मज़दूर वर्ग का राजनीतिक लक्ष्य मज़दूरी को बढ़ाना या सभी की मज़दूरी को बराबर कर देना नहीं है बल्कि मज़दूरी - व्यवस्था को ही समाप्त करना है। मज़दूरी को बढ़ाने के लिए सतत् जारी संघर्ष को भी इस राजनीतिक लक्ष्य के लिए संघर्ष का एक अंग बनाना हमारे लिए अनिवार्य है अन्यथा वह एक अर्थवादी संघर्ष होगा जो हमारे राजनीतिक लक्ष्य से हमें काट देगा, राजनीतिक रूप से सोचने और राजनीतिक प्रश्न उठाने यानी राज्यसत्ता का प्रश्न उठाने की क्षमता से हमें वंचित कर देगा। पूँजीपति वर्ग यही चाहता है। जो ट्रेड यूनियनें मज़दूर वर्ग की आर्थिक माँगों के लिए संघर्ष को अर्थवादी स्वरूप देकर मज़दूर वर्ग का अराजनीतिकरण करती हैं, वे पूँजीवादी ट्रेड यूनियनें हैं जो कि मज़दूर वर्ग की समूची गतिविधि को पूँजीवादी दायरों के भीतर कैद रखना चाहती हैं। भारत में सभी संसदीय वामपंथी चुनावबाज़ पार्टियों जैसे माकपा, भाकपा, भाकपा माले लिबरेशन आदि तथा अन्य पूँजीवादी पार्टियों की केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें जैसे कि सीटू, एटक, इण्टक व ऐक्टू यही काम करती हैं।
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Saturday, 3 September 2022
Friday, 2 September 2022
पटना के साथियों को संबोधित पत्र
बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में निर्माण व असंगठित मजदूरों को संगठित करने की शुरुआती कोशिश करने और जारी जारी रखने के लिये सभी साथियों को बधाई । ये लहरे धीरे- धीरे ही सही, लेकिन निश्चित रफ्तार से तट पर स्थित मजदूरों के शोषण से बने विराट अट्टालिकाओं एवम महलो की तरफ बढ़ता रहे, ताकि उसे ध्वस्त कर सके, यही मजदूर आंदोलन से मेरी अपेक्षा है। मजदूरी बढाने एवम उनसे जुड़ी अन्य मांगो के लिये संघर्ष आवश्यक है, लेकिन हमें यह कत्तई नही भूलना है कि हमारा असली लक्ष्य मजदूरी बढ़ाना नही बल्कि मजदूरी-प्रथा (Wage Slavery) का नाश करने के लिये मजदूरों को तैयार करना है। यह बात मजदूरों को सम्बोधित हमारे पर्चो, भाषणों एवम लेखों में जितना आ सकेगा, उतना हम आगे बढ़ पाएंगे। लेकिन यह काम सबसे कठिन है, और मजदूर आंदोलन के सुधारवादी आंदोलन में बदल जाने के पीछे मुख्य कारण भी यही होता रहा है। हमे एक ट्रेड यूनियन सेक्रेटरी की तरह नही बल्कि एक कम्युनिष्ट की तरह मजदूरों के बीच काम करना चाहिये। आज , अगर सच कहें, तो यही एक काम है जिसे करने के बाद आदमी गौरवान्वित महसूस कर सकता है। आपकी इस उदारता के लिये धन्यवाद कि आप हमें भी इस लायक समझते है।
धन्यवाद।
धन्यवाद।
Thursday, 1 September 2022
वर्ग तथा जातीय उत्पीड़न के बीच मजदूर वर्ग का पक्ष
वर्ग के अंदर के अंतर्विरोध में जातीय उत्पीड़न उपेक्षा के रूप में आता है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के दलित मंत्री के इस्तीफा देना की घटना को इसी तरह के उत्पीड़न की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका स्वरूप है लूट में हिस्सेदारी और महत्व का नहीं मिलना, लेकिन जब मजदूर वर्ग तथा अन्य मेहनतकश वर्ग का जातीय उत्पीड़न होता है तो वह भयावह होता है। मेहनतकशों की उपेक्षा व उत्पीड़न "ठाकुर का कुंआ और सद्गति" जैसी कहानियों के उत्पीड़न के रूप में होता है। आधुनिक युग में कार्य स्थल पर उन्हें साथ उठने बैठने से लेकर संबोधन के रूप में होता है, कई कार्य आज भी उनके हिस्से में अमानवीय स्थिति में करने की मजबूरी के रूप में होता है। गटर में डुबकी लगाकर सफाई करने वाले मजदूरों का जातीय उत्पीड़न और मिस्टर खटीक के जातीय उत्पीड़न में फर्क है। पिछले दशकों में आमतौर पर जातीय उत्पीड़न का विमर्श पढ़े-लिखे मध्यवर्ग और सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष करते उपेक्षित समाज के खाते पीते वर्ग तक सीमित हो गया, जबकि जातीय उत्पीड़न सबसे ज्यादा मेहनतकशों की होती रही है। ऐसी स्थिति में जातीय उत्पीड़न के स्वरूप की गहरी खुदाई करके मेहनतकशों का जो जातीय उत्पीड़न होता है, उसे विमर्श की अग्रिम पंक्ति में लाना होगा। आज भी अंतरजातीय शादियों में जो ज्यादा हत्याएं हो रही हैं, वह शोषित वर्ग की उत्पीड़ित जातियों का ही हो रहा है। कई दलित नेताओं ने ऊंची जातियों में शादियां की, लेकिन वहां पर ऑनर किलिंग की स्थिति नहीं बनती है। इसलिए वर्ग और जातीय उत्पीड़न का संबंध बड़ा गहरा है। इस गहरी स्थिति में मेहनतकश वर्गों के पक्ष में खड़ा होकर ही जातीय उत्पीड़न के सही प्रश्न को संबोधित किया जा सकता है।
किसी भी तरह के उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए समाज का जनवादीकरण होना आवश्यक है। कम्युनिस्ट तथा मेहनतकशों के आंदोलन में भी खाते पीते वर्ग से आने वाले लोग अपने वर्गीय तथा जातीय पूर्वाग्रहों और संस्कृति को लेकर आते हैं। इसलिए आप जहां भी कहीं हों, शासक वर्ग के खिलाफ और खुद के खिलाफ भी आपको जनवादी उसूलों के लिए संघर्ष करना होगा। आपको अपनी बात कहने का अधिकार है, बहस करने का अधिकार है, लेकिन आप दूसरे के अधिकारों की उपेक्षा करके, अपने पूर्व से अर्जित क्षमता के कारण हावी नहीं हो सकते हैं। यही वह स्थिति है जिस पर विचार करना होगा कि ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसलिए हो रहा है कि समाज वर्गों तथा सदियों से उत्पीड़क तथा उत्पीड़ित जातियों में, समाजों में और क्षेत्रीय रूप में बंटा आ रहा है जिसमें सक्षम वर्ग तथा समाज ने पिछड़े समाज, वर्ग तथा प्रदेश पर शासन किया है। इस स्थिति को खत्म करना होगा।
नये जनवाद की ऐसी व्यवस्था का नाम समाजवाद है लेकिन यह समाजवाद तब तक लागू नहीं हो सकता है जब तक कि उत्पीड़क वर्ग तथा समाज को नियंत्रण में ना लाया जाए। इसलिए बहुमत आबादी के जनवाद को लागू करने के लिए आवश्यक है कि जो मुट्ठी भर अल्पसंख्यक हैं, उनके ऊपर नियंत्रण किया जाए। ऐसी परिस्थिति को लागू करते हुए लेनिन तथा स्टालिन ने सोवियत संघ में शासक वर्ग के अधिकारों पर नियंत्रण किया तथा मेहनतकशों के अधिकार को बहाल किया। इतना ही नहीं उन्होंने उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के भी अधिकारों को अलग से रेखांकित किया और उसे सुरक्षित करने के लिए, उन्हें विकसित होकर पहले से विकसित समाज के स्तर पर आने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं उपलब्ध कराई। इसलिए वास्तविक जनवाद सिर्फ समाजवाद में ही लागू हो सकता है जिसके शासन का आधार है "पहले से सुविधा संपन्न सभी वर्गों के दूसरों का शोषण वउत्पीड़ित करने के सभी अधिकारों और प्रवृत्तियों" पर रोक लगाना।
हमारे देश सहित पूरी दुनिया के लिबरल्स कराह उठते हैं, जब प्रभुत्वशाली वर्गों के अधिकार की कटौती की बात की जाती है, लेकिन वे ऐसी कोई भी रूपरेखा नहीं रख पाते हैं, जिसमें शोषकों के अधिकारों पर नियंत्रण किए बगैर उपेक्षित तथा शोषित वर्ग के जनवाद के अधिकारों को कैसे लागू किया जाएगा? प्रभुत्वशाली वर्गों के अधिकारों पर लगाम लगाने के क्रम में कई गलतियां हो सकती है, हम ज्यादा से ज्यादा सावधानी ही बरत सकते हैं।लेकिन इसके नाम पर पूंजीवादी जनतंत्र के जुमलों की आड़ में शोषक वर्गों को खुली छूट नहीं दी जा सकती है। यह खुली छूट शोषित वर्गों के जनवादी अधिकार पर हमले का चोर दरवाजा बन जाता है और पूरी दुनिया में लिबरल्स इस चोर दरवाजे की पहरेदारी के लिए बड़े सजग होकर बहस चलाते हैं।
हमें मजबूती के साथ मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण के साथ मेहनतकशों के पक्ष में खड़े रहना है।
*नरेन्द्र कुमार*
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जन ज्वार से - चर्च का जातिवाद
दलित पादरी फादर विलियम प्रेमदास चौधरी की आत्मकथा आडंबरपूर्ण कैथोलिक चर्च व्यवस्था में फैले भेदभाव और अश्पृश्यता के अंधियारे का खुलासा करती है और चर्च के मिथक को तोड़कर उसकी असली कहानी बयां करती है...
आरएल फ्रांसिस - फादर विलियम प्रेमदास चौधरी ने अपनी हाल ही में प्रकाशित आत्मकथा 'ऐन अन्वान्टिड प्रीस्ट' (एक अवांछित पादरी) में इस समस्या पर खुलकर आक्रमण किया है। उन्होंने चर्च के पादरियों के जीवन का विश्लेषण किया है, जिससे अब तक गैर ईसाई ही नहीं खुद ईसाई समुदाय भी अनजान है।
चर्च की ऊंची दीवारों से घिरे और काफी अंदर तक फैले जातीय भेदभाव, उत्पीड़न, असमानता का जिक्र करते हुए फादर विलियम आर्चबिशप विन्सेंट एम कैनसासियों के एक पत्र का उत्तर देते हुए कहते है 'मैं एक दलित पादरी हूँ, न कि भिखारी। मैं अपने लिए किसी चर्च का प्रमुख बनने की भीख नही मांग रहा हूँ। मैं कोई दक्षिण भारतीय पादरी नहीं, जिसकी आपको चिंता हो। मुझे धर्म की शिक्षा देने के लिए आपके निर्देशों की जरूरत नहीं, जीजस हमारे स्वामी हैं न कि आप। मैं जीजस का भक्त हूँ न कि आपका। चर्च प्रमुख बनने के बिना भी मैंने जो पाया है उससे मैं संतुष्ट हूँ। मैं दलित वर्ग से आया हूँ इसलिए ये मेरी जिम्मेदारी है कि मैं कैथोलिक चर्च के अंदर दलित ईसाइयों के सम्मान की रक्षा करूं.
चर्च में गहरे तक फैले भेदभाव का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि स्थानीय दलित पादरी होने के कारण चर्च नेतृत्व ने मेरा मनोबल तोड़ने के लिए पिछले चार वर्षों से मुझे 'कलर्जी होम' (एक तरह से अवकाश प्राप्त पादरियों का आवास) में रखा हुआ है। आज तक किसी कार्यरत युवा पादरी को इतने समय तक यहा नहीं रखा गया है। कैथोलिक बिशप से वह पूछते हैं कि आप कहते हैं मुझे किसी चर्च का प्रमुख नहीं बनाया जा सकता क्योंकि मुझमें कमियां हैं,जबकि आप अभी तक मेरे किसी दोष को सिद्ध नहीं कर सके हैं, केवल इसके कि मैं हिन्दू दलित से धर्मांतरण करके ग्यारह वर्ष के कड़े परिश्रम के बाद पादरी बना हूँ।
'ऐन अन्वान्टिड प्रीस्ट' चर्च के अंदर पादरियों के बीच पनपने वाले अहम, अहंकार और टकरावों और इस विशाल संस्थान के कामकाज के तरीके पर कई सवाल खड़े करती है. साथ ही धर्मांतरित दलितों और दलित पादरियों पर हुए जुल्म पर भी जोर देती है। इस किताब ने कई चीजों का खुलासा किया है और कई मिथकों को तोड़ा भी है। फादर विलियम ने चर्च संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार और चर्च के कुछ खास पदाधिकारियों द्वारा आर्थिक बदइंतजामी फैलाने पर भी कई सवाल खड़े किये हैं। वो एक अन्य पादरी डोमिनिक इमानुएल जो दिल्ली कैथोलिक आर्च डायसिस के प्रवक्ता हैं, के बारे में लिखते हैं उन्होंने भारतीय सिनेमा के लिए बनाई गई फिल्मों का आय-व्याय का सही ब्योरा नहीं दिया। उसके विदेशों से पैसा पाने के तरीकों पर भी यह किताब कई प्रश्न खड़े करती है और इस बात पर जोर देती है कि चर्च के आमदनी और खर्चे का सही सही हिसाब रखा जाना चाहिए।
एक रोचक प्रसंग का जिक्र करते हुए लिखा गया है 'इस तरह के प्रश्न उठाने पर कई बार उनकी अपने साथी पादरियों से लम्बी बहस हो जाती है. एक बार इन्हीं मुद्दों पर लम्बी खिंची बहस के बाद आर्चबिशप ने मुझे 'अन्वान्टिड प्रीस्ट' कह डाला।
ये किताब हिन्दू समाज पर भी दबाव डालती है कि वो उन दलित भाईयों के बारे में सोचे जो समाज में बराबरी और आदर के लिए ईसाइयत को अपना लेते हैं। धर्मांतरण करने वाले दलित सोचते हैं कि अब वो आजाद हैं, लेकिन उन्हें यहा भी मुक्ति नहीं मिलती। चर्च ढांचे में भेदभाव बड़ी चालाकी से होता है इसलिए फादर विलियम जैसे किसी दलित पादरी की स्थिति काफी खराब हो जाती है और उनके लिए सम्मानजनक रूप में पादरी बने रहना असंभव जैसा हो जाता है।
फादर विलियम ने वो लिखने की हिम्मत की है जिसे कई कहने और सपने में भी कबूल करने की हिम्मत नहीं करेंगे। वो धर्मांतरण के कड़वे सच और एक दलित की दुविधा को स्वीकार करते हैं। वो लिखते हैं कि करीब सभी दलित हिन्दु इसलिए गरीब थे क्योंकि उनका उच्च जातियों ने शोषण किया. वो या तो मजदूरी कर रहे हैं या फिर कोई बहुत ही तुच्छ कार्य। धर्मांतरण के बाद शोषण करने का जिम्मा कैथोलिक चर्च के पदाधिकारियों ने उठा लिया है, इसलिए धर्मांतरित दलितों की स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है। कैथोलिक चर्च पर दक्षिण भारतीय बिशपों एवं पादरियों के एकाधिकार जैसे कई अहम मसले 'ऐन अन्वान्टिड प्रीस्ट' में उठाये गये हैं।
कैथोलिक चर्च में दलितों और आदिवासियों की विशाल जनसंख्या की तरफ इशारा करते हुए यह पुस्तक कहती है कि उच्च जातीय चर्च नेतृत्व कदम-कदम पर उनका शोषण ण कर रहा है. जीसस पर उनके अटूट विश्वास ने ही उन्हें चर्च के साथ बांध रखा है, जबकि चर्च का सिस्टम हमेशा उच्च वर्गो और उच्च जातियों को ही फायदा पहुंचाने वाला रहा है। फादर विलियम इसे बदलने पर जोर देते हुए लिखते हैं कि इसी की वजह से कई जगह आपस में टकराव भी देखने को मिल रहे है। ये किताब पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट का भी उल्लेख करती है जो दलित ईसाइयों के अधिकारों की पुरजोर वकालत कर रहा है। फादर विलियम प्रेमदास चौधरी ने एक बड़े ही आदर्श मंच का इस्तेमाल कर अपने चारों तरफ उपजे कई सवालों का जवाब दे दिया है।
'ऐन अनवान्टेड प्रीस्ट' फादर विलियम प्रेमदास चौधरी की आत्मकथा है. ये किताब धर्म में आस्था रखने वाले धार्मिक संस्थाओं, सरकार, नौकरशाह, न्यायपालिका, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग अनुसंधान कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों को ये समझने में मददगार होगी कि दलित और आदिवासियों की तमाम समास्याएं क्या हैं और सफेद पोशाक (पवित्र चोगा) के पीछे कितना अंधियारा छाया हुआ है। यह धर्मांतरण की राजनीति को समझने में मदद पहुंचाएगी। ये किताब यह समझाने में भी कारगर साबित होगी कि दलितों के आर्थिक विकास से समाज में बड़ा बदलाव आएगा, न कि धर्मांतरण से.
(आरएल फ्रांसिस पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं.)
ओशो... गणेश चतुर्थी रहस्य...
परमात्मा जन्म देता है, मृत्यु देता है। एक हाथ से जन्म देता है, दूसरे हाथ से जन्म वापिस ले लेता है। यहां रात होती, दिन होता। यहां गर्मी आती, सर्दी आती। यहां मौसम बदलते रहते। यही तो जीवन की रसमयता है।
राही विरोध का मिलन है। अगर इकहरा होता जीवन तो इसमें रस न होता, इसमें समृद्धि न होती। यहां विपरीत संघात मिल कर अपूर्व संगीत का जन्म होता है। यहां जन्म और मृत्यु के बीच जीवन का खेल चलता है, जीवन का रास रसा जाता है
वही मैं तुमसे कह रहा हूं : ध्यान करो भी और ध्यान रखना कि छोड़ना है। एक दिन छोड़ना है। —विधि का एक दिन विसर्जन कर देना है।
तुमने देखा, हिंदू इस संबंध में बड़े कुशल हैं। गणेश जी बना लिए मिट्टी के, पूजा इत्यादि कर ली—जा कर समुद्र में समा आए। दुनिया का कोई धर्म इतना हिम्मतवर नहीं है।
अगर मंदिर में मुर्ति रख ली तो फिर सिराने की बात ही नहीं उठती। फिर वे कहते हैं अब इसकी पूजा जारी रहेगी। हिंदुओं को हिम्मत देखते हो! पहले बना लेते हैं, मिट्टी के गणेश जी बना लिए। मिट्टी के बना कर उन्होंने भगवान का आरोपण कर लिया। नाच—कूद, गीत, प्रार्थना—पूजा सब हौ गई। फिर अब वह कहते हैं, अब चलो महाराज, अब हमें दूसरे काम भी करने हैं! अब आप समुद्र में विश्राम करो, फिर अगले साल उठा लेंगे।
यह हिम्मत देखते हो? इसका अर्थ क्या होता है? इसका बड़ा सांकेतिक अर्थ है. अनुष्ठान का उपयोग कर लो और समुद्र में सिरा दो। विधि का उपयोग कर लो, फिर विधि से बंधे मत रह जाओ। जहां हर चीज आती है, जाती है, वहा भगवान को भी बना लो, मिटा दो।
जो भगवान तुम्हारे साथ करता है वही तुम भगवान के साथ करो—यही सज्जन का धर्म है। वह तुम्हें बनाता, मिटा देता। उसकी कला तुम भी सीखो। तुम उसे बना लो, उसे विसर्जित कर दो।
जब बनाते हिंदू तो कितने भाव से! दूसरे धर्मों के लोगों को बड़ी हैरानी होती है। कितने भाव से बनाते, कैसा रंगते, मूर्ति को कितना सुंदर बनाते, कितना खर्च करते! महीनों मेहनत करते हैं। जब मूर्ति बन जाती, तो कितने भाव से पूजा करते, फूल— अर्चन, भजन, कीर्तन!
मगर अदभुत लोग हैं! फिर आ गया उनकी विसर्जन का दिन। फिर वे चले बैंड—बाजा बजाते, तो भी नाचते जाते हैं। जन्म भी नृत्य है, मृत्यु भी नृत्य होना चाहिए। चले परमात्मा को सिरा देने! जन्म कर लिया था, मृत्यु का वक्त आ गया।
इस जगत में जो भी चीज बनती है वह मिटती है। और इस जगत में हर चीज का उपयोग कर लेना है और किसी चीज से बंधे नहीं रह जाना है—परमात्मा से भी बंधे नहीं रह जाना है। मैं नहीं
कहता कि हिंदुओं को ठीक—ठीक बोध है कि वे क्या कर रहे हैं। लेकिन जिन्होंने शुरू की होगी यात्रा उनको जरूर बोध रहा होगा। लोग भूल गये होंगे। अब उन्हें कुछ भी पता न हो कि वे क्या कर रहे हैं। मूर्च्छा में कर रहे होंगे।
पुरानी परंपरा है कि बनाया, विसर्जन कर रहे होंगे; लेकिन उसका सार तो समझो। सार इतना ही है कि विधि उपयोग कर ली। फिर विधि से बंधे नहीं रह जाना है। अनुष्ठान पूरा हो गया, विसर्जन कर दिया।
वही मैं तुमसे कहता हूं : नाचो, कूदो, ध्यान करो,पूजा, प्रार्थना—इसमें उलझे मत रह जाना। यह पथ है, मार्ग है; मंजिल नहीं। जब मंजिल आ जाए तो तुम यह मत कहना कि 'मैं इतना पुराना यात्री, अब मार्ग को छोड़ दूं? छोड़ो!
इतने दिन जन्मों—जन्मों तक मार्ग पर चला, अब आज मंजिल आ गई, तो मार्ग को धोखा दे दूं? दगाबाज, गद्दार हो जाऊं? जिस मार्ग से इतना साथ रहा और जिस मार्ग ने यहां तक पहुंचा दिया,उसको छोड़ दूं? मंजिल छोड़ सकता हूं, मार्ग नहीं छोड़ सकता। 'तब तुम समझोगे कि कैसी मूढ़ता की स्थिति हो जाएगी। इसी मंजिल को पाने के लिए मार्ग पर चले थे; मार्ग से नाता—रिश्ता बनाया था—वह टूटने को ही था।
मार्ग की सफलता ही यही है कि एक दिन घड़ी आ जाए जब मार्ग छोड़ देना पड़े।
अष्टावक्र महागीता 🌹--(भाग-2) प्रवचन--7 🌾
नाज़िम हिक़मत की कविताएं
1. दुनिया का सबसे अजीब प्राणी / नाज़िम हिक़मत
तुम किसी बिच्छू की तरह हो, मेरे भाई,
बिच्छू की तरह
रहते हो कायरता से भरे अँधेरे में।
तुम किसी गौरैया की तरह हो, मेरे भाई,
गौरैया की तरह
हमेशा रहते हो हड़बड़ी में।
तुम किसी सीपी की तरह हो, मेरे भाई,
सीपी की तरह बन्द और सन्तुष्ट।
और तुम डरावने हो, मेरे भाई,
किसी सुप्त ज्वालामुखी की तरह डरावने।
एक नहीं,
पाँच नहीं —
अफ़सोस की बात है कि लाखों की संख्या में हो तुम।
तुम किसी भेड़ की तरह हो, मेरे भाई :
जब भेड़ की खाल ओढ़े चरवाहा अपना डण्डा उठाता है,
तुम झट से शामिल हो जाते हो झुण्ड में
और लगभग गर्व से भरे दौड़ पड़ते हो बूचड़खाने की तरफ।
मेरा मतलब है कि तुम इस दुनिया के सबसे अजीब प्राणी हो —
मछली से भी ज्यादा अजीब
जो पानी में होते हुए भी समुद्र को नहीं देख पाती।
और इस दुनिया में शोषण
तुम्हारी ही वजह से है।
और अगर हम भूखे, थके, लहूलुहान हैं
और पीसे जाते हैं जैसे शराब के लिए अंगूर,
यह तुम्हारी गलती है —
बहुत मुश्किल है मेरे लिए यह कहना,
मगर मेरे भाई, ज़्यादा ग़लती तुम्हारी ही है।
1947
अँग्रेज़ी से अनुवाद : मनोज पटेल
2. ■अपने बेटे के नाम आख़िरी चिट्ठी
बीजों में, धरती में, सागर में भरोसा करना,
मगर सबसे अधिक लोगों में भरोसा करना I
बादलों को, मशीनों को, और किताबों को प्यार करना,
मगर सबसे ज्यादा लोगों को प्यार करना I
ग़मज़दा होना
एक सूखी हुई टहनी के लिए,
एक मरते हुए तारे के लिए,
और एक चोट खाए जानवर के लिए,
लेकिन सबसे गहरे अहसास रखना लोगों के लिए I
खुशी महसूस करना धरती की हर रहमत में --
अँधेरे और रोशनी में,
चारों मौसमों में,
लेकिन सबसे बढ़कर लोगों में I
◆नाज़िम हिक़मत.
आंद्रिआना लिस्बोआ( ब्राजीली कवयित्री)
आत्मा को
अपने हाथों से धोना चाहिए
इसलिए नहीं कि
वह बहुत नाजुक होती है
और रगड़े जाने पर उसमें खून आ जाएगा
इसके उलट
वह बेहद मजबूत कपड़े से बनी होती है
और उसे धोने का
एक ही तरीका है कि
उसे हाथों से धोया जाए
एक घरेलू साबुन लें
अच्छा होगा कि सबसे सस्ता वाला
ब्लीच , फैब्रिक सॉफ्टनर
सब भूल जाइए
किसी आत्मा को इनकी जरूरत नहीं होती
थोड़ी देर तक उसे भिगोकर रखें
ताकि जिद्दी दाग हट जाए
हट जाए तेल , कीचड़ , चटनी सॉस के निशान भी फिर उसे रगड़िए निचोड़िये
और सूखने के लिए धूप में टांग दीजिए
इस्तरी करने की कोई जरूरत ही नहीं है
अगर इस तरह से धोएंगे
तो आप बरसों बरस पहन सकते हैं
अपनी आत्मा
यह जो आपकी देह है न यही दुनिया है-
यह एक अड़ियल स्कूल है
और आत्मा
इसका आदर्श यूनिफॉर्म.............
आंद्रिआना लिस्बोआ( ब्राजीली कवयित्री)
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