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Saturday, 29 April 2023

Man O Man!



 Man O Man!
 When without money,
 eats vegetables at home;
 When has money,
 eats the same vegetables in a fine restaurant.
 
 When without money, rides bicycle;
 When has money rides the same 'exercise machine'.
 
When without money walks to earn food
 When has money, walks to burn fat;

 Man O Man! Never fails to deceive thyself!
 
 When without money,
 wishes to get married;
 When has money,
 wishes to get divorced.
 
 When without money,
 wife becomes secretary;
 When has money,
 secretary becomes wife.
 
 When without money, acts like a rich man;
 When has money acts like a poor man.
 Man O Man! Never can tell the simple truth!
 
Says share market is bad,
 but keeps speculating;
 Says money is evil,
 but keeps accumulating.
 
 Says high Positions are lonely,
 but keeps wanting them.

 Says gambling & drinking is bad,
 but keeps indulging;

 Man O Man! Never means what he says and never says what he means..

Life is not about what 
you couldn't do so far, 
it's about what you can 
still do. 
Wait n dont ever give up..
Miracles happen every 
day....
                              
Rs.20 seems too much 
to give a beggar but it
seems okay when its 
given as tip at a fancy
restaurant.

After a whole day of 
work, Hours at the gym
seem alright but helping
your Mother out at home 
seems like a burden.

Praying to god for 3 min
takes too much time but
watching a movie for 3
hours doesn't.

Wait a whole year for
Valentine's day but we
always forget Mother's 
day.

Two poor starving kids
sitting on the pavement
weren't given even a slice 
of Bread but a painting of
them sold for lakhs of
Rupees.

We don't think twice 
About forwarding jokes 
But we will rethink about
sending this message on.

Think about It..
Make a change. 

Thursday, 27 April 2023

Mind's Wondrous Poetry Our Mind


Mind's Wondrous Poetry

Our Mind

In the realms of thought, where wonders reside,
There lies a realm where dreams coincide,
A mystic abode of boundless design,
Behold the marvels of the human mind.

It dances like a river, swift and free,
A canvas vast where thoughts find their decree,
In swirling tides of imagination's reign,
A symphony of ideas, a vibrant terrain.

A web of neurons, a network profound,
Weaving thoughts, emotions all around,
A tapestry woven with intricate threads,
Creating worlds within, where truth embeds.

The mind, a universe, uncharted, vast,
Where memories echo, remnants of the past,
It ponders questions, seeks knowledge's embrace,
Unveiling mysteries with unyielding grace.

Within its sanctuary, dreams take flight,
Transforming darkness into radiant light,
From whispered hopes to grandest schemes,
The mind is the architect of endless dreams.

Yet, within its labyrinthine expanse,
Lies battles fought, an eternal dance,
Between doubts and dreams, fears and desires,
A battleground where the soul aspires.

But fear not, for within this sacred sphere,
Resides the power to conquer and persevere,
To paint the world with hues of sheer delight,
To transform darkness into radiant light.

So cherish the mind, this wondrous domain,
A sanctuary where dreams and thoughts attain,
Their highest form, where magic is born,
And the essence of our humanity is sworn.

Oh, the mind, an infinite symphony,
A gift bestowed, a wellspring of creativity,
In its boundless depths, we find our way,
Unleashing the power to shape each day.

Embrace its depths, let curiosity ignite,
And embark on journeys, both day and night,
For within the mind, the cosmos unfurled,
A timeless treasure, the greatest wonder in our world.


मन की अद्भुत कविता

हमारा दिमाग

विचार के क्षेत्र में, जहां चमत्कार निवास करते हैं,
वहाँ एक क्षेत्र है जहाँ सपने मेल खाते हैं,
असीम डिजाइन का एक रहस्यवादी निवास,
मानव मन के चमत्कार देखें।

यह एक नदी की तरह नृत्य करता है, तेज और मुक्त,
एक कैनवास विशाल जहाँ विचार अपना फरमान पाते हैं,
कल्पना के शासन के घूमते ज्वार में,
विचारों की एक सिम्फनी, एक जीवंत इलाका।

न्यूरॉन्स की एक वेब, एक गहरा नेटवर्क,
बुन रहे विचार, भावनाएँ चारों ओर,
जटिल धागों से बुनी एक टेपेस्ट्री,
भीतर दुनिया बनाना, जहां सच्चाई एम्बेड होती है।

मन, एक ब्रह्मांड, अज्ञात, विशाल,
जहां यादें गूंजती हैं, अतीत के अवशेष,
यह सवालों पर विचार करता है, ज्ञान को गले लगाता है,
अटल अनुग्रह के साथ रहस्यों का अनावरण।

इसके अभयारण्य के भीतर, सपने उड़ान भरते हैं,
अँधेरे को रौशनी में बदलना,
फुसफुसाती आशाओं से लेकर भव्य योजनाओं तक,
मन अंतहीन सपनों का वास्तुकार है।

फिर भी, इसके भूलभुलैया विस्तार के भीतर,
लड़ी गई झूठ की लड़ाई, एक शाश्वत नृत्य,
संदेह और सपने, भय और इच्छाओं के बीच,
एक युद्ध का मैदान जहाँ आत्मा आकांक्षा करती है।

लेकिन डरो मत, क्योंकि इस पवित्र क्षेत्र के भीतर,
जीतने और दृढ़ रहने की शक्ति है,
दुनिया को खुशियों के रंग से रंगने के लिए,
अंधेरे को दीप्तिमान प्रकाश में बदलने के लिए।

इसलिए मन को संवारें, यह अद्भुत डोमेन,
एक अभयारण्य जहां सपने और विचार प्राप्त होते हैं,
उनका सर्वोच्च रूप, जहाँ जादू पैदा होता है,
और हमारी मानवता का सार शपथ है।

ओह, मन, एक अनंत सिम्फनी,
दिया गया उपहार, रचनात्मकता का स्रोत,
इसकी असीम गहराई में, हम अपना रास्ता खोजते हैं,
प्रत्येक दिन आकार देने की शक्ति को उजागर करना।

इसकी गहराइयों को गले लगाओ, जिज्ञासा को प्रज्वलित होने दो,
और यात्रा पर निकल पड़ते हैं, दिन और रात दोनों,
मन के भीतर के लिए, ब्रह्मांड फहराया,
एक कालातीत खजाना, हमारी दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य।

M K Azad

कल 96 वर्ष की आयु में हैरी बेलाफोनेट का निधन हो गया।


कल 96 वर्ष की आयु में हैरी बेलाफोनेट का निधन हो गया।

हैरी बेलाफोनेट एक प्रसिद्ध अमेरिकी गायक, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। 1 मार्च, 1927 को न्यूयॉर्क के हार्लेम में जन्मे, अपने पूरे करियर के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। बेलाफोंटे को संगीत उद्योग में उनके योगदान के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से कैलीप्सो और पारंपरिक लोक संगीत की शैलियों में। उनके कुछ प्रसिद्ध गीतों में "बनाना बोट सॉन्ग (डे-ओ)" और "जंप इन द लाइन (शेक, सेनोरा)" शामिल हैं।

अपनी संगीत उपलब्धियों के अलावा, बेलाफोनेट नागरिक अधिकारों और मानवीय कारणों में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। वह डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के करीबी सहयोगी थे और उन्होंने नागरिक अधिकार आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बेलाफोनेट ने नस्लीय समानता और सामाजिक न्याय की वकालत करने के लिए अपनी प्रसिद्धि और मंच का इस्तेमाल किया।

"बनाना बोट सॉन्ग (डे-ओ)" एक प्रसिद्ध जमैका लोक गीत है जिसे हैरी बेलाफोनेट ने लोकप्रिय बनाया था। इस गीत की जड़ें पारंपरिक जमैका के मेंटो संगीत में हैं और बेलाफोनेट द्वारा उनके 1956 के एल्बम "कैलिप्सो" के लिए अनुकूलित किया गया था। यह जल्दी से उनके हस्ताक्षर गीतों में से एक बन गया और उनकी सबसे प्रसिद्ध रिकॉर्डिंग में से एक बना रहा।

"बनाना बोट सॉन्ग (डे-ओ)" एक कार्य गीत है जो जमैका के केले के व्यापार में नावों पर केले लोड करने के श्रमसाध्य कार्य को याद करता है। इसमें एक कॉल-एंड-रिस्पॉन्स शैली है, जिसमें बेलाफोनेट मुख्य मुखर राग का नेतृत्व करता है और प्रतिष्ठित "डे-ओ" रिफ्रेन के साथ दर्शकों या बैकिंग वोकलिस्ट का जवाब देता है।

इस गीत ने व्यापक लोकप्रियता हासिल की और वर्षों से विभिन्न फिल्मों, टेलीविजन शो और सांस्कृतिक संदर्भों में चित्रित किया गया है। यह कैरेबियन संगीत का प्रतीक बन गया है और अक्सर हैरी बेलाफोनेट की संगीत विरासत से जुड़ा हुआ है।

कल 96 वर्ष की आयु में हैरी बेलाफोनेट का निधन हो गया।

Red Saute.

Wednesday, 26 April 2023

*शोषण और दमन से मुक्त समाज बनाने के लिए संघर्ष को तेज़ करें!* *मई दिवस पर मज़दूर एकता कमेटी का बयान, 20 अप्रैल, 2023*

*शोषण और दमन से मुक्त समाज बनाने के लिए संघर्ष को तेज़ करें!*

*मई दिवस पर मज़दूर एकता कमेटी का बयान, 20 अप्रैल, 2023*

1 मई, 2023, मई दिवस पर दुनियाभर के मज़दूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष में शहीद हुए अपने सभी साथियों को याद करेंगे। वे जुझारू प्रदर्शनों के ज़रिए अपनी मांगों को बुलंद करेंगे। रैलियों में निकलकर, एक बार फिर पूंजीवादी शोषण और दमन से मुक्ति हासिल करने के अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प जाहिर करेंगे। साथ ही साथ, यह निश्चय करेंगे कि पूंजीवादी शोषण और दमन के वर्तमान समाज का विकल्प कैसे लाया जाये। 

आज दुनिया के हर देश में मज़दूर बड़ी बहादुरी के साथ संघर्ष कर रहे हैं। वे सम्मानजनक जीवन जीने लायक वेतन के लिए, सुरक्षित रोज़गार के लिये, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के विरोध में, सड़कों पर निकल रहे हैं। वे पूंजीवादी शोषण के खि़लाफ़, राष्ट्रों के दमन, साम्प्रदायिक हिंसा, नस्लवाद और साम्राज्यवादी जंग के खि़लाफ़, अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। वे अपने अधिकारों के लिए तथा एक ऐसे समाज की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मज़दूर-किसान को अपने श्रम का फल मिले।

पूंजीवादी हुक्मरानों के निजीकरण के अजेंडे के विरोध में रेलवे, सड़क परिवहन, कोयला, पेट्रोलियम और रक्षा क्षेत्र, बिजली उत्पादन और वितरण, बैंकिंग और बीमा, आदि के मज़दूर बहुत ही बहादुरी से लड़ रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास, बिजली, पानी, दूरसंचार, परिवहन सेवा - इन सभी सेवाओं को पूंजीपतियों के मुनाफे़ का स्रोत बनाया जा रहा है। मज़दूर इसका विरोध कर रहे हैं और इन सभी सेवाओं को अधिकार बतौर मुहैया कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मज़दूर एकता कमेटी उन सभी मज़दूरों को सलाम करती है, जो पूंजीपति वर्ग के निजीकरण के कार्यक्रम को चुनौती दे रहे हैं। 

पूंजीपतियों द्वारा मज़दूरों के शोषण को और आसान करने के लिए, सरकार ने 44 श्रम क़ानूनों को सरल बनाने के नाम पर, 4 लेबर कोड को घोषित कर दिया है। इसका मतलब यह है कि जो कुछ अधिकार अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों ने संघर्ष करके हासिल किये थे, उन्हें भी वापस लिया जायेगा। 12 से 16 घंटे प्रतिदिन काम अब नियम बन जायेगा। महिला मज़दूरों को बिना किसी सुरक्षा की गारंटी के, रात की पाली में काम करने को मजबूर किया जायेगा। अपना ट्रेड यूनियन बनाकर अपने अधिकारों के लिए संगठित रूप से लड़ना अधिकतम मज़दूरों के लिये बहुत मुश्किल हो जायेगा।

किसान अपनी फ़सलों के लिये सरकारी ख़रीदी की गारंटी और लाभकारी दाम की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आये हैं। मज़दूर एक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, जिसमें सभी मेहनतकश लोगों को सस्ते दामों पर पर्याप्त मात्रा में सभी आवश्यक वस्तुयें प्राप्त हो सकें। ये मज़दूरों और किसानों की लंबे समय से चली आ रही मांगें हैं।

मज़दूरों और किसानों के तमाम संघर्षों के बावजूद, ये मांगें पूरी क्यों नहीं होती हैं? बड़े-बड़े पूंजीवादी घरानों - टाटा, बिरला, अम्बानी, अदानी, आदि - की दौलत क्यों बढ़ती रहती है? मज़दूरों-किसानों की हालत क्यों बिगड़ती रहती है? इसकी वजह है अधिक से अधिक मुनाफ़ा हड़पने की इजारेदार पूंजीपतियों की लालच, जो इन मांगों को पूरा होने से रोक देती है। इजारेदार पूंजीपति हर क्षेत्र में मज़दूरों के शोषण और किसानों की लूट को खूब तेज़ करके, जल्दी से जल्दी, खुद को और अमीर बना रहे हैं। पूंजीपति वर्ग ही हिन्दोस्तान का असली हुक्मरान है। उसकी अगुवाई बड़े-बड़े इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं। पूंजीपति वर्ग की सेवा हिन्दोस्तानी राज्य करता है। राज्य यह सुनिश्चित करता है कि पूंजीपति वर्ग का अजेंडा ही हमेशा लागू होता रहे, चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो।

देश के लोगों की सभी समस्याओं का स्रोत पूंजीवादी व्यवस्था है। हिन्दोस्तानी राज्य के सभी संस्थान - सरकार संभालने वाली राजनीतिक पार्टी और उसका मंत्रीमंडल, उसके साथ-साथ संसदीय विपक्ष, पुलिस, सेना, न्यायपालिका, न्यूज मीडिया - ये सब मज़दूरों और किसानों पर पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही को क़ायम रखने के साधन हैं। 

'दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र' कहलाये जाने वाले इस देश में जो राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया क़ायम है, उसके ज़रिये यह सुनिश्चित किया जाता है कि मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकश लोगों को हमेशा ही सत्ता से बाहर रखा जायेगा। संसद में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी की सरकार बनती है। उसी पार्टी का मंत्रीमंडल बनता है। उसी मंत्रीमंडल के हाथों में हमारे जीवन पर असर डालने वाले हर फ़ैसले को लेने की शक्ति होती है। लोगों के पास चुनाव में अपने उम्मीदवारों का चयन करने का कोई साधन नहीं है। चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने या उन्हें वापस बुलाने का कोई साधन नहीं है। हम मज़दूर-मेहनतकश न तो क़ानून बना सकते हैं और न ही मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, जन-विरोधी क़ानूनों को बदल सकते हैं।

यह भ्रम फैलाया जाता है कि चुनावों में मतदान करके लोग अपनी पसंद की सरकार को चुनते हैं। यह बहुत बड़ा धोखा है। हक़ीक़त तो यह है कि पूंजीपति करोड़ों-करोड़ों रुपए खर्च करके अपनी भरोसेमंद राजनीतिक पार्टियों में से उस पार्टी की जीत को सुनिश्चित करते हैं, जो उनके एजेंडे को सबसे बेहतर तरीक़े से लागू करेगी। सरकार उसी पार्टी की बनायी जाती है जो सबसे ज्यादा चतुराई से, पूंजीपतियों के अजेंडे को "लोकहित" में बताकर, लोगों को बुद्धू बना सकती है।

राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद हुक्मरानों का पसंदीदा हथकंडा है। इस हथकंडे का इस्तेमाल करके वे बार-बार मज़दूरों और किसानों की एकता को तोड़ते हैं। हमारे संघर्षों को कमजोर करते हैं। हमारी एकता को तोड़ने की हुक्मरानों की सभी कोशिशों से हमें चौकन्ने रहना होगा।

आज हमारे संघर्ष के सामने एक बड़ी रुकावट उन ताक़तों से है, जो इस भ्रम को फैलाने में लगे हुए हैं कि हिन्दोस्तान का लोकतंत्र और संविधान एकदम ठीक हैं, कि समस्या सिर्फ कुछ ग़लत और भ्रष्ट नेताओं की वजह से है। उनका कहना है कि अगर वर्तमान भाजपा सरकार को हटा दिया जाये तो मज़दूरों और किसानों की सारी समस्याएं हल हो जायेंगी। वे संघर्षरत लोगों को आगामी लोक सभा चुनावों में भाजपा के किसी विकल्प की सरकार को चुनने के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।

हमारे पास बीते 76 वर्षों का अनुभव है। हमने सरकार में पार्टियों को बार-बार बदलते हुए देखा है। परन्तु पूंजीपतियों का अजेंडा बेरोक चलता रहा है। अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई बढ़ती ही रही है। क्या, हमें फिर से उसी चक्र में फंसना है? 

हमें वर्तमान संसदीय व्यवस्था की जगह पर श्रमजीवी लोकतंत्र की व्यवस्था स्थापित करनी होगी। यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जिसमें कार्यपालिका, निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह होगी और चुने गए प्रतिनिधि मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होंगे। राजनीतिक प्रक्रिया 18 साल से ऊपर के प्रत्येक नागरिक के चुनने और चुने जाने के अधिकार की पुष्टि करेगी, जिसमें किसी भी चुनाव से पहले उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार शामिल होगा। चुनाव अभियान के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किया जायेगा और किसी निजी धन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जायेगी।

हम मज़दूर और किसान समाज की अधिकतम आबादी हैं। हम देश की दौलत को पैदा करते हैं परन्तु हुक्मरान पूंजीपति वर्ग हमारे श्रम का फल हड़प लेता है। पूंजीपतियों की अमीरी बढ़ती रहती है जबकि हमारी हालत बद से बदतर होती जाती है। इसे बदलना होगा। पूंजीपति वर्ग को सत्ता से हटाना होगा। देश की दौलत पैदा करने वालों को देश का मालिक बनना होगा। ऐसा करके ही हम वह नया समाज स्थापित कर सकेंगे, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था को जनता की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में संचालित किया जायेगा और लोग देश के भविष्य को निर्धारित करने वाले फ़ैसलों को लेने में सक्षम होंगे।

मज़दूर साथियों,

आज से 133 वर्ष पहले, 1 मई, 1890 को यूरोप के सभी देशों के मज़दूर 8 घंटे के काम के दिन की मांग को लेकर, सड़कों पर उतरे थे। 1889 में स्थापित सोशलिस्ट इंटरनेशनल के आह्वान पर, 1 मई के दिन को पूंजीवादी शोषण के खि़लाफ़ मज़दूरों के संघर्षों के प्रतीक के रूप में ऐलान किया गया था। उस समय से लेकर आज तक, सारी दुनिया में मई दिवस पर मज़दूर पूंजीवादी शोषण से मुक्ति के लिए अपने संघर्ष को और मजबूत करने के संकल्प के साथ आगे आते हैं।

मज़दूर वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था से समाज को मुक्त कराना होगा। जब तक पूंजीवादी व्यवस्था बरकरार रहेगी तब तक मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकशों का शोषण-दमन ख़त्म नहीं हो सकता है। 

आइए, हम मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए, अपने एकजुट संघर्ष को और तेज़ करें। आइए, हम इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की जगह पर, मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करने के लक्ष्य के साथ, देश के सभी शोषित और पीड़ित लोगों को संघर्ष में लामबंध करें।

*हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मज़दूर, किसान, औरत और जवान!*

*मई दिवस ज़िन्दाबाद!* 

*इंक़लाब ज़िन्दाबाद!*

Tuesday, 25 April 2023

Removal of the theory of evolution from the NCERT's 10th-grade science textbook

The Indian government has decided to remove the theory of evolution from the 10th-grade science textbook by the National Council of Educational Research and Training (NCERT) in India.  The decision was made after the removal of Mughal and Mahatma Gandhi's history. The theory of Charles Darwin states that humans and apes have a common ancestor, which conflicts with the belief that humans were created by God. By removing the theory of evolution, India is denying its true history and perpetuating blind faith and superstition.
 
The decision has sparked criticism and concern among  members of the scientific community and the public, with over 1,800 individuals and organizations signing a petition to have the topic reinstated. The CBSE and UP boards are expected to implement the changes in the curriculum, which include the removal of the chapter on evolution, from 2023-24. 

 The removal of the theory of evolution from the NCERT's 10th-grade science textbook is a matter of concern for many members of the scientific community. The theory of evolution is supported by a vast amount of scientific evidence and is widely accepted as the scientific explanation for the diversity of life on Earth. The removal of this theory from the textbook could lead to a lack of understanding and appreciation for the scientific method and could hinder scientific progress in India. It is important to note that scientific theories are not absolute truths and are subject to change based on new evidence and research. However, the removal of a well-established theory based on ideological or political reasons is not supported by scientific principles.

This move will have  the impact of perpetuating blind faith and superstition in education?

लेनिन के जन्‍मदिवस (22 अप्रैल) पर बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता

लेनिन के जन्‍मदिवस (22 अप्रैल) पर बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता
लेनिन की मृत्‍यु पर कैंटाटा* (अनुवाद- सत्यम)
1. 
जिस दिन लेनिन नहीं रहे
कहते हैं, शव की निगरानी में तैनात एक सैनिक ने
अपने साथियों को बताया: मैं 
यक़ीन नहीं करना चाहता था इस पर।
मैं भीतर गया और उनके कान में चिल्‍लाया: 'इलिच
शोषक आ रहे हैं।' वह हिले भी नहीं।
तब मैं जान गया कि वो जा चुके हैं।
2.
जब कोई भला आदमी जाना चाहे
तो आप कैसे रोक सकते हैं उसे?
उसे बताइये कि अभी क्‍यों है उसकी ज़रूरत।
यही तरीक़ा है उसे रोकने का।
3.
और क्‍या चीज़ रोक सकती थी भला लेनिन को जाने से?
4. 
सोचा उस सैनिक ने
जब वो सुनेंगे, शोषक आ रहे हैं
उठ पड़ेंगे वो, चाहे जितने बीमार हों
शायद वो बैसाखियों पर चले आयें
शायद वो इजाज़त दे दें कि उन्‍हें उठाकर ले आया जाये, लेकिन
उठ ही पड़ेंगे वो और आकर
सामना करेंगे शोषकों का।
5. 
जानता था वो सैनिक, कि लेनिन
सारी उमर लड़ते रहे थे
शोषकों के ख़ि‍लाफ़
6.
और वो सैनिक शामिल था
शीत प्रासाद पर धावे में, और घर लौटना चाहता था
क्‍योंकि वहाँ बाँटी जा रही थी ज़मीन
तब लेनिन ने उससे कहा था: अभी यहीं रुको !
शोषक अब भी मौजूद हैं।
और जब तक मौजूद है शोषण
लड़ते रहना होगा उसके ख़ि‍लाफ़
जब तक तुम्‍हारा वजूद है
तुम्‍हें लड़ना होगा उसके ख़ि‍लाफ़।
7. 
जो कमज़ोर हैं वे लड़ते नहीं। थोड़े मज़बूत
शायद घंटे भर तक लड़ते हैं।
जो हैं और भी मज़बूत वे लड़ते हैं कई बरस तक।
सबसे मज़बूत होते हैं वे 
जो लड़ते रहते हैं ताज़ि‍न्‍दगी।
वही हैं जिनके बग़ैर दुनिया नहीं चलती।
8.
इंक़लाबी की शान में क़सीदा
जब शोषण बढ़ता जाता है
बहुतों के हौसले हो जाते हैं पस्‍त
मगर उसकी हिम्‍मत और बुलंद होती है।
वह संगठित करता है अपना संघर्ष
मज़दूरी के लिए, रोटी और चाय के लिए
और फिर सत्ता दखल करने के लिए।
वह पूछता है दौलत से:
कहाँ से आई तुम?
पूछता है दृष्टिकोणों से:
किसकी सेवा करते हो तुम?
जब पसरा हो सन्‍नाटा
वह बोल उठता है
जहाँ भी हो ज़ुल्‍म, और लोग बात करते हों किस्मत की
वह चीज़ों को पुकारता है उनके सही-सही नाम से।
जहाँ वह बैठता है खाने की मेज़ पर
साथ बैठता है असंतोष भी
खाना लगने लगता है ख़राब
और कमरा कुछ ज्‍़यादा ही तंग।
जहाँ भी उसे भगाया जाता है
पीछे-पीछे चली आती है उथल-पुथल
और अशांति बनी रह जाती है
जहाँ किया जाता है उसका शिकार।
9.
जब लेनिन नहीं रहे और
लोगों को उनकी याद आई
जीत हासिल हो चुकी थी, मगर
देश था तबाहो-बर्बाद
लोग उठकर बढ़ चले थे, मगर
रास्‍ता था अँधियारा
जब लेनिन नहीं रहे
फुटपाथ पर बैठे सैनिक रोये और
मज़दूरों ने अपनी मशीनों पर काम बंद कर दिया 
और मुट्ठियाँ भींच लीं।
10.
जब लेनिन गये,
तो ये ऐसा था 
जैसे पेड़ ने कहा पत्तियों से
मैं चलता हूँ।
11. 
तब से गुज़र गये पंद्रह बरस
दुनिया का छठवाँ हिस्‍सा 
आज़ाद है अब शोषण से।
'शोषक आ रहे हैं!': इस पुकार पर
जनता फिर उठ खड़ी होती है
हमेशा की तरह।
जूझने के लिए तैयार।
12.
लेनिन बसते हैं
मज़दूर वर्ग के विशाल हृदय में,
वो थे हमारे शिक्षक।
वो हमारे साथ मिलकर लड़ते रहे।
वो बसते हैं
मज़दूर वर्ग के विशाल हृदय में।
(1935)
* कैंटाटा – वाद्य संगीत के साथ गायी जाने वाली संगीत रचना, जो प्राय: वर्णनात्‍मक और कई भागों में होती है (कुछ-कुछ हमारे बिरहा की तरह)। इस कैंटाटा के संगीत को अंतिम रूप दिया था ब्रेष्‍ट के साथी और महान जर्मन संगीतकार हान्‍स आइस्‍लर ने। इस रचना का आठवाँ भाग 'इंक़लाबी की शान में क़सीदा' ब्रेष्‍ट ने पहलेपहल 1933 में, गोर्की के उपन्‍यास 'माँ' पर आधारित अपने नाटक के लिए लिखा था।
अनुवाद: सत्‍यम

मई दिवस का ऐलान

मई दिवस का ऐलान,

समाजवाद हमारा भविष्य है!



दुनिया का पूरा का पूरा लुटेरा पूंजीपति वर्ग, मजदूरों और किसानों व मेहनतकश जनता की एकता से सबसे ज्यादा डरता है और खौफ खाता है, क्यों कि उनको पता है कि इसी एकता और भाईचारा के हथियार से वे इस लुटेरी पूंजीवादी राजव्यवस्था का तख्ता पलटेंगे और एक ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण करेंगे,,,,, 


जहां सब बराबर होंगे, 

जहां सब आजाद होंगे, 

जहां अन्याय नही होंगे, 

जहां सब तरह का शोषण ,,,,,

मनुष्य का मनुष्य द्वारा और एक देश का दुसरे देशों द्वारा,,,, 

खत्म हो जाएगा, 


जहां अमीर, गरीब नही होंगे, 

जहां ऊंच नीच का नाम नही रहेगा, 

जहां सब पढे लिखे होंगे, 

जहां सब मिलजुलकर रहेंगे, 

जहां सब अपनी काबलियत के हिसाब से काम करेंगे, 

जहां कोई किसी का गुलाम नही होगा, 

जहां सब भाई बहन की तरह रहेंगे, 

जहां कोई किसी का शोषण नही करेगा, 

जहां सब समाज के लिए जियेंगे, 


और 


सारा समाज प्रत्येक आदमी के लिए काम करेगा और उसका ध्यान रखेगा, 

जहां सरकार मजदूरों और किसानों की होगी, 

जहां सरकार केवल अमीरों की तिजोरियां भरने का काम नही करेगी, 

जहां सच्चा जनवाद आ जायेगा,

जहां शोषण करने वालों का और आदमी का खून पीने वालों का खात्मा कर दिया जायेगा,

जहां पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का विनाश कर दिया जायेगा, 

जहां, धर्म, जाति, रंग, लिंग, स्थान और नस्ल पर आधारित सभी तरह की विषमताओं, गैरबराबरी, शोषण और अन्याय का समूल विनाश कर दिया जायेगा,

जहां राज्य धर्म से दूरी बना कर रखेगा अर्थात जहां धर्म राज्य के कामकाज में कोई हस्तक्षेप नही करेगा, 

जहां धर्म की मनमानी नही चलेगी, 

जहां वैज्ञानिक संस्कृति और सोच का साम्राज्य होगा, 

जहां अंधविश्वास, ढपोरशंखी,मान्यताओं, तर्कहीनता, विवेकहीनता का सर्वनाश कर दिया जायेगा, 

जहां ज्ञान-विज्ञान  और तकनीक का बोलबाला होगा, 

जहां वैज्ञानिक संस्कृति का साम्राज्य कायम हो जायगा, 

जहां चारों तरफ प्यार, मुहब्बत, आपसी भाईचारा, आपसी मेलमिलाप और आपसी सहयोग होगा, 

ऐसी अदभुत व्यवस्था को समाजवादी समाज और समाजवादी व्यवस्था कहते हैं।

    

यहां यह बात भी ध्यान रखने की है कि यह व्यवस्था खुद नही आयेगी, बल्कि इसके लिये मानव यानि कम्युनिस्टों, मजदूरों और किसानों और व्यापक मेहनतकश जनता की एकता के बल पर शोषण, अन्याय भेदभाव और गैरबराबरी पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को उखाडकर फैंकना होगा।


      मित्रों और साथियों, आइए हम मई दिवस के अभियान में शामिल होकर आठ घण्टे कार्यावधि की मांग करे और, पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और शोषण मुक्त समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए संगठित होने और एकजुट होकर काम करने के अपने दृढ़ संकल्प और लौह इच्छाशक्ति की घोषणा करें…।


मई दिवस जिंदाबाद, 

इंकलाब जिंदाबाद, 

समाजवाद जिंदाबाद।


                  साथियों, आओ मई दिवस पर  होने वाले कार्यक्रमो में बढ़चढ कर भारी संख्या में हिस्सेदारी करें।


क़ान्तीकारी अभिवादन के साथ,


लाल सलाम




Declaration of May Day, Socialism is our future!


The entire world's predatory capitalist class is most afraid and in awe of the unity of workers, farmers and toiling people, because they know that with this weapon of unity and brotherhood, they will overturn this predatory polity and create a Society


Where all are equal,

Where everyone is free

Where there will be no injustice,

Where all forms of exploitation, of man by man 

and of one country by another, shall come to an end.


Where there will be no rich, no poor,

Where there will be no name of high and low,

Where everyone will be educated,

Where everyone will live together

Where everyone will work according to their ability,

Where no one will be slave of anyone,

Where everyone will live like brothers and sisters,

Where no one exploits anyone,

Where everyone will live for the society,

And

The whole society will work for and take care of every man,

Where the government will be of workers and farmers,

Where the government will not only work to fill the coffers of the rich,

Where true democracy will come,

Where the exploiters and the drinkers of human blood will be put to an end,

where capitalism and imperialism will be destroyed,

Where all inequalities, exploitation and injustice based on religion, caste, colour, sex, place and race shall be completely destroyed,

Where the state will keep a distance from religion, that is, where religion will not interfere in the functioning of the state,

Where the arbitrariness of religion will not work,

Where there will be an empire of scientific culture and thought,

Where superstition, hypocrisy, beliefs, irrationality, irrationality will be annihilated,

Where knowledge-science and technology will dominate,

Where the empire of scientific culture will be established,

Where there will be love, affection, mutual brotherhood, mutual reconciliation and mutual cooperation all around,

Such a wonderful system is called socialist society and socialist system.


     Here it is also to be kept in mind that this system will not come by itself, but for this the capitalist system based on exploitation, injustice, discrimination and inequality will have to be uprooted on the strength of the unity of human beings i.e. communists, workers, farmers and toiling people. 


       Friends and comrades, let us join the May Day campaign to demand eight-hour working hours and show our determination and iron will to organize and work unitedly to overthrow the capitalist system and establish an exploitation-free  socialist system……


Long Live May Day!

Inquilab Zindabad,

Long Live Socialism.


                   Friends, come and participate in large numbers in the programs organized on May Day.


With warm greetings,


Red Salute