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Monday, 6 February 2023

सर्गेई आइज़ेंस्ताइन की फ़िल्म* ‘ओल्ड ऐण्ड न्यू’ (1929)


यह फ़िल्म सोवियत संघ के देहातों में कृषि के सामूहिकीकरण और मशीनीकरण की मुहिम पर केन्द्रित थी।

व्यापक दर्शकों तक पहुंचने की उम्मीद में, निर्देशक ने समूहों पर जोर देने की अपनी पुरानी प्रथा को छोड़ दिया और एकल ग्रामीण नायिका पर ध्यान केंद्रित किया।

सबसे पहले ईसेनस्टीन ने मुख्य भूमिका के लिए एक पेशेवर अभिनेत्री को काम पर रखने पर विचार किया। लेकिन जब कास्टिंग के दौरान पहला सवाल पूछा गया: "क्या आप गाय का दूध निकाल सकती हैं, हल चला सकती हैं, ट्रैक्टर चला सकती हैं?"  तो सभी ने आत्मविश्वास से "नहीं" जवाब दिया। इसके बाद उन्होंने इस भूमिका के लिए खेतिहर मजदूर मार्था लैपकिना, जिन्होंने कभी फिल्म में अभिनय नहीं किया था, को लेने का फैसला किया। 

100,000,000 किसान - अनपढ़, गरीब, भूखे। एक दिन ऐसा आता है जब एक महिला यह निर्णय लेती है कि वह अब पुरानी जिंदगी नहीं जी सकती। नए सोवियत राज्य और औद्योगिक प्रगति के तरीकों का उपयोग करके वह अपने गाँव के जीवन और श्रम को बदल देती है।

इस फ़िल्म में जब मार्था के पिता की मृत्यु हो जाती है और विरासत का वितरण हो जाता है, तो उसके पास केवल एक गाय और भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा रह जाता है जिसका प्रबंधन करना कठिन होता है। कम से कम न्यूनतम आय अर्जित करने के लिए, वह एक अमीर कुलक से कुछ मदद मांगती है। उसे अपने छोटे से खेत को जोतने के लिए केवल एक घोड़े की जरूरत है। लेकिन कठोर हृदय वाला कुलक उसकी एक भी नहीं सुनता। सरासर निराशा से बाहर, मार्था सोचती है कि क्या एक उन्नत कृषि के अन्य तरीके हो सकते हैं।

एक दिन मार्था में एक क्रांतिकारी जागता है। चार अन्य किसानों के साथ मिलकर, जो समान रूप से अनिश्चितता की स्थिति में हैं, उन्होंने अपना कोलखोज(सामूहिक कृषि प्रणाली) स्थापित किया। बार-बार झटके लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इस सामूहिक कृषि के लाभ सभी शामिल पार्टियों के लिए स्पष्ट होता जाता हैं। सहकारिता प्रभावी कृषि के लिए मॉडल बन जाती है, और बड़ी संख्या में स्थानीय किसान इसमें शामिल होने लगते  हैं। जल्द ही वे खेतों का बेहतर प्रबंधन करने के लिए एक ट्रैक्टर भी ले  सकते हैं। दूसरी ओर, उनके आस-पास के कई लोग, जैसे कि गहरे विश्वासी और पुजारी, बहुत पुराने समय के घिसे-पिटे अवशेषों की तरह प्रतीत होते हैं।

सहकारिता या सामूहिक कृषि के माध्यम से जिस तरह सोवियत रूस में गरीब किसानों का जीवन स्तर सुधारा गया, इस फ़िल्म में इसे ही बहुत बेहतर ढंग से दिखाया गया है। भारत मे किसान समस्या से जूझ रहे हर व्यक्ति को इस फ़िल्म से सबक लेनी चाहिये-पूंजीवादी राज्य नही, सिर्फ सर्वहारा राज्य किसानों को तमाम समस्याओं से निजात दिला सजता है।  

Saturday, 4 February 2023

कॉमरेड सुभाष. पड़ौस की मज़दूर बस्ती में रहते हैं

रु-ब-रु 
 
आप हैं कॉमरेड सुभाष. पड़ौस की मज़दूर बस्ती में रहते हैं. 12 वीं तक पढ़े हैं. पढ़ने में अच्छे थे लेकिन ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद ने आगे पढ़ने की इज़ाज़त नहीं दी. कॉमरेड सुभाष की दिनचर्या सर्दियों में 6 बजे और गर्मियों में 5 बजे शुरू होती है. 

सबसे पहले, वे पड़ौस की एक हाउसिंग सोसायटी में गाड़ियों की सफ़ाई करते हैं. उसके बाद घर के लिए पानी की व्यवस्था करते हैं. पहले वे, उसी सोसिएटी से पानी ले लेते थे, लेकिन फिर उस टटपूंजिया क्लास सोसायटी की टटपूंजिया प्रबंधन कमेटी ने हुक्म सुनाया- सोसायटी का पानी मज़दूरों के निजी इस्तेमाल के लिए नहीं है. एक पानी व्यवसायी, उस झुग्गी में सुबह टैंकर से पानी बेचता है. इसलिए, अब उन्हें पानी की लाइन में लगकर पानी लेना होता है. उसके बाद 9 बजे वे खाना खाते हैं जिसे ब्रेकफास्ट-सह-लंच समझा जाए. उसके बाद वे दो कोठियों में जाकर कपड़े धोते हैं. लगभग 1 बजे, वे सड़क किनारे कपड़े स्त्री करने के ठेले पर, अपने बूढ़े पिताजी के साथ कपड़े स्त्री कर, घर-घर जाकर देकर आते हैं. उनका दिन 8 से 9 बजे के बीच समाप्त होता है. 

कॉमरेड सुभाष ने अपने दिन के काम का पुनर्प्रबंधन किया है. वृहस्पतिवार को गाड़ियाँ साफ़ करने की छुट्टी रहती है. उन्होंने तय किया है कि उस दिन वे 3 घंटे, अपने संगठन, 'क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा' को देंगे. उसके अलावा भी, किसी एक दिन 2 घंटे संगठन के काम को देंगे, लेकिन दिन वे खुद तय करेंगे. साथ ही, किसी भी सामूहिक सांगठनिक मोर्चे-प्रदर्शन में तो वे शामिल रहते ही हैं, भले काम का नुकसान हो. पिछले वृहस्पतिवार को अनखीर लेबर चौक जाते वक़्त उन्होंने अपनी एक दास्ताँ मुझसे शेयर की थी जो मेरे ज़हन में गुद गई. "12 वीं कक्षा में साथ पढ़ने वाले हम 5 दोस्त हैं. आज भी हम मिलते-रहते हैं. वे मुझे बुलाते हैं. पिछले साल हम मिलकर मनाली घूमने गए थे. सबने पांच-पांच हज़ार रुपये जमा किए थे लेकिन उन्होंने मुझसे कहा, तू तीन हज़ार ही दे देना. मैं उसकी वज़ह समझ गया. दो हज़ार रुपये तो बच गए लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा. इसके बाद भी ऐसा ही एक  प्रोग्राम बना लेकिन मैंने मना कर दिया." कॉमरेड सुभाष में मुझे गोर्की के पावेल की छवि नज़र आती है. 

साथियो, समाज की विकास यात्रा में, एक ऐतिहासिक घड़ी आती है, जब धीरे धीरे, थोड़ा-थोड़ा, अपनी गति से बदलता समाज, छलांग लेकर एक नए, उन्नत समाज में बदल जाता है. उस तारीखी वक़्त में अत्याधिक ऊर्जा की दरक़ार होती है. हम सौभाग्यशाली हैं कि हम उस घड़ी में जी रहे हैं. 
अपने संगठन के लिए वक़्त निकालिए.


मिलिंद पञ्हो -प्रेमकुमार मणि

*मिलिंद पञ्हो* 

*प्रेमकुमार मणि* 

*'मिलिंद पञ्हो'*  एक मशहूर बौद्ध ग्रन्थ है,जो पाली भाषा में है। यह दार्शनिक गुत्थियों को सुलझाता है और इसमें भारतीय तर्क शैली का बेजोड़ उदाहरण आप देख सकते हैं।  मिनांदर या मिलिंद हिंदी -यूनानी ( इंडो -ग्रीक ) राजा था, जिसने ईसापूर्व 150 के इर्द -गिर्द भारत के पश्चिमोत्तर इलाके पंजाब  पर शासन  किया था। इनकी राजधानी  शांगल थी,जो आज संभवतः सियालकोट है। हिंदी -यूनानी राजाओं का पूरी तरह  भारतीयकरण हो गया था। मिनांदर ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी और उसने इसके परिष्कार में काफी दिलचस्पी ली थी। वह वाकई सुरुचिसंपन्न और जिज्ञासु विद्वान राजा था। इसका प्रमाण यह किताब 'मिलिंद पञ्हो ' है।  दरअसल यह राजा मिलिंद और  उसके ज़माने के प्रतिनिधि बौद्ध दार्शनिक नागसेन के शास्त्रार्थ का विस्तृत  ब्यौरा है। 

मेरे गुरु भिक्षु जगदीश कश्यप ने इस किताब को ढूंढ़ निकाला था। उन्होंने ही इसका हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया। उनके अनुसार यह किताब पहले संस्कृत या प्राकृत में लिखी गई प्रतीत होती है। क्योंकि इसकी शैली प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत से अधिक मिलती है। कश्यप जी ने इस किताब का एक चीनी रूप भी चीन देश के पिनांग में देखा था, जिसका उन्होंने मूल चीनी से अंग्रेजी अनुवाद किया था। इसका चीनी रूप ' ना -सेन- पिब्कु -किन ' अर्थात ' नागसेन -भिक्षु -सूत्र ' है। 

पुस्तक की तर्क शैली का एक उदाहरण देखिए।

राजा मिलिंद  ने बौद्ध दार्शनिक नागसेन को सादर आमंत्रित किया। राजा ने नागसेन से पूछा - क्या आप मेरे साथ शास्त्रार्थ करेंगे  ? 

नागसेन ने कहा -यदि आप विद्वानों की तरह करोगे तो करूँगा और राजाओं की तरह  करोगे, तो नहीं करूँगा। 

 राजा ने  ने पूछा - विद्वान किस तरह शास्त्रार्थ करते हैं ? 

 नागसेन ने कहा -वे तर्कों से एक दूसरे को लपेटते हैं और एक दूसरे की लपेटन को खोल देते हैं।  वे दूसरे को तर्क से पकड़ लेते हैं और अपने तर्क से दूसरों की पकड़ से मुक्त हो जाते हैं।  वे तर्क करते हैं, दूसरे मत का खंडन करते हैं, लेकिन किसी पर क्रुद्ध नहीं होते।  

-- और राजा लोग कैसे शास्त्रार्थ करते हैं ? ' नागसेन ने पूछा।

--महाराज ! राजाओं की बातों का खंडन करो  तो वे तुरंत क्रुद्ध होते हैं और दंड देते हैं। 

मिलिंद ने नागसेन को वचन दिया कि वह विद्वान की तरह शास्त्रार्थ करेगा।  

राजा बोले 
 - भंते ! मैं पूछता हूँ।
-महाराज !  पूछें ? 
-भंते मैंने पूछ लिया।
-महाराज ! मैंने भी उत्तर दे दिया।
- भंते ! आपने क्या उत्तर दिया ? 
-महाराज आपने क्या पूछा ?

नागसेन ने अनेक विधियों से राजा को बौद्ध दर्शन की सूक्ष्म गुत्थियों को समझाया है। प्रतीत्यसमुत्पाद की व्याख्या देखिए -
-महाराज ! यदि कोई दीया जलाए तो क्या वह रात भर जलता रहेगा ? 
-हाँ ,भंते , रात भर क्यों नहीं जलेगा। 
- महाराज ,रात के प्रथम पहर में दीये की जो लौ थी, क्या वही दूसरे और तीसरे पहर में भी रहती है ?
- नहीं भंते। 
- महाराज तो क्या  प्रथम पहर  और अंतिम पहर का दीया अलग-अलग था ? 
- नहीं भंते, दीया तो एक ही था। 
- महाराज,  इसी तरह हर वस्तु के अस्तित्व के सिलसिले के अंतर्गत एक अवस्था उत्पन्न होती है। फिर उस अवस्था का लय होता है और फिर उस लय होती अवस्था से ही एक और अवस्था उत्पन्न  हो जाती है। और इस तरह निरंतरता का एक प्रवाह जारी रहता है। किसी प्रवाह की दो अवस्थाओं में क्षण भर का भी अंतर नहीं रहता ; क्योंकि एक के लय होते ही दूसरी उतपन्न हो जाती है।  एक जन्म के अंतिम विज्ञान के साथ दूसरे जन्म का प्रथम विज्ञान शुरू हो जाता है।

नागसेन ने द्वंद्वात्मकता की उस स्थिति की बेहतर व्याख्या की है, जिसे सैंकड़ो वर्ष बाद जर्मन दार्शनिक हेगेल ने बताया और जिससे कार्ल मार्क्स प्रभावित हुए। मार्क्स ने हेगेल की व्याख्या को भौतिक आधार दिया। मार्क्स के ही शब्दों में माथे के बल खड़े द्वंद्ववाद को पैरों के बल खड़ा किया।
नागसेन कहीं अधिक स्पष्ट हैं। नाम और रूप के विभेद को स्पष्ट करते हुए वह मिलिंद को कहते हैं-' सभी  स्थूल चीजें  रूप हैं और सभी सूक्ष्म चीजें नाम।

 शंकराचार्य की तरह मिलिंद का भी आग्रह होता है - ' ऐसा क्यों नहीं है केवल नाम ही, या केवल रूप ही जन्म ग्रहण करे? 
नागसेन का जवाब है- ' नाम और रूप एक दूसरे पर आश्रित हैं। एक दूसरे के बिना ठहर नहीं सकते। दोनों एक दूसरे के सापेक्ष हैं। नाम और रूप अलग -अलग रूप में अस्तित्वहीन अर्थात शून्य हैं। दोनों की एक दूसरे पर सापेक्षता ही इन्हे अस्तित्व में लाता है।

 इसी पुस्तक में रथ के उदाहरण वाला प्रसंग भी है ,जिसे दुनिया भर के विद्वान उद्धृत करते हैं। 

नागसेन और दूसरे बौद्ध विद्वानों के अनुसार जगत और चेतना अलग -अलग रूपों में कुछ नहीं,अर्थात शून्य हैं। चेतना है के अस्तित्व को स्वीकारने केलिए जगत या रूप की जरूरत है। इसी तरह बिना चेतना के जगत का कोई मूल्य नहीं है।

' मिलिंद पञ्हो ' भारतीय दर्शन परंपरा के उत्कर्षकाल की एक झलक देता है। इसे पढ़ते -समझते हुए हमें उस दौर का एक आभास होता है जब ग्रीक जनों ,जिन्हे यूनानी या यवन भी कहा जाता है, का भारतीयकरण हो रहा था। उस वक्त हमारी बौद्धिक क्षमता ऊंचाइया छू रही थी। दुनिया भर के लोग हमसे सीखते थे,संवाद करते थे।

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Friday, 3 February 2023

SERGEI M. EISENSTEIN - Biography

Introduction


SERGEI M. EISENSTEIN, whose art sprang from the vortex of the Russian Revolution, is already assured a place among the few great pioneers of cinematography. He was one of the adventurers striving to mould a mechanical means of entertainment—the moving picture

into a dynamic form expressive of a new society in our era of unprecedented scientific investigation and social conflict.

In Eisenstein, the genius of an artist and the fervour of an inspired scholar were united; and his six completed films, though they represent

but a fraction of his creative activity, reveal him as one of the most

important artists of the 20th century.

As a film director, Eisenstein's contribution to the development of

cinema is as distinctive as that of such directors as David Wark Griffith,

Charles Chaplin, Robert Flaherty or Rene Clair. But Eisenstein was

not only a film director. He was a scientist searching for the roots of artistic expression. This led him to the development ofa body of theory relating to the creative process and film aesthetics.

However, since a great part of his research and theoretical work is still unpublished, it is difficult to set Sergei Eisenstein accurately in the

perspective of the short history of his chosen medium. When all his

unpublished work is assembled it is possible that posterity will rank

Eisenstein the scientist and philosopher as high as or even higher than

Eisenstein the film director. Indeed, he may be generally recognized as a universal genius.

Eisenstein the man was no less remarkable than his work. He

appeared to some as a cynical egotist bending everything and everyone.to his own will; others declared with equal conviction that he was the victim of insincere and merciless men. To some people he appeared as the embodiment of the scientific materialist of a communist society; while others saw him as the embodiment of the individualist whose way of thinking was saturated with mysticism and symbolism. He impressed many people who knew him as the most intelligent man

they ever encountered.

This biography is a personal portrait of Eisenstein. It relates the man to his work and attempts to answer the many questions asked about him. The basic material used in this book was given me by Eisenstein himself between 1932 and 1935. He dictated some of the material to me, particularly that relating to America and Mexico. Other material concerning his ideas and his life I noted down at his request, and a great

residue remained imprinted on my memory.

When I began to write this biography, a few people said that the

greatest service I could render to the art of film, and to Eisenstein,

would be to record his work as an artist and theoretician. These people

feared that the stature of Eisenstein and the film medium would be

lessened if the more difficult and complex aspects of his life were

included. They thought that many details of his life should not be fully

revealed at this time.

However, I felt that such an approach would do Eisenstein an

injustice for it would serve to perpetuate the legend of a confusing

personality whose life has been surrounded by exaggerated stories and

innuendo. Because I had a deep respect for Eisenstein as a person, I decided that I would not evade the more difficult and complex aspects

of his character.

I have, therefore, attempted to explain his personal conflicts as he

explained them to me. If at times the personal aspects are detailed to a point where some might call it indiscretion, my answer is that the

understanding of a great artist as a human being is more important than

the creation of a formal record of his achievement. It is for this reason

that I have omitted only those things which might injure people who

are still living, or those tilings of such an entirely personal exchange of

thought and feeling that they would have no meaning except to those

people intimately involved.

Other biographers may interpret Eisenstein differently from myself.

They may have access to some material which is not yet available and

they may stress other aspects of his life and work. But, if Eisenstein and

his work are to be fully understood, it would seem that a personal

portrait, such as I have presented, has its place.

The psychoanalyst, Eduard Hitschman, recently said 'To under-

stand [character] by tracing it back to inborn instincts and their trans- formation by the ego, and the influence of parents and early events in

life, is legitimate and scientific characterology which is the most

important part of biography.'

It is my hope that in the future there will be other studies of Eisenstein

so that ultimately a just estimate can be reached of one of the most brilliant and profoundly interesting figures of the first half of our century—a man spanning two social and political systems; an artist rushing forward to the future; a genius whose aim was to make him-self a worthy member of a new society and serve generations of artists as yet unborn.


MARIE SETON

Thursday, 2 February 2023

यूएसएसआर में छात्रायें

यूएसएसआर में, लड़कियों को सिर्फ पढ़ाया ही नहीं गया उन्हें रूढ़िवाद से छुटकारा - पाने में मदद की गई और ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में खुद को आजमाने से नहीं डरती। 1920 के अंत तक, महिलाओं ने मेडिकल छात्रों का आधा गठन किया, 1930 के अंत तक, तकनीकी स्कूलों का आधा हिस्सा, 1960 के मध्य तक, गणित के आधे छात्र और अधिकांश जीव विज्ञान के छात्र। 1963 में नोवोसिबिर्स्क में आयोजित एक अध्ययन से पता चला कि लड़कियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ अपने जीवन को जोड़ने का सपना देखा, जिसमें मुख्य रूप से गणित, चिकित्सा, रसायनशास्त्र और भौतिकी को प्राथमिकता दी थी। शिक्षा ने कौशल के विकास का मार्ग प्रशस्त किया: 1930 से 1970 तक, प्रबंधन कर्मचारियों में महिलाओं का हिस्सा चौगुना हो गया है।

Wednesday, 1 February 2023

भारतीय समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था

परम्परागत जातिवाद का राजनीतिक इस्तेमाल
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मंथन अंक: 31  आर्थिक, राजनीतिक, समाजिक मुद्दें ।
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लेखक : कमला प्रसाद (वाराणसी) जुलाई 2021 
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भारतीय समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था प्राचीन काल से चली आ रही है। इसकी उत्पत्ति के बारे में एक दृष्टिकोण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की उसी ने मनुष्यों और उनमें वर्णो या जातियों को बनाया, अतः यह अनादि है। जबकि हमें प्रारम्भिक शिक्षा में ही पढ़ाया जाता है कि मनुष्य के शरीर के विकास फिर उसके एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होने में हजारों साल लग गये। फिर उसके हजारों सालों के बाद मानव समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ। अतः यह कहना गलत है कि वर्ण या जाति व्यवस्था अनादि है।

वर्ण व्यवस्था के बारे में भारत के प्राचीन धर्म ग्रन्थ ऋग्वेद में रंगों के आधार पर वर्णों का उल्लेख है। जिसमें आर्यों को गौर वर्ण एवं अनार्यों को काले वर्ण या रंगों वाला कहा गया है। उसी ग्रन्थ में आर्यों द्वारा अनार्यों के प्रति घृणा व वैमनस्य का भी उल्लेख मिलता है। उन्हें वह दस्यु या राक्षस आदि नामों से भी सम्बोधित करते थे। तथा इन्द्र के द्वारा दस्युओं या राक्षसों को युद्धों में मार डालने उनके नाश कर देने की कामना करते थे। इस प्रकार युद्धों में पहले वह अनार्य शत्रुओं को मार डालते थे किन्तु कालान्तर में कृषि एवं पशुपालन का विकास होने पर अधिक श्रम की जरूरत महसूस होने पर आर्य लोग उन्हें दास बनाने लगे। ऋग्वेद में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य, चर्मकार, कृषक, रथकार, बुनकर दास व दासियों का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्यों में एक सामाजिक विभाजन उनके श्रम विभाजन पर आधारित था। यद्यपि शुरूआती दौर में यह स्पष्ट श्रम विभाजन नही था. एक पेशे का काम करने वाले दूसरे पेशे का भी काम कर सकते थे किन्तु जैसे- जैसे खेतियों का विकास तथा उससे सम्बन्धित उद्योगों का विकास शुरू हुआ तो उस पर आधारित तरह तरह के पेशे विकसित होने लगे।

भारत की विशाल समतल एवं उपजाऊ जमीन सिंचाई के लिये नदियों की अधिकता तथा प्राकृतिक वर्षा • उपलब्ध होने के कारण आर्य लोगों ने खेती एवं पशुपालन को जीवन यापन का मुख्य पेशा बना लिया। जिसके कारण उनका जीवन स्थायी हुआ और वह ग्रामों में बसने लगे। चूंकि आर्यों में पेशे के आधार पर सामाजिक जीवन पहले से मौजूद था, इसके अलावा युद्धों अथवा जुए में हारे हुये अनार्य लोगों को उन्होंने अपना दास या गुलाम बना लिया था जो कि उनके लिये सेवा का काम करते थे अतः कालान्तर में एक स्थायी जीवन प्रणाली होने के कारण एक पेशे में लगे हुए लोगों के बच्चे भी उसी पेशे में कुशल होने लगे और धीरे धीरे पेशों का बंटवारा पुश्तैनी हो गया जिसमें किसी व्यक्ति का पेशा उसके जन्म लेते ही तय हो जाता था।

पहले अनार्य कबीलों से आर्यों को कृषि कार्य के फैलाव हेतु युद्ध लड़ना पड़ता था इसी से शत्रुता के चलते आर्य उनसे घृणा करते थे फिर जब उन्हें गुलाम बनाकर सेवा के कार्य लेने लगे तो शत्रुतापूर्ण घृणा में कुछ कमी आई परन्तु युद्ध में विजयी होने के चलते स्वयं को उच्च और हारे अनार्यों को अपने से निम्न या नीचा मानने लग गये। साथ ही साथ आर्यों की उच्च स्थिति एवं अनार्य दस्यु या दासों की निम्न स्थिति के चलते अनार्य दासों के द्वारा किये गये उत्पादनों का संग्रह दासों के पास नही बल्कि आर्य मालिकों के पास होता था। चूंकि काले वर्ण वाले अनार्य दास या गुलामों से वह परिश्रम या सेवा के कार्य लेते थे और गौर वर्ण वाले आर्य स्वयं काम नहीं करते थे तथा दास या गुलाम होने के कारण वह काले अनार्यों से शत्रुता के चलते घृणा करते थे अतः धीरे धीरे कालान्तर में श्रम या पेशा का निर्धारण जन्मजात पुश्तैनी रूप से तय हो जाने से वर्ण शब्द जाति का द्योतक हो गया तथा विभिन्न प्रकार के पेशों में लग कर श्रम करने वाले पेशों या जातियों को श्रम न करने वाले आर्य वर्णों या जातियों के द्वारा नीच एवं घृणित माना जाने लगा। अतः धीरे-धीरे श्रम करना नीचता एवं श्रम न करना उच्चता का द्योतक हो गया तथा वर्ण शब्द वर्ग का द्योतक हो गया।

इस तरह आर्यों एवं अनार्यों के बीच ऊंच नीच का एक वर्ग विभाजन स्थापित होने लगा। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण कबीले की भलाई के लिये, देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिये मंत्रों का उच्चारण करते थे तथा क्षत्रिय (क्षेत्रपति) कबीले की रक्षा सुरक्षा का जो काम करते थे उसके बदले में पेशा करने वाले कमकर लोग उन्हें अपने उत्पादन का एक हिस्सा शुल्क (बलि) के रूप में दिया करते थे। इससे भी ब्राहमणों एवं क्षत्रियों के पास कमकर वर्णों या वर्गों की तुलना में अतिरिक्त धन इकट्ठा होने लगा। यह आर्यों में वर्ग विभाजन का द्योतक है। कालान्तर में धीरे-धीरे यही वर्ण या वर्ग व्यवस्था एक सामाजिक बंटवारे के रूप में स्थापित हो गयी जिसमें ब्राह्मण का काम शिक्षा देना, पूजा पाठ आदि करना या क्षत्रिय का काम रक्षा करना प्रबन्ध करना आदि तथा वैश्य का काम व्यापार आदि करना तथा विभिन्न प्रकार के कमकर पेशे में लगे हुये लोगों को शूद्र कहा गया। शूदों का काम ऊपर के इन्ही तीनों वर्णों की सेवा करना था। जो उच्च वर्ण के लोग थे ज्यादातर उत्पादन के साधनों जैसे खेतियां, पशुपालन आदि पर उन्हीं का मालिकाना होता था और शूद वर्ग के लोग उनके इन्हीं उत्पादन के साधनों पर मजदूरी करके, कृषि सम्बन्धी कार्यों में लग कर अथवा सेवा के अन्य पेशों में लगकर अपना जीवन यापन करते थे। चूंकि शूद्रों के पास इन्हीं तीनों उच्च वर्णों की सेवा के लिए श्रम करने के अलावा जीवन यापन का कोई अन्य साधन नहीं होता था और निर्धनता के चलते उन्हें मैला उठाना, मरे हुये जानवरों को हटाना, व उनका मांस खाना, जूठा साफ करना व खाना, जूते बनाना आदि जैसे निम्न, गंदा व घृणित काम भी करना पड़ता था। अतः ऊपर के तीनों उच्च वर्ग के लोग नीचे के शूद्र वर्ण के लोगों से, जो कालान्तर में पेशी के आधार पर विभिन्न छोटी जातियों में विभाजित हो गये थे, उन्हें नीच एवं गन्दा मानकर उनसे घृणा करते थे और उनसे छुआछूत का भेदभाव करने लगे। चूंकि ब्राहमण का पेशा शिक्षा देना, क्षत्रिय का पेशा रक्षा करना तथा वैश्य का पेशा व्यापार करना था इसलिए इन वर्णों में पेशों के आधार पर ज्यादा विभाजन या उपविभाजन नहीं हुआ और पूरे वर्ण विभाजन की व्यवस्था में उनकी उच्चता बरकरार रही जबकि शूद वर्ण में बहुत से पेशे जैसे हल चलाना, जानवरों की देखभाल करना, खेतियों में प्रयोग होने वाले लोहे के औजार बनाना, लकड़ी का काम मिट्टी के बर्तन बनाना, बाल काटना, कपड़े धोना, जूते बनाना या चमड़े़ के अन्य काम मरे हुए जानवरों को हटाना, सफाई करना, पालकी ढोना, कुटाई पिसाई आदि ऐसे तमाम पेशे थे जिनके आधार पर शूद्र वर्ण में बहुत सी जातियां उपजातियां बनती गयी और पीढ़ी दर पीढ़ी उसी काम में दक्षता होने की वजह से उनके बच्चे भी उसी काम में लगते गये। इस प्रकार से पेशों के आधार पर जातियां उपजातियां बनती गयी। जिसमें घृणित एवं गंदा काम जैसे- मैला उठाना, मरे पशुओं को हटाना, जूते व चमड़े का काम, सफाई का काम आदि ऐसे बहुत से काम करने वालों को उच्च वर्ण के लोग अपने से नीच मानने लग गये, उनसे घृणा करने लगे, उनसे छुआछूत का भेदभाव रखते हुए उन्हें अछूत जातियां मानने लग गये और उनकी गांव की बस्ती से अलग बस्तियां बन गयी। वर्षों से चले आ रहे इसी जातीय भेदभाव को परम्परागत जातिवाद कहा जाता है।

अंग्रेजों के आने के बाद से जैसे-जैसे पूंजीवाद का विकास होने लगा उसे अपने औपनिवेशिक शासन की जरूरतों हेतु कल कारखानों में कुशल अकुशल मजदूरों, क्लकों एवं टेक्नीशियनों आदि की जरूरतें महसूस हुई तो उसने इन परम्परागत वर्गों को शिक्षित प्रशिक्षित करने के लिये बिना किसी भेद भाव के शिक्षा की व्यवस्था की। जिसमें छोटी जातियों के लोग भी शिक्षा प्राप्त करके नौकरियों में अफसर क्लर्क, चपरासी आदि शिक्षा में अध्यापक, कल-कारखानों वाणिज्य-व्यापार में मजदूर, सुपरवाइजर, टेक्नीशियन आदि के रूप में भर्ती हुए।
जिससे उनकी आर्थिक स्थितियां पहले से मजबूत हुईं। यद्यपि अंग्रेजों ने यह कार्य भारतीय जनता की सेवा भाव या कल्याण उत्थान के लिये नहीं बल्कि अपने औपनिवेशिक शासन द्वारा भारत की जनता की लूट पाट व शोषण के लिये किया लेकिन उसके इस कार्य से भारत में वर्षों से चली आ रही सामाजिक संरचना में टूटन एवं बदलाव शुरू हुआ। निम्न जातियों का एक बड़ा हिस्सा जो अभी तक केवल जमीन मालिकों की जमीनों से बंधा हुआ दास अर्द्धदास था वह उनसे मुक्त होकर औद्योगिक एवं दिहाड़ी खेतिहर मजदूरों के रूप में उमरा उसके
पेशे बदले, जिससे जाति व्यवस्था पर चोट पहुंची। जातिवाद पर महत्वपूर्ण चोट कम्युनिस्टों द्वारा चलाये गये क्रान्तिकारी आन्दोलनों से पड़ी। उन्होंने मजदूरों किसानों को, जो कि ज्यादातर छोटी जाति के ही होते हैं, पर जमीदारों सामान्तों द्वारा जो शोषण उत्पीड़न किया जा रहा था. उसके विरूद्ध उन्हें गोलबन्द किया। उन्होंने मजदूरियों एवं जमीनों के बटवारे के लिये आन्दोलन किया। इस तरह से कम्युनिष्टों ने जमीनों के बटवारे का मुद्दा खड़ा करके जाति व्यवस्था के प्रमुख आधार जमीनों पर ऊंची जाति के लोगों के मालिकाने पर परिणाम स्वरूप उनकी जातीय उच्चता पर चोट की। आन्दोलनों से दबाव में आकर सरकार के द्वारा जमीनों को पट्टे पर देने की व्यवस्था की गयी तथा मजदूरियां सुनिश्चित की गयी। इससे छोटी जाति के मजदूरों की स्थितियों में सुधार हुआ और वह जमीदारों सामन्तों के आर्थिक सामाजिक चंगुल से काफी हद तक मुक्त हुये। इसके अलावा ज्योतिबा फुले, डा० अम्बेडकर, लोहिया एवं अन्य समाज सुधारकों और राजनीतिज्ञों ने भी सामाजिक सुधारों के आन्दोलन चलाये जिससे परम्परागत जातिवाद पर चोट पहुंची। जमींदारी उन्मूलन के बाद दलित एवं पिछड़ी जातियों में भी कुछ लोग जमीनों के मालिक हुये और उनकी आर्थिक स्थितियां मजबूत हुई। आर्थिक सम्बन्धों के इस बदलाव के चलते परम्परागत जातिवाद में टूटन आयी और छुआछूत का भेदभाव कम हुआ। इस प्रकार जैसे-जैसे पूंजीवाद का विकास हुआ वैसे-वैसे परम्परागत जातिवाद भी कमजोर हआ किन्तु आज भी समाज में जातिवाद का भेदभाव सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं अन्य रूप अभी भी मौजूद हैं।

इन सब के साथ-साथ समाज में एक बड़ा व्यापक बदलाव आया। पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने भारत में अपने व्यापार एवं उद्योगों के विकास के लिये मालों की ढुलाई एवं आवागमन हेतु देश में रेलवे लाइनें बिछाई, सड़कें बनवाई तथा नये नये उद्योगों धन्धों की स्थापना की। जिसके फलस्वरूप पैसे पूंजी का प्रचलन और बढ़ा तथा एक नया वर्ग, उद्योगपतियों एवं व्यापारियों का वर्ग उभरा जिसके पास मुनाफा कमाने से धीरे-धीरे उसके हाथों में पैसे पूंजी का संकेन्द्रण बढ़ता गया और वह पूंजीपति बनता गया। वर्ण व्यवस्था की दृष्टि से इस पूंजीपति वर्ग में अब तक उच्च माने जाने वाले ब्राह्मण एवं क्षत्रियों की संख्या कम है जबकि वर्ण व्यवस्था की श्रेष्ठता के क्रम में तीसरे नम्बर पर आने वाले वैश्यों की संख्या अधिक है। यही पूंजीपति वर्ग उस समय अंग्रेजों के साथ मिलकर उद्योगों व्यापारों के माध्यम से मुनाफा लूटता रहा और आज साम्राज्यी देशों के पूंजीपतियों के साथ मिलकर अपनी उस मुनाफा लूटने की व्यवस्था का विश्वव्यापी साम्राज्य बना लिया है। उस समय केवल देशी पूंजीपति अंग्रेजों से मिलकर देश को लूटते थे अब देशी और विदेशी पूंजीपति दोनों मिलकर मुनाफा लूटने की विश्वव्यापी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बनाये हुये हैं जिसमें हर जाति, हर धर्म के लोग पूंजीवाद सामाज्यवाद की लूट एवं शोषण का शिकार होते हैं। लूट एवं शोषण में वह जाति धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। अपने इसी पैसे पूंजी की बदौलत यह पूंजीपति अपने प्रचार तन्त्रों के माध्यम टेलीविजन, अखबार, बिकाऊ पत्रकारों विद्वानों आदि के द्वारा राजनीतिक पार्टियों के पक्ष अथवा विपक्ष में जनमत तैयार करता रहता है तथा चुनावों में चन्दे देकर उन्हें जिताने का काम करता रहता है और इसके द्वारा कभी इस राजनीतिक दल की और कभी उस राजनीतिक दल की सरकारें बनाते बिगाड़ते रहते हैं। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, वह उन्हीं का काम करती है, और उन्हीं के हित में नीतियां बनाती है। परिणाम स्वरूप आज देश की लगभग 73 प्रतिशत सम्पत्ति इन्हीं 1 प्रतिशत पूंजीपतियों-धन्नादों के हाथों में है।

अब अगली बात, अंग्रेजों के शासन के बाद भारत में तथाकथित लोकतन्त्र की बहुदलीय शासन प्रणाली स्थापित हुई। जिसमें चुनाव के माध्यम से बहुमत प्राप्त दल अपनी सरकार बनाता है। इस लोकतंत्र की स्थापना के साथ यह भी प्रचारित किया जाने लगा कि अब जनता का राज आ गया है, ऊंचनीच सभी बराबर हैं. देश में अब गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी नहीं रहेगी सबका जमीनों पर न्यायपूर्ण बंटवारा होगा। जिसके लिये सीलिंग एक्ट भी ले आये लेकिन वह पूर्णतः लागू नहीं हो पाया। दलितों के लिये और पिछड़ों के लिये शिक्षा में नौकरियों में संसद, विधान सभा, जिला पंचायत, ग्राम पंचायत चुनावों में आरक्षण लागू किया जो कि संसद, विधान सभा, जिला पंचायत, ग्राम पंचायत चुनावों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में आज भी पूरा नहीं हो पाया। गरीबी दूर करने का नारा दिया लेकिन 1970 के दशक तक सरकार गरीब निर्धन जनता की गरीबी महंगाई, बेरोजगारी आदि दूर
नहीं कर पाई और इन्हें दूर करने के उसके सारे दावे वादे असफल होते गये। आम जनता में भी यह धारणा बैठती गयी कि राजनीतिक पार्टियां उनकी गरीबी महंगाई बेरोजगारी जैसी आर्थिक समस्याओं को दूर नहीं कर सकती। अतः शासन सत्ता में बने रहने के लिये, चुनाव में बहुमत प्राप्त कर अपनी सरकार बनाने के लिये राजनीति में जाति, धर्म, भाषा एवं इलाका का राजनीतिक इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। क्योंकि समाज में परम्परागत जातिवाद अपने किन्हीं न किन्हीं रूपों में पहले से ही मौजूद है इसलिये राजनीतिक पार्टियों को जातिवाद का इस्तेमाल करने का आसान आधार मिल जाता है। इसके लिये राजनीतिक पार्टियों दलितों के उत्थान कल्याण की बातें इसलिये भी करती है कि आबादी के लिहाज से उनकी संख्या ज्यादा है और वह उनके लिये बहुत बड़ा वोट बैंक है, अतः उन्होंने जातिवादी, धर्मवादी मुद्दों को आगे कर दिया।

जातिवाद का राजनीतिक इस्तेमाल करने का समाज पर प्रभाव यह पड़ा कि लोग जातीय गुटों में गोलबन्द होने लगे। विभिन्न जातियों के आधार पर राजनीतिक दल बनने लग गये और सरकार के द्वारा जातीय आधार पर दलित एवं पिछड़ी जातियों को आरक्षण दे दिया गया तथा यह भी प्रचारित होने लगा कि 15 प्रतिशत ऊंची जाति के लोगों द्वारा 85 प्रतिशत दलित एवं पिछड़ी जाति के लोगों के हकों पर कब्जा है और इस असमानता को दूर करने के लिये उनको आरक्षण दिया गया है, जिससे कि वे भी समाज की मुख्य धारा में आ सकें। दलितों पिछड़ों में भी यह उम्मीदें पैदा होने लगी कि आरक्षण के द्वारा ही उनकी गरीबी बेरोजगारी दूर हो जायेगी। यद्यपि सरकारी नौकरी के क्षेत्र में अभी तक आरक्षण का पूरा लाभ लोगों को नहीं मिल पाया है जबकि राजनीतिक क्षेत्र, जैसे संसद, विधान सभा व पंचायत चुनावों में लगभग पूरी तरह लागू है।

इसका परिणाम यह हुआ कि दलित एवं पिछड़ी जातियों के लोग आरक्षण को ही विकास का मुख्य मुद्दा मानकर उसके लिये संघर्ष करने लगे और यह मानने लगे कि 15 प्रतिशत उच्च जाति के लोगों द्वारा उनका शोषण किया जा रहा है। जैसा कि चर्चा की जा चुकी है वे पूंजीवाद साम्राज्यवाद को मुख्य दुश्मन न मानकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ही अपनी गरीबी बेरोजगारी का कारण मानने लग गये तथा उनमें ऊंची जाति, छोटी जाति का बैर, वैमनस्य बढ़ता गया। यद्यपि शासन प्रशासन में ऊंची जाति के लोगों की संख्या ज्यादा होती है लेकिन वह शासन प्रशासन में पूंजीवाद की ही सेवा करते हैं।

जातिवाद के राजनीतिक इस्तेमाल का प्रभाव दलित एवं पिछड़ी जातियों में आपस में भी पड़ा। यह प्रचारित किया जाने लगा कि दलित जातियों में चमार जाटव आदि ही आरक्षण का ज्यादा फायदा ले रहे है तथा पिछड़ी जातियों में यादव, कुर्मी आरक्षण का ज्यादा फायदा ले रहे हैं जिससे उनमें फिर दलित, महादलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा का विभाजन हो गया और उनके अलग-अलग जातीय, संगठन तथा राजनैतिक संगठन बनने लग गये। उच्च जातियों के भी अपने जातीय संगठन बनने लग गये। परिणामत: ऊंची जाति-छोटी जाति के आपसी विरोध के साथ उनमें आपस में ही पिछड़ी, अति पिछड़ी एवं दलित, अति दलित के जातीय झगड़े व विद्वेष बिखराव बढ़ने लगे।

इस प्रकार से परम्परागत जातिवाद के साथ साथ एक अलग प्रकार का जातिवाद, राजनीतिक जातिवाद शुरू हो गया। पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों ने इस परम्परागत जातिवाद का इस्तेमाल अपने सत्ता स्वार्थ की पूर्ति के लिये करना शुरू किया। वे पिछड़ी व निम्न जातियों की भलाई. कल्याण, उत्थान व सामाजिक न्याय के वास्ते शिक्षा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण को ही एक प्रमुख मुद्दा मानकर उसे ही चुनावों में जीत के लिये प्रचारित करने लगीं। जैसे- 1969-71 के दौरान खास कर 1967 में विभिन्न प्रान्तों में अपनी पराजय के बाद कांग्रेस ने खुद को पिछड़ी जातियों, दलितों व अल्पसंख्यकों का हिमायती घोषित करना शुरू किया। 

केरल में मुस्लिम धर्मवादी संगठन मुस्लिम लीग तथा इसाई धर्मवादी संगठन केरल कांग्रेस के साथ, एझवा व नैयर जाति के लोगों के संगठनों से चुनावी गठजोड़ बनाया। इसी प्रकार यू०पी० में बसपा व सपा तथा बिहार में जनता दल पिछड़ी व निम्न जातियों, दलितों, अल्पसंख्यकों की मुक्ति एवं कल्याण करने के नाम पर राजनीतिक दल के रूप में खड़े हो गये। दोनों प्रमुख बामपंथी पार्टियां सी.पी.आई. और सी.पी.एम. भी संशोधनवादी सुधारवादी राजनीति के चलते सत्ता स्वार्थ के कारण जातिवादी राजनीति से दूर नहीं हो सकी। केरल में दोनों 1970 से 1982 तक लगातार मुस्लिम लीग व केरल कांग्रेस जैसी धर्मवादी तथा एझवा व नैयर जाति की जातिवादी पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ते रहे व बाममोर्चे की सरकार बनाते रहे। पं० बंगाल की बामपंथी सरकार ने भी पिछड़ी जातियों को फुसलाने के लिये उन्हें 14 प्रतिशत आरक्षण दिया।

इस प्रकार से सभी जातियों को आपस में झगड़ों में फंसा कर पूंजीवाद साम्राज्यवाद निर्वाध रूप से अपनी शोषण एवं लूट की व्यवस्था को बनाये रखता है। जातिवाद, दलितवाद, धर्मवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, नारीवाद एवं पर्यावरण वाद आदि विभिन्न प्रकार के मुद्दों से फंसा उलझाकर उनकी एकता को तोड़ता रहता है जिससे कि मजदूरों किसानों की वर्गीय एकता न खड़ी होने पाये। पूंजीवाद से उत्पन्न समस्याओं जैसे-महंगाई, बेकारी भ्रष्टाचार आदि पर चर्चा न हो इसलिये वह समय-समय पर इस प्रकार के मुद्दे जनता में खड़ा करता रहता है। मौजूदा समाज में हर जाति का नव-मध्यम व उच्च-मध्यम वर्ग इस प्रकार की राजनीति, विचार व्यवहार व पूंजीवादी कला संस्कृति का बहुत बड़ा वाहक है। कृपया ध्यान दें कि जाति, धर्म, भाषा, इलाका की राजनीति किसी राजनीतिक पार्टी की राजनीति नहीं है, बल्कि यह पूंजीवाद साम्राज्यवाद की राजनीति है और जब भी नई आर्थिक नीतियों, डंकल प्रस्ताव की नीतियों के अगले चरण को लागू करने की बात आती है उसी समय जाति, धर्म, भाषा, इलाका कीराजनीति को और तेज कर दिया जाता है और यही मुद्दे चर्चा के केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं। चूंकि सभी बड़े प्रचार प्रसार के माध्यम भी बड़े बड़े पूंजीपतियों के होते हैं अतः वह भी दिन-रात इन्हीं मुद्दों को प्रचारित प्रसारित करते रहते हैं। अतः आज के समय में पूंजीवाद साम्राज्यवाद के द्वारा आम जनता को जाति धर्म, भाषा, इलाका के आधार पर जो बंटवारा करने की राजनीति की जा रही है हमें उसका सचेतन रूप से विरोध करते हुये वर्गीय आधार पर संगठित होने की जरूरत है। 

नोट- जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के लेखन में श्री जी. डी. सिंह (गुर दर्शन सिंह) की पुस्तक जाति (वर्ण) व्यवस्था का सहारा लिया गया है।

लेखक : कमला प्रसाद  (वाराणसी)

11 बेहतरीन नज्मों के साथ

इस महीने की शुरुवात 11 बेहतरीन नज्मों के साथ 

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गणतंत्र दिवस, गणतंत्र दिवस, गणतंत्र दिवस, 
तंत्र है जितना खुंखार, है गण उतना ही विवश.

हैं ढो रहे तंत्र का भार गण ही अपने कंधों पर, 
गण का जीवन तंत्र ने, कर दिया तहस-नहस. 

रोज-रोज मर रहा गण, तिल-तिलकर कब से, 
सुली पर चढ़ाया जा रहा, न जाने किस वजह. 

सुनता रहा है नारा, समाजवाद, लोकतंत्र का, 
पर भोगता रहा जीवन में, गरीबी और दहश. 

चूस रहा तंत्र जोंक बन, खून प्रतिदिन गण का, 
काट दिया जुबां भी, कर सकते न कोई बहस. 

यूं बीत रही है जिंदगी, केंचुए की तरह रेंगती, 
है कैसा यह गणतंत्र, न समझा, इसका सबब. 

हम मेहनत करने वाले हैं, मेहनत करते रहते हैं, 
खा गए सब कुर्सी वाले, हमें नहीं  मिला सुयश.

लूटेरों का है गणतंत्र, लूटेरे ही जश्न मनाते हैं, 
गणतंत्र हमारा खा गई, इन लूटेरों की हवश. 

Ram Ayodhya Singh 

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गरीब दुकानदार का ग्राहक गरीब होता है
कभी उतना गरीब, जितना उसका ग्राहक होता है 
कभी उससे भी गरीब, जितना उसका ग्राहक होता है
कभी ग्राहक कुछ अमीर
कभी दुकानदार कुछ अमीर होता है
कभी पलड़ा कुछ इधर
कभी पलड़ा कुछ उधर होता है

गरीब आदमी का दुकानदार
गरीब से पहले जागता है
क्योंकि वह गरीब आदमी का दुकानदार है 
गरीब के बाद सोता है
क्योंकि वह गरीब आदमी का दुकानदार है

कभी वह आशा लेकर घर से निकलता है
निराशा लेकर घर लौटता है
कभी इसका उल्टा होता है
कभी न वह कुछ लाता है,न ले जाता है

गरीब आदमी के दुकानदार के पास फुरसत होती है
पर वह बार -बार पैसे नहीं गिनता
वह जानता है या तो कल से दस ज्यादा होंगे
या बीस कम

गरीब आदमी का ग्राहक हो या दुकानदार
उधार को लेकर दुविधा में रहता है
कभी ग्राहक पहल करता है
कभी ग्राहक मना करता है
दुकानदार उधार दे देता है

गरीब ग्राहक को प्यारा है अपना दुकानदार
वह सोचता है एक दिन ऐसा आएगा कि
वह इसकी इतनी मदद कर पाएगा
कि इसके सारे दुख- दर्द दूर हो जाएंगे

कभी दुकानदार सोचता है कि जब भी बड़ी दुकान खोलूंगा
इसे हर दिन मुफ्त खिलाऊंगा

सोचना जारी रहता है
कभी दुकानदार सूरज की तरह डूब जाता है 
सुबह हो जाती है फिर भी लौटकर नहीं आता 
कभी ग्राहक चांद की तरह छुप जाता है
पूर्णिमा आ जाती है
तो भी नहीं आता।

Vishnu Nagar 

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माँ की सिफारिश असर लायी,
हरि की बिटिया के लिए नयी किताबे आयीं।

नयी जिम्मेदारियाँ आने लगी हैं
अब बिटिया रानी भी स्कूल जाने लगी हैं।

सबको लगता है वो पढ़ रही है, 
लेकिन वो समझती है कि वो तो उड़ रही है ।

गुड़िया काम में भी हाथ बंटा रही है,
अब हंसिया ले कर खेत तक जा रही है।

ये क्या है? वो कैसे करूँ? ये क्यूँ है? जाने कितने सवाल हैं,
बाउजी की गुड़िया नहीं कोई बवाल है।

बात बात पर अड़ने लगी है, 
मजदूरी की खातिर जमीनदार साहब से भी भिड़ने लगी है।

ये लड़की तो बिगड़ने लगी है,
जरा सी छूट क्या दी सिर चढ़ने लगी है।

कहती है अभी और पढ़ूंगी,
तुम सबके जीवन को बदलूंगी।

इतना सुनते ही भाई बोला झल्लाकर,
बड़ी आयी, चल खाना तैयार कर। 

यूँही दिन गुजरेंगे कुछ कुछ बदलते हुए, 
एक दिन सब कुछ बदलेंगे। 

सोचती हुई गुड़िया बढ़ रही थी,
और माँ दहेज का समान जोड़ रही थी।

पढ़ाई-लिखाई बन्द करा दी गयी थी, 
अब गुड़िया किशन संग ब्याह दी गयी थी।

कमी नहीं है किसी चीज़ की किशन के खानदान में,
लेकिन नजरे टिंकीं है, हरि के पुराने मकान में।

जो खटकती थी कभी मालिकों की आँखों में लहू बनकर,
चूल्हा-चौका सम्भाल रही है किसी की बहू बनकर।

किताबे घोल कर पीने वाली गुड़िया, 
बन गयी बातें सुन कर जीने वाली गुड़िया।

गाली, मार खून पीकर सह लेती है,
अब सारे दुख दर्द खुद से ही कह लेती है।

गुज़ार देती थी हर एक रात आँसुओं में नहा कर,
इच्छायें, ख्वाहिशें, खुशियाँ तो चली थी मायके से ही बहा कर।

माँ, बाप, भाई सब खुश हैं कि नया जीवन गढ़ रही है,
लेकिन उसे लगता है कि अब वो सड़ रही है।

समझ नहीं पा रही है कि वो समय काट रही है या समय उसे काट रहा है,
हर कोई बात बात पर उसे बिगड़ रहा है, डांट रहा है।

ससुराल बढ़ा रहा है अपने अभिमान को,
गुड़िया समेट चुकी है आपने भीतर एक और जान को।

आज फिर इस कामचोर की रोटी जर गयी 
अरी ओ कलमूही कहाँ मर गयी।

सास ने बुलाया गरियाते हुए चिल्लाकर,
आयी माँ जी कहते हुए प्रकट हुई दौड़कर।

इतने में किशन ने मारा धर दी कमर तोड़कर,
अजन्मा बच्चा भी चला गया बिचारी का साथ छोड़कर।

बुरा हो गया हाल रो-रो कर,
साड़ी साफ़ करती रही खून के धब्बे धो-धो कर।

रोशनी का सूरज तो उसके लिए कब का ढल गया था, 
आज बचा-खुचा वज़ूद भी उसका जल गया था।

सब कुछ छोड़ चल दी एक दिन मरने को, 
बहुत कुछ रह गया था तुमसे कहने को।

उसका खत तुमको सुनाती हूँ,
उसकी मौत का जिम्मेदार मैं खुद को भी मानती हूँ। 

हाथ में एक काग़ज़ लिए छुटकी पढ़ रही थी,
गुड़िया को तलाशते हुए उसकी भतीजी खड़ी थी। 

आंख में आंसू थे, आवाज़ फंस रही थी,
लग रहा था कि बाजू में उसकी बुआ हंस रही थी।

बड़ी हिम्मत कर के आगे बोली,
गुड़िया के जज्बातों की पोटली खोली। 

"सवाल बहुत किए मैंने, तुम जवाब बनना,
मैं हिसाब बनती रही, तुम इन्कलाब बनना।"

अंजलि प्रताप 

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खबर  माल  बन  रही  इश्तहार  के पीछे
बखूबी दुकान चल रही अखबार के पीछे

पहले  हुई  पीली  फिर काली  हुई  खबर
अब रह गई  है  सुर्खियां सरकार के पीछे

हालत बिगड़ती ही गई जितनी दवा खाई
धंधा चल रहा इलाज का  बीमार के पीछे

वो  शख्स सियासी है भरी जेब है जिसकी
नौ मूर्ख  पड़े है  तन्हा  समझदार  के पीछे

फिदा हुए जो लोग उसकी शोख अदा पर
बन के  फ़कीर  खड़े  है  गुनहगार के पीछे

यू ही तो भगत सिंह याद आते नहीं "सरल"
कोई सोच महकती है उस किरदार के पीछे
                                
सरल कुमार वर्मा
उन्नाव, यूपी
9695164945

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स्त्री जब प्रेम करती है तो
पृथ्वी अपनी धुरी पर थोड़ा तेज़ घूमने लगती है
स्त्री जब प्रेम करती है तो
यह ब्रह्मांड थोड़ा फैल जाता है
स्त्री जब प्रेम करती है तो
चीटियाँ अपने से दस गुनी बड़ी शक्कर की डली ठेलकर
बिल तक ले जाने में कामयाब हो जाती है

लेकिन जल्द ही ब्रह्मांड फिर सिकुड़ने लगता है
पृथ्वी अपनी धुरी पर सुस्त होने लगती है
चीटियों का कोई जोर अब डली पर नहीं लगता

स्त्री का प्रेम
संबंधों के अंधेरे कुएं में छूट गयी बाल्टी सा डूबने लगता है
स्त्री के हाथ से फिसलने लगता है
उसका इतिहास और उसका भविष्य

यह प्रक्रिया दोहराई जाती है
अनगिनत बार...
फिर भी स्त्री प्रेम करना नहीं छोड़ती
उसका प्रेम दफ़्न होता जाता है
अंधेरे कुएं में
प्रेम के ऊपर प्रेम की परत दर परत इकट्ठा होने लगती है
जैसे इकट्ठा होती है पेड़ से गिरी पत्तियां एक के ऊपर एक सदियों तक...
और बन जाती है ईंधन एक लंबे समय बाद..

ठीक उसी तरह परत दर परत इकट्ठा स्त्री का प्रेम 
एक लंबे अंधेरे समय बाद
बन जाता है बगावत

इसलिए, स्त्री अब महज प्रेम ही नहीं करती
प्रेम को ज़िंदा रखने की ज़िद भी करती है,
इसलिए, स्त्री अब महज प्रेम ही नहीं करती
प्रेम के लिए
दुनिया को सुन्दर बनाने की जद्दोजहद भी करती है....

Manish Azad 

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बेगुनाहों से बेगुनाही का हिसाब मांग रहा है, 
पढ़ने के लिए अनपढ़ों से किताब मांग रहा है.

हक शैतानी का अपना, पूरा कर चुका है वह, 
अब जमाने से संत का खिताब मांग रहा है.

जिसने मुंह भी न खोला अपना बोलने के लिए, 
उसीसे हंगामा करने का जवाब मांग रहा है.

पाप करने में न आई जिन्हें शर्म भी कभी, 
चेहरा छुपाने को वही, नकाब  मांग रहा है.

एतराज है जिन्हें बेटियों की हंसी और खुशी से, 
नहलाने के लिए अब वही तेजाब मांग रहा है.

कहता रहा जो दिन भर, शराब पीना हराम है, 
रात में जाम छलकाने को, शराब मांग रहा है.

खा गया सारी मछलियाँ, जो भी थीं तालाब के, 
मिटी नहीं भूख तो, दूसरा तालाब मांग रहा है.

राम अयोध्या सिंह

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शोषण की निर्बाध व्यवस्था करनी आज ध्वस्त है !
                                     
निजाम उधर मस्त है
अवाम इधर  पस्त है, 
विकास बेटे को पेचिश
उल्टी और दस्त है। 

सम्मान में नहीं खड़ी
मंचों के नीचे भीड़, 
युवा बेरोजगार-बेबस
लगा रहा गश्त है।

मिलेगा इस बार भी
आश्वासन इक नया, 
सरकार तो बस यही
देने में अभ्यस्त है। 

अब के नेता का कद 
पजामे सा हो गया, 
जो कुर्ते का नाप बस
देने में व्यस्त है। 

छिपकली की पूँछ सा
बढ़ न आए अंगूठा, 
इस डर से अबका द्रोण
मांगा पूरा हस्त है। 

तोड़ूँगा पूरी बुनियाद
महलों का गुरुर भी, 
शोषण की निर्बाध व्यवस्था
करनी आज ध्वस्त है। 

बच्चा लाल 'उन्मेष'

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◆ अचानक 

स्त्रियाँ 'अचानक' के लिए अभ्यस्त होती हैं 
अचानक ही हो जाती हैं बड़ी 
अचानक एक दिन छूट जाता है मनपसंद फ्रॉक 
अचानक घूरने लगती है निगाहें 
उनकी छाती और नितंब 
और न जाने क्या क्या 
चलना-बैठना-खड़े होना 
अचानक युद्ध में बदल जाता है 

अचानक उन्हें पता चलता है 
पड़ोस वाले भइया के भीतर एक जानवर रहता है 
और दूर के दादा जी के अंदर भी 
और किसके किसके अंदर जानवर देखा उन्होंने 
कभी किसी को नहीं बता पाईं वे

अचानक उनका भाई बदल जाता है जासूस में 
पिता सरकार में 
माँ हमेशा से निरीह ही रहती है 
अचानक ग़ायब भले हो जाती है 
फ़ैसलों से-बहसों से 

अचानक आ जाती है माहवारी 
अचानक हो जाती हैं अछूत
वह भी उन दिनों जब वे एक देह रच सकती हैं 
जैसे पृथ्वी बना देती है 
एक बीज को बरगद 

अचानक कोई पुरुष उनसे कहता है:
तुम दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री हो 
और अचानक चला जाता है वही पुरुष 
जैसे चला गया हो बादल धरती को छल कर 

अचानक बदल जाती है स्त्रियों की दुनिया 
स्त्रियाँ हर तरह के अचानक के लिए हमेशा तैयार रहती हैं 
और आपको क लगता है 
सिर्फ़ मृत्यु ही आती है अचानक 

कभी किसी स्त्री से नहीं पूछा
क्या क्या आता है अचानक ?

अनुराग अनंत

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मुल्क कबाड़ा बना दिया  
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उल्टा - सीधा  गजब  पहाड़ा  पढ़ा  दिया 
तीन का तेरह किया  , नगाड़ा  बजा  दिया  ।

देशभक्ति का नाटक खेलने वालो ने
देश  को  पूरा  खुला अखाड़ा बना दिया ।

तरह-तरह के तेला - बेला का खेला
असली मुद्दा गोल - गपाड़ा बना दिया ।

गले  में  जनता  के  जनार्दन  का  पट्टा 
कस  के ,  लोगों  को  बेचारा  बना दिया ।

भीतर सब फोंका ,ऊपर-ऊपर बस शोर 
बिठाके  भट्ठा , मुल्क  कबाड़ा  बना  दिया  ।

Aditya Kamal 

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जलाकर शहर  खामोश  घर आके बैठ गए
सपने कुर्सी के आंखो  में  सजा के बैठ गए 

वो  कहते थे शम्स खुद को  नए जमाने का 
 चिंगारी से  डर के  दामन  बचा के बैठ गए

बड़े  ही दरियादिल है कौम भी मुतासिर  है
न जाने कैसे कैसे लिबास सिला के बैठ गए

मोहब्बत चैनो अमन सियासत की तौहीन है
वो  नफ़रत  का इक दरिया बहा के बैठ गए

सब्ज हटाकर  शहर  जाफरानी  बनाना था
और जोशीमठ में बस्तियां हिला के बैठ गए

दिल ऐसा भरा नदी  पहाड़ जंगल से"सरल" 
वो मुल्क में  नखलिस्तान  सजा के  बैठ गए
                                 
सरल कुमार वर्मा
उन्नाव,यूपी 
9695164945
 
शब्दार्थ :                                 
शम्स : सूरज
दरियादिल : खूब खर्च करने वाला
मुतासिर : प्रभावित 
तौहीन :  अपमान
सब्ज : हरा रंग
जाफरानी : केसरिया रंग
नखलिस्तान : रेगिस्तान में जमीन का हरा भरा टुकड़ा जिसमे खजूर के पेड़ लगे हो

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राजा भी नंगा है, जनता बेहाल
                 
बातों ही बातों में बीत गए साल,
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल।
 
सभी तरफ झूठ का बवण्डर है
जाति, धर्म, जड़ता आडम्बर है
बचपन से राष्ट्रगान गा-गाकर
लोकतंत्र सभी तरफ खण्डहर है।

आशा ही आशा में बीत गए साल,
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल।

सभी तरफ फैलती निराशा है
जीवन बस घूमती हताशा है
शोषण, उत्पीड़न से लड़ लड़कर
पीढ़ियां भी बन गई तमाशा है।

सपनों ही सपनों में बीत गए साल
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल

सभी तरफ भारत में हलचल है
दुराचरण, राजनीति, दलदल है
देख देख लूटते खजाने को
वोट, नोट, ताकत का छल-बल है।

वादों-प्रतिवादों में बीत गए साल
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल।

सभी तरफ बाड़़, कुएं, खाई हैं
सत्य के प्रयोग की मनाही है
गांधी के अनुयायी बन बनकर
नफरत की बस्तियां बनाई हैं।

घातों-प्रतिघातों में बीत गए साल
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल।

सभी तरफ मांग पत्र घूम रहे
वैभव, दुष्यंत, सभी झूम रहे
परिवर्तन बार बार ला-लाकर
जनमत को जागरूक बनाना है।

जीत-हार देख देख बीत गए साल
राजा भी नंगा है, जनता बेहाल।

वेदव्यास

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अजय असुर के वाल से साभार