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Thursday, 4 August 2022

शिक्षा

#शिक्षा
दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर दीपक भास्कर लिखते हैं 
"आज दुखी हूं, कॉलेज में काम खत्म होने के बाद भी स्टाफ रूम में बैठा रहा, कदम उठ ही नहीं रहे थे। 

दो बच्चों ने आज ही एड्मिशन लिया और जब उन्होंने फीस लगभग 16000 सुना और होस्टल फीस लगभग 1,20,000 सुनकर एड्मिशन कैंसिल करने को कहा। 

पिता ने लगभग पैर पकड़ते हुए कहा कि सर, मजदूर है राजस्थान से, हमने सोचा कि सरकारी कॉलेज है तो फीस कम होगी, होस्टल की सुविधा होगी सस्ते मे, इसलिए आ गए थे। 

मैंने रोकने की कोशिश भी की लेकिन अंत में एडमिशन कैंसिल ही करा लिया। 

बैठकर, ये सोच रहा था कि एक तरफ जहां लोग सस्ती शिक्षा चाह रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सरकार कह रही है कि 30 प्रतिशत खुद जेनेरेट कीजिये। 

ऑटोनोमी के नाम पर निजिकरण हो रहा है।

सोचिये दिल्ली विश्विद्यालय के चारो तरफ प्राइवेट यूनिवर्सिटी का जाल बिछ रहा है।

जो लोग 15,000 की फीस नही दे पा रहे वो लाखों की फीस प्राइवेट यूनिवर्सिटी को कहां से देंगे ?

लगभग ऐसे कई बच्चे डीयू के तमाम कॉलेजों में एड्मिशन कैंसिल कराते होंगे। 

ये उस देश में हो रहा है जिसके प्रधानमंत्री स्वयं चाय बेचने की बात करते हैं।

अरे भाई आप गरीब है तो इनके लिए ही कुछ कर देते। 

कॉलेज में कई तरह की स्कालरशिप तो हैं लेकिन फीस भरने के लिए काफी नही, होस्टल फीस भरने लायक तो कतई नही। 

PG में रेंट पर रहना तो अच्छी आर्थिक व्यवस्था वाले लोगों के भी वश का नही। 

शिक्षक एक कार्पस फण्ड बनाने की बात कर रहे हैं ताकि ऐसे बच्चों की मदद किया जा सके। 
लेकिन इससे एक दो लोगों की मदद तो हो सकती है लेकिन सर्व कल्याण तो सरकार की नीतियों से ही होगा।

लेकिन सरकार को खुद बचा रहना है और बाकी मंत्रालयों को उनको बचाये रखना है

तो गरीब मजदूर क्या करें। 

लेकिन मैं दुखी हूं कालेज का 95 प्रतिशत का कटऑफ और बच्चे के पास 95 प्रतिशत नम्बर हैं

लेकिन इसके बावजूद भी गरीब बच्चे क्या करेंगे ?

गांव गोद लिए जा रहे हैं और लोग गरीब हुए जा रहे हैं। 

बेटी बचाओ बेटी बढ़ाओ का नारा कितना फेक लगता है। 

गर्ल्स कॉलेज बेटियों को उच्च शिक्षा देने के लिए ही बना था लेकिन आज एक गरीब की बेटी उसी से महरूम हो गई।

विश्विद्यालय अपने यूनिवर्सिटी होने का चरित्र खो रही है। 

बाकी फर्स्ट कट ऑफ का एड्मिसन खत्म हो गया है। 

दूसरे और तमाम कटऑफ में भी शायद ऐसे कितने बच्चे आएंगे और वापस चले जायेंगे।

ये सालों से हो रहा होगा लेकिन जब भारत बदल रहा था तो शायद ये भी बदल जाता। 

बाकी अब कुछ नहीं। शिक्षा मंत्रालय रोज एक नया फरमान ला रहा है। 

उस पिता ने कहा कि सुना था कि JNU की फीस कम है उसी से सोच लिए थे कि यहां भी कम होगी। 

अब आप समझे JNU को खत्म क्यों किया जा रहा है। 


Wednesday, 3 August 2022

जबाव अभी तक नही मिला है


Ram Ayodhya Singh, जो कि राजेन्द्र कॉलेज छपरा के सेवानिवृत्त प्राधानाध्यापक है, लिखते है:

"अनुत्पादक काम में लगा कोई सर्वश्रेष्ठ होने का दावा कैसे कर सकता है? *ब्राह्मण* हो या कोई और, जो उत्पादन नहीं करता वह श्रेष्ठ नहीं निकृष्ट है. धर्म में लगे सभी लोग अनुत्पादक काम में लगे हैं, इसलिए वे *हरामखोर* हैं, और हरामखोर कभी सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता."

क्या भाषा है प्रधानाध्यापक महोदय का। मैंने उनसे प्रश्न किया है:
'लेकिन जो व्यक्ति रास्ते के पत्थर को पूजनीय भगवान बना दे, बौद्धिक रूप से वो श्रेष्ठ है या उसके कहने पर   भगवान से मनोकामना पूरा होने की लालच में या किसी आसन्न विपत्ति से बचने के लिए धन, प्रसाद और चढ़ावा चढ़ाने वाले हजारों लोग श्रेष्ठ है?'
जबाव अभी तक नही मिला है।

Tuesday, 2 August 2022

शकील बदायूँनी

1946 में मुम्बई में हकीम मिर्ज़ा बेग देहलवी की अध्यक्षता में एक मुशायरा आयोजित हुआ ।  हकीम मिर्ज़ा मुम्बई के साहित्यिक गतिविधियों के एक ख़ास स्तम्भ थे। उस मुशायरे में जिगर मुरादाबादी, मजरूह सुल्तानपुरी, माहिर उल क़ादरी, जोश मलीहाबादी जैसे शायरों के बीच दिल्ली से एक शायर आया था जो दिल्ली में एक सप्लाई अफसर था। उसदिन का मुशायरा बहुत कामयाब रहा । 
उस मुशायरे में एक फ़िल्म निर्माता फाज़ली साब मौजूद थे । वे मेहंदी नाम की एक फ़िल्म बना रहे थे। उन्होंने मुशायरा देखने के बाद निर्णय लिया कि फ़िल्म में भी एक मुशायरे का सीन होना चाहिए । दो दिन बाद स्टूडियो में सारे शायर को आमंत्रित किया गया। रात भर मुशायरे की शूटिंग चलती रही। सुबह सारे शायर को निर्माता ने नगद भुगतान किया। दिल्ली का वो सप्लाई अफ़सर  शायर को सात सौ रुपया मिला। उसे यकीन नहीं हुआ कि फ़िल्म में एक नज़्म सुनाने के लिए इतने पैसे मिल सकते हैं। वह मात्र 75 रुपये महीने कमाता था। 

वह दिल्ली वापिस जाकर अपनी नौकरी करने लगा। दो महीने बाद हक़ीम मिर्ज़ा का एक ख़त उस सप्लाई अफसर के नाम आया कि एक बड़े प्रोड्यूसर अपने फ़िल्म स्टूडियो में आपको गीतकार की नौकरी देना चाहते हैं। आप एकबार मुम्बई आके उनसे मिल लीजिए । आपके आने जाने का रेल किराया फ़िल्म  स्टूडियो देगा ।  अपने घरवालों से सलाह लेकर वह शख़्स मुम्बई पहुँचा । मुम्बई के मोहम्मद अली रोड पर स्थित हक़ीम मिर्ज़ा के क्लीनिक में अपना सामान रखा। प्रोड्यूसर की कार क्लीनिक पे आके रुकी। वह प्रोड्यूसर थे मशहूर निर्माता निर्देशक ए आर कारदार । कारदार खुद उस सप्लाई अफसर शायर को लेकर अपने कारदार फ़िल्म स्टूडियो (अब राजकमल स्टूडियो) परेल पहुँचे। बड़े केबिन में सिर्फ़ दो लोग मौजूद थे कारदार साब और दिल्ली से आया वह शख़्स।  कारदार ने कहा कि यंग मैन, आप जो नौकरी कर रहे हो इसमें 20 साल बाद ज़्यादा से ज़्यादा सेक्रेटरी बन जाओगे। जिसमें आपको 1200 ₹ पगार मिलेगा। अगर इस फिल्मी दुनिया में आपकी किस्मत ने साथ दिया तो एक गाने के लिए दो से तीन हज़ार पा सकते हो ।  अभी आप जो पगार पा रहे हो उससे पांच गुना पगार मैं आपको देने के लिए तैयार हूं। बतौर गीतकार आपको मेरी फ़िल्म कम्पनी में काम करना होगा । उस सप्लाई अफसर शायर ने उनकी फ़िल्म कम्पनी ज्वाईन कर ली। प्रोड्यूसर ने अपने मुलाजिमों के रहने के लिए दादर पूर्व में स्टेशन के पास एक बंगला किराए पे ले रखा था। उस बंगले का एक कमरा इस शायर को रहने के लिए दे दिया गया । कारदार प्रोडक्शन द्वारा निर्मित फ़िल्म में उस शायर के लिखे सारे गीत बहुत मशहूर हुए । उस फ़िल्म के संगीतकार  थे नौशाद। एक लोकप्रिय गीत जिसे गायिका और अभिनेत्री उमा देवी उर्फ़ टुनटुन ने गाया था- 'अफ़साना लिख रही हूँ ' । फ़िल्म का नाम था 'दर्द' और वह सप्लाई अफसर गीतकार थे शकील बदायूँनी । 

उस दादर के बंगले में ही संगीतकार नौशाद भी रहते थे। नौशाद को शकील बदायूँनी के लिखे बोल बेहद पसंद आए । नौशाद ने उनके साथ एक कामयाब जोड़ी बनाने का फ़ैसला कर लिया। 
        
तभी मुल्क के बंटवारे का स्वर गूंजने लगा। पंजाब और बंगाल में कौमी दंगे भड़क उठे। उसकी तपिश मुम्बई भी पहुंच गई। सारे फ़िल्म स्टूडियो में काम बंद हो गए । दादर के उस बंगले में रहनेवाले ज़्यादातर मुलाजिम मुस्लिम थे। बताया गया कि उनके लिए यह एरिया सुरक्षित नहीं है। कारदार के असिस्टेंट डायरेक्टर रहे एस यू सन्नी अब निर्देशक बन चुके थे। वर्ली में उनका बंगला था। नौशाद साब वहाँ शिफ्ट हो गए । कुछ लोग दादर मुसाफिरखाना में चले गए जो पुलिस चौकी के पास था। शकील बदायूँनी अपने तीन मित्रों के साथ भिन्डी बाज़ार के एक खोली में शिफ़्ट हो गए। वहाँ इनकी जान पहचान वाला एक ग्रामोफोन रिकॉर्ड की दुकान थी। इस दंगे फसाद के बीच रात में शकील अपने दोस्तों के साथ उसकी दुकान खुलवा के अंदर से कुंडी लगा लेते थे और वे सब बैठकर फ़िल्म दर्द के गीत ग्रामोफोन पर सुना करते थे। 

तभी शकील बदायूँनी को पता चला कि कारदार साब अपने फ़िल्म स्टूडियो को बंद करके पाकिस्तान शिफ्ट हो गए। महबूब स्टूडियो के मालिक महबूब खान भी पाकिस्तान चले गए। माहौल इतना ख़राब था कि शकील के कई रिश्तेदार भी पाकिस्तान शिफ्ट होने लगे।  शकील के दोस्तों ने कहा कि अब इस देश में मुसलमानों का कुछ नहीं होनेवाला। हमें भी अब पाकिस्तान शिफ्ट चलना चाहिए। शकील ने अपने दोस्तों के कहने पर मुम्बई से कराची के लिए समुद्री जहाज का टिकट 20 ₹ में खरीद लिया। जाने से पहले वह नौशाद से मिलने के वास्ते गए। नौशाद को जब मालूम हुआ कि शकील का पाकिस्तान जाने का प्लान बन गया है उन्होंने उसी वक़्त उन्हें टिकट लौटाने को कहा और दिलासा दिया कि कुछ दिनों में हालात बिल्कुल ठीक हो जाएंगे।  शकील ने उनकी बात मान ली और वह भी एस यू सन्नी के बंगले में शिफ्ट हो गए ।  लेकिन अब सबको आजीविका की चिन्ता सताने लगी थी क्योंकि जमापूंजी सब खत्म हो रहे थे।
तभी जे बी एच वाडिया ने एस यू सन्नी के निर्देशन में एक फ़िल्म की घोषणा कर दी। जिसमें शकील को गीतकार और नौशाद को संगीतकार के लिए साइन कर लिया गया। फ़िल्म में कलाकार थे दिलीप कुमार, नरगिस । 1948 में रिलीज उस फिल्म का नाम था 'मेला' । इस फ़िल्म के ज़्यादतर गीत सुपरहिट हुए।  जिसमें एक मुकेश का गाया मशहूर गीत था- "गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के"। 

शकील का रहने का अभी भी कोई ठिकाना नहीं था। फ़िल्म मेला के बाद शकील रहने के लिए बांद्रा चले गए। बांद्रा में उनका स्कूल टाइम का एक दोस्त साकिर का दो मंजिला मकान था। उसके ग्राउंड फ्लोर पर वह शिफ्ट हो गए। बदायूँ से उन्होंने अपना परिवार भी बुला लिया। कुछ ही दिन बाद साकिर पाकिस्तान चले गए और फिर वहीं बस गए। अब उस मकान के सर्वेसर्वा शकील हीं थे। उसी मकान की पहली मंजिल को नौशाद साहब ने अपना आशियाना बना लिया। 

तभी ख़बर आई कि पाकिस्तान से कारदार साब और महबूब खान लौटकर मुम्बई आ गए। महबूब खान ने शकील और नौशाद की जोड़ी के साथ फ़िल्म 'अनोखी अदा' शुरू की।  फ़िल्म अंदाज़, उड़नखटोला, बाबुल, दीदार, आन, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुग़ले आज़म, गंगा जमुना के संगीत रचकर शकील और नौशाद की जोड़ी हिन्दी सिनेमा जगत में इतिहास रच दिया। 

निर्माता निर्देशक विजय भट्ट ने फ़िल्म बैजू बावरा में गीतकार के लिए कवि प्रदीप को साइन कर लिया था। संगीतकार के लिए नौशाद साब को अनुबंधित किया। नौशाद ने गीतकार के लिए शकील बदायूँनी का नाम सुझाया। विजय भट्ट ने कहा कि नौशाद मियां...इस फ़िल्म में भजन लिखने हैं गज़ल नहीं।  नौशाद ने कहा कि जी हाँ हुजूर... शकील साब भजन ही लिखेंगे। शकील साब को सिचुएशन दी गई । उन्होंने दो भक्ति गीत लिखे।  नौशाद ने दोनों गीत कम्पोज करके विजय भट्ट को सुनाया । भजन सुनते हीं उन्होंने उसी वक़्त शकील बदायूँनी को गीतकार के लिए साइन कर लिया।  वे भजन थे- 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज'...  'ओ दुनिया के रखवाले'..। 

1960 के बाद शकील बदायूँनी नौशाद साब से अलग दूसरे संगीतकारों के साथ काम करना शुरू किए। एम सादिक जो गुरुदत्त की फ़िल्म चौदहवीं का चांद का निर्देशन करने जा रहे थे। वे शकील बदायूँनी को गुरूदत्त से मिलाने ले गए। गुरुदत्त ने कहा कि शकील साब मुझे खुशी है कि आप मेरी फिल्म के गीत लिखने जा रहे हैं। पिछली दफा आपसे 'कागज़ के फूल' के गीत लिखवाना चाह रहा था लेकिन आपने सीधे मना कर दिया था। उन्होंने जवाब दिया कि अब मैं आपकी हर फ़िल्म के गीत लिखने के लिए तैयार हूँ। गुरुदत्त ने उनको फ़िल्म चौदहवीं का चाँद और साहब बीवी और गुलाम दोनों फिल्मों के लिए बतौर गीतकार साइन कर लिया। शकील साब के लिखे गीत ने फिर जादू चलाया। "चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो .... ना जाओ सैंया छुड़ा के बैंया ..... साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी सुना है तेरे महफ़िल में" ये गीत बहुत मशहूर हुए थे। 

1961 में शकील साब को 'चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब' के लिए  बेस्ट गीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
1962 में फ़िल्म घराना के गीत 'हुस्नवालों तेरा जवाब नहीं' के लिए और  1963 में फ़िल्म बीस साल बाद के गीत "कहीं दीप जले कहीं दिल" के लिए बेस्ट गीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
शकील ऐसे शायर थे जिनके गीतों के बग़ैर रोमांटिक फिल्मों की कहानियां पूरी नहीं होती थी । उनकी शायरी में इंसान की वो ज़िन्दगी मौजूद होती है जो ख़्वाबों में दिखती है। साहिर और शकील दोनों समकालीन शायर थे लेकिन दोनों का नज़रिया अलग था । मसलन ताजमहल पर लिखे दोनों के गीत मशहूर हैं। जहाँ साहिर लिखते हैं " एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।"
वहीं शकील लिखते हैं " एक शहंशाह ने बनवाके हसीं ताजमहल, सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है"

साठ के दशक में रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम के लिए बेग़म अख़्तर मुम्बई आई थी।   शकील बदायूँनी को जब मालूम हुआ कि बेग़म अख़्तर मुम्बई आई हैं और आज शाम को वी टी (अब सीएस टी) स्टेशन से उनकी ट्रेन है। शकील साब आनन फानन में वी टी पहुँचे। ट्रेन सीटी दे चुकी थी। वह भागते हुए कोच तक आए। खिड़की से उन्होंने बेग़म अख़्तर को एक कागज़ पकड़ाया और कहा कि आपके लिए एक गज़ल लिखी है।  लखनऊ रेडियो स्टेशन के प्रोग्राम में बेग़म अख़्तर ने शकील साब की लिखी गज़ल गायी। वो गज़ल इतनी मकबूल हुई कि गज़ल संसार की सिग्नेचर ट्यून बन गई। वो गज़ल थी 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया '

फ़िल्म लीडर, मेरे महबूब, दिल दिया दर्द लिया के गीत 'कोई सागर दिल को बहलाता नहीं',  दो बदन के गीत 'लो आ गई उनकी याद' या 'जब चली ठंडी हवा' जैसे लिखे इनके गीत रेडियो और ग्रामोफोन पर लोग सुन रहे थे तभी शकील साब टी बी रोग से ग्रसित हो गए । उन्हें पंचगनी के सेनेटोरियम में भर्ती कराया गया। नौशाद को पता था कि इन्हें पैसे की कमी है।  एक सच्चे दोस्त के नाते उन्होंने शकील साब को बतौर गीतकार तीन फिल्में साइन कराई । प्रोड्यूसर से एक साथ पूरे पैसे लेकर उन्होंने शकील साब के इलाज का बंदोबस्त किया। शकील बदायूँनी ने तीन फिल्मों के गीत पंचगनी के सैनिटोरियम में रहकर लिखी।  वे तीन फिल्में थी राम और श्याम, आदमी और संघर्ष । जिसके गाने "आज की रात मेरे दिल की सलामी लेले, आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़, मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दो तो फिर मेरी चाल" बहुत लोकप्रिय हुए। 

पंचगनी से स्वस्थ होने के बाद शकील साब मुम्बई वापिस आ गए । उसके बाद दूसरे संगीतकारों के लिए दो साल तक फिल्मों के गीत लिखते रहे।  एकदिन अचानक फिर उनकी तबियत बिगड़ी। लगभग 54 साल की उम्र में 20 अप्रैल 1970 को बॉम्बे हॉस्पिटल में उन्होंने आख़िरी सांसे ली ।  

शकील बदायूँनी#106वीं जयंती# 3 अगस्त 1916#


हड़तालों के विषय में लेनिन का एक महत्पपूर्ण लेख

हड़तालों के विषय में लेनिन का एक महत्पपूर्ण लेख 

1. क्या कारण है कि बड़े पैमाने का फैक्टरी उत्पादन हमेशा हड़तालों को जन्म देता है?
2. क्या एक मज़दूर के लिए अकेले संघर्ष करना सम्भव है?
3. मज़दूर वर्ग के संघर्ष के लिए हड़तालों (काम रोकने) का क्या महत्व है?
4. हड़तालें मज़दूरों को क्या सिखाती हैं?
5. हड़तालों के बारे में मज़दूरों के बीच कुछ विभ्रम? 

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हड़तालों के विषय में  – लेनिन
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लिखित: 1899 के अंत में लिखा गया प्रकाशित: पहली बार 1924 में प्रोलेटार्स्काया रेवोल्युत्सिया, नंबर 8-9 पत्रिका में प्रकाशित हुआ। एक अज्ञात हाथ से कॉपी की गई पांडुलिपि के अनुसार प्रकाशित। स्रोत: लेनिन कलेक्टेड वर्क्स, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, 1964, मॉस्को, वॉल्यूम 4, पृष्ठ 310-319।
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इधर कुछ वर्षों से रूस में मज़दूरों की हड़तालें बारम्बार हो रही हैं। एक भी ऐसी औद्योगिक गुबेर्निया नहीं है, जहाँ कई हड़तालें न हुई हों। और बड़े शहरों में तो हड़तालें कभी रुकती ही नहीं। इसलिए यह बोधगम्य बात है कि वर्ग-सचेत मज़दूर तथा समाजवादी हड़तालों के महत्व, उन्हें संचालित करने की विधियों तथा उनमें भाग लेने वाले समाजवादियों के कार्यभारों के प्रश्न में अधिकाधिक सततू रूप में दिलचस्पी लेते हैं।
हम यहाँ इन प्रश्नों के विषय में अपने विचारों की रूपरेखा प्रस्तुत करने का प्रयत्न करेंगे। अपने पहले लेख में हमारी योजना आमतौर पर मज़दूर वर्ग आन्दोलन में हड़तालों के महत्व की चर्चा करने की है; दूसरे लेख में हम रूस में हड़ताल-विरोधी क़ानूनों की चर्चा करेंगे तथा तीसरे में इस बात की चर्चा करेंगे कि रूस में हड़तालें किस तरह की जाती थीं और की जाती हैं तथा उनके प्रति वर्ग-सचेत मज़दूरों को क्या रुख़ अपनाना चाहिए:-
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सबसे पहले हमें हड़तालों के शुरू होने और फैलने का कारण ढूँढ़ना चाहिए। यदि कोई आदमी हड़तालों को याद करेगा, जिनकी उसे व्यक्तिगत अनुभव से, दूसरों से सुनी रिपोर्टों या अख़बारों की ख़बरों के माध्येम से जानकारी प्राप्त हुई हो, तो वह तुरन्त देख लेगा कि जहाँ कहीं बड़ी फैक्टरियाँ हैं तथा उनकी संख्या बढ़ती जाती है, वहाँ हड़तालें होती तथा फैलती हैं। सैकड़ों (कभी-कभी हजारों तक) लोगों को काम पर रखने वाली बड़ी फैक्टरियों में एक भी ऐसी फैक्टरी ढूँढ़ना सम्भव नहीं होगा, जहाँ हड़तालें न हुई हों। जब रूस में केवल चन्द बड़ी फैक्टरियाँ थीं, तो हड़तालें भी कम होती थीं। परन्तु जब से बड़े औद्योगिक ज़िलों और नये नगरों तथा गाँवों में बड़ी फैक्टरियों की तादाद बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है, हड़तालें बारम्बार होने लगी हैं। 

क्या कारण है कि बड़े पैमाने का फैक्टरी उत्पादन हमेशा हड़तालों को जन्म देता है? इसका कारण यह है कि पूँजीवाद मालिकों के ख़िलाफ़ मज़दूरों के संघर्ष को लाजिमी तौर पर जन्म देता है तथा जहाँ उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, वहाँ संघर्ष अनिवार्य ढंग से हड़तालों का रूप ग्रहण करता है।
आइये, इस पर प्रकाश डालें।

पूँजीवाद नाम उस सामाजिक व्यवस्था को दिया गया है, जिसके अन्तर्गत जमीन, फैक्टरियाँ, औजार आदि पर थोड़े-से भूस्वामियों तथा पूँजीपतियों का स्वामित्व होता है, जबकि जनसमुदाय के पास कोई सम्पत्ति नहीं होती या बहुत कम होती है तथा वह उजरती मज़दूर बनने के लिए बाध्य  होता है। भूस्वामी तथा फैक्टरी मालिक मज़दूरों को उजरत पर रखते हैं और उनसे इस या उस किस्म का माल तैयार कराते हैं, जिसे वे मण्डी में बेचते हैं। इसके अलावा फैक्टरी मालिक मज़दूरों को केवल इतनी मज़दूरी देते हैं, जो उनके तथा उनके परिवारों के मात्र निर्वाह की व्यवस्था करती है, जबकि इस परिमाण से ऊपर मज़दूर जितना भी पैदा करता है, वह फैक्टरी मालिक की जेब में उसके मुनाफ़े के रूप में चला जाता है। इस प्रकार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत जन समुदाय दूसरों का उजरती मज़दूर होता है, वह अपने लिए काम नहीं करता, अपितु मज़दूरी पाने के वास्ते मालिकों के लिए काम करता है। यह बात समझ में आने वाली है कि मालिक हमेशा मज़दूरी घटाने का प्रयत्न करते हैं : मज़दूरों को वे जितना कम देंगे, उनका मुनाफ़ा उतना ही अधिक होगा। मज़दूर अधिक से अधिक मज़दूरी हासिल करने का प्रयत्न करते हैं, ताकि अपने परिवारों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन दे सकें, अच्छे घरों में रह सकें, दूसरे लोगों की तरह अच्छे कपड़े पहन सकें तथा भिखारियों की तरह न लगें। इस प्रकार मालिकों तथा मज़दूरों के बीच मज़दूरी की वजह से निरन्तर संघर्ष चल रहा है; मालिक जिस किसी मज़दूर को उपयुक्त समझता है, उसे उजरत पर हासिल करने के लिए स्वतन्त्र है, इसलिए वह सबसे सस्ते मज़दूर की तलाश करता है। मज़दूर अपनी मर्जी के मालिक को अपना श्रम उजरत पर देने के लिए स्वतन्त्र है, इस तरह वह सबसे महँगे मालिक की तलाश करता है, जो उसे सबसे ज्यादा देगा। मज़दूर चाहे देहात में काम करे या शहर में, वह अपना श्रम उजरत पर चाहे जमींदार को दे या धनी किसान को, ठेकेदार को अथवा फैक्टरी मालिक को, वह हमेशा मालिक के साथ मोल-भाव करता है, मज़दूरी के लिए उससे संघर्ष करता है।
परन्तु क्या एक मज़दूर के लिए अकेले संघर्ष करना सम्भव है? मेहनतकश लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है : किसान तबाह हो रहे हैं तथा वे देहात से शहर या फैक्टरी की ओर भाग रहे हैं। जमींदार तथा फैक्टरी मालिक मशीनें लगा रहे हैं, जो मज़दूरों को उनके काम से वंचित करती रही हैं। शहरों में बेरोज़गारों की संख्या बढ़ रही है तथा गाँवों में अधिकाधिक लोग भिखारी बनते जा रहे हैं; जो भूखे हैं, वे मज़दूरी के स्तर को निरन्तर नीचे पहुँचा रहे हैं। मज़दूर के लिए अकेले मालिक से टक्कर लेना असम्भव हो जाता है। यदि मज़दूर अच्छी मज़दूरी माँगता है अथवा मज़दूरी में कटौती से असहमत होने का प्रयत्न करता है, तो मालिक उसे बाहर निकल जाने के लिए कहता है, क्योंकि दरवाजे पर बहुत-से भूखे लोग खड़े होते हैं, जो कम मज़दूरी पर काम करने के लिए सहर्ष तैयार हो जायेंगे।
जब लोग इस हद तक तबाह हो जाते हैं कि शहरों और गाँवों में बेरोज़गारों की हमेशा बहुत बड़ी तादाद रहती है, जब फैक्टरी मालिक अथाह मुनाफ़े खसोटते हैं तथा छोटे मालिकों को करोड़पति बाहर धकेल देते हैं, तब व्यक्तिगत रूप से मज़दूर पूँजीपति के सामने सर्वथा असहाय हो जाता है। तब पूँजीपति के लिए मज़दूर को पूरी तरह कुचलना, दास मज़दूर के रूप में उसे और निस्सन्देह अकेले उसे ही नहीं, वरन उसके साथ उसकी पत्नी तथा बच्चों को भी मौत की ओर धकेलना सम्भव हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम उन व्यवसायों को लें, जिनमें मज़दूर अभी तक क़ानून का संरक्षण हासिल नहीं कर सकते हैं तथा जिनमें वे पूँजीपतियों का प्रतिरोध नहीं कर सकते, तो हम वहाँ असाधारण रूप से लम्बा कार्य-दिवस देखेंगे, जो कभी-कभी 17 से लेकर 19 घण्टे तक का होता है, हम 5 या 6 वर्ष के बच्चों को कमरतोड़ काम करते हुए देखेंगे, हम स्थायी रूप से ऐसे भूखे लोगों की एक पूरी पीढ़ी देखेंगे, जो धीरे-धीरे भूख के कारण मौत के मुँह में पहुँच रहे हैं। उदाहरण हैं वे मज़दूर, जो पूँजीपतियों के लिए अपने घरों पर काम करते हैं; इसके अलावा कोई भी मज़दूर बीसियों दूसरे उदाहरणों को याद कर सकता है! दासप्रथा या भूदास प्रथा के अन्तर्गत भी मेहनतकश जनता का कभी इतना भयंकर उत्पीड़न नहीं हुआ, जितना कि पूँजीवाद के अन्तर्गत हो रहा है, जब मज़दूर प्रतिरोध नहीं कर पाते या ऐसे क़ानूनों का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकते, जो मालिकों की मनमानी कार्रवाइयों पर अंकुश लगाते हों।

इस तरह अपने को इस घोर दुर्दशा में पहुँचने से रोकने के लिए मज़दूर व्यग्रतापूर्वक संघर्ष शुरू कर देते हैं। मज़दूर यह देखकर कि उनमें से हरेक व्यक्ति सर्वथा असहाय है तथा पूँजी का उत्पीड़न उसे कुचल डालने का खतरा पैदा कर रहा है, संयुक्त रूप से अपने मालिकों के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर देते हैं। मज़दूरों की हड़तालें शुरू हो जाती हैं। आरम्भ में तो मज़दूर यह नहीं समझ पाते कि वे क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, उनमें इस बात की चेतना का अभाव होता है कि वे अपनी कार्रवाई किस वास्ते कर रहे हैं : वे महज मशीनें तोड़ते हैं तथा फैक्टरियों को नष्ट करते हैं। वे फैक्टरी मालिकों को महज अपना रोष दिखाना चाहते हैं; वे अभी यह समझे बिना कि उनकी स्थिति इतनी असहाय क्यों है तथा उन्हें किस चीज के लिए प्रयास करना चाहिए, असह्य स्थिति से बाहर निकलने के लिए अपनी संयुक्त शक्ति की आजमाइश करते हैं।
तमाम देशों में मज़दूरों के रोष ने पहले छिटपुट विद्रोहों का रूप ग्रहण किया – रूस में पुलिस तथा फैक्टरी मालिक उन्हें "विद्रोही" के नाम से पुकारते हैं। तमाम देशों में इन छुटपुट विद्रोहों ने, एक ओर, कमोबेश शान्तिपूर्ण हड़तालों को और दूसरी ओर, अपनी मुक्ति हेतु मज़दूर वर्ग के चहुँमुखी संघर्ष को जन्म दिया।

मज़दूर वर्ग के संघर्ष के लिए हड़तालों (काम रोकने) का क्या महत्व है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें पहले हड़तालों की पूरी तस्वीर हासिल करनी चाहिए। जैसाकि हम देख चुके हैं, मज़दूर की मज़दूरी मालिक तथा मज़दूर के बीच करार द्वारा निर्धारित होती है और यदि इन परिस्थितियों में निजी तौर पर मज़दूर पूरी तरह असहाय है, तो जाहिर है कि मज़दूरों को अपनी माँगों के लिए संयुक्त रूप से लड़ना चाहिए, वे मालिकों को मज़दूरी घटाने से रोकने के लिए अथवा अधिक मज़दूरी हासिल करने के लिए हड़तालें संगठित करने के वास्ते बाधित होते हैं। यह एक तथ्य है कि पूँजीवादी व्यवस्था वाले हर देश में मज़दूरों की हड़तालें होती हैं। सर्वत्र, तमाम यूरोपीय देशों तथा अमरीका में मज़दूर ऐक्यबद्ध न होने पर अपने को असहाय पाते हैं; वे या तो हड़ताल करके या हड़ताल करने की धमकी देकर केवल संयुक्त रूप से ही मालिकों का प्रतिरोध कर सकते हैं। ज्यों-ज्यों पूँजीवाद का विकास होता जाता है, ज्यों-ज्यों फैक्टरियाँ अधिकाधिक तीव्र गति से खुलती जाती हैं, ज्यों-ज्यों छोटे पूँजीपतियों को बड़े पूँजीपति बाहर धकेलते जाते हैं, मज़दूरों द्वारा संयुक्त प्रतिरोध किये जाने की आवश्यकता त्यों-त्यों तात्कालिक होती जाती है, क्योंकि बेरोज़गारी बढ़ती जाती है, पूँजीपतियों के बीच, जो सस्ती से सस्ती लागत पर अपना माल तैयार करने का प्रयास करते हैं (ऐसा करने के वास्ते उन्हें मज़दूरों को कम से कम देना होगा), प्रतियोगिता तीव्र होती जाती है तथा उद्योग में उतार-चढ़ाव अधिक तीक्ष्ण तथा संकट  अधिक उग्र होते जाते हैं। जब उद्योग फलता-फूलता है, फैक्टरी मालिक बहुत मुनाफ़ा कमाते हैं, परन्तु वे उसमें मज़दूरों को भागीदार बनाने की बात नहीं सोचते। परन्तु जब संकट पैदा हो जाता है, तो फैक्टरी मालिक नुकसान मज़दूरों के मत्थे मढ़ने का प्रयत्न करते हैं। पूँजीवादी समाज में हड़तालों की आवश्यकता को यूरोपीय देशों में हरेक इस हद तक स्वीकार कर चुका है कि उन देशों में क़ानून हड़तालें संगठित किये जाने की मनाही नहीं करता; केवल रूस में ही हड़तालों के विरुद्ध भयावह क़ानून अब भी लागू है (इन क़ानूनों और उनके लागू किये जाने के बारे में हम किसी और मौके पर बात करेंगे)।
कुछ भी हो, हड़तालें जो ठीक पूँजीवादी समाज के स्वरूप के कारण जन्म लेती हैं, समाज की उस व्यवस्था के विरुद्ध मज़दूर वर्ग के संघर्ष की शुरुआत की द्योतक होती हैं। अमीर पूँजीपतियों का अलग-अलग, सम्पत्तिहीन मज़दूरों द्वारा सामना किया जाना मज़दूरों के पूर्ण दास बनने का द्योतक होता है। परन्तु जब ये ही सम्पत्तिहीन मज़दूर ऐक्यबद्ध हो जाते हैं, तो स्थिति बदल जाती है। यदि पूँजीपति ऐसे मज़दूर नहीं ढूँढ़ पायें, जो अपनी श्रम-शक्ति को पूँजीपतियों के औजारों और सामग्री पर लगाने और नयी दौलत पैदा करने के लिए तैयार हों, तो फिर कोई भी दौलत पूँजीपतियों के लिए लाभकर नहीं हो सकती। जब तक मज़दूरों को पूँजीपतियों के साथ निजी आधार पर सम्बन्ध रखना पड़ता है, वे ऐसे वास्तविक दास बने रहते हैं, जिन्हें रोटी का एक टुकड़ा हासिल कर सकने के लिए दूसरे को लाभ पहुँचाने के वास्ते निरन्तर काम करना होगा, जिन्हें हमेशा आज्ञाकारी तथा मूक उजरती नौकर बना रहना होगा। परन्तु जब मज़दूर संयुक्त रूप में अपनी माँग पेश करते हैं और थैलीशाहों के आगे झुकने से इंकार करते हैं, तो वे दास नहीं रहते, वे इन्सान बन जाते हैं, वे यह माँग करने लगते हैं कि उनके श्रम से मुट्ठीभर परजीवियों का ही हितसाधन नहीं होना चाहिए, अपितु उसे इन लोगों को भी, जो काम करते हैं, इन्सानों की तरह जीवनयापन करने में सक्षम बनाना चाहिए। दास स्वामी बनने की माँग पेश करने लगते हैं – वे उस तरह काम करना और रहना नहीं चाहते, जिस तरह जमींदार और पूँजीपति चाहते हैं, बल्कि वे उस तरह काम करना और रहना चाहते हैं, जिस तरह स्वयं मेहनतकश जन चाहते हैं। हड़तालें इसलिए पूँजीपतियों में सदा भय पैदा करती हैं कि वे उनकी प्रभुता पर कुठाराघात करती हैं।

जर्मन मज़दूरों का एक गीत मज़दूर वर्ग के बारे में कहता है : "यदि चाहे तुम्हारी बलशाली भुजाएँ, हो जायेंगे सारे चक्के जाम"। और यह एक वास्तविकता है : फैक्टरियाँ, जमींदार की जमीन, मशीनें, रेलें, आदि से एक विराट यन्त्र के चक्के की तरह हैं, उस यन्त्र की तरह, जो विभिन्न उत्पाद हासिल करता है, उन्हें परिष्कृत करता है तथा निर्दिष्ट स्थान को भेजता है। इस पूरे यन्त्र को गतिमान करता है मज़दूर, जो खेत जोतता है, खानों से खनिज पदार्थ निकालता है, फैक्टरियों में माल तैयार करता है, मकानों, वर्कशापों और रेलों का निर्माण करता है। जब मज़दूर काम करने से इन्कार कर देते हैं, इस पूरे यन्त्र के ठप होने का खतरा पैदा हो जाता है। हरेक हड़ताल पूँजीपतियों को याद दिलाती है कि वे नहीं, वरन मज़दूर, वे मज़दूर वास्तविक स्वामी हैं, जो अधिकाधिक ऊँचे स्वर में अपने अधिकारों की घोषणा कर रहे हैं। हरेक हड़ताल मज़दूरों को याद दिलाती है कि उनकी स्थिति असहाय नहीं है, कि वे अकेले नहीं हैं। जरा देखें कि हड़तालों का स्वयं हड़तालियों पर तथा किसी पड़ोस की या नजदीक की फैक्टरियों में या एक ही उद्योग की फैक्टरियों में काम करने वाले मज़दूरों, दोनों पर कितना जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। सामान्य, शान्तिपूर्ण समय में मज़दूर बड़बड़ाहट किये बिना अपना काम करता है, मालिक की बात का प्रतिवाद नहीं करता, अपनी हालत पर बहस नहीं करता। हड़तालों के समय वह अपनी माँगें ऊँची आवाज में पेश करता है, वह मालिकों को उनके सारे दुर्व्यवहारों की याद दिलाता है, वह अपने अधिकारों का दावा करता है, वह केवल अपने और अपनी मज़दूरी के बारे में नहीं सोचता, वरन अपने सारे साथियों के बारे में सोचता है, जिन्होंने उसके साथ-साथ औजार नीचे रख दिये हैं और जो तकलीफों की परवाह किये बिना मज़दूरों के ध्येोय के लिए उठ खड़े हुए हैं। मेहनतकश जनों के लिए प्रत्येक हड़ताल का अर्थ है बहुत सारी तकलीफें, भयंकर तकलीफें, जिनकी तुलना केवल युद्ध द्वारा प्रस्तुत विपदाओं से की जा सकती है – भूखे परिवार, मज़दूरी से हाथ धो बैठना, अक्सर गिरफ्तारियाँ, शहरों से भगा दिया जाना, जहाँ उनके घरबार होते हैं तथा वे रोज़गार पर लगे होते हैं। इन तमाम तकलीफों के बावजूद मज़दूर उनसे घृणा करते हैं, जो अपने साथियों को छोड़कर भाग जाते हैं तथा मालिकों के साथ सौदेबाजी करते हैं। हड़तालों द्वारा प्रस्तुत इन सारी तकलीफों के बावजूद पड़ोस की फैक्टरियों के मज़दूर उस समय नया साहस प्राप्त करते हैं, जब वे देखते हैं कि उनके साथी संघर्ष में जुट गये हैं। अंग्रेज मज़दूरों की हड़तालों के बारे में समाजवाद के महान शिक्षक एंगेल्स ने कहा था : "जो लोग एक बुर्ज़ुआ को झुकाने के लिए इतना कुछ सहते हैं, वे पूरे बुर्ज़ुआ वर्ग की शक्ति को चकनाचूर करने में समर्थ होंगे।"  बहुधा एक फैक्टरी में हड़ताल अनेकानेक फैक्टरियों में हड़तालों की तुरन्त शुरुआत के लिए पर्याप्त होती है। हड़तालों का कितना बड़ा नैतिक प्रभाव पड़ता है, कैसे वे मज़दूरों को प्रभावित करती हैं, जो देखते हैं कि उनके साथी दास नहीं रह गये हैं और, भले ही कुछ समय के लिए, उनका और अमीर का दर्जा बराबर हो गया है! प्रत्येक हड़ताल समाजवाद के विचार को, पूँजी के उत्पीड़न से मुक्ति के लिए पूरे मज़दूर वर्ग के संघर्ष के विचार को बहुत सशक्त ढंग से मज़दूर के दिमाग़ में लाती है। प्राय: होता यह है कि किसी फैक्टरी या किसी उद्योग की शाखा या शहर के मज़दूरों को हड़ताल के शुरू होने से पहले समाजवाद के बारे में पता ही नहीं होता और उन्होंने उसकी बात कभी सोची ही नहीं होती। परन्तु हड़ताल के बाद अध्यीयन मण्डलियाँ तथा संस्थाएँ उनके बीच अधिक व्यापक होती जाती हैं तथा अधिकाधिक मज़दूर समाजवादी बनते जाते हैं।

हड़ताल मज़दूरों को सिखाती है कि मालिकों की शक्ति तथा मज़दूरों की शक्ति किसमें निहित होती है; वह उन्हें केवल अपने मालिक और केवल अपने साथियों के बारे में ही नहीं, वरन तमाम मालिकों, पूँजीपतियों के पूरे वर्ग, मज़दूरों के पूरे वर्ग के बारे में सोचना सिखाती है। जब किसी फैक्टरी का मालिक, जिसने मज़दूरों की कई पीढ़ियों के परिश्रम के बल पर करोड़ों की धनराशि जमा की है, मज़दूरी में मामूली वृद्धि करने से इन्कार करता है, यही नहीं, उसे घटाने का प्रयत्न तक करता है और मज़दूरों द्वारा प्रतिरोध किये जाने की दशा में हजारों भूखे परिवारों को सड़कों पर धकेल देता है, तो मज़दूरों के सामने यह सर्वथा स्पष्ट हो जाता है कि पूँजीपति वर्ग समग्र रूप में समग्र मज़दूर वर्ग का दुश्मन है और मज़दूर केवल अपने ऊपर और अपनी संयुक्त कार्रवाई पर ही भरोसा कर सकते हैं। अक्सर होता यह है कि फैक्टरी का मालिक मज़दूरों की ऑंखों में धूल झोंकने, अपने को उपकारी के रूप में पेश करने, मज़दूरों के आगे रोटी के चन्द छोटे-छोटे टुकड़े फेंककर या झूठे वचन देकर उनके शोषण पर पर्दा डालने के लिए कुछ भी नहीं उठा रखता। हड़ताल मज़दूरों को यह दिखाकर कि उनका "उपकारी" तो भेड़ की खाल ओढ़े भेड़िया है, इस धोखाधाड़ी को एक ही वार में खत्म कर देती है।

इसके अलावा हड़ताल पूँजीपतियों के ही नहीं, वरन सरकार तथा क़ानूनों के भी स्वरूप को मज़दूरों की ऑंखों के सामने स्पष्ट कर देती है। जिस तरह फैक्टरियों के मालिक अपने को मज़दूरों के उपकारी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते हैं, ठीक उसी तरह सरकारी अफसर और उनके चाटुकार मज़दूरों को यह यकीन दिलाने का प्रयत्न करते हैं कि जार तथा जारशाही सरकार न्याय की अपेक्षानुसार फैक्टरियों के मालिकों तथा मज़दूरों, दोनों का समान रूप से ध्यान रखते हैं। मज़दूर क़ानून नहीं जानता, उसका सरकारी अफसरों, खास तौर पर ऊँचे पदाधिकारियों के साथ सम्पर्क नहीं होता, फलस्वरूप वह अक्सर इन सब बातों पर विश्वास कर लेता है। इतने में हड़ताल होती है। सरकारी अभियोजक, फैक्टरी इंस्पेक्टर, पुलिस और कभी-कभी सैनिक कारख़ाने में पहुँच जाते हैं। मज़दूरों को पता चलता है कि उन्होंने क़ानून तोड़ा है : मालिकों को क़ानून इकट्ठा होने और मज़दूरों की मज़दूरी घटाने और खुलेआम विचार-विमर्श करने की अनुमति देता है। परन्तु मज़दूर अगर कोई संयुक्त करार करते हैं, तो उन्हें अपराधी घोषित किया जाता है। मज़दूरों को उनके घरों से बेदखल किया जाता है, पुलिस उन दुकानों को बन्द कर देती है, जहाँ से मज़दूर खाने-पीने की चीजें उधार ले सकते हैं, उस समय भी जब मज़दूर का आचरण शान्तिपूर्ण होता है, सैनिकों को उनके ख़िलाफ़ भड़काने का प्रयत्न किया जाता है। सैनिकों को मज़दूरों पर गोली चलाने का आदेश दिया जाता है और जब वे भागती भीड़ पर गोली चलाकर निरस्त्र मज़दूरों को मार डालते हैं, तो जार स्वयं सैनिकों के प्रति आभार-प्रदर्शन करता है (इस तरह जार ने 1895 में यारोस्लाव्ल में हड़ताली मज़दूरों की हत्या करने वाले सैनिकों को धन्यवाद दिया था)। हर मज़दूर के सामने यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जारशाही सरकार उसकी सबसे बड़ी शत्रु है, क्योंकि वह पूँजीपतियों की रक्षा करती है तथा मज़दूरों के हाथ-पाँव बाँध देती है। मज़दूर यह समझने लगते हैं कि क़ानून केवल अमीरों के हितार्थ बनाये जाते हैं, कि सरकारी अधिकारी उनके हितों की रक्षा करते हैं, कि मेहनतकश जनता की जुबान बन्द कर दी जाती है, उसे इस बात की अनुमति नहीं दी जाती कि वह अपनी माँगें पेश करे, कि मज़दूर वर्ग को हड़ताल करने का अधिकार, मज़दूर समाचारपत्र प्रकाशित करने का अधिकार, क़ानून बनानेवाली और क़ानूनों को लागू करने के कार्य की देखरेख करने वाली राष्ट्रीय सभा में भाग लेने का अधिकार अवश्य हासिल करना होगा। सरकार ख़ुद अच्छी तरह जानती है कि हड़तालें मज़दूरों की ऑंखें खोलती हैं और इस कारण वह हड़तालों से डरती है तथा उन्हें यथाशीघ्र रोकने का प्रयत्न करती है। एक जर्मन गृहमन्त्री ने, जो समाजवादियों तथा वर्ग-सचेत मज़दूरों को निरन्तर सताने के लिए बदनाम था, जन प्रतिनिधियों के सामने यह अकारण ही नहीं कहा था : "हर हड़ताल के पीछे क्रान्ति का कई फनोंवाला साँप (दैत्य) होता है"। प्रत्येक हड़ताल मज़दूरों में इस अवबोध को दृढ़ बनाती तथा विकसित करती है कि सरकार उनकी दुश्मन है तथा मज़दूर वर्ग को जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के वास्ते अपने को तैयार करना चाहिए।

अत: हड़तालें मज़दूरों को ऐक्यबद्ध होना सिखाती हैं; उन्हें बताती हैं कि वे केवल ऐक्यबद्ध होने पर ही पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष कर सकते हैं; हड़तालें मज़दूरों को कारख़ानों के मालिकों के पूरे वर्ग के विरुद्ध, स्वेच्छाचारी, पुलिस सरकार के विरुद्ध पूरे मज़दूर वर्ग के संघर्ष की बात सोचना सिखाती है। यही कारण है कि समाजवादी लोग हड़तालों को युद्ध की पाठशाला, ऐसा विद्यालय कहते हैं, जिसमें मज़दूर पूरी जनता को, श्रम करने वाले तमाम लोगों को सरकारी अधिाकारियों के जुए से, पूँजी के जुए से मुक्त करने के लिए अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ युद्ध करना सीखते हैं।

परन्तु "युद्ध की पाठशाला" स्वयं युद्ध नहीं है। जब हड़तालें मज़दूरों के बीच व्यापक रूप से फैली होती हैं, कुछ मज़दूर (कुछ समाजवादियों समेत) यह सोचने लगते हैं कि मज़दूर वर्ग अपने को महज हड़तालों, हड़ताल कोषों या हड़ताल संस्थाओं तक सीमित रख सकता है, कि अकेले हड़तालों के जरिये मज़दूर वर्ग अपने हालात में पर्याप्त सुधार ला सकता है, यही नहीं, अपनी मुक्ति भी हासिल कर सकता है। यह देखकर कि संयुक्त मज़दूर वर्ग में, यही नहीं, छोटी हड़तालों तक में कितनी शक्ति होती है, कुछ सोचते हैं कि मज़दूर पूँजीपतियों तथा सरकार से जो कुछ भी हासिल करना चाहते हैं, उसके लिए बस इतना काफी है कि मज़दूर वर्ग पूरे देश में आम हड़ताल संगठित करे। इसी तरह का विचार अन्य देशों के मज़दूरों द्वारा भी व्यक्त किया गया था, जब मज़दूर वर्ग आन्दोलन अपने आरम्भिक चरणों में था तथा मज़दूर अभी बहुत अनुभवहीन थे। पर यह ग़लत विचार है। हड़तालें तो उन उपायों में से एक हैं, जिनके जरिये मज़दूर वर्ग अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करता है, परन्तु वे एकमात्र उपाय नहीं हैं। यदि मज़दूर संघर्ष करने के अन्य उपायों की ओर धयान नहीं देते, तो वे मज़दूर वर्ग की संवृद्धि तथा सफलताओं की गति धीमी कर देंगे। यह सच है कि यदि हड़तालों को कामयाब बनाना है, तो हड़तालों के दौरान मज़दूरों के निर्वाह के लिए कोषों का होना जरूरी है। ऐसे मज़दूर कोष (आम तौर पर उद्योग की पृथक शाखाओं, पृथक पेशें तथा वर्कशापों में मज़दूर कोष) तमाम देशों में रखे जाते हैं। परन्तु यहाँ रूस में यह बहुत कठिन है, क्योंकि पुलिस उनका पता लगाती है, धन जब्त कर लेती है तथा मज़दूरों को गिरफ़्तार करती है। निस्सन्देह, मज़दूर उन्हें पुलिस से छुपाने में सफल रहते हैं; स्वभावतया ऐसे कोषों को संगठित करना महत्तवपूर्ण है और हम मज़दूरों को उन्हें संगठित करने के विरुद्ध परामर्श नहीं देना चाहते। परन्तु यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि मज़दूर कोष क़ानून द्वारा निषिद्ध होने पर वे चन्दा देनेवालों को बड़ी संख्या में आकृष्ट करेंगे; और जब तक ऐसे संगठनों की सदस्य संख्या कम होगी, ये कोष बहुत उपयोगी सिद्ध नहीं होंगे। इसके अलावा उन देशों तक में, जहाँ मज़दूर यूनियनें खुलेआम विद्यमान हैं तथा उनके पास बहुत बड़े कोष हैं, मज़दूर वर्ग संघर्ष के साधन के रूप में अपने को हड़तालों तक सीमित नहीं कर सकता। जो कुछ आवश्यक है, वह उद्योग के मामलों में एक विघ्न (उदाहरण के लिए संकट, जो रूस में आज समीप आता जा रहा है) है, और कारख़ानों के मालिक तो जानबूझकर हड़तालें तक करायेंगे, क्योंकि कुछ समय के लिए काम का बन्द होना तथा मज़दूर कोषों का घटना उनके लिए लाभप्रद होता है। इसलिए मज़दूर किसी भी सूरत में अपने को हड़ताल सम्बन्धी कार्रवाइयों तथा हड़ताल सम्बन्धी संस्थाओं तक सीमित नहीं कर सकते। दूसरे, हड़तालें वहीं सफल हो सकती हैं, जहाँ मज़दूर पर्याप्त रूप में वर्ग-सचेत होते हैं, जहाँ वे हड़तालें करने के लिए सही अवसर चुनने में सक्षम होते हैं, जहाँ वे यह जानते हैं कि अपनी माँगें किस तरह पेश की जाती हैं, और जहाँ उनके समाजवादियों के साथ सम्बन्ध होते हैं और उनके जरिये पर्चे और पैम्फलेट हासिल कर सकते हैं। रूस में ऐसे मज़दूर अभी बहुत कम हैं, उनकी तादाद बढ़ाने के लिए हर चेष्टा की जानी चाहिए, ताकि मज़दूर वर्ग का धयेय जन साधारण को बताया जा सके, उन्हें समाजवाद तथा मज़दूर वर्ग के संघर्ष से अवगत कराया जा सके। समाजवादियों तथा वर्ग-सचेत मज़दूरों को इस उद्देश्य के लिए समाजवादी मज़दूर वर्ग पार्टी संगठित कर यह कार्यभार संयुक्त रूप से सँभालना चाहिए। तीसरे, जैसाकि हम देख चुके हैं, हड़तालें मज़दूरों को बताती हैं कि सरकार उनकी शत्रु है, कि सरकार के विरुद्ध संघर्ष चलाते रहना चाहिए। वस्तुत: हड़तालों ने ही धीरे-धीरे तमाम देशों के मज़दूर वर्ग को मज़दूरों के अधिाकारों तथा समग्र रूप में जनता के अधिाकारों के लिए सरकारों के ख़िलाफ़ संघर्ष करना सिखाया है। जैसाकि हम कह चुके हैं, केवल समाजवादी मज़दूर पार्टी ही मज़दूरों के बीच सरकार तथा मज़दूर वर्ग के धयेय की सच्ची अवधारणा का प्रचार करके यह संघर्ष चला सकती है। किसी और अवसर पर हम खास तौर पर इस बात की चर्चा करेंगे कि रूस में हड़तालें किस तरह संचालित होती हैं और वर्ग सचेत मज़दूरों को कैसे उनका उपयोग करना चाहिए। यहाँ हम यह इंगित कर दें कि हड़तालें जैसाकि हम ऊपर कह चुके हैं, स्वयं युद्ध नहीं, वरन युद्ध की पाठशाला हैं, कि हड़तालें संघर्ष का केवल एक साधन हैं, मज़दूर वर्ग आन्दोलन का केवल एक रूप हैं। अलग-अलग हड़तालों से मज़दूर श्रम करने वाले तमाम लोगों की मुक्ति के लिए पूरे मज़दूर वर्ग के संघर्ष की ओर बढ़ सकते हैं और उन्हें बढ़ना चाहिए, और वे वस्तुत: तमाम देशों में उस ओर बढ़ रहे हैं। जब तमाम वर्ग-सचेत मज़दूर समाजवादी हो जायेंगे, अर्थात जब वे इस मुक्ति के लिए प्रयास करेंगे, जब वे मज़दूरों के बीच समाजवाद का प्रसार कर सकने, मज़दूरों को अपने दुश्मनों के विरुद्ध संघर्ष के तमाम तरीके सिखा सकने के लिए पूरे देश में ऐक्यबद्ध हो जायेंगे, जब वे एक ऐसी समाजवादी पार्टी का निर्माण करेंगे, जो सरकारी उत्पीड़न से समग्र जनता की मुक्ति के लिए, पूँजी के जुए से समस्त मेहनतकश जनता की मुक्ति के लिए संघर्ष करती है, केवल तभी मज़दूर वर्ग तमाम देशों के मज़दूरों के उस महान आन्दोलन का अभिन्न अंग बन सकेगा, जो समस्त मज़दूरों को ऐक्यबद्ध करता है तथा जो लाल झण्डा ऊपर उठाता है, जिस पर ये शब्द लिखे हुए हैं : "दुनिया के मज़दूरों, एक हो!"

शिव लिंग

ऐसा क्या किया था शिव तुमने?
रची थी कौन-सी लीला???
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग
माताएँ बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लम्बी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ
पूजती है तुम्हारे लिंग को,

दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चन्दन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारम्बार
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम

तुम्हारे लिंग को दूध से धोकर
माथे पर लगाती है टीका
जीभ पर रखकर
बड़े स्वाद से स्वीकार करती हैं
लिंग पर चढ़े हुए प्रसाद को

वे नहीं जानती कि यह
पार्वती की योनि में स्थित
तुम्हारा लिंग है,
वे इसे भगवान समझती हैं,
अवतारी मानती हैं,
तुम्हारा लिंग गर्व से इठलाता
समाया रहता है पार्वती-योनि में,
और उससे बहता रहता है
दूध, दही और नैवेद्य...
जिसे लाँघना निषेध है
इसलिए वे औरतें
करतीं हैं आधी परिक्रमा

वे नहीं सोच पातीं
कि यदि लिंग का अर्थ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग दोनों है
तो इसका नाम पार्वती-लिंग क्यों नहीं?
और यदि लिंग केवल पुरूषांग है
तो फिर इसे पार्वती-योनि भी
क्यों न कहा जाए?

लिंगपूजकों ने
चूँकि नहीं पढ़ा 'कुमारसम्भव'
और पढ़ा तो 'कामसूत्र' भी नहीं होगा,
सच जानते ही कितना हैं?
हालाँकि पढ़े-लिखे हैं

कुछ ने पढ़ी है केवल स्त्री-सुबोधिनी
वे अगर पढ़ते और जान पाते
कि कैसे धर्म, समाज और सत्ता
मिलकर दमन करते हैं योनि का,

अगर कहीं वेद-पुराण और इतिहास के
महान मोटे ग्रन्थों की सच्चाई!
औरत समझ जाए
तो फिर वे पूछ सकती हैं
सम्भोग के इस शास्त्रीय प्रतीक के--
स्त्री-पुरूष के समरस होने की मुद्रा के--
दो नाम नहीं हो सकते थे क्या?
वे पढ़ लेंगी
तो निश्चित ही पूछेंगी,
कि इस दृश्य को गढ़ने वाले
कलाकारों की जीभ
क्या पितृसमर्पित सम्राटों ने कटवा दी थी
क्या बदले में भेंट कर दी गईं थीं
लाखों अशर्फियाँ,
कि गूंगे हो गए शिल्पकार
और बता नहीं पाए
कि सम्भोग के इस प्रतीक में
एक और सहयोगी है
जिसे पार्वती-योनि कहते हैं।

नेहा नरूका
फ़ोटो क्रेडिट : Ashok Kumar Chauhan

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Monday, 1 August 2022

कला के सामाजिक उद्गम -प्लेखानोव

इसी प्रकार ओग्युस्त कोम्त का भी यही विचार था कि "समूची सामाजिक प्रक्रिया अन्तिम रूप से विचारों पर ही आधारित होती है" यह विश्वकोशकारों के दृष्टिकोण का दुराव भर था, जिनका मानना था कि विचार ही दुनिया पर शासन करते हैं।

प्रत्ययवाद की एक और भी किस्म है, जिसकी अभिव्यक्ति हीगेल के निरपेक्ष प्रत्ययवाद में हुई। उसके दृष्टिकोण से मनुष्य के विकास का इतिहास कैसे व्याख्यायित किया गया? इसे मैं एक उदाहरण के जरिये स्पष्ट करना चाहूंगा। हीगल सवाल उठाता है: यूनान के पतन का क्या कारण था? वह इसके कई कारण बताता है, उसकी दृष्टि में, इसका मुख्य कारण यह था कि निरपेक्ष विचार के विकास में यूनान सिर्फ एक अवस्था को प्रतिबिम्बित करता था, और जब यह अवस्था गुजर गयी, तो  उसका पतन होना ही था।

स्पष्ट है कि हीगेल के विचार से-हालांकि वह जानता था कि "लेसडाइमोन का पतन सम्पत्ति की असमानता के कारण हुआ"- सामाजिक सम्बन्धों और मानव-विकास के समूचे इतिहास का निर्धारण अन्ततः तर्क द्वारा, विचार के विकास द्वारा, होता है। इतिहास की भौतिकवादी दृष्टि इस दृष्टि के धुर विपरीत है। जहाँ सेण्ट-साइमन इतिहास को प्रत्ययवादी अवस्थिति से देखते हुए, यह मानता है कि यूनानियों के सामाजिक सम्बन्ध उनके धार्मिक विचारों के कारण बने थे, वहीं उसके विपरीत, मैं जो भौतिकवादी दृष्टि में विश्वास करता हूँ, यह कहना चाहूँगा कि यूनानियों की गण सभा ओलिम्पस उनकी सामाजिक प्रणाली का प्रतिबिम्बन थी। और, इस सवाल के जबाब में कि यूनानियों की धार्मिक दृष्टि कहाँ से पैदा हुई थी, जहाँ सेण्ट-साइमन कहता है कि यह उनकी वैज्ञानिक विश्व-दृष्टि से पैदा हुई थी, वहीं उसके विपरीत, मेरा मानना है कि यूनानियों की वैज्ञानिक विश्व दृष्टि स्वयं में, अपने ऐतिहासिक विकास के क्रम में, हेलेनिक लोगों (प्राचीन यूनानियों-अनु.) द्वारा किये गये उत्पादक शक्तियों के विकास से निर्धारित हुआ था।"

सामान्य रूप से मेरी इतिहास-दृष्टि यही है। क्या यह सही है? इसे सही सिद्ध करने का यह उपयुक्त अवसर नहीं है। यहाँ पर आपसे मैं यही चाहूँगा कि आप मान लें कि यह सही है, और इसे ही कला के बारे में हमारी जाँच-पड़ताल का प्रस्थान बिन्दु मानकर मेरे साथ चलें। कहने की जरूरत नहीं कि कला के इस विशिष्ट प्रश्न की



कई वर्ष पहले ए. एस्पिनास की पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ टेक्नोलॉजी' पेरिस में प्रकाशित हुई थी जो प्राचीन यूनानियों की विश्व-दृष्टि के विकास की व्याख्या उनकी उत्पादक शक्तियों के विकास से करने का एक प्रयास है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प प्रयास है जिसके लिए हमें एस्पिनास का आभारी होना चाहिए, इस तथ्य के बावजूद कि उसकी विवेचना में ब्योरों की कई गलतियाँ हैं।

32/ कला के सामाजिक उद्गम


पड़ताल के साथ ही इसकी मेरी सामान्य दृष्टि की भी जाँच हो जायेगी। क्योंकि अगर यह सामान्य दृष्टि गलत है, तो इसे अपना प्रस्थान मान लेने के बाद, हम कला के विकास की व्याख्या करने में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पायेंगे। लेकिन अगर हमें ऐसा लगे कि अन्य किसी दृष्टि की अपेक्षा, इस दृष्टि से कला के विकास की बेहतर व्याख्या की जा सकती है, तो इस दृष्टि के समर्थन में हमें एक नया और सशक्त तर्क हासिल हो जायेगा।

लेकिन यहाँ मुझे एक आपत्ति उठाये जाने का पूर्वाभास हो रहा है। डार्विन ने अपनी कृति, मनुष्य की उत्पत्ति (Descent of man and Selection in Relation to Sex) ढेरों तथ्य यह दर्शाने के लिए पेश किये हैं कि प्राणियों के जीवन में सौन्दर्य का बोध एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन तथ्यों की ओर इंगित किया जायेगा और यह नतीजा निकाला जायेगा कि सौन्दर्यबोध की उत्पत्ति की जीववैज्ञानिक व्याख्या की जानी चाहिए। और तब मुझसे यह कहा जा सकता है कि यह अस्वीकार्य ("संकीर्ण) है कि मनुष्यों में इस बोध की उत्पत्ति को एकमात्र उनके समाज के आर्थिक रूप से ही सम्बद्ध किया जाये और चूंकि प्रजातियों के विकास के बारे में डार्विन की दृष्टि भी एक भौतिकवादी दृष्टि ही है, इसलिए मुझसे यह भी कहा जा सकता है कि एकांगी ऐतिहासिक ("आर्थिक") भौतिकवाद की आलोचना के लिए जीववैज्ञानिक भौतिकवाद पर्याप्त सूचनाएँ प्रदान करता है।

इस आपत्ति की गम्भीरता को महसूस करता हूँ और इसीलिए इसकी विवेचना करना चाहूँगा। यह काफी उपयोगी होगा, क्योंकि इसका जवाब देने के दौरान ही, मैं ऐसी ही उन सभी आपत्तियों का भी जवाब दे सकूँगा, जो प्राणियों के मानसिक (psychical) जीवन के आधार पर उठायी जा सकती हैं।

सबसे पहले, यथासम्भव पूरी शुद्धता के साथ उस निष्कर्ष को परिभाषित करने की कोशिश करें जो डार्विन द्वारा पेश किये गये तथ्यों से निकाला जा सकता है और इसके लिए, देखते हैं कि इन तथ्यों से स्वयं डार्विन ने क्या निष्कर्ष निकाला है। मनुष्य की उत्पत्ति के बारे उसकी पुस्तक के अध्याय दो, खण्ड एक में हम पढ़ते

"सौन्दर्य का बोध इस बोध को सिर्फ मनुष्य की ही विशिष्टता घोषित किया गया है। लेकिन जब हम एक नर पक्षी को मादा पक्षी के सामने अपने खूबसूरत पंखों या शानदार रंगों को प्रदर्शित करते हुए देखते हैं, जबकि दूसरे पक्षी जो इतने सजीले नहीं होते, ऐसा प्रदर्शन नहीं करते, तब इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जातो कि मादा पक्षी अपने नर साथी के सौन्दर्य को पसन्द करती है। चूंकि हर जगह की स्त्रियाँ इन पंखों से अपने आप को सजाती हैं, इसलिए इन अलंकरणों के सौन्दर्य पर कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। मर्मर-पक्षी के घोंसले और ब्रोवर पक्षी के

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कलरव-कुंज रंग-बिरंगी वस्तुओं से सजे होते हैं। इससे पता चलता कर उसे सौन्दर्य की धारणा होती है। यही बात पक्षियों के गाने के बारे में भी कही जा सकती है प्रणय की ऋतु में अनेक नर पक्षी जो मधुर तान छेड़ते है, उसकी सराहना निशा ही मादाए करती हैं। यदि मादाएं अपने नर साथियों के सुन्दर रंगों, अलंकरणों और स्वरों की सराहना नहीं करती तो नर पक्षियों द्वारा मादाओं के समक्ष अपने लुभावन गुणों के प्रदर्शन की सारी मेहनत और चिन्ता बेकार की होते और यह बात असम्भ लगती है।

"एक निश्चित ढंग से सजे हुए निश्चित रंग और निश्चित स्वर क्यों आनन्दित करते हैं, इसे समझा पाना वैसे ही कठिन है जैसे यह कि कुछ निश्चित स्वाद और सुगन्ध क्यों अधिक रुचिकर लगते हैं। लेकिन पूरे विश्वासपूर्वक यह कहा जा सकता है कि मनुष्य और निम्नतर श्रेणी के बहुतेरे प्राणी एक जैसे रंगों और एक जैसे स्वरो की पसन्द करते हैं।""

इस प्रकार, डार्विन द्वारा पेश किये गये तथ्य यह संकेत देते हैं कि निम्नतर श्रेणी के प्राणी भी, मनुष्य की भाँति हो, सौन्दर्य-सुख अनुभव करने में समर्थ होते हैं, और कि हमारी सौन्दर्यात्मक रुचियाँ कभी-कभी निम्नतर श्रेणी के प्राणियों की सौन्दर्यात्मक रुचियों से मेल खाती हैं। लेकिन इन तथ्यों से इन रुचियों की उत्पत्ति स्पष्ट नहीं होती। यदि जीवविज्ञान हमारी सौन्दर्यात्मक रुचियों की उत्पत्ति को स्पष्ट नहीं कर पाता, तो उनके ऐतिहासिक विकास को तो और भी स्पष्ट नहीं कर सकता। बहरहाल, डार्विन की और सुनें।

यह आगे कहता है, "जहां तक स्त्री-सौन्दर्य की बात है, सुन्दर के प्रति रुचि मानव मस्तिष्क की कोई विशिष्ट प्रकृति नहीं है, कारण कि यह मनुष्य की भिन्न-भिन्न नस्लों में काफी भिन्न-भिन्न होती है; यहाँ तक कि यह एक ही नस्ल के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में भी एक समान नहीं होती। अगर हम अधिकांश आदिवासी लोगों द्वारा पसन्द किये जाने वाले भद्दे अलंकरणों और वैसे ही भद्दे संगीत को देखें तो, दावे के साथ कहा जा सकता है कि उनकी सौन्दर्यबोध की क्षमता उतनी विकसित नहीं होती, जितनी कि कुछ निश्चित प्राणियों में, उदाहरणस्वरूप, पक्षियों में होती है।"

अब यदि सुन्दर के प्रति धारणा एक ही नस्ल के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में * चाल्र्स डार्विन की 'दि डिसेण्ट ऑफ मैन' का रूसी अनुवाद, सेण्ट पीटर्सवर्ग, 1999, श्री. आई.एम. सेचेनोव द्वारा सम्पादित



*" वालेस की राय में, डार्विन ने प्राणियों के लैंगिक चवन में सौन्दर्यबोध के महत्व को काफी बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया है। वालेस की बात कितनी सही है, इसका फैसला जीव वैज्ञानिकों पर छोड़ते हुए में वह मान लेता हूँ कि डार्विन का विचार बिल्कुल सही है, और आप इस बात से सहमत होंगे कि यह मान्यता मेरे उद्देश्य के लिए सबसे कम अनुकूल है।

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भिन्न-भिन्न हो सकती है, तो यह स्पष्ट ही है कि इस विभिन्नता का कारण जीवविज्ञान में नहीं खोजा जा सकता। डार्विन स्वयं कहता है कि हमारी यह खोज किसी और दिशा में निर्दिष्ट होनी चाहिए। उसकी पुस्तक के दूसरे अंग्रेजी संस्करण में, मेरे द्वारा ऊपर उद्धृत किये गये पैराग्राफ में निम्नलिखित शब्द देखने को मिलते हैं, जो पहले अंग्रेजी संस्करण के आई.एम. सेचेनोव द्वारा सम्पादित रूसी अनुवाद में नहीं है लेकिन सुसंस्कृत लोगों में ऐसे (अर्थात् सौन्दर्यात्मक) संवेदन संश्लिष्ट विचारों और विचार श्रृंखलाओं के साथ घनिष्ठता से जुड़े होते हैं।"

यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कथन है। यह हमें जीवविज्ञान से समाजशास्त्र की और निर्दिष्ट करता है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो जाता है कि डार्विन के विचार से, सामाजिक कारण इस तथ्य को निर्धारित करते हैं कि सुसंस्कृत लोगों में सौन्दर्यात्मक संवेदन संश्लिष्ट विचारों के साथ जुड़े होते हैं। लेकिन डार्विन का यह सोचना क्या सही है कि ऐसे संवेदन केवल सुसंस्कृत लोगों में ही होते हैं? नहीं, उसका यह कहना सही नहीं है, और इसे आसानी से जाना जा सकता है। आइये, एक उदाहरण लें। सब जानते हैं कि प्राणियों की खालों, नाखूनों और दाँतों का आदिम लोगों के आभूषणों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसका कारण क्या है? क्या इसका कारण इन वस्तुओं में रंग और रेखाओं के संयोजन में निहित है? नहीं, तथ्य यह है कि आदिम मनुष्य शेर की खाल, नाखून और दाँतों से या भैंस की खाल और सींगों से, खुद को अपनी फुर्ती और ताकत के प्रतीक के तौर पर सजाते हैं जिसने एक फुर्तीले शेर को हरा दिया हो, वह स्वयं फुर्तीला है, जिसने ताकतवर भैंसे को पछाड़ दिया हो, वह स्वयं ताकतवर है। इसमें अन्धविश्वास भी हो सकता है। स्कूलक्राफ्ट बताता है कि पश्चिमी अमेरिका के रेड इंण्डियन कबीले, अपने क्षेत्र में पाये जाने वाले सबसे खार जानवर, भूरे भालू, के नाखूनों से बने आभूषण पहनने के बेहद शौकीन होते हैं। इन रेड इण्डियन योद्धाओं का यह विश्वास है कि जो भी अपने आप को भूरे भालू के नाखूनों से सजाता है उसमें भालू जैसी ही उग्रता और साहस आ जाता है। उसके लिए, जैसा कि स्कूलकाफ्ट का कहना है, ये मासून अंशतः आभूषण होते हैं, और अंशतः ताबीज"

बेशक इस मामले में यह स्वीकार करना असम्भव है कि शुरू-शुरू में रेड इण्डियनों को जानवरों की खाल, नाखून और दौत इन चीजों के विशिष्ट रंग और



* दि डिसेण्ट ऑफ़ मैन, 1883, पृ. 92. ये शब्द सम्भवतः इस पुस्तक के नये रूसी अनुवाद में हैं, पर अभी वह मेरे पास नहीं है।

"कूल हिस्टॉरिकल ऐण्ड स्टेटिस्टिकल इंफॉर्मेशन रिस्पेक्टिंग दि हिस्ट्री कंग्रेशन एण्ड प्रॉस्पेक्ट्स ऑफ दि रेड इण्डियन ट्राइस ऑफ दि युनाइटेड स्टेट्स 5, 9.216

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रेखाओं के संयोजनों के कारण ही पसन्द आये थे। नहीं, इसके विपरीत सम्भव लगता है कि ये चीजें पहले-पहल मात्र साहस, फुर्ती और ताकत के प्रतीक के तौर पर धारण की गयी होंगी, और आगे चलकर साहस, फुर्ती और ताकत के प्रतीक होने के ही नाते, ये चीजें सौन्दर्यात्मक संवेदन जगाने लगीं और आभूषणों का रूप ग्रहण कर लिया। तब इसका मतलब यह है कि "आदिवासी लोगों में सौंदर्यात्मक  संवेदनों को केवल संश्लिष्ट विचारों के साथ जोड़ा ही नहीं जा सकता" बल्कि कभी-कभी वे ठीक ऐसे विचारों के प्रभाव में ही उत्पन्न हो सकते हैं।

एक दूसरा उदाहरण लें। यह विदित है कि कई अफ्रीकी कबीलों की अपनी बाँहों और पैरों में लोहे के कड़े पहनती हैं। धनी लोगों की पलियाँ कभी-कभी तीस या चालीस पौण्ड के ऐसे आभूषणों से लदी रहती हैं।

निस्सन्देह वे आभूषण बेहद असुविधाजनक होते हैं, लेकिन तब भी दासता की ये बेड़ियाँ, जैसा कि श्वीनफर्व उन्हें कहता है, खुशी-खुशी पहनी जाती हैं। आखिर क्यों नीग्रो स्त्री इन भारी-भरकम बेड़ियों को पहनकर खुश होती है? इसलिए कि इनकी वजह से वह खुद को और दूसरों को सुन्दर प्रतीत होती है। लेकिन वह सुन्दर क्या प्रतीत होती है? स्पष्टतः यह विचारों के एक संश्लिष्ट संयोजन का ही परिणाम है। ऐसे आभूषणों के प्रति आसक्ति उन्हीं कबीलों में पायी जाती है, जो श्वीनफर्म के शब्दों में, लौह युग से होकर गुजर रहे होते हैं, अर्थात्, दूसरे शब्दों में, वे ऐसे कबीले हैं, जिनके लिए लोहा एक बहुमूल्य धातु है। बहुमूल्य चीजें इसलिए सुन्दर लगती है कि उनके साथ सम्पत्ति की धारणा जुड़ी होती है। जब डिंका कबीले की कोई स्त्री बीस पौण्ड लोहे के कड़े पहनती है तो वह खुद को और दूसरों को उस समय से ज्यादा सुन्दर लगती है जब वह सिर्फ दो पौण्ड लोहा पहनती थी, यानी जब वह गरीब थी। स्पष्ट है कि यहाँ कड़ों की सुन्दरता नहीं, बल्कि उनके साथ जुड़ी सम्पत्ति की धारणा का मोल है।

एक तीसरा उदाहरण जाम्बेजी के ऊपरी भाग में बाटोका कबीले के लोग उस आदमी को कुरूप मानते हैं जिसके ऊपरी नुकीले दात निकाल नहीं लिये गये होते. हैं। सौन्दर्य की यह विचित्र अवधारणा कैसे पैदा हुई? स्पष्टतः यह विचारों के सष्टि संयोजन से उत्पन्न हुई। बाटोका कबीले के लोग अपने ऊपरी दाँत इसलिए निकलवा लेते हैं कि वे जुगाली करने वाले जानवरों की भांति दिखना पसन्द करते हैं। यह समझ आनेवाली बात नहीं लगती। लेकिन बाटोका एक पशुपालक कबीला है और वे अपने गाय-बैलों की लगभग पूजा करते हैं। यहाँ भी वही बात है कि जो बहुमूल्य है वह सुन्दर है, और कि सौन्दर्यात्मक अवधारणाएँ बिल्कुल भिन्न किस्म के विचारों से



'कुछ मामलों में ऐसी वस्तुएँ केवल अपने रंग के कारण ही प्रिय लगती हैं, लेकिन इसके बारे में बाद में।

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उत्पन्न होती है।

अन्त में, स्वयं डार्विन द्वारा लिविंस्टन के हवाले से दिये गये एक उदाहरणको ले। माकोलोलो कबीले की स्त्रियां अपना ऊपरी होठ छिदवाती है और उसके छेद में धातु या बॉस का बड़ा-सा छल्ला पहनती है, जिसे पलेले कहा जाता है। जब इस कबीले के एक मुखिया से पूछा गया कि स्त्रियां इसे क्यों पहनती हैं, तो उसने "ऐसे मुर्खतापूर्ण सवाल पर  स्पष्टतः आश्चर्य प्रकट करते हुए", जवाब दिया: सौन्दर्य के लिए। स्त्रियों के पास बस यही एक सुन्दर चीज है। पुरुषों के दाढ़ी  होती है, स्त्रियों के तो होती नहीं। पलेले के बिना वे कैसी दिखेंगी?" यह बता पाना कठिन है कि पलेले पहनने का यह रिवाज कहाँ से आया, लेकिन, सरष्टतः इसकी शुरुआत विचारों के किसी बहुत संश्लिष्ट संयोजन में ही खोजनी होगी, न कि जीवविज्ञान के नियमों में, जिनका तनिक भी (प्रत्यक्ष) सम्बन्ध इस चलन से नहीं है।"*

इन उदाहरणों की रोशनी में, मैं कह सकता हूँ कि आदिम मनुष्य के मन में भी रंगों या वस्तुओं के रूपों के निश्चित संयोजनों द्वारा उत्पन्न संवेदन बहुत संश्लिष्ट विचारों के साथ जुड़े होते हैं, और ऐसे अनेक रूप और संयोजन केवल इसके कारण सुन्दर प्रतीत होते हैं।

ऐसे संवेदन कैसे उत्पन्न होते हैं? और वे संश्लिष्ट विचार कहाँ से आते हैं जो किन्हीं वस्तुओं को देखते ही हमारे भीतर होने वाले संवेदनों से सम्बद्ध होते हैं? जाहिर है कि जीववैज्ञानिक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता, इनका उत्तर केवल समाजशास्त्री ही दे सकता है। और यदि इतिहास की भौतिकवादी दृष्टि, अन्य किसी भी दृष्टि की अपेक्षा, यह जवाब देने में अधिक सक्षम है; यदि हमें यह मालूम है कि उपर्युक्त सम्बद्ध और संश्लिष्ट विचार, अन्तिम रूप से, किसी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था की उत्पादक शक्तियों की स्थिति द्वारा निर्धारित होते हैं, तो यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि डार्विनवाद इतिहास को उस भौतिकवादी दृष्टि का कतई निषेध नहीं करता जिसका वर्णन करने की मैंने कोशिश की है। मैं यहाँ पर डार्विनवाद और इतिहास की भौतिकवादी दृष्टि के बीच सम्बन्ध को लेकर बहुत विस्तार में नहीं जा सकता। लेकिन इस विषय पर कुछ और बातें अवश्य कहना चाहूँगा।

इन पंक्तियों पर गौर करें: "सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना उचित हैं कि मैं "यह नहीं कहना चाहता कि किसी भी सामाजिक प्राणी की बौद्धिक क्षमताएँ यदि मनुष्य की बौद्धिक क्षमताओं की भांति सक्रिय और विकसित हो जायें तो उसमें हमारे जैसा ही नैतिकता बोध आ जायेगा।



*आदिम समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास के सम्बन्ध में इसकी व्याख्या में आगे फरूँगा।

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