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Wednesday, 20 July 2022

End Of Casteism

तमिलनाडु के मशहूर दलित लीडर और जातिवाद के ख़िलाफ़ अन्दोलन करने वाले टी एम मणि जिन्होंने 2007 में अपने सैंकड़ो अनुयायियों के साथ इस्लाम क़बूल किया और अपना नाम टी एम उमर फ़ारूक़ रखा, जिन्होंने कई पुस्तकों के साथ End Of Casteism नाम की मशहूर किताब लिखी, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ, सात साल पहले आज ही के दिन 5 जून 2015 को उनका इंतक़ाल हो गया, उनकी पुण्यतिथि पर टी एम मणि साहब के बारे में संक्षिप्त जानकारी पढ़ें -

टी एम उमर फारूक तमिलनाडु के तंजावुर जिले में टी एम मणि के रूप में एक हिंदू परिवार में पैदा हुए थे। उनके पूर्वज बंधुआ मजदूर थे और उन्होंने केवल प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। हालांकि, टी.एम. मणि तमिल साहित्य और इसकी दार्शनिक परंपरा में पारंगत थे। एक जाति-विरोधी कार्यकर्ता के रूप में उन्हें मार्क्सवादी विचारधाराओं की भी अच्छी समझ थी। हाशिए पर पड़े लोगों के लिए विरोध करते हुए उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।

1960 में, 16 साल की उम्र में, उन्होंने युवाओं के लिए एक राजनीतिक संगठन शुरू किया, और बाद में 1962 में इसे अम्बेडकर एजुकेशनल एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के रूप में स्थापित किया। उन्होंने तमिलनाडु के एक अन्य जाति-विरोधी नेता एल. इलायपेरुमल के साथ मिलकर काम किया। 1990 के दशक में, टी एम मणि ने नीला पुलिगल इयक्कम (ब्लू पैंथर्स मूवमेंट) शुरू किया। उन्होंने अपने ब्लू पैंथर्स आंदोलन के माध्यम से जाति व्यवस्था के खिलाफ दृढ़ता से लड़ाई लड़ी।

तमिलनाडु में जितनी भी क्षेत्रीय जाति विरोधी राजनीतिक पार्टियां थी और जिनका बड़ा जनाधार था वो सब तमिल राष्ट्रवाद की समर्थक थी लेकिन टी एम मणि तमिल राष्ट्रवाद के आलोचक थे और उनका मानना था के तमिल राष्ट्रवाद की जड़ें हिन्दू धर्म मे हैं इसलिए उन्हें तमिल राजनीतिक पार्टियों ने किनारे कर दिया और तमिल सियासत के मुख्यधारा में नही आने दिया

टी.एम. मणि ने जाति के मुद्दे को संबोधित करने में वामपंथ और तमिल राष्ट्रवाद इन दोनों विकल्पों को खारिज कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि तमिल राष्ट्रवादी विचारधारा का आधार हिंदू धर्म में है। उन्होंने चुनावी राजनीति को भी खारिज कर दिया क्योंकि उनका कहना था के अनुसूचित जाति कभी भी बहुमत का वोट हासिल नहीं कर पाएगी और वहां भी राजनीतिक 'अछूत' ही बने रहेंगे ।

टी.एम. मणि ने वामपंथ को एक विकल्प के रूप में भी माना लेकिन फिर इस विचार को खारिज कर दिया क्योंकि वह बताते हैं कि भारत में उत्पीड़न वर्ण व्यवस्था से आता है न कि वर्ग संघर्ष से।

विभिन्न विकल्पों पर विचार करने के बाद, टी.एम. मणि ने दृढ़ता से धर्म परिवर्तन को दलित मुक्ति का एकमात्र साधन बताया। उन्होंने दलितों को उन देवताओं से मुक्त होने की सलाह दी जिन्होंने उन्हें हिंदू जाति व्यवस्था के माध्यम से गुलाम बनाया था।

टी एम मणि ने अपने हजारों अनुयायियों को इस्लाम में परिवर्तित होने और खुद को मुक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि, एक सवाल यह था कि उन्होंने इस्लाम को क्यों चुना, जब जाति-विरोधी आंदोलन के सबसे बड़े नेता अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपना लिया।

टी. एम. मणि ने अपनी पुस्तक 'अम्बेडकर का धर्म परिवर्तन' में बौद्ध धर्मांतरण के तर्क में कमजोरी की ओर इशारा किया है। टी एम मणि ने माना की बौद्ध धर्म में परिवर्तन के परिणामस्वरूप दलितों की संख्या बल में मजबूती नहीं आई बल्कि समस्या को और बढ़ा दिया क्योंकि बौद्ध भारत में दूसरे सबसे छोटे धार्मिक अल्पसंख्यक बने हुए हैं जिससे दलित संख्याबल में मज़बूत नही हो पाए,
उन्होंने पाया की बौद्ध धर्म को सांस्कृतिक रूप से हिंदू धर्म के साथ पहचाना जाता है। उन्होंने भारतीय संविधान में बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म को भी इंगित किया (अनुच्छेद 25 (ए) - खंड बी में स्पष्टीकरण II) कानूनी रूप से बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म के एक हिस्से के रूप में माना जाता है। इसलिए, उन्होंने अपने अनुयायियों को इस्लाम में धर्म परिवर्तित करने का सुझाव दिया और 1980 के दशक से इस विचार पर चर्चा की।

मई 2007 तक टी.एम. मणि ने अपने हज़ारों अनुयायियों के साथ आधिकारिक तौर पर इस्लाम को अपना लिया  और टी.एम उमर फ़ारूक़ के रूप में जाना जाने लगे, उनकी पत्नी, अगिलम्मई भी आयशा अम्मल बन गईं। उनका पूरा जीवन जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में बीता।

उन्होंने थेनपीसकु थेरवु (अस्पृश्यता के लिए समाधान), और साथी ओझिंधाधु (जाति विनाश अर्थात End Of Casteism) सहित कई किताबें लिखी हैं, जिसमें उन्होंने हिंदू धर्म के त्याग के बारे में बात की है। टी.एम. उमर फारूक का मानना ​​था कि इस्लाम ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो दलितों को स्वाभिमान हासिल करने में मदद करेगा। सात साल पहले आज ही के दिन 5 जून 2015 को उनका इंतक़ाल हो गया, अल्लाह उनके क़ब्र को नूर से भर दे, आमीन । 

आख़िर में टी.एम. उमर फारूक साहब की पुस्तक के एक उद्धरण से इस लेख का अंत करते हैं, -

"गर्व से टोपी और दाढ़ी की मुस्लिम पहचान को गले से लगाओ। और ज़ोर से कहो: अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर। इस्लाम का आह्वान उन दुश्मनों तक पहुंचें जिन्होंने 2000 से अधिक वर्षों से हम पर अत्याचार किया है।"


Friday, 15 July 2022

भारत में गोर्की के उपन्यास "मां" की लोकप्रियता - वीरेन्द्र त्रिपाठी


गांधीजी संभवतः गोर्की की प्रतिभा को पहचानने वाले पहले ख्यातिलब्ध भारतीय थे।

 इंडियन ओपिनियन के 1905 के एक अंक में गांधीजी ने अपने एक लेख में गोर्की को महान अधिकारों का एक महान योद्धा घोषित किया। गांधीजी ने अपने लेख में कहा, "कुछ समय पहले रूस में एक विद्रोह हुआ। उसमें भाग लेने वाले प्रमुख व्यक्तियों में गोर्की भी थे। उनका जन्म और पालन-पोषण घोर गरीबी में हुआ था। उन्होंने एक मोची के साथ उनके सहायक के रूप में काम करना शुरू किया, लेकिन उसने शीघ्र ही उन्हें काम से हटा दिया। बाद में वह फौज में भर्ती हो गए। फौज में काम करते हुए उनमें पढ़ाई-लिखाई के प्रति रुचि पैदा हुई। 1892 में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक लिखी। वह पुस्तक इतनी अधिक दिलचस्प थी कि वह शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए। उन्होंने लिखना जारी रखा। उनका मुख्य उद्देश्य जनता को सजग रखना था ताकि वह अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को तैयार रहे। उन्होंने रुपए-पैसे की कभी चिंता नहीं की। उनकी कृतियां इतनी तीखी थीं कि सरकारी अधिकारी चौकन्ने हो गए। उन्हें जनता की सेवा में जेल भी जाना पड़ा। वह जेल को एक सम्मानित स्थान समझते थे। कहा जाता है कि यूरोप में गोर्की जैसा कोई दूसरा लेखक नहीं है जिसने जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष किया हो।"

न सिर्फ सोवियत पाठकों में, वरन सारे संसार के पाठकों में गोर्की की अतिशय लोकप्रियता का मुख्य कारण यह है कि उनकी रचनाएं दलित लोगों के सच्चे संघर्षों, संभावनाओं और इच्छाओं को सच्चाई के साथ उद्घाटित कर अर्ध-उपनिवेशी रूस के जीवन के एक नए वीरतापूर्ण युग को वाणी प्रदान करती है। इसी विशिष्टता ने उनके पात्रों को औपनिवेशिक भारत की जनता का प्रिय बना दिया, क्योंकि उनमें भारतीय जनता को अपने ही जैसे दुख झेलते लोगों के दर्शन होते थे। 

गोर्की के जीवन की परिस्थितियों ने उन्हें अपनी जनता के दुखों-कष्टों का दर्शक तथा भागीदार बना दिया। सामाजिक न्याय के लिए उनके अथक प्रयासों ने उन्हें जनता की अगली पांत- प्रगतिशील क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों की पांत- में पहुंचा दिया।

 उनकी प्रारंभिक रचनाएं रोमांटिक थीं, लेकिन उसमें रूसी जीवन के नए युग का प्रभाव भी प्रतिबिंबित होता था। वह प्रथम रूसी लेखक थे जिन्होंने रूस में उथल-पुथल के आसन्न बादल के विस्तार को पहले से ही भांप लिया था। यही मुख्य कारण है कि भारत के क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों ने गोर्की को तुरंत स्वीकार कर लिया और यह महसूस किया कि जिस तरह की घटनाएं रूस में हुई है, ठीक उसी तरह की घटनाएं भारत में भी होने जा रही है।

 हिंदी, उर्दू और बंगला पत्रिकाओं में गोर्की की कहानियों का अनुवाद तीसरे दशक से होने लगा। दूसरी भारतीय भाषाएं भी पीछे न रहीं। भारतीय साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन के विकास के साथ-साथ गोर्की और अन्य रूसी लेखकों में लोगों की दिलचस्पी बहुत अधिक बढ़ गई। उनके अनुवाद और तेजी से होने लगे और हिंदी तथा उर्दू की कुछ पत्रिकाओं ने रूसी लेखकों की कहानियों के विशेषांक भी निकालें। उर्दू में इस प्रकार के एक विशेषांक का संपादन मशहूर कहानी लेखक सआदत हसन मंटो ने किया।

गोर्की का उपन्यास "मां" भारतीय भाषाओं में अनूदित होने वाली उनकी पहली महत्वपूर्ण कृति थी। अंग्रेजी में सर्वप्रथम यह पुस्तक 1907 में छपी। उसके बाद 1921 में यह दुबारा प्रकाशित हुई। मां में, जिसमें अत्यंत विश्वसनीयता और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता के साथ यह दर्शाया गया है कि सामाजिक आकांक्षाएं व्यक्ति की आत्मा के साथ एकाकार होकर कैसे उसके लिए एक वैयक्तिक मूल्य ग्रहण कर लेती है, भारतीय पाठकों को व्यक्ति और समाज के एक नये संबंध के विकास की झांकी मिली। उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि मां न केवल सामाजिक संघर्ष की एक गाथा है, बल्कि दलितों के ऐतिहासिक परिवर्तन को दर्शाने वाली एक ऐसी मानवीय दस्तावेज है जो "मानवजाति के नए मानव" को शिक्षित भी करती है।

हिंदी में "मां" का पहला अनुवाद 30 साल पहले छविनाथ पांडेय ने किया था जिसका शीर्षक था 'मां का हृदय'। उन्होंने यह अनुवाद हिंदी के कहानीकार स्वर्गीय विनोद शंकर व्यास की प्रेरणा से किया था। यह एक अविकल अनुवाद था। उन्हीं दिनों गोर्की की कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें चेलकश, छब्बीस मर्द और एक औरत तथा ओडेेस्सा का राजकुमार कहानियां भी शामिल थीं।
 
स्वर्गीय चंद्रभाल जौहरी ने भी कुछ वर्ष बाद इस उपन्यास का बहुत अच्छा अनुवाद किया। अपने अनुवाद की भूमिका में उन्होंने लिखा: "यह मात्र उपन्यास नहीं है, बल्कि पूंजीवाद के जुए के नीचे समाज की यंत्रणा की एक सजीव गाथा है। इसे सरसरी तौर पर पढ़ने से इसका वास्तविक सौंदर्य उद्घाटित नहीं होता, पर ध्यानपूर्वक पढ़ने से ऐसा स्थाई भाव पैदा होता है जैसा कोई सुंदर चित्र देखने से होता है।"

 सियाराम शरण प्रसाद ने हिंदी उपन्यासकार डॉ वृंदावन लाल वर्मा पर अपनी डॉक्टरेट की थीसिस में गोर्की के "मां" की नायिका तथा इंदौर की रानी अहिल्याबाई में निकट साम्य बताया है।

 हिंदी के विख्यात उपन्यासकार और आलोचक इलाचंद्र जोशी के कथनानुसार," यदि स्वयं गोर्की का हृदय मां की तरह न होता, तो वह मां जैसा शक्तिशाली उपन्यास कभी न लिख पाते।" एक और सुप्रसिद्ध हिंदी लेखक स्वर्गीय रांगेय राघव ने अपने लेख "मैक्सिम गोर्की और प्रगतिशील साहित्य" में गोर्की की प्रतिभा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए कहा है कि मां संपूर्ण मानवता का प्रतीक है और गोर्की ने इसमें समकालीन समाज का चित्रण अत्यंत यथार्थवादी ढंग से किया है। प्रेमचंद ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपनी फिल्म "मिल और मजूर" की पटकथा लिखी जिस पर ब्रिटिश सरकार ने रोक लगा दी थी। गोर्की के लिए उनके ह्रदय में इतना गहरा सम्मान था कि 1936 में बहुत बीमार होने पर भी जब उन्हें गोर्की की मृत्यु का समाचार मिला तो वह उनकी स्मृति में आयोजित शोक सभा में भाग लेने के लिए रोगशैैय्या से उठ कर गए। उस सभा में उन्होंने गोर्की को जो श्रद्धांजलि अर्पित की, वह सूचनाप्रद होने के साथ ही एक महान लेखक द्वारा दूसरे महान लेखक को अर्पित अंतिम श्रद्धांजलि थी।

 गोर्की ने अनेक हिंदी लेखकों को प्रेरणा दी। उनसे प्रेरणा पाने वालों में हिंदी के अन्यतम शैलीकार पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र भी थे। उन्होंने अपनी कहानी "मां" में जिसमें एक भारतीय क्रांतिकारी की एक वीर माता का चित्रण है, गोर्की की ही "मां" का एक प्रतिरूप प्रस्तुत किया। चौथे दशक और पांचवें दशक के प्रारंभ में मां और मजदूर अथवा मजदूर नेता लेखकों की प्रिय विषयवस्तु थे। 

"मां" का पहला उर्दू अनुवाद लाहौर में 1946 में छपा। इसके अनुवादक मखमूर जालंधरी थे जिन्हें गोर्की के एक और उपन्यास फोमा गोर्देयेव के अनुवाद (दीवाना है दीवाना) के लिए हाल में सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया है। उर्दू में "मां" का एक सस्ता संस्करण 1953 में मकतब शाह-ए-राह ने छापा।

 "मां" का प्रथम पंजाबी अनुवाद मजदूर शीर्षक से पांचवें दशक के प्रारंभ में छपा। नरिन्दर सिंह "सोच" के इस अनुवाद के बाद इसका एक और अनुवाद छपा। यह अनुवाद गुरबख्श सिंह ने, जो स्वयं पंजाबी के अच्छे लेखक हैं, "मां" शीर्षक से किया।

 बंगला में अनूदित गोर्की की किसी कृति का पुस्तक-रूप में पहला प्रकाशन तीसरे दशक के प्रारंभ में हुआ। यह पुस्तक की विमल सेन की "मां" जो गोर्की के उपन्यास का संक्षिप्त रूपांतर थी। 1933 में नृपेन्द्र कृष्ण चट्टोपाध्याय ने भी "मां" का बंगला रूपांतरण किया। मां का बंगला में संपूर्ण अनुवाद श्रीमती पुष्पमयी बोस ने किया जो 1954 में प्रकाशित हुआ। "मां" के इन सभी अनुवादों के अनेक संस्करण निकल चुके हैं।

 उत्पल दत्त के लिटिल थियेटर ग्रुप में ने छठे दशक के आरंभ में मां के उस प्रसंग का जिसमें मई दिवस का चित्रण है, बंगला नाट्य रूपांतरण भी प्रस्तुत किया। यही रूपांतरण दिल्ली में भी अभिनीत किया गया। बंगाल की प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री मोलिना देवी ने "मां" उपन्यास पर आधारित एक नाटक भी प्रस्तुत किया जिसकी मुख्य भूमिका में खुद उन्होंने ही अभिनय किया।

 रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शरतचंद्र भी एक शक्तिशाली लेखक के रूप में गोर्की का बहुत अधिक सम्मान करते थे। अपने उपन्यास "पथेर दाबी" में शरत बाबू गोर्की से प्रभावित लगते हैं। इलाचंद्र जोशी से एक साक्षात्कार में शरतचंद्र ने कहा था: "गोर्की को पढ़ने के बाद अनुभव होता है कि मानव जीवन का जितनी गहराई से गोर्की ने विश्लेषण किया है, वैसा किसी और लेखक ने नहीं किया।..."
 शरतचंद्र ने जोशी को गोर्की की एक कहानी "जीव जो कभी मनुष्य थे" का 1922 के आरंभ में प्रकाशित बंगला अनुवाद पढ़ने के लिए कहा। उन्होंने आगे बताया:  "आप इसमें एकदम नया दृष्टिकोण, नए विचार, नयी शैली तथा नई तकनीक पायेंगे। गोर्की ने मानवता को एक नया संदेश दिया है। यदि आप गोर्की को नहीं पढ़ेंगे, तो अपने को जीवन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू की जानकारी से वंचित रखेंगे।"

"मां" का मराठी अनुवाद "आई" नाम से प्रभाकर ऊर्ध्वरेशे ने किया है। यह पांचवें दशक के प्रारंभ में प्रकाशित हुआ। बाद में इस पुस्तक के कई और मराठी अनुवाद प्रकाशित हुए। मराठी लेखकों पर गोर्की की पुस्तकों का गहरा प्रभाव पड़ा। उदाहरणार्थ, बी. वी. (मामा) वरेरकर के नाटक "सोने का कलश" पर गोर्की का प्रभाव देखा जा सकता है तथा उपन्यास "पुतलीघर" सीधे गोर्की के "मां" से प्रेरित लगता है। मामा वरेरकर ने "सोने का कलश" में वर्ग संघर्ष का तथा "पुतलीघर" में बम्बई के मिल मजदूरों के जीवन का चित्रण किया है। 

आलोचक बटुक देसाई के कथनानुसार गोर्की गुजराती जनता के सभी वर्गों में, यहां तक कि "ऊंचे बुद्धिजीवियों" के बीच भी बहुत लोकप्रिय हैं। "मां" का गुजराती में दो बार अनुवाद हो चुका है और दोनों ही अनुवादों के एक से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। चौथे दशक के प्रारंभ से जब समाजवादी विचारधारा न केवल बुद्धिजीवियों, वरन मजदूरों और किसानों के व्यापक तबकों के बीच भी फैलने लगी, तो गोर्की का उपन्यास "मां" गुजरात में जन-आंदोलन के संगठनकर्ताओं के लिए एक उपयोगी अस्त्र सिद्ध हुआ।

 असमिया में "मां" का अनुवाद करने का प्रयास कई लेखकों ने किया और उनके अनुवादों के अंश विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे। लेकिन इसका प्रथम संपूर्ण अनुवाद जदुनाथ सैकिया ने किया। इस पुस्तक की भूमिका में असम के सुप्रसिद्ध राजनीतिक नेता फणि बोरा ने, जिन्होंने यह अनुवाद प्रकाशित किया है, कहा है कि "संसार की ऐसी कोई भाषा नहीं है जिसमें गोर्की की अमर कृति "मां" का अनुवाद न हुआ हो। "मां" समस्त संसार के सामाजिक क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का अनन्त स्त्रोत है।"

"अम्मां" नाम से लिंगराज ने "मां" का तेलुगु अनुवाद किया जो 1934 में छपा। किंतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उसे जब्त कर लिया। पर पढ़ने वाली जनता ने उसका उत्साहपूर्ण स्वागत किया और उसका वितरण गुप्त रूप से होता रहा। 1939 में मद्रास की प्रथम कांग्रेस सरकार ने "मां" पर लगा प्रतिबंध हटा लिया। तब से इस पुस्तक के 8 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और पाठकों में इतने व्यापक लोकप्रियता प्राप्त कर ली है।

 तमिल में "मां" का अनुवाद टी. एस. चिदंबर रघुनाथन ने किया है जो 1952 में प्रकाशित हुआ।

 उड़िया में "मां" का अनुवाद अनंत पटनायक ने किया है जो स्वयं उड़िया के प्रसिद्ध कवि हैं।

 बंगला में गोर्की के संबंध में 5 पुस्तकें हैं। उनमें से एक सोमेंद्रनाथ ठाकुर की है जो गोर्की से विदेश में मिले थे। उन्होंने इस भेंट का वर्णन अपनी पुस्तक त्रयी (तीन) में किया है।

मैसूर राज्य की युवा पीढ़ी के अगुआ लेखक और उपन्यासकार ने गोर्की के "मां" का अनुवाद कन्नड़ में किया है।
"मां" का यह अनुवाद पहले लोकप्रिय साप्ताहिक पत्र चित्रगुप्त में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ था। मैसूर के एक उदीयमान प्रकाशक और मुद्रक सी. एच. रामाराव ने "मां" का सरल सचित्र संस्करण प्रकाशित किया है।

प्रस्तुत लेख वीरेंद्र त्रिपाठी द्वारा लिखित है,जो कि लिया गया है:
मैक्सिम गोर्की जन्मशती अंक, 
सोवियत दर्पण 
खंड 3, अंक 17-18 6 अप्रैल, 1968

प्रस्तुत लेख व पत्रिका का चित्र आदरणीया Richa Rana मेम से साभार प्राप्त

Thursday, 14 July 2022

किसी के घर मे यूं ही नहीं घुस जाया जाता

किसी के घर मे यूं ही नहीं घुस जाया जाता
फिर चाहे वह राष्ट्रपति का ही घर क्यों न हो.

रसोई में बिना पूछे कोई कैसे घुस सकता है?
वो तो बहुत 'पवित्र' जगह है
फिर चाहे वह राष्ट्रपति की ही रसोई क्यों न हो.

और बेडरूम में घुसना तो सरासर असभ्यता है
और वह भी मोटे मोटे विदेशी महंगे गद्दों पर जूतों के साथ कूदना?
यह तो बर्दाश्त के बाहर है.

किसी के निजी स्वीमिंग पूल के साफ पारदर्शी पानी में 
पसीने और धूल से लथपथ शरीर के साथ 
सैकड़ों की संख्या में नहाने का क्या मतलब है?
यही न, कि आप अभी तक सभ्य नहीं हुए हैं.

जिस आलीशान भवन में आपने हज़ारों की संख्या में प्रवेश किया है,
उसे 'असभ्य' तरीके से अपने पैरों तले रौंदा है,
वह एक 'महान' व्यक्ति का भवन था.

उसने आपके लिए क्या-क्या नहीं किया
पहले मुस्लिमों को ठिकाने लगाया.
आपने में से कुछ लोगों ने इस पर ताली भी बजाई.

फिर आपकी सुरक्षा के नाम पर 
देश की सुरक्षा के नाम पर
लिट्टे को कुचल कर रख दिया.

नफ़रत इतनी कि
प्रभाकरन  के 9 साल के बच्चे को बंकर से निकाल कर
उसके कपड़े उतार कर 
उसकी खुली छाती पर
मीडिया के सामने गोली मारी.

तमिलों को बहुत 'सभ्य' तरीके से उनकी औक़ात बताई.

भले ही तमाम तस्वीरें तमिलों के बर्बर कत्लेआम की  कहानी कह रही हों.
लेकिन आपने तो यही समझा कि यह सब देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है
अपने धर्म की पताका को सबसे ऊंचा रखने के लिए ज़रूरी है.

बुद्ध पूर्णिमा के दिन भी जब चांद पर रक्त के छींटे पड़े
तो आपको लगा कि आपका शांति पूर्ण धर्म 
अब आक्रामक हो रहा है.
लेकिन इसी में आपने अपनी सुरक्षा समझी.

रोटी और नौकरी के बदले यह आक्रामक धर्म आपका ही तो चुनाव था.
आप तो खुश थे कि तमिलों - मुस्लिमों को
हाशिये पर धकेला जा रहा है.
उन्हें घुटनों के बल चलने पर मजबूर किया जा रहा है.

लेकिन सच तो यह भी है कि
किसी भी खेल को भूखे पेट कब तक देखा जा सकता है?
पेट की मरोड़ के साथ
कब तक खेला जा सकता है?

धर्म और नफ़रत से दिमाग भरता है पेट नहीं
और जब आप से न रहा गया 
तो आपने रोटी की खातिर राष्ट्रपति के भवन को रौंद डाला?

यह तो सरासर एहसान फ़रामोशी है.

रोटी तो आपका चुनाव ही नहीं था.

चलिए, इसके बावजूद
आप वहां चले ही गए
 तो आपने कुछ तो देखा होगा
महसूस किया होगा.

राष्ट्रपति की आलीशान भरी हुई रसोई देखकर
शायद आपको महसूस हुआ होगा कि
आपकी रसोई खाली क्यों है!

समृद्धि में बजबजाते महल को देखकर 
शायद आपको अपनी गरीबी का कारण समझ आया हो!

स्विमिंग पूल के अथाह पानी को देखकर
शायद आपको अपनी गहरी प्यास का अहसास हुआ होगा!

उसके विशाल आलीशान बेडरूम को देखकर
शायद आप इसकी जादुई ताकत को पहचान पाए हो,
कि हर रात यह आपकी नींद चुम्बक की तरह कैसे खींच लेती हैं!

लेकिन एक अहसास शायद अभी बाकी है 
हमारे धर्म भले ही अलग अलग हों
लेकिन हमारी रोटी एक ही है.

भूख सबकी एक ही है
बच्चों की चिंता सबकी एक ही है!

यह अहसास
हमें उनसे जोड़ेगा, जिनसे नफ़रत के बदले 
हमने अपनी रोटी गवाई है.

बच्चों का भविष्य गंवाया है!

अपने भविष्य को राजा के हाथों गिरवी रखा है!

इस अहसास के बाद
रोटी और बच्चों के भविष्य की सांझी लड़ाई में
हम सिर्फ इन आलीशान, समृद्धि से बजबजाते भवनों में
प्रवेश ही नहीं करेंगे,
बल्कि उस पर बुलडोजर चलाकर
उसे समतल भी कर देंगे.

फिर वहां हम एक फुलवारी लगाएंगे
जिसमें हर रंग, हर खुशबू के फूल होंगे.
और सभी अपने रंग अपनी खुशुब पर ताउम्र इतराएँगे...

#मनीषआज़ाद

Amita Sheereen की वाल से

दर्शनों के लिए शुल्क

https://www.aajtak.in/india/uttar-pradesh/story/kashi-vishwanath-temple-worship-in-sawan-2022-new-rate-list-varanasi-lcl-1498755-2022-07-13 

चर्च में प्रार्थना, मस्जिद में नमाज और गुरुद्वारे में अरदास निशुल्क है बल्कि सिक्ख तो लंगर भी छकाते हैं
दुनिया भर में बड़े हिंदू मंदिर ही हैं जहाँ दर्शनों के लिए शुल्क देना पड़ता है। 

हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 लाख रुपये का जुर्माना।

बस्तर के आदिवासियों के बीच दो दशक रहकर उनकी लड़ाई और हक़ के लिए अपना खून पसीना बहाने वाले हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया है.यह राशि उन्हें 4 हफ्तों में देना होगा,अगर जुर्माना नहीँ दे पाए तो उन्हें जेल जाना होगा.छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि धारा 211 के तहत उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करें.हिमांशु कुमार एक असाधारण योद्धा हैं.वे युवा रहते हुए ही आदिवासियों की भलाई के लिए बस्तर आये और परिवार के साथ बस्तर के दंतेवाड़ा में ही रहना शुरू किए.वनवासी चेतना आश्रम बनाकर आदिवासियों के बीच काम करने लगे.छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार जब माओवादियों के नाम पर भोले -भाले आदिवासियों को मारने लगे तो उन्होंने विद्रोह किया.उनके आश्रम को रमन सिंह सरकार ने उजाड़ दिया.इसी दौरान कल्लूरी नामक एक दुर्दांत पुलिस अधिकारी ने बस्तर में खूब मारकाट मचाया.और सैकड़ो आदिवासियों को नक्सली कहकर मरवा दिया.2009 में सुकमा ज़िले के गोमपाड़ में 16 आदिवासियों के फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने और एक मासूम बच्चे का हाथ काटने के मामले में हिमांशु कुमार ने सुरक्षा बलों पर आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.13 साल बाद न्याय तो नहीं मिला लेकिन हिमांशु कुमार को आदिवासियों के लिए न्याय मांगने पर सजा जरूर मिल गई है.पिछले दिनों ब्रेन हेमरेज झेलने वाले हिमांशु कुमार चेहरे पर मुस्कान रख तानाशाही से लड़ते हैं.मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें 2007 से जानता हूँ.जब वे एक वेबसाइट में बस्तर के अलग -अलग हिस्सों में सुरक्षा बलों के जुल्म की कहानी लिखते थे. बाद में सुप्रीम कोर्ट में वे कई मामले लेकर गए और उन्हें तब न्याय भी मिला.हिमांशु कुमार अभी कहते हैं उनके जेब में 5 लाख तो क्या 5 हजार भी नहीं है.हर एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता की जेब की यही कहानी है.उनके पास क्या होगा मैं बता सकता हूँ. उनके झोले में बस्तर के आदिवासियों की चिट्ठी होगी.देश के किसी हिस्से में इस तानाशाही सरकार के खिलाफ लड़ने,एक होने का पम्पलेट होगा.कल संजीव भट्ट को गुजरात दंगा मामले में जेल से ही गिरफ्तार किया गया है और आज 13 साल बाद आदिवासियों के लिए न्याय मांगने पर हिमांशु कुमार को जेल भेजने की पूरी तैयारी है.हम हमारे लिए इस तानाशाही दौर में लड़ने और लड़ने की हिम्मत देने वाले साथियों को खोते जा रहे हैं.उन्हें जेल में ठूंसा जा रहा है.प्रताड़ना दी जा रही है.आप अगर इस तानाशाही सरकार और बिक चुके न्यायपालिका के खिलाफ हिमांशु कुमार के साथ खड़े नहीं होते हैं तो समझिए आप मुर्दा हैं.लाल सलाम हिमांशु कुमार.हम सब हिमांशु कुमार हैं.

*विक्रम सिंह चौहान*

Monday, 11 July 2022

पूँजीवाद में 'प्रेस की स्‍वतंत्रता' के खोखले जुमले पर लेनिन के विचार



पूँजीपतियों ने हमेशा से ही ''स्‍वतंत्रता'' शब्‍द को अमीरों के और अमीर होने और मज़दूूरों के भूखे मरने की स्‍वतंत्रता के रूप में इस्‍तेमाल किया है। पूँजीवादी मायने में प्रेस की स्‍वतंत्रता का अर्थ है: प्रेस को रिश्‍वत देने की अमीरों की स्‍वतंत्रता, उनके द्वारा तथाकथित जनमत का निर्माण करने के लिए अपनी सम्‍पत्ति का इस्‍तेमाल करने की स्‍वतंत्रता। इस सन्‍दर्भ में भी ''शुद्ध लोकतंत्र'' के हिमायती एक निहायत ही घटिया और भ्रष्‍ट तंत्र की हिमायत करते हैं जो अमीरों को मास मीडिया पर नियंत्रण करने देता है। वे जनता की आँँख में धूल झोंकने का काम करते हैं और और सुनने में अच्‍छे व तर्कसंगत लगने वाले लेकिन पूरी तरह से झूठे जुमलों के ज़रिये प्रेस को पूँजीवादी ग़ुलामी से मुक्‍त करने के ठोस ऐतिहासिक कार्यभार से लोगों का ध्‍यान भटकाते हैं।

- लेनिन

Sunday, 10 July 2022

सिर्फ धार्मिक कट्टरता नहीं, सरकार का रवैया भी ज़िम्मेदार

सिर्फ धार्मिक कट्टरता नहीं, सरकार का रवैया भी ज़िम्मेदार
( 'हस्तक्षेप', राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित) 

इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब से जुड़ी एक घटना बेहद लोकप्रिय है. यह न केवल लोकप्रिय है, बल्कि इस्लाम का अर्थ इसी घटना के संदेश में छिपा है. असल में, दिन के पांचों वक्त की नमाज़ मोहम्मद साहब की दिनचर्या का हिस्सा थी. जब वो नमाज़ के लिए अपने घर से मस्जिद को जाते, तो रास्ते में एक वृद्ध महिला (जो तब तक इस्लाम की अनुयायी नहीं थी) हर रोज छत से उन पर कूड़ा डाल दिया करती. लेकिन, वो इससे कभी गुस्सा नहीं होते. कपड़े पर पड़े कूड़े को छाड़ देते और चुपचाप मस्जिद की ओर चल पड़ते. एक दिन ऐसा हुआ कि उस महिला ने कूड़ा नहीं डाला. यह देख कर मोहम्मद साहब बहुत हैरान हुए. इसकी वजह जानने के लिए वो उस महिला के घर चले गए. पता चला कि आज वो बीमार है. इजाजत लेकर मोहम्मद साहब उस महिला के करीब गए और उनकी तबियत का जायजा लिया. मोहम्मद साहब की इस रहमदिली को देख कर वृद्ध महिला बहुत प्रभावित हुई. हदीसों में लिखा है कि इसके बाद वृद्ध महिला ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया. यह एक ऐसी घटना है जिससे यह समझना बेहद आसान है कि एक मुस्लिम की जिंदगी किन राहों पर और किन तौर-तरीकों पर गुजरनी चाहिए. उदयपुर की घटना तो इस्लाम की शिक्षा के बिलकुल उलट है. जब इतनी बदतमीजियों के बाद भी मोहम्मद साहब वृद्ध महिला की हाल पूछने जा रहे हैं, तो उनके बारे में एक अभद्र टिप्पणी करने वाले की जान ले लेना तो उनकी शिक्षाओं का ही अपमान है. जो मजहब एक कत्ल को पूरी इंसानियत के कत्ल के बराबर करार देता हो, उस मजहब के अनुयायी इस घटना के पक्षधर कभी नहीं हो सकते. यानी उदयपुर में हुई हत्या बेहद निंदनीय और गंभीर है. जाहिर है, इसको अंजाम देने वाला व्यक्ति सही अर्थों में इस्लामिक नहीं हो सकता.

नुपुर शर्मा द्वारा मोहम्मद साहब पर अभद्र टिप्पणी और उसके बाद जन्मी परिस्थितियों और पूरी बहस का तो यह एक पक्ष है. इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी कोई कम गंभीर और चिंताजनक नहीं है. इस दूसरे पक्ष में शासन और प्रशासन की हीलाहवाली है जिसके चलते सरकार की मंशा ही कटघरे में है. असल में, जब नुपूर शर्मा ने मोहम्मद साहब के खिलाफ भावनाएं भड़काने वाली टिप्पणी की, तब से उन पर दिल्ली समेत कई राज्यों में पुलिस केस दर्ज हैं. लेकिन, पुलिस उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है. दूसरी ओर, मोहम्मद जुबैर नामक एक पत्रकार को हाल ही में दिल्ली पुलिस ने धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. दिलचस्प बात यह है कि नुपूर और जुबैर दोनों पर एक जैसी धाराओं में केस दर्ज है. धारा 295ए (किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करना) और 153ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत दोनों आरोपी हैं. लेकिन, दोनों मामलों में कार्रवाई को लेकर पुलिस का रवैया बिलकुल अलग है. यह मामला इतना साफ है कि एक मामूली समझ रखने वाला व्यक्ति भी सरकार के मंसूबों को समझ सकता है. यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार पर कार्रवाई करने में भेदभाव के आरोप लग रहे हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने और पुख्ता कर दिया है. नुपूर शर्मा की एक याचिका को खारिज करते हुए जज ने कहा- "क्या कारण है कि इतने मुकदमे के बावजूद पुलिस आपको छू नहीं पा रही और आपकी शिकायत पर आरोपी को गिरफ्तार किया जा रहा है".

यह बताने की जरूरत नहीं है कि नुपूर शर्मा के बयान के बाद देश के कई हिस्सों में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हुई. विरोध प्रदर्शनों में आगजनी हुई. यहाँ तक कि कुछ लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी. उदयपुर और अमरावती में दो हत्याकांड हुए और दोनों ही मामलों के पीछे नुपूर शर्मा की टिप्पणी को वजह बताई गई. ऐसा कह कर इन हत्याकांड को जायज नहीं ठहराया जा रहा है, लेकिन हैरतअंगेज बात है कि इन तमाम मामलों के बावजूद नुपूर शर्मा पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. वहीं, जिस मोहम्मद जुबैर की ट्विटर पोस्ट से किसी हिंसा की खबर नहीं है, वह जेल की सलाखों के पीछे है. बात सिर्फ़ नुपूर शर्मा की नहीं है. हालिया वर्षों में देखा गया है कि मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने और उनकी भावनाओं को भड़काने वालों पर शासन और प्रशासन वक्त रहते जरूरी कार्रवाई नहीं करता. दिल्ली दंगा भड़काने वाली रागिनी तिवारी और नरसंहार की अपील करने वाले नरसिंहानंद इसके उदाहरण हैं. सरकार और प्रशासन बार-बार ऐसे उदाहरण पेश कर रहे हैं जिनसे साफ तौर पर पक्षपात का पता चलता है और यह सब एक आजाद और लोकतांत्रिक देश के लिए बिलकुल भी मुनासिब नहीं है.

दरअसल, यहीं पर हम और हमारा संविधान दोनों की हार हो जाता है. जिस संविधान में 'कानून के समक्ष समानता' और 'विधि का शासन' की प्रतिज्ञा ली गई है, उस संविधान वाले देश में भेदभाव की ऐसी पराकाष्ठा तो नहीं होनी चाहिए. सवाल है कि क्या हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर चल पड़े हैं जहाँ कानूनी प्रावधानों के बजाय मनमानेपन से कार्रवाई की जाएगी? क्या हम पड़ोसी देश पाकिस्तान की शैली की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ से अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ भेदभाव की खबरों से हम चिंतित हो जाते हैं. यकीनन हम वैसा नहीं बनना चाहेंगे. लेकिन, मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय मुस्लिम व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पा रहा है. संविधान जिस सेक्यूलरिज़्म की बात करता है, उसकी अवहेलना हो रही है. ऐसे में एक अल्पसंख्यक के तौर पर मुस्लिम समुदाय खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है.

असल में, सरकार को समझना होगा कि देश में बढ़ रही कट्टरता के लिए केवल धर्म जिम्मेदार नहीं है, सरकार का ढीला रवैया भी इसको बढ़ाता है. जब धार्मिक भावनाओं को भड़काने वालों पर वक्त रहते कार्रवाई नहीं होती है, तब आहत होने वालों का गुस्सा धर्म के अंदर कट्टरता को बढ़ावा देता है. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वक्त रहते असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई करे. लेकिन, सत्ता अपने चरित्र के मुताबिक जब तक कट्टरता को नासूर बना कर अपनी सियासी रोटी सेंकती रहेगी, मुल्क अपना अमन-चैन यूंही खोता रहेगा.