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Tuesday, 8 March 2022

Dedicated to all Women

अपनी ख़ुशी टाँगने को, तुम कंधे क्यूँ तलाशती हो?
    कमज़ोर हो, ये वहम क्यों पालती हो??

ख़ुश रहो क़ि ये काजल, तुम्हारी आँखों मे आकर सँवर जाता है!
    ख़ुश रहो क़ि कालिख़ को, तुम निखार देती हो!!

ख़ुश रहो क़ि तुम्हारा माथा, बिंदिया की ख़ुशकिस्मती है!
    ख़ुश रहो क़ि तुम्हारा रोम-रोम, बेशक़ीमती है!!

ख़ुश रहो क़ि तुम न होतीं, तो क्या-क्या न होता?
    न मकानों के घर हुए होते, न आसरा होता!!

न रसोइयों से खुशबुएँ ममता की, उड़ रही होती!
     न त्योहारों पर महफिलें, सज रही होती!!

ख़ुश रहो क़ि तुम बिन, कुछ नहीं है!
    तुम्हारे हुस्न से ये आसमाँ, दिलक़श और ये ज़मीं हसीं है!!

ख़ुश रहो क़ि रब ने तुम्हें पैदा ही, ख़ुद मुख़्तार किया!
    फ़िर क्यों किसी और को तुमने, अपनी मुस्कानों का हक़दार किया!!

ख़ुश रहो जान लो क़ि, तुम क्या हो?
   चांद सूरज हरियाली, हवा हो!!

खुशियाँ देती हो, खुशियाँ पा भी लो!
     कभी बेबात, गुनगुना भी लो!!

अपनी मुस्कुराहटों के फूलों को,अपने संघर्ष की मिट्टी में खिलने दो!
    अपने पंखों की ताकत को, नया आसमान मिलने दो!!

और हाँ मत ढूँढो कंधे!
       क़ि सहारे, सरक जाया करते हैं!!

😊  Dedicated to all Womens

8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: अतीत और वर्तमान. - अमिता शीरी




अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास उन मेहनतकश  औरतों को समर्पित है जिन्होंने बहुत संघर्ष करके औरतों के लिए वे सारे अधिकार हासिल किये थे जिनके दम पर औरतें आज आज़ादी की चन्द सांसें ले रही हैं. यह भी सच है कि दुनिया की अधिकांश औरतें आज भी मेहनत कर रही हैं. यह भी सच है कि तमाम प्रतिक्रियावादी ताकतें आज फिर से औरतों को इतिहास के उसी अन्धेरे कोने में ढकेल देना चाहती हैं जिससे निकलने के लिए हमारी पुरखिन पूर्वजों ने अथक परिश्रम किया था. 
आज से ठीक 112 साल पहले सन 1910 में पहली बार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी. जर्मनी की विख्यात समाजवादी नेत्री क्लारा जेटकिन ने डेनमार्क के कोपेनहेगन में आयोजित मेहनतकश औरतों के अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा कि औरतों के अधिकारों के सम्मान और औरतों के लिए सार्वजनिन मताधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक दिन मनाया जाए. 17 देशों से आई लगभग 100 प्रतिनिधियों ने ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को पारित कर दिया. उस वक्त इसके लिए कोई एक निश्चित तिथि निर्धारित नहीं की गई. 
लिये गए निर्णय के मुताबिक 19 मार्च 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैण्ड में पहली बार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया. तकरीबन 10 लाख लोगों ने विभिन्न रैलियों और प्रदर्शन में हिस्सेदारी की.  वोट देने के अधिकार के अलावा प्रदर्शनकारियों की मांगें थीं कि उन्हें काम करने का अधिकार दिया जाए, व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया जाए तथा नौकरियों में औरतों और पुरुषों में व्याप्त गै़रबराबरी ख़त्म की जाए. 19 मार्च का दिन इसलिए तय किया गया क्योंकि इसी दिन 1848 में प्रशा के राजा ने एक सशस्त्र बग़ावत के बाद कई सुधारों का वादा किया गया जिसमें एक था औरतों के लिए वोट देने का अधिकार, जिसे अभी तक पूरा नहीं किया गया था. 
1913 में इस तिथि को बदल कर 8 मार्च कर दिया गया. ऐसा इस दिन मेहनतकश वर्ग के इतिहास के दो महत्वपूर्ण दिन की याद में किया गया. 8 मार्च 1857 में अमेरिका के न्यूयार्क शहर की कपड़ा फैक्ट्रियों और टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिला मजदूरों ने पहली बार एक प्रतिरोध प्रदर्शन किया था. यह प्रतिरोध महिला मजदूरों की अमानवीय कार्य दशा के विरोध में था. ये औरतें अत्यन्त अमानवीय दशा में 16-16 घण्टे बहुत कम वेतन पर काम करतीं. इनके बच्चे कई-कई दिन अपनी मांओं की शक्ल नहीं देख पाते थे. सुबह जब वे काम पर जा रहीं होतीं उस समय वे सोते रहते और जब वे रात में वापस काम पर आतीं तो बच्चे फिर से सो जाते. इन महिला मजदूरों ने अपनी ख़राब दशा के खिलाफ़ पहली बार प्रतिरोध किया. उस वक्त भी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने हमला किया और प्रदर्शनकारियों को तितरबितर कर दिया. इसके दो साल बाद पहली बार मार्च में ही महिला मजदूरों ने अपना पहला यूनियन बनाया. 
पुनः 8 मार्च 1908 को न्यूयार्क शहर में 15000 औरतों ने मार्च निकाला. उनकी मांग थी कि काम के घण्टे कम किये जाएं, बेहतर वेतन दिया जाए, औरतों को भी वोट देने का अधिकार दिया जाए तथा बाल मजदूरी का खात्मा किया जाए. इस बार उनका नारा था 'रोटी और गुलाब'. इसमें रोटी प्रतीक थी आर्थिक सुरक्षा की तथा गुलाब प्रतीक था बेहतर जीवन स्थितियों का. इसी साल अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने हर साल फरवरी के अन्तिम रविवार को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया. 
28 फरवरी 1909 को समूचे अमेरिका में पहली बार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया. जल्दी ही यूरोप में भी फरवरी के अन्तिम रविवार को महिला दिवस मनाया जाने लगा. इसी पृष्ठभूमि में क्लारा जेटकिन ने 1910 में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा. 
इसी दौरान 25 मार्च 1911 में अमेरिका में एक त्रासदी हुई. ट्रायंगल अग्निकांड में  140 मजदूर लड़कियों की मौत हो गयी. इस घटना का अमेरिका में मजदूर कानूनों पर दूरगामी प्रभाव पड़ा. इससे अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस को और भी प्रेरित किया. 
1913 में प्रथम विश्वयुद्ध की पूर्वसंध्या में रूसी औरतों ने अपना पहला अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया. समूचे यूरोप में 8 मार्च और इसके आसपास अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा. इन सबमें सबसे प्रसिद्ध हुई सेंट पीटर्सबर्ग में 8 मार्च 1917 (रूसी कैलेण्डर के हिसाब से 24 फरवरी 1917) को रूसी औरतों के नेतृत्व में आयोजित 'रोटी और षान्ति' के लिये की गई स्ट्राइक. इसमें मेहनतकश वर्ग की दो प्रसिद्ध नेत्री क्लारा जेटकिन और एलेक्ज़ान्द्रा कोलोन्ताई ने हिस्सेदारी की. अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में आयोजित यह स्ट्राइक 8-12 मार्च के बीच पूरे शहर में फैल गई. बाद में यह प्रसिद्ध फरवरी क्रान्ति में तब्दील हो गया जिसने ज़ार के शासन को उखाड़ फंेका और पूरी दुनिया को झकझोर दिया.
समाजवादी रूस में 8 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में घोषित किया गया. और तबसे 8 मार्च मजदूर औरतोें के  संघर्ष का शानदार प्रतीक बन गया. समाजवादी रूस आगे चलकर औरतों के अधिकारों के लिए एक शानदार मिसाल बन गया और पूरी दुनिया में महिला आन्दोलन को प्रभावित किया. आगे चलकर 1949 में चीनी क्रान्ति ने औरतों की शानदार उपलब्धि पर मुहर लगाई. चीनी क्रान्ति ने स्थापित किया कि कैसे एक घोर सामन्ती, पिछड़े हुए और पितृसत्तात्मक समाज में भी औरतों के अधिकारों की जीत को स्थापित किया जा सकता है. महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति ने औरतों की मुक्ति की लड़ाई को एक और मुकम्मल मुकाम प्रदान किया. 
1960 और 1970 के दशक में पूंजीवादी देशों में एक सशक्त जनवादी आन्दोलन छिड़ गया. वहीं तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों ने ज़ोर पकड़ लिया. साथ ही एक सशक्त नारी मुक्ति आन्दोलन भी सतह पर उभर कर आ गया. इन आन्दोलनों से साम्राज्यवादी सत्ताएं डोलने लगीं.
इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यवाद ने तमाम सारे मुक्ति आन्दोलनों को कुचलने के कई सारे हथकण्डे अपनाने शुरू किये. इनमें से एक था इन आन्दोलनों को और इनके प्रतीकों को स्वयं में मिला लेने का. बड़ी मात्रा में आर्थिक अनुदान देकर कोरपोरेट और राज्य प्रायोजित एनजीओ के माध्यम से समाजवाद पर हमले शुरू किये गए. भ्रमित करने के लिए बूर्जुआ नारीवाद का एक विकल्प परोसा गया. समावेशीकरण के इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ ने साल 1975 को अन्तरराष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप मनाने की घोषणा की और इसी साल 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा भी की गई. 
धीरे-धीरे मेहनतकश औरतों के शानदार संघर्ष के प्रतीक 8 मार्च के इस दिन को तमाम सारी प्रतिगामी शक्तियां भी मनाने लगीं. आज इस दिन पर बाज़ार का कब्ज़ा हो गया है. यह दिन कभी लक्मे महिला दिवस तो कभी पॉन्ड्स महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. 
समाजवाद व कम्युनिस्ट आन्दोलन की तात्कालिक पराजय के कारण दुनिया भर में औरतों के संघर्षों को धक्का पहुंचा है. वैश्वीकरण की साम्राज्यवादी आंधी में औरतों को एक बार फिर शिकस्त देने की तैयारी चल रही है. कामगार लोगों के काम के घण्टों को बढ़ाया जा रहा है. औरतों को वापस किचेन में ढकेलने की कवायद चल रही है.
परन्तु तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि आज भी पूरी दुनिया में औरतें अपनी मुक्ति के लिए अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं. तो ज़रूरी है कि हम प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथों से अपने संघर्षों के प्रतीक इस दिन को छुड़ा लें और अपनी मेहनतकश औरतों के प्रतीक इस यादगार दिन को अपनी विरासत के रूप में घोषित करें. 8 मार्च, अन्तरराष्ट्रीय दिवस मेहनत करने वाली औरतों का एक प्रतीक यादगार दिन है और यही हमारी ताकत है और यह हमारी पहचान का दिन है!

*अमिता शीरी*
*मुक्ति अंक 4 से....*

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Monday, 7 March 2022

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के मौके पर प्रस्तुत हैं समाज में स्त्रियों की गुलामी और बदहाली से जुड़े कुछ उद्धरण :



  *(स्‍त्री प्रश्‍न पर लेनिन के साथ महान कम्‍युनिस्‍ट स्‍त्री संगठनकर्ता और नेत्री क्‍लारा ज़ेटकिन के लम्‍बे साक्षात्‍कार का अंश)* 
 
'बहुत कम पति, यहाँ तक कि सर्वहारा भी नहीं, यह सोचते हैं कि अगर वे इस 'औरतों के काम' में हाथ बँटायें तो वे अपनी पत्नियों का कितना बोझ और चिंताएँ कम कर सकते हैं, या उन्‍हें पूरी तरह इनसे राहत दे सकते हैं। लेकिन नहीं, यह तो 'पति के विशेषाधिकार और गरिमा' के ख़ि‍लाफ़ चला जायेगा। वह माँग करता है कि उसे आराम और सुविधा चाहिए। स्‍त्री का घरेलू जीवन एक हज़ार छोटे-छोटे कामों में अपने आपको क़ुर्बान करना होता है। उसके पति, उसके स्‍वामी और प्रभु, के प्राचीन अधिकार चुपचाप क़ायम रहते हैं। लेकिन वस्‍तुगत रूप से, उसकी दासी अपना प्रतिशोध ले लेती है। यह भी छिपे रूप में होता है। उसका पिछड़ापन और अपने पति के क्रान्तिकारी आदर्शों की समझ की उसकी कमी पति की जुझारू भावना और लड़ने के उसके हौसले को पीछे खींचती है। छुद्र कीड़ों की तरह वे धीरे-धीरे, मगर लगातार कुतर-कुतर कर उसे कमज़ोर बनाते हैं। मैं मज़दूरों के जीवन को जानता हूँ, और सिर्फ़ किताबों से नहीं जानता। स्‍त्री जनसमुदाय के बीच हमारे कम्‍युनिस्‍ट कार्य, और आम तौर पर हमारे राजनीतिक कार्य में पुरुषों के बीच व्‍यापक शैक्षिक काम करना शामिल है। हमें पार्टी से, और जनसमुदाय से, पुराने दास-स्‍वामी वाले दृष्टिकोण को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। यह हमारा एक राजनीतिक कार्यभार है....।
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"युध्द में चली हर गोली अंततः किसी महिला की छाती में ही लगती है।"
 *--मैक्सिम गोर्की* 

"जब कोई पुरुष एक स्त्री की शक्ति को नज़रअंदाज करता है, तो दरअसल वह अपने ही विवेक को मार रहा होता है।"
-- *अमृता प्रीतम* 
 
 *भारतीय राष्ट्रीय जागरण के मनीषी राधामोहन गोकुल जी की पुस्तक 'स्त्रियों की स्वाधीनता' (जो कि स्त्री प्रश्नों पर आधारित तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके 6 लेखों का संकलन है, जिसे पुस्तिका के रूप में राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है) से कुछ उद्धरण|* 👇
 
1-    स्त्रियों को पराधीनता की बेड़ी से जकड़ना बड़ी भूल है...| पुरुषों का कभी-कभी यह ताना देना कि स्त्री रण क्षेत्र में जाया करे, और दूसरे बड़े-बूढ़े कठिनाई के काम किया करें, ठीक नहीं है, क्योंकि स्त्रियां भी तो कह सकती हैं कि पुरुष बच्चे जन लिया करें और अन्य अनेक प्रकार के काम-जो प्रकृति ने स्त्रियों के लिए ही बनाए हैं--पुरुष कर लिया करें| यह सूखा तर्क कठुवाद था --खाली जबानदराजी है| इससे हमारे इस तर्क को तनिक भी धक्का नहीं पहुंचता है कि स्त्री-पुरुषों के सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और साम्पत्तिक अधिकार एक समान होने चाहिए
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2-    स्त्री का सर्वस्व पति है| परंतु पति की संपत्ति में स्त्री का हक एक पाई भी नहीं| क्यों? इसलिए कि नारी उसका आधा अंग है? बेचारी स्त्री न तो पिता की संपत्ति में हिस्सा पा सकती है न पति या पुत्र की संपत्ति में| आजन्म केवल गुलामी करते रहना ही उसका धर्म है| वाह! अर्धांगिनी का क्या सुंदर सम्मान है।
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3-    खरीदी हुई दासी चाहे अपने क्रेता के सहवास से इंकार कर दे| परंतु विवाहिता को इस बात का अधिकार नहीं|... स्त्री यदि अपने पति से दया, प्रेम, अन्न, वस्त्र आदि किसी चीज की आशा कर सकती है, तो केवल अपनी अनन्य सेवा के बदले में| इसके सिवा उसका और कोई हक नहीं| घर की संपत्ति को पति चाहे जैसे उड़ा दे, नष्ट भ्रष्ट कर डाले, उसे अधिकार है, परंतु उसकी अर्धांगिनी एक कौड़ी भी खर्च करने का अधिकार नहीं रखती|
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4-    यह कहना कि लड़के अपने माता पिता की आज्ञाएँ माना करें, पत्नियां पतियों की सब आज्ञा का पालन किया करें और दास अपने स्वामियों की इच्छा के अनुकूल ही सब काम करें, यही उनका धर्म है और इसीलिए भी बनाए गए हैं| वास्तव में इस तरह का तर्क बड़ा ही बेहूदा मालूम होता है|
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5-    गंदापन मनुष्यों की अपेक्षा स्त्रियों में कम होता है| क्योंकि श्रृंगार का प्रेम जितना नारियों में स्वाभाविक होता है, उतना पुरुषों में नहीं होता| फिर स्त्रियां क्यों गंदी मानी जाती हैं, यह समझ में नहीं आता है| यदि उनके मासिक धर्म आदि के ख्याल से अपवित्र कहा जाए तो सरासर अन्याय है, क्योंकि वह प्राकृतिक है और सृष्टि हेतु है, इसलिए वह घृणा की वस्तु नहीं है|
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6-    ऐसे बहुत थोड़े उदाहरण मिलेंगे जिनमें स्त्रियों ने आगे बढ़कर पुरुषों को दुराचार में प्रवृत्त किया है| प्रायः यही देखा जाता है कि पुरुष ही स्त्रियों को कुमार्गगामिनी बनाया करते हैं| क्या स्त्रियों की पाशविक कामना की तृप्ति के लिए कहीं पुरुषों का बाजार भी है, जहां स्त्रियां स्वच्छंदता से जा सकती हैं? परंतु पुरुषों की कामासक्ति के लिए स्त्रियों का बाजार सर्वत्र देखा जाता है| क्या पुरुषों का नैतिक पतन सिद्ध करने के लिए यह एक ही उदाहरण काफी नहीं है? 
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7-    कहते हैं स्त्रियाँ मूढ़ और अज्ञानी होती हैं| ठीक, अगर शूद्रों और स्त्रियों को पढ़ाना-लिखाना बंद करके पोथी लिखने वाले उन पर अज्ञानता का दोष लगावें तो अपराधी कौन? पंडित लोग| ...हम उन्हें घरों में बंद करके अबला बनाते हैं| ...स्त्रियों में जो त्रुटियां देखी जाती हैं, ये नैसर्गिक या स्वाभाविक नहीं, किंतु बनावटी हैं, और इन सबके जिम्मेदार पुरुष हैं, न कि स्त्रियां|
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8-    भारत के पतन का प्रधान कारण लड़कियों को दान कर देने, दे डालने और बेच देने की चीज समझना है| जो वस्तु पशु या जड़ पदार्थों की तरह बेची या दे डाली जा सकती है, उसकी प्रतिष्ठा नहीं रह सकती| कितने ही कुलीनों में बहुत-सा धन लेकर वर, कन्या का पाणिग्रहण ग्रहण करता है, इसलिए भी स्वार्थी धनलोलुप कुलीन पुरुषों में स्त्रियों की कदर नहीं होती| वह बहुधा चाहते हैं कि स्त्री मर जाय, तो फिर नई स्त्री और हराम का धन हाथ आवे| इन दोनों बातों में स्त्री जाति का घोर अपमान होता है| स्त्रियों को जान लेना चाहिए कि उनका पहला काम इन दोनों प्रथाओं को मिटाना है| यदि पिता धन लेकर या दहेज देने का इकरार करके विवाह करते हैं, तो स्त्रियों को ऐसे विवाह को संपन्न ना होने देना चाहिए| विवाह कैसा भी हो, वर और कन्या की अनुमति का प्रावधान होना जरूरी है| इसके लिए महिलाओं की ओर आंदोलन होना चाहिए|
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9-    क्या हिंदू, क्या मुसलमान, जिनके यहां देखोगे स्त्रियां भिखारनियों की तरह अपने पतियों और पुत्रों के सामने टके-टके के लिए हाथ फैलाती नजर आयेंगी| जहां किसी माता, स्त्री, बहन ने चार पैसे मांगे कि पुरुष का पहला प्रश्न होता है कि 'कल मैंने एक आना दिया था उसका क्या हुआ?' दूसरा प्रश्न यह होता है कि-- 'तुम पैसे का क्या करोगी? कौन काम है जिसके लिए तुम्हें पैसे की जरूरत पड़ी?' बेचारी माता और पत्नी भय से कांप उठती है| उनमें यह शक्ति कहा कि पूछ बैठे कि तुम्हारे खाने पहनने और फुटकर खर्च में कितना उठता है? कितना पैसा है? सब का हिसाब तो बताओ! ऐसी कायर भिखमंगी माता की गोद में पले बच्चे कैसे होंगे, यह पाठकों के समझने की बात है|
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10- मैं पूछता हूं कि क्या यह संभव है कि जिसे हम प्यार ना करें, जिसे हम हेय, नीच और दासी समझें, वह हमें प्यार करेगी और शुद्ध हृदय से प्यार करेगी? ... जब पशु-पक्षी भी पराधीनता को अपने वश पड़ते नहीं सहन कर सकते तो हम कैसे आशा कर सकते हैं, मनुष्य दूसरे मनुष्य के अधीन रहकर सुखी रहेगा? स्त्रियाँ भी मनुष्य हैं, वे कब इस बात को देखकर सुख मान सकती हैं कि उनके खाने के दाने-दाने पर, उनके वस्त्रों के तार-तार पर पुरुषों की मुहर हो और पुरुष चाहे जो खाएं-उडाएं, कोई पूछने वाला न हो|
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11- जिस प्रकार धनवान निर्धन को, सबल निर्बल को, शासक शासित को, स्वामी सेवक को पीसने में ही अपने महत्व का भान करता है, उसी प्रकार पुरुष स्त्रियों को सताने और दबाने में अपनी वीरता का अभ्युदय देखते हैं| सड़कों की नाली साफ करने वाला, मिलो में मजदूरी करने वाला भी दिनभर लाते खाने के बाद जब घर आता है, तो अपनी पत्नी पर वैसी ही हुकूमत करता है, जैसे राज्य कर्मचारी जनता पर करते हैं| इसीलिए कहना पड़ता है कि स्त्रियां दासों की भी दास हैं|
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12- पुस्तके प्रायः पुरुषों द्वारा लिखी जाती हैं इसलिए स्त्रियाँ उनको मानने को बाध्य नहीं हो सकतीं| जो धर्म शास्त्रों की, वेद, बाइबल, कुरान आदि की लिखने वाली स्त्रियां होतीं तो आज उनके भाव, भाषा, आदेश, उपदेश में बड़ा अंतर होता| इन पुस्तकों में तो स्त्रियों की अवज्ञा, प्रतिष्ठा इनकार, अनादर भरा पड़ा है| स्त्रियां पुरुषों के भोग की सामग्री बताई गई हैं| इन पुस्तकों के वाक्यों से सिद्ध होता है कि ईश्वरीय ज्ञान के दावेदार महाशयगण कुछ नहीं जानते थे| उन्हें मनुष्यों के स्वत्वों और दायित्वों का कुछ भी पता ना था| वे स्वातन्त्र्य के शत्रु और पशु-बल के पोषक थे| उनके सिद्धांतों ने मनुष्यों में ज्ञान की कमी और पशुता की वृद्धि की|
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 - *संकलन-सहकार रेडियो टीम* 

Sunday, 6 March 2022

सरकार की मोडस ऑफ़ ऑपरेंडी

सरकार की मोडस ऑफ़ ऑपरेंडी

अगर आप यूक्रेन में फंसे हो - तो टाइम पे वापिस क्यों नहीं निकले 

छोटे देशों में पढ़ने गए - तो क्यों गए , बड़े देशों में जाओ 

छोटे देशों में पढ़ने गए - कामचोर अयोग्य हो , तभी तो यूक्रेन जैसे देश में पैसों से ऐडमिशन लिया ,अब मरो वंही। 

विमान कम्पनी किराया ज्यादा वसूल रहीं हैं - तो भरो , हम क्या करें 

अगर आपकी नौकरी जाती है - तो आप निकम्मे हो , अयोग्य हो 

अगर आप धंधा चौपट होता है - तो आप कामचोर हो 

अगर सरकारी कंपनी बिकेगी - तो सरकारी कर्मचारी निकम्मे हैं 

महामारी में आपके पास खाने को नहीं है - तो घर मत जाओ , अपने कमरे में ही मर जाओ 

अगर रेलवे और अन्य संस्थानों में वैकेंसी नहीं निकल रही - तो पकोड़े तलो , स्वरोजगार करो 

नौकरी नहीं है - लिप सिंक वीडियो बनाओ 

अगर ऑक्सीजन की कमी है तो - आप मर जाओ 

महामारी में लाखों मर गए - कांग्रेस होती तो करोड़ो मरते 

स्कूल फीस बढ़ती है - तो जितनी औकात है उतने लेवल के स्कूल में पढ़ाओ 

पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं - तो साइकिल से चलो 

दाल महंगी - तो सब्जी खाओ 

सब्जी महंगी - तो उपवास रखो 

महंगाई बढ़ रही है -  महंगाई अच्छी होती है 

देश का क़र्ज़ बढ़ गया है - पकिस्तान को देखो , पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है

सरकारी अर्ध-सरकारी संस्थान पूंजीपतियों को बिक रहें है - सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है 

बैंक घोटाले हुए - तो ये तो कांग्रेस की वजह से हुआ 

महंगाई - कांग्रेस की वजह से 

पूंजीपति लोन लेके विदेश भाग गए - कांग्रेस की वजह से 

चीन पाकिस्तान प्रॉब्लम - नेहरू की वजह से 

गुंडा गर्दी - सपा की वजह से 

शरणार्थी समस्या - ममता की वजह से 

श्रीलंका तमिल समस्या - स्टालिन की वजह से 

अगर पार्टी कही चुनाव हारती है - तो जनता मूर्ख है , हिन्दू फिर सो गए। 

वाचस्पति शर्मा 


शिवरात्रि



लिंग पूजा की क़बीलाई टोटेम को शिव पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में समाहित कर इसे परंपरा से जोड़ दिया गया,जिसे कालक्रम से पूरे देश के हिन्दू समुदाय के बीच प्रतिष्ठापित और प्रचारित-प्रसारित कर धार्मिक संस्थाओं का अभिन्न अंग बना दिया गया है।विशेष अवसरों पर शिव की पूजा शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। लेकिन, शिव पूजा अधिकतर हिन्दुओं में रोजमर्रा की आस्था अभिव्यक्ति का माध्यम हो गया है।

अन्य राज्यों की बात तो मैं नहीं जानता, पर बिहार में इधर करीब बीस सालों में एक अन्य धार्मिक परंपरा " शिव चर्चा " की भी शुरुआत हो गई है, जो अब शहरों से लेकर गांवों तक प्रचारित-प्रसारित कर दिया गया है। आज की तारीख में यह शिवचर्चा उच्च सवर्ण जातियों की अपेक्षा पिछड़ी जातियों के बीच ज्यादा लोकप्रिय होता जा रहा है। मैंने यह देखा है कि इसके माध्यम से भाजपा की पैठ पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के बीच गहरा होता जा रहा है।

भारत और भारतीयों को ऐसे देवताओं, मंदिरों और मूर्तियों के माध्यम से जड़ता की जंजीरों में हजारों साल से बांधा गया है, और यह जकड़न अब और भी बढ़ती जा रही है। इन अवतारों, त्रिदेवों, देवताओं, देवियों को मंदिरों में प्रतिष्ठापित कर भारतीय जनमानस को जड़ता की अंधेरी गुफा में ढकेल दिया गया है, जहां से निकलना उनके लिए संभव नहीं है। पत्थरों की पूजा ने अधिकतर भारतीयों को पत्थर जैसा ही ह्रदयहीन बना दिया है।

अकर्मण्यता, पाखंड, कर्मकांड, मूर्तिपूजा,भाग्यवादी और अंधविश्वास के साथ-साथ ही देवपूजा ने भारतीयों को हर तरह के पापकर्म, कुकर्म, दुष्कर्म, अपराध करने का सामाजिक और धार्मिक अनुज्ञप्ति ( लाइसेंस ) भी मिल जाता है। राम राम जपने और मंदिरों में पूजा करने वाले को लोग सामान्यतया अच्छा मनुष्य भी मान लेते हैं, या यह उनके दुष्कर्मों के औचित्य का साधन बन जाता है। मैंने आजतक कभी भी मंदिरों में पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और रतजगा करने वालों को कभी भी और किसी भी तरह के पापकर्म करने में हिचकिचाते नहीं देखा है। वे बड़े आराम से और निश्चिंत होकर कोई भी पापकर्म हंसते हुए कर लेने में सक्षम होते हैं। मूर्तिपूजा पापकर्म करने का नैतिक भय ही उनके मन से खत्म कर देता है।

पूरा भारतीय समाज ऐसे ही तत्त्वों का मकड़जाल है, जिससे बाहर निकलना बहुत ही कम लोगों के लिए संभव है। यह सोचने वाली बात है कि जो व्यक्ति निर्जीव पत्थरों के आगे शरणागत है, वह अपने से ताकतवर मालिक के आगे कितना नतमस्तक होगा। राजसत्ता के आगे जनसत्ता के समर्पण को सुनिश्चित कराने के लिए ही भारत में धार्मिक कर्मकांडों,पाखंडों, देवी-देवताओं की मूर्तियों और मंदिरों का जाल बिछाया गया है।यह जाल भारत के लोगों के लिए दमघोंटू बन गया है। इसलिए जबतक पूरे भारत में बिछे इस जाल को काटा नहीं जाएगा, भारत न भारतीय कभी भी गुलामी से मुक्त नहीं हो सकते।

Ram Ayodhya Singh

मारपीट और जबरन 'जय श्री राम'

इस तरह का मारपीट और जबरन 'जय श्री राम' कहने के लिए जो तरीका अपनाया गया एवं अन्य जगहों में भी देखने को मिल जाता है वह बहुत ही निंदनीय,आपत्ति जनक एवं पूर्णतया जनवाद विरोधी क़दम है। हमारे देश के संविधान में धर्मनिरपेक्षता तथा सभी नागरिक को धर्म का समान अधिकार का उल्लेख है, फिर भी एक ईसाई धर्म मानने वाले व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार किया जाना क्या संविधान का मज़ाक उड़ाना नहीं है? हिंदू बहुल देश होने का क्या यही पहचान है? हम जानते हैं कि दुनिया के अनेकों देश में यहां के हिंदू बसे हैं , पढ़ते हैंतथा  विभिन्न कार्यों में लिप्त हैं। अगर जवाबी प्रतिक्रिया में वहां के धर्मावलंबी या वहां के नागरिक प्रतिशोधात्मक  व्यवहार करें तो फिर उसका नतीजा क्या होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। हिंदू बहुल देश होने के नाते इस तरह के मारपीट और बल प्रयोग का किया जाना सर्वथा अनुचित कदम है तथा ऐसे कृत्य की भर्त्सना पूरे देश के स्तर पर की जानी चाहिए। धर्म का प्रचार जो कोई भी करता है  करें , कोई किसी धर्म को मानता है माने या किसी दूसरे धर्म को अपना कर धर्म परिवर्तन करता है तो करे,या  किसी कोई भी धर्म को न मानना है न माने ,यह प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत मामला है और यही जनवादी कदम भी है।
               पूंजीपति वर्ग धड़ल्ले से अपनी पूंजी का निवेश दुनियां के किसी भी देश में कर सकता है. मजदूरों का शोषण- दमन कर सकता है, इस पर यहां के धर्मावलंबियों का किसी भी तरह की प्रतिक्रिया कभी भी देखने को नहीं मिलती  है। देशी पूंजी की पक्षधरता करने वाले आज विदेशी निवेश के लिए चारों दिशा के दरवाजे खोल दिए हैं.वास्तविकता तो यह है कि धार्मिक द्वेष फैलाने को ऐसे लोगों को यहां के शासक वर्ग द्वारा ही तरजीह दी जाती है ताकि समाज में समुदायों के बीच विभाजन बना रहे और शासक वर्ग को अपने हिसाब से शासन चलाने में किसी भी तरह विरोध का सामना न करना पड़े। भारत को छोड़कर दुनियां के अन्य  देशों में या तो ईसाई धर्म या इस्लाम या बुद्धिज़्म को मानने वाले लोग रहते हैं। उन देशों के पूंजीपतियों की पूंजी यहां आकर लगे इसके लिए हमारे देश का शासक वर्ग लगातार प्रयत्नशील भी रहता है . उस वक्त धर्म बाधा क्यों नहीं बनता ? दुनियां के पूंजीपतियों के बीच अपनी पूंजी निवेश के मामले में एकता देखने को मिलती है और धर्म के नाम पर उन्माद फैला  हमारी और आम अवाम की एकता एवं भाईचारे में अलगाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है.इससे मजदूर वर्ग को सजग एवं सावधान होने की जरुरत है.
                इसलिए आज हमारे देश के बहुसंख्यक आवाम यथा मजदूर वर्ग का दायित्व है कि वह शासक वर्ग के द्वारा धर्म के आधार पर समाज में लोगों के बीच फैलाए जा रहे धार्मिक द्वेष एवं विभाजन करने के प्रयास को उजागर करे। इतना ही नहीं, हमारे देश के प्रबुद्ध एवं जनवादी  लोगों द्वारा भी उसी तत्परता से शासक वर्ग के कुत्सित प्रयास का भंडाफोड़ करने का काम अपने हाथों में लिया जाना चाहिए, यही आज के समय की मांग भी है। 
                    यह सर्वविदित है कि हिंदू समाज का जो कमजोर वर्ग है, उसी समूह के लोग ईसाई या इस्लाम या बौद्ध धर्म में गए हैं जिसका मुख्य कारण यह रहा है कि वैसे समुदाय के लोगों के साथ देश में दोयम दर्जा तथा गैर जनवादी तरीके से असमानता  का व्यवहार हिंदू समुदाय का दबंग वर्ग करता था और आज भी एक दूरी तक करते हुए देखने को मिलता है। कोई कमजोर समुदाय का व्यक्ति अगर मूंछ रख ले तो उसकी पिटाई हो जाती है, कोई घोड़े पर चढ़कर बाजे गाजे के साथ शादी नहीं कर सकता। यह किसी भी प्रबुद्ध नागरिक को मालूम है आम हिंदू के श्मशान घाट पर उन्हें अपने मृतक का दाह संस्कार करने से रोकते भी हैं। ऐसी घटनाओं का जिक्र आज भी देश में सुनने को मिलता रहता है। जबकि वस्तुत: वे लोग भी मजदूर वर्ग के ही हिस्से हैं तथा आज वे अपने जनवादी अधिकारों के लिए  आवाज भी बुलन्द कर भी रहे हैं। आज मजदूर वर्ग का यह दायित्व बनता है कि उनके संघर्षों के साथ कंधे से कंधे मिलाते हुए उनके जनवादी अधिकार को हासिल किया जाए ताकि एक साथ मिलकर सभी तरह के शोषण दमन के खिलाफ संघर्ष को गति प्रदान किया जा सके। इतना ही नहीं आजकल शासक वर्ग के रहनुमा धर्मांतरण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। वस्तुत: ऐसा कृत्य भी समाज में लोगों के बीच विभाजन का काम करता है। अतः समाज में विभाजन करने वाली शक्तियों से सजग रहते हुए उनका भंडाफोड़ करना आज के समय की मांग है।
RBC

जंग सीमाओं पर नहीं, औरतों के शरीरों पर

जंग सीमाओं पर नहीं, औरतों के शरीरों पर भी लड़ी जाती है ताकि मर्द अपनी हार का गुस्सा या जीत का जश्न मना सकें! -- मृदुलिका झा

"13 साल की थी, जब खेत पर जाते हुए जापानी सैनिकों ने मुझे उठा लिया और लॉरी में डालकर मुंह में मोजे ठूंस दिए, बदबूदार- ग्रीस और कीचड़ से सने हुए। फिर बारी-बारी से सबने मेरा रेप किया। कितनों ने, नहीं पता। मैं बेहोश हो चुकी थी। होश आया तो जापान के किसी हिस्से में थी। एक लंबे कमरे में तीन संकरे रोशनदान थे, जहां लगभग 400 कोरियन लड़कियां थीं।
उसी रात पता लगा कि हमें 5 हजार से ज्यादा जापानी सैनिकों को 'खुश करना' है। यानी एक कोरियन लड़की को रोज 40 से ज्यादा मर्दों का रेप सहना है।"

चोंग ओके सन (Chong Ok-sun) का ये बयान साल 1996 में यूनाइटेड नेशन्स की रिपोर्ट में छपा था। इस रिपोर्ट पर कभी खुलकर बात नहीं हुई। ये दरअसल शरीर का वो खुला हिस्सा था, जिसे छिपाए रखने में ही बेहतरी थी, वरना इंसानियत नंगी हो जाती।

बात दूसरे विश्व युद्ध की है। जापान ताकतवर था। उसके लाखों सैनिक जंग लड़ रहे थे। राशन और गोला-बारूद तो उनके पास थे, लेकिन शरीर की जरूरत के लिए लड़कियां नहीं थीं। तो बेहद ऑर्गेनाइज्ड जापान ने इसके लिए एक तरीका निकाला। वो 'कुंवारी' कोरियन, चीनी, फिलीपीनी लड़कियों को पकड़ता और अपने कंफर्ट स्टेशन्स में कैद कर लेता। कंफर्ट स्टेशन उस जगह का नाम है, जहां लड़कियां सेक्स स्लेव की तरह रखी जातीं।

1944 की यह तस्वीर अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स में रखी है। ये महिलाएं सेक्स स्लेव्स हैं, जिन्हें दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सैनिकों की शारीरिक भूख मिटाने के लिए चीन में बंधक बनाया गया था। तब इन्हें कम्फर्ट वुमन कहा जाता था। माना जाता है कि जापानी सेना ने चीन-कोरिया समेत कब्जाए गए इलाकों में 2 लाख से ज्यादा महिलाओं को सैनिकों की हवस मिटाने के लिए गुलाम बनाया था।

कच्ची उम्र की एक-एक बच्ची रोज 40 से 50 पके हुए सैनिकों को सर्व करती। जो विरोध करती, उसका गैंगरेप सबक की तरह सारी लड़कियों के सामने होता और फिर बंदूक की नोंक मार-मारकर ही उसकी जान ले ली जाती। गोली से नहीं- क्योंकि सैनिक गुलाम लड़कियों पर गोली भी खर्च नहीं करना चाहते थे।

लड़कियां प्रेगनेंट न हों, इसके लिए भी तगड़ा बंदोबस्त था। हर हफ्ते उन्हें एक इंजेक्शन दिया जाता। 'नंबर 606' नाम के इस इंजेक्शन में ऐसा केमिकल होता, जो नसों में घुलकर प्रेगनेंसी को रोकता, या अबॉर्शन हो जाता। दवा के ढेरों साइड-इफेक्ट थे। लड़कियों की भूख मर जाती, चौबीसों घंटे सिरदर्द रहता। पेट में ऐंठन होती और अंदरुनी अंगों से खून रिसता रहता, लेकिन ये कोई समस्या नहीं थी। जरूरी ये था कि वे प्रेग्नेंट हुए बगैर सैनिकों की भूख मिटाती रहें।

पहले ऊंची रैंक के अफसर रेप किया करते, फिर पुरानी होने के बाद लड़कियों को नीचे की रैंक के सैनिकों के पास छोड़ा जाने लगा, लेकिन एक बात कॉमन थी कि रोज पचासों मर्दों की भूख मिटाने वाली किसी लड़की को यौन बीमारी हो जाए वो रातोंरात गायब हो जाती। जापानी सैनिक अपनी साफ-सफाई और हेल्थ को लेकर काफी पाबंद थे!"

ये औरतें युद्ध की वो कहानी हैं, जो कभी नहीं कही जाएंगी। या कही भी जाएंगी तो खुसफुसाकर, जैसे किसी शर्म को ढंका जा रहा हो।

जंग में मिट्टी के बाद जिसे सबसे ज्यादा रौंदा-कुचला गया, वो है औरत! विश्व युद्धों के अलावा छिटपुट लड़ाइयों में भी औरतें यौन गुलाम बनती रहीं। अमेरिकी जर्नल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग एब्यूज में जिक्र है कि कैसे छोटी-छोटी लड़कियों का यौन शोषण हुआ। सात-आठ साल की बच्चियां जिनके गुदगुदे गाल देखकर प्यार करने को दिल चाहते है, उन बच्चियों को ड्रग्स दिए गए ताकि उनकी देह भर जाए और वे सैनिकों को औरत की तरह सुख दे सकें।

वियतनाम युद्ध में ताकतवर अमेरिकी आर्मी के जाने के बाद देश में बेबी बूम हुआ। एक साथ पचासों हजार बच्चे जन्मे, जिनमें बहुतेरे अपाहिज थे। बहुतेरों की नाबालिक मांओं ने उन यादों से नफरत के चलते जन्म देते ही शिशुओं को सड़क पर फेंक दिया। इन बच्चों को वियतनामी में बुई दोई यानी Dirt of life कहा गया। ये वो बच्चे थे, जिन्हें उनकी मांएं कलेजे से लगाते हुए डरती थीं।

साल 2018 में कांगो के पुरुष गायनेकोलॉजिस्ट डेनिस मुकवेज को नोबेल पुरस्कार मिला- उन औरतों का वजाइना रिपेयर करने के लिए, जो युद्ध में सेक्स स्लेव की तरह इस्तेमाल हुई थीं। एक सवाल ये भी उठता है कि सर्जरी करने वाले को नोबेल जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की बजाय क्या उन स्त्रियों को दुलराया नहीं जाना चाहिए, जो युद्ध के बाद की तकलीफ से जूझ रही थीं।

क्या वजाइना रिपेयरिंग की बजाय कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए थी, जो औरतों की चिथड़ा-चिथड़ा आत्मा को सिल सके?

कल रात यूक्रेन के कीव से एक वॉट्सएप कॉल आया। लड़की रुआंसी थी कि उसके आसपास की तमाम दुकानों में सैनिटरी पैड्स का स्टॉक खत्म हो चुका। 23 साल की लड़की को 30 साल पीछे जाकर कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। बात सुनने में मामूली है, लेकिन ये युद्ध की शुरुआत है, वो युद्ध जो सीमाओं के साथ-साथ औरतों की शरीरों पर लड़ा जाएगा।

सीमा पर युद्ध रुक जाएंगे। मुल्क आपस में हाथ मिलाएंगे। तेल-कोयला-मोबाइल-मसाला के व्यापार चल पड़ेंगे। रुकी रहेंगी तो औरतें। वे औरतें, जो युद्ध में शामिल हुए बिना मारी गईं।

मूल लेखक-अज्ञात