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Saturday, 1 October 2022

महिषासुर कौन??

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बंग प्रदेश जिसे आज पश्चिम बंगाल कहते हैं में ब्राह्मण धर्म के अनुसार महेष नामक शूद्र वर्ण में पैदा हुआ यादव जाति का राजा था जो बहुत ही वीर क्रान्तिकारी था और बहुत ही मिलनसार और हंसमुख था वह उसके पास बहुत सी गायें और भैंसे थी जिसे ज्यादातर वह चरवाहों के साथ भैस चराने के लिए भी चला जाता था और मजाक में भैंस पर सवारी कर लेता भैस को महिष कहते हैं इसलिए ब्राह्मण लोग उसे महिषासुर कहते थे। 
ब्राह्मणों ने महिषासुर का राज्य हड़पने के लिए कई बार आमने सामने की लड़ाई लडी लेकन हार कर भाग गये अंत में छलकटप जो कि ब्राह्मणों का सबसे बड़ा हथियार है प्रयोग किया और दुर्गा नामक वेशया को इसकी जिम्मेदारी दिया। 

 *दुर्गा कौन??* 

नौ रात्री क्यों? 
नौ दिन क्यों नहीं?? 
👉 क्योंकि कुछ गलत कार्य रात्री में ही होता है। 

दुर्गा आठ हाथों की नहीं दो हाथों की साधारण महिला थी जो कि बहुत खूबसूरत थी यही उसका कसूर था जिसके कारण कुछ दुष्टों ने पश्चिम बंगाल के एक साधारण से परिवार में पैदा हुई दुर्गा को गरीब परिवार से खरीद कर वेश्यालय में बेंच दिया था।
पश्चिम बंगाल में ही महिषासुर नामक श्रमण (बौद्ध) सम्राट था जो कि बहुत ही बलशाली था और उसके राज में सभी सुखी थे।
ब्राह्मणों ने कई बार आमन सामने की लड़ाई लड़ी लेकिन हर बार महिषासुर के आगे टिक नहीं पाये और हार गये।
ब्राह्मणों का इतिहास है कि ब्राह्मण बहुत ही शातिर और बदमाश होते हैं जीतने के लिए शाम दाम दंड भेद यानी किसी भी हद तक जा सकते हैं।
ब्राह्मणों ने शाजिस करके दुर्गा वेश्या को महिषासुर के हत्या की जिम्मेदारी दी।
दुर्गा ने एक एक करके अपनी कला मोहक अदाएं दिखाकर शराब पिलाकर अलग अलग वस्त्र पहनकर नाच दिखाकर रिझाने की कोशिश किया इस तरह से नौ रात्रि लग गई अंत में नवें दिन कामयाब हो गई और महिषासुर की धोखे से हत्या कर दिया।
ब्राह्मणों ने फिर लोगों को गुमराह किया और हत्या को देवी द्वारा सजा का नाम देकर लोगों को मूर्ख बना दिया और नौ देवियाँ बनाकर अपनी कमाई का जरिया बना दिया।
माता किसी की हत्या नहीं कर सकती है और हत्या करने वाले को पूजते नहीं है सजा दिया जाता है।
जिनके हाथों में हथियार है वे भगवान या देवी देवता नही हो सकते हैं जिन्होंने ने हत्या किया है वे हत्यारे है और हत्यारों को पूजने वाले भी दोषी है।
आस्था के नाम कर कब तक मूर्ख बने रहोगे।
तथागत गौतमबुद्ध प्रियदर्शी सम्राट अशोक और सिंबल आफ नालेज बाबा साहब डॉ आंबेडकर के विचारों को अपना कर चलो ब्रह्मणी माताओ को फेक दो सिर्फ अपनी माता-पिता का मान सम्मान दो और उनकी उचित देखभाल करो इसी में सबकी भलाई है।
सिंबल आफ नालेज बाबा साहब डॉ आंबेडकर के विचारों को अपना कर चलो बुद्ध धम्म अपनाओ 💐 शर्वश्रेषट इंसान बनो 💙🙏👩‍🎓
जय भीम जय संविधान नमो बुद्धाय🙏💙

महिषासुर के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं पर ध्रुव गुप्त सर का आलेख)

2 मिनट विलेन को तय करने का विवेक !
(नवरात्रि के मौके पर असुरराज महिषासुर के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं पर ध्रुव गुप्त सर का आलेख)

दुनिया की किसी भी संस्कृति में हत्या का उत्सव जायज़ नहीं माना जाता चाहे मरने वाला हमारा प्रबल शत्रु ही क्यों न हो। दुर्भाग्य से हम महिषासुर की हत्या का भी उत्सव मनाते रहे हैं और रावण की हत्या का भी। अभी दुर्गा पूजा के दिनों में महिषासुर की हत्या का जश्न जारी है। जैसी कि पुराणों और काल्पनिक तस्वीरों के आधार पर आम धारणा बनी या बनाई गई है, महिषासुर कोई बलवान भैंसा, दुराचारी शासक या शैतानी ताकत नहीं था। बुराईयों का प्रतीक भी नहीं। प्राचीन भारत में वह असुर जनजाति का एक लोकप्रिय नायक हुआ करता था। इतिहासकारों - डी.डी कौशांबी और देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सहित बहुत सारे शोधकर्ताओं ने पुराणों से इतर कई प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से यह नतीजा निकाला है कि महिषासुर प्राचीन काल का एक लोकप्रिय, समतावादी और पशुपालकों का आराध्य नायक था। देश के असुर जनजाति के लोगों में प्राचीन काल से ही उसके लोक कल्याणकारी और शूरवीर रूपों की अनेक कहानियां कही-सुनी जाती रही है। स्वयं पुराण भी स्वीकार करते हैं कि वह अपने समय का सबसे बड़ा आर्येतर योद्धा था। अपने विस्तार के क्रम में देवता कहे जाने वाले आर्य राजाओं ने उसे पराजित करने की कई बार कोशिशें की, लेकिन असफल रहे। उलटे महिषासुर ने ही उन्हें कई बार पराजित कर उनके स्वर्ग अर्थात उनके वैभवशाली नगरों पर अधिकार कर लिया था। 

दुर्गा और महिषासुर के बीच संग्राम के संबंध में पुराणों की कथाओं की तार्किक व्याख्या करें तो पता चलता है कि कई बार पराजित और हताश देवताओं ने अंततः इस तथ्य का पता लगा लिया कि स्त्रियों और पशुओं की रक्षा के लिए कृतसंकल्प महिष किसी भी स्थिति में उनपर हथियार नहीं उठाता। उसके चरित्र के इसी उज्जवल पक्ष का लाभ उठाते हुए देवताओं ने युद्ध में वीरांगना देवी दुर्गा को भेजकर महिषासुर को पराजित कर उसे मार डालने में सफलता हासिल की। इस युद्ध में बड़ी संख्या में असुर जनजाति के दूसरे योद्धा भी मारे गए। असुर जनश्रुतियों के अनुसार महिषासुर के पराजित समर्थकों और अनुयायियों ने असुरों के भीषण नरसंहार के पांच दिनों बाद शरद पूर्णिमा को एक विशाल सभा आयोजित की। सभा में उन्होंने अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को जीवित रखने और देवों के हाथों लुटी अपनी संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। इसी संकल्प की याद में असुर जनजाति के लोग दशहरा के पांच दिनों बाद शरद पूर्णिमा को 'महिषासुर शहादत दिवस' के तौर पर मनाते हैं। महिषासुर अपने लोगों में कितना लोकप्रिय था इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि हजारों साल बाद भी उसकी जनजाति के लोग उसकी पूजा करते हैं। बुंदेलखंड में महोबा से लगभग सत्तर किमी की दूरी पर ग्राम चौका सोरा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित एक प्राचीन महिषासुर स्मारक मंदिर भी मौजूद है। 

महिषासुर के बारे में तमाम भ्रम इस शब्द का गलत अर्थ करने की वजह से पैदा हुआ है। उसका नाम महिष और असुर शब्दों के योग से बना है। महिष का सबसे  पुराना अर्थ महा शक्तिमान है। यह 'मह' धातु में 'इषन' प्रत्यय जोड़कर बना है, जिनमें गुरूता का भाव अन्तर्निहित है। भारत में राजतंत्र के विकास के साथ उसका नया अर्थ राजा हुआ क्योंकि धरती पर राजा ही महा शक्तिमान होते थे। रानी को आज भी महीषी ही कहा जाता है। महिष को भैंसा के अर्थ में प्रयोग बाद में पुराणों और स्मृति-ग्रंथों में हुआ है। असुर शब्द का पुराना और सही अर्थ भी राक्षस या नकारात्मक शक्ति नहीं है। वैदिक कोश के अनुसार 'असुराति ददाति इति असुर' -अर्थात जो असु (प्राण) दे, वह असुर (प्राणदाता) है। संस्कृत केे प्रख्यात कोशकार वीएस आप्टे ने भी असु का अर्थ प्राण ही किया है।

अपने वर्चस्व के लिए राजाओं, कबीलों और जातियों में युद्ध हमेशा से चलता रहा है। हमारा राष्ट्र पिछले हजारों वर्षों में हजारों जातियों और हजारों संस्कृतियों के अंतर्संघर्षों और समन्वय की विराट कोशिशों से ही बना है। हमारी संस्कृति में युद्ध में जीतने वालों को ही नहीं, युद्ध में पराजित होने और मरने वाले योद्धाओं को भी सम्मान देने की परंपरा रही है। यहां देवी दुर्गा की भी पूजा होती रही है और महिषासुर की भी। राम की भी और रावण की भी। नाग जनजाति के सबसे बड़े विनाशक जनमेजय की भी और नागों के जातीय नायकों - वासुकि, कालिय और शेषनाग की भी। यही सांस्कृतिक विविधता हमारे देश की खूबसूरती है। देवी दुर्गा आर्यों की महान नायिका और महिषासुर असुर जनजाति के महान नायक रहे हैं। दोनों हमारे आदरणीय पूर्वज हैं। हमारा प्राचीन इतिहास आर्येतर जातियों ने नहीं, आर्यों अर्थात देवों के पुरोहितों द्वारा लिखा गया है। अपने आश्रयदाताओं के महिमामंडन के उद्देश्य से उनके विपक्षियों को शैतान और बुराईयों के प्रतीक के तौर पर चित्रित करना उनकी मजबूरी थी। हमारे आगे वैसी कोई विवशता नहीं। हमारे लिए वीरांगना देवी दुर्गा भी वंदनीय हैं और प्रतापी जननायक महिषासुर भी। युद्ध में मारे गए किसी भी पक्ष की हत्या का उत्सव मनाना हमारे लिए उचित नहीं।
Dhruv Gupt  sir

कविता महिषासुर

 
उल्टे सुल्टे ग्रन्थ रचदिए 
घौंट- घौंट कर याद ।
ऊँचे आसन पर जा बैठे 
फैला कर मनुवाद ।
इतिहास मिटा करके पुरखों का किया हमें बरवाद।
अजी!हम कहाँ हुए आजाद?
सदियौं से हक दबा रहे हैं ,
दीन-दलित को सता रहे हैं ।
मँदिर में बैठे मुस्टण्डे ,
ठूँस रहे धन देखो पण्डे ।
रबड़ी और मलाई खाते ,
हाय!!निठल्ले मौज मनाते ।
आरच्छण ह्रदय में कसके ,
बड़े अनौखे इनके फटके ।
पौंगा -पँथी अरे!प्रपंची 
तनिक न आती लाज ।अजी...
देवालय तहखाने वाला ,
अकूत धन पर लगा है ताला ।
मणिधारी वहाँ जमे हुए हैं ,
तिलक तृपुण्डी रंगे हुए हैं ।
कहीं पै शंकराचार्य अड़े हैं ,
कहीं पै नँग-धड़ँग पड़े हैं ।
काली करतूतैं करते हैं ,
वापू और योगी बनते हैं ।
पौधा वृच्छ कहाँ?बनपाए ,
मिले न पानी   खाद। अजी.... कोई दबँग बना ऐंठा है ,
सत्ता हथिया कर बैठा है ।
कोई धन धरती का स्वामी ,
करवाते बेगार गुलामी ।
मजदूर किसान का होतादोहन,
दीन-दलित नारी का शोषण ।
मलिनबस्तियां झुग्गी ,
झौंपड़-पट्टी कहाँ?आबाद ।
अजी...
महिषासुर हिरणच्छ कोछलसे मलसूकर छुपकर छलबल  से
शेर की खाल ओढ़ कर मारा. वीर हिरण्यकश्यप सँहारा ।
किसी का राच्छस नाम रखदिया,
किसी के सर पर सींग जड़ 
दिया ।
धोखे से राजा बन बैठे ।
पहन-पहन कर ताज ।अजी...
सदियौं से  हालत है ढीली ,
उनकी तो रातें. रँगीली ।
लाला लल्लूलाल बन गया ,
वह तो फूट में लूट कर गया । 
अब तो बहुजन विगुल बजादो जन-जन में चेतना जगादो ।
शाँन्ति -क्रान्ति की धूम मचादो ।
खुशहाली जब "विकल "
हो निर्भय सँविधान का राज।
अजी हम तब हौंगे आजाद।
अजी हम तब हौंगे आजाद।।
कवि विकल-बेअकल
(भन्ते शीलसागर)

दुर्गा कौन??



दुर्गा आठ हाथ की नही थी,दो हाथ की थी दुर्गा का जन्म कलकत्ता के  वैश्यालय मै हुआ था??

महिषासुर कौन है? 
एक मूलनिवासी राजा
दुर्गा मूर्ति बनाने के लिए बंगाल में वैश्या के घर से मिट्टी लाना जरूरी है ?? वैश्या की घर की मिट्टी के बिना दुर्गा की प्रतिमा पूजा योग्य नहीं मानी जाती है |

अब यह प्रश्न उठता है ?कि दुर्गा की मूर्ति के लिए केवल वैश्या के ही घर की मिट्टी की जरूरत क्यों ??? इसके पीछे क्या रहस्य है ???

1- महिषासुर बंगाल के सावाताल अथवा संथाल में आदिवासियों का अत्यंत बलशाली राजा था | ब्राह्मण विदेशी इसके राज्य पर कब्जा करना चाहते थे। जिसके लिए कई बार युद्ध किया | लेकिन ब्राह्मणों को हमेशा हार का ही मुँह देखना पड़ा |

2-इतिहास गवाह है कि जिसे बल से नहीं जीता जा सकता है, उसे सुरा व सुंदरी के माध्यम से जीता जा सकता है | वैसे ये ब्राह्मणों की ही शैतानी नीति है |

3- कई बार हारने के बाद ब्राह्मण महिषासुर के शक्ति को समझ गये थे |इसलिए सुरा सुंदरी वाले शैतानी नीति को अपनाया | 

4- ब्राह्मणों ने दुर्गा जो कि एक अत्यंत सुंदर वैश्या थी, को षड़यंत्र के तहत, महिषासुर को अपने मायाजाल में फाँसकर हत्या करने के लिए भेजा | 

5- दुर्गा ने 8 रात सुरा पिलाते हुए, कई नाटक करते हुए महिषासुर के साथ बिताई | नौवे रात को मौका मिलते ही इस वैश्या ने महिषासुर की हत्या कर दी |
इसीलिए दुर्गा की नवरात्रि मनाई जाती है |
चूँकि दुर्गा वैश्या थी, इसीलिए वैश्या के घर से मिट्टी लाने का रिवाज आज भी है | 

6-मूलनिवासी राजा महिषासुर की हत्या दुर्गा ने किया जिससे ब्राह्मण उस राज्य पर कब्जा करने में कामयाब हुए | इसलिए ब्राह्मणों ने मूलनिवासियों से उनके पूर्वजों की हत्यारिनी दुर्गा का पूजा ही करवा डाला | 

7-भारत के मूलनिवासी लोग आँख, अक्ल और दिमाग के इतने अंधे हैं कि उसके बारे में जानने की जरूरत नहीं समझी | बिना जाने ही हत्यारों का पूजा करना शुरू कर दिया |
किसी ने आज तक किसी भी ऐसे मनुष्य को देखा है जिसके 8 हाथ, 3 गर्दन,आधा शरीर मनुष्य का और आधा जानवर का, गर्दन हाथी का इत्यादि हो | 
आदिमानव काल में भी जाऐंगे, तब भी ऐसा किसी मनुष्य का जिक्र नहीं मिलता है | फिर ऐसे प्राणियों की पूजा कैसे शुरू हो गया |
इसका मतलब साफ है कि ब्राह्मण, मूलनिवासियों के दिमाग में इतने हावी हैं। कि उनके दिमाग में बुद्धि के जगह गोबर भर दिया है | जिससे कि खुद से सोचने और समझने की शक्ति चली गयी है, अंधभक्त हो गये हैं।

8- कई लोग ऐसे अंधभक्त है कि जानने के बावजूद भी इसे अपने बाप दादाओं की परम्परा मानकर ढोते हैं | अरे तुम्हारे बाप दादाओं से पढ़ने लिखने का अधिकार छिन लिया गया था इसलिए उन्हें जो बताया गया, मानते गये | 

तुम्हें तो पढ़ने लिखने का अधिकार है, पढ़ लिखकर भी गोबर को लड्डू मानकर,खाओगे तो पढ़ना लिखना सब बेकार है ।

आप ने इसे पढ़ने के लिए समय दिया उसका बहुत बहुत धन्यवाद । अब एक एहसान और करदो  इस संदेश को अन्य 10-20  साथियों में और भेज दो। बस यही तरीका है अपने साथियों को जागरूक करने का ।

सबूत के तोर पर स्मृति ईरानी का विडीयो सेयर सुन ले??
उन्होंने भी कुछ ऐसा ही बताया था। 

बस इतना ही कहना चाहेंगे की

#पाखंड_मिटाओ_शासन_करो

#शिक्षित_बनो_और_शिक्षित_करो

सबेरा और उजाला तब नहीं होता जब सूर्योदय होता है, उसके लिए आंखें भी खोलनी पडती है।

आप ने इसे पढ़ने के लिए समय दिया उसका बहुत बहुत धन्यवाद । अब एक एहसान और करदो  इस संदेश को अन्य 10-20  साथियों में और ग्रुप मे भेज दो। बस यही तरीका है अपने साथियों को जागरूक करने का

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हमारा अपना महिषासुर -गौरी लंकेश


एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की।

महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है। 

उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है।

यद्यपि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इसके बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं। 

यहां तक कि बी. आर. आंबेडकर और जोती राव फूले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविडियन शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की।

इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि 'माही' शब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में 'शांति कायम करे। 

अधिकांश देशज राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे।

उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था। उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोई जगह नहीं थी। 

कोई भी अपने भोजन, आनंद या धार्मिक अनुष्ठान के लिए मनमाने तरीके से अंधाधुंध जानवरों को मार नहीं सकता था। 

सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके राज्य में किसी को भी निकम्मे तरीके से जीव काटने की इजाजत नहीं थी। 

उनके राज्य में मनमाने तरीके से कोई पेड़ नहीं काट सकता था। पेडों को काटने से रोकने के लिए उन्होंने बहुत सारे लोगों को नियुक्त कर रखा था।

विजय दावा करते हैं कि महिषासुर के लोग धातु की ढलाई की तकनीक के विशेषज्ञ थे। 

इसी तरह की राय एक अन्य इतिहासकार एम.एल. शेंदज प्रकट करती हैं, उनका कहना है कि "इतिहासकार विंसेन्ट ए स्मिथ अपने इतिहास ग्रंथ में कहते हैं कि भारत में ताम्र-युग और प्राग ऐतिहासिक कांस्य युग में औजारों का प्रयोग होता था। 

महिषासुर के समय में पूरे देश से लोग, उनके राज्य में हथियार खरीदने आते थे। ये हथियार बहुत उच्च गुणवत्ता की धातुओं से बने होते थे।

लोककथाओं के अनुसार महिषासुर विभिन्न वनस्पतियों और पेड़ों के औषधि गुणों को जानते थे और वे व्यक्तिगत तौर पर इसका इस्तेमाल अपने लोगों की स्वास्थ्य के लिए करते थे।

क्यों और कैसे इतने अच्छे और शानदार राजा को खलनायक बना दिया गया? 

इस संदर्भ में सबल्टर्न संस्कृति के लेखक और शोधकर्ता योगेश मास्टर कहते हैं कि "इस बात को समझने के लिए सुरों और असुरों की संस्कृतियों के बीच के संघर्ष को समझना पडेगा"। 

वे कहते हैं कि " जैसा कि हर कोई जानता है कि असुरों के महिषा राज्य में बहुत भारी संख्या में भैंसे थीं। आर्यों की चामुंडी का संबंध उस संस्कृति से था, जिसका मूल धन गाएं थीं। जब इन दो संस्कृतियों में संघर्ष हुआ, तो महिषासुर की पराजय हुई और उनके लोगों को इस क्षेत्र से भगा दिया गया"।

कर्नाटक में न केवल महिषासुर का शासन था, बल्कि इस राज्य में अन्य अनेक असुर शासक भी थे। 

इसकी व्याख्या करते हुए विजय कहते हैं कि "1926 में मैसूर विश्वविद्यालय ने इंडियन इकोनामिक कांफ्रेंस के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक राज्य में असुर मुखिया लोगों के बहुत सारे गढ़ थे। 

उदाहरण के लिए गुहासुर अपनी राजधानी हरिहर पर राज्य करते थे।

हिडिम्बासुर चित्रदुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन करते थे।

बकासुर रामानगर के राजा थे। यह तो सबको पता है कि महिषासुर मैसूर के राजा थे। 

यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि आर्यों के आगमन से पहले इस पूरे क्षेत्र पर देशज असुरों का राज था। 

आर्यों ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया"।

मैसूर में महिषासुर दिवस पर सेमिनार, जिसमें लेखकों ने उन्हें बौद्ध राजा बताया ओर उनके अपमान का विरोध किया
आंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी मिथकों के इस चित्रण का पुरजोर खण्डन किया है कि असुर दैत्य थे। 

आंबेडकर ने अपने एक निबंध में इस बात पर जोर देते हैं कि "महाभारत और रामायण में असुरों को इस प्रकार चित्रित करना पूरी तरह गलत है कि वे मानव-समाज के सदस्य नहीं थे।

असुर मानव समाज के ही सदस्य थे"। आंबेडकर ब्राह्मणों का इस बात के लिए उपहास उड़ाते हैं कि उन्होंने अपने देवताओं को दयनीय कायरों के एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है।

वे कहते हैं कि हिंदुओं के सारे मिथक यही बताते हैं कि असुरों की हत्या विष्णु या शिव द्वारा नहीं की गई है, बल्कि देवियों ने किया है। 

यदि दुर्गा (या कर्नाटक के संदर्भ में चामुंडी) ने महिषासुर की हत्या की, तो काली ने नरकासुर को मारा। 

जबकि शुंब और निशुंब असुर भाईयों की हत्या दुर्गा के हाथों हुई।

वाणासुर को कन्याकुमारी ने मारा। एक अन्य असुर रक्तबीज की हत्या देवी शक्ति ने की। 

आंबेडकर तिरस्कार के साथ कहते हैं कि "ऐसा लगता है कि भगवान लोग असुरों के हाथों से अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को, अपने आप को बचाने के लिए भेज दिया"।

आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा। 

इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि "देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे। 

इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है। 

अपनी शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई। 

नाटक-नौटंकी के लिए अच्छी, लेकिन अंसभव सी लगने वाली इन कहानियों, से हट कर हम इस सच्चाई को देख सकते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी वर्ग ने देशज लोगों के इतिहास को तोड़ा मरोड़ा। 

इतिहास को इस प्रकार तोड़ने मरोड़ने का उनका उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना था।

महिष-दशहरा पर अयोजित मोटरसाइकिल रैली होती है 

केवल बंगाल या झारखण्ड में ही नहीं, बल्कि मैसूर के आस-पास भी कुछ ऐसे समुदाय रहते हैं, जो चामुंडी को उनके महान उदार राजा की हत्या के लिए दोषी ठहराते हैं।

उनमें से कुछ दशहरे के दौरान महिषासुर की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं। 

जैसा कि चामुंडेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीनिवास ने मुझसे कहा कि "तमिलनाडु से कुछ लोग साल में दो बार आते हैं और महिषासुर की मूर्ति की आराधना करते हैं"।

पिछले दो वर्षों से असुर पूरे देश में आक्रोश का मुद्दा बन रहे हैं। यदि पश्चिम बंगाल के आदिवासी लोग असुर संस्कृति पर विचार-विमर्श के लिए विशाल बैठकें कर रहे हैं, तो देश के विभिन्न विश्विद्यालयों के कैम्पसों में असुर विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। 

बीते साल उस्मानिया विश्विद्यालय और काकाटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने 'नरकासुर दिवस' मनाया था। चूंकि जेएनयू के छात्रों के महिषासुर उत्सव को मानव संसाधन मंत्री (तत्कालीन) ने इतनी देशव्यापी लोकप्रियता प्रदान कर दी थी कि, मैं उसके विस्तार में नहीं जा रही हूं।

महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण की क्या व्याख्या की जाए? 

क्या केवल इतना कह करके पिंड छुडा लिया जाए कि, मिथक इतिहास नहीं होता, लोकगाथाएं भी हमारे अतीत का दस्तावेज नहीं हो सकती हैं। 

विजय इसकी सटीक व्याख्या करते हुए कहते हैं कि "मनुवादियों ने बहुजनों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। 

हमें इस इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड़ को झाड़ना पडेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पडेगी।

यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं।

महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों का बढता आकर्षण बताता है कि वास्तव में यही काम हो रहा है।

(गौरी लंकेश ने यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, जो वेब पोर्टल बैंगलोर मिरर में 29 फरवरी, 2016 को प्रकाशित हुई थी)
Himanshu Kumar  की वॉल से साभार।


सब याद रखा जाए गा।


सब याद रखा जायेगा...

गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी

जन्म 1 अक्टूबर 1919 -24 मई 2000
बेहद लोकप्रिय गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी भी एक वामपंथी सिपाही थे।अपनी वामपंथी विचार धारा के कारण मजरूह सुल्तानपुरी को कई बार कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। कम्युनिस्ट विचारों के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। मजरूह सुल्तानपुरी को सरकार ने सलाह दी कि अगर वे माफ़ी मांग लेते हैं, तो उन्हें जेल से आज़ाद कर दिया जाएगा, लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी इस बात के लिए राजी नहीं हुए और उन्हें दो वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया था। जेल में रहने के कारण मजरूह सुल्तानपुरी के परिवार की माली हालत काफ़ी ख़राब हो गई थी।