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Sunday, 6 November 2022

असली_पुरुषोत्तम_चंगेज़_खां

#असली_पुरुषोत्तम_चंगेज़_खां

16 साल की उम्र में चंगेज़ ने बोरते से शादी की लेकिन दुश्मन मेर्किट उनकी पत्नी को उठाकर ले गए, उनकी पत्नी को मेर्किट के बलात्कार से एक संतान हुई जोचि।

कुछ सालों बाद जब चंगेज़ ज़बरदस्त युद्ध जीत कर अपनी पत्नी को वापस लाने जाते हैं, तब ना सिर्फ अपनी पत्नी बोरते को बल्कि उसकी संतान जोचि को भी लेकर आते हैं और अपनी ही संतान सा प्यार, दुलार और सम्मान देते हैं। 

आगे चलकर भी ताउम्र बोरते उनकी महारानी बनी रहतीं हैं और वे जोचि को कईं राज्यों का प्रमुख बनाकर, सौतेला बाप होते हुए भी एक बेहतरीन पिता की भूमिका निभाते हैं। वे अपनी पत्नी के साथ हुए अत्याचार और बलात्कार के लिए उसे न तो दोषी मानते हैं, न अग्निपरीक्षा माँगते हैं और ना ही दुश्मन की संतान से नफ़रत कर पाते हैं, पत्नी से उनके प्रेम पर कोई भी पुरुषवादी घृणा हावी तक न हो पाई।

इस बात में कोई दो राय नही कि चंगेज़ खां बेहद ख़ौफ़नाक लड़ाकू था, लेकिन प्रेम की समझ उसमे हमारे किसी भी मिथकीय मर्यादा पुरुषोत्तम से बहुत अधिक थी। 

इसीलिये जब तक हम दुनिया के बारे में नही जानेंगे, अपनी कपोल कल्पनाओं में विश्वगुरु बने रहेंगे और पूरी दुनिया के सामने हँसी का पात्र और राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानते रहेंगे।


महिषासुर

https://m.thewirehindi.com/article/asur-adiwasi-mahishasur-durga-puja/20014/amp

जिस महिषासुर का दुर्गा ने वध किया उन्हें आदिवासी अपना पूर्वज और भगवान क्यों मानते हैं


महिषासुर का शहादत दिवस झारखंड के सिंहभूम इलाके में भी मनाया जा रहा है. कई जगहों पर महिषासुर पूजे जाते रहे हैं.

इसी सिलसिले में नवरात्र के नवमी पूजन के दिन यानि शुक्रवार को चाकुलिया में आयोजित शहादत दिवस कार्यक्रम में आदिवासी संथाल, भूमिज, कुड़मी के साथ दलित समुदाय के लोग भी शामिल हुए.

महिषासुर को पूजे जाने की खबर झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कई आदिवासी इलाकों से भी मिलती रही है. अलबत्ता बंगाल के काशीपुर में महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगा है.

सखुआपानी गुमला की सुषमा असुर कहती हैं कि उनकी उम्मीदें बढ़ी है कि अब देश के कई हिस्सों में आदिवासी इकट्ठे होकर पुरखों को शिद्दत से याद कर रहे हैं.

झारखंड की राजधानी रांची से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गुमला जिले के सखुआपानी, जोभापाट आदि पहाड़ी इलाके में असुर बसते हैं. इंटर तक पढ़ी सुषमा कथाकार हैं और वे आदिवासी रीति, पंरपरा, संस्कृति को सहेजे रखने के अलावा असुरों के कल्याण व संरक्षण पर काम करती हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में असुरों की आबादी महज 22 हजार 459 है. झारखंड जनजातीय शोध संस्थान के विशेषज्ञों का मानना है कि आदिम जनजातियों में असुर अति पिछड़ी श्रेणी में आते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था न्यूनतम स्तर पर है. असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं.

जगन्नाथपुर कॉलेज में इतिहास विभाग के प्राध्यापक और आदिवासी विषयों के जानकार जगदीश लोहरा का कहना है कि असुरों के अलावा कई और आदिवासी समुदाय भी मानते हैं कि वे लोग महिषासुर के वंशज हैं. इन समुदायों को ये भी जानकारी मिलती रही है कि वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी. इसमें महिषासुर मार दिए गए. कई जगहों पर लोग महिषासुर को राजा भी मानते हैं.

आदिवासी विषयों के एक अन्य जानकार लक्ष्मीनारायण मुंडा के मुताबिक इसे आदिवासी समुदाय द्वारा उनके पुरखों के इतिहास को सामने लाने की कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. क्योंकि कथित तौर पर मिथकों के जरिए एक बड़े तबके की भावनाएं दबाई जाती रही हैं.

छल से मारे गए!

सुषमा असुर कहती हैं कि महिषासुर की याद में नवरात्र की शुरुआत के साथ दशहरा यानि दस दिनों तक वे लोग शोक मनाते हैं.

इस दौरान किसी किस्म की रीति-रस्म या परपंरा का निर्वहन नहीं होता. बड़े-बुजुर्गों के बताए गए नियमों के तहत उस रात एहतियात बरते जाते हैं जब महिषासुर का वध हुआ था. मूर्ति पूजक नहीं हैं, लिहाजा महिषासुर को दिल में रखते हैं.

पिछले साल झारखंड के पंचपरगना इलाके में एक कार्यक्रम में महिषासुर को पूजते लोग.

बकौल सुषमा किताबों में भी पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया, जो हमारे पूर्वज थे. सुषमा का जोर इस बात पर है कि वह कोई युद्ध नहीं था.

वो बताती हैं कि महिषासुर का असली नाम हुडुर दुर्गा था. वह महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे. इसलिए दुर्गा को आगे कर उनकी छल से हत्या कर दी गई.

वाकिफ कराने की चुनौती

इस असुर महिला के मुताबिक आने वाली पीढ़ी को पुरखों के द्वारा बताई गई बातों तथा परंपरा को सहेजे रखने के बारे में जानकारी देने की चुनौती है. कई युवा लिखने-पढ़ने को आगे बढ़े भी, पर पिछली कतार में रहने की वजह से जिंदगी की मुश्किलों के बीच ही वे उलझ जा रहे हैं. वे खुद भी कठिन राहों से गुजरती रही है.

इसी इलाके से मिलन असुर को विश्वास है कि उनके पुरखों का नरसंहार किया गया. इसलिए शोक मनाना लाजिम है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए , जबकि नरसंहारों के विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है.

यह भी पढ़ें: महिषासुर भारतीय इतिहास का ऐतिहासिक नायक है

गौरतलब है कि साल 2008 में विजयादशमी के मौके पर झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने रांची के मोराबादी मैदान में होने वाले रावण दहन समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि रावण आदिवासियों के पूर्वज हैं. वे उनका दहन नहीं कर सकते.

जबकि पिछले दिनों तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर को 'शहीद' के तौर पर बताए जाने पर काफी नाराजगी जताई थी.

पुरखे-परंपरा के लिए संघर्ष

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति 'अखड़ा' की अगुआ वंदना टेटे कहती हैं कि आप इसे पूर्वज-पंरपरा को याद रखने के तौर पर देख सकते हैं. बेशक आदिवासियों को अपने रूट्स में जाने की जरूरत है, ताकि एक ठोस नतीजे पर पहुंचा जा सके, क्योंकि कई चीजें गुम होती जा रही है और कई विषयों को अलग-अलग तरीके से उनके सामने रखा जाता रहा है.

झारखंड के चाकुलिया में शुक्रवार को महिषासुर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. (फोटो: दिलीप महतो)

बकौल वंदना वे अक्सर असुरों के बीच जाती रही हैं. वाकई में वे लोग महिषासुर को अपना पूर्वज मानते रहे हैं साथ ही कई मौके पर भाषा, संस्कृति, पंरपरा और पुरखौती अधिकारों के लिए सृजनात्मक संघर्ष करने के लिए खड़े होते हैं.

दसाई और काठी नृत्य

उधर झारखंड के चाकुलिया में देशज संस्कृति रक्षा मंच के बैनर तले महिषासुर शहादत दिवस मनाने वालों में कपूर टुडू ऊर्फ कपूर बागी बताते हैं कि दशहरा के मौके पर संथाल समाज के लोग दशकों से नृत्य-गीत के माध्यम से महिषासुर के मारे जाने पर दुख जताते हैं.

इसे दसाई और कांठी नाच कहा जाता है. इन समुदायों में शोक गीत के बोल-' हर रे हय रे हय ओकार नमरे हय, ओकाय नमरे हुदुड़ दर्गी'… लोकप्रिय हैं.

उनका जोर है कि आदिवासियों को विश्वास है कि महिषासुर फिर लौटेंगे, क्योंकि उनके राजा को छल-कपट से मारा गया. रावण वध जैसी पौराणिक घटनाओं को भी मिथकीय रूप दिया जाता रहा है.

रावण दहन क्यों?

सिहंभूम इलाके के कुमारचंद्र मार्डी कहते हैं कि महिषासुर वीर पुरूष थे और छल से ही मारे गए. बुराई पर अच्छाई की जीत बताकर और रावण का पुतला बनाकर जलाये जाने को भी वे लोग सहज तौर पर नहीं लेते, क्योंकि रावण भी हमारे पूर्वज थे.

झारखंड के जोभीपाट नेतरहाट गांव में असुर समाज के लोग बैठक करते हुए. (फोटो: वंदना टेटे)

मार्डी के मुताबिक इस पूरे मामले में बड़ा इतिहास है, जिसे जानने की जरूरत है.मार्डी इस मुहिम को सकारात्मक बताते हैं कि कुड़मी-भूमिज समेत कई समाज-समुदाय के लोग भी इस मसले पर उनका साथ देते रहे हैं.

मार्डी कहते हैं कि अब उत्तर भारत में भी महिसासुर का शहादत दिवस मनाया जाने लगा है.

असलियत पर बहस

देशज संस्कृति रक्षा मंच से ही जुड़े दिलीप महतो बताते हैं कि कुड़मी समाज में इस तरह की परंपरा रही है. वे लोग किसी देवी की पूजा या उत्सव का विरोध नहीं करते, लेकिन जिस तरह से महिषासुर का वध दर्शाया जाता है, वह आहत करता रहा है.

इस बारे में असलियत सामने लाये जाने की जरूरत है. क्योंकि इतिहास को गलत तरीके से दर्शाया जा रहा है. हालांकि इस विषय पर बहसें होती रही है.

इस बीच असुर आदिवासी विजडम डॉक्यूमेटेंशन इनीसियेटिव में खंडवा मध्य प्रदेश की आदिवासी महिला सुंगधी वीडियो के मार्फत यह बताने की कोशिश कर रही हैं वे लोग असुरों की संतान हैं तथा मेघनाद को पूजते हैं.

लिहाजा नस्लीय भेदभाव और इंसानी गरिमा के हनन की कोशिशों के खिलाफ वे आवाज मुखर करना चाहती हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं)






शोक गीतों के खिलाफ

#शोक गीतों के खिलाफ
जीवन रचने के लिए
लाखों गतिशील मनुष्य चाहिए
यह गति जब अपना लय खोता है 
जिंदगियां खामोश हो जाती हैं
 एक अहम साथी चाहिए
जीवन जीने के लिए 
यह मायने नहीं रखता कि 
वह साथी स्त्री है या पुरुष 
या वह उम्र के किस पड़ाव पर है
 जीवन को गति देने के लिए 
सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध लोगों का
 सानिध्य कितना महत्वपूर्ण है! 
लेकिन समय का दुर्भाग्य है कि
 सामाजिक सरोकार डूबता जा रहा है 
क्षितिज के पार
उदास शाम की तरह 
जो उभर आती है पहाड़ के गांवों में 
लोग आत्म केंद्रित होते जा रहे हैं
क्षुद्रता की हद तक!
 यह कितना दुखद है!
शोक गीतों की तरह!
लेकिन यह भी तो सच है
रात का अंधेरा प्रकृति का अर्धसत्य है
प्रकृति अपनी गति से जब
 किसी आकार को विखेर  रहा होता है
कहीं दूर अंधेरे को चीर कर 
सूरज निकल रहा होता है
मनुष्य वृद्ध होता है 
युवा जोड़े आलिंगनबद्ध हो अंगड़ाई लेते हैं
और फिर शिशुओं की किलकारियां गूंज उठती है 
उन  शोक गीतों के खिलाफ!

Narendra Kumar 

Saturday, 5 November 2022

आलोचना की स्वतंत्रता'

'आलोचना की स्वतंत्रता' निस्संदेह मौजूदा समय का सबसे फैशनेबल नारा है। यह सभी देशों और समाजवादियों और जनवादियों के बीच चल रहे विवादों में सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मुद्दा है। विवाद में शामिल पार्टियों में से कोई एक अगर आलोचना की स्वतंत्रता के लिए गंभीर अपील करे तो पहली नजर में इससे ज्यादा विचित्र बात कोई और नजर नहीं आएगी। बहुतेरे यूरोपीय देशों के संवैधानिक कानून, विज्ञान और वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए स्वतंत्रता की गारंटी करते हैं। क्या इन कानूनों के खिलाफ इन देशों की अग्रणी पार्टियों के भीतर आवाज उठाई गई है? 'यहां कुछ न कुछ गलत निश्चित रूप से है।' यही किसी भी उस दर्शक की टिप्पणी होगी, जिसने आलोचना की स्वतंत्रता के इस फैशनेबल नारे को सुना होगा। इस नारे को बार-बार दोहराया तो जाता रहा है, लेकिन उसके प्रति उठे विवादों के सारतत्व को भेदा नहीं जा सकता है। 'बिलकुल साफ है कि यह नारा एक पारंपरिक शब्द-खंड या उक्ति है, जो संक्षिप्त नामों की तरह इस्तेमाल के क्रम में वैधानिक और लगभग जातीय (एक वर्ग-विशेष का) पद हो गया है।'

'स्वतंत्रता' एक महान शब्द है। लेकिन उद्योग की स्वतंत्रता के बैनर तले सर्वाधिक लुटेरे किस्म के युध्द हुए हैं। श्रम की स्वतंत्रता के बैनर तले श्रमिक लूटे गए हैं। 'आलोचना की स्वतंत्रता' शब्दपद के इस आधुनिक इस्तेमाल में भी ऐसा ही फरेब अंतर्निहित है। जो लोग इस बात में यकीन रखते हैं कि उन्होंने सचमुच विज्ञान में तरक्की हासिल की है, वे इस स्वतंत्रता की मांग नहीं करेंगे कि पुराने के साथ-साथ नए विचार चलें बल्कि वे यह चाहेंगे कि नए विचार पुराने विचारों की जगह ले लें। 'आलोचना की स्वतंत्रता जीवित रहे' का मौजूदा आर्त्तनाद खाली कनस्तर से गूंजती आवाज सा प्रतीत होता है।

-क्या करें
(लेनिन)

Thursday, 3 November 2022

ईरान में महसा अमीनी की शहादत : एक साहसी लोकप्रिय विद्रोह की शुरुआत - तुहिन



 

16 सितंबर को ईरान की नैतिक पुलिस के हाथों  तेहरान में एक युवा कुर्द महिला, जीना महसा अमिनी (उम्र 22) की पुलिस हिरासत में मौत हो गई।13 सितंबर  को उसकी गिरफ्तारी तेहरान में शहीद हागनी एक्सप्रेस वे में  धार्मिक नैतिक  पुलिस द्वारा की गई थी।उसका कारण बताया गया कि उसने हिजाब पहनने के लिए बनाए कानून का कथित उल्लंघन  किया था। वह ईरान के पश्चिम के इराकी सीमा से लगे कुर्द हिस्से साघेज शहर की रहने वाली थी।
तब से, ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और जो बंद होने का नाम नहीं ले रहे; ईरान के धार्मिक सरकार  के जुल्मों सितम के बावजूद।ये प्रदर्शन शुरू तो हुए ईरान के अल्पसंख्यक राष्ट्रीयता वाले कुर्द प्रांत में, लेकिन बहुत जल्द ईरान के सभी बड़े और छोटे शहरों में  दिन-रात सड़कों पर  अलग अलग तरीके से लड़ाकू  प्रदर्शन शुरू हो गए जो चार सप्ताह बाद भी जोर शोर से जारी है । दुनिया के बहुतेरे देशों में कुर्द वामपंथी विद्रोही महिलाओं के नारे "जिन,जियान,आजादी"(महिला,जीवन,आजादी) गूंज रहे हैं।ये नारा सबसे पहले 8 मार्च,2006 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर क्रांतिकारी कुर्द महिलाओं ने लगाया था। ईरान में सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का दबदबा तमाम किस्म के दुष्प्रचार और दमन के बावजूद कायम है। जीना अमिनी की मृत्यु ने फिर से पूरे देश में एक क्रांतिकारी उत्तेजना की आग को प्रज्वलित कर दिया है, जो लंबे समय से जनता के बीच सुलग रही थी। महिलाओं,युवा/विद्यार्थियों के  द्वारा महिलाओं  के खिलाफ  धार्मिक पि त्रसत्तात्मक  प्रतिबंधों के खिलाफ  और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में शुरू हुए इस विद्रोह में मजदूरों और आम जनता के जुड़ जाने से ईरान का मौजूदा विद्रोह अभूतपूर्व रूप ले चुका है ।
इतिहास खुद को दुहरा रहा है 
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1852 में 35 वर्षीय महिला अधिकार कार्यकर्ता ताहिरीह घोराटोलें को तेहरान में तत्कालीन शासकों द्वारा उसके तथाकथित धर्मविरोधी होने और हिजाब न पहनने के कारण मृत्युदंड दिया गया था।उसके अंतिम वाक्य थे"तुम लोग मुझे जल्दी से जल्दी जैसा तुम चाहे मार सकते हो मगर तुम लोग महिलाओं की मुक्ति को नहीं रोक सकते"।करीब 170 साल बाद उसी शहर में 22 वर्षीय माहसा जीना अमीनी नामक कुर्द युवती की मौत इस्लामिक धार्मिक शासकों का कोपभाजन बनने से हुई।इस मामले में इतिहास की पुनरावृति हुई है कि दोनों महिलाओं ने पितृसत्ता और धार्मिक तानाशाही के गठबंधन को चुनौती दी या शासकों को इन महिलाओं से डर लगा।
महसा के भाई ने कहा कि वे तेहरान के नहीं हैं और शहर के कायदे कानून से ठीक से वाकिफ नहीं थे।लेकिन फिर भी तेहरान की धार्मिक नैतिक पुलिस ने मह्सा को अपमानित किया और यातना देकर मार डाला।हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कहा कि उनका"ब्रेन डेड" हो चुका है और दिल में धक्का लगा है।ईरान की धार्मिक सरकार ने कहा कि वह पहले से गंभीर बीमारी से पीड़ित थी इसी से उसकी मृत्यु हो गई है।लेकिन महसा के परिवार और दोस्तों ने इसे झूठा करार दिया और कहा कि उसे कोई बीमारी नहीं थी।
कुर्द कौन हैं-
असल में महसा अमीनी ईरानी नाम है। महसा का कुर्दिश नाम" जीना" है।जीना का कुर्द भाषा में अर्थ जीवन है।कुर्द एक अल्पसंख्यक राष्ट्रीयता है जो ईरान,इराक, टर्की और सीरिया में बसे हुए हैं।जिस तरह हमारे देश में कश्मीरी राष्ट्रीयता के लोगों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना कर सारे मौलिक अधिकारो के लिए जद्दोजहद करने पर मजबूर कर दिया गया है वैसे ही कुर्दों को उपरोक्त चारों देशों में बदहाल स्थिति रखा गया है।जिसके खिलाफ कुर्दिस्तान वामपंथी आंदोलन विशेषकर महिलाएं लगातार सक्रिय हैं।हाल ही में  टर्की और समीप के देशों के कुर्द क्षेत्रों में बहुत ज्यादा सक्रिय "कुर्दिस्तान विमेंस लिबरेशन मूवमेंट" से जुड़ी नगिहान अकारसेल शहीद हो गई हैं।उन्हे टर्की की फासिस्ट एर्डोगन सरकार ने मार डाला। कुर्दिस्तान विमेंस लिबरेशन मूवमेंट,साम्राज्यवाद तथा उसके देशीय दलाल कॉरपोरेट घरानों व धार्मिक फासिस्ट   सरकार के साथ साथ धार्मिक  पितृसत्तात्मक कट्टरपंथी/आतंकवादी आइसिस के खिलाफ जीवन मरण का संघर्ष चला रही हैं। आइसिस के आतंकी जिन्हे अल कायदा और तालिबान की तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद ने पैदा किया है,कुर्द महिला वामपंथी छापामारों से बहुत डरते रहे हैं।इन बहादुर वामपंथी महिला क्रांतिकारियों के सशस्त्र प्रतिरोध के चलते कुछ सालों पूर्व  आइसिस(इस्लामिक स्टेट्स) के हाथों से "रोझावा" को मुक्त किया गया था,जो एक इतिहास बन चुका है।
विद्रोह क्यों फैला-
पहली नज़र में, विरोध गुस्से के एक स्वतःस्फूर्त विद्रोह की तरह लगता है। लेकिन  इसका एक लंबा इतिहास है। पिछले साल पहले से ही 55 से 130 प्रतिशत तक की मुद्रास्फीति लोगों के लिए असहनीय होती जा रही थी, और कई  संघर्ष के अनुभव वाले श्रमिक कारखानों में संगठित हो रहे थे। मार्च 2021 से मार्च 2022 तक, इस्पात संयंत्रों , तेल, गैस, पेट्रोकेमिकल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से 4000 श्रमिकों के संघर्ष हुए थे।जिसमें हफ़्ट टेपे में गन्ना श्रमिकों से लेकर ट्रक ड्राइवरों, नर्सों और शिक्षकों तक संघर्ष में शामिल हुए थे।विरोध प्रदर्शनों में ट्रेड यूनियन की मांगें उठाई गईं, साथ ही कारखानों, शैक्षणिक संस्थानों और बुनियादी शहरी सेवाओं के निजीकरण ,मंहगाई और बेरोजगारी  के खिलाफ मांगों को भी उठाया जा रहा है।
 ईरान में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों की भूमिका-
मध्य पूर्व विशेषकर ईरान , तेल की प्रचुरता के कारण साम्राज्यवादियों का सरगना  अमरीका और अन्य पश्चिमी ताकतों के निशाने पर रहा है।1953 में ईरान की संसद(मजलिस) द्वारा निर्वाचित  देश के 35 वें प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देघ जो की लोकप्रिय थे और साम्राज्यवाद विरोधी भूमिका में थे को अमरीकी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने प्रतिक्रांति के जरिए सत्ता से अपदस्थ कर दिया।मोसद्देग ,ब्रिटिश तेल निगम"एंग्लो अमेरिकन ऑइल कंपनी(AIOC)" के दस्तावेजों का ऑडिट करने जा रहे थे। उनके नेतृत्व में ईरानी संसद मजलिस ने ईरान की तेल संपदा के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में मतदान किया था।ब्रिटेन ने तब ईरान के तेल का विश्व व्यापी बहिष्कार की मुहिम चलाई और ब्रिटिश नियंत्रित "अबादान ऑयल रिफाइनरी" पर प्रभुत्व के लिए ईरान के खिलाफ सैनिक कार्यवाही करने की पहल की थी।ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और अमेरिकी राष्ट्रपति ईसनहावर मिलकर मोसद्देक सरकार को गिराने की लगातार कोशिश कर रहे थे। अंत में सीआईए और ब्रिटिश इंटेलिजेंस एमआई 5 ने मिलकर TPAJAX प्रोजेक्ट के तहत मोसद्देघ का तख्ता पलट किया। सीआईए ने मोसद्देग विरोधी प्रदर्शन करवाए।प्रतिक्रांति के बाद उन्हें सैनिक अदालत ने गिरफ्तार किया और तीन साल की कैद की सजा दी।उनके अधिकांश देशभक्त समर्थकों को या तो जेल में डाला गया या मार डाला गया। प्रतिक्रांति के बाद जनरल फजलुल्लाह जहेदी ने सत्ता शाह रजा पहलवी को सौंप दी।इस तरह प्रजातंत्र का गला घोंट कर साम्राज्यवादी ताकतों ने ईरान में राजतंत्र की स्थापना की।पहलवी वंश के अमरीकी पिट्ठू शाह का निरंकुश शासन छब्बीस वर्ष तक चला।अगस्त 2013 में अमरीकी सरकार ने ईरान में हुई 1953 की प्रतिक्रांति में अपनी भूमिका को स्वीकार किया।अमरीकी सरकार की रिपोर्ट में यह माना गया कि अमेरिकी विदेश नीति के तहत प्रशासन के सर्वोच्च स्तर के आदेश से उस समय सीआईए ने ईरानी राजनीतिज्ञों,सैनिक अधिकारियों को बड़े पैमाने पर घुस दिया और मोसद्देघ विरोधी माहौल बनाने के निमित्त प्रचार प्रसार में पैसा पानी की तरह खर्च किया गया।
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के होने तक शाह रजा पहलवी का शासन एक घोर जनविरोधी तानाशाही जुल्मी दौर था।जहां  पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को  देश को लूटने की खुली छूट दे दी गई और जनसंघर्षों /अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल दिया गया।ईरान के वामपंथी दलों और फिदायीन उल मुल्क जैसे साम्राज्यवाद,सामंतवाद,पूंजीवाद विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को बड़े पैमाने पर मार डाला गया या तेहरान की  बदनाम जेल/यातनागृह सेविन में तड़पने के लिए छोड़ दिया गया ।ये वही जेल"सेविन" है जहां दो दिन पहले भीषण आग लगी थी और कई कैदी मारे गए थे या गंभीर रूप से घायल हुए थे। इनमे ज्यादातर वे कैदी थे जो महजा अमीनी की शहादत के बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
अप्रैल से दिसंबर 1979 के बीच ईरान में  तानाशाह शाह  रजा पहलवी विरोधी संघर्ष  ने जोर पकड़ा और जनता प्रजातंत्र के लिए सड़कों पर उतर आई।इस विद्रोह में कम्युनिस्ट भी सक्रिय थे।यही वह समय था जब निर्वासित धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमेनी यूरोप से निर्वासन से लौट आए और विद्रोह की कमान संभाल ली।शाह विरोधी विद्रोह सफल होने के बाद खोमैनी ने ईरान को इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया,लोगों की जनवादी आकांक्षाओं को कुचल दिया गया और वामपंथी व जनवादी ताकतों का सफाया किया जाने लगा।ईरान के इस्लामिक गणराज्य ने धार्मिक शासन कायम करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खारिज करते हुए लोगों पर विशेषकर महिलाओं पर तमाम किस्म की पाबंदियां लगाईं।यही वह समय था जब सलमान रशदी के उपन्यास "शैतान की आयतें" पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगाकर अयातुल्लाह खोमैनी ने उनका सर काटने का फरमान जारी किया था।इस्लामिक क्रांति के बाद पश्चिमी देशों के साथ ईरान ने अपने रिश्ते खत्म कर दिए।अमेरिका सहित पश्चिमी ताकतों ने राजतंत्र के खात्मे को अपना पराजय माना।अमरीका तब से लेकर आज तक ईरान के खिलाफ आर्थिक और कूटनैतिक प्रतिबंध लगाता रहा है।अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने तेहरान के अमेरिकी दूतावास के बंधक राजनयिकों को छुड़ाने के लिए एयरबोर्न ऑपरेशन करने का प्रयास किया लेकिन  मरुस्थल में फाइटर प्लेन के क्रैश होने के कारण वह असफल हो गया।
अमेरिकी साम्राज्यवाद ने ईरान में अपना आधार खोने के बाद  ईरान पर नियंत्रण कायम करने के लिए मध्य पूर्व में और सहयोगियों को तलाशने का काम शुरू किया।1980 में इराक में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में बाथ सोशलिस्ट पार्टी का शासन मजबूत हो रहा था।सद्दाम को भी मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाना था।सद्दाम सुन्नी बहुल इराक के पक्षधर थे तो ईरान शिया बहुल था।सद्दाम , ईरान की शिया क्रांति से  असुरक्षित महसूस कर रहे थे।ईरान से जब उनकी प्रतिद्वंदिता तेज हो गई तो अमेरिकी साम्राज्यवाद ने  उसी साल छिड़े ईरान-इराक युद्ध में सद्दाम का पक्ष लिया ।ईरान- इराक युद्ध 8 सालों तक चला जिसमें दोनों देशों को नुकसान पहुंचा।लेकिन ईरान ज्यादा क्षतिग्रस्त हुआ।इसके बाद तो दजला और फराद नदियों में बहुत पानी बह गया।सद्दाम के उत्तरोत्तर ताकतवर होने ,कुवैत पर कब्जा करने,अमरीका समेत पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों का कोपभाजन बनने और साम्राज्यवादियों द्वारा सद्दाम हुसैन और इराक को तबाह करने का मंजर दुनिया ने अगले तीस सालों में देखा है।तेल और मध्य पूर्व में अपनी हुकूमत कायम करने के लिए इराक,लीबिया,सीरिया,अफगानिस्तान आदि देशों को कैसे साम्राज्यवाद ने मध्य युग में धकेल दिया इसे पूरी दुनिया ने देखा है।
बराक ओबामा जब  अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु संधि हुआ था और अमरीका समेत पश्चिमी देशों द्वारा ईरान पर लगाए आर्थिक प्रतिबंध को हटाने और ईरान को राहत प्रदान करने की बात हुई थी।मगर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने उस समझौते को रद्द कर दिया और फिर से ईरान को आतंकवादी देश कहना शुरू किया।
एक धारणा जो भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों के बीच यह है कि ईरान में हो रहा हिजाब और धार्मिक पाबंदियों के खिलाफ विद्रोह,पश्चिमी देशों के द्वारा भड़काया जा रहा है।इतना जरूर है कि ईरान में हो रहे प्रदर्शनों का समाचार पश्चिमी मीडिया अपने हितों के लिए अच्छी तरह प्रचारित कर रही है लेकिन यह सोचना कि सब कुछ अमेरिका करवा रहा है वास्तविकता से मुंह मोड़ना है।अगर आंदोलन में व्यापक जनता जिसमें आक्रोशित महिलाएं अगुआई कर रही हैं शामिल नहीं होती तो विद्रोह इतने बड़े जंगल के आग की तरह नहीं फैलता और इतने दिनों तक नहीं टिकता।

भारत के संघी फासीवादी ताकतों की भूमिका-
भारत के साथ ईरान के दोस्ताना संबंध रहे हैं।संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान व अमेरिका के लाए प्रस्ताव के खिलाफ ईरान ने हमेशा भारत का साथ दिया है। चाबहार बंदरगाह और ईरान भारत तेल पाइप लाइन पर ईरान से हुए समझौते के बावजूद ,अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव में फासिस्ट मोदी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ में ईरान का समर्थन नहीं किया , न ही उससे तेल खरीदा और न ही अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ  अन्यायपूर्ण कार्रवाई का ये कभी विरोध करती है।
ईरान के हिजाब विरोधी और महिला अधिकारों के लिए हो रहे प्रदर्शनों से भारत का फासिस्ट संघ परिवार और कॉरपोरेट  गोदी मीडिया,हिजाब पर प्रतिबंध लगाने की उनकी अल्पसंख्यक विरोधी मुहिम के लिए मुफीद मान रहे हैं।लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि ईरान के महिलाओं और आम जनता का आंदोलन , धार्मिक कट्टरपंथ व फासीवाद के खिलाफ है तथा औरतों के पक्ष में समानाधिकार और आजादी का आंदोलन है।इस आंदोलन से यह ध्वनि उभरी है कि महिलाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे क्या पहने,क्या खाएं और अपना जीवन कैसे बिताएं।इस लिहाज़ से साम्राज्यवाद के जूनियर पार्टनर और भारतीय जनता के दुश्मन नंबर एक संघी मनुवादी फासिस्ट ताकतों को महिलाओं के बारे में कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है।क्योंकि सबसे बड़े महिला विरोधी और महिलाओं के खिलाफ यौन अत्याचारों में शीर्ष पर रहने वाले आरएसएस,भाजपा के नेता , संघी गुंडे/दंगाई और इनके घनिष्ठ मित्र बलात्कारी हत्यारे ढोंगी बाबा राम रहीम ,आशाराम बापू जैसे लोग ही हैं।

अब क्या-
इन संघर्षों से वह शक्ति विकसित हुई जो आज के जन-विद्रोह को देशव्यापी विस्तार देती है, उनको निरंतरता प्रदान करती है और धार्मिक पितृसत्तात्मक शासन के खिलाफ उनके प्रतिरोध को निर्देशित करती है।
 
"लोगों  का कहना है कि  बस  अब अति हो गई है!  श्रमिक वर्ग हड़तालें कर रहा है, महिलाएं सड़कों पर हैं, शिक्षक व पेंशनभोगी महीनों से लड़ रहे हैं, । हर कोई गरीबी,बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, भूख और उत्पीड़न से भरे असहनीय जीवन के खिलाफ लड़ रहा है। विरोध स्पष्ट संकेत देते हैं कि कुर्द और ईरान के अन्य सभी  समुदायों के लोग बड़ी एकजुटता के साथ एक साथ खड़े हैं।" ऐसा ईरान की अंतरराष्ट्रीय लड़ाकू महिला आंदोलन की कार्यकर्ता ईरानी जमान मसूदी कहती हैं।
 जीना महसा अमीनी की मौत की खबर को सबसे पहले ईरान की पत्रकार निलोफर हमीदी ने ट्विटर पर उजागर किया था।22सितंबर को पुलिस ने उनके घर छापा मारकर उनके लिखने का सारा सामान जब्त किया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल के तन्हाई सेल में डाल दिया है।उनके वकील मुहम्मद अली ने ट्विटर पर यह जानकारी दी है।
लोग अपना डर ​​खो रहे हैं। हजारों गिरफ्तारियों और अब तक करीब २०० मौतों( जिसमें 19 नाबालिग हैं )के साथ क्रूर दमन और हिंसा के बावजूद, महिलाएं और पुरुष, कार्यकर्ता, युवा लोग,कलाकार,मीडियाकर्मी, विद्यार्थी समुदाय, घृणास्पद धार्मिक तानाशाही  वाले फासीवादी शासन के खिलाफ खड़े हैं। महिलाओं ने , पुलिस थानों, धार्मिक केंद्रों और सार्वजनिक कार्यालयों सार्वजनिक रूप से अपने हिजाब को उतार कर उसे  आग के हवाले कर दिया।साथ ही पुरुष प्रधान समाज द्वारा सौंदर्य  का एक मापदंड  समझे जाने वाले नारी के लंबे बालों को महिलाओं ने सड़कों पर काट कर फेंक दिया। हाल ही में  निका शकरीन ने खुलेआम हिजाब को उतारकर जलाया। उस दिन के बाद से वह लापता थी,दस दिन के बाद उसकी लाश मिली। नीका की मौत की खबर ने विद्रोह को और भड़का दिया।पश्चिम के कुर्द शहर"सानंदाज" में पुलिस गोलीचालन से कई नौजवानों की मौत हो गई। दोनों धार्मिक नेता ,इस्लामिक क्रांति के नेता अयातुल्लाह खोमैनी और वर्तमान के सर्वोच्च धार्मिक नेता रुहेल्ला खोमैनी के चित्र पर प्रदर्शनकारी कालिख पोत रहे हैं,जो अभी तक अविश्वसनीय बात थी।ईरान के  वर्तमान राष्ट्रपति महोदय जब एक कॉलेज में गए तो छात्राओं ने उन्हें "गेट आउट" कहा।ईरान की नारियां पूरी दुनिया के नारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए कह रही हैं कि महिलाओं के बारे में क्या सही क्या गलत है ये वे खुद तय करेंगी।पूंजीवादी,सामंती धार्मिक पितृसत्तात्मक समाज को कोई अधिकार नहीं कि वे ये तय करें की औरतें ये पहनें या ऐसे चलें।
"पितृसत्ता,साम्राज्यवाद,फासीवाद और धार्मिक कट्टरपंथ का नाश हो,ईरान में महिलाओं समेत आम जनता की आजादी,समान अधिकार और सच्चे जनवाद के लिए लड़ाई  जिंदाबाद" नारे के आधार पर  ICOR (कम्युनिस्ट और क्रांतिकारी संगठनों का अंतरराष्ट्रीय मंच) में शामिल चालीस से अधिक देशों(जिनमें भारत भी है)की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टियों और क्रांतिकारी महिला संगठनों ने मिलकर ईरान की विद्रोही जनता को क्रांतिकारी सलाम के रूप में एकजुटता संदेश प्रेषित किया है।
अफगानिस्तान सहित दुनिया के चारों ओर  आधी आबादी द्वारा, " जिन,जियान,आजादी"(नारी, जीवन, स्वतंत्रता) के नारों से आसमान गूंज रहा है ,ईरान में विद्रोही अपने विचारों को छुपाना अपनी शान के खिलाफ समझ रहे हैं ।we खुलकर धार्मिक फासीवादी राजसत्ता,पूंजीवाद/साम्राज्यवाद के खिलाफ सड़कों पर उमड़ रहे हैं। वे सच्चे जनवाद,बराबरी का अधिकार,शोषणहीन समाज और तमाम किस्म के जुल्मों से आजादी चाहते हैं और हकीकत है कि उनके विद्रोह से इस्लामिक धार्मिक शासक कांप रहे हैं, बहुत कुछ वैसा जैसा 1850 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र की भूमिका में कहा गया था।
(लेखक क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच कसम के महासचिव हैं)

Tuesday, 1 November 2022

विभाजन विरोधी मुसलमान

जिन्हें 'गरमदली' वामपंथी समझा जाता है, उनमें दो ऐसे लोग हैं जिनका मैं हृदय से सम्मान करता हूँ। दोनों मेरे आत्मीय मित्र हैं। एक तरुणतर हैं, दूसरे थोड़ा वरिष्ठ। 

संयोग देखिए, दोनों का सम्बंध रंगकर्म से है। एक हैं अनिल शुक्ल जिनका ठिकाना आगरा में है और वे 'रंगलीला' नामसे संस्था चलाते हैं। दूसरे हैं शम्सुल इस्लाम जो दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक रहे हैं और निशांत नाट्यमंच के संस्थापक, संचालक हैं। 

दिल्ली में एक समय नुक्कड़ नाटक के जनक सफ़दर हाशमी और निशांत के संचालक शम्सुल दोनों सक्रिय थे। 

दोनों हम सब के मित्र थे।

अनिल शुक्ल से पहली बार 1974 में मिलना हुआ था। वे मेरे आगरावासी अभिन्न मित्र पीयूष श्रीवास्तव के साथ कुछ बातचीत के लिए दिल्ली आये थे। तब मैं एमए पूर्वार्द्ध में पढ़ रहा था। अनिल और पीयूष बीए/बीएससी के विद्यार्थी थे। दोनों आगरे में रंगकर्म करते थे। 

शम्सुल से मुलाकात भी तभी हुई थी जब मैं एमए में पढ़ता था। वे सत्यवती कॉलेज में इतिहास पढ़ाने लगे थे और तेज़-तर्रार युवा शिक्षक के रूप में लोकप्रिय थे। सत्यवती कॉलेज में मेरे मित्र द्वारिका प्रसाद चरुमित्र थे। इस कारण वहाँ बराबर आना जाना होता था। कॉलेज के प्राचार्य बाँदा साहब से खूब दोस्ती हो गयी थी। शम्सुल से भी बहुत सम्वाद होता था। उनकी अपनी क्रांतिकारी समझ थी जिसके साथ कहीं-कहीं मेरी असहमति थी लेकिन वे निरर्थक विवाद में नहीं उलझते थे, सार्थक बहस से बचते भी नहीं थे। 

आगे चलकर मानबहादुर सिंह की हत्या के खिलाफ लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का एक बड़ा जत्था प्रतिरोध यात्रा लेकर सुल्तानपुर गया तब उसमें निशांत की ओर से शम्सुल और नीलिमा शर्मा जी भी थीं। 

मुझे सबसे प्रभावित करने वाली बात लगी थी, जहाँ संध्या वंदन के रूप में मदिरा के बिना प्रगतिशीलता अधूरी रहती है, वहाँ शम्सुल-नीलिमा जी का इस व्यसन से कुछ भी लेना-देना नहीं था। रात के कवि सम्मेलन में जब कुछ दिल्ली से आये कवि मंच पर खड़े नहीं हो पा रहे थे, कोई-कोई तो खड़े होने की कोशिश करते ही साष्टांग की मुद्रा में धराशायी हो जाते थे, तब लोगबाग कह रहे थे कि ये प्रगतिशील लोग हैं, एक कवि की श्रद्धाजंलि में आये हैं, उस समय शम्सुल-नीलिमा उत्तेजित होने और क्रोध करने की जगह परिस्थितियों को संभालने का काम कर रहे थे!!

शराब पीना नैतिक प्रश्न नहीं है। लेकिन परिस्थिति की मर्यादा का प्रश्न तो है ही। वहाँ हम लोग मानबहादुर जी की हत्या का ग़म ग़लत करने नहीं गये थे। 

आचरण की मर्यादा का सम्बंध दृष्टिकोण की गम्भीरता से है। शम्सुल ने रंगकर्म के साथ-साथ इतिहास का अपना क्षेत्र नहीं छोड़ा। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। आज एक पुस्तक का ज़िक्र करना चाहता हूँ। 

पुस्तक है: भारत-विभाजन विरोधी मुसलमान (देशप्रेमी मुसलमानों की अनकही दास्तान)  

प्रकाशक: फ़रोस
अँग्रेज़ी से अनुवाद: जावेद आलम। 
प्राक्कथन: प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया। 

सच बात तो यह है कि इसपर मुझे एक विस्तृत परिचय लिखना चाहिए था। लेकिन इधर के अनेक उलझावों के कारण यह संभव नहीं हो रहा था। इसलिए लगा कि केवल सूचना डाल देना भी आवश्यक है। यह विषय जिस शोध और तटस्थता की माँग करता है, वह इतिहासकार शम्सुल में भरपूर है। 

आपको जानकर अचंभा होगा कि जहाँ सावरकर और गोलवलकर हिन्दू पक्ष की ओर से इक़बाल और जिन्नाह की भूमिका निभा रहे थे, वहीँ अल्लाह बख़्श के नेतृत्व में मुसलमान अलगाववाद के खिलाफ जंग लड़ रहे थे। हम न अभी 1857 की बात कर रहे हैं, न उन शायरों की बात कर रहे हैं जिन्होने साहित्य की महान परम्पराओं का निर्वाह करते हुए बँटबारे का विरोध किया--1947 के पहले भी, 1947 के बाद भी!

जिनकी रुचि नफ़रती प्रचार में न होकर सच्चाई में है, उनके लिए इस समस्या पर  दो पुस्तकें अनिवार्य हैं। एक शम्सुल की 'भारत-विभाजन विरोधी मुसलमान' और दूसरी कर्मेन्दु शशिर की 'भारतीय मुसलमान'। कर्मेन्दु जी की पुस्तक का उपयोग मैंने 'संगीत कविता हिंदी और मुग़ल बादशाह' में प्रचुरता से किया है। शम्सुल की पुस्तक का उल्लेख टालता जाता था। आज भी उसका केवल ज़िक्र भर कर रहा हूँ। लिखने की इच्छा बाद में पूरी करूँगा। 

सबसे पहले केवल उन नामों को देखिए जिन्होंने विभाजन का निरंतर विरोध किया: शिबली नोमानी, हसरत मोहानी, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान, मुख्तार अहमद अंसारी, शौकतुल्ला अंसारी, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान, सैयद अब्दुल्ला बरेलवी, अब्दुल मजीद ख़्वाजा। 

ये सभी लोग'अल्पसंख्यक कार्ड' क़विरोधी थे। साथ ही, उर्दू नवजागरण की खिल्ली उड़ाने वाले इरफ़ान हबीब की दुराग्रही मान्यताओं का जवाब भी इन सब के जीवन से मिलता है। 

कर्मेन्दु जी की तरह शम्सुल की पुस्तक से भी ज्ञात होता है कि आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस न केवल भारत विभाजन के ख़िलाफ़ लड़ रही थी बल्कि वह मुस्लिम लीग से ज़्यादा लोकप्रिय थी। इसीलिए अँग्रेज़ों और लीगियों के षड़यंत्र के तहत अल्लाह बख़्श की हत्या कर दी गयी थी। 

सबसे बुरी बात यह थी कि कॉंग्रेस ने आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से नहीं, अँग्रेज़ों को खुश रखने के लिए मुस्लिम लीग से संधि की! लीग, कॉंग्रेस और अंग्रेजों में समझौते के चलते देश विभाजित हुआ। इस राजनीति को बारीकी से समझने में शम्सुल की पुस्तक बड़ी मददगार है। 

शम्सुल उन प्रवादों का उत्तर हैं जो कहते या सोचते हैं कि कोई मुसलमान सचमुच धर्मनिरपेक्ष होता है या नहीं? वे स्वयं एक सच्चे देशभक्त भारतीय हैं। 

पदावली के उपयोग में शम्सुल बहुत सावधान हैं। वे 'राष्ट्रवादी हिन्दू' और 'राष्ट्रवादी मुसलमान' शब्दों का व्यवहार करने के पक्ष में नहीं हैं। उनके अनुसार, ये दोनों ही सम्पदायिक दृष्टिकोण को स्वीकार करते थे। शम्सुल 'देशप्रेमी मुसलमान 'इस्तेमाल करते हैं। यह मुझे भी ठीक लगता है। 

दो बातों पर गौर करना चाहिए। एक, अधिकांश हिन्दू और अधिकांश मुसलमान बँटवारे के विरोधी थे; दूसरे, विभाजन विरोधी मुसलमानों की तादात कम नहीं थी इसीलिए बहुत से मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए, यहीं रहे। इन्हीं को अब 'हिन्दू राष्ट्र' से खदेड़ने का अभियान चलाया जा रहा है क्योंकि मुसलमानों को उनका देश तो दे दिया गया है! यह कितना बड़ा झूठ है, इसे इतिहास के तथ्यों से ही जाना जा सकता है। मसलन, 1946 में मुस्लिम लीग को जो भारी बहुमत मिलता दिखाया जाता है, वह सीमित मतदान प्रणाली का नतीजा था। इन सब तथ्यों का विस्तृत विवेचन शम्सुल की पुस्तक में है। 

कर्मेन्दु की पुस्तक का दायरा बड़ा है। वह भारतीय मुसलमानों का पूरा विश्लेषण है। वह भी नवजागरण को केंद्र में रखकर। शम्सुल की पुस्तक का ध्यानकेन्द्र भारत के विभाजन में मुसलमानों की वास्तविक भूमिका की खोज है। इस दृष्टि से शम्सुल की पुस्तक आज की राजनीतिक परिस्थितियों के लिए अधिक चुटीली है। 

इसपर विस्तार से लिखने का काम बाक़ी है। मैं तो लिखूँगा ही, दूसरे मित्र भी लिखें तो एक ऐतिहासिक संघर्ष में उनका सहयोग होगा।

शम्सुल की पुस्तकों के लिए लिंक: