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Thursday, 10 November 2022

सच्चिदानंद सिन्हा

क्या सच्चिदानंद सिन्हा का नाम आपने सुना है 

प्रेमकुमार मणि 

मुझे बिहार की कुछ चुनिंदा विभूतियों के प्रति अतीव सम्मान है। उनमें एक हैं सच्चिदानंद सिन्हा। संभव है आप उन्हें जानते हों ; नहीं भी जानते हों। मुझे अधिक विश्वास है कि नयी पीढ़ी उनके बारे में कुछ नहीं जानती। यह मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक है। पिछले साल मैंने चुपचाप छज्जूबाग स्थित सिन्हा लाइब्रेरी में जाकर कुछ समय बिताए। जीर्ण -शीर्ण स्थिति देख कर मन क्षुब्ध हुआ था। आज़ाद भारत की हुकूमतें आई और गईं, सिन्हा लाइब्रेरी की हालत निरंतर बद से बदतर होती चली गई। बिहार को गुंडों -शोहदों के महिमामंडन से फुर्सत मिले तब तो ! 

लेकिन मैं भी तो अवांतर बातें करने लगा। शायद इसका कारण मेरा भावावेग हो। नयी पीढ़ी को पहले पता तो हो कि सच्चिदानंद सिन्हा थे कौन। इसके लिए आवश्यक है कि पहले उनकी संक्षिप्त चर्चा कर ली जाय। 

सिन्हा साहब के नाम से  मशहूर सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म आज ही के दिन यानी 10 नवम्बर को 1871 में मौजूदा बक्सर जिले के कोरान सराय के पास मोरार गाँव में हुआ था, जहाँ उनके पिता की छोटी -सी ज़मींदारी थी। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की और फिर लंदन जाकर बैरिस्टर बने। वहाँ उनके शिक्षकों में सुप्रसिद्ध भारतविद मैक्स मूलर भी थे, जिन्होंने इन्हें अपना नाम शुद्ध लिखना सिखाया। सिन्हा अपना नाम अशुद्ध लिखा करते थे। इसकी चर्चा उन्होंने अपने संस्मरणलेख में की है। भारत लौटने पर उन्होंने पहले कोलकाता ,फिर इलाहाबाद और आखिर में पटना में वकालत की। लेकिन यह तो उनका पेशा था ,जिनसे उनका जीवनयापन होता था। सिन्हा साहब के  दो कार्य मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण है एक राजनीतिक और दूसरा सामाजिक। राजनैतिक तौर पर उन्होंने बिहार को अलग प्रान्त बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई और सामाजिक स्तर पर बिहार में रेनेसां अथवा नवजागरण का सूत्रपात किया। यह उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि बिहार 1912 में बंगाल से पृथक प्रान्त के रूप में अस्तित्व में आया। सिन्हा साहब ही थे जिन्होंने इस तथ्य को समझा था कि बिहार जैसे पिछड़े इलाके दोहरा औपनिवेशिक संकट झेल रहे हैं। पहला तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद  था और दूसरा बंगाली उपनिवेशवाद। ब्रिटिश उपनिवेशवाद तो ऊपर -ऊपर था ,लेकिन यह बंगला उपनिवेशवाद प्रत्यक्ष सीने पर सवार था। हर शहर का नागरिक जीवन बंगालियों की गिरफ्त में था। हर जगह डाक्टर ,वकील ,प्रोफ़ेसर बंगाली ही होते थे। वे बिहारियों से भरपूर नफरत भी करते थे। रेलवे के विस्तार के साथ बंगालियों का भी अखिल भारतीय विस्तार हो गया। कहते हैं सिन्हा साहब जब लंदन से पढाई कर गाँव लौटे और बक्सर रेलवे स्टेशन पर एक रेलवे कांस्टेबल को बंगाल पुलिस का बिल्ला लगाए देखा ,तब क्षुब्ध हुए । उन्होंने लंदन प्रवास में ही ठान लिया था कि बिहार को बंगालियों के चंगुल से मुक्त कराऊंगा। बिहार लौट कर तुरत -फुरत वह अपने काम में लग गए और महेश नारायण जैसे कुछ मित्रों के सहयोग से बिहार की आज़ादी का झंडा बुलंद कर दिया।

बिहारियों का नागरिक जीवन बहुत सुस्त था। जात-पात में उलझे सत्तूखोर बिहारी केवल कमाना- खाना जानते थे। भोन्दू भाव न जाने, पेट भरे सो काम। उनका एक बहुत छोटा हिस्सा ही  शहरी हुआ था, जिसमें मुख्यतः अशरफ़ मुसलमान और श्रीवास्तव कायस्थ थे। ये लोग भी हद दर्जे के काहिल थे। पटना से न कोई अखबार निकलता था, न यहाँ  थियेटर और क्लब या सामाजिक विमर्श की कोई परंपरा थी। साहित्य -संस्कृति के क्षेत्र में भी बिहारियों का पढ़ा -लिखा तबका बंगालियों का पिछलग्गू था। सिन्हा साहब के शब्दों में ' चारों ओर मायूसी थी '। उन्होंने इस कमजोरी को चिन्हित किया। उन्होंने 1894 में  बिहार टाइम्स अख़बार का प्रकाशन शुरू किया। बंगालियों ने इसे बिहारियों का प्रलाप कहा । सिन्हा डिगे नहीं। आगे चल कर उन्होंने इलाहबाद से निकलने वाले कायस्थ समाचार पत्रिका को खरीद लिया और उसे हिंदुस्तान रिव्यू बना दिया। इसी अख़बार के सम्पादकीय में उन्होंने  राजेंद्र बाबू पर टिप्पणी की थी, जब प्रवेशिका परीक्षा में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रथम आकर कमाल का प्रदर्शन किया था। दरअसल सिन्हा साहब ने इसे बिहार के उभरते गौरव के रूप में देखा था। 1907 में अपने मित्र और सहयोगी महेश नारायण के देहांत के बाद वह अकेले हो गए, लेकिन 1911 में अपने साथी सर अली इमाम से मिल कर इन्होने केंद्रीय विधान परिषद् में बिहार का मामला रखने केलिए उत्साहित किया। अली साहब ने सम्राट की घोषणा में बिहार केलिए लेफ्टिनेंट गवर्नर इन कौंसिल की घोषणा कर दी। जैसे ही सम्राट की घोषणा हुई, सिन्हा बच्चों की मानिंद उल्लास से भर गए । दरअसल अपने मित्र से उन्होंने छल किया था। अली इमाम साहब बिहार केलिए लेफ्टिनेंट गवर्नर की घोषणा का ही प्रस्ताव करना चाहते थे। सिन्हा ने जिद की उसे कौंसिल के साथ करवाइये। वह मान गए और अंग्रेज हुक्मरानों, जिनके बगलबच्चे बंगाली भी थे, इस बारीकी पर ध्यान नहीं दे पाए। जैसे ही घोषणा हुई सिन्हा साहब ने अपनी ख़ुशी को प्रदर्शित किया । इमाम को बिहार के निर्माण की बधाई दी। इमाम साहब ने कहा - '  मूर्खता की बातें कर रहे हो। बिहार कैसे बन गया ? '  सिन्हा साहब ने स्पष्ट किया यदि कौंसिल बनेगा तो अलग प्रान्त बनाना  ही होगा। उनकी वकील बुद्धि पर इमाम साहब हैरान हो गए। नाराजगी  प्रदर्शित करते हुए कहा -सिन्हा ,तुमने मेरे साथ छल किया है। अंग्रेज लोगों ने आँख मूँद कर मुझ पर विश्वास किया और मैंने उन्हें धोखा दे दिया। सिन्हा साहब का कहना था ,मैंने जो भी किया अपने बिहार केलिए किया। 

सच्चिदानंद सिन्हा पर लिखने और बोलने केलिए समय चाहिए । मैं रोम -रोम से उनका सम्मान करता हूँ । राजनीति को वह पसंद नहीं करते थे और इसे ऐरू-गैरु -नत्थू खैरु लोगों का शगल कहते थे । वह खयालों में यथास्थितिवादी थे और उनके इस रूप का मैं आलोचक हूं। वह ज़मींदारों के हित के पक्षधर थे। एक वक़्त उन्होंने ज़मींदारों की सभा की सदारत भी की थी । लेकिन व्यक्ति का रूप एकपक्षीय नहीं होता और  पूरी तरह किसी का शफ्फाक होना तो मुश्किल होता है। सिन्हा साहब ने बिहार के निर्माण और यहाँ सामाजिक नवजागरण विकसित करने में जो योगदान किया है उसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए,  उसपर व्यवस्थित काम होना ही चाहिए ।  9 दिसम्बर 1946 को जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो सबसे उम्रदराज सदस्य के नाते सिन्हा साहब को ही इसका अस्थायी अध्यक्ष (सभापति ) बनाया गया । जब संविधान बन गया ,तब उनके हस्ताक्षर केलिए राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में एक दल पटना आया ,क्योंकि सिन्हा साहब दिल्ली जाने में अस्वस्थता के कारण अक्षम थे। पटना में इस वास्ते एक छोटा -सा समारोह हुआ। कहते हैं राष्ट्रगान पर उनका बिहारीपन एकबार फिर मचल उठा। उन्होंने एतराज किया -' इस गान में हमारा बिहार तो है ही नहीं ।'  सिन्हा साहब हिंदी समर्थक भी नहीं थे। वह बिहारी बोलियों को भाषा का दर्जा देना चाहते थे। वह कभी हिंदी नहीं बोलते थे। भोजपुरी उनकी जुबान थी और इस पर उन्हें जरूरत से कुछ ज्यादा गुमान था। अंग्रेजी से फुर्सत मिलने पर वह भोजपुरी ही बोलते थे। भिखारी ठाकुर को पहली दफा नागरिक सम्मान उन्होंने दिया। उनके सम्मान में एक भोज दिया जिसमें पटना के गणमान्य लोग उपस्थित थे ।

लेकिन सबसे बड़ी सेवा उन्होंने शिक्षा जगत को दी। 1924 में पचास हजार रुपए देकर उन्होंने एक लाइब्रेरी स्थापित की जो आज भी सिन्हा लाइब्रेरी के नाम से आख़िरी सांसें ले रहा है। उसी के साथ राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट है। राधिका सिन्हा उनकी पत्नी थीं। 1936 से 1944 तक वह पटना विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। उस समय संभवतः वह बिहार का एकमात्र विश्वविद्यालय था। इस विश्वविद्यालय को ऊंचाइयां देने केलिए उन्होंने सब कुछ किया। उनका कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। इन व्यस्तताओं से समय निकाल कर वह लिख -पढ़ भी लेते थे। कहते हैं वह खूब पढ़ते थे। पढ़ते वक़्त किताब की पसंदीदा पंक्तियों पर लाल -नीली रेखाएं खींचना भूलते नहीं थे। सिन्हा लाइब्रेरी की शायद ही कोई पुस्तक हो जो उनके रेखांकन से बची हुई हो। उन्होंने अपने वक़्त के लोगों पर खूबसूरत संस्मरणात्मक लेख लिखे हैं। कवि इक़बाल पर भी उनकी एक किताब है - ' इक़बाल: द पोएट एंड हिज मैसेज ' ।

सिन्हा साहब ही थे जिन्होंने जाति से जमात की ओर और प्रदेश से देश की ओर का नारा बुलंद किया था। वह कायस्थों की जातिसभा के अध्यक्ष रहे ,लेकिन जाति की कट्टरता को तोड़ते हुए उन्होंने विवाह किया था और इसके लिए उन्हें जातिवहिष्कृत कर दिया गया। इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं थी। राजेंद्र बाबू ने आत्मकथा में लिखा है कि किस तरह मैट्रिक पास करने के बाद सिन्हा साहब का आशीर्वाद लेने केलिए वह पटना आना चाहते थे ,लेकिन इस भय से कि उन्हें भी जातिवहिष्कृत कर दिया जाएगा डर गए थे। आखिरकार बहुत छुपते हुए वह सिन्हा साहब से मिले और चरणस्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया। सिन्हा साहब जब इलाहाबाद में वकालत कर रहे थे ,तब मोतीलाल नेहरू के अभिन्न मित्र थे । दोनों कांग्रेस में साथ -साथ सक्रिय हुए । हालांकि 1920  के बाद सिन्हा साहब दलगत राजनीति से अलग हो गए । इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर इन्होने सत्यसभा की स्थापना में योगदान दिया । यह सत्यसभा ब्रह्मसमाज की तरह का एक सामाजिक मंच था । जिसपर अब तक कोई शोधकार्य नहीं हुआ है । 

मैं समझता हूँ मैंने एक बेतरतीब वृतांत लिख दिया है । इसे संवारने की मुझे  फुरसत नहीं है । मैं अपने मित्रों केलिए इसे छोड़ता हूँ । अभी मुझे बस मित्रों से यही अनुरोध करना है कि सिन्हा साहब के जन्मदिन पर एक छोटा -सा संकल्प लें कि बिहार में एक मुकम्मल नागरिक जीवन बहाल करेंगे ।

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा का उनके जन्मदिन पर सादर नमन।

Premkumar Mani के वाल से साभार ।

Wednesday, 9 November 2022

कुछ शायरी

वो मुझ को टूट के चाहेगा,छोड़ जाएगा !
मुझे ख़बर थी,उसे ये हुनर भी आता है !!

मोहसिन नक़वी !!

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि,हर तक़दीर से पहले !
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है ?
अल्लामा इक़बाल !!

याद ने आकर, यकायक पर्दा खीँचा दूर तक !
में भरी महफिल में बैठा था,कि तन्हा हो गया !! 

सलीम अहमद !!

ये कैसा नशा है,मैं किस अजब खुमार में हूँ।
तू आके,जा भी चुका,मैं इंतज़ारमें हूँ।।

मुनीर नियाज़ी।।

खुजली

आपके साथ कभी ये हुआ है कि आप कुछ ऐसे काम कर रहे हैं, जैसे आटा गूंथना या हाथों से मिट्टी निकालना या कोई भी ऐसा काम जिसमें आपके दोनों हाथ सने हुए हों या फिर आपने ग्लव्स डाल रखे हों और उसी वक्त आपकी नाक में या सर के पीछे या किसी ऐसी जगह खुजली होने लगे जहाँ आप सने हुए हाथ नहीं लगा सकते हों? ये सबके साथ होता है। क्या आपको पता है कि खुजली होती ही क्यों है? इसके कई कारण हो सकते हैं। जैसे कोई एलर्जिक प्रतिक्रिया, या त्वचा का सूखापन या फिर कोई बीमारी। और इसके अलावा ऐसी खुजली जिसका कोई कारण नहीं होता और यह कभी भी कहीं भी हो सकती है। जैसे आपके सर के पीछे, कमर में ऐसी जगह जहां आपका हाथ ही नहीं पहुंच पाए या फिर अभी जो आपके कान के पीछे या दाहिने घुटने पर या फिर कहीं पर एकदम से स्टार्ट हो गई हो क्योंकि अभी हम खुजली की बात कर रहे हैं। (अभी अभी आपने खुजाया भी है। राइट?) 
तो खुजली होती क्यों है? इसके कई स्रोत हो सकते हैं। जैसे मच्छर के काटने से। जब मच्छर हमें खून पीने के लिए काटता है तो यह अपनी लार के साथ कुछ केमिकल हमारी बॉडी में छोड़ता है ताकि इसके खून पीने तक खून का थक्का न बन जाये और खून पीने में आसानी रहे। ये केमिकल जो खून का थक्का बनने (यानी कोएगूलेशन) से रोकते हैं इन्हें एन्टी कोएगूलेंट्स कहते हैं। साथ में ये केमिकल हमारे शरीर के लिए थोड़े से एलर्जिक होते हैं, और इनके हमारे शरीर में घुसने की प्रतिक्रिया में हमारा शरीर एक अन्य केमिकल छोड़ता है जिसका नाम है हिस्टामिन। हिस्टामिन हमारी रक्त केशिकाओं (केशिका यानी केश यानी बाल के समान सूक्ष्म रक्तशिराएँ) को काफी ज्यादा खोल देता है। इससे उस जगह खून का प्रवाह बढ़ जाता है और हमारे शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली इस बाहरी खतरे (यानी एन्टी कोएगूलेंट्स) के खिलाफ सक्रिय हो जाती है। इसी वजह से इस जगह पर छोटी सी सूजन आ जाती है। दूसरा काम हिस्टामिन ये करता है कि इस जगह की उन तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देता है जो खुजली का संदेश दिमाग तक लेकर जाती हैं। और इस तरह से खुजली शुरू हो जाती है। फिर हम जब हाथ से खुजाते हैं तो राहत मिलती है। हमारे इधर कहावत भी है कि जो मजा खाज करने में है वो राज करने में भी नहीं। खैर। खुजाने से ये राहत कैसे मिलती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जो तंत्रिकाएं खुजली का संदेश दिमाग तक लेकर जाती हैं वे असल में दर्द का सिग्नल लेकर जाने वाली तंत्रिकाओं की ही एक कैटेगरी होती हैं। जब हम खुजाते हैं तो एक तरह से हम हल्का दर्द पैदा कर रहे होते हैं जिसकी वजह से दिमाग खुजली के और हल्के सिग्नल से उसी जगह हो रहे हल्के दर्द वाले सिग्नल पर चला जाता है और खुजली से राहत के साथ आनंद की अनुभूति होती है। किसी एलर्जी की स्थिति में या फिर किसी इन्फेक्शन की स्थिति में भी यही हिस्टामिन काम करता है। एक बीमारी होती है स्केबीज। आम भाषा में इसे खाज लगना कहा जाता है। यह itch mite नामक एक परजीवी की वजह से होता है। यह परजीवी मरीज की त्वचा की परतों में फलता फूलता है और अंडे देता है। इस बीमारी में मरीज को भयंकर खुजली होती है। खासतौर पर रात के वक्त। इतनी भयंकर कि मरीज रात भर सो भी नहीं पाता। त्वचा पर इसके निशानों के नीचे यह परजीवी नंगी आंखों से देखा जा सकता है। यह पहली बीमारी है जिसके कारक जीव का पता मनुष्य को सबसे पहले लगा था। यह बहुत तेजी से फैलती है। बिस्तर, कपड़े शेयर करने से और यहां तक कि हाथ मिलाने से भी।
ये हो हुई मच्छर के काटने या फिर किसी एलर्जी या बीमारी की स्थिति में खुजली होने की वजह। लेकिन जो खुजली बिन बात होती है उसका क्या? जैसे अभी अभी आपको भी हुई। इसका कारण वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारे विकास के दौरान हमारी त्वचा का विकास इस तरह से हुआ है कि यह किसी भी स्पर्श के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। जब मानव का विकास हो रहा था तो उसे बड़े खतरों के अलावा जहरीले कीड़े मकोड़ों से भी खतरा होता था क्योंकि तब मनुष्य या मनुष्य के भी पूर्वज प्रजातियों के पास कपड़े भी नहीं होते थे। इसलिए हमारा दिमाग भी उसी तरह से कंडिशन्ड हुआ। कोई कीड़ा शरीर पर रेंगता है तो उसका पता चल जाता है साथ में खुजली भी होती है। जब हम खुजली करते हुए उस जगह पर हाथ चलाते हैं तो वह कीड़ा या कोई ऐसा जहरीला पत्ता या कोई भी हानिकारक चीज हम अपने शरीर से हटा देते हैं। लाखों साल के एवोल्यूशन ने दिमाग को इस तरह से कंडीशन किया है कि ये रक्षात्मक रेस्पॉन्स अपने आप बिना किसी ट्रिगर के भी अक्सर होता रहता है। सोचने से भी और बिना सोचे भी। कभी कभी किसी मरीज में एक साइकोलॉजिकल स्थिति हो जाती है कि उसे लगता है कि उसकी त्वचा पर या फिर त्वचा के नीचे कीड़े मकोड़े रेंग रहे हैं। और इस वजह से वह लगातार खुजाता रहता है। या फिर कभी कभी ये भी होता है कि किसी एक्सीडेंट या बीमारी की वजह से किसी मरीज का कोई अंग काटना पड़ जाता है। और अब उसे लगता है कि उसे उसी अंग में खुजली हो रही है जिसको काट दिया गया था। ये इसलिए होता है क्योंकि अंगभंग का हमारे शरीर के नर्वस सिस्टम यानि तंत्रिका तंत्र पर बहुत बुरा असर पड़ता है, इसलिए दिमाग को यह कंफ्यूजन हो जाता है कि खुजली उस अंग में हो रही है जो कि असल में है ही नहीं। इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अभी और शोध कर रहे हैं। नई नई जानकारियां रोज सामने आ रही हैं। बीमारियों के लिए नई दवाएं भी बनाई जा रही हैं। 
खैर। इमेजिन कीजिए। अगर आपको तीव्र खुजली होने लगे और आप खुजा न पा रहे हों तो आपको कैसा लगेगा? इटालियन कवि दांते एक कविता में नर्क का वर्णन करते हैं। इस नर्क में व्यक्ति को अनन्त काल तक खुजली से परेशान होने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

खाज नर्क भी है। खाज आनंद भी है। खाज बीमारी या बाहरी हानिकारक वस्तु या जीव के प्रति शरीर की प्रतिरोधक क्रिया भी है। और बीमारी का लक्षण भी है। यही इसका डायलेक्टिक है।

नावमीट




मृत्युभोज



मैं डेढ़ साल का था और मेरे पिताजी गुजर गए।समाज के सफेदपोश लोगों ने मिलकर मृत्युभोज किया।मेरी विधवा मां ने दशकों तक कर्ज के बोझ को ढोया।हम दो भाई व एक बहन का पेट भरने के लिए रात में खुद के खेत मे काम करती व दिन में मजदूरी के लिए दूसरों के खेतों में काम करती थी।

बढ़े भाई की पढ़ाई छूट गई।भाई चौदह साल की उम्र में स्टील फैक्ट्री में एक मजदूर बन गया।हम दोनों बहन-भाई स्कूल जाने लगे।अकाल पड़ गया।घर मे कुछ खाने को नहीं था।आस पड़ोस में उम्मीद भरी नजरों से देखा मगर मायूसी मिली।दोनों बहन-भाई ननिहाल उम्मीद लेकर गए थे मगर उनकी हालत भी ज्यादा ठीक नहीं थी।

एक दिन उपवास में कटा व अगले दिन नानी कुछ बाजरी लेकर आई।उस साल अकाल में राशन वितरण हो रहा था मगर एक बोरी धान के 180 रुपये कीमत थी।माँ 2-4 लोगों के पास गई।किसी ने कहा कि जमीन का क्या करेगी तो किसी ने तीसरे को संबोधित करते हुए कहा कि दे तो दें मगर वसूली कौनसे हुड़(भेड़ का नर बच्चा)बेचकर करेंगे।

भाई ने फैक्ट्री में मजदूरी करके घर चलाने का बहुत प्रयास किया मगर मजबूरी में मेरी बहन को स्कूल छोड़नी पड़ गई।संघर्ष करते-करते मेरे परिवार को गांव छोड़ना पड़ा।15 साल बाहर खेती बाड़ी की और सहारा बना एक बनिया परिवार।मैंने शिक्षा को भविष्य समझा और रातदिन एक ही बात सोचता था कि दुबारा परिवार अगर जड़ों पर खड़ा हो सकता है तो सिर्फ मेरी शिक्षा से।

मेरी नौकरी के 2साल बाद परिवार को अपने बाप की जमीन व उनके द्वारा निर्मित घर मे स्थापित कर पाया।

पिताजी के मृत्युभोज पर समाज लूटने के बजाय सहारा बन जाता,खाने के बजाय मददगार बन जाता तो मेरे भाई को पढ़ाई छोड़नी नहीं पड़ती,बहन को पढ़ाई नहीं छोड़नी पड़ती!पूरे परिवार का दर्द व बेबसी के आंसू मेरी कॉपियों में चलने वाली कलम के इर्द-गिर्द मंडराते रहे!कई बार आत्महत्या करने का ख्याल मन मे आया मगर दूसरे ही पल सोचता कि परिवार जिंदा ही मेरी शिक्षा व सफलता की उम्मीदों पर है।नहीं!यह ख्याल लड़ाकों के नहीं होते।इसपर मुझे जीत हासिल करनी है।

जीवन के इस संघर्ष में कई बार ढीठ बनना पड़ता है।

घर मे कई महीनों तड़का नहीं लगता था।
स्कूल में कभी टिफिन साथ लेकर नहीं गया।
माँ के हाथ से सीला बेग लेकर जाता था।
बिना कारी का निक्कर पहनने का अवसर बहुत कम मिला।
बहन के गौने में पहली बार पेंट पहनी थी।
11वीं कक्षा में पहली बार जूता पहना था।

जो लोग आज मृत्युभोज के समर्थक बनकर कह रहे है कि बाप ने तुम्हारे लिए इतना किया तो तुम उनके पीछे मिठाईयां तक नहीं करोगे!उनसे मेरा एक ही सवाल है मेरे बाप की मौत हुई थी उस दिन तक परिवार पर कोई कर्ज नहीं था।उनकी मौत के बाद समाज ने परिवार को कर्ज में धकेला।उसका दर्द तो आपने पढ़ ही लिया होगा?अगर किसी का बाप 5-10 लाख का कर्ज परिवार पर छोड़कर गुजर जाए तो उनके पीछे मृत्युभोज करना चाहिए या मरने पर चौराहे पर पेट्रोल डालकर फूँकना चाहिए?

बहुत कम लिखा है व ज्यादा समझा जाएं।ये भामाशाह,दानदाता जो भजन संध्या लगाते है,मंदिरों पर इंडा चढ़ाने की बोलियां आदि लगाते है उनमे से ज्यादातर बाप या माँ के पीछे मृत्युभोज करके भाई की जमीन पर नजर गड़ाये,गांव के किसी गरीब की जमीन पर कब्जा करने,24%ब्याज गरीबों से वसूली करने वाले गिद्ध निकलेंगे!

आपके एक समय का भोजन व डोडा पोस्त के चार घूंट किसी गरीब के परिवार पर क्या कहर ढहाते है वो इस बच्चे का जीवन तुम्हारी करतूतों का प्रतिबिंब बनकर तुम्हारे भविष्य को आइना दिखाता रहेगा।

प्रेमाराम सियाग


Sunday, 6 November 2022

हीरा डोम की कविता

हीरा डोम की कविता

यह कविता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित 'सरस्वती' (सितंबर 1914, भाग 15, खंड 2, पृष्ठ संख्या 512-513) में प्रकाशित हुई थी। इसे आरंभिक दलित साहित्य का प्रकाशन माना जाता है।

अछूत की शिकायत – हीरा डोम

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेब से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,
बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,
हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे,
बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि ।।१।।
खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।
ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले।
धोतीं जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,
परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले।
मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के,
कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले।
कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब।
डोम तानि हमनी क छुए से डेराले ।।२।।
हमनी के राति दिन मेहत करीजां,
दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि।
ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं,
हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।
हकिमे के लसकरि उतरल बानीं।
जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि।
मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं,
ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि ।।३।।
बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,
ठकुर क लेखे नहिं लउरि चलाइबि।
सहुआ के लेखे नहि डांड़ी हम जोरबजां,
अहिरा के लेखे न कबित्त हम जोरजां,
पबड़ी न बनि के कचहरी में जाइबि ।।४।।
अपने पहसनवा कै पइसा कमादबजां,
घर भर मिलि जुलि बांटि-चोंटि खदबि।
हड़वा मसुदया कै देहियां बभनओं कै बानीं,
ओकरा कै घरे पुजवा होखत बाजे,
ओकरै इलकवा भदलैं जिजमानी।
सगरै इलकवा भइलैं जिजमानी।
हमनी क इनरा के निगिचे न जाइलेजां,
पांके से पिटि-पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलैं,
हमने के एतनी काही के हलकानी ।।५।।

असली_पुरुषोत्तम_चंगेज़_खां

#असली_पुरुषोत्तम_चंगेज़_खां

16 साल की उम्र में चंगेज़ ने बोरते से शादी की लेकिन दुश्मन मेर्किट उनकी पत्नी को उठाकर ले गए, उनकी पत्नी को मेर्किट के बलात्कार से एक संतान हुई जोचि।

कुछ सालों बाद जब चंगेज़ ज़बरदस्त युद्ध जीत कर अपनी पत्नी को वापस लाने जाते हैं, तब ना सिर्फ अपनी पत्नी बोरते को बल्कि उसकी संतान जोचि को भी लेकर आते हैं और अपनी ही संतान सा प्यार, दुलार और सम्मान देते हैं। 

आगे चलकर भी ताउम्र बोरते उनकी महारानी बनी रहतीं हैं और वे जोचि को कईं राज्यों का प्रमुख बनाकर, सौतेला बाप होते हुए भी एक बेहतरीन पिता की भूमिका निभाते हैं। वे अपनी पत्नी के साथ हुए अत्याचार और बलात्कार के लिए उसे न तो दोषी मानते हैं, न अग्निपरीक्षा माँगते हैं और ना ही दुश्मन की संतान से नफ़रत कर पाते हैं, पत्नी से उनके प्रेम पर कोई भी पुरुषवादी घृणा हावी तक न हो पाई।

इस बात में कोई दो राय नही कि चंगेज़ खां बेहद ख़ौफ़नाक लड़ाकू था, लेकिन प्रेम की समझ उसमे हमारे किसी भी मिथकीय मर्यादा पुरुषोत्तम से बहुत अधिक थी। 

इसीलिये जब तक हम दुनिया के बारे में नही जानेंगे, अपनी कपोल कल्पनाओं में विश्वगुरु बने रहेंगे और पूरी दुनिया के सामने हँसी का पात्र और राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानते रहेंगे।


महिषासुर

https://m.thewirehindi.com/article/asur-adiwasi-mahishasur-durga-puja/20014/amp

जिस महिषासुर का दुर्गा ने वध किया उन्हें आदिवासी अपना पूर्वज और भगवान क्यों मानते हैं


महिषासुर का शहादत दिवस झारखंड के सिंहभूम इलाके में भी मनाया जा रहा है. कई जगहों पर महिषासुर पूजे जाते रहे हैं.

इसी सिलसिले में नवरात्र के नवमी पूजन के दिन यानि शुक्रवार को चाकुलिया में आयोजित शहादत दिवस कार्यक्रम में आदिवासी संथाल, भूमिज, कुड़मी के साथ दलित समुदाय के लोग भी शामिल हुए.

महिषासुर को पूजे जाने की खबर झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कई आदिवासी इलाकों से भी मिलती रही है. अलबत्ता बंगाल के काशीपुर में महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगा है.

सखुआपानी गुमला की सुषमा असुर कहती हैं कि उनकी उम्मीदें बढ़ी है कि अब देश के कई हिस्सों में आदिवासी इकट्ठे होकर पुरखों को शिद्दत से याद कर रहे हैं.

झारखंड की राजधानी रांची से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गुमला जिले के सखुआपानी, जोभापाट आदि पहाड़ी इलाके में असुर बसते हैं. इंटर तक पढ़ी सुषमा कथाकार हैं और वे आदिवासी रीति, पंरपरा, संस्कृति को सहेजे रखने के अलावा असुरों के कल्याण व संरक्षण पर काम करती हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में असुरों की आबादी महज 22 हजार 459 है. झारखंड जनजातीय शोध संस्थान के विशेषज्ञों का मानना है कि आदिम जनजातियों में असुर अति पिछड़ी श्रेणी में आते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था न्यूनतम स्तर पर है. असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं.

जगन्नाथपुर कॉलेज में इतिहास विभाग के प्राध्यापक और आदिवासी विषयों के जानकार जगदीश लोहरा का कहना है कि असुरों के अलावा कई और आदिवासी समुदाय भी मानते हैं कि वे लोग महिषासुर के वंशज हैं. इन समुदायों को ये भी जानकारी मिलती रही है कि वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी. इसमें महिषासुर मार दिए गए. कई जगहों पर लोग महिषासुर को राजा भी मानते हैं.

आदिवासी विषयों के एक अन्य जानकार लक्ष्मीनारायण मुंडा के मुताबिक इसे आदिवासी समुदाय द्वारा उनके पुरखों के इतिहास को सामने लाने की कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. क्योंकि कथित तौर पर मिथकों के जरिए एक बड़े तबके की भावनाएं दबाई जाती रही हैं.

छल से मारे गए!

सुषमा असुर कहती हैं कि महिषासुर की याद में नवरात्र की शुरुआत के साथ दशहरा यानि दस दिनों तक वे लोग शोक मनाते हैं.

इस दौरान किसी किस्म की रीति-रस्म या परपंरा का निर्वहन नहीं होता. बड़े-बुजुर्गों के बताए गए नियमों के तहत उस रात एहतियात बरते जाते हैं जब महिषासुर का वध हुआ था. मूर्ति पूजक नहीं हैं, लिहाजा महिषासुर को दिल में रखते हैं.

पिछले साल झारखंड के पंचपरगना इलाके में एक कार्यक्रम में महिषासुर को पूजते लोग.

बकौल सुषमा किताबों में भी पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया, जो हमारे पूर्वज थे. सुषमा का जोर इस बात पर है कि वह कोई युद्ध नहीं था.

वो बताती हैं कि महिषासुर का असली नाम हुडुर दुर्गा था. वह महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे. इसलिए दुर्गा को आगे कर उनकी छल से हत्या कर दी गई.

वाकिफ कराने की चुनौती

इस असुर महिला के मुताबिक आने वाली पीढ़ी को पुरखों के द्वारा बताई गई बातों तथा परंपरा को सहेजे रखने के बारे में जानकारी देने की चुनौती है. कई युवा लिखने-पढ़ने को आगे बढ़े भी, पर पिछली कतार में रहने की वजह से जिंदगी की मुश्किलों के बीच ही वे उलझ जा रहे हैं. वे खुद भी कठिन राहों से गुजरती रही है.

इसी इलाके से मिलन असुर को विश्वास है कि उनके पुरखों का नरसंहार किया गया. इसलिए शोक मनाना लाजिम है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए , जबकि नरसंहारों के विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है.

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गौरतलब है कि साल 2008 में विजयादशमी के मौके पर झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने रांची के मोराबादी मैदान में होने वाले रावण दहन समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि रावण आदिवासियों के पूर्वज हैं. वे उनका दहन नहीं कर सकते.

जबकि पिछले दिनों तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर को 'शहीद' के तौर पर बताए जाने पर काफी नाराजगी जताई थी.

पुरखे-परंपरा के लिए संघर्ष

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति 'अखड़ा' की अगुआ वंदना टेटे कहती हैं कि आप इसे पूर्वज-पंरपरा को याद रखने के तौर पर देख सकते हैं. बेशक आदिवासियों को अपने रूट्स में जाने की जरूरत है, ताकि एक ठोस नतीजे पर पहुंचा जा सके, क्योंकि कई चीजें गुम होती जा रही है और कई विषयों को अलग-अलग तरीके से उनके सामने रखा जाता रहा है.

झारखंड के चाकुलिया में शुक्रवार को महिषासुर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. (फोटो: दिलीप महतो)

बकौल वंदना वे अक्सर असुरों के बीच जाती रही हैं. वाकई में वे लोग महिषासुर को अपना पूर्वज मानते रहे हैं साथ ही कई मौके पर भाषा, संस्कृति, पंरपरा और पुरखौती अधिकारों के लिए सृजनात्मक संघर्ष करने के लिए खड़े होते हैं.

दसाई और काठी नृत्य

उधर झारखंड के चाकुलिया में देशज संस्कृति रक्षा मंच के बैनर तले महिषासुर शहादत दिवस मनाने वालों में कपूर टुडू ऊर्फ कपूर बागी बताते हैं कि दशहरा के मौके पर संथाल समाज के लोग दशकों से नृत्य-गीत के माध्यम से महिषासुर के मारे जाने पर दुख जताते हैं.

इसे दसाई और कांठी नाच कहा जाता है. इन समुदायों में शोक गीत के बोल-' हर रे हय रे हय ओकार नमरे हय, ओकाय नमरे हुदुड़ दर्गी'… लोकप्रिय हैं.

उनका जोर है कि आदिवासियों को विश्वास है कि महिषासुर फिर लौटेंगे, क्योंकि उनके राजा को छल-कपट से मारा गया. रावण वध जैसी पौराणिक घटनाओं को भी मिथकीय रूप दिया जाता रहा है.

रावण दहन क्यों?

सिहंभूम इलाके के कुमारचंद्र मार्डी कहते हैं कि महिषासुर वीर पुरूष थे और छल से ही मारे गए. बुराई पर अच्छाई की जीत बताकर और रावण का पुतला बनाकर जलाये जाने को भी वे लोग सहज तौर पर नहीं लेते, क्योंकि रावण भी हमारे पूर्वज थे.

झारखंड के जोभीपाट नेतरहाट गांव में असुर समाज के लोग बैठक करते हुए. (फोटो: वंदना टेटे)

मार्डी के मुताबिक इस पूरे मामले में बड़ा इतिहास है, जिसे जानने की जरूरत है.मार्डी इस मुहिम को सकारात्मक बताते हैं कि कुड़मी-भूमिज समेत कई समाज-समुदाय के लोग भी इस मसले पर उनका साथ देते रहे हैं.

मार्डी कहते हैं कि अब उत्तर भारत में भी महिसासुर का शहादत दिवस मनाया जाने लगा है.

असलियत पर बहस

देशज संस्कृति रक्षा मंच से ही जुड़े दिलीप महतो बताते हैं कि कुड़मी समाज में इस तरह की परंपरा रही है. वे लोग किसी देवी की पूजा या उत्सव का विरोध नहीं करते, लेकिन जिस तरह से महिषासुर का वध दर्शाया जाता है, वह आहत करता रहा है.

इस बारे में असलियत सामने लाये जाने की जरूरत है. क्योंकि इतिहास को गलत तरीके से दर्शाया जा रहा है. हालांकि इस विषय पर बहसें होती रही है.

इस बीच असुर आदिवासी विजडम डॉक्यूमेटेंशन इनीसियेटिव में खंडवा मध्य प्रदेश की आदिवासी महिला सुंगधी वीडियो के मार्फत यह बताने की कोशिश कर रही हैं वे लोग असुरों की संतान हैं तथा मेघनाद को पूजते हैं.

लिहाजा नस्लीय भेदभाव और इंसानी गरिमा के हनन की कोशिशों के खिलाफ वे आवाज मुखर करना चाहती हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं)