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Friday, 29 April 2022

मई दिवस के अमर शहीद अल्बर्ट पार्सन्स

"हमारी मौत दीवार पर लिखी इबारत बन जायेगी"

मई दिवस के अमर शहीद अल्बर्ट पार्सन्स द्वारा पत्नी व बच्चों को लिखे दो ख़त

अल्बर्ट पार्सन्स मई दिवस के उन चार शहीदों में से एक थे, जिन्होंने मज़दूरों के हक़ और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, और क़ुर्बानी दी। जेल की काल कोठारी से अपनी पत्नी लुसी पार्सन्स व बच्चों को लिखे पत्र मानवता के प्रति उनके प्रेम, आशावाद और जिंदादिली की मिसाल है। उनके दो अविस्मरणीय पत्र प्रस्तुत है :

पत्नी लुसी के नाम अल्बर्ट पार्सन्स का पत्र
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पत्नी लुसी पर्सन्स
मेरी प्रिय पत्नी :

आज सुबह हमारे बारे में हुए फैसले से पूरी दुनिया के अत्याचारियों में ख़ुशी छा गयी है, और शिकागो से लेकर सेण्ट पीटर्सबर्ग तक के पूँजीपति आज दावतों में शराब की नदियाँ बहायेंगे। लेकिन, हमारी मौत दीवार पर लिखी ऐसी इबारत बन जायेगी जो नफ़रत, बैर, ढोंग-पाखण्ड, अदालत के हाथों होने वाली हत्या, अत्याचार और इन्सान के हाथों इन्सान की ग़ुलामी के अन्त की भविष्यवाणी करेगी। दुनियाभर के दबे-कुचले लोग अपनी क़ानूनी बेड़ियों में कसमसा रहे हैं। विराट मज़दूर वर्ग जाग रहा है। गहरी नींद से जागी हुई जनता अपनी ज़ंजीरों को इस तरह तोड़ फेंकेगी जैसे तूफ़ान में नरकुल टूट जाते हैं।

हम सब परिस्थितियों के वश में होते हैं। हम वैसे ही हैं जो परिस्थितियों ने हमें बनाया। यह सच दिन-ब-दिन साफ़ होता जा रहा है।

ऐसा कोई सबूत नहीं था कि जिन आठ लोगों को मौत की सज़ा सुनायी गयी है उनमें से किसी को भी हे-मार्केट की घटना की जानकारी थी, या उसने इसकी सलाह दी या इसे भड़काया। लेकिन इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। सुविधाभोगी वर्ग को एक शिकार चाहिए था, और करोड़पतियों की पाग़ल भीड़ की ख़ून की प्यासी चीख़-पुकार को शान्त करने के लिए हमारी बलि चढ़ायी जा रही है क्योंकि हमारी जान से कम किसी चीज़ से वे सन्तुष्ट नहीं होंगे। आज एकाधिकारी पूँजीपतियों की जीत हुई है! ज़ंजीर में जकड़ा मज़दूर फाँसी के फन्दे पर चढ़ रहा है क्योंकि उसने आज़ादी और हक़ के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत की है।

मेरी प्रिय पत्नी, मुझे तुम्हारे लिए और हमारे छोटे-छोटे बच्चों के लिए अफ़सोस है।

मैं तुम्हें जनता को सौंपता हूँ, क्योंकि तुम आम लोगों में से ही एक हो। तुमसे मेरा एक अनुरोध है – मेरे न रहने पर तुम जल्दबाज़ी में कोई काम नहीं करना, पर समाजवाद के महान आदर्शों को मैं जहाँ छोड़ जाने को बाध्य हो रहा हूँ, तुम उन्हें और ऊँचा उठाना।

मेरे बच्चों को बताना कि उनके पिता ने एक ऐसे समाज में, जहाँ दस में से नौ बच्चों को ग़ुलामी और ग़रीबी में जीवन बिताना पड़ता है, सन्तोष के साथ जीवन बिताने के बजाय उनके लिए आज़ादी और ख़ुशी लाने का प्रयास करते हुए मरना बेहतर समझा। उन्हें आशीष देना; बेचारे छौने, मैं उनसे बेहद प्यार करता हूँ। आह, मेरी प्यारी, मैं चाहे रहूँ या न रहूँ, हम एक हैं। तुम्हारे लिए, जनता और मानवता के लिए मेरा प्यार हमेशा बना रहेगा। अपनी इस कालकोठरी से मैं बार-बार आवाज़ लगाता हूँ : आज़ादी! इन्साफ़! बराबरी!

– अल्बर्ट पार्सन्स

कुक काउण्टी बास्तीय जेल, कोठरी नं. 29, शिकागो, 20 अगस्त, 1886

अल्बर्ट पार्सन्स का अपने बच्चों के नाम पत्र
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मेरे प्यारे बच्चों,

अल्बर्ट आर. पार्सन्स (जूनियर) और बेटी लुलु एडा पार्सन्स,

मैं ये शब्द लिख रहा हूँ और मेरे आँसू तुम्हारा नाम मिटा रहे हैं। हम फिर कभी नहीं मिलेंगे। मेरे प्यारे बच्चों, तुम्हारा पिता तुम्हें बहुत प्यार करता है। अपने प्रियजनों के प्रति अपने प्यार को हम उनके लिए जीकर प्रदर्शित करते हैं और जब आवश्यकता होती है तो उनके लिए मरकर भी। मेरे जीवन और मेरी अस्वाभाविक और क्रूर मृत्यु के बारे में तुम दूसरे लोगों से जान लोगे। तुम्हारे पिता ने स्वाधीनता और प्रसन्नता की वेदी पर अपनी बलि दी है। तुम्हारे लिए मैं एक ईमानदारी और कर्तव्यपालन की विरासत छोड़े जा रहा हूँ। इसे बनाये रखना, और इसी रास्ते पर आगे बढ़ना। अपने प्रति सच्चे बनना, तभी तुम किसी दूसरे के प्रति भी कभी दोषी नहीं हो पाओगे। मेहनती, गम्भीर और हँसमुख बनना। और तुम्हारी माँ! वह बहुत महान है। उसे प्यार करना, उसका आदर करना और उसकी बात मानना।

मेरे बच्चों! मेरे प्यारों! मैं आग्रह करता हूँ कि इस विदाई सन्देश को मेरी हरेक बरसी पर पढ़ना, और मुझमें एक ऐसे इन्सान को याद करना जो सिर्फ तुम लोगों के लिए ही नहीं बल्कि भविष्य की आने वाली पीढ़ियों के लिए क़ुरबान हुआ।

ख़ुश रहो, मेरे प्यारों! विदा!

तुम्हारा पिता

अल्बर्ट आर. पार्सन्स

कालकोठरी नम्बर-7, कुक काउण्टी जेल, शिकागो, 9 नवम्बर, 1887

मई दिवस : मजदूर वर्ग का क्रांतिकारी संघर्ष

🔴मई दिवस : मजदूर वर्ग का क्रांतिकारी संघर्ष

Www.enagrik.com (1-15May 2020) 

मई दिवस पूरी दुनिया में 1 मई को मनाया जाता है। यह दिन मजदूर वर्ग के 8 घंटे काम के दिन के संघर्ष के रूप में जाना जाता है। '8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरजंन' के नारे के तहत  1 मई 1886 में शिकागो शहर के मजदूरों की शानदार हड़ताल और 4 मई को शिकागो शहर में हे मार्केट की घटना के बाद मजदूरों के नेता पार्सन्स, फिशर, एंजेल्स और स्पाइस को फांसी देने की पूंजीपति वर्ग और उसकी संस्थाओं की हठधर्मिता ने 1 मई को पूंजी व श्रम के बीच वर्ग संघर्ष में एक मील का पत्थर के रूप में स्थापित कर दिया। और 1889 से 1 मई को वैश्विक स्तर पर मजदूरों के 8 घंटे काम के संघर्ष के रूप में मनाया जाने लगा।

मानव समाज के वर्ग संघर्ष के इतिहास में जब पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की शुरूआत हुयी तब उसने मजदूरों के शोषण करने के नये-नये कीर्तिमान रचे। उसने केवल पुरुष मजदूरों के ही नहीं बल्कि महिलाओं व छोटे-छोटे बच्चों के शरीर से भी खून की आखिरी बूंद को अपने मुनाफे में ढालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूंजीपतियों द्वारा कल-कारखानों व खदानों में मजदूरों से काम कराने और मुनाफा कमाने के तरीकों ने दास मालिकों को भी पीछे छोड़ दिया था। 

पूंजीपतियों द्वारा 18-18 घंटे तक काम कराने के खिलाफ मजदूर वर्ग का प्रतिरोध भी हुआ साथ ही इंग्लैण्ड में संसद में मौजूद कुछ उदार हृदय के सांसदों ने काम के इन अत्यधिक घंटों के खिलाफ आवाज भी उठायी, साथ ही कुछ फैक्टरी इंस्पेक्टरों ने भी संसद के समक्ष अपनी रिपोर्टों में मजदूरों से अत्यधिक काम लेने की बुराईयों का जिक्र किया। लेकिन शुरू में यह केवल बच्चों व महिलाओं तक ही सीमित था। बच्चों व महिलाओं के लिए काम के दिन के घण्टे कम करने के कानून भी बने। महिलाओं को लड़के-लड़कियों के समान समझा गया। 7 जून 1844 को अतिरिक्त फैक्टरी अधिनियम के तहत 18 वर्ष के ज्यादा उम्र की महिलाओं को संरक्षण मिला और उनके लिए 12 घण्टे काम का दिन तय हुआ। 8 से 13 वर्ष के बच्चों के बारे में 1844 का अधिनियम कहता है कि वे साढ़े सात घण्टे काम करेंगे। 

लेकिन पूंजीपतियों ने काम के घण्टे कम करने के इन अधिनियमों को कभी भी नहीं स्वीकार किया और उनको तोड़ा। साथ ही उन्होंने दबाव के तरीके भी अपनाये ताकि सरकार को मजबूर किया जा सके कि वे इन कानूनों को रद्द करें। जब 1846 में कपास संकट पैदा हुआ तो उन्होंने मजदूरी में 10 प्रतिशत तक की कमी कर दी और 1 जुलाई 1847 को काम के घंटे 11 करने पर मजदूरी में 8.33 प्रतिशत की कटौती कर दी। 1 मई 1848 को काम के घण्टे 10 करने पर उन्होंने मजदूरी में 16.66 प्रतिशत की कटौती करने की धमकी दी। फलस्वरूप 8 फरवरी 1850 को यह कानून रद्द कर दिया गया। कानून के रद्द होने के फलस्वरूप मजदूरों का प्रतिरोध बढ़ गया। उसके बाद 5 अगस्त 1850 को अतिरिक्त फैक्टरी अधिनियम बना जिसके अनुसार लड़के-लड़कियों व महिलाओं के लिए सप्ताह में पहले पांच दिन काम के घण्टे 10 से साढ़े दस और शनिवार को साढ़े सात घंटे तय किये गये। 

पूंजीपतियों ने काम के कम घंटे के नियम को तोड़ने के लिए पाली प्रणाली का भी सहारा लिया। जैसे एक मजदूर सुबह की पाली में एक पूंजीपति के यहां काम करता था और रात की पाली में दूसरी जगह या फिर एक ही पूंजीपति की दो अलग-अलग फैक्टरियों में अलग-अलग समय पर काम कराकर बच्चों, महिलाओं व पुरुष मजदूरों के मामले में उसने कानून को ठेंगा दिखाया। उसने मजदूरों से काम के घंटे कम करने के खिलाफ पत्र संसद में भिजवाये लेकिन उनकी इस मेहनत पर मजदूरों ने यह कहकर पानी फेर दिया कि ये पत्र उनसे जबर्दस्ती लिखवाये गये हैं और वे काम के कम घंटे के लिए कम मजदूरी में भी काम करने को तैयार हैं। 

कुल मिलाकर पूंजीपति ने हर सम्भव तरीके से कानून द्वारा मजदूरों के लिए सामान्य दिन के घण्टे कम करने का विरोध किया और उनको कानूनी और गैरकानूनी दोनों रूपों में ही तोड़ा।  पूंजीपतियों मजदूरों की श्रम शक्ति को 30 साल के बजाय 10 साल में ही चूसकर अपनी तिजोरियां भरना चाहते थे और उनकी इस हवस ने मजदूरों को बहुत कम उम्र में ही मरने के लिए बाध्य कर दिया। और खास उद्योगों में होने वाली खास बीमारी ने तो बच्चों-महिलाओं व पुरुष मजदूरों की जिंदगी को भयानक कष्ट दिये। 

काम के घंटे कम करने का संघर्ष पूंजी और श्रम के बीच वर्ग संघर्ष का एक रूप है। इस संघर्ष में हे मार्केट के शहीदों से लेकर अनगिनत लोगों ने अपनी जान कुर्बान कर दी। शहादत का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। 

आज कोरोना के बहाने पूंजी द्वारा श्रम पर हमले को बढ़ाया जा रहा है। भारत में ही 5 राज्यों में काम के घण्टे बढ़ा कर 12 कर दिये गये हैं। ऐेसे वक्त में मई दिवस को याद करना और अपने संघर्षों को तेज करना मजदूर वर्ग के लिए जरूरी हो गया है। 

Labels: मजदूर हालात

मई दिवस का पैगाम, जारी रखना है संग्राम!

मई दिवस का पैगाम, जारी रखना है संग्राम!
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अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की क्रांतिकारी विरासत और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाएं! 

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस अमर रहे!
दुनिया के मज़दूरों, एक हो! पूंजीवाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!

साथियों,
1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस है, यानी मजदूर वर्ग का सबसे खास दिन व त्योहार। यह ऐतिहासिक दिवस पहली मई को पूरी दुनिया के कोने-कोने में मजदूरों द्वारा रैली, प्रदर्शन, सभा, मीटिंग के रूपों में मनाया जाएगा। मई दिवस पूंजीवादी शोषण और गुलामी के खात्मे तक मजदूर वर्ग के संघर्ष को जारी रखने के संकल्प को दोहराने का दिन है। मई दिवस का इतिहास हमें यह याद दिलाता है कि '8 घंटे का कार्य-दिवस' के साथ मजदूरों के सभी अधिकार कोई तोहफे या खैरात में नहीं मिले थे, बल्कि लड़कर जीते गए जिसके लिए मजदूर वर्ग को बड़ी कुर्बानियां देनी पड़ी हैं। मई दिवस इसका भी परिचायक है कि जब मजदूर वर्ग एकजुट और सचेत हो जाता है, तो वह बड़ी से बड़ी लूटेरी शक्तियों को चकनाचूर कर सकता है। इसलिए पूंजीपति वर्ग ने कभी नहीं चाहा कि मजदूर वर्ग मई दिवस के बारे में जाने और इसके लिए अपने गुर्गों (सरकारों, मीडिया, संस्थाओं, प्रचारकों आदि) द्वारा मई दिवस के इतिहास को भिन्न तरीकों से छुपाया है।

मई दिवस की क्रांतिकारी विरासत

संघर्ष की शुरुआत : मई दिवस की शुरुआत आज से डेढ़ सौ साल पहले होती है जब पूरी दुनिया में मजदूरों के काम की कोई समय-सीमा तय नहीं थी और उन्हें 14-16 घंटे तक काम करवाया जाता था। इसके खिलाफ पूरी दुनिया, खास कर अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, में कई सालों से छोटे-बड़े आंदोलन हो रहे थे। लेकिन अमेरिका के मजदूरों ने पहली बार '8 घंटे काम' की मांग पर अक्टूबर 1884 में एक सम्मलेन आयोजित किया जिसमें 1 मई 1886 से 8 घंटे काम को लागू करवाने का दिन चुना गया।

उसी 1 मई से मई दिवस की लड़ाकू शुरुआत हुई जब पूरे अमेरिका के 4-5 लाख मजदूर '8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन' की मांग पर आर-पार की हड़ताल पर चले गए। हड़ताल के पूर्व ही पूंजीपति वर्ग का विरोध चरम पर था। पूरे अमेरिका में हथियारबंद पुलिस तैनात कर दी गर्इं। अखबारों द्वारा आंदोलन के खिलाफ कुत्साप्रचार अभियान शुरू किया गया। मजदूर नेताओं को अपराधी और गुंडा कहा गया। हड़ताली मजदूरों को नौकरी से निकाल देने और सजा देने का फरमान जारी हुआ। इन सबके बावजूद हड़ताल पूरी तरह सफल रही। 

3 मई को मजदूरों की एकता से बौखलाए पूंजीपतियों ने जवाबी हमला करते हुए मैककौर्मिक हार्वेस्टर वर्क्स के हड़ताली मजदूरों पर गोलियां चलवा दीं जिसमें 6 मजदूर शहीद हो गए और कई घायल हुए। इससे मजदूरों का गुस्सा भड़क उठा। इसके खिलाफ 4 मई को आंदोलन के केंद्र, शिकागो शहर, के हेमार्केट स्क्वायर चौक पर एक बड़ी मजदूर सभा का आयोजन किया गया। लेकिन सभा के दौरान ही भीड़ में छुपे पूंजीवादी दलालों ने षड्यंत्र के तहत चौक पर बम फेंक दिया जिसमें 4 मजदूर और 7 पुलिसवाले मारे गए। यह होते ही पुलिस को गोलियां बरसाने का खुला मौका मिल गया जिसमें 200 मजदूर घायल हुए और कई मारे गए।

इसी के साथ पूंजीपति वर्ग का खूनी तांडव शुरू हो गया। 8 प्रमुख मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें से 7 को फांसी की सजा सुनाई गई। अंततः 11 नवंबर 1887 को आनन-फानन में बिना सबूत के 4 नेताओं (जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फिशर, ऐल्बर्ट पार्सन्स, अगस्त स्पाइस) को फांसी दे दी गई। 7 साल बाद वहां के नए गवर्नर ने पूरे कानूनी प्रकरण को बेबुनियादी व अन्यायपूर्ण बताते हुए बाकी कैद नेताओं को रिहा कर दिया, परंतु निर्दोष मजदूर नेताओं को फांसी देने के लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया। यही है पूंजीवादी न्याय, जो मजदूरों के लिए हमेशा अन्याय ही होता है!

मई दिवस अंतर्राष्ट्रीय बन गया : अमेरिका के इस आंदोलन से उठी चिंगारी जल्द पूरी दुनिया में फैल गई। 1889 में मजदूरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन 'द्वितीय इंटरनेशनल' का गठन पेरिस में हुआ जिसके स्थापना सम्मेलन में सभी देशों में 1 मई को 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 1 मई 1890 को '8 घंटे काम' की मांग पर कई देशों में जबरदस्त प्रदर्शन हुए। तब से संघर्ष का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा, 8 घंटे काम के साथ तमाम कानूनी हक मजदूरों ने हासिल किए। संघर्षों से मजदूरों में जो चेतना पैदा हुई, उससे मजदूर वर्ग की विचारधारा और परिपक्व हुई, तथा दुनिया भर में मजदूर वर्ग की पार्टियां बनीं। सन् 1917 में रूस के मजदूरों ने अपनी बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में अक्तूबर क्रांति कर पूंजीवादी सत्ता को पलट कर मजदूरों का राज तक स्थापित किया, और धीरे-धीरे दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर मजदूर वर्ग की सत्ताएं काबिज हुईं। तब से लेकर आज तक 1 मई दुनिया भर के मजदूरों के बीच एकता और पूंजीपति वर्ग के खिलाफ मुक्तिकामी संघर्ष का प्रतीक दिवस बना हुआ है।

मजदूर वर्ग पर आज लगातार बढ़ते हमले

136 साल के उतार-चढ़ाव भरी एक लम्बी यात्रा से गुजरते हुए मई दिवस आज एक बेहद मुश्किल समय में उपस्थित है। जैसे-जैसे मजदूर आंदोलन पीछे हटता व बिखराव की ओर बढ़ता चला गया, वैसे-वैसे ही पूंजीपति वर्ग अपने हमले बढ़ाता रहा। मई दिवस की परंपरा 8 घंटे काम की मांग से शुरू हुई थी, लेकिन आज कम वेतन पर काम के घंटे 12 से 14 होना भी आम बात हो गई है। एक तरफ बेरोजगारी नए रिकॉर्ड तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ आज हर सेक्टर में ठेका प्रथा लागू है जिसमें नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है। कई संस्थाओं में फिक्स-टर्म रोजगार (यानी एग्रीमेंट के तहत कुछ समय के लिए काम पर रख कर निकाल देना) तथा हायर व फायर नीति लागू है। छंटनी-बंदी का नया दौर गति पकड़ चुका है जिसमें परमानेंट मजदूर भी सुरक्षित नहीं रहे। यही नहीं, मोदी सरकार ने महामारी व लॉकडाउन के बीच "आपदा को अवसर" में बदलते हुए 44 श्रम कानूनों को ध्वस्त कर 4 नए श्रम कोड ले आए जो पूरी तरह से मजदूर-विरोधी और मालिक के पक्ष में हैं। इनके लागू होते ही हायर-फायर व्यवस्था लागू होगी, ठेका प्रथा और मजबूत बनेगी, मालिक मनमानी छटनी-गेटबंदी कर पाएगा, यूनियन बनाने व एकजुट संघर्ष का अधिकार खत्म हो जाएगा, 8 घंटे और न्यूनतम वेतन के कानून भी समाप्त हो जाएंगे आदि।

एक तरफ जहां महंगाई आसमान छू रही है, वहां वेतन में नाम-मात्र बढ़ोतरी होती है। सरकारी संपत्तियों व कंपनियों (जैसे रेल, विमान, एयरपोर्ट, बैंक, LIC, BSNL, कोयला, बिजली, तेल-गैस, स्टील आदि) को सरकार अपने आकाओं (पूंजीपतियों) को औने-पौने दामों पर सौंप रही है। मोदी सरकार ने रक्षा उपकरण बनाने वाली ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों को भी 7 निगमों में बांट कर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर ली है। इसके खिलाफ जब कर्मचारी हड़ताल पर गए तो सरकार ने उसपर 'एस्मा' यानी आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून लागू कर हड़ताल को गैर-कानूनी बना दिया। 

आज मई दिवस का महत्व

आज पूरी विश्व पूंजीवादी व्यवस्था गंभीर संकट में फंस गई है। मजदूरों के शोषण से पैदा होने वाले इसके मुनाफे का पहिया रुक गया है। इसी कारण से यह अब मजदूर वर्ग के खून-पसीने का आखिरी कतरा तक चूस लेने के लिए बेताब है, और इसलिए मजदूर अधिकारों पर हमले बढ़ते जा रहे है। यही नहीं, असली मुद्दों पर से ध्यान भटकाने तथा हमारी एकता तोड़ने के लिए आज पूंजीपतियों की ये सरकारें पूरे देश में सांप्रदायिक जहर फैला कर जगह-जगह पर दंगे करवा रही है। मीडिया को भी आग भड़काने के काम में लगा दिया गया है। आम सरकारों से बात नहीं बनी तो अब फासीवादी व घोर मजदूर विरोधी भाजपा सरकार को लाया गया है जो कि मेहनतकश जनता के हक और न्याय की आवाज उठाने वालों पर फर्जी मुकदमे थोप कर उन्हें गिरफ्तार कर ले रही है। जनांदोलनों पर लाठी-डंडा-बंदूक चलाना आम हो गया है। और तो और, मुनाफाखोरी के चलते साम्राज्यवादी ताकतों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई है, जिसका दंश आज यूक्रेन की आम जनता झेल रही है। परंतु फिर भी पूंजीवादी मुनाफे का पहिया बढ़ नहीं पा रहा। यह साबित कर रहा है कि पूंजी का साम्राज्य बहुत दिनों का मेहमान नहीं है। इसे उखाड़ फेंक कर मजदूरों का राज यानी बराबरी, भाईचारे पर टिका शोषणविहीन समाज, जिसे समाजवाद कहते हैं, स्थापित करने के लिए बस जरूरत है तो मजदूर वर्ग के एकजुट होकर इसे आखिरी धक्का मारने की।

हम तमाम मजदूरों से अपील करते हैं कि वे मई दिवस के दिन इसकी क्रांतिकारी विरासत को ज्यादा से ज्यादा मजदूरों तक पहुंचाने के लक्ष्य से अपने बस्तियों-कॉलोनियों, कार्यस्थलों, नुक्कड़-चौकों आदि पर जुलूस-रैली, जुटान-प्रदर्शन, मीटिंग-सभा का आयोजन करें। इसकी तैयारी के लिए पर्चे बांटे, पोस्टर साटें, मीटिंग आदि करें। आइए पहली मई को मई दिवस के शहीदों को याद करते हुए संकल्प लें! आठ घंटे काम सहित मजदूर वर्ग को अधिकार विहीन बनाने के कुचक्रों (जैसे लेबर कोड) के खिलाफ वर्गीय एकता कायम करते हुए, हमारे शोषण पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मेहनतकश वर्ग की मुक्ति के लिए निर्णायक संघर्ष खड़ा करें!

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
आई.एफ.टी.यू. (सर्वहारा)
PDYF - Progressive Democratic Youth Federation 

कन्हाई बरनवाल, महासचिव, आईएफटीयू (सर्वहारा) द्वारा यूनियन कार्यालय, हरिपुर, पश्चिम बर्धमान, प. बंगाल से जारी।

1 मई, अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस

1 मई, अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस ज़िन्दाबाद! मई दिवस के शहीद अमर रहें!
दुनिया के मज़दूरों, एक हो!
यह घोषणा करने का दिन, कि हम भी हैं इंसान!
घृणित दासता किसी रूप में नहीं हमें स्वीकार!!

साथियो! दुनिया भर में पहली मई का दिन मज़दूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। मज़दूर वर्ग का अपना शानदार इतिहास रहा है। इस दुनिया में एक तरफ़ कमेरों का वर्ग है जिसकी मेहनत के दम पर सारी चमक-दमक कायम है लेकिन मेहनतकशों की ज़िन्दगी तबाह-बर्बाद है। 12-12 घण्टे काम करके भी गुजारा नहीं, बच्चों के लिए अच्छे दवा-इलाज़, शिक्षा-रोज़गार तक का प्रबन्ध नहीं हो पाता! दूसरी तरफ़ लुटेरों का वर्ग है जो बिना कुछ किये भी केवल लूट के दम पर दुनिया की दौलत पर कब्ज़ा करके बैठा है। मालिक वर्ग कम से कम मज़दूरी देकर ज़्यादा से ज़्यादा मेहनतकशों की श्रम शक्ति को निचोड़ डालना चाहता है और मज़दूर भी शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं। पूँजी और श्रम के बीच ऐसा ही एक संघर्ष 132 साल पहले अमेरिका के शिकागो शहर में लड़ा गया था।

 मई दिवस का स्वर्णिम इतिहास 

1 मई 1886 को अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने आठ घण्टे कार्यदिवस की माँग के लिए एक साथ हड़ताल करने का फैसला किया। हड़ताल में क़रीब 11,000 फैक्ट्रियों के कम से कम 3 लाख 80 हज़ार मज़दूर शामिल हुए। शहर के मुख्य मार्ग 'मिशिगन अवेन्यु' पर मज़दूर नेता अल्बर्ट पार्संस के नेतृत्व में शानदार जुलूस निकाला गया। मज़दूरों को संगठित होता देख डरे हुए मालिक-पूँजीपतियों ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप मज़दूर वर्ग पर बार-बार हमले किये। ख़रीदे गये भाड़े के टट्टू अख़बार, पुलिस और गुण्डे मज़दूरों पर हमले के लिए लगा दिये गये। मज़दूरों के जुझारू आन्दोलन को तोड़ने के लिए मालिकों ने नीच से नीच षड्यन्त्र रचे। हड़ताल तोड़ने के लिए पुलिस के संरक्षण में तीन सौ गद्दार मज़दूरों को लाया गया। जब हड़ताली मज़दूरों ने इस गद्दारी के ख़िलाफ़ मीटिंग शुरू की तो निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं। इस हमले में चार मज़दूर मारे गये और कई घायल हुए। अगले कई दिन तक मज़दूरों के ऊपर हमले जारी रहे। इस बर्बर पुलिस दमन के ख़िलाफ़ 4 मई को शहर के मुख्य बाज़ार 'हे मार्केट स्क्वायड' में जनसभा का आयोजन किया गया। सभा के अन्त में पूँजीपतियों के इशारों पर षड्यन्त्र के तहत पुलिस ने बम फिंकवा दिया और लोगों को तीतर-बीतर कर दिया। इसके बाद उल्टा दोष भी मज़दूरों पर ही मढ़ दिया गया और शान्तिपूर्ण सभा के ऊपर पुलिस ने अन्धाधुन्ध गोलियाँ और लाठियाँ बरसा दी। इस घटना में छः मज़दूर मारे गये और 200 से ज्यादा घायल हुए। घटना के दौरान मज़दूरों के रक्त से लाल हुआ कपड़ा ही मेहनतकश वर्ग का झंडा बना। बम काण्ड में मज़दूर नेताओं को फँसाकर जेल में बन्द कर दिया गया। आठ मज़दूर नेताओं को इस घटना का दोषी करार दे दिया गया। मज़दूर वर्ग के इन महान पूर्वजों के नाम थे अल्बर्ट पर्सन्स, आगस्टस स्पाईस, जार्ज एंजेल, अडोल्फ़ फिशर, सैमुएल फील्डेन, माइकल शवाब, लुईस लिंग्ग और ऑस्कर नीबे। इनमें से सिर्फ़ सामुएल फिल्डेन ही 4 मई को वारदात के समय घटनास्थल पर मौजूद था बाकी तो वहाँ पर थे भी नहीं! 20 अगस्त 1887 को इस मुकदमे का फैसला सुनाया गया जिसमें ऑस्कर नीबे के अलावा सभी मज़दूर नेताओं को फाँसी की सज़ा सुनायी गयी। 1 मई से शुरू हुआ मज़दूर वर्ग का संगठित संघर्ष यहीं पर नहीं रुका बल्कि इसके बाद दुनिया भर में 'काम के घण्टे आठ करो' का नारा गूँज उठा। हारकर पूँजीपति वर्ग को काम के घण्टे आठ के अधिकार को कानूनी मान्यता देकर स्वीकारना पड़ा और मज़दूर वर्ग के नायकों का बलिदान रंग लाया। तब से लेकर अब तक 135 साल बीत चुके हैं, इस दौरान मज़दूर वर्ग ने अनगिनत संघर्षों और कुर्बानियों के कीर्तिमान स्थापित किये। 

 मई दिवस की विरासत और हमारा समय 

दोस्तों मई दिवस को याद करना कोई रस्म निभाना भर नहीं है। मई दिवस को याद करना अपने पुरखों से संघर्ष की ऊर्जा लेना है। सच्चाई यह है कि हम मेहनतकश मज़दूरों के लिए हालात आज 2022 में 1885 से भी बदतर हैं। हमारे यहां अब किसी भी कारखाने में आठ घण्टे काम का नियम लागू नहीं होता है। आसमान छूती महँगाई के दौर में किसी को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता। सारे श्रम क़ानून, जो मज़दूरों की कुर्बानियों की वजह से अस्तित्व में आए थे, उन्हें चार लेबर कोड बनाकर छीना जा रहा है। श्रमिकों के पास कोई भी हक़ अधिकार नहीं है। कम्पनी मालिक जब चाहे किसी को भी काम से निकाल सकता है। श्रमिकों के रोज़गार की कोई गारंटी नहीं है। कारखानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों के अंग भंग होने से लेकर जान तक जा रही है। कम्पनियों में सुरक्षा के कोई पुख़्ता इंतज़ाम नहीं है। मालिकों की मनमानी खुले आम चल रही है। आज की सच्चाई यही है कि मज़दूरों के ऊपर मालिकों को ताक़त हावी है। मज़दूरों की कोई बड़ी ताक़त मौजूद नहीं है जो मालिकों तथा उनकी सरकारों का मुक़ाबला कर सके।

दोस्तों, सरकारें पूंजीपति वर्ग की मैनेजिंग कमेटी होती है। सरकारों का काम मालिकों की सेवा करना है। मज़दूर मालिकों की गुलामी करते रहें इसके लिए नीतियाँ बनाना है। अगर हम मज़दूर शोषण अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं तो हम पर  डंडे चलाना है, हमारा दमन करना है।  यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए सरकार किसी भी दल की हो वह हमेशा मालिकों की ही चाकरी करती है। आज केन्द्र में फ़ासीवादी मोदी सरकार बैठी है, तो वहीं दिल्ली में केजरीवाल सरकार। दोनों ही सरकारें घनघोर मज़दूर विरोधी हैं। 
फ़ासीवादी मोदी सरकार हम मज़दूरों को आपस में बांटने के लिए देश भर में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का काम कर रही है। अभी बीते दिनों जहाँगीरपुरी में हनुमान जयंती के दिन वहां साम्प्रदायिक तनाव फैलाया गया। उसके तीन रोज़ बाद वहां पुलिस तथा नगर निगम द्वारा बुलडोजर चलाकर ज़्यादातर मुसलमानों के मकान-दुकान तोड़े गए, ताकि इस घटना के बहाने ना सिर्फ़ जहाँगीर पुरी बल्कि दिल्ली व पूरे देश भर में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया जाए, धार्मिक उन्माद फैलाया जाए। अभी देश भर में जहां-जहां भाजपा के हाथ में पुलिस प्रशासन है, वहां ग़रीबों के घर बुलडोजर चलाया जा रहा है, और इसका साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। दोस्तों, भाजपा चाहती है कि हमलोग जाति धर्म के झगड़ों में उलझे रहें, ताकि रोज़ी-रोटी, महँगाई, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर हमारा ध्यान न जाए।  एक तरफ खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर गैस सिलिंडर के दाम महँगे होते जा रहे हैं, पर दूसरी तरफ हमारी तनख़्वाह में रत्ती भर की बढ़ोतरी नहीं हो रही है। इन मुद्दों से ही ध्यान भटकाने के लिए देश भर में जाति-धर्म के नाम पर दंगे करवाये जा रहे हैं। हम हिन्दू मुसलमान में उलझते हैं तो इसका फ़ायदा सीधे पूँजीपतियों, कारखाना मालिकों, सरकारों, तमाम चुनावबाज़ पार्टियों तथा उनके लग्गू-भगुओं को होता है। 
आम आदमी पार्टी छिपे व खुले तौर पर भाजपा की सारी फ़ासीवादी नीतियों का समर्थन करती है। असल में दोनों ही सरकारें मिलकर ग़रीबों मेहनतकशों को लूटने का काम करती है। इस मक्कार केजरीवाल के घर के बाहर बाइस हज़ार आँगनवाड़ी की महिलाएं शानदार संघर्ष कर रही थीं, अपने बुनियादी हक़ अधिकार के लिए लड़ रही थीं। केजरीवाल सरकार पर महिलाओं के प्रदर्शन का पूरा दबाव था, कि ऐसे में भाजपा के राज्यपाल ने महिलाओं के संघर्ष को कमज़ोर करने के मक़सद से जनविरोधी हेस्मा कानून लगा दिया। और साफ़ ज़ाहिर कर दिया की भाजपा और आम आदमी पार्टी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। हड़ताल के तात्कालिक स्थगन के बावजूद आँगनवाड़ी कर्मियों का ऐतिहासिक संघर्ष आज भी ज़ारी है।

 हमारे आज के कार्यभार 
साथियो! आज हमारे संघर्ष दो क़दमों पर चलेंगे। आर्थिक संघर्ष; जिनमें काम के घण्टे, ईएसआई, ईपीएफ़, न्यूनतम मज़दूरी, सुरक्षा के समुचित इन्तज़ाम, बोनस, वेतन-भत्ते, रोज़गार इत्यादि से जुड़ी माँगों के लिए हमें आन्दोलन संगठित करने होंगे। देश-दुनिया के कौने-कौने में मज़दूर वर्ग अपने आर्थिक संघर्ष लड़ भी रहा है किन्तु अधिकतर जगह पर नेतृत्व समझौतापरस्त है। मज़दूर आन्दोलन में आज अर्थवाद करने वाले और 20-30 परसेंट की दलाली खाने वाले हावी हैं। इनसे पीछा छुड़ाकर स्वतन्त्र क्रान्तिकारी नेतृत्व विकसित करना आर्थिक संघर्षों की जीत की भी पहली शर्त है।

मज़दूर वर्ग का असल संघर्ष उसका राजनीतिक संघर्ष है जो एक शोषणविहीन-समतामूलक समाज व्यवस्था के लिए होने वाला संघर्ष है जिसमें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान का शोषण न हो सके। मज़दूर वर्ग पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर तथा समाजवादी व्यवस्था कायम करके ही ऐसा कर सकता है। इसके लिए मज़दूर वर्ग को संशोधनवाद, संसदवाद और अर्थवाद से छुटकारा पाना होगा और अपने अन्दर पैठे दलालों और गद्दारों को पहचानना होगा। जब तक पूँजीवाद रहेगा तब तक होने वाले आर्थिक संघर्ष तो साँस लेने के समान हैं किन्तु असल लड़ाई शोषण के हर रूप के खात्मे के लिए होनी चाहिए। इसके लिए हमें अपनी क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ कर उसे मज़बूत करना पड़ेगा। मई दिवस का सच्चा सन्देश यही है कि हम अपने शानदार अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की दिशा का सन्धान करें। मई दिवस के शहीदों को भी हमारी यही सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है!

दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन

सम्पर्क: 9873868097

Thursday, 28 April 2022

Certificate without caste

मई दिवस जिंदाबाद शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम

माइकल जे शाक, 1886 के मई महीने में शिकागो में पुलिस कप्तान तैनात था. ये ही वो व्यक्ति था जो मामले की सारी हकीक़त जानता था, किसने बम फेंका, कैसे मज़दूर नेताओं को उसमें फंसाया गया. शिकागो के क्रांतिकारी मज़दूर नेताओं की गिरफ़्तारी भी उसी की निगरानी में हुई और वो ही उस मामले का मुख्य चश्मदीद गवाह था जिसमें उन क्रांतिकारियों को फांसी की सज़ा हुई. 11 नवम्बर 1887 उन्हें फांसी दिए जाते वक़्त भी वह मौजूद था. उसने रिटायर होकर एक किताब लिखी, 'Anarchy and Anarchists'. ज़ाहिर है वो मालिकों का गुरगा था और क्रांतिकारी मज़दूरों से नफ़रत करता था. अपनी किताब के आखरी अध्याय में माइकल जे शाक लिखता है;

"जज ने अगस्त स्पाइस से पूछा, आपको फांसी कि सज़ा क्यों ना दी जाए, आपको कुछ कहना है? 'मैं एक वर्ग के प्रतिनिधि की हैसियत से दूसरे वर्ग के प्रतिनिधि से बोल रहा हूँ. उसकी आवाज गरिमापूर्ण, ऊँची और चीरती हुई थी...अगर आप लोग सोचते हैं कि हमें फांसी पर लटकाकर आप मज़दूर आन्दोलन को कुचल देंगे तो आओ, आगे बढ़ो, हमें फांसी पर लटका दो. .. सतह के नीचे एक ज्वाला धधक रही है जिसे आप और आपका निज़ाम बुझा नहीं पाएगा...मेरे विचार मुझे बहुत प्रिय हैं, मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता. अगर सच बोलने की सज़ा फांसी है तो हमें मंज़ूर है. मैं ख़ुशी से ये क़ीमत चुकाने को तैयार हूँ...बुलाओ अपने जल्लाद को. सच्चाई के लिए फांसी चढ़े सुकरात, ईसा मसीह, गिओरदानो ब्रूनो, गैलिलिओ आज भी जिंदा हैं. हमें ये रास्ता इन्होने और इनके जैसे अनेक क्रांतिकारियों ने दिखाया है और हम ख़ुशी से इस रास्ते पर चलने को तैयार हैं.."

मई दिवस जिंदाबाद
शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम
दुनिया के मजदूर एक हो

मई दिवस जिंदाबाद

अगस्त स्पाइस के बाद 7 अक्तूबर 1886 को शिकागो की अदालत में बोलने की बारी माइकल श्वाब की थी. उनपर आरोप थे कि उन्होंने ही हे मार्केट में हुई  4, मई 1886 की सभा में बम फेंका था जिसमें 7 पुलिस वाले और 4 नागरिक मारे गए थे. पुलिस की पहली रिपोर्ट में था कि उन्होंने कई बम फेंके. बाद में जब पता चला कि वहाँ तो एक ही बम फेंका गया है तब पुलिस ने एफआईआर की तफ्तीश में लिखा, एक बम फेंका गया लेकिन वो माइकल श्वाब ने ही फेंका. (इनमें से किसी ने भी बम नहीं फेंका था, बाद में सिद्ध हो गया).

"मैं कुछ बोलना नहीं चाहता लेकिन चुप रहना कायरता होगी इसलिए बोल रहा हूँ. अदालत में जो चल रहा है वो न्याय का मखौल है...हमने जो किया उसे षडयंत्र कहा जा रहा है. ये षडयंत्र नहीं आन्दोलन है. निशाने पर हम नहीं हैं, निशाने पर मज़दूर आन्दोलन है, समाजवाद है. हर मज़दूर आन्दोलन को आवश्यक रूप से समाजवादी होना चाहिए. हम समाजवाद की, क्रांति की बात कर रहे हैं, आप उसे षडयंत्र बता रहे हैं...ये जो लोग दौलत के पहाड़ इकट्ठे कर रहे हैं, महलों में रहते हैं, ऐश करते हैं, ये सब हमारे उस श्रम की बदौलत है जिसका भुगतान हमें नहीं किया गया. हम जब बाज़ार जाते हैं तो हम बासी गोश्त का छोटा सा टुकड़ा और सड़ी सब्जियां ख़रीद पाते हैं. हम टूटे-उजड़े घरों रहते हैं और बीमारियों से मरते हैं...आप क्या जानते हैं मजदूर कैसे रहता है. मैं जानता हूँ . मैं डिपार्टमेंटल स्टोर के सेलर (सामान रखने की जगह) में रहा हूँ. मैंने मज़दूरों को भूखों मरते देखा है..काम करते-करते थक कर ख़त्म होते देखा है.. हमारे 12-14 साल के बच्चों को भी काम करना पड़ता है..ये सब आप अमीरों के अखबारों में नहीं छपता..आधुनिक मशीनें जो आज की ज़रूरत हैं वे ही हमारे लिए अभिशाप बन रही हैं. जबकि उनकी आवश्यकता है क्योंकि उससे काम आसान हो जाता है और उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है... समाजवाद और कम्युनिज्म की जड़ें इस देश में मज़बूत होने की यही वज़ह है..ऐसा मत सोचिए कि इसे विदेशी लाए हैं (दरअसल माइकल श्वाब जर्मनी में पैदा हुए थे और वहाँ समाजवादी आन्दोलन से जुड़े थे), अमेरिका में जन्मे कम्युनिस्टों की तादाद बाहर वालों से कहीं ज्यादा है. समाजवाद से हमारा मतलब है कि ज़मीन और उद्योग पूरे समाज के होंगे और सभी को काम करना होगा. तब सभी को बहुत कम घंटे काम करना ही पर्याप्त होगा...मैं जानता हूँ कि हमारा लक्ष्य आज या कल हांसिल नहीं होने वाला लेकिन आप देखेंगे कि ये ज़रूर पूरा होगा...उस दिन हे मार्केट में बम किसने फेंका मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं, ना मुझे हिंसा फ़ैलाने वाले उस षडयंत्र के बारे में कुछ पता है जिसका आप ज़िक्र कर रहे हैं.

माइकल श्वाब

उन्हें भी फांसी की सज़ा हुई थी जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया था. दस साल की सज़ा के बाद वे रिहा हुए थे. उसके बाद उन्होंने मज़दूर अधिकारों के लिए काम किया और उनकी मृत्यु 29 जून 1898 को हुई.

मई दिवस जिंदाबाद 
शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम 
दुनिया के मज़दूरो एक हो
Satyavir Singh