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Friday, 30 September 2022

Photo from Manoj

पत्थर की मूर्ति से ना गाय डरती है ना बंदर डरता है ना बिल्ली डरती हैं ना कुत्ता डरता है,
बस मंदबुद्धि और अंधविश्वासी इंसान डरता है!

Thursday, 29 September 2022

ट्रोत्स्कीपन्थि पोस्ट का तात्पर्य

Rohit Sharma पोस्ट का तात्पर्य क्या है? जमीनी काम और हवाबाजी या क्रांतिकारी लफ्फाजी को स्पष्ट करना।

तो कामरेड साथियो, काम तो हमेशा जमीन पर ही की जाती है, अगर सिर्फ लफ्फाजी या हवाबाजी करना हो तो और बात है।

क्रांतिकारी इतिहास हमें बताता है कि जहाँ 'लफ्फाज क्रांतिकारी' एक देश में समाजवाद के सिद्धांत का विरोध का माला जपते  रहे  थे, वही ठीक इसके उलट माओवादी एक देश के एक इलाके में लाल सत्ता कायम रह सकने की परिस्थितियों पर विचार करते रहे थे। 

मार्क्सवादी सिद्धांत की भाववादी समझ के कारण 'लफ्फाज क्रांतिकारी' महज लफ्फाजी करने के सिवा एक कदम भी क्रान्ति की तरफ व्यवहार में  आगे नहीं बढ़ पाए। जबकि माओवादियो ने न केवल चीन में बल्कि कई देशो में एक इलाके में लाल सत्ता स्थापित होने और कायम रहने की भौतिक परिस्थितियों का विश्लेष्ण किया और लाल सत्ता की स्थापना भी की।

 उस लाल सत्ता का महत्व इससे कम नहीं होता की उन परिस्थितियों में वे उस इलाके में कितने दिन टिकी रही। वैसे ही सर्वहारा सत्ता या उसके द्वारा समाजवाद के निर्माण की दिशा में उठाये गए कदम का महत्व इससे कम नहीं होता कि वे उस देश में कितने दिनों तक टिकी रही। मार्क्सवादी हमेशा  परिस्थितियों से अलग किसी सिद्धांत पर आधारित कर के अपनी दिशा निर्धारित नहीं करते बल्कि परिस्थितियों के ठोस विश्लेष्ण के आधार पर अपने  व्यवहार का निर्धारण  करते है और क्रांति की दिशा में आगे बढ़ते है। क्रांति का उद्देश्य हमेशा लाल सत्ता की स्थापना होता है और यह हमेशा किसी बनी बनायी सिधांत से नहीं बल्कि मार्क्सवादी सिद्धांत के सहारे परिस्थितियों के ठोस और वैज्ञानिक विश्लेष्ण से  निर्धारित होता है। साम्राज्यवाद के दौर में असमतल पूंजीवादी विकास के चलते किसी एक देश मे जो कमजोड़ कड़ी हो, वहाँ  क्रांति होना, सर्वहारा सत्ता स्थापित करना और समाजवाद स्थापित करना सम्भव हो पाया था। लेनिन, स्टालिन, माओ एवं  उस धारा के अन्य क्रांतिकारी इसी ठोस परिस्थिति के विष्लेषण के आधार पर क्रांति कर सके थे। इसे कहते है-जमीनी काम।

लेकिन कुछ लफ्फाज क्रांतिकारी यही चुक जाते रहे  है और एक देश में समाजवाद के सिद्धांत के विरोध का सिर्फ माला जपते  रहे  है। इतिहास में यही उनकी  त्रासदी रही है।

क्रांति क्यो हो कर रहे गी, वे परिस्थितियां जो विराट मिहनतकस समुदाय को क्रांति की तरफ धकेल रही है, बजाय इस पर फोकस करने के कुछ लोग बिल्कुल उलट सोचते है। एक देश मे क्रांति क्यो नही हो सकती,  पिछड़े देश मे क्रांति क्यो नही हो सकती; क्रांति अगर सिर्फ एक देश मे सफल हो गई तो फिर एक देश मे समाजवाद का निर्माण क्यो नही किया जा सकता आदि आदि उल्टे सीधे प्रश्न से भले ही कोइ पूंजीवादी बुद्धिजीवियों को चकाचौंध कर दे, सर्वहारा बुद्धिजीवी ऐसे बे - सिर पैर के उलटबासी को खूब समझते रहे है।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid0366YV7PnnyKLyVuxDGwT1ZDCcnpXBpmiyvub5pTdD5QDrpyjSwdP4CC7UdPk55xoal&id=100072302191085



Wednesday, 28 September 2022

बिल्कुल सही जानकारी-- इसे पढ़ते रहना चाहिये....



जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दुस्तान' रखा, हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा। अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में। 'राम चरित मानस' भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी।

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था। इस तरह के कई रजवाड़े ,कई देशद्रोही राजा ,नेता अंग्रेजों से मिल गए। आजादी के बाद पुनः देश भक्त बन गए। 25 साल देशभक्त का लबादा ओढ़े रहे । लोगों को भरमा कर वोट लिया । चुनाव जीता और अब देश विक्रेता बन गए ।
   सभी देशद्रोहियों ने देशभक्त का चोला पहनकर देश को बेचने का काम तेज कर दिया है।

टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर,,, बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं। अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते।

यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युँ ना हो। दीनदयाल से लेकर सावरकर तक ऐसे लोगों और उनसे जुड़े तमाम संगठन अंग्रेजों की दलाली करते रहे । भारत के मासूम क्रांतिकारियों को कटवाते रहे । ये चोर,  बेईमान , गद्दार,  हत्यारे आज देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं।

*बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रैजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना। भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये*।

*ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि - "हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं*।"

*बेवकूफ थे बहादुरशाह ज़फर। आज उनकी पुश्तें भीख माँग रहीं हैं*।

अपने इस हिन्दुस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये। अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी ! 
    सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ? 

ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता।

क्या इनके नाम पर हुआ ?

नहीं ना ? इसीलिए कहा कि अंग्रेजों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना कैद मिलती ना कैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही कैद में लिखा :-

*लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में*,
*किस की बनी है आलम-ए-नापायदार* में*।
*उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन*,
*दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में*।
*कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए*,
*दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में*

(शिवाकांत गोरखपुरी जी की एक पुरानी पर शानदार पोस्ट)



Tuesday, 27 September 2022

शहीदे आजम भगतसिंह के 115वें जन्मदिवस (28 सितम्बर, 2022) के अवसर पर

शहीदे आजम भगतसिंह के 115वें जन्मदिवस (28 सितम्बर, 2022) के अवसर पर उन्हें याद करते हुए प्रस्तुत है दो फिल्म। इस फ़िल्म का सामूहिक प्रदर्शन किया जाना चाहिये और जहां तक हो सके सबको को साथ मिल कर देखना चाहिये।

भगतसिंह के जीवन पर गौहर रज़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म *इन्क़लाब'*

यह फ़िल्म भगतसिंह के जीवन पर बनी है जिसमें उनकी विचार यात्रा को दिखाया गया है। यह फ़िल्म जनता के बीच आज के हुक्मरानों द्वारा फैलाये गये उन तर्कों का खण्डन करती है जो भगतसिंह को एक ऐसे जोशीले क्रान्तिकारी के रूप में पेश करते हैं, जो बम-पिस्तौल के ज़रिए आज़ादी लाना चाहते थे।

यह फ़िल्म यह बताती है कि भगतसिंह एक जोशीले क्रान्तिकारी होने के साथ-साथ एक विचारक भी थे जिनके पास एक बेहतर समाज का ख़ाका मौजूद था। यह फ़िल्म यह सोचने को मजबूर कर देती है कि क्या आज भगतसिंह को याद करने का मतलब महज़ उनकी तस्वीर पर फूल-माला चढ़ाना है, या फिर आज उनके विचारों को पुनर्जीवित करना है!?
https://youtu.be/CwFX2jkGyRk


आनन्द पटवर्धन द्वारा निर्देशित *'उना मित्रां दी याद प्यारी' (In the memory of friends)*

यह फ़िल्म आज प्रतिक्रियावादी ताक़तों द्वारा भगतसिंह के नाम को सहयोजित करने के ऊपर बनी है। आज़ादी के बाद देश के हुक्मरानों से लेकर धार्मिक कट्टरपन्थियों ने भगतसिंह को उनके विचारों से काटकर अपने अनुरूप ढालने की कोशिश की। यह फ़िल्म इन्हीं कोशिशों पर चोट करती हुई भगतसिंह के विचारों को प्रतिबिम्बित करती है।

इस फ़िल्म में 1984 में हुए सिख दंगों के दौरान हुई बर्बरता का ज़िक्र आता है, और साथ ही खालिस्तानी और हिन्दू कट्टरपन्थियों की प्रतिक्रियावादी विचारों को भी बेनक़ाब किया गया है। इसमें यह दिखाया गया है कि किस प्रकार खालिस्तानियों ने भगतसिंह (जो कि एक नास्तिक थे) के नाम को जबरन सिख पहचान से जोड़कर अपनी नफ़रती राजनीति को अंजाम देने का काम किया। साथ ही उस वक्त सत्ता में बैठे लोग भगतसिंह के नाम को उनके विचारों से काटकर अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। लेकिन इस दौरान कुछ ऐसे भी लोग थे, जो पंजाब समेत देशभर में भगतसिंह के विचारों का प्रचार कर रहे थे। वे लोग भगतसिंह द्वारा दिये सन्देशों को जन-जन तक पहुँचाने का काम कर रहे थे।
https://youtu.be/aE8TV7ZqAHU 

Monday, 26 September 2022

वामपंथी पार्टियों के भीतर धर्मभीरू/कर्मकांडी कार्यकर्ताओं बढ़ती संख्या

वामपंथी पार्टियों के भीतर धर्मभीरू या कहें कर्मकांडी कार्यकर्ताओं/नेताओं की संख्या इधर खूब बढ़ी है।

पार्टी की बैठकों या क्लास तक में कॉमरेडों के मोबाईल रिंग टोन में भक्ति-भजन की गूंज खुलेआम सुनी जा सकती है। घरों के भीतर तो छोड़िए अब तो मंदिरों में जाकर पूरे विधि विधान और तानाबाना के साथ न सिर्फ कर्मकाण्ड में शामिल होने बल्कि उसे नि:संकोच फेसबुक पर सार्वजनिक करने की खुली प्रवृत्ति कई जिला स्तर के पार्टी नेताओं में घर कर गयी है। पार्टी कार्यालयों में भी मंदिर होकर और माथे पर टीका, हाथों में पीला धागा लपेटे आने वाले कामरेड लोग अब निसंकोच बैठे मिल जायेंगे! यह एक ख़तरनाक रूझान है ! और इससे भी ख़तरनाक बात यह है कि यह प्रवृत्ति धीरे धीरे पार्टियों के भीतर स्वीकार्य होती जा रही है -- 'चलता है कॉमरेड'!

पार्टी के भीतर घर कर रही इस घोर विजातीयता से निर्ममतापूर्वक लड़े बिना हम देश में बढ़ती धार्मिक कट्टरता से कोई निर्णायक लड़ाई लड़ भी सकते हैं क्या लड़ने का प्रहसन करने के सिवाय?

(रिपोस्ट)

पोस्टर -नवरात्रि, मांसाहार

हार्वड फ़ास्ट- आदि विद्रोही



अनुवादक की ओर से


विश्व के अाधुनिक साहित्यकारों में हावर्ड फ़ास्ट एक बड़ा नाम है। अब तक उसकी सत्ताइस कृतियाँ निकल चुकी हैं जिनमें चौदह उपन्यास हैं, तीन कहानी संग्रह हैं, दो इतिहास ग्रन्थ हैं, एक नाटक है, एक थालोचना पुस्तक है, चार किशोरोपयोगी कथा कृतियाँ हैं और दो सम्पादित ग्रन्थ हैं ।


फास्ट की अधिकांश पुस्तकें संसार की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। हमारी भाषा में अब तक सम्भवतः दो ही आ पाई हैं— 'मुक्ति-मार्ग' और 'पीक - स्किल' | 'मुक्ति-मार्ग' ऐतिहासिक उपन्यास है और 'पीक - स्किल' समसामयिक इतिहास की एक घटना का कथात्मक विवरण, तथापि विषय वस्तु दोनों की एक है, नीग्रो जाति के स्वत्वों का संघर्ष । और बात केवल नीग्रो जाति की नहीं है । जो मी पददलित है, जिस पर भी श्रन्याय और अत्याचार होता है उसके साथ इस लेखक की सक्रिय सहानुभूति है, वह व्यक्ति या समूह कहीं का हो, कोई हो, किसी वर्ण का, किसी जाति का, किसी देश का, किसी युग का । लेखक की यह सहानुभूति कितनी सच्ची कितनी सक्रिय है इसका सबसे सबल प्रमाण तो 'पीक- स्किल' की वही ऐतिहासिक घटना है जिसमें गोरी चमड़ी के अन्य सद्विवेकशील व्यक्तियों के साथ-साथ फास्ट ने भी अपने नीग्रो बन्धुओं के कन्धे से कन्धा मिला कर, सचमुच उनके हाथ-में हाथ देकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन संगठित, प्रतिगामी, नीग्रो विरोधी शक्तियों से युद्ध किया जिनकी आज भी 'सभ्य' अमरीका में तूती बोलती है, जो नीग्रो को कुत्ता समझते हैं, जिनकी दृष्टि में एक नीग्रो के प्राण का मूल्य कुत्ते से भी कम होता है और जिनको नीग्रो के स्वाभिमान अथवा स्वत्वों की बात कान में पिघला सीसा उँडेलने जैसी जान पड़ती है ।


उत्पीड़ित के प्रति लेखक की इस सक्रिय संवेदना का रहस्य क्या है ? यह रहस्य और कुछ नहीं है, केवल इतना कि उसकी त्वचा का रंग चाहे जो हो, वह स्वयं भी उसी ग़रीब उत्पीड़ित वर्ग से आया है। सबसे पहले उसका अपना जीवन-अनुभव और फिर उसकी जीवन-दृष्टि उसको सभी उत्पीड़ितों की ओर अपना बन्धुत्व का हाथ बढ़ाने के लिये प्रेरित करती है ।


फास्ट ने एक स्थान पर अपने जीवन के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं। फ़ास्ट की मनोरचना और उसके साहित्य को ठीक से समझने में निश्चय ही उससे सहायता मिलेगी । वह लिखता है -


- मेरा जन्म न्यूयार्क शहर में ११ नवम्बर १५१४ को एक मज़दूर परिवार में हुआ। मेरे पिता पहले एक लोहे के कारखाने में काम करते थे, फिर बस कन्डक्टर हुए और सबसे अन्त में एक रेडीमेड कपड़ों के कारखाने में काम करने लगे। मैं जब आठ वर्ष का था मेरी मां मर गई और मैं अपने दो भाइयों के साथ न्यूयार्क शहर की एक गन्दी बस्ती में भयानक ग़रीबी में पला और बढ़ा ।


- मुझे ग्यारह साल की उम्र से ही जीविका कमाने में लग जाना पड़ा इसलिए स्वभावतः मैं पढ़ न सका । सोलह साल की उम्र में मैंने 'हाई स्कूल की परीक्षा पास की। उसके बाद फिर कभी मैंने स्कूल का मुँह नहीं देखा, सिवाय उस एक साल के जब मैंने छात्रवृत्ति से एक चित्रकला अकादमी में शिक्षा ली। लेकिन वह चीज भी चल न सकी क्योंकि जो समय वहाँ जाता था उसको जीविकोपार्जन में लगाना जरूरी था।


-- ग्यारह से लेकर इक्कीस साल की उम्र तक मैंने जीविकोपार्जन के लिए बहुत तरह के काम किये - अख़बार बाँटे, सिगार के कारखाने में की सफाई की, तामीरी कामों में साधारण कुली का काम किया और होते-होते अन्त में मैं भी न्यूयार्क के एक रेडीमेड कपड़ों के कारखाने में काम करने लगा ।


— मैं स्वयं शिक्षित व्यक्ति हूँ | सोलह का होते होते मैं लिखने लगा था। मैंने लिखते-लिखते लिखना सीखा। हो सकता है साहित्य रचना की कुछ नैसगिक क्षमता भी मेरे अन्दर रही हो । मेरी पहली किताब लगभग तेईस वर्ष पहले छपी थी । यह एक प्रेम कहानी थी जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध न था । इस किताब से मुझको कुल सौ डालर की आमदनी हुई थी । जब मैं इक्कीस का था मैंने 'द चिल्ड्रेन' लिखी जो एक प्रसिद्ध कहानी पत्रिका में छपी। इसके भी मुझको सौ डालर मिले लेकिन अब मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि मैं लिखकर अपनी जीविका चला सकता हूँ। पचीस साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मुझको अपनी कहानियों के लिए अच्छा पारिश्रमिक मिलने लगा था और मेरी किताबें भी बिकने लगी थीं। 'लास्ट फॉन्टियर' से मुझको पहली उल्लेखनीय ख्याति मिली । यह पुस्तक १९४१ में प्रकाशित हुई थी । 'सिटिज़ेन टॉम पेन' का प्रकाशन होते ही मेरी किताबों की बिक्री लाखों होने लगी और मेरा नाम काफ़ी फैल गया । १९४६ तक सब कुछ ठीक से चला मगर उसी वर्ष से सरकारी आतंक ने देश को बुरी तरह जकड़ लिया और मेरी किताबों की व्यापक बिक्री में रुकावट पैदा होने लगी । तब तक अमरीका में मेरी एक करोड़ से ज्यादा किताबें बिक चुकी थीं.....


इसके बाद वह स्थिति आई जब कि प्रस्तुत पुस्तक छापने के लिए अमरीका का कोई प्रकाशक तैयार न था और फ़ास्ट को स्वयं अपने साहित्य रसिक मित्रों की सहायता से इसको छापने की व्यवस्था करनी पड़ी ।


हमारे इस विक्षुब्ध युग में दो विरोधी विचारधाराओं और समाज व्यवस्थाओं का जो शीत युद्ध निरन्तर चल रहा है, यह घटना भी उसी का एक प्रतिफलन है। सम्प्रति अमरीका के कुछ प्रभावशाली हलक े अपने देश के इस महान् लेखक का नाम लेने से घबराते हैं और चाहते हैं कि किसी उपाय से उसकी स्मृति भी मिट जाय। लेकिन वे भूल जाते हैं कि हावर्ड फास्ट, वाल्ट ह्विटमैन और माक ट्वेन  जीवन्त और संघर्षशील मानवतावादी परम्परा का लेखक है, जिस परम्परा का सूत्रपात टॉम पेन, जेफरसन और अब्राहम लिंकन जैसे लोगों ने किया था, जो परम्परा अमरीकी राष्ट्र की आधार शिला है, जिस परम्परा का स्वर स्वयं उनके स्वाधीनता के घोषणापत्र में गूँज रहा है -


- और जो आज डालरों की झनकार में, आणविक ब्रह्मास्त्रों के तुमुल घोष में डूब गया है, खो गया है।


मनुष्य मात्र की स्वाधीनता, साम्य, और मुक्त विवेक की इसी खोई हुई, बिसराई हुई अमरीकी परम्परा को फिर से खोजने, जोड़ने और समझने की कोशिश इस अमरीकन यहूदी लेखक ने अपनी अनेक कृतियों में की है। कन्सीन्ड इन लिबर्टी, द लास्ट फॉन्टियर, दिन बैक्वड, सिटिज़ेन टॉम पेन, फ्रीडम रोड, दि अमेरिकन, द प्राउड ऐण्ड द फ्री, द पैशन ऑफ सैको ऐन्ड वैनज़ेटी और साइलस टिम्बरमैन नामक उपन्यासों, प्रायः डेढ़ दर्जन कहानियों, थर्टी पीसेज़ ऑफ सिलवर नामक नाटक और स्किल नामक कथात्मक इतिवृत्त, सबमें यही एक ही मूल भावना मिलती है।


इतिहास हावर्ड फ़ास्ट का प्रिय विषय है, अपने देश का इतिहास, अपनी जाति का इतिहास, संसार का इतिहास; और इतिहास उस अर्थ में नहीं जिस अर्थ में राजा-रानी की प्रणय कथा इतिहास होती है या लड़ाई में किसी राजा की हार-जीत इतिहास होती है या राजमहल में चलनेवाले षड्यंत्र इतिहास होते हैं बल्कि इतिहास वह जो अपना स्रोत कोटि-कोटि साधारण जनों की क्रिया-शक्ति में पाता है, जिसकी दृष्टि राजा से अधिक प्रजा पर होती है और जो उन सामाजिक शक्तियों को समझने का प्रयत्न करता है जिनके अन्तरसंघर्ष से जीवन में प्रगति होती है। हावर्ड फ़ास्ट के पास ऐसी ही तीक्षण ऐतिहासिक दृष्टि है और व्यापक भी, जो स्थान, काल, किसी का कोई भेद नहीं मानती, जिसके लिए दुनिया एक और अखंड है और यह सब भौगोलिक और राजनीतिक सीमाएँ झूठी हैं और समय एक निरन्तर बहती हुई नदी है जिसमें भूत भविष्यत् वर्तमान नाम के काल-खंड केवल समझने-बूझने की सुविधा के लिए बनाये गए हैं -


ऐसे एक और अखंड जगत् में, एक और अविच्छिन्न कालप्रवाह में वह प्राणी रहता है जिसका नाम मनुष्य है, जो सर्वसहा, मूर्त क्षमा पृथ्वी का पुत्र है, तेजः पुंज, दृढ़वती, धीमान्, सत्याश्रयी, अक्रोधी, अशेष धैर्यवान्, जो सब जानता है, सब समझता है, सब सहता है, और सीमा का अतिक्रमण होने पर फिर एक रोज़ फूट पड़ता है । उसी को भूकम्प कहते हैं ।


ऐसे ही भूकम्पों की, विद्रोहों की कहानी हावर्ड फ़ास्ट ने कही है । उसके लिए इतिहास न्याय के संघर्ष की गाथा है । और जहाँ भी न्याय के लिए संघर्ष होता है, खून गिरता है वहाँ लेखक खड़ा है, कोई भी देश हो कोई भी काल हो। जहाँ 'साइलस टिम्बरमैन' में लेखक आज के अमरीका की कहानी कहता है वहाँ 'आदिविद्रोही' में वह ईसा से ७३ वर्ष पूर्व के रोम की कहानी कहता है जब गुलामी की प्रथा अपने शिखर पर थी और उन्हीं गुलामों में से एक उस पाशविक प्रथा को चुनौती देने का विवेक और साहस अपने आप में पाया था। 'माई ग्लोरियस ब्रदर्स' में लेखक ईसा से डेढ़ दो सौ वर्ष पूर्व के इज़रायल में पहुँच जाता है और उन पाँच भाइयों की कहानी कहता है जिनके नेतृत्व में वहाँ के ग़रीब किसानों ने तीस वर्ष तक अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता की रक्षा के लिए मृत्युंजय संघर्ष किया था ।


फास्ट की कृतियों में बहुत बार यह संघर्ष स्थूल भौतिक दृष्टि से पराजित होता है, विद्रोह असफल रहता है और उसके नायक गोली से उड़ा दिये जाते हैं, सलीब पर टांग दिये जाते हैं, मैदान में खेत रहते हैं । तब भी उन विद्रोही संघर्षकारियों, योद्धाओं की अन्तिम विजय में हमारी आस्था कभी नहीं खोती और पुस्तक समाप्त करने पर मन जहाँ गहरी उदासी से भरा होता है वहाँ उस उदासी में और सब कुछ हो पर निराशा का रंग नहीं होता । साहित्य की कीमियागरी शायद यही है जो हार को जीत में परिणत कर देती है। संघर्ष की असल पराजय आत्मा की पराजय है और सभी श्रेष्ठ मानवतावादी कलाकारों की भाँति हावर्ड फास्ट के यहाँ भी आत्मा कभी पराजित नहीं होती, उसका अजेय स्वर कभी मन्द नहीं पड़ता।


शिल्प की दृष्टि से भी फ़ास्ट के इन ऐतिहासिक उपन्यासों का असाधारण महत्व है । बहुधा देखा जाता है कि ऐतिहासिक उपन्यास या तो प्रेम कहानी बन कर रह जाते हैं या इतिहास के आँकड़ों में ऐसे उलझ जाते हैं कि उपन्यास उपन्यास न होकर इतिहास का ग्रन्थ बन जाता है। फास्ट के ऐतिहासिक उपन्यास इन दोनों दोषों से मुक्त हैं। एक ओर जहाँ वे युग विशेष के जीवन का समग्र, सम्पूर्ण चित्र देते हैं और इतिहास की दिशा का संकेत करते हैं वहाँ दूसरी श्रोर उनकी औपन्या सिकता में रत्ती भर कमी नहीं आने पाती । कथावस्तु की रोचकता, वाता वरण की चित्रमय सृष्टि, रक्त मांस के सजीव, अत्यन्त सजीव, पात्र ये सभी बातें अपने श्रेष्ठतम रूप में फ़ास्ट की कृतियों में मिलती हैं । विशेषतः 'आदिविद्रोही' में जो कि शायद लेखक की सबसे महान् कृति है । पुस्तक की असाधारण रूप से गठी हुई शैली अनुवादक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, इसमें सन्देह नहीं । अनुवाद सफल हुआ या नहीं, इसका निर्णय भी पाठक ही कर सकेगा । पर तो भी अनुवादक के ना मुझे इस बात का सन्तोष है कि मैंने पूरी निष्ठा के साथ काम किया है । मेरा यह भी विश्वास है कि अनुवाद की सारी कठिनाइयों और क्षमताओं— के बावजूद मैं मूल ग्रन्थ की आत्मा की रक्षा काफी हद तक कर सका हूँ । इस अनुवाद कार्य में मुझको जो सुख मिला, उसको मैं व्यक्त नहीं कर सकता । केवल इतना कहना चाहता हूँ कि विश्व साहित्य की यह अमर कृति हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है।


कविता के टुकड़ों का अनुवाद मेरे आत्मीय श्री बालकृष्ण राव ने किया है जिसके लिए मैं हृदय उनका कृतज्ञ हूँ ।


- आमृत राय




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