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Thursday, 5 May 2022

महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स को उनके जन्मदिवस 5 मई के अवसर पर लाल सलाम!

"तुम गरीब इसलिए नहीं हो कि ईश्वर की यही इच्छा है।तुम गरीब इसलिए भी नहीं हो कि तुमने पिछले जन्म में कोई पाप किया था।

बल्कि तुम गरीब इसलिए हो क्योंकि ये राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां ही ऐसी हैं।तुम गरीब इसलिए हो क्योंकि कुछ लोग हैं जो तुम्हे गरीब बनाये रखना चाहते हैं।

इसलिए उठो जागो और सदैव याद रखो तुम्हारे पास खोने के लिए केवल तुम्हारी बेड़ियाँ हैं और जीतने के लिए सम्पूर्ण विश्व।"

दुनिया के मजदूरों एक हो!

महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स को उनके जन्मदिवस 5 मई के अवसर पर लाल सलाम! 

Wednesday, 4 May 2022

कार्ल मार्क्स के जन्मदिन के अवसर पर उनकी एक कविता

5 मई विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक कार्ल मार्क्स के जन्मदिन के अवसर पर उनकी एक कविता

प्रेमचंद, नवम्बर 1931.( 'हिन्दू- मुस्लिम एकता' शीर्षक लेख से).

प्रेमचंद  ने नब्बे  वर्ष  पूर्व   जो  कहा था--
"यह बिलकुल गलत है कि  इस्लाम तलवार के बल से फैला. तलवार के बल से कोई धर्म नहीं फैलता, और कुछ दिनों के लिए फैल भी जाए, तो चिरजीवी नहीं हो सकता. भारत में इसलाम के फैलने का कारण, ऊंची जाति वाले हिंदुओं का नीची जातियों पर अत्याचार था. बौद्धों ने ऊंच- नीच का, भेद मिटाकर नीचों के उद्धार का प्रयास किया, और इसमें उन्हें अच्छी सफलता मिली लेकिन जब हिन्दू धर्म ने जोर पकड़ा, तो नीची जातियों पर फिर वही पुराना अत्याचार शुरू हुआ, बल्कि और जोरों के साथ. ऊंचों ने नीचों से उनके विद्रोह का बदला लेने की ठानी. नीचों ने बौद्ध काल में अपना आत्मसम्मान पा लिया था. वह उच्चवर्गीय हिंदुओं से बराबरी का दावा करने लगे थे.उस बराबरी का मज़ा चखने के बाद, अब उन्हें अपने को नीच समझना दुस्सह हो गया. यह खींचतान हो ही रही  थी कि इसलाम ने नए सिद्धांतों के साथ पदार्पण किया. वहाँ ऊंच- नीच का भेद न था. छोटे-बड़े, ऊंच-नीच की कैद न थी. इसलाम की दीक्षा लेते ही मनुष्य की सारी अशुद्धियाँ, सारी अयोग्याताएं, मानों धुल जाती थीं. वह मस्जिद में इमाम के पीछे खड़ा होकर नमाज पढ़ सकता था, बड़े बड़े सैयद- जादे के साथ एक दस्तरखान पर बैठकर भोजन कर सकता था. यहाँ तक कि उच्च वर्गीय हिंदुओं की दृष्टि में भी उसका सम्मान बढ़ जाता था. हिंदू अछूत से हाथ नहीं मिला सकता , पर मुसलमानों के साथ मिलने- जुलने में उसे कोई बाधा नहीं होती. वहाँ कोई नहीं पूछता, कि अमुक पुरुष कैसा, किस जाति का मुसलमान है. वहाँ तो सभी मुसलमान हैं. इसलिए नीचों ने इस नए धर्म का बड़े हर्ष से स्वागत किया, और गांव के गाँव मुसलमान हो गये. जहाँ उच्च वर्गीय हिंदुओं का अत्याचार जितना ज्यादा था, वहाँ वह विरोधाग्नि भी उतनी प्रचंड थी और वहीं इसलाम की तबलीग भी खूब हुई. कश्मीर, आसाम, पूर्वी बंगाल आदि इसके उदाहरण है."---प्रेमचंद, नवम्बर 1931.( 'हिन्दू- मुस्लिम एकता'  शीर्षक लेख से).
वीरेंद्र यादव के वॉल से

Tuesday, 3 May 2022

पत्रकार उर्मिलेश - विदेशी दुर्गुण

घोड़े पर चढ़ा दूल्हा अच्छा नहीं लगता
अगर वह दलित हो
तलवार जैसी मूंछ वाला युवक तो और भी अच्छा नहीं लगता 
अगर वह दलित हो
किसी शूद्र या पिछड़े का अच्छी नौकरी में या ऊपर के ओहदे पर होना भी अच्छा नहीं लगता
जोर से बोलने या सुरीली आवाज में गाने वाली दलित घर की लड़की अच्छी नहीं लगती 
चारपाई पर साथ बैठने वाला दलित हो या पिछड़ा, कोई भी अच्छा नहीं लगता
सवाल करने वाला अच्छा नहीं होता
धरम का रास्ता छोडने वाला अच्छा नहीं लगता
धरम में सबका काम और ओहदा तय है
नियम और लीक से हटकर चलने वाले अच्छे नहीं होते
ये सब विदेशी दुर्गुण हैं 
अपने यहां तो बच्चों को शुरू से समझाया जाता है
बड़ों से बहस नहीं करते
बडों की बातों पर सवाल नहीं करते
'अपना मीडिया' अच्छा लगता है-'शुद्ध स्वदेशी-सवर्ण' 
बिल्कुल अपने टीवीपुरम् की तरह संस्कारी
विदेशी मीडिया अच्छा नहीं लगता 
उसके समाचार, समीक्षाएं और सर्वेक्षण सब फ़ालतू होते हैं 
अपने यहां भी उसी तर्ज पर 'गिटिर-पिटर' करने वाले
कुछ आ गये हैं 
वे बेमतलब सवाल करते हैं 
पर उन्हें पढते ही कितने
उन्हें सुनते ही कितने
सब बेमतलब
सवाल करने वाले अच्छे नहीं होते
धर्म और विकास के रास्ते में अवरोध होते हैं 
सवाल करना स्वदेशी गुण नहीं 
स्वदेशी सत्ता से सवाल करने का औचित्य ही क्या है
देश-धरम की नजर से तो 
ये डेमोक्रेसी भी ठीक नहीं 
वह स्वदेशी नहीं 
डेमोक्रेसी में लोग खराब हो जाते हैं 
वे सवाल करने लगते हैं
सहमत और असहमत होना सीख लेते हैं 
सवाल करना अच्छा नहीं
सवाल करते मीडिया की तरह सवाल करता आदमी भी अच्छा नहीं लगता

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश

ईद मुबारक

Rupam Mishra  की इस कविता के साथ अपनी ओर से भी ईद मुबारक और साथियों का यह साथ मुबारक!

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डॉ कफ़ील , सफूरा , शरजील उन जैसे सभी लड़ने वाले दोस्तों के नाम - 

बहुत सी चलती सांसो के बचे रहने के लिए
तुम्हारा बचे रहना बहुत जरूरी है 

इस कठिन समय में कैसे भी करके तुम बचे रहना 
अन्न पानी के अकाल से कहीं ज्यादा 
ये आदमीपने का अकाल  है 

ये हादसों का समय है 
होने को कुछ भी हो सकता है
तुम्हारे करुणा से भरे मन को 
जबरी क्रूरता की मुहर लगाई जा सकती है 
तुम्हारे नाम को लाल घेरे में रखा जा सकता है

तुम्हारा फोन टेप हो सकता है
एकदूसरे में भीगी हुई  निर्वस्त्र आत्माओं को 
घसीट कर बाजार में लाया जा सकता है

तुम भले  भलमनसाहत की मेयार में ढले हो 
पर किसी सँझरतिया में 
जीप में तुम्हें  धकेलती हुई पुलिस देखकर 
तुम्हारे पिता को गद्दार कहा जा सकता है

देखना !  किसी भी क्रांति के स्वर में
तुम्हारी माँ और प्रेमिका का  रुदन  एकमेव न हो जाये 
तुम रो लेना  
जब सच बोलने के लिए  तुम्हारे साथियों पर लाठियां  पड़ी हों और तुम बच गए थे 
पर अफसोस न करना
तुमपर थोपी गयी इस लड़ाई के लिए , लड़ते रहना

एक आरामतलब कौम अपने आराम के लिए कायर हुई जा रही है
तुम जानते हो 
अदब  और उदारता के नाम पर शुरू हुए मध्यमवर्गीय भगोड़ेपन को
अब संघर्ष की राह बहुत उजाड़ है
तुम एक मजबूत दुश्मन के आगे मिमियाती बिल्ली की लाल लाल आँखों के आगे आ गये हो
तुम सब बचे रहना मेरे दोस्तों ! 

◆ईद मुबारक हो◆

अरशाना अज़मत औरतों की ईद

हम औरतें केवल सेक्स और देह पर ही ट्रोल नहीं होती हैं. अपने मन की किसी भी बात पर ट्रोल होने का हमारा पूरा हक है. हर होली, दीवली या किसी भी समय मुझे अरशााना अज़मत की यह कविता याद आती रहती है. यह कविता मात्र ईद के लिए नहीं है, हर पर्व, त्यौहार या किसी भी खास मौके पर हर आम औरत की हकीकत बयान करती है.  आप भी पढिए. 
बताया गया कि आज अक्षय तृतीया भी है. हमारे पास राहिल और सहर द्वारा भेजा गया शीर- खुरमा आ गया है. अब आप में से कोई अक्षय तृतीया पर सोना भी भेज दीजिए तो और मज़ा आ जाए. 

"हम औरतों की ओर से ईद मुबारक यह कहते हुए-
औरतों की ईद 

अरशाना अज़मत

औरतों की ईद  यानी .. 
रोज के मुकाबले जल्दी जगने का दिन .. 
बावर्चीखाने में ज्यादा खटने का दिन .. 
ज्यादा खाना पकाने का दिन.. 
ज्यादा तरह के खाने पकाने का दिन .. 
ज्यादा बर्तन धोने का दिन.. 
ज्यादा सफाई करने का दिन.. 

औरतों की ईद यानी .. 
रोज के मुकाबले देर से खाने का दिन.. 
देर से नहाने का दिन.. 
देर से बिस्तर में जाने का दिन.. 
देर से टीवी देखने या न देखने का दिन.. 

ज्यादातर औरतें नहीं जानतीं कि ईद पर रिलीज होती है सलमान खान की पिक्चर.. 
ज्यादातर नहीं जाती सिनेमा हॉल में पिक्चर देखने...
 
ज्यादातर को ईदी भी नहीं मिलती.. 
ज्यादातर नहीं खरीद पातीं अपनी पसंद की झुमकियां... 
ज्यादतार दूसरे दिन पहनती हैं चाव से सिलवाया सूट और चूड़ियां.. 

औरतें बनाती हैं देग भर बिरयानी और खाती हैं मुट्ठी भर चावल... 
वो भी अक्सर सबके खा लेने के बाद.. .
रायता, चटनी और सलाद खत्म हो जाने के बाद.. 

औरतें सुबह सूरज निकलने से पहले बनाती हैं सेवंई .. 
औरतें शाम को सूरज ढलने के बाद खाती हैं सेवंई .. 

ज्यादातर ईद के दिन घर से नहीं निकलतीं.. 
ज्यादातर किसी से ईद मिलने नहीं जातीं.. 
ज्यादातर से ईद मिलने कोई नहीं आता.. 
उंगलियों पर गिनने लायक होते हैं औरतों के मेहमान... 

कहानियों में भी .. 
औरतें अमीना होती हैं वे घर में रहती हैं .. 
औरतें हामिद नहीं होतीं, वे मेले में नहीं जातीं .. 
औरतों को चिमटे की जरूरत होती है ... 
और जरूरत पूरी करने के लिए हामिद की.. 
औरतें खुद नहीं खरीदतीं अपने लिए चिमटा.. 

औरतें शामिल होती हैं इबादत में .. 
तैयारियों में ...
खरीदारी में ...
बाजार भर में दिखती हैं औरतें ...

औरतें गायब हो जाती हैं ईद के जश्न से ...

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यह रचना अरशाना अज़मत की है। अरशाना पत्रकार हैं। लखनऊ में रहती हैं।"

विभा रानी जी से साझा पोस्ट

Sunday, 1 May 2022

गोरख पाण्डेय की एक कविता- कला कला के लिए



कला कला के लिए हो
जीवन को खूबसूरत बनाने के लिए
न हो
रोटी रोटी के लिए हो
खाने के लिए न हो

मज़दूर मेहनत करने के लिए हों
सिर्फ़ मेहनत
पूंजीपति हों मेहनत की जमा पूंजी के
मालिक बन जाने के लिए
यानी, जो हो जैसा हो वैसा ही रहे
कोई परिवर्तन न हो
मालिक हों
ग़ुलाम हों
ग़ुलाम बनाने के लिए युद्ध हो
युद्ध के लिए फ़ौज हो
फ़ौज के लिए फिर युद्ध हो

फ़िलहाल, कला शुद्ध बनी रहे
और शुद्ध कला के
पावन प्रभामंडल में
बने रहें जल्लाद
आदमी को
फांसी पर चढ़ाने के लिए 

 -गोरख पाण्डेय