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Tuesday, 14 February 2023

विश्व की दस उत्कृष्ट प्रेम कविताएँ: अनुवाद अरुण कमल


विश्व की दस उत्कृष्ट प्रेम कविताएँ: अनुवाद अरुण कमल

लखनऊ के शायर मीर हसन का एक शेर है- 'कूचा-ए-यार है और दैर है और काबा है / देखिए इश्क़ हमें आह किधर लावेगा.' प्रेम से कविता का बहुत ही नज़दीकी रिश्ता है. शायद ही कोई भाषा हो जिसकी कविता में इश्क के गीत न लिखे गये हों. विश्व-प्रसिद्ध कुछ प्रेम कविताओं में से दस का चयन करके हिंदी के वरिष्ठ और महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल ने उनका अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है. चयन और अनुवाद दोनों ऐसे उपक्रम हैं जिनके समानांतर तमाम रेखाएं चलती हैं. ख़ुद अनुवादक ने स्वीकार किया है– 'अपने ही पैर की गर्द से घर गंदा हो जाता है'. यह ख़ास आयोजन ख़ास आपके लिए प्रस्तुत है.

विश्व की दस उत्कृष्ट प्रेम कविताएँ: अनुवाद अरुण कमल

विश्व की दस उत्कृष्ट प्रेम कविताएँ

अनुवाद: अरुण कमल

Pablo-Neruda

1.
आज रात मैं लिख सकता हूँ सबसे उदास पंक्तियाँ
पाब्लो नेरुदा

उदाहरण के लिए, लिख सकता हूँ, रात टूट-बिखर चुकी है
और नीले तारे सुदूर काँप रहे हैं

रात की हवा आकाश में घूम रही है और गा रही है

आज रात मैं लिख सकता हूँ सबसे उदास पंक्तियाँ
मैंने उसे प्यार किया, और कभी कभी उसने भी मुझको प्यार किया

ऐसी रातों में मैंने उसे अपनी बाँहों में भरा
चूमा बार बार चूमा अंतहीन आसमान के नीचे

कभी कभी उसने मुझे प्यार किया, और मैंने भी उसे प्यार किया
कैसे कोई उन बड़ी शांत आँखों को प्यार न करता

आज की रात मैं लिख सकता हूँ सबसे उदास पंक्तियाँ
सोच कर कि वह नहीं है मेरे पास, कि मैं उसे खो चुका हूँ

इतनी बड़ी रात को सुनना, और भी बड़ी उसके बगैर यह रात
गिरती है आत्मा पर कविता जैसे मैदान पर ओस

इससे क्या कि मेरा प्यार उसे रख न सका पास
रात बिखर चुकी है और वह नहीं है मेरे पास

बस यही है. दूर कोई गा रहा है. दूर पर कहीं
मेरा मन नहीं मानता कि मैंने उसे खो दिया है

मेरी आँखें उसे ढूँढ रही हैं मानो पहुँचने को उस तक
मेरा दिल उसे खोज रहा है और वह नहीं है मेरे पास

रात वही है उन्हीं पेड़ों पर सफ़ेदी करती
पर हम नहीं रह गये हैं वही, तब जो थे

मैं अब उसे प्यार नहीं करता यह तो तै है, लेकिन मैंने उसे कितना प्यार किया
मेरी आवाज़ उस हवा को तलाशने की कोशिश करती जो उसे छू सके

दूसरे की. वह दूसरे की होगी. जैसे पहले के मेरे चुम्बन
उसकी आवाज़. उसकी चमकती देह. उसकी अनन्त आँखें

अब मैं उसे प्यार नहीं करता, यह तै है,लेकिन शायद करता भी हूँ
इतना छोटा है प्यार, और भूलना इतना लम्बा

ऐसी ही रातों में मैंने उसे बाँहों में भरा था
मेरा मन मानता नहीं कि मैंने उसे खो दिया

भले यह अंतिम दर्द हो उसका दिया हुआ भोगने को
और ये अंतिम पद जो मैं लिख रहा उसके लिए.

 

Pablo-Neruda

२.
हर दिन तुम खेलती हो…
पाब्लो नेरुदा

हर दिन तुम ब्रम्हाण्ड के प्रकाश के साथ खेलती हो
अगोचर आगन्तुक,तुम उतरती हो फूल में और जल में
हर रोज जो मैं अपने हाथों में कस कर पकड़ता हूँ यह उज्ज्वल माथा
फूलों के गुच्छे की तरह तुम कहीं अधिक हो उससे

तुम किसी और की तरह नहीं हो क्योंकि तुमको मैं प्यार करता हूँ
मैं पसार दूँ तुमको पीली मालाओं पर
दक्षिण में तारों के बीच कौन लिखता है तुम्हारा नाम धुएँ के अक्षरों में?
ओ मैं याद करूँ कैसी रही होगी तुम पहले, अपने होने के पहले

अचानक हवा चीखती है और पीटती है मेरी बंद खिड़की
आसमान धुँधली मछलियों से भरा हुआ जाल है ठसाठस
यहाँ सब हवाएँ चली जाती हैं देर- सबेर सब की सब
बारिश अपने कपड़े उतारती है

चिड़ियाँ भागती जाती हैं
हवा. हवा—
मैं तो केवल मनुष्य की ताक़त से लड़ सकता हूँ—
अंधड़ तेज घुमाती है स्याह पत्ते
और रात में बँधी नावों को खोल देती है आकाश की ओर

तुम यहाँ हो. ओह तुम मत जाना
जवाब देना अंतिम पुकार तक
मुझमें लिपट जाओ मानो तुम डर गयी हो
वैसे भी एक अजीब छाया गुजरी थी तुम्हारी आँखों से एक बार

अभी अब भी मेरी नन्हीं, तुम मेरे लिए लाती हो मोगरे के फूल
और तुम्हारी छातियाँ भी भरी हैं इसकी सुगंध से
जब खिन्न हवा तितलियों का संहार करती फिर रही है
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और मेरी खुशी काटती है तुम्हारे मुंह का जामुन

तुमने कितना सहा होगा मेरे अभ्यस्त होने में
मेरी अकेली असभ्य आत्मा और मेरे नाम के, जिसे सुनते ही भागते हैं सब
कितनी बार हमने देखा है सुबह के जलते तारे को हमारी आँखें चूमते
और हमारे सिर के ऊपर भूरा प्रकाश उघड़ता है घूमती पंखियों में

मेरे शब्द बरसे तुम्हारे ऊपर, तुम्हें थपथपाते
लम्बे समय तक मैंने प्यार किया है तुम्हारी धूपतपी देह के मोती को
इतना कि मुझे लगा तुम्हीं स्वामिनी हो पूरे ब्रह्मांड की
मैं तुम्हारे लिए पहाड़ों से लाऊँगा प्रसन्न फूल, ब्लूबेल, स्याह हेज़ल, और चुम्बनों से भरीं
खाँचियाँ
मैं तुम्हारे साथ वही करना चाहता हूँ जो वसंत करता है चेरी वृक्षों के साथ.

 

Pablo-Neruda

३.
सॉनेट २५
पाब्लो नेरुदा

तुमसे प्रेम करने के पहले प्रिय कुछ भी नहीं था मेरा
मैं यूँ ही भटकता रहता गलियों में चीज़ सामानों
के बीच
किसी चीज़ का कुछ भी मतलब नहीं था न नाम
यह संसार हवा से बना था, इंतज़ार करता
मैं ऐसे कमरों को जानता था जो राख से भरे थे
उन खोहों को जहाँ रहता था चाँद
कर्कश कारख़ानों को जो गुर्राते 'भाग जा'
ऐसे सवाल जो रेत में ले जाते
हर चीज़ खाली मृत और ख़ामोश थी
गिरी हुई छोड़ी हुई और विनष्ट
इतनी बाहरी इतनी अलग कि सोचा भी नहीं जा सकता
यह सब किसी और का था- या किसी का नहीं:
जब तक कि तुम्हारी सुन्दरता और दरिद्रता ने
हेमंत को भर न दिया ढेर से उपहारों से.

 

Pablo-Neruda

४.
शायद तुम याद करो
पाब्लो नेरुदा

शायद तुम याद करो उस उस्तरे-से चेहरे वाले आदमी को
जो एक ब्लेड की तरह बाहर निकला था अँधेरे से
और- इसके पहले कि हम जान पाते- वह जान गया सब कुछ जो वहाँ था
उसने धुआँ देखा और कहा आग

काले केशों वाली वह पाण्डुर औरत
एक मछली की तरह उठी अतल से
और दोनों ने मिल एक यंत्र बनाया
प्रेम के विरुद्ध शस्त्रबद्ध

आदमी और औरत, दोनों ने पहाड़ ढाहे और बगीचे
फिर नदी की ओर उतरे, दीवारें फाँदीं
और पहाड़ी पर अपना विचित्र सैन्य सामान जमा दिया

तब प्रेम ने जाना इसे ही कहते हैं प्रेम
और मैंने जब अपनी आँखें तुम्हारे नाम पर उठायीं
तब सहसा तुम्हारे दिल ने मुझे रास्ता दिखाया

Sylvia Plath

 

५.
पागल लड़की का प्रेम गीत
सिल्विया प्लाथ

मैं आँखें बंद करती हूँ और सारी दुनिया मृत पड़ जाती है;
मैं पलकें उठाती हूँ और सब फिर पैदा हो जाता है.
(मैं सोचती हूँ मैंने तुम्हें अपने मन के भीतर गढ़ा था.)

सितारे नाचते चले जाते हैं नीले लाल
और बेतरतीब कालापन सरपट दौड़ता आता है:
मैं आँखें बंद करती हूँ और सारी दुनिया मृत पड़ जाती है

मैंने सपना देखा कि तुम जादू डाल मुझे बिस्तर पर ले गये
और गाकर मुझे मदहोश कर दिया,चूम चूम कर पागल कर दिया.
(मैं सोचती हूँ मैंने तुम्हें अपने मन के भीतर गढ़ा था)

ईश्वर लुढ़कता है आसमान से, नर्क की आग मुरझाने लगती हैः
कूच कर जाते हैं शिशु देवदूत और शैतान के लोग:
मैं आँखें बंद करती हूँ और सारी दुनिया मृत पड़ जाती है.

मैंने सोचा तुम लौटोगे जैसा तुमने कहा था,
लेकिन मैं बूढ़ी हो रही हूँ और भूल रही हूँ तुम्हारा नाम.
(मैं सोचती हूँ मैंने तुम्हें अपने मन में गढ़ा था.)

मुझे वास्तव में गर्जनपाखी से प्रेम करना चाहिए था; कम से कम वसंत में तो वे फिर से गरजते आते हैं.
मैं आँखें बंद करती हूँ और सारी दुनिया मृत पड़ जाती है.
(मैं सोचती हूँ मैंने तुम्हें अपने मन में गढ़ा था.)

 

Federico García Lorca

६.
गुलाब की माला का सॉनेट
फेदेरियो गार्सिया लोर्का

माला, जल्दी से, एक हारः मैं आ गया हूँ और मर रहा हूँ.
गूँथों फूलों को वे मुरझा रहे हैं. गाओ, रोओ और गाओ!
हृदय मेरे कंठ में,एक तूफान उफानता नद को
हजारों प्रपातों से आच्छादित रजतमय.
तुम्हारी अपनी इच्छा और मेरी इच्छा के बीच की जगह
भरी है तारों से, हर डग कँपाता ज़मीन को, उग आएंगे एनिमोन फूलों के वन
वर्ष के अंत पर, अपनी गोपन आवाज़ करते.
मेरे जख्मों के लैंडस्केप में देख सकते हैं प्रेमी,
खुशी खुशी, काटती तरंगों में झुकते सरपत,
और पी सकते हैं मधुमय जंघाओं के लाल ताल से.
जल्दी करो, आओ हम एक दूसरे में गूँथकर एक हो जाएँ,
हमारे मुंह विदीर्ण, हमारी आत्मा डँसी हुई प्रेम से,
ताकि काल को मिलें हम निश्चित विनष्ट.

 

Guillaume Apollinaire

७.
मिराबो पुल
अपॉलीनेयर

मिराबो पुल के नीचे बहती है नदी सीन
जहाँ तक हमारे प्रेम की बात है
मुझे याद आता है कि
हर दुख के बाद आती है खुशी फिर

रात आए, बीतें पहर
दिन भी बीतें, पर यहीं ठहरा रहूँ मैं

हाथ में हाथ डाल आमने-सामने ठहरे रहें हम
और नीचे
हमारे आलिंगन-पुल के नीचे
बहती जाएँ लहरें हमारे ताकते रहने से क्षुब्ध

आए रात, बीतें पहर
दिन भी बीतें, पर यहीं ठहरा रहूँ मैं

प्यार गुजर जाता है जैसे धारा गुजर जाती है
गुजर जाता है प्यार
जीवन कितना लम्बा और सुस्त है
जीवन की उम्मीद देती है कितने ज़ोर की चोट

रात आए ,बीतें पहर
दिन भी बीतें, पर यहीं ठहरा रहूँ मैं

दिन और सप्ताह बहते जा रहे हैं हम से दूर
न लौटेगा बीता समय
न लौटेगा प्यार फिर
बह रही है नदी सीन मिराबो पुल के नीचे

रात आए, बीतें पहर
दिन भी बीतें, पर यहीं ठहरा रहूँ मैं.

 

Chinua Achebe

८.
प्रेम-गीत (अन्ना के लिए)
चिनुआ अचेबे

जरा सा धैर्य धरो मेरी प्रिय
मेरी खामोशी की इस घड़ी में;
हवा भरी है भयंकर अपशकुनों से
और गीतपक्षी मध्याह्न के प्रतिशोध के भय से
अपने स्वर छुपा आए हैं
कोकोयम की पत्तियों में…
कौन सा गीत तुम्हें सुनाऊँ मेरी साँवरी जब
उकड़ूँ बैठे दादुरों की टोली
सड़ियल दलदल के गलफड़ प्रशंसा गान से
दिन को उबकाई से भर रही है
और बैंगनी मूँड़ वाले गिद्ध हमारे घर की छप्पर पर बैठे
पहरा दे रहे हैं?

मैं ख़ामोश इंतजार में गाऊँगा
तुम्हारी उस ताक़त को जो मेरे सपने
अपनी शांत आँखों में सहेज रखेगी
और हमारे छाले भरे पाँवों की धूल को सुनहले पैताबे में
तैयार उस दिन के लिए जब लौटेंगे
अपने निर्वासित नृत्य.

 

Maya Angelou

९.
आओ, मेरे शिशु बन जाओ
माया अंजलु

हाइवे भरा है बड़ी बड़ी कारों से
जातीं कहीं नहीं तेज
और लोग पी रहे हैं जो भी जले उसका धुआँ
कुछ लोग अपने झूठ कॉकटेल ग्लास के इर्द-गिर्द लपेटे हुए हैं
और तुम बैठे हो सोचते
किधर जायें—
मैं जानती हूँ.

आओ. और मेरे शिशु बन जाओ.
कुछ भविष्य वक्ता कहते हैं ये दुनिया ख़त्म हो जाएगी कल
कुछ दूसरे कहते हैं अभी एक दो हफ़्ते हैं अपने पास
अख़बार तो हर तरह की भयानक बातों से भरे हैं
और तुम बैठे हो सोचते
अब क्या करें.
मैं जान गयी.
आओ, और मेरे शिशु बन जाओ.

 

Harold Pinter

१०.
यह यहीं है
हैरल्ड पिंटर

वो आवाज़ कैसी थी?

मैं मुड़ता हूँ, उस कमरे की ओर जो हिल रहा है.

वो आवाज़ कैसी थी जो अँधेरे से आई?
कैसा है यह प्रकाश का भूलभुलैया जिसमें वह छोड़ती है हमें?
यह कैसी मुद्रा है
हटने और फिर लौटने की?
यह क्या सुना हमने?

यह वही साँस थी जो हमने ली थी जब हम पहली बार मिले थे.

सुनो. यह यहीं है.

अरुण कमल

१५ फ़रवरी १९५४ को नासरीगंज, बिहार में जन्मे अरुण कमल के छह कविता संग्रह, दो आलोचना पुस्तकें, साक्षात्कारों की एक किताब और दो अनुवाद पुस्तकें प्रकाशित हैं. 'अनुस्वार' नाम से अनुवाद का एक स्तम्भ. नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह की दस-दस कविताओं के अँग्रेजी अनुवाद, लेख सहित, इंडियन लिट्रेचर में प्रकाशित. एक कविता पुस्तक, और लेखों तथा बातचीत की किताबें प्रकाश्य.

अनुवादक घर साफ़ करने वाली बाई की तरह कविता के कोने अँतरों तक पहुँच सकता है या घड़ीसाज की तरह सारे पुर्जे खोल कर फिर से जमा सकता है- इसी मजे, और भेद को जानने- सीखने के वास्ते मैं अनुवाद करता रहता हूँ और रखे रहता हूँ. हालाँकि फिर से जमाने में कुछ कल-पुर्जे इधर उधर हो जाते हैं , या अपने ही पैर की गर्द से घर गंदा हो जाता है.
arunkamal1954@gmail.com




Monday, 13 February 2023

एदुआर्दो गालिआनो

सपनों के बारे में एदुआर्दो गालिआनो की पाँच लघु कथाएँ
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हेलेना के सपने

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उस रात उन सपनों की एक कतार लग गयी जो चाहते थे कि हेलेना उन्‍हें देखे, लेकिन हेलेना के लिए उन सबको देखने की लिए चुन पाना मुमकिन नहीं था। उनमें से एक सपने ने जिसे हेलेना नहीं पहचानती थी, आग्रह किया:
''मुझे देखने के लिए चुनो -- मैं एकदम तुम्‍हारे लायक हूँ। मुझे देखो -- तुम मुझे ज़रूर पसंद करोगी।''
कुछ नये सपने जो हेलना को पहले कभी नहीं आये थे, कतार में लगे हुए थे, लेकिन उसने उन मादक सपनों को पहचाना जो  बार-बार लौटकर आते रहे थे, वह उदास सपना और दूसरे अजीब या धुँधले सपने, जो ऊँची उड़ान की रातों से उसके पुराने दोस्‍त थे।
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सपनों के देश की यात्रा
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हेलेना एक घोड़ागाड़ी में उस देश की यात्रा कर रही थी जहाँ सपने देखे जाते थे। उसके बाजू में कोचवान की सीट पर उसकी नन्‍हीं कुतिया पेपा लुम्‍पेन बैठी थी। पेपा अपने पंजों तले एक मुर्गी लेकर चली थी जो उसके सपने में काम करने वाली थी। हेलेना अपने साथ एक बहुत बड़ी संदूकची ले चल रही थी जो मुखौटों और रंग-बिरंगे चिथड़ों से भरी हुई थी।
लोगों से भरी हुई सड़क धीरे-धीरे खिसक रही थी। वे सभी सपनों के देश की राह पर थे और अपने सपनों का पूर्वाभ्‍यास करते हुए इतनी लांछन भरी बातें कर रहे थे और इतना गुलगपाड़ा कर रहे थे कि पेपा सिर्फ झींख रही थी क्‍योंकि वह ठीक से ध्‍यान केन्द्रित नहीं कर पा रही थी।

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सपनों का देश

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उस देश में एक बहुत बड़ा शिविर लगा हुआ था।
वहाँ जादुगरों की ऊँची टोपियों में उगे हुए सलाद और चमकदार मिर्चियाँ थीं और चारो ओर लोग सपनों की लेन-देन कर रहे थे। एक आदमी प्‍यार के सपने के बदले यात्रा का सपना बेच रहा था और दूसरा एक अच्‍छी रुलाई के सपने के बदले हँसाने वाले सपने की पेशकश कर रहा था।
एक आदमी अपने सपनों के टुकड़ों की खोज में इधर-उधर भटक रहा था जो किसी के रास्‍ते में आ गया था और उसने उसे तोड़ दिया था। वह आदमी टुकड़ों को इकट्ठा कर रहा था और बहुरंगी झण्‍डा बनाने के लिए उन्‍हें एक साथ चिपका रहा था।
सपनों का भिश्‍ती लड़का उनके लिए पानी ला रहा था जिन्‍हें सोने के साथ ही प्‍यास लग जाती थी। वह अपनी पीठ पर लदे मिट्टी के मशक में पानी ढो रहा था और उसे लम्‍बे गिलासों में ढाल रहा था।
मीनार में एक औरत थी जो सफेद अंगरखा पहने हुए थी और अपने लटों में कंघी कर रही थी जो उसके पैरों तक पहुँचते थे। कंघी सपनों को चारो ओर बिखेर रही थी, जो अपने सभी पात्रों से भरे हुए थे: उस औरत के बालों से सपने हवा में उड़ रहे थे।

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भुला दिये गये सपने

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हेलेना ने सपना देखा कि उसने अपने भुला दिये गये सपनों को एक टापु पर छोड़ दिया है।
क्‍लारिबेल अलेग्रिया ने हेलेना के सपनों को एक साथ इकट्ठा किया, उन्‍हें एक रिबन से बाँधा और हिफाज़त से छिपाकर रख दिया। लेकिन उसके बच्‍चों ने वह जगह खोज ली। वे हेलेना के सपनों को आजमाना चाहते थे। क्‍लारिबेल ने उनसे सख्‍़ती से कहा:
''उन्‍हें छूना भी नहीं।''
फिर उसने हेलेना को फोन लगाया और उससे पूछा:
''तुम्‍हारे सपनों के साथ मुझे क्‍या करना चाहिए?''

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सपने छुट्टी पर

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सपने छुट्टी पर जा  रहे थे। हेलेना रेलवे स्‍टेशन तक उनके साथ गयी। प्‍लेटफॉर्म से उसने उन्‍हें विदाई दी, रुमाल हिलाते हुए।


"हर व्यक्ति अपनी ख़ुद की रोशनी से चमकता है। कोई भी दो लपटें एकसमान नहीं होतीं। छोटी लपटें हैं और बड़ी लपटें हैं, हर रंग की लपटें हैं। कुछ लोगों की लपटें इतनी स्थिर हैं कि वे हवा में फड़फड़ाती तक नहीं, जबकि कुछ की उग्र लपटें हैं जो हवा को स्फुलिंगों से भर देती हैं। कुछ गावदी लपटें हैं जो न जलती हैं न रोशनी देती हैं, लेकिन कुछ दूसरी इतनी प्रचण्डता के साथ जिन्दगी से धधकती रहती हैं कि कोई बिना पलक झपकाये उनकी ओर देख नहीं सकता और अगर कोई उनके पास जाता है तो आग में चमकने लगता है।"

-एदुआर्दो गालिआनो

हकीकत आपसे अच्छी चीजों को याद रखने और उन्हें लिखने के लिए कहती है। अगर लिखने के पेशे का कोई औचित्य है तो वह यह है कि हकीकत के चेहरे से मुखौटा हटाने में मदद की जाये और इसे उजागर किया जाये कि दुनिया कैसी है, कैसी थी और अगर हम इसे बदल देते हैं तो कैसी होगी..

-एदुआर्दो गालिआनो

रोज़-रोज़ याद रखने और याद दिलाने वाली बात....

"जिस धरती पर हर अगले मिनट एक बच्चा भूख या बीमारी से मरता हो, वहाँ पर शासक वर्ग की दृष्टि से चीज़ों को समझने की आदत डाली जाती है। लोगों को इस दशा को एक स्वाभाविक दशा समझने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। लोग व्यवस्था को देशभक्ति से जोड़ लेते हैं और इस तरह से व्यवस्था का विरोधी देशद्रोही अथवा विदेशी एजेण्ट बन जाता है। जंगल के क़ानूनों को पवित्र रूप दे दिया जाता है ताकि पराजित लोग अपनी हालत को अपनी नियति समझ बैठें।"

- एदुआर्दो गालिआनो


शब्‍दों का घर

हेलेना विलाग्रा ने सपना देखा कि कवि शब्‍दों के घर में प्रवेश कर रहे हैं। शब्‍द काँच की पुरानी बोतलों में रखे हुए थे, वे कवियों का इन्‍तजार कर रहे थे, और अपने को पेश कर रहे थे और चुने जाने की चाहत से पागल हो रहे थे: वे कवियों से याचना कर रहे थे कि वे उनपर निगाह डालें, उन्‍हें सूँघें, उन्‍हें छूएँ, उन्‍हें चाटें। कवि बोतलों को खोलते थे, अपनी ऊँगलियों के पोरों से शब्‍दों को आजमाते थे, और अपने होंठ चुभकारते थे या नाक सिकोड़ते थे। कवि उन शब्‍दों की तलाश में थे जिन्‍हें वे जानते नहीं थे और उन शब्‍दों की भी, जिन्‍हें वे जानते थे और खो चुके थे।
शब्‍दों के घर में रंगों की एक टेबुल भी थी। वे अपने को ढेरों फौव्‍वारों के रूप में पेश करते थे और हर कवि वह रंग ले लेता था जो वह चाहता था: नींबुई पीला या सूरज की रोशनी जैसा पीला, सागर जैसा नीला या धुँए जैसा, किरमिजी लाल, खून जैसा लाल या वाइन जैसा लाल...

-- एदुआर्दो गालिआनो


हकीकत आपसे अच्छी चीजों को याद रखने और उन्हें लिखने के लिए कहती है। अगर लिखने के पेशे का कोई औचित्य है तो वह यह है कि हकीकत के चेहरे से मुखौटा हटाने में मदद की जाये और इसे उजागर किया जाये कि दुनिया कैसी है, कैसी थी और अगर हम इसे बदल देते हैं तो कैसी होगी..

-एदुआर्दो गालिआनो

सभ्यता की शिनाख्त

जंगल में कहीं, किसी ने कहा ' सभ्य लोग कितने अजीब है। उन सब के पास घड़ियां है लेकिन किसी के पास वक्त नहीं है।'
                                              - एदुआर्दो गालिआनो

लातिन अमेरिका के लेखक एदुआर्दो गालिआनो दुनिया की मेहनतकश और संघर्षरत जनता के हक़ में उठी एक सशक्त आवाज़ के रूप में पूरी दुनिया में जाने जाते थे। उनकी किताब 'ओपन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका' (लातिन अमेरिका की खुली नसें) साम्राज्यवादी लूट और तबाही का पर्दाफ़ाश करने वाली एक अद्भुत रचना है। पिछली 13 अप्रैल को यह आवाज़ हमेशा के लिए शान्त हो गयी। बिगुल के पाठकों के लिए हम यहाँ उनके लेखन के दो छोटे अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। जल्द ही हम उनकी कुछ और ताक़तवर रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत करेंगे। 

अगर लातिन अमरीका की हालत यह है कि सिर्फ कुछ लोग ही सुख-सुविधाओं के पहाड़ पर बैठे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बाकी सारे लोग नीचे रहकर उन्हें देखें। और किसी दिन ऊपर पहुंच जाने का सपना देखते रहें। 

यहां गरीबों को अमीरी, गुलामों को आजादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गई हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं। 

गैर-बराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाए रखने की जरूरत का अहसास टीवी, रेडियो और फिल्में कराती हैं। जो रात दिन सबके समझ में आ सकने वाले अंदाज में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं। 

हर एक मिनट में बीमारी और भूख से एक बच्चे की हत्या करने वाली यह व्यवस्था हमें अपने हिसाब से ढाल लेने और इस अन्याय का हिस्सा बनाने के सभी उपाय करती है।

 हमें यह सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही रही है और सबकुछ ठीक चल रहा है। 

शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज उठाने वालों को बड़ी आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दे दिया जाता है। 

जंगल के कानून को कानून का राज घोषित कर दिया जाता है। ताकि लोग सबकुछ किस्मत का खेल मानकर चुपचाप बैठे और सहते रहें। 

---एदुआर्दों गालिआनो, चुनी हुई रचनाएं, गार्गी प्रकाशन 

"हर व्यक्ति अपनी ख़ुद की रोशनी से चमकता है। कोई भी दो लपटें एकसमान नहीं होतीं। छोटी लपटें हैं और बड़ी लपटें हैं, हर रंग की लपटें हैं। कुछ लोगों की लपटें इतनी स्थिर हैं कि वे हवा में फड़फड़ाती तक नहीं, जबकि कुछ की उग्र लपटें हैं जो हवा को स्फुलिंगों से भर देती हैं। कुछ गावदी लपटें हैं जो न जलती हैं न रोशनी देती हैं, लेकिन कुछ दूसरी इतनी प्रचण्डता के साथ जिन्दगी से धधकती रहती हैं कि कोई बिना पलक झपकाये उनकी ओर देख नहीं सकता और अगर कोई उनके पास जाता है तो आग में चमकने लगता है।"

-एदुआर्दो गालिआनो

जीवन का वृक्ष जानता है कि, चाहे जो भी हो, इसके इर्द-गिर्द नाचता उष्‍ण संगीत कभी बंद नहीं होगा। चाहे जितनी भी मौत आये, चाहे जितना भी खून बहे, यह संगीत तबतक स्त्रियों और पुरुषों में नृत्‍य करता रहेगा, जबतक हवा उनकी साँसों में आती-जाती रहेगी, जबतक ज़मीन जुतती  रहेगी और उन्‍हें प्‍यार करती रहेगी।
--एदुआर्दो गालिआनो

तो लोगों को झकझोर कर जगा देने और उन्हें आस-पास की सच्चाई से रू-ब-रू करने का काम कैसे किया जाए? जब दुनिया इस दौर के कठिन हालातों से रू-ब-रू है तो क्या साहित्य हमारे काम आ सकता है? संस्कृति का जो रूप सरकारें लेकर आती हैं वह तो सत्ता में बैठे चन्द लोगों के लिए ही है- यह सरकारी संस्कृति बर्बर व्यवस्था को 'विकास' और 'मानवता' का चेहरा देकर लोगों को गुमराह करती और व्यवस्था का गुलाम बना देती है- ऐसे में अपनी कलम से नई दुनिया का राह बनाने वाला लेखक 'सब ठीक है' जैसे झूठे दावों पर टिकी व्यवस्था से कैसे लड़े? ऐसे समय में जब हम अपनी अलग-अलग इच्छाओं और सपनों के साथ एक-दूसरे को सिर्फ फ़ायदे और नुकसान के नज़रिये से देख-समझ और परख पा रहे हैं तब सबको साथ लेकर चलने और दुनिया की तस्वीर बदलने का ख़्वाब संजोने वाले साहित्य की क्या भूमिका हो? हमारे आस-पास के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लिखना और कुछ नहीं बल्कि एक के बाद दूसरी समस्याओं की बात करना और उनसे भिड़ना हो गया है- तब हमारा लिखना किन लोगों के ख़ि‍लाफ़ और किनके लिये हो? लातिन अमेरिका में हम जैसे लेखकों की किस्मत और सफ़र बहुत हद तक बड़े सामाजिक बदलावों की ज़रूरत से सीधे-सीधे जुड़ा है- लिखना इस बदलाव के लिए लड़ना ही है क्योंकि यह तो तय है कि जब तक गरीबी, अशिक्षा और टी.वी तथा बाकी संचार माध्यमों के फैलते जाल पर बैठी सत्ता का राज कायम रहेगा तब तक हमारी सबसे जुड़ने और सबके साथ लड़ने की सभी कोशिशें बेकार ही रहने वाली हैं।

जब किसानों-मज़दूरों सहित आबादी के बड़े हिस्से की आज़ादी ख़त्म की जा रही है तब सिर्फ लेखकों के लिए कुछ रियायतों या सुविधाओं की बात से मैं सहमत नही हूँ। व्यवस्था में बड़े बदलावों से ही हमारी आवाज़ अभिजात महफिलों से निकल कर खुले और छिपे सभी प्रतिबन्धों को भेद कर उस जनता तक पहुँचेगी जिसे हमारी ज़रूरत है और जिसकी लड़ाई का हिस्सा हमें बनना है। अभी के दौर में तो साहित्य को इस गुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद ही बनना है।


एदुआर्दो गालिआनो

(अनुवाद: पी. कुमार मंगलम)


उन चीज़ों के लिए मर जाना सम्‍मान योग्‍य है, जिन चीज़ों के बिना ज़ि‍न्‍दा रहना सम्‍मान योग्‍य नहीं है।


-- एदुआर्दो गालिआनों


"मैंने कभी किसी का क़त्ल नही किया,यह सच है,लेकिन ऐसा इसलिए हुआ,क्योंकि या तो मेरे पास साहस नही था या फिर समय की कमी थी,इसलिए नही क्योंकि मुझमें इच्छा की कमी थी।"

 

                                  एदुआर्दो गालिआनो







जस्टिस रंजन गोगोई

पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई राज्य सभा जाएँगे। नवंबर के महीने में रिटायर हुए थे। 

कुछ बचा ही नहीं है तो बेहतर है कुछ कहने की जगह अगर कांग्रेस राज में किसी जज के राज्य सभा भेजने के उदाहरण खोजें जाएँ तो आराम पहुँचेगा। इनके फ़ैसलों को उपकार के रूप देखने की ज़रूरत नहीं है। राज्य सभा जाने के फ़ैसले को आप किसी भी रूप में देख सकते हैं। 

27 मार्च 2019 को एक सुनवाई के दौरान जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पद न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर दाग़ के समान हैं। 

मार्च 2020 में रंजन गोगोई रिटायरमेंट के तीन महीने बाद राज्य सभा के मनोनीत होते हैं। 

इससे बेहतर होगा कारवाँ की इस रिपोर्ट को पढ़ना। जानने के लिए थोड़ी मेहनत करना। इसका हिन्दी अनुवाद है। इसे पढ़िएगा ज़रूर। 

Ravish Kumar

Sunday, 12 February 2023

मजरूह सुल्तानपुरी

वो शायर, जिसकी कविता सुनकर नेहरू ने उसे सालों के लिए जेल में ठूंस दिया था।

इश्क़ में घायल हुआ वह शायर अपने ज़ख्मों में कलम डुबोकर शायरी लिखता था. ग़रीब-गुरबों का दर्द उसकी सांसों में धड़कता था,

इसलिए यह शायर हुकूमत से ख़ल्क़ का नुमाइंदा बनकर उलझने से भी नहीं कतराता था. 

पेशे से हकीम, हर्फों के जादूगर और दर्द के चारागर इस अजीम शायर का नाम असरारुल हसन खान उर्फ़ मजरूह सुल्तानपुरी था. 

मजरूह शुरुआती दिनों में पेशे से हकीम थे. लोगों की नब्ज़ देखकर दवाई देते थे. न सिर्फ जड़ी-बूटियों से, बल्कि हर्फों से भी हर दर्द की दवा बनाते फिरते थे.

इन्हें एक तहसीलदार की बेटी से इश्क़ हुआ. यह बात उस लड़की के रसूख़दार पिता को नागवार गुजरी. सो मोहब्बत की कहानी अधूरी रह गई, इसलिए मजरूह ने ज़िंदगी एक ग़ज़ल की शक्ल में पूरी की. 

मुशायरे के मंचों से होते हुए वह फिल्मों की खिड़की से कूदकर हमारे दिलों में इस तरह दाखिल हुए कि हमारे हर अहसास के लिए गीत लिख गए. जब हम प्रेम में पड़े, तो मजरूह को गाया. जब दिल टूटा, तो मजरूह को गुनगुनाया. जब दुनिया से लड़े, तो मजरूह साथ थे. जब अकेले पड़े, तब मजरूह के हाथ हमारे हाथ में थे. 

इस तरह मजरूह सुल्तानपुरी घायलों की 'घायलियत', सवालियों की 'सवालियत' और इंसानों की 'इंसानियत' का दूसरा नाम था.

मार्क्स और लेनिन का सपना उनकी सांसों में धड़कता था, इसलिए वह गैरबराबरी के अंधेरे में इंक़लाब का सुर्ख सूरज बनकर जलना चाहते थे. और शायद इसीलिए ग़ज़लों की गौरैया को सरमायादारी के बाज़ से लड़ाना चाहते थे, इस यक़ीन के साथ कि जीत आखिर में गौरैया की ही होगी.

बात आजादी से दो साल पहले की है. 44-45 का दौर था, जब मजरूह बंबई के किसी मुशायरे में बुलाए गए थे. 

मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक कारदार साहब (एआर कारदार) ने उन्हें सुना और उनके मुरीद हो गए. उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गीत लिखने को कहा, पर मजरूह साहब ने मना कर दिया. 

वैसे ही, जैसे गीतकार शैलेंद्र ने राजकपूर को मना किया था. 

जब यह बात उनके दोस्त जिगर मुरादाबादी को पता चली, तो उन्होंने मजरूह साहब को समझाया और राजी कर लिया.

फिल्म का नाम था 'शाहजहान'. गीत गाया था मशहूर गायक कुंदनलाल सहगल (के.एल. सहगल) ने और धुन बनाई थी नौशाद ने. 

ये वही गीत था, जो मज़रूह की कलम से निकलकर हमारे दिलों में दाखिल हुआ. 

गाना था, 'जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे'. इस गीत के लिए कहा जाता है कि ये उस वक़्त के दिलफ़िगार आशिकों के लिए राष्ट्रीय गीत के माफिक था. आज भी ये गीत टूटे हुए दिलों की तन्हाई का साथी है.

इसके बाद एस फ़ज़ील की 'मेहंदी' (1947), महबूब खान की 'अंदाज़' (1949) और शाहिद लतीफ़ की 'आरज़ू' (1950) के लिए मजरूह साहब ने गीत लिखे. 'आरज़ू' के सभी गीत सुपरहिट हुए. 'ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल, जहां कोई न हो', 'जाना न दिल से दूर', 'आंखों से दूर जाकर', 'कहां तक हम उठाएं गम' और 'जाओ सिधारो हे राधे के श्याम' जैसे गीत आम जन मानस की जुबान पर चढ़ गए थे.

फिल्म इंडस्ट्री ने मजरूह की धमक महसूस कर ली थी और यह तय हो गया था कि आने वाले समय में मजरूह सुल्तानपुरी सारे हिंदुस्तान को अपनी कलम की नोक पर नचाने वाले हैं. 

मगर इसी बीच बंबई में मजदूरों की एक हड़ताल में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक ऐसी कविता पढ़ी कि खुद को भारत के जवान समाजवादी सपनों का कस्टोडियन कहने वाली नेहरू सरकार आग-बबूला हो गई.

तत्कालीन गवर्नर मोरार जी देसाई ने महान अभिनेता बलराज साहनी और अन्य लोगों के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया. 

मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी कविता के लिए माफ़ी मांगने को कहा गया और उसके एवज में जेल से आजादी का प्रस्ताव दिया गया. 

पर मजरूह के लिए किसी नेहरू का क़द उनकी कलम से बड़ा नहीं था. सो उन्होंने साफ़ शब्दों में इनकार कर दिया. 

मजरूह सुल्तानपुरी को दो साल की जेल हुई और आज़ाद भारत में एक शायर आज़ाद लबों के बोल के लिए दो साल तक सलाखों के पीछे कैद रहा. 

आप भी पढ़िए, मजरूह साहब ने पंडित नेहरू के लिए क्या कहा था-

मन में ज़हर डॉलर के बसा के,
फिरती है भारत की अहिंसा.
खादी की केंचुल को पहनकर,
ये केंचुल लहराने न पाए.
ये भी है हिटलर का चेला,
मार लो साथी जाने न पाए.
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू,
मार लो साथी जाने न पाए.

सत्ता की छाती पर चढ़कर एक शायर ने वह कह दिया था, जो इससे पहले इतनी साफ़ और सपाट आवाज़ में नहीं कहा गया था. 

यह मज़रूह का वह इंक़लाबी अंदाज़ था, जिससे उन्हें इश्क़ था. वह फिल्मों के लिए लिखे गए गानों को एक शायर की अदाकारी कहते थे और चाहते थे कि उन्हें उनकी ग़ज़लों और ऐसी ही इंक़लाबी शायरी के लिए जाना जाए.

पर जैसा कहा जाता है कि पेट से उठने वाला दर्द जिगर से उठने वाली आह से ज्यादा फरेबी होता है, 

वैसा ही हुआ. जेल के दौरान ही मज़रूह साहब को पहली बेटी हुई और परिवार आर्थिक तंगी गुज़रने लगा. 

मजरूह साहब ने जेल में रहते हुए ही कुछ फिल्मों के गीत लिखने की हामी भरी और पैसे परिवार तक पहुंचा दिए गए. 

फिर मजरूह साहब 1951-52 के दौर में बाहर आए और तब से 24 मई, 2000 तक मुसलसल गीत लिखते रहे.

उन्होंने बेहतरीन हिंदी फिल्मों के लिए सैकड़ों बेशकीमती गीत लिखे. संगीतकार नौशाद और फिल्म निर्देशक नासिर हुसैन के साथ उनकी जोड़ी कमाल बरपाती रही और हमें बेहतरीन फ़िल्में और दिलनशीन गीत मिलते रहे. 

उन्होंने नासिर हुसैन के साथ 'तुम सा नहीं देखा', 'अकेले हम अकेले तुम', 'ज़माने को दिखाना है', 'हम किसी से कम नहीं', 'जो जीता वही सिकंदर' और 'क़यामत से क़यामत तक' जैसी कभी न भुलाई जाने वाली फिल्में कीं.

उन्होंने एके सहगल से लेकर सलमान तक के लिए गीत लिखे और अपने पचास साल के ऊपर के करियर में सैकड़ों ऐसे गीत दिए, जो हमारे वज़ूद का हिस्सा हैं. 

उन्हें 'दोस्ती' फिल्म के 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे' गीत के लिए 1965 में पहला और आखिरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला. 

1993 में मजरूह साहब को फिल्मों में उनके योगदान के लिए फिल्मों का सबसे बड़ा पुरस्कार 'दादा साहेब फाल्के अवार्ड' दिया गया. पर यकीनी तौर पर मजरूह साहब किसी भी पुरस्कार और खिताब से ऊपर थे.

मजरूह हर्फों के वह मसीहा थे, जो उनमें जान फूंककर उन्हें कालजयी कर दिया करते थे. 

वह अहसासों को आवाज़ देने के इस सफर में अकेले ही चले थे, पर लोग उनके साथ आते गए और कारवां बनता गया. 

मजरूह साहब किसी मजदूर के हथेलियों में पड़ी लाल ठेठों की लाली हैं. किसी की इंक़लाबी सुर्ख आवाज़ हैं, तो किसी चाक़-जिगर आशिक के दिल का लहू हैं. 

मजरूह साहब ने कभी हमारा साथ नहीं छोड़ा. वह हमारे साथ थे और हम उनके साथ होते चले गए. वह शायद इस बात को जानते थे, इसीलिए उन्होंने कहा था-

'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर / लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया'

- अनुराग अनंत
लल्लनटॉप के लिये

स्वांते पेबो की खोज

2022 का मेडिसिन/फिजियोलॉजी का नोबेल पुरस्कार डॉ. स्वांते पेबो को मिला है।
और इन्होंने खोजा क्या है?

आज के समय विज्ञान मानता है कि आधुनिक मानव यानि होमो सेपियंस यानि हम लोग इस धरती पर सबसे पहले अफ्रीका में 300000 साल पहले दिखाई दिए थे। लेकिन हमसे पहले एक अन्य मानव प्रजाति अफ्रीका से बाहर विचरण कर रही थी। यह प्रजाति थी नियंडरथल मानवों की। नियंडरथल मानव 400000 साल पहले धरती पर आये थे और यूरोप व एशिया के अधिकतर भूभाग में फैले हुए थे।
लगभग 70000 साल पहले आधुनिक मानवों ने अफ्रीका से एशिया की धरती पर कदम रखा था। आज से 30000 साल पहले नियंडरथल मानव विलुप्त हो गए। तो इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 40000 साल तक होमो सेपियंस और नियंडरथल मानव एक साथ यूरोप और एशिया में विचरण कर रहे थे।
1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने मानव के जेनेटिक कोड को देखना शुरू किया। इसके लिए नए नए औजार और नई तकनीकें विकसित हो रही थी। डॉ स्वांते पेबो ने इन्हीं औजारों और तकनीकों की मदद से नियंडरथल मानव के जेनेटिक कोड का अध्ययन करने करने लगे। लेकिन ये तकनीकें नियंडरथल मानव के डीएनए को समझने के लिए कारगर सिद्ध नहीं हो रही थीं क्योंकि नियंडरथल का डीएनए पूर्ण अवस्था में मिलता ही नहीं था।
म्युनिख विश्वविद्यालय में काम करते हुए डॉ पेबो ने माईटोकॉन्डरिया (हमारी कोशिकाओं में मौजूद एक विशेष संरचना जिसे कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है) में मौजूद डीएनए का अध्ययन करने पर ध्यान केंद्रित किया। हालांकि माईटोकॉन्डरिया के डीएनए में कोशिका के डीएनए से कम जानकारी होती है लेकिन नियंडरथल के केस में यह कोशिका के डीएनए से ज्यादा अच्छी हालत में मिल रहा था इसलिए सफलता की संभावना ज्यादा हो गई थी।
अपनी नई तकनीक के द्वारा पेबो ने नियंडरथल मानव की एक 40000 हजार साल पुरानी हड्डी के माईटोकॉन्डरिया के डीएनए का सीक्वेन्स बनाने में सफलता हासिल कर ली। और यह पहला सबूत था जो यह बताता है कि आधुनिक मानव नियंडरथल से जेनेटिक तौर पर भिन्न है। यानि यह एक भिन्न प्रजाति है।
2010 में पेबो और उनकी टीम ने नियंडरथल का पहला जेनेटिक सीक्वेन्स छापा। पेबो की इस खोज ने हमें यह बताया कि आज से आठ लाख साल पहले हमारा यानि होमो सेपियंस और नियंडरथल मानव का एक कॉमन पूर्वज इस धरती पर था।
पेबो और उनकी टीम को आधुनिक मानव के डीएनए में नियंडरथल के डीएनए के अंश भी मिले जिससे यह पता चलता है आधुनिक मानव और नियंडरथल मानव के बीच में इंटरब्रीडिंग होती रही है।
लेकिन सिर्फ यही काफ़ी नहीं था। पेबो को दक्षिणी साइबेरिया की एक गुफा में 40000 साल पुरानी इंसानी ऊँगली की हड्डी मिली थी। जब पेबो ने इसकी डीएनए सीक्वेन्सिंग की तो उन्हें कुछ ऐसा मिला जोकि आज तक किसी को नहीं मिला था। इस हड्डी का डीएनए न तो नियंडरथल के डीएनए से मिलता था और न ही आधुनिक मानव के डीएनए से। यह मानव की एक सर्वथा नई प्रजाति थी। इस नई प्रजाति को डेनिसोवा नाम दिया गया क्योंकि जिस जगह यह हड्डी मिली थी उस जगह को डेनिसोवा ही कहा जाता है। डेनिसोवा और नियंडरथल लगभग 600000 साल पहले एक दूसरे से अलग हुए थे।
लेकिन अभी एक महत्वपूर्ण खोज और बाक़ी थी। दक्षिण पूर्व एशिया के लोगों में से 6% में डेनिसोवा मानव के डीएनए के अंश भी मिले हैं, जिससे पता चलता है कि इन दोनों समूहों के बीच भी सम्पर्क रहा होगा।
बहरहाल इन खोजों ने हमारे पूर्वजों के बारे में हमारी जानकारी को विकसित किया है। साथ ही इनसे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास को समझने में भी मदद मिली है।

तीस साल पहले शुरू हुई विज्ञान की इस नई शाखा ने अब फल देने शुरू किये हैं, उम्मीद है कि आगे भी मानव अपने ज्ञान का दायरा बढ़ाता रहेगा।

इसके अलावा एक और बात। डॉ स्वांते पेबो 1982 के फिजियोलॉजी/मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार विजेता सुनये बेर्गस्त्रोम के पुत्र हैं। सुनये बेर्गस्त्रोम को नोबेल पुरस्कार प्रोस्टाग्लैंडिन नामक एक बायोकेमिकल के ऊपर उनके काम के लिए मिला था।