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Sunday, 7 May 2023

Godi Media Moordabad



Godi media moordabad,
Their loyalty can't be had.
They spew lies with every breath,
Their words are a form of death.

They serve their masters with no shame,
Truth and justice are not their aim.
They distort facts and spread hate,
Their agenda is to manipulate.

But we won't be fooled by their game,
Their deceit and lies we'll proclaim.
We'll stand for truth and justice always,
And expose their lies in every way.

Godi media moordabad,
Their betrayal won't go unclad.
We'll fight for a free and fair press,
And their lies we'll always address. 


*गोदी मीडिया मुरादाबाद*

गोदी मीडिया मुरादाबाद,
उनकी वफादारी नहीं ली जा सकती।
वे हर सांस के साथ झूठ उगलते हैं,
उनके शब्द मृत्यु का रूप हैं।

वे बिना लज्जा के अपने स्वामियों की सेवा करते हैं,
सत्य और न्याय उनका लक्ष्य नहीं है।
वे तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं और नफरत फैलाते हैं,
उनका एजेंडा हेरफेर करना है।

लेकिन हम उनके खेल से मूर्ख नहीं बनेंगे,
उनके छल और झूठ का हम प्रचार करेंगे।
हम हमेशा सच और न्याय के लिए खड़े रहेंगे,
और उनके झूठ का हर प्रकार से पर्दाफाश करो।

गोदी मीडिया मुरादाबाद,
उनका विश्वासघात खुला नहीं रहेगा।
हम एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस के लिए लड़ेंगे,
और उनके झूठ को हम हमेशा संबोधित करेंगे।

Pseudo Beti Bachao



Pseudo Beti Bachao, the hollow cry
Used by those who truth defy
Chasing consensual couples with hate
Killing on unconfirmed grounds, sealing fate

Love jihad, a fake scare
Used to justify violence, unfair
Kanganas, Khans, Kapoors in a row
With Prime Time debaters, the show

But where are they now, in this hour?
As Indian daughters raise their voice, with power
Complaining of harassment by a powerful chief, MP
And the police, their actions beyond belief

The communal drowsiness, must be shed
To see the reality of daughters being led
Into the darkness of fear and distress
By those who profess to be their protector and address

But Sonu Sood, the reel life villain
Shows what true heroism can instill in
Voicing and standing for the oppressed
Amidst the chaos, where the cries haven't ceased

Oh, wake up from this vote craving trance
And take a look at this horrific circumstance
Where daughters are harassed, even under media light
And justice seems nowhere in sight

Pseudo Beti Bachao, a mere slogan
Unless backed by action, not just a token
For every daughter in this great land
Deserves safety and security, strong and grand.

Friday, 5 May 2023

मार्क्स और अपने जीवन को याद करते हुए (Reminiscences of Marx and Engels)

"1852 में ईस्टर के मौक़े पर, हमारी छोटी बच्ची, फ्रेंज़िस्का को खांसी हुई. तीन दिन तक, वह ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलती रही. उसकी हालत बिकट रूप से बिगड़ती गई और उसकी मौत हो गई. हमने अपनी प्यारी बच्ची की मृत देह को, पिछले कमरे में फर्श पर रखा और बाहर के कमरे में जाकर, फ़र्श पर बिस्तर बिछा लिए. हमारे तीनों बच्चे, हमारे सामने लेटे हुए थे और तीनों, अपनी छोटी बहन को याद कर, बुरी तरह बिलख रहे थे, जिसका मासूम बेजान शारीर, साथ के कमरे में फर्श पर पड़ा था. हमारी लाड़ली बेटी की मौत उस वक़्त हुई थी, जब हमारी आर्थिक हालत बहुत ही ख़राब थी. हमारे जर्मन दोस्त भी, उस वक़्त हमारी मदद करने की स्थिति में नहीं थे. एर्न्स्ट जोंस ने, जो हमारे घर अक्सर आया करते थे, हमें मदद करने का वादा किया, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया...मेरा दिल सदमे से टूट चूका था, फिर भी मैं, एक फांसीसी प्रवासी के पास गई, जो नज़दीक ही रहते थे, और जो अक्सर हमसे मिलने आया करते थे. मैंने कहा, हम बहुत ही दयनीय हालत में हैं, आप हमारी मदद कीजिए. उन्होंने हमसे दोस्ताना हमदर्दी  दिखाते हुए, तुरंत 2 पौंड दे दिए. उस पैसे से हमने, अपनी प्यारी बच्ची के लिए ताबूत ख़रीदा, जिसमें हमारी लाड़ली शांति से आराम कर सके. मेरी ये बच्ची, जब इस संसार में आई थी तब उसके लिए खिलौने नहीं थे, और जब गई, तो बहुत देर तक ताबूत के लिए तरसती रही. कितने टूटे हुए दिल से हमने, अपनी जान को उसकी क़ब्र में रखा था!!"

जेनी मार्क्स, 
कार्ल मार्क्स की जीवन संगिनी, मार्क्स और अपने जीवन को याद करते हुए (Reminiscences of Marx and Engels)

मार्क्स को नमन नहीं , मनन करें !


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"अज्ञान एक राक्षसी शक्ति है और हमें डर है कि यह कई त्रासदियों का कारण बनेगा ।"

                              --- कार्ल मार्क्स

कुछ और ज़रूरी उद्धरण
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" यह भौतिकवादी सिद्धांत कि मनुष्य परिस्थितियों एवं शिक्षा-दीक्षा की उपज है , और इसलिए परिवर्तित मनुष्य भिन्न परिस्थियों एवं भिन्न शिक्षा-दीक्षा की उपज है इस बात को भुला देता है कि परिस्थितियों को मनुष्य ही बदलते हैं और शिक्षक को स्वयं शिक्षा की आवश्यकता होती है।....... परिस्थितियों एवं मानव क्रियाकलाप के परिवर्तन का संपात केवल क्रांतिकारी व्यवहार के रूप में विचार तथा तर्कबुद्धि द्वारा समझा जा सकता है ।"

       ------ कार्ल मार्क्स ( फायरबाख पर निबंध )
" सामाजिक जीवन मूलतः व्यवहारिक है । सारे रहस्य जो सिद्धांत को रहस्यवाद के गलत रास्ते पर भटका देते हैं , मानव व्यवहार में और इस व्यवहार के संज्ञान में अपना बुद्धिसम्मत समाधान पाते हैं  ।"        
                     ---- मार्क्स ( फायरबाख पर निबंध )

" दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से विश्व की केवल व्याख्या ही की है , लेकिन प्रश्न विश्व को बदलने का है । "

                        ---- मार्क्स ( फायरबाख पर निबंध )

"उनके ( ट्रेड यूनियनों के ) प्राथमिक उद्देश्य कुछ भी हों उन्हें अब मजदूर वर्ग की पूर्ण मुक्ति के व्यापक हितार्थ उसके संगठनकारी केंद्रों के रूप में सचेत रूप से कार्य करना सीखना चाहिए । उन्हें इस दिशा की ओर उन्मुख प्रत्येक सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलन का समर्थन करना चाहिए । अपने को पूरे मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि मानते हुए और उसके हितों की वकालत करते हुए वे सोसायटी से बाहर के लोगों को अपनी कतारों में शामिल करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं । उन्हें सबसे कम पारिश्रमिक वाले व्यवसायों के , उदाहरण के लिए खेत - मज़दूरों के , जिन्हें असाधारण परिस्थितियों ने असहाय बना दिया है , हितों का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए । उन्हें पूरे संसार के सामने यह प्रदर्शित करना चाहिए कि उनके प्रयत्न संकीर्ण तथा स्वार्थपूर्ण नहीं हैं अपितु उनका उद्देश्य करोड़ों पददलित लोगों को मुक्ति दिलाना है ।"

                                  --- कार्ल मार्क्स
 ( अस्थायी जनरल कौंसिल के डेलीगेटों के लिए निर्देश -1866 में लिखित )

दुनिया के मज़दूरों के रोज़मर्रा के संघर्षों ( ट्रेड यूनियन संघर्ष ) और मज़दूर वर्ग की राजनीति का सार ( कार्ल मार्क्स के शब्दों में )
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" यदि पूंजी के मुकाबले में अपने प्रतिदिन के संघर्ष में मज़दूर बुजदिली के साथ घुटने टेक देते हैं तो वे कोई बड़ा आंदोलन छेड़ने के काबिल नहीं रहेंगे ।
इसके साथ-साथ , मजूरी की व्यवस्था से जुड़ी हुई आम ग़ुलामी के अलावा , मज़दूर वर्ग को इन रोज़मर्रा के संघर्षों के अंतिम कार्य-परिणाम को बढ़ा -चढ़ाकर न आंकना चाहिए । मज़दूरों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे परिणामों से लड़ रहे हैं , न कि उन परिणामों के कारणों से ; वे पतनशील गति को केवल विलंबित कर रहे हैं , पर रोग को नष्ट नहीं कर रहे । अतः मज़दूरों को पूंजी के निरंतर अतिक्रमण या बाजार के परिवर्तनों के कारण नित्य पैदा होनेवाले अनिवार्य छापेमार संघर्षों में फँसकर नहीं रह जाना चाहिए । उन्हें समझना चाहिए कि मौजूदा व्यवस्था , उनसब मुसीबतों के बावजूद जो वह मज़दूरों पर ढाती है , साथ ही समाज के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक रूपों को उत्पन्न करती है । इसलिए इस रूढ़िगत मूलमंत्र - ' दिन के माकूल काम की माकूल मजदूरी ' के बजाय मज़दूरों को अपने झंडे पर यह क्रांतिकारी नारा लिख लेना चाहिए - मज़दूरी व्यवस्था का अंत हो ! "

                    --- कार्ल मार्क्स ( मज़दूरी , दाम और मुनाफ़ा )

" सम्पत्तिधारी वर्गों की संयुक्त सत्ता के विरुद्ध अपने संघर्ष में सर्वहारा अपने को एक विशेष राजनीतिक पार्टी में गठित करके ही वर्ग के रूप में काम कर सकते हैं जो सम्पत्तिधारी वर्गों की तमाम पार्टियों के विरुद्ध हो । राजनीतिक पार्टी में सर्वहारा का यह गठन सामाजिक क्रांति की और उसके अंतिम लक्ष्य - वर्गों के उन्मूलन के लक्ष्य - की विजय सुनिश्चित करने के लिए अपरिहार्य है । ...... चूंकि भूमि तथा पूंजी के अधिपति अपनी आर्थिक इजारेदारियों को बरकरार रखने और श्रम को दास बनाने के लिए अपने राजनीतिक विशेषाधिकारों का सदैव उपयोग करते हैं , इसलिए राजनीतिक सत्ता विजित करना सर्वहारा का महान कर्तव्य बन जाता है ।"

                 --- मार्क्स तथा एंगेल्स द्वारा तैयार ( 1872 की हेग जनरल कांग्रेस के प्रस्तावों में धारा 7 क के रूप में प्रस्तावित और कांग्रेस द्वारा अनुमोदित धारा का अंश ।)

" पूंजीपति वर्ग ने , जहाँ भी उसका पलड़ा भारी हुआ , वहाँ सभी सामंती , पितृसत्तात्मक और ' काव्यात्मक ' संबंधों का अंत कर दिया । उसने मनुष्य को अपने ' स्वाभाविक बड़ों ' के साथ बांध रखनेवाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला ; और नग्न स्वार्थ के , ' नकद पैसे-कौड़ी ' के हृदयशून्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा संबंध नहीं रहने दिया । धार्मिक श्रद्धा के स्वर्गोपम आनंदातिरेक को , वीरोचित उत्साह और कुपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबा दिया है । मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय-मूल्य बना दिया है , और पहले के अनगिनत प्रदत्त और हासिल किए गए स्वातंत्रयों की जगह अब उसने उस एक निर्लज्जतापूर्ण स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं । एक शब्द में , धार्मिक और राजनीतिक धोखे की टट्टी के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न , निलज्ज , प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है । " .............
" पूंजीपति वर्ग के खिलाफ सर्वहारा वर्ग का संघर्ष , यद्यपि अन्तर्य की दृष्टि से नहीं , तथापि रूप की दृष्टि से शुरू में राष्ट्रीय संघर्ष होता है । हर देश के सर्वहारा वर्ग को , जाहिर है , पहले अपने ही पूंजीपतियों से निबटना होगा । "

                   --- कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ( कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र )

" अठारहवीं शताब्दी की क्रांतियाँ जैसी पूंजीवादी क्रांतियाँ तूफानी चाल से कामयाबियों पर कामयाबियाँ हासिल करतीं हैं ; उनकी प्रत्येक नाटकीय निष्पत्ति दूसरी को मात करती है ; मनुष्य और वस्तुएँ दोनों जगमगाते दिखाई देतीं हैं ; उल्लास की भावना प्रतिदिन की भावना बन जाती है ; किन्तु ये सारी बातें अल्पजीवी होती हैं ,वे शीघ्र ही अपने शिखर-बिंदु तक पहुँच चुकती हैं ; समाज पर इसके पहले कि वह अपने तूफानी दौर के परिणामों को गंभीरतापूर्वक आत्मसात करना सीखे , एक खुमारी भरा अवसाद छ जाता है ।
दूसरी ओर उन्नीसवीं शताब्दी की क्रांतियों जैसी सर्वहारा क्रांतियाँ निरंतर अपनी आलोचना करतीं हैं , आगे बढ़ते-बढ़ते स्वयं ही बार-बार रुक जातीं हैं , ज़ाहिरा तय किए हुए रास्ते पर फिर लौट आती हैं ताकि अपनी यात्रा दोबारा शुरू कर सकें , अपने प्रथम प्रयासों की अपर्याप्तताओं, कमज़ोरियों और तुक्ष्ताओं की निर्मम आद्यंत भर्त्सना करती हैं , शत्रु को मानो इसीलिए पटकतीं हैं कि वह धरती से नवीन बल प्राप्त कर और अधिक विराट होकर फिर उनके सामने आए ; स्वयं अपने लक्ष्यों के अस्पष्ट से विराट आकार से बारम्बार झिझक कर पीछे हो जाती हैं - तब तक , जब तक कि ऐसी परिस्थिति तैयार नहीं हो जाती जिसमे पीछे हटना बिलकुल असंभव होता है और परिस्थितियाँ स्वयं पुकारकर कहतीं हैं -
Hic Rhodus , Hic Salta ! ( यहाँ गुलाब है , नाचो यहाँ ) "
--- कार्ल मार्क्स ( लूई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर )

Wednesday, 3 May 2023

*कार्ल मार्क्स पर कविता (5 मई)*



बदलते ज्वार के दौर में, एक विचारक उभरा,
एक आवाज  गूँज उठी, और भीड़ उमड़ पड़ी।
कार्ल मार्क्स, उनका नाम इतिहास के पन्ने पर हमेशा के लिए अंकित हो गया,
क्रांति का प्रकाश स्तम्भ, एक बौद्धिक संत।

उग्र शब्दों और इतनी पैनी कलम के साथ,
वह एक प्रणाली, पूंजीवादी प्रणाली में तल्लीन हो गया।
उन्होंने देखा विभाजन, शोषण, कलह,
और जीवन के ताने-बाने को नया रूप देने की कोशिश की।

उन्होंने श्रम की जंजीरों, सर्वहारा वर्ग की दुर्दशा की बात की,
न्याय के लिए संघर्ष, एक अनवरत संघर्ष।
मार्क्स को एक अधिक निष्पक्ष दुनिया में विश्वास था,
जहां समानता और एकजुटता हमारा साझा मामला होगा।

दास कैपिटल में, उनका घोषणापत्र गहरा है,
उन्होंने यांत्रिकी को विच्छेदित किया, जो खामियां उन्होंने पाईं।
उन्होंने एक ऐसे समाज की तस्वीर चित्रित की, जो अबाधित है,
वर्ग भेद से, जहाँ सच्ची स्वतंत्रता मिलेगी।

उन्होंने घोषित किया कि मजदूरों के पास चाभी है,
दमन के फरमान से रहित भविष्य के लिए।
उनका श्रम, उनका पसीना, धन की नींव,
लेकिन कुछ लोगों के हाथों में यह चोरी के सिवा कुछ नहीं लाया।

मार्क्स ने एक ऐसी दुनिया का सपना देखा था जहां शक्ति साझा की गई हो,
जहां सभी की आवाज थी, जहां सभी की देखभाल की जाती थी।
एक साम्यवादी दृष्टि, जहाँ प्रचुरता बहुतायत थी,
जहां प्रत्येक योगदान देगा, और प्रत्येक के पास बहुत कुछ होगा।

फिर भी उनके विचारों को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, विरोध जरूर बढ़ा,
आलोचकों ने तिरस्कार किया और संदेह किया, शंकालु आँखों से।
लेकिन फिर भी, उनके शब्द युगों से गूंजते रहे,
मन को प्रज्वलित करते रहे, साहसी चरणों में विद्रोह को उकसाते रहे।

मार्क्स के लिए, यह केवल सिद्धांत या अमूर्त विचार नहीं था,
यह कार्रवाई का आह्वान था, एक संघर्ष जो उन्होंने चाहा था।
एकजुटता का आह्वान, परिवर्तन की मांग,
दमन की जंजीरों को तोड़ने के लिए, पुनर्व्यवस्थित करने के लिये।

हालांकि इतिहास सामने आया, और दुनिया बदल गई,
मार्क्स के संदेश का सार अब भी चमक रहा है।
क्योंकि उन्होंने शक्तिशाली, यथास्थिति को चुनौती दी,
और हमें सवाल करना, विरोध करना और बढ़ना सिखाया।

तो आइए याद करते हैं इस दूरदर्शी का नाम,
और उनके द्वारा छोड़ी गई विरासत जो हमेशा के लिए जल उठी।
सर्वहारा के हिमायती कार्ल मार्क्स
क्रांति का एक शिल्पकार, जिनके शब्द आज भी हौसला बढ़ाते हैं।

कुमार तरुण

*Poem on Karl Marx (5th May)*

In a time of changing tides, a thinker emerged,
A voice that echoed, and the masses surged.
Karl Marx, his name forever etched in history's page,
A beacon of revolution, an intellectual sage.

With fiery words and a pen so keen,
He delved into a system, capitalist and mean.
He saw the divisions, the exploitation, the strife,
And sought to reshape the fabric of life.

He spoke of labor's chains, the proletariat's plight,
The struggle for justice, a relentless fight.
For Marx believed in a world more fair,
Where equality and solidarity would be our shared affair.

In Das Kapital, his manifesto profound,
He dissected the mechanics, the flaws he found.
He painted a picture of a society unbound,
From class distinctions, where true freedom would be found.

The workers, he declared, held the key,
To a future devoid of oppression's decree.
Their labor, their sweat, the foundation of wealth,
But in the hands of the few, it brought naught but stealth.

Marx dreamed of a world where power was shared,
Where all had a voice, where all were cared.
A communist vision, where abundance was plenty,
Where each would contribute, and each would have plenty.

Yet his ideas met resistance, opposition did rise,
Critics scorned and doubted, with skeptical eyes.
But still, his words resonated through the ages,
Igniting minds, inciting rebellion in courageous stages.

For Marx, it wasn't just theory or abstract thought,
It was a call to action, a struggle he sought.
A call for solidarity, a demand for change,
To break the chains of oppression, rearrange.

Though history unfolded, and the world has turned,
The essence of Marx's message still brightly burned.
For he challenged the powerful, the status quo,
And taught us to question, to resist and grow.

So let us remember this visionary's name,
And the legacy he left, forever aflame.
Karl Marx, the advocate for the downtrodden,
A craftsman of revolution, whose words still embolden.

*Kumar Tarun* 

रोटी

स्कूल में टिफिन करते बच्चों से अध्यापक ने पूछा-
ये रोटी तुम किसकी बदौलत खा रहे हो?

जवाब का सिलसिला शुरू हो गया-
माँ-पिता की बदौलत
किसान जिसने अन्न पैदा किया

उस गाड़ी के ड्राइवर की बदौलत
जिसने अन्न को खेतों से बाहर पहुँचाया

जिसने इस गाड़ी को बनाया
यह गाड़ी डीज़ल से चलती है
तो इस रोटी में अंधेरे कुएं से तेल निकालने वालों का भी तो योगदान हुआ
अंधेरे कुएं से तेल निकालने के लिए
जिस तकनीक की जरूरत है
उसे भी तो किसी ने बनाया होगा
तो उनका भी योगदान इस एक रोटी में है

और उस ट्रक के पहिए के लिए
रबर किसने तैयार किया?
क्या उसका योगदान नहीं है

एक बच्चा चुप था
अध्यापक उसके प्रति मुखातिब हुआ
तुमने अभी तक कुछ नहीं बोला?

बच्चा सकुचाते हुए 
और अपनी रोटी दिखाते हुए बोला-
'जिन्होंने आग की खोज की
उनका भी योगदान है, इस रोटी में......

(सोवियत रूस के अध्यापक Sukhomlynsky के एक शिक्षा-प्रयोग से प्रभावित)

Monday, 1 May 2023

Wrestler Protest



In arenas filled with fervent cries,
Their message echoes through the skies,
"We're not just wrestlers, we're warriors true,
Fighting for dignity, for me and you."

Their struggle, a metaphor for the fight,
Against oppression's suffocating might,
Through holds and locks, they break the chains,
Igniting hope where despair remains.

And as they grapple with hearts aflame,
We witness a battle, we feel no shame,
For in their fight, we see the truth,
That dignity is worth the wrestle, forsooth.