कि मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने और उनकी भावनाओं को भड़काने वालों पर शासन और प्रशासन वक्त रहते जरूरी कार्रवाई नहीं करता. दिल्ली दंगा भड़काने वाली रागिनी तिवारी और नरसंहार की अपील करने वाले नरसिंहानंद इसके उदाहरण हैं. सरकार और प्रशासन बार-बार ऐसे उदाहरण पेश कर रहे हैं जिनसे साफ तौर पर पक्षपात का पता चलता है और यह सब एक आजाद और लोकतांत्रिक देश के लिए बिलकुल भी मुनासिब नहीं है.

दरअसल, यहीं पर हम और हमारा संविधान दोनों की हार हो जाता है. जिस संविधान में 'कानून के समक्ष समानता' और 'विधि का शासन' की प्रतिज्ञा ली गई है, उस संविधान वाले देश में भेदभाव की ऐसी पराकाष्ठा तो नहीं होनी चाहिए. सवाल है कि क्या हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर चल पड़े हैं जहाँ कानूनी प्रावधानों के बजाय मनमानेपन से कार्रवाई की जाएगी? क्या हम पड़ोसी देश पाकिस्तान की शैली की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ से अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ भेदभाव की खबरों से हम चिंतित हो जाते हैं. यकीनन हम वैसा नहीं बनना चाहेंगे. लेकिन, मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय मुस्लिम व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पा रहा है. संविधान जिस सेक्यूलरिज़्म की बात करता है, उसकी अवहेलना हो रही है. ऐसे में एक अल्पसंख्यक के तौर पर मुस्लिम समुदाय खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है.

असल में, सरकार को समझना होगा कि देश में बढ़ रही कट्टरता के लिए केवल धर्म जिम्मेदार नहीं है, सरकार का ढीला रवैया भी इसको बढ़ाता है. जब धार्मिक भावनाओं को भड़काने वालों पर वक्त रहते कार्रवाई नहीं होती है, तब आहत होने वालों का गुस्सा धर्म के अंदर कट्टरता को बढ़ावा देता है. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वक्त रहते असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई करे. लेकिन, सत्ता अपने चरित्र के मुताबिक जब तक कट्टरता को नासूर बना कर अपनी सियासी रोटी सेंकती रहेगी, मुल्क अपना अमन-चैन यूंही खोता रहेगा.

तेजाब से चमकाया जाता है अदरक

तेजाब से चमकाया जाता है अदरक को
कई रिपोर्ट्स में इस बात का खुलासा हो चुका है कि तेजाब से अदरक को धोकर उस पर चमक लाई जाती है। गंदी और भद्दी दिखने वाली अदरक को तेजाब से चमकाया जाता है, क्योंकि बाजार में जब भी आप अदरक खरीदने के लिए जाएंगे तब आप वही अदरक खरीदेंगे जो देखने में ठीक लग रहा हो। रिपोर्ट के अनुसार, एक लीटर तेजाब से करीब 400 किलो अदरक धोकर चमकाई जाती है।

हो सकता है कैंसर तक
तेजाब से अदरक को धोने पर उसके ऊपर का भद्दा हिस्सा या गन्दा छिलका निकल जाता और अदरक में चमक आ जाती है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस बात का खुलासा हो चुका है कि देश की कई मंडियों में तेजाब से साफ की हुई अदरक सप्लाई की जा रही है, जो लोकल मार्केट से होकर आपके घरों में जाती है। इसके बाद यह आपके पेट में जाकर जहर बना रही है। डॉक्टरों का कहना है कि ज्यादा मात्रा में तेजाब वाली चाय पीने से आपकी मौत हो सकती है। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि बहुत लंबे समय तक अगर इसको खाया जाए तो कैंसर तक हो सकता है।

भिखारी ठाकुर के दो नाटक



अपने बचपन के दिनों में मुझे भोजपुरी साहित्य के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के दो नाटकोंको देखने का सौभाग्य मिला ।एक नाटक उनका था विदेशिया। विदेशिया का पाठ अदा करते हुए मुझे उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त है। दूसरा नाटकतथा  भाई विरोध । इनका एक नाटक  लोकप्रिय था" बेटी बेचवा। ,"ऐसा कहा जाता है हजारीबाग में वे जब इस नाटक कोअभिनीत कर रहे  थे तोदर्शक महिलाएं रो रही थी। यह नाटक बेमेल विवाह पर आधारित है लड़की रो रो कर अपनी अपनी व्यथा को यह गा गा कर प्रकट कर रही है सचमुच यह गीत ह्रदय विदारक है। विदेशिया नाटक में पति अपनी पत्नीको छोड़कर कोलकाता चला जाता है और जब वह लौटता है उसके साथ उसकी दूसरी पत्नी और बच्चे होते हैं पहली पत्नी अपने पति को पाकर खुश है और अपने सौतनऔर उसके बच्चे को भी अपना लेती है। उन दिनों मजदूर वर्ग के लोग घर परिवार छोड़कर कोलकाता कमाने  के लिए चले जाते थे। नवविवाहिता पत्नी अपनी विरह वेदना को   किसतरह से व्यक्त करती है, इसका सजीव वर्णन भिखारी ठाकुर ने अपने इस नाटक में की है । उनका एक और नाटक है जालिम सिंहजोपटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित हुआ था। इस नाटक में जालिम सिंह जो एक सिपाही है एक महादलित लड़की से विवाह करता है ।लड़की अपनी सास को बात बात में बदला देती है वह महादलित परिवार की है ।फिर तो परिवार में कोहराम मच जाता है। उन दोनों को परिवार से अलग कर दिया जाता है ।अपने  बीमार ससुर की सेवा गोरखपुर के अस्पताल मे  करती है। उनकीजिंदगी बच जाती है। अस्पताल से घर आने पर अब वह अपने पतोहू को बेटी का  दर्जा देकर फिर से परिवार में शामिल कर  लेते हैं । उन्होंने इस नाटक में अंतरजातीय विवाह की मान्यता समाज में  दिलाने की कोशिश की है और महादलित  को समाज में सम्मान दिलवाने की कोशिश की है।

           उनके निर्माण दिवस पर उन्हें शत-शत नमन और प्रणाम ।

Wednesday, 6 July 2022

बहादुरशाह ज़फर

जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दुस्तान' रखा, हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा। अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में। 'राम चरित मानस' भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी।

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था।

टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर,,,  बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं। अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते।

यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युँ ना हो।

बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रैजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना। भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये।

ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि - "हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं।"

बेवकूफ थे बहादुरशाह ज़फर। आज उनकी पुश्तें भीख माँग रहीं हैं।

अपने इस हिन्दुस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये। अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी ! सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ? 

ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता।

क्या इनके नाम पर हुआ ?

नहीं ना ? इसीलिए कहा कि अंग्रेजों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना कैद मिलती ना कैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही कैद में लिखा :

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।
कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥
......Kamran Khan

अगर किसी नाटक के पात्र मुसलमान हैं तो उसका मंचन कहां करना चाहिए?



अगर किसी नाटक के पात्र मुसलमान हैं तो उसका मंचन कहां करना चाहिए? 

मुस्लिम के स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम में?

क्या इसके मंचन के लिए हिंदू के स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम से परहेज़ करना चाहिए?
(नाटक के निर्देशक हिंदू हों तो भी?)

कर्नाटक के शिमोगा में बजरंग दल वालों ने यह कहते हुए जयंत कैकिनी का नाटक जोतेगिरुवानु चंदिरा का मंचन बीच में रोक दिया कि इसमें पात्र मुस्लिम हैं और हिंदू (वीराशैव हिंदू) स्वामित्व वाले ऑडिटोरियम में इसका मंचन नहीं हो सकता। 

बजरंग दल ने जब हस्तक्षेप किया, तब तक नाटक को शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मतलब, ऑडिटोरियम के मलिकान को नाटक पर कोई एतराज़ नहीं था।

जयंत कैकिनी लिखित जोतेगिरुवानु चंदिरा जोसफ स्टीन के बहुचर्चित उपन्यास द फिडलर ऑन द रूफ का कन्नड़ नाट्य रूपांतरण है। इसका मंचन रंगाबेलाकू थिएटर ग्रुप कर रहा था।

ख़ुद जोसफ स्टीन ने इसे शोलेम अलेखेम की बहुचर्चित कहानी तेवये एंड हिज डॉटर्स से डेवलप किया है। 

मूल कहानी 1905 के लगभग की है और ज़ार के राज वाले रूस के एक काल्पनिक गांव अनातेवका के दूध बेचने वाले तेवये पर केंद्रित है। तेवये यहूदी है। उसका परिवार बाहरी सामाजिक सांस्कृतिक प्रभावों से जूझ रहा है और वह अपनी यहूदी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को बचाने की कोशिश कर रहा है। इन्ही परिस्थितियों में वह अपनी पांच बेटियों की शादी को ले कर चिंतित है।

बजरंग दल की परेशानी अब आप समझ सकते हैं।

यह उस देश में हो रहा है, जहां एक वक्त कुरान  हिंदू स्वामित्व वाले प्रिटिंग प्रेस में छपा करता था।

Saturday, 2 July 2022

मुफ्त इलाज

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