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Saturday, 11 February 2023

रंगनायकम्मा - अम्बेडकर

बुर्जुआ बुद्धिजीवियों में जो कुछ खास सुधारों के लिए प्रयास करते हैं, उन्हें "उदार बुर्जुआ बुद्धिजीवी" कहा जाता है। इसलिए अम्बेडकर भी उदार बुर्जुआ बुद्धिजीवी हैं। अम्बेडकर जो मार्क्सवाद को ऐसे सिद्धान्त को जो श्रम के शोषण के उन्मूलन पर बल देता है सुअरों का दर्शन मानते थे, ऐसे बुर्जुआ बुद्धिजीवी होंगे जो मार्क्सवाद से नफरत करता है और श्रम के शोषण के संबंधों की हिमायत करता है। यदि कोई उन्हें मार्क्सवादी बुद्धिजीवी कहता है तो वह ऐसी बात है जिसे वह पसंद नही करते। यह उनका सम्मान नही अपमान करना होगा।

- *रंगनायकम्मा*
*(जाति और वर्ग: एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण)*

Thursday, 9 February 2023

वसीली कामिन्स्की का संस्मरण : मायकोवस्की मेरा हमदम, मेरा दोस्त।



अगर मायकोवस्की की तुलना उसके अन्य सभी साथियों से की जाए तो वह उनसे लाख गुना अधिक मनमोहक, आकर्षक, ज़िन्दादिल,सहृदय और दूसरों के प्रति चिन्तातुर था। उसे कविताएँ पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। वह न केवल अपनी कविताएँ पढ़ता था बल्कि हम सभी की कविताएँ पढ़ता था। कवि सिविरयानिन की कविताएँ तो वह हर समय गाता रहता था। जब भी वह उसकी कोई कविता गा कर सुनाता तो उसके बाद ऊपर से यह टिप्पणी भी अवश्य जड़ देता -- वैसे मैं सिविरयानिन से कहीं बेहतर कवि हूँ। उससे अच्छा लिखता हूँ। उदाहरण के लिए ज़रा मेरी यह कविता सुनकर देखो। इसका शीर्षक है -- 'मायकोवस्की की त्रासदी'। तुम सभी लोग मेरे इस बात से सहमत होगे कि मेरी इस कविता में बहुत दम है।

हम मायकोवस्की से कहते -- ठीक है, सुनाओ। और वह अपने बड़े-बड़े हाथों को हवा में लहराते हुए अपनी 'मखमली आवाज़' में अपनी वह नई कविता सुनाना शुरू कर देता --

ठीक है,

अब रास्ता दीजिए मुझे

यहाँ से जाने का,

मैं तो सोच रहा था

ख़ुश रहूँगा

आँखों में दमक भरे

बैठ जाऊँगा सिंहासन पर

यूनानियों की तरह आरामतलबी से।

लेकिन नहीं

ओ शताब्दी !

यह जीवन-राह बहुत लम्बी है

और मुझे मालूम है

कि दुबले हैं तेरे पैर

और उत्तरी नदियों के बाल बूढ़े सफ़ेद !

आज मैं

इस नगर को पार कर निकलूँगा बाहर

कीलों बिंधी आत्मा को अपनी

इमारतों की नुकीली छतों पर छोड़कर।

वह कविता समाप्त करके कुछ विचारमग्न-सा गहरा उच्छवास लेता और कहता --

मैं इतनी गम्भीर कविताएँ लिखता हूँ कि मुझे ख़ुद से ही डर लगने लगता है। चलो, छोड़ो ये बातें, अब कुछ हँसी-मज़ाक करते हैं। पता नहीं क्यों बड़ी बोरियत-सी हो रही है।

मायकोवस्की के चरित्र की एक मुख्य विशेषता यह थी कि उसकी मनःस्थिति बहुत जल्दी-जल्दी बदलती रहती थी। हमेशा ऐसा महसूस होता रहता था कि एक पल वह हमारे साथ है और दूसरे ही पल वह हमारे साथ नहीं है। वह स्वयं अपने भीतर ही कहीं गहरे डूब चुका है और फिर जैसे अचानक ही पुनः वापिस हमारे बीच लौट आया है।

-- अरे, तुम लोग अभी तक वैसे के वैसे बैठे हो। चलो-चलो, कुछ हंगामा करो। प्यार करो एक-दूसरे को, चूम लो, कुछ धक्का-मुक्की करो, कुछ धींगा-मुश्ती, कुछ गाली-गलौज, कुछ ऐसा करो कि बस, मज़ा आ जाए।

कभी कहता -- चलो, 'रूस्सकए स्लोवा' (रूसी शब्द) के सम्पादकीय विभाग में चलते हैं और वहाँ सम्पादक सीतिन से यह माँग करेंगे कि वह अगले ही अंक में हम सबकी कविताएँ छापे। अगर वह मना करेगा तो हम उसके केबिन के सारे शीशे तोड़ डालेंगे और यह घोषणा कर देंगे कि आज से सीतिन को उसके तख़्त से उतारा जाता है। अब पत्रिका 'रूस्सकए स्लोवा' पर हम भविष्यवादियों का अधिकार है। अब इस केबिन में मायकोवस्की बैठेगा और युवा लेखकों को उनकी रचनाओं का मानदेय पेशगी देगा।

इस तरह की कोई भी बात कहकर अपनी कल्पना पर वह बच्चों की तरह खिलखिलाने लगता और इतना ज़्यादा ख़ुश दिखाई देता,मानो उसकी बात सच हो गई हो। मायकोवस्की अक्सर इस तरह की शैतानी भरी कल्पनाएँ करता रहता था और फिर हम लोग भी उसकी इन बातों में शामिल हो जाते थे। इस तरह की कोई चुहल अभी चल ही रही होती थी कि अचानक मायकोवस्की का मूड बदल जाता और वह बेहद उदास और खिन्न दिखाई देने लगता।

कभी हम कहीं जा रहे होते कि अचानक उसकी योजना बदल जाती -- चल वास्या, ज़रा हलवाई की दुकान पर चलते हैं। कुछ समोसे और मिठाइयाँ बँधवा कर माँ के पास चलेंगे। अचानक हमें आया देखकर माँ और बहनें सभी कितनी ख़ुश होंगी। मैं ख़ुशी-ख़ुशी उसकी बात मान लेता और हम उसके घर पहुँच जाते। कहना चाहिए कि वह अपनी माँ अलिक्सान्द्रा अलिक्सियेव्ना को और अपनी दोनों बहनों-- ओल्गा और ल्युदमीला को बेहद प्यार करता था। निश्चय ही उसके बचपन की स्मृतियाँ ही उनके बीच इस प्रगाढ़ स्नेह व आत्मीय सम्बन्धों का आधार थीं।

अपने बचपन के तरह-तरह के किस्से वह हमें सुनाता था। कभी यह बताता कि उसे जार्जिया के उस बगदादी गाँव में, जहाँ वह पैदा हुआ था, अपने बचपन में कुत्तों के साथ घूमना कितना प्रिय था। वह कहता -- मैं अपने कुत्तों के साथ गाँव के बाहर जंगल में चला जाता और देर तक किसी पेड़ की छाया में लेटा रहता। खासकर मुझे यह बात बहुत अच्छी लगती कि कुत्ते मेरी चौकीदारी कर रहे हैं, बल्कि कहना चाहिए कि उन दिनों मैं सिर्फ़ इसी वजह से जंगल में घूमने जाता था कि मेरे कुत्ते मेरे सुरक्षा-दस्ते का काम करते थे और मैं इसमें गर्व महसूस करता था।

मुझे यह देखकर भी आश्चर्य होता था कि मायकोवस्की का रूप अपने घर पर, अपनी माँ और बहनों के सामने बदलकर एकदम 'छुई-मुई' की तरह हो जाता था। जैसे वह कोई बेहद शर्मीला, शान्त, ख़ूबसूरत और कोमल नन्हा-सा बच्चा हो, जो बहुत आज्ञाकारी और अनुशासन-प्रिय है। साफ़ पता लगता था कि उसके परिवार के लोग उसे बेहद चाहते हैं और जब भी वह घर में होता है, वहाँ एक उत्सव का सा माहौल बना रहता है। घर पर एक पुत्र और एक भाई की भूमिका में और बाहर पीली कमीज़ पहने एक हुड़दंगी नवयुवक व एक बहुचर्चित कवि की भूमिका में उसे देखकर मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि उसके भीतर जैसे दो मायकोवस्की रहते हैं, एक दूसरे से एकदम भिन्न दो आत्माएँ, जिनमें परस्पर रूप से हमेशा संघर्ष चलता रहता है।

• 

जीवन का चक्र अपनी गति से घूम रहा था। हम ओदेस्सा में थे और वहाँ से हमें किशिन्योफ़ के लिए रवाना होना था। मायकोवस्कीन जाने कहाँ फँसा रह गया था। हम बेचैनी से उसके आने का इन्तज़ार कर रहे थे। तब मायकोवस्की को एक लड़की मरीया अलिक्सान्द्रव्ना से प्रेम हो गया था। कहना चाहिए कि वह उन दिनों उसके प्यार में बुरी तरह से डूबा हुआ था। उसकी दशा पाग़लों जैसी हो चुकी थी। दाढ़ी और बाल बढ़ गए थे। एक ही जोड़ी कपड़े पिछले कई दिनों से उसके बदन पर चढ़े हुए थे। उसे न नहाने का होश था न खाने-पीने की चिन्ता। वह यह समझ नहीं पा रहा था कि अपने इस दमघोंटू प्यार को लेकर वह कहाँ जाए और क्या करे। सत्रह वर्षीय मरीया की गिनती उन गिनी-चुनी लड़कियों में होती थी, जो न केवल सौन्दर्य की दृष्टि से अत्यन्त मोहक और चित्ताकर्षक थीं बल्कि मानसिक स्तर पर भी नए क्रान्तिकारी दर्शन और विचारों में गहरी रुचि लेती थीं। छरहरी, गरिमामयी, हरिण-सी आँखोंवाली, बेहद नशीली, सुन्दर और स्निग्ध उस लड़की ने युवा कवि मायकोवस्की की कल्पना-छवियों को पूरी तरह से घेर लिया था --

अब मैं सिर्फ़

इतना भर जानता हूँ

कि तुम हो मोनालिसा

जिसे मुझे चुराना है

बीस वर्षीय मायकोवस्की को पहली बार प्रेम हुआ था। यह उसकी पहली प्रेमानुभूति थी और वह उसे सम्हाल नहीं पा रहा था। मरीया के साथ हुई अपनी पहली मुलाक़ात के बाद उसके प्यार में डूबा, विषण्ण और विचलित मायकोवस्की किसी घायल पक्षी की तरह पंख फड़फड़ाता, लेकिन इसके साथ-साथ बेहद ख़ुश, सुखी और बार-बार मुस्कराता हमारे कमरे में आया। किसी विजेता की तरह बेहद पुलकित और उल्लसित होकर वह बार-बार केवल यही शब्द दोहरा रहा था -- वाह! क्या लड़की है, वाह! क्या लड़की है। उन दिनों कभी-कभी यह महसूस करते हुए कि शायद ही उस लड़की की तरफ़ से भी उसे वैसा ही भावात्मक उत्तर मिलेगा यानी इस प्रेम में अपनी असफलता की पूर्वानुभूति के साथ-साथ अवसाद में डूबा वह बेचैनी से कमरे में इधर से उधर चक्कर लगाता रहता। उन्हीं दिनों उसने अपने बारे में ये पंक्तियाँ लिखी थीं --

इन दिनों मुझे आप पहचान नहीं पाएँगे

यह विशाल माँसपिण्ड आहें भरता है

आहें भरता है और छटपटाता है

मिट्टी का यह ढेला आख़िर क्या चाहता है

चाहता है यह बहुत कुछ चाहता है

उन दिनों हम वास्तव में यह नहीं समझ पाते थे कि उस लापरवाह, निश्चिन्त और बेफ़िक्र मायकोवस्की का यह हाल कैसे हो गया? उसमें अप्रत्याशित रूप से ये कैसा विचित्र परिवर्तन आ गया है? वह न जाने किस उधेड़बुन में डूबा रहता है? कभी अपने बाल नोचता है तो कभी दीन-दुनिया से बेख़बर फ़र्श की ओर ताकता बैठा रहता है। कभी-कभी पिंजरे में बन्द किसी शेर की तरह अपने कमरे में घूमता रहता है और बुड़बुड़ाता रहता है -- क्या किया जाए? क्या करूँ? कैसे रहूँ?

प्रेम में व्यथित सोफ़े पर पड़े दोस्त को देखकर अपने चश्मे के भीतर से झाँकते हुए हमारे साथी बुरल्यूक ने उससे कहा -- तू बेकार दुखी हो रहा है। देख लेना, कुछ नहीं होगा, कोई फल नहीं निकलेगा तेरे इन आँसुओं का। जीवन का पहला प्यार हमेशा यूँ ही गुज़र जाता है।

यह सुनकर मायकोवस्की दहाड़ने लगा -- कैसे कुछ नहीं होगा, क्यों फल नहीं निकलेगा? दूसरों का पहला प्यार यूँ ही गुज़र जाता होगा, मेरा नहीं गुज़रेगा। देख लेना।

बुरल्यूक ने फिर से अपनी बात दोहराई और उसे सान्तवना देने की कोशिश की। पर उसे 'मिट्टी के ढेले' यानी मायकोवस्की को तो प्रेम-मलेरिया हो गया था --

आप सोच रहे हैं

सन्निपात में है, कारण है मलेरिया

हाँ, यह ओदेस्सा की बात है

चार बजे आऊँगी

मुझसे तब बोली थी मरीया

फिर आठ बजा

नौ बजा

दस बज गए

वह अपने मन की शान्ति गवाँ चुका था। मरीया से मुलाक़ात की वह पहली ख़ुशी अब आकुलता, छटपटाहट और भयानक पीड़ा में बदल चुकी थी --

माँ

तेरा बेटा ख़ूब अच्छी तरह बीमार है

माँ

आग लगी हुई है उसके दिल में

उसकी बहनों को बता दे, माँ

ल्यूदा और ओल्या को बता दे तू

अब उसके सामने कोई रास्ता नहीं है

चूँकि तब तक हम ओदेस्सा में आयोजित सभी काव्य-गोष्ठियों में अपनी कविताएँ पढ़ चुके थे और हमें वहाँ से तुरन्त ही किशिन्योफ़ रवाना होना था, इसलिए उसकी बेचैनी देखकर हमने मायकोवस्की को यह सुझाव दिया कि उसे जल्दी से जल्दी मरीया के साथ अपने सम्बन्धों की सारी गाँठें खोल लेनी चाहिए और अकेले यूँ तड़पने से अच्छा तो यह है कि सारी बात साफ़ कर लेनी चाहिए। और फिर अचानक ही बात साफ़ हो गई --

अचानक

हमारे कमरे का दरवाज़ा चरमराया

मानो दाँत किटकिटाए हों किसी ने

एक धमक के साथ कोई भीतर घुस आया

चमड़े के दस्तानों को

अपने हाथों में मसलते हुए

उसने मुझे अपना यह फ़ैसला सुनाया

क्या मालूम है तुम्हें यह बात

शादी कर रही हूँ

मैं कुछ ही दिनों बाद

मायकोवस्की यह सुनकर बौखला गया था। उसने चलने की घोषणा कर दी और हम उसी शाम रेलगाड़ी में बैठकर किशिन्योफ़ की तरफ़ रवाना हो गए।

रेल के भोजन-कक्ष में हम तीनों दोस्त बहुत देर तक चुप बैठे रहे। हम तीनों ही बहुत असहज महसूस कर रहे थे और शायद मरीया के बारे में ही सोच रहे थे। आख़िर दवीद दवीदाविच बुरल्यूक मे महाकवि पूश्किन की कविता की दो पंक्तियाँ पढ़कर उस चुप्पी को तोड़ा --

पर मैं करती हूँ किसी दूसरे को प्यार

जीवन-भर रहूँगी सदा उसकी वफ़ादार

मायकोवस्की धीमे से मुस्कुराया मानो उसे मुस्कराने के लिए भी पूरा ज़ोर लगाना पड़ रहा हो। उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। वह कई दिन तक उदास रहा। किशिन्योफ़ से हम निकालाएफ़ गए और फिर वहाँ से कियेव। रेल से कियेव जाते हुए रास्ते मेंमायकोवस्की देर तक खिड़की से बाहर झाँकता रहा। अचानक वह गुनगुनाने लगा --

यह बात है ओदेस्सा की

ओदेस्सा की...

बाद में यही दोनों पंक्तियाँ उसकी उस ख़ूबसूरत लम्बी कविता में पढ़ने को मिलीं, जिसे सारी दुनिया 'पतलूनधारी बादल' के नाम से जानती है, हालाँकि उसने पहला इसका शीर्षक 'तेरहवाँ देवदूत' रखा था।

शुरू से ही मायकोवस्की का जीवन रेल के किसी तंग डिब्बे की तरह ही बहुत तंगहाल और घिचपिच भरा रहा। इसलिए मौक़ा मिलते ही उसने खुले और व्यापक भविष्य की ओर एक झटके में वैसे ही क़दम बढ़ाए जैसे बोतल में बन्द किसी जिन्न को अचानक ही आज़ाद कर दिया गया हो --

मैं देख रहा हूँ उसे

समय के पहाड़ पर चढ़ते हुए

किसी और को वह दिखाई नहीं देता

कीव में मायकोवस्की पूरी तरह से अपनी नई लम्बी कविता की रचना में डूबा हुआ था। वह उस कविता को 'किसी रॉकेट-क्रूजर की तरह' गतिवान, आलीशान और इतना सफल बना देना चाहता था कि दुनिया दाँतों तले उँगली दबा ले और उसे हमेशा याद रखे।

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लगातार होने वाली गुत्थम-गुत्था और लड़ाई-झगड़ों से थोड़ा थके हुए दिखाई दे रहे बीस वर्षीय मायकोवस्की ने हम लोगों के सामने प्रस्ताव रखा -- चलो दोस्तो ! तिफ़लिस चलते हैं। वह मेरा शहर है। शायद दुनिया का अकेला ऐसा शहर, जहाँ मेरे साथ कोई झगड़ा-फ़साद नहीं होगा। वहाँ के लोग नए कवियों को सुनना बहुत पसन्द करते हैं और बड़े मन से मेहमाननवाज़ी करते हैं। हमने उसकी बात मान ली और उसके साथ जाने के लिए तैयार हो गए।

मार्च 1914 के अन्त में हम तीनों दोस्त (मायकोवस्की, बुरल्यूक और मैं) तिफ़लिस के लिए रवाना हो गए और वहाँ ग्राण्ड होटल में जाकर रुके। हमें होटल के स्वागत-कक्ष में ही छोड़कर मायकोवस्की तुरन्त गायब हो गया और क़रीब आधा घण्टे बाद जब फिर से नमूदार हुआ तो उसके साथ धूप में तपकर लाल दिखाई दे रहे जार्जियाई नवयुवकों का एक पूरा झुण्ड था। ये सब उसके पुराने दोस्त थे, उन दिनों के दोस्त, जब वह कुताइस्सी में स्कूल में पढ़ता था। होटल का हमारा वह बड़ा-सा कमरा खिले हुए चेहरों और चमकती आँखों वाले बेफ़िक्र नौजवानों की चीख़ों, कहकहों और मस्तियों से भर गया। उनकी बड़ी-बड़ी बशलीकी टोपियाँ पूरे कमरे में यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी थीं। मायकोवस्की एक-एक करके उनसे गले मिल रहा था और अपनी रूसी परम्परा के अनुसार उन्हें चूम रहा था। वह उनसे बचपन के अन्य दोस्तों का हालचाल पूछ रहा था और बेहद ख़ुश था। बात करते-करते कभी अचानक वह जार्जियाई लिज़्गीन्का नृत्य करने लगता तो कभी ज़ोर-ज़ोर से अपनी कोई कविता पढ़ने लगता। वह हम दोनों से भी बार-बार कहता -- ज़रा अपनी वह कविता तो सुनाना इन्हें, जिसे सुनकर हॉल में बैठे श्रोता खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे थे या जिसे सुनकर औरतें रोने लगी थीं या फिर ऐसी ही कोई और बात। संक्षेप में कहूँ तो हमें यह लग रहा था कि मायकोवस्की वास्तव में अपने घर, अपने देस पहुँच गया है, अपने गहरे दोस्तों के बीच।

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हॉल ठसाठस भरा था। गर्मी इतनी थी कि ऐसा लग रहा था कि मानों किसी भट्ठी में बैठे हुए हों। मायकोवस्की चौड़ी बाहों वाला'सूर्यास्त की रश्मी-छटा' जैसा रंग-बिरंगा कुरता पहने वहाँ भीड़ के बीच खड़ा था और लोगों को किसी मदारी की तरह तीखी व ज़ोरदार आवाज़ में नए जीवन-दर्शन, नई विचारधारा और उस नई विश्व-दृष्टि के बारे में बता रहा था जो आने वाले दिनों में न केवल कला को, बल्कि समाज और जीवन के सभी क्षेत्रों को तथा विश्व की सभी जातियों को गहराई से प्रभावित करेगी। किसी नेता की तरह जीवन के नए रूपों के निर्माण से सम्बन्धित विचारों की भारी चट्टानों को लोगों की ओर ढकेलता हुआ वह जैसे भविष्य के नीले आकाश में झाँक रहा था। और यह काम वह इतनी सहजता और आसानी के साथ कर रहा था मानों मन को भली लगने वाली शीतल बयार बह रही हो। हर दो-तीन मिनट में हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था।

नवयुवक होने के बावजूद नई सामाजिक व्यवस्था के बारे में मायकोवस्की के विचार काफ़ी परिपक्व और प्रौढ़ थे और उसकी कविताएँ भी गम्भीर, संजीदा तथा शिल्प और सौन्दर्य की दृष्टि से परिपूर्ण। यहाँ तिफ़लिस में बचपन के अपने दोस्तों के बीच, उनके द्वारा दिए गए गरमा-गरम समर्थन और हार्दिक स्वागत-सत्कार के बाद, मायकोवस्की जैसे पूरी तरह से खिल उठा था। उसने जैसे अपना पूरा रूप, पूरा आकार ग्रहण कर लिया था और वह हिमालय की तरह विशाल हो गया था।

मायकोवस्की और उसके दोस्तों के साथ हम दोनों जार्जिया में चारों ओर फैली पर्वतमाला के सबसे ऊँचे पहाड़ 'दवीद' को देखने गए। दवीद की चोटी पर पहुँचकर ऐसा लगा मानों हम अन्तरिक्ष में तैर रहे हों। चारों तरफ़ पहाड़ ही पहाड़। एक नई मनोरम दुनिया हमारे सामने उपस्थित थी। इस अपार विस्तार को देखकर मायकोवस्की चहकने लगा था -- वाह भई वाह! देखो, कितना विशाल हॉल है सामने। इस ऊँचाई पर पहुँचकर तो वास्तव में पूरी दुनिया को सम्बोधित किया जा सकता है। ठीक है मियाँ दवीद, अब हमें भी ख़ुद को बदलना ही पड़ेगा और तुम्हारे जैसा ऊँचा क़द अपनाना होगा।

उस वसन्त में हमें रोज़ ही कहीं न कहीं जाना होता था। कभी किसी के घर भोजन करने जाना है तो कभी किसी कहवाघर या चायख़ाने में हमारा काव्य-पाठ है। कभी स्थानीय बाज़ार में घूमने जाना है तो कभी किसी पार्क में कोई सभा। तिफ़लिस के दुकानदार अपनी दुकानों में हमें बैठाकर हमसे अपनी कविताएँ सुनाने का अनुरोध करते। मयख़ानों में हमें कविताएँ सुनाने के लिए बुलाया जाता। निश्चय ही हमें यह सब बहुत अच्छा लग रहा था और हम यहाँ आकर बहुत ख़ुश हुए थे।

अक्सर ऐसा होता था कि हम सड़क पर चले जा रहे हैं और सामने से कोई नौजवान या नवयुवती आ रही है। मायकोवस्की उसे रोक लेता और पूछता था -- कहाँ जा रहे हो? अरे, वहाँ क्या करोगे? चलो छोड़ो, वहाँ क्या जाना। हमारे साथ चलो। वापिस लौट चलो। हम वहाँ पर कविता पढ़ेंगे। तुम भी पढ़ना या फिर हमारी कविता ही सुनना। और लोग उसका यह अनुरोध मान लेते थे और हमारे साथ ही घूमने लगते थे। जार्जियाई भाषा मायकोवस्की के लिए मातृभाषा रूसी की तरह ही अपनी थी। वह एकदम जार्जियाइयों की तरह जार्जियाई भाषा बोलता था। इसलिए जब-जब हम उसे जार्जियाई बोलते देखते, हमारी गर्दनें गर्व से तन जातीं।

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तिफ़लिस की अनेक सभाओं और गोष्ठियों में काव्य-पाठ करने के बाद हम कुताइस्सी पहुँचे। कुताइस्सी -- जहाँ मायकोवस्की ने अपने परिवार के साथ अपना बचपन गुज़ारा था। जहाँ उसके पिता वन-संरक्षक के पद पर कार्यरत थे। जहाँ मायकोवस्की ने स्कूली-शिक्षा पाई थी। यहीं वह 1905 की पहली रूसी क्रान्ति के बाद जार्जियाई क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आया था। यहीं 1906 में उसके पिता का देहान्त हुआ था और इसके तुरन्त बाद यहीं से वह मास्को गया था।

अब मायकोवस्की कुताइस्सी की गलियों में घूम रहा था। अपने बचपन के दोस्तों से मिल रहा था। उन्हें अपनी बाँहों में लपेट रहा था और चूम रहा था। अपने बचपन के खेलों, हरकतों और शैतानियों को याद कर रहा था। वह ख़ुद भी हँस रहा था और हमें भी हँसा रहा था। हम उसके साथ उसका स्कूल देखने गए। बच्चों ने स्कूल की खिड़कियों से सफ़ेद रुमाल हिलाकर हमारा स्वागत किया। स्कूल से लौटते हुए उसने देखा कि सामने से एक गधा चला आ रहा है। उसे देखकर वह एकदम ख़ुश हो गया और किलकारियाँ मारने लगा। हमसे बोला -- अगर मैं पहले जैसा बच्चा होता तो इस गधे पर चढ़े बिना नहीं मानता और दूर तक इसकी सवारी करता। लेकिन अब तो मेरा शरीर पहाड़ जैसा है। अगर मैं इस पर चढ़ भी गया तो पहली बात तो यह है कि यह गधा ही दिखाई नहीं देगा, दूसरे मेरे पैर भी ज़मीन पर घिसटेंगे।

मायकोवस्की के दोस्तों ने उसके कुताइस्सी-आगमन की ख़ुशी में एक बड़ी-सी पार्टी दी। जार्जियाई परम्परा के अनुसार उन्होंने मेहमानों का स्वागत करते हुए भेड़ के सींगों को खोखला करके बनाए गए विशेष तरह के 'रोक' नामक गिलासों को भर-भरकर बेतहाशा शराब पी, जार्जियाई लोकगीत गाए, कविताएँ पढ़ीं, भाषण दिए, स्थानीय लोकनृत्य किए और आसमान में गोलियाँ छोड़ीं। जब मास्को लौटने का समय आया तो वे लोग हमें छोड़ ही नहीं रहे थे। बड़ी मुश्किल से हज़ार बहाने बनाकर हमने लौटने की इजाज़त पाई। आख़िर किसी तरह लौटकर हम तीनों बुद्धू घर को आए यानी मास्को पहुँचे।

• 

उन दिनों हम लोग यह महसूस करने लगे थे कि देश में चल रही वर्तमान शासन-व्यवस्था अब कुछ ही दिन की मेहमान रह गई है।मायकोवस्की कहा करता -- जल्दी ही मज़दूर-क्रान्ति होगी और तब मैं अपने जल्वे दिखाऊँगा। हम सब एक ही आग में जल रहे थे। इसलिए उसकी इस तरह की बातें सुनकर हमें आश्चर्य नहीं होता था। प्रथम विश्व-युद्ध के उन कठिन फ़ौजी-राष्ट्रभक्तिपूर्ण दिनों में, जब अपना सब कुछ 'ज़ार व मातृभूमि की सेवा में' समर्पित करने की बात की जा रही थी, मायकोवस्की हर समय बड़े गर्व के साथ अपनी ये पँक्तियाँ सुनाता घूमता था --

पहाड़ों के उस पार से

वह समय आता मैं देख रहा हूँ

जिसे फिलहाल कोई और देख नहीं पाता

किसी की नज़र वहाँ तक नहीं जाती

भूखे-नंगे लोगों की भीड़ लिए

आएगा सन् सोलह का साल

क्रान्ति का काँटों भरा ताज लिए

ये पँक्तियाँ उसकी उस नई लम्बी कविता 'तेरहवाँ देवदूत' ('पतलूनधारी बादल') का ही एक अंश थीं, जिस पर वह उन दिनों दुगने-तिगुने उत्साह के साथ काम कर रहा था।

मक्सीम गोरिकी उन दिनों विदेश से लौटे थे। वे पहले ऐसे बड़े लेखक थे, जिन्होंने तब हमारा खुलकर समर्थन किया था। एक पत्रिका में उन्होंने लिखा था --

"रूसी भविष्यवाद जैसी कोई चीज़ नहीं है। सिर्फ़ चार कवि हैं -- ईगर सिविरयानिन, मायकोवस्की, बुरल्यूक और वसीली कामिनस्की। इनके बीच निस्सन्देह ऐसे प्रतिभाशाली कवि भी हैं, जो आगे चलकर बहुत बड़े कवि बन जाएँगे। आलोचक इन्हें फटकारते हैं जबकि वास्तव में ऐसा करना ग़लत है। इन्हें फटकारना नहीं चाहिए बल्कि इनके प्रति आत्मीयता दिखानी चाहिए। हालाँकि मैं समझता हूँ कि आलोचकों की इस फटकार में भी इनके भले और अच्छाई की इच्छा ही छिपी है। ये युवा हैं पर गतिहीन नहीं हैं। वे नवीनता चाहते हैं। एक नया शब्द। और निस्सन्देह यह एक उपलब्धि है।

उपलब्धि इस अर्थ में है कि कला को जनता तक पहुँचाना ज़रूरी है। आम आदमी तक, भीड़ तक, और ये लोग यह काम कर रहे हैं, हालाँकि काम करने का इनका तरीका बहुत भद्‍दा है, लेकिन उनकी इस कमी को नज़र‍अन्दाज़ किया जा सकता है।

हंगामे-भरे गीत गाने वाले ये गायक, जो पता नहीं ख़ुद को भविष्यवादी कहना क्यों पसन्द करते हैं, अपना छोटा-सा या बहुत बड़ा काम कर जाएँगे, जिससे एक दिन सारे रास्ते खुल जाएँगे। चुप रहने से तो बेहतर है कि शोर हो, हंगामा हो, चीख़ें हों, ग़ालियाँ हों और हो जोश-ख़रोश-उन्माद।

अभी यह कहना बहुत कठिन है कि आगे चलकर ये लोग किस रूप में ढलेंगे, लेकिन मन कहता है कि ये नई तरह के युवक होंगे, नई तरह की ताज़ा आवाज़ें। हमें इनका बेहद इन्तज़ार है और हम ये आवाज़ें सुनना चाहते हैं। इन्हें ख़ुद जीवन ने पैदा किया है, हमारी वर्तमान परिस्थितियों ने। ये कोई गिरा दिया गया गर्भ नहीं हैं, बल्कि ये तो वे बच्चे हैं जिन्होंने ठीक समय पर जन्म लिया है।

मैंने हाल ही में उन्हें पहली बार देखा। एकदम जीवन्त और वास्तविक। और मेरा ख़याल है कि वे उतने भयानक भी नहीं हैं, जैसाकि वे ख़ुद को दिखाते हैं या जैसा उन्हें आलोचक प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए मायकोवस्की को ही लें। वह एकदम नवयुवक है, केवल बीस वर्ष का। वह चीख़ता-चिल्लाता है, उद्दण्ड है, लेकिन निस्सन्देह उसके भीतर, कहीं गहराई में, प्रतिभा छिपी हुई है। उसे मेहनत करनी होगी, सीखना होगा और फिर वह वास्तव में बहुत अच्छी कविताएँ लिखेगा। मैंने उसका कविता-संग्रह पढ़ा है और उसकी कुछ कविताओं ने मुझे बेहद प्रभावित भी किया है। वे वास्तव में सच्चे मन से लिखी गई कविताएँ हैं।"

• 

उन दिनों हमें लगातार जगह-जगह कविता पढ़ने के लिए बुलाया जाता था और हम सबके बीच मायकोवस्की ऐसा लगता था मानो युद्ध के मैदान में तमाम फ़ौजी गाड़ियों के बीच कोई टैंक धड़धड़ाता हुआ तेज़ी से आगे बढ़ रहा हो। वह गरजने लगा था। उसे देखकर आश्चर्य होता था। सभी कवियों में वह अकेला ऐसा कवि था जिसने सबसे पहले युद्ध के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इससे उन देशभक्त लेखकों के बीच रोष की लहर दौड़ गई जो दुश्मन पर रूस की विजय को देखने को लालायित थे। लेकिन मायकोवस्की सब बाधाओं को धकेलता हुआ टैंक की तरह आगे बढ़ रहा था।

एक बार बरीस प्रोनिन के बोहिमियाई तहख़ाने में बने 'आवारा कुत्ता' क्लब में, जहाँ हम जैसे बहुत से लेखक-कलाकार अक्सर इकट्ठे होते थे, मायकोवस्की ने बड़े कठोर शब्दों में युद्ध का विरोध किया और अपनी कविता पढ़ी --

औरतों और पकवानों के प्रेमियों

तुम्हारे लिए

क्या तुम्हारे सुख को बनाए रखने के लिए

हम अपनी जानें गवाँ दें?

इससे तो अच्छा यह होगा कि मैं

किसी शराबख़ाने में रण्डियों को देने लगूँ

अनानास की शराब 'आबे-हयात'

बड़ा भारी झगड़ा खड़ा हो गया। वहाँ उपस्थित एक विशिष्ट सरकारी मेहमान ने मायकोवस्की पर बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं। यह तो अच्छा हुआ कि एक भी बोतल उसे नहीं लगी। तभी हम सब उस मेहमान पर टूट पड़े और उसे वहाँ से निकाल बाहर किया। हमने मायकोवस्की से वैसी ही और कविताएँ पढ़ने को कहा और वह हम लोगों की सुरक्षा में कविताएँ पढ़ने लगा --

यह क्या माँ?

सफ़ेद पड़ गई हो तुम, बिल्कुल सफ़ेद

जैसे देख रही हो तुम सामने ताबूत

छोड़ो इसे, भूल जाओ

भूल जाओ, माँ, तुम उस तार को

मौत की ख़बर लाया है जो

ओह, बन्द करो बन्द कर दो आँखें अख़बारों की !

'पतलूनधारी बादल' का पाठ वहाँ इतना सफल रहा कि उस दिन से मायकोवस्की को प्रतिभाशाली और दक्ष कवि माना जाने लगा। यहाँ तक कि उसके शत्रु भी उसकी इन ऊँचाइयों को बड़े विस्मय और आतंक के साथ देखते थे। और स्वयं कवि इतने शानदार ढंग से यह कविता पढ़ता था मानो वह सारी मानवजाति का प्रतिनिधि हो। उस तरह से कविता का पाठ हमारी दुनिया में शायद ही कभी कोई कर पाएगा। काव्य-पाठ करने का वह ढंग कवि मायकोवस्की के साथ ही हमेशा के लिए काल के गाल में समा गया। मेरा विश्वास है कि उसकी इस कविता का वैसा ही पाठ करना किसी अन्य व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि इसके लिए ख़ुद मायकोवस्की होना ज़रूरी है। वह ख़ुद भी यह बात कहता था --देख लेना, जब मैं मर जाऊँगा, कोई भी एकदम मेरी ही तरह यह कविता नहीं पढ़ पाएगा।

हमारी दोस्ती के बीस वर्ष के काल में मैंने हज़ारों बार मायकोवस्की को कविता पढ़ते हुए सुना था और हर बार मुझे ऐसा अप्रतिम सुख मिलता था, ऐसा नशा-सा चढ़ जाता था, जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उसके दैत्यनुमा वज़नी शब्दों में जैसे कोई विराट आत्मा-सी प्रविष्ट हो जाती थी। जब पहली बार मैंने उसकी 'पतलूनधारी बादल' कविता का पूरा पाठ सुना, तब उसकी उम्र केवल बाईस वर्ष की थी। मैं उसकी तरफ़ बेहद अचरज से देख रहा था मानो दुनिया का आठवाँ आश्चर्य देख रहा हूँ। मैं उसको सुन रहा था और सोच रहा था -- क्या यह वही किशोर है, जिससे मैं चार वर्ष पहले मिला था। मुझे इस जादू पर विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन यथार्थ यही था। द्रुतगति के साथ हुए कवि के इस विकास को समझ पाना बेहद कठिन था। मेरे लिए तो और भी कठिन क्योंकि मैं दिन-रात उसके साथ, उसके आसपास ही रहता था। अब बाईस वर्षीय मायकोवस्की वह पुराना किशोर कवि नहीं, बल्कि एक वयस्क सुविज्ञ पुरुष था, जो महत्त्वपूर्ण और ठोस कामों में निमग्न था।

• 

फ़रवरी-क्रान्ति के बाद मायकोवस्की ने बुरल्यूक को मेरे साथ लगा दिया था ताकि हम लोग अस्थाई बुर्जुआ सरकार का विरोध करते हुए सर्वहारा क्रान्ति के पक्ष में प्रचार के काम को तेज़ गति दे सकें। हम लोगों ने दिन-रात प्रचार शुरू कर दिया। एक राजनीतिक वक्ता के रूप में भी मायकोवस्की को सुनना मेरे लिए आश्चर्यजनक ही था। इस क्षेत्र में भी उसकी प्रतिभा नई ऊँचाइयों को छू रही थी। उसने सभी कलाकारों से आह्वान किया कि वे सर्वहारा क्रान्ति के नायक मज़दूर-वर्ग को अपनी कला का विषय बनाएँ। मायकोवस्की के स्वरों में 1908का (तब वह कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य था) वह बोल्शेविक फिर से बोलने लगा था। उसने जनता से अपील की --

आप सब

अपनी-अपनी मशीनों पर पहुँचें

अपने-अपने दफ़्तरों में

अपनी-अपनी खदानों में पहुँचें, भाइयो

इस धरती पर हम सभी

सैनिक हैं

नए जीवन को रचने वाली

एक ही फ़ौज के

अब उस पुराने विद्रोही मायकोवस्की को पहचानना मुश्किल था, जो भविष्यवादी आन्दोलन का प्रवक्ता था और पीली कमीज़ में घूमा करता था। अब वह बालिग़ हो गया था, सामान्य कपड़े पहनता था, सिर्फ़ राजनीतिक घटनाओं के बारे में बातचीत करता था और ख़ुद को बोल्शेविक कहता था। फ़रवरी-क्रान्ति के बाद के उस दौर में हम लगभग रोज़ ही क्रान्ति-समर्थक कवियों के रूप में विभिन्न सभाओं में कविताएँ पढ़ने जाया करते थे और हर सभा में मायकोवस्की यह घोषणा किया करता था -- दोस्तो, बहुत जल्दी ही सर्वहारा-क्रान्ति होने वाली है। तब यह बुर्जुआ सरकार ख़त्म हो जाएगी।

रूसी भाषा से अनुवाद : Anil Janvijay आदरणीय अनिल जनविजय जी के द्वारा।



Wednesday, 8 February 2023

कम्‍युनिस्‍ट - पाब्‍लो नेरुदा


हम जिन्‍होंने अपनी आत्‍मा पत्‍थर में
लोहे में, कठोर अनुशासन में प्रतिष्ठित की,
हम सिर्फ प्‍यार में जीवित रहे,
और लोग खूब जानते हैं कि हमने अपना रक्‍त बहाया
जब ग्रहण के उदास चन्‍द्रमा ने
तारे का रूप विकृत किया।

अब तुम देखोगे कौन हैं हम और क्‍या सोचते हैं हम।
अब तुम देखोगे हम क्‍या हैं और क्‍या होंगे।

हम पृथ्‍वी की शुद्ध चाँदी हैं,
आदमी की सच्‍ची धातु।
हममें सागर की निरंतर गति है,
हममें सारी आशा की शक्ति मूर्तिमान होती है।
अंधकार का एक क्षण हमें अंधा नहीं बना पाता।
कुछ भी पीड़ा के बिना हम मृत्‍यु का वरण करेंगे।

(अनुवाद:चन्‍द्रबली सिंह)

अलितेत पहाड़ियों की शरण मे- तिखोन स्योमुश्किन


 उपन्यास, "अलितेत पहाड़ियों की शरण में" सोवियत संघ के सुदूर कोने में बसे हुए चुकोत्स्क प्रदेश से संबंधित उपन्यास है। कुछ समय पहले नष्टप्राय होने जा रही चुकची जाति के नवजीवन प्रवेश की यह कहानी है।

'चुकोत्स्क में,"  उपन्यासकार तीखोन स्योमुश्किन कहते हैं, " मैं कई वर्ष रहा। बारहसिंगों और कुत्तों की गाड़ियों पर मैंने उसके असीम हिमावृत विस्तारों में 20,000 से अधिक किलोमीटर की यात्रा की। मैं धुएं से भरे चुकची यारंग और तंबू में रहा और बरफ़ के बीच सोने वाले थैले में सोया; फिर ऐसे फ्लैटों में मैंने निवास किया जो सेंट्रल हीटिंग, बिजली और यहां तक कि टेलीफ़ोन से भी सुसज्जित थे।

 "इस पुस्तक के सभी चरित्र वास्तविक जीवन से लिये गये हैं। याराक, वामचो और आये जैसे कई चुकची नौजवानों से और लोस और जुकोव जैसे सोवियत देश के संदेशवाहकों से मैं मिला। स्थानीय जनता को लूटकर मालदार बनने वाले और विदेशी निवासियों के एजेंटों का करने वाले काम अलितेत जैसे चुकची कुलक भी मैंने देखे..."

-पुस्तक के ब्लर्ब से


इस फ़िल्म पर बनी फिल्म का लिंक

Tuesday, 7 February 2023

स्ट्राइक’ 1925 मूवी- आइज़ेंस्ताइन


1924 में, प्रोलेतकुल्त थिएटर ने, जिससे जुड़कर कई नाटकों के लिए डिज़ाइनिंग और निर्देशन का काम आइज़ेंस्ताइन ने किया था, उन्हें 'सर्वहारा अधिनायकत्व की ओर' फ़िल्म–श्रृंखला के आठ प्रसंगों/कड़ियों में से एक के निर्देशन की ज़िम्मेदारी सौंपी। इसी का नतीजा 'स्ट्राइक' फ़िल्म के रूप में सामने आया जिसने सोवियत सिनेमा की दिशा बदल दी। 

स्ट्राइक (रूसी: Cтачка, अनुवादित। स्टैचका) 1925 में सोवियत संघ में सर्गेई आइज़ेंस्ताइन द्वारा बनाई गई मूक फिल्म है। यह आइज़ेंस्ताइन की पहली पूर्ण लंबाई वाली फीचर फिल्म थी, और वह उस वर्ष बाद में द बैटलशिप पोटेमकिन बनाने जा रहे थे। यह प्रोलेटकल्ट थियेटर द्वारा अभिनय किया गया था, और छह भागों से बना था। यह बदले में, सात- भाग श्रृंखला का एक हिस्सा होने का इरादा था, जिसका शीर्षक टुवर्ड्स डिक्टेटरशिप (सर्वहारा वर्ग) था, जिसे अधूरा छोड़ दिया गया था। आइज़ेंस्ताइन का प्रभावशाली निबंध, मोंटाज ऑफ अट्रैक्शन स्ट्राइक के प्रोडक्शन और प्रीमियर के बीच लिखा गया था।

फिल्म में 1903 में ज़ारकालीन रूस में एक कारखाने के श्रमिकों द्वारा हड़ताल और उसके बाद के दमन को दर्शाया गया है। मजूदर वर्ग की ऊर्जा और प्रचण्ड शक्ति के साथ ही शासक वर्गों के जासूसों, उकसावेबाज़ों और सशस्त्र दस्तों की भूमिका को फ़िल्म में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

यह फिल्म अंत में एक दृश्य के लिए सबसे प्रसिद्ध है जिसमें हड़ताल के हिंसक दमन को मवेशियों के वध के फुटेज के साथ क्रॉस-कट किया गया है, हालांकि फिल्म में कई अन्य बिंदु हैं जहां जानवरों को विभिन्न व्यक्तियों की स्थितियों के रूपकों के रूप में उपयोग किया जाता है।

फिल्म में एक अन्य विषय व्यक्तिवाद के विरोध में सामूहिकता है जिसे पश्चिमी फिल्म के सम्मेलन के रूप में देखा गया था। फ़िल्म वैयक्तिक नायक के चलन को तोड़ती हुई, पहली बार मज़दूर वर्ग को सामूहिक नायक के रूप में उपस्थित करती है। स्ट्राइक और बैटलशिप पोटेमकिन दोनों के लिए सामूहिक प्रयास और पात्रों का समूहीकरण केंद्रीय बिंदु था। 

इस फ़िल्म में पहली बार आइज़ेंस्ताइन ने मोन्ताज की अवधारणा को व्यवहार में लागू किया। फ़िल्म का लिंक: 

Monday, 6 February 2023

बदलते दौर में सिनेमा के आईने में मजदूर वर्ग

''साथी हाथ बंटाना, एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना...'' ...... बदलते दौर में सिनेमा के आईने में मजदूर वर्ग

समाजशास्त्र और नृशास्त्र के विद्वानों का मत है कि वानर से नर के विकास में श्रम की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही है. कालांतर में मानव के सामूहिक श्रम के परिणामस्वरूप ही सभ्यता और संस्कृति का निर्माण हुआ. बिना श्रम के मानव जीवन के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. सभ्यता के शरुआत से ही समाज के विकास में मजदूर की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही है. बात चाहे कृषि की हो, या उद्योग-धंधों की या किसी अन्य क्षेत्र की, मजदूरों के परिश्रम के बिना हर कार्य असंभव प्रतीत होता है. पर ये भी उतना ही कड़वा सच है कि सभ्यता के शुरुआत से ही यही वर्ग सबसे अधिक शोषण और दमन का शिकार हुआ है. कभी भी इनके श्रम को न उचित सम्मान दिया गया और न ही उन्हें अपने श्रम का उचित मूल्य मिला. ये सदा ही समाज के सबसे निचले पायदान पर रहते आये है. पूँजीवाद के आगमन से पहले, सामंती समाज में तो इन्हें दास या अर्ध दास के समान रखा जाता था और उन्हें काम के बदले में कोई मजदूरी भी नहीं दी जाती थी. पूँजीवाद के आगमन के बाद हालाँकि मजदूर दास या अर्ध दासता से तो मुक्त हो गए, पर शोषण का चक्र नहीं रूका. उन्हें फैक्ट्रियों में १९-२० घंटे तक बेहद कम मजदूरी पर काम कराया जाता था. उनके रिहायशी क्षेत्र बेहद गंदे और बदबूदार हुआ करते थे. उनके श्रम को महता नहीं दी जाती थी. उस समय के आर्थशास्त्री उत्पादित वस्तुओं के मूल्य में मजदूरी की अहमियत को कम करके आंकते थे और उस वस्तु के उत्पादन और मूल्य का पूरा श्रेय पूजीपतियों को दिया करते थे. इसी समय दुनिया के पटल पर मार्क्स का प्रादुर्भाव होता है. उन्होंने अर्थशास्त्र की परम्परागत सोच के विपरीत उत्पादित वस्तुओं के मूल्य के निर्धारण के लिए अपने क्रांतिकारी सिद्धांत '' मूल्य का श्रम सिद्धांत'' ( लेबर थ्योरी ऑफ़ वैल्यू) को प्रस्तुत किया और वस्तुओं के उत्पादन और अतिरिक्त मूल्य में श्रम के योगदान को निर्विदाद रूप से प्रमाणित किया. उन्होंने अपने मित्र और सहयोगी फेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर अपनी प्रसिद्द पुस्तिका ''कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो '' में दुनिया के मजदूरों को एक होकर संघर्ष करने का नारा दिया. इससे मजदूरों की चेतना में जबरदस्त उभार आया और उन्होंने अपनी बेहतरी के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया. उन्होंने सबसे पहले काम के घंटे को ८ घंटे करने की मांग लेकर हड़ताल शुरू की.पर शासनकर्ताओं ने जो शुरुआत से उनके विद्रोह को ताकत के बल पर शुरू से ही दबाते आ रहे हैं, ने मांग को मानने से इंकार कर दिया. फिर १ मई १८८६ को अमेरिका में मजदूरों ने सामूहिक रूप से हड़ताल की.इस हड़ताल का व्यापक ससार हुआ और सरकार को उनकी बात माननी पड़ी. उसी के बाद से १ मई को मजदूर दिवस मनाये जाने की परम्परा शुरू हुई. चूँकि सिनेमा समाज का दर्पण है तो सिनेमा के शुरुआत से ही संवेदनशील फिल्मकार मजदूरों की समस्याओं को समय-समय पर फिल्माते रहे हैं. आज १ मई है यानि ''मजदूर दिवस'', तो क्यों नहीं इस बात का जायजा लिया जाए कि बदलते दौर में सिनेमा में मजदूर वर्ग को किस ढंग से दिखाया गया है

सिनेमा की शुरुआत १८९५ में ल्युमेर बंधुओं द्वारा की गयी मानी जाती है और अपनी पहली ही फिल्म में उन्होंने अपने पिता की फैक्ट्री से निकल रहे मजदूरों को ही फिल्माया. इस तरह सिनेमा और मजदूर वर्ग का सम्बन्ध पहली फिल्म से हो गया. शुरूआती दौर में मजदूरों पर डी.डब्ल्यू. ग्रिफ्फिथ की ''कार्नर इन व्हिट''(१९०९) को एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है जिसमें उन्होंने गेहूं के खेतों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों की स्थिति और बिचौलियों की लूट को जीवन्तता के साथ दिखाया है. इसके बाद उन्होंने अपनी फिल्म ''कंट्रास्ट'' में कोयले के खदानों में काम करने वाले मजदूरों के शोषण और उत्पीडन को दर्शाया है. शुरूआती दौर में प्रसिद्ध रूसी निर्देशक सर्गेई आइजेस्तैन ने ''बैटलशिप पोटेमकिन'' और ''स्ट्राइक'' जैसी क्लासिक फिल्मों का निर्माण किया जिसमें मजदूरों के वीरतापूर्ण संघर्ष को बड़े ही खूबसूरत अंदाज में दर्शाया है. चार्ली चैपलिन ने भी '' सिटी लाइट'' और ''मॉडर्न टाइम्स'' में मजदूरों और मिल मालिकों के सम्बन्ध को दर्शाया. '' मॉडर्न टाइम्स'' के निर्माण के बाद तो वे अपने समाजवादी विचारों के कारण ऍफ़.बी.आई के वाच लिस्ट में आ गए. पर बाद में हॉलीवुड में हाईड कोड के लागू होने के बाद मजदूरों की स्थिति को लेकर फिल्म का निर्माण रूक सा गया, पर वार्नर ब्रदर ने ४० के दशक के अंत में ट्रक ड्राइवरों को पर ''दे ड्राइव बी नाईट'' और फिर '' क्लैश बी नाईट'' बनाकर इस जड़ता को तोडा. 

इसी बीच ३० के दशक में यूरोप में ज्यां रेनुआ और मार्सेल कार्नी जैसे ''पोएटिक रियलिज्म'' की शुरुआत करने वाले निर्देशकों ने मजदूरों और मालिकों के संबंधों को लेकर ''द क्राइम ऑफ़ मोसे'' और ''ला जोर सा लेव'' जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्में बनायी जो आज न सिर्फ क्लासिक का दर्जा पा गयी है, बल्कि ३० के दशक में यूरोप में मजदूरों की स्थिति का प्रमाणिक दस्तावेज भी मानी जाती है. ४० के दशक में इटली में ''नियो रियलिज्म '' की शुरुआत हुई जिसके सबसे प्रमुख हस्ताक्षर थे- इतालवी निर्देशक वित्तोरियो डी सिका. इनके द्वारा निर्देशित फिल्म त्रयी ''शू शाइन'', जिसमें कि एक अनाथ लड़के की कहानी कही गयी है, '' बाइसिकल थीफ'', जो कि एक बेरोजगार युवक की कहानी है, और ''उम्बेर्तो डी '', जो कि एक बृद्ध पेन्शनयाफ्ता की कहानी है, को फिल्म इतिहास में क्लासिक मानी जाती है. हर वो फिल्मकार जो अपनी फिल्मों में समाज के इन शोषित तबकों के यथार्थ को फिल्माना चाहता है, उनके लिए ये तीन फ़िल्में बाइबिल के समान हैं. उधर जापान में अकिरा कुरासोवा ने ''ड्रंकन एंजेल'' और ''स्ट्रे डॉग'' में जापान के गरीब मजदूरों को दिखाया है तो केंजी मिज़ोगुची ने ''द विक्ट्री ऑफ़ वुमन'' और ''स्ट्रीट ऑफ़ शेम'' में महिला मजदूरों की दयनीय स्थिति और पितृसत्तात्मक समाज को निरुपित किया है.हॉलीवुड में मैकार्थी युग में एक बार फिर से मजदूरों के थीम को लेकर फ़िल्में बनाने का निर्माण रुक गया जो कि ६० मके दशक में ही फिर से प्राम्भ हुआ. ''थे मौली मगुइरेस'', '' नार्मन रे'', ''ग्रपेस ऑफ़ रैथ'', ''९ टू ५'', '' ऑफिस स्पेस'','' वर्किंग गर्ल्स'', ''क्लर्क'','' द अपार्टमेंट'', ''ब्रॉडकास्ट न्यूज़'', ''स्विमिंग विथ शार्क्स'' इत्यादि फिल्मों का निर्माण हुआ. पर नव उदारवाद के आगमन के बाद या तो मजदूरों के थीम को लेकर फ़िल्में बननी लगभग बंद हो गयी या जो भी फ़िल्में बनी उनमें मालिकों के पक्ष को ही मजबूती से रखा गया.  

भारत में फिल्मों की शुरुआत दादा साहेब फाल्के की फिल्म ''राजा हरिश्चंद्र'' (१९१३) से मानी जाती है. शुरुआत में ज्यादातर फ़िल्में पौराणिक कहानियों पर ही बने. ३० के दशक में बोलती फिल्मों के शुरुआत के बाद सामाजिक फिल्मों का निर्माण बड़े पैमाने पर होने लगा और इस क्रम में फिल्मकारों ने मजदूरों की स्थिति पर भी फ़िल्में बनायी.  ३० के ही दशक के मध्य में मशहूर कथाकार मुंशी  प्रेमचंद फिल्मों में अपना भाग्य आजमाने मुंबई आए. उन्होंने मुंबई के मिल मजदूरों की स्थिति को देखकर एक कहानी लिखी जिस पर फिल्म बनी ''गरीब मजदूर'' जो कि १९३४ में रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस परमजदूरों की उमड़ती भीड़ के चलते काफी सफल रही. इसके बाद १९३७  में किसानों की दयनीय स्थिति को दर्शाती फिल्म '' किसान कन्या'' आई. आज़दी के जंग के दौरान चेतन आन्नद ने मजदूरों को केन्द्र में रखकर "नीचा नगर" (1946)का निर्माण किया तो ख्वाजा अहमद अब्बास ने " धरती के लाल"(1946) जैसी यथार्थवादी फिल्म बनायी. अब्बास आजादी के बाद भी "राही","धरती की पुकार" जैसी प्रगतिशील फिल्मों का निर्माण करते रहे. आजादी के कुछ ही साल के भीतर  विमल राय की क्लासिक फिल्म ''दो बीघा जमीन'' (१९५३) आई जिसमें आज़ादी के तुरंत बाद किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति को दर्शाया गया है. ये फिल्म इटली के नव यथार्थवादी फिल्मों से प्रेरित है. फिल्म में एक किसान शम्भू ( बलराज साहनी) की कहानी है जो महाजन के कर्ज को चुकाने के लिए शहर जाकर रिक्शा मजदूर बन जाता है, पर कठोर श्रम करने के बावजूद पर कर्ज चुकाने में नाकाम रहता है और उसकी जमीन महाजन कर्ज के एवज में कब्ज़ा कर मिल मालिक को बीच देता है. फिल्म  एक साथ किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति और किसानों का गाँव से विस्थापित होकर शहर की पलायन कर मजदूर बन जाने की गाथा है और आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है. बी.आर.चोपड़ा की ''नया दौर'' (१९५६) में मजदूर और मशीन के बीच के संघर्ष को दिखाया गया है और श्रम की महत्ता पर जोर दिया गया है. इसी फिल्म में फिल्माया गया गीत '' साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना..'' मजदूर एकता के लिए प्रेरणा श्रोत बन गया. १९५७ में आई फिल्म व्ही शांताराम की '' दो आँखें बारह हाथ'' हालाँकि मजदूरों और मिलमालिकों के थीम पर आधारित नहीं है, पर उसमें पूंजीवादी और सामंतवादी समाज के चलते कैसे किसान और मजदूर अपराध करने को विवश हो जाते हैं और कैसे उन्हें अगर श्रम करने के लिए एक आदर्श माहौल दिया जाय तो तो वे सुधर कर एक अच्छे इंसान बन सकते हैं, को बड़े ही कलात्मक अंदाज में दिखाया गया है. फिल्म में एक सुधारवादी और प्रगतिशील जेलर आदिनाथ ने ६ दुर्दांत अपराधियों के जेल से निकालकर एक फार्म पर ले जाते हैं और सम्मानजनक तरीके से श्रम करने अवसर मुहैय्या कराके उनको सुधारने का कार्य शुरू करते हैं. कई कठिनाइयों के बाद उनका तरीका सफल होता है जब वे दुर्दांत अपराधी सुधर कर उस फार्म में लहलहाती फसल को उपजाते हैं. हालाँकि फिल्म के अंत में उन्हें बचाते हुए आदिनाथ की मौत हो जाती है. फिल्म का एक गीत '' ए मालिक तेरे बन्दे हम..'' आज भी बेहद लोकप्रिय है. १९५९ में आई फिल्म ''पैगाम'' में मजदूरों और मिल मालिकों के बीच के संघर्ष को लेकर बनी है जिसमें मुख्य भूमिका दिलीप कुमार और राजकुमार ने निभाई है. फिल्म का एक गीत ''इंसान को इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा..'' बेहद लोकप्रिय हुआ. 
 
१९७३ में आई ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ''नमकहराम'' जिसमें मजदूरों और मिल मालिक के बीच अपने-अपने हितों को लेकर चल रहे संघर्ष को काफी विस्तार से दिखाया गया है. विक्रम (अमिताभ बच्चन), जो कि एक मिल मालिक का बेटा है, और सोमनाथ ( राजेश खन्ना) दोस्त हैं. इसी बीच विक्रम का मिल मालिक पिता ( ओम शिवपुरी) बीमार पड़ते हैं तो विक्रम को मिल चलाना पड़ जाता है. मिल में हड़ताल हो जाती है और उसे समाप्त करने के लिए अपने पिता के कहने पर विक्रम को मजदूर नेता ( ए.के.हंगल) से माफ़ी मांगनी पड़ जाती है. विक्रम अपमान की अग्नि में जलता हुआ अपने दोस्त सोमनाथ को सारा हाल कह डालता है. फिर सोमनाथ उस मजदूर नेता को सबका सिखाने के इरादे से विक्रम के मिल में मजदूर बन कर आ जाता है और देखते-देखते उसे हटाकर खुद मजदूर नेता बन जाता है. पर एक बार मजदूरों की दयनीय स्थिति से रूबरू होने के बाद सोमनाथ के विचारों में परिवर्तन होने लगता है. दोनों दोस्तों के बीच अब दुश्मनी हो जाती है. सोमनाथ अपने दोस्त विक्रम को समझाना चाहता है कि ये दो दोस्तों की लड़ाई न होकर दो वर्गों के बीच का संघर्ष है, पर विक्रम नहीं समझता. पर जब उसे पता चलता है कि उसका मिल मालिक पिता सोमनाथ को मरवाने के लिए गुंडे को भेज चूका है तो विक्रम ने उसे बचने के लिए पूरा जोर लगा दिया, पर सोमनाथ बच नहीं पाता है. विक्रम अपने पिता को सबक सिखाने के इरादे से उसकी हत्या को आरोप खुद पर लेकर जेल चला जाता है. फिल्म में समाजवादी विचारों को बेहद कलात्मकता और यथार्थवादी ढंग से दिखाया गया है. फिल्म के गीत जैसे '' दिए जलते हैं..'', '' मैं शायर बदनाम..'', '' नदिया से दरिया...'' इत्यादि काफी हिट हुए थे और आज भी संगीत प्रेमियों द्वारा बेहद चाव से सुने जाते हैं. १९७५ में यश चोपड़ा की फिल्म ''दीवार'' में भी कई दृश्य मजदूरों पर फिल्माए गए हैं. आनद वर्मा ( सत्येन कप्पू) एक मजदूर नेता है जिसे मिल में हड़ताल के बाद मिल मालिक के गुंडों के द्वारा उसके परिवार का अपहरण कर ब्लैक मेल किया जाता है. वह अपने परिवार को बचाने के लिए मजदूरों के हितों कि बलि चढ़ा देता है. गुस्से में मजदूरों की भीड़ उसे गद्दार कह कर अपमानित करती है. वह शहर छोड़कर चला जाता है. फिर एक दिन लोगों ने उसके बड़े बेटे विजय(अमिताभ बच्चन) के हाथों पर ''मेरा बाप चोर है'' लिख डालते हैं. विजय के मन में पोरे समाज के लिए नफरत फ़ैल जाती है. बाद में जब वह डॉक में कुली बन जाता है तो उसने गुंडों की रंगदारी के खिलाफ विद्रोह कर दिया और कुलियों का नेता बन गया. इसके बाद से उसका कुली से डॉन बनने की सफ़र की शुरुआत होती है. वहीँ दूसरी ओर उसका भाई रवि (शशि कपूर) पुलिस इंस्पेक्टर बन जाता है और फिर शुरू होता है भाइयों के बीच संघर्ष जिसमें अपने बड़े बेटे से बेहद प्रेम करने के बावजूद माँ (निरूपा राय) अपने छोटे बेटे का साथ देती है.फिल्म में अमिताभ का एक प्रसिद्ध संवाद है-'' मैं फेंके गए पैसे आज भी नहीं उठाता'' जो समाज में श्रम को लेकर तिरस्कार के प्रति उसके क्रोध को बखूबी दिखाता है.

यश चोपड़ा ने ही १९७९ में खान मजदूरों की दयनीय स्थिति और १९७५ में चासनाला में हुए भयंकर दुर्घटना जिसमें खदान मालिकों की लापरवाही से ४०० से भी अधिक मजदूरों की मौत हो गयी थी, को लेकर फिल्म ''काला पत्थर'' बनायीं. फिल्म में खदान मालिकों के मुनाफा कमाने की लालच और मजदूरों की दयनीय हालत को काफी यथार्थवादी ढंग से दिखाया गया है. विजय (अमिताभ बच्चन), एक नेवल ऑफिसर है, जो कि ये सोचकर कि उसका जहाज डूब चूका है, जहाज छोड़कर चला आता है, पर जहाज डूबता नहीं है और ड्यूटी छोड़कर भाग आने के शर्म से वह शहर छोड़कर एक खदान में मजदूर बनकर काम करने लगता है. यहीं रवि (शशि कपूर) इंजिनियर बनकर आता है और खदान के मालिक (प्रेम चोपड़ा) को बताता है कि खदान में सुरक्षा के उपाय नहीं के बराबर हैं और कभी भी दुर्घटना घात सकती है. पर लालची खदान मालिक मजदूरों की सुरक्षा पर कोई पैसा खर्च करना नहीं चाहता है. विजय इसका विरोध करता है, पर तभी खान में दुर्घटना घात जाती है जिसमें विजय विजय रवि और मंगल (शत्रुघ्न सिन्हा) की सहायता से अधिकांस मजदूरों की जान बचाने में कामयाब हो जाता है. १९८३ में बी.आर.चोपड़ा के बेटे रवि चोपड़ा ने दिलीप कुमार को लेकर फिल्म ''मजदूर'' बनायीं. दीनानाथ (दिलीप कुमार) एक मजदूर नेता हैं जिन्होंने बोनस को लेकर मिल के मालिक के खिलाफ हड़ताल कर दिया. मिल का मालिक हीरालाल मांग को तो मान लेता है पर शर्त ये रखता है कि वो माफ़ी मांग लें. दीनानाथ बजाए माफ़ी मांगने के अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं और अपने दोस्त अभियंता के साथ मिलकर एक टूटी-फूटी मिल खरीदकर खुद एक मिल खोलते हैं जहाँ उन्होंने मिल मालिक और मजदूरों के बीच एक आदर्श सम्बन्ध स्थापित करते हैं. फिल्म यथार्थवादी न होकर आदर्शवादी है जहाँ वर्गों के बीच सहयोग पर बल दिया गया है. यही सन्देश फिल्म ''पैगाम'' में भी दिया गया था. ९० के दशक में एक बार फिर कोयला खदानों में मजदूरों की स्थिति को लेकर निर्देशक राकेश रोशन ने शाहरुख़ खान को लेकर फिल्म ''कोयला'' बनाई . 

पर ९० के दशक में ही भारत में नव उदारवाद का आगमन होता है और एक आक्रमक उपभोक्तावादी मध्यम वर्ग का उदय होता है जिसके लिए किसान-मजदूर मायने नहीं रखते हैं और जो परदे पर रंग-बिरंगे फैशनेबुल कपडे पहने नव धनाढ्य वर्ग के वर्ग के प्रतिनिधि नायक-नायिकाओं को एक्सोटिक लोकेशन में नाचते-गाते, प्यार करते देखना चाहता है. फिर तो ऐसी ही फिल्मों की भरमार हो गयी. ऐसी फिल्मों में यदा-कदा अगर मजदूर वर्ग को दिखाया भी गया तो नकारात्मक भूमिकाओं में. अक्सर इन फिल्मों में मजदूर  नेताओं को विलेन के रूप दिखाया गया. या अगर सकारत्मक रूप में दिखाया भी गया तो फिल्मों का सन्दर्भ कुछ दूसरा था जैसे कि ''मसान'' और ''पीपली लाइव''. इसी बीच बाल मजदूरों कि समस्याओं को लेकर ''स्टान्ली का डिब्बा'', '' चिल्लर पार्टी'', ''पाठशाला'' इत्यादि कुछ अच्छी फ़िल्में भी बनी है. पर फिल्मों में मजदूरों के हाशिये पर चले जाने का एक दूसरा कारण है ९० के दशक में फिल्म नगरी मुंबई के आतंरिक संरचना में आया जबरदस्त बदलाव. शहर के बेटरी भागों में स्थित मिल बंद हो गए और उनकी जगह पर बड़े-बड़े माल और होटलों का निर्माण हो गया. तो जाहिर है मजदूरों का पलायन शहर के बाहर हो गया. इस तरह वे फिल्म निर्मातों और निर्देशकों की नज़रों से ओझल हो गए. पर नज़रों से ओझल होने का मतलब ये नहीं है कि समाज में उनकी भूमिका समाप्त हो गयी या उनका शोषण होना बंद हो गया है. बल्कि अब फैक्ट्री के परंपरागत मजदूरों के अलावा बड़े पैमाने पर कॉल सेन्टर में काम करने वाले या ऑफिस में काम करने वाइट कॉलर मजदूर भी शोषण का शिकार हो रहे हैं. ऐसे समय में जब श्रम कानून में सुधारों के नाम पर बड़े संघर्ष के बाद अर्जित मजदूरों के अधिकारों को छिना जा रहा है,उम्मीद यही करनी चाहिए कि निर्माता-निर्देशक इनकी समस्याओं पर ध्यान देते हुए एक बार फिर से मजदूर और मजदूरी के थीम पर अच्छी फिल्मों का निर्माण करना प्राम्भ कर देंगे और ये हर हर संवेदनशील निर्मात-निर्देशकों का कर्तव्य भी है. इसी के ''मजदूर दिवस'' की शुभकामनाएँ अपने सभी साथियों को देने के साथ में इस आलेख को समाप्त करता हूँ.

Aditya Das


मशहूर फिल्म 'बैटेलशिप पोतेमकिन

मशहूर फिल्म 'बैटेलशिप पोतेमकिन' का एक दृश्य शायद आपको याद हो। सीढ़ियों पर ऊपर से जार की सेना मजदूरों का कत्लेआम करती आगे बढ़ रही है। एक छोटा बच्चा अपने प्राम में सीढ़ियों पर लुढक रहा है क्योकि उसकी माँ को गोली लग गयी है। यह दृश्य 'ओडेसा' में फिल्माया गया था, जो इस वक़्त यूक्रेन का महत्वपूर्ण शहर है। 
इसी शहर पर इस वक़्त रूस की सेना भयानक बमबारी कर रही है। 
एक समय था जब यूक्रेन और रूस दोनों के मजदूर साथ मिल कर रूसी जार से लड़ रहे थे। 'बैटेलशिप पोटेमकिन' उसी युद्ध का हिस्सा था।
1917 की क्रांति के बाद यूक्रेन, जार्जिया, उज्बेकिस्तान......के मजदूर रूसी मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर श्वेत आतंकवाद यानी अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी.... की सम्मिलित सेनाओं के खिलाफ लड़ रहे थे.
उस वक़्त मजदूरों के इंटरनेशनल में जब रूस और जर्मनी के कामरेडों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया तो पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था. [उस वक़्त रूस और जर्मनी के बीच वही सम्बन्ध था जो आज भारत पाक के बीच है] यह अंतरराष्ट्रीयतावाद का दौर था.
आज लगभग 100 साल बाद स्थिति एकदम उलट है. यूक्रेन और रूस का मजदूर एक दूसरे पर बन्दूक ताने खड़े हैं. यूक्रेन अमेरिका की गोद में बैठ कर रूस के खिलाफ अमेरिका की रणनीतियों को लागू कर रहा है. पुतिन लेनिन की आलोचना कर रहा है कि लेनिन ने उत्पीड़ित राष्ट्रों को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया होता तो आज वह यानी पुतिन जार का सच्चा उत्तराधिकारी होता. अभी भी पुतिन का सपना रूस को जारशाही में तब्दील करने का ही है.
अमेरिका भूखे भेड़िये की तरह सोवियत रूस से टूटने वाले सभी पूर्वी योरोप के देशों को अपने आगोश में यानी अपने सैन्य संगठन नाटो में लेता जा रहा है, और इस तरह रूस की घेरेबंदी करता जा रहा है. इस वक़्त नाटो की सेनायें एकदम रूस की सीमा पर हैं. रूस की सीमा से लगे 14 में से 5 देश नाटो के सदस्य हो चुके हैं. यूक्रेन भी जल्द ही नाटो का सदस्य बनने वाला है. रूस चाहता है कि नाटो का सदस्य बनने से पहले यूक्रेन से उन क्षेत्रो को अपने प्रभाव में ले लिया जाय [उन्हें 'स्वतंत्र' घोषित करके या अपने मे मिलाकर] जहाँ रूसी जनसँख्या ज्यादा हो, ताकी भविष्य में यूक्रेन के नाटो में जाने पर नाटो और रूस के बीच एक बफर ज़ोन बना रहे. इसी रणनीति के तहत रूस ने 2014 में क्रीमिया को यूक्रेन से अलग करके रूस में मिला लिया था.
अमेरिका इन भूतपूर्व समाजवादी देशों को नाटो में लाने के लिए पिछले दशको में यहाँ 'ओरेंज क्रांति' के माध्यम से सत्ता पलट करवा कर रूस समर्थित या तटस्थ सरकारों को उखाड़ कर अमेरिका समर्थित सरकारें बिठा रहा है.
2014 से पहले यूक्रेन में रूस समर्थित सरकार थी. अमेरिका ने अथाह पैसा फेकते हुए और 'सीआईए' का इस्तेमाल करते हुए यूक्रेन में रूस समर्थित सरकार का तख्ता पलट करवाया और अपनी कठपुतली सरकार बिठाई. रूस ने इसी की प्रतिक्रिया में यूक्रेन पर हमला कर क्रीमिया को अपने कब्जे में ले लिया. इसे विस्तार में जानना हो तो 'ओलिवर स्टोन' की मशहूर डॉक्युमेंट्री 'यूक्रेन ऑन फायर' देखी जा सकती है.
ठीक इसी तरह प्रशांत महासागर में अनेक देशों और द्वीपों पर सैनिक अड्डे बनाकर चीन को भी लगातार घेरने की रणनीति पर अमेरिका काम कर रहा है. लगभग 3 लाख अमेरिकी सेना यहाँ तैनात है. अनेक परमाणु बम से लैस मिसाइल चीन की ओर रूख किये हुए है. 'जान पिल्जर' ने अपनी फिल्म 'वार ऑन चाइना' में इसे विस्तार से दिखाया है.
ठीक इसी तरह रूस को घेरे हुए नाटो की सेनायें अपने परमाणु मिसाइलो को रूस की ओर किये हुए है. ऐसी परिस्थिति में चीन और रूस भी पिछले दो दशको से लगातार अपनी युद्ध क्षमता को बढ़ा रहे है. और दुनिया एक बार फिर से तबाही की ओर बढ़ रही है.
इस पर भारत का स्टैंड क्या है? भाजपा सरकार जिस तरह से हिन्दू-मुस्लिम राजनीति में मगन है, उससे भारत की विदेश नीति लगभग ख़त्म हो चुकी है. या यो कहें कि भारत की घरेलू नीति ने उसकी विदेश नीति को निगल लिया है. बचा खुचा काम चैनलो के हवाले कर दिया गया है. चैनलो को महज सनसनी और अपने एजेंडे से मतलब है. हां, उन्हें जरूर इस बात का दुःख है कि पुतिन ने भारत से बिना पूछे यूक्रेन पर हमला क्यो किया.
भावी परमाणु युद्ध पर नज़र रखने वाली संस्था The Doomsday Clock का कहना है की हम मध्य रात्रि से महज 100 सेकंड दूर हैं. 
हम पढ़ते आये हैं कि समय हमेशा आगे जाता है। लेकिन आज शायद समय को 'पीछे' ले जाने की जरूरत है, उस चौराहे तक पीछे, जहां से हमने गलत रास्ता पकड़ लिया था।

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