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Wednesday, 17 August 2022

चार्ली चैप्लिन का ख़त - अपनी बेटी के नाम

चार्ली चैप्लिन का ख़त - अपनी बेटी के नाम

क्रिसमस की रात  -

चार्ली चेपलिन ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक बहुत सुन्दर ख़त लिखा था -
मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। 

बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा लिखा।

मेरी प्यारी बेटी,
रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नीद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस दिन मैं चाहूंगा कि मैं अंधा हो जाऊं। तुम्हारी फोटो वहां उस मेज पर है और यहां मेरे दिल में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य शहर पेरिस में! चैम्प्स एलिसस के शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। इस रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। शरद ऋतु के आकाश में टिमटिमाते तारों की चमक मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। ऐसा लावण्य और इतना सुन्दर नृत्य। सितारा बनो और चमकती रहो। परन्तु यदि दर्शकों का उत्साह और उनकी प्रशंसा तुम्हें मदहोश करती है या उनसे उपहार में मिले फूलों की सुगंध तुम्हारे सिर चढ़ती है तो चुपके से एक कोने में बैठकर मेरा खत पढ़ते हुए अपने दिल की आवाज सुनना।
...मैं तुम्हारा पिता, जिरलडाइन! मैं चार्ली, चार्ली चेपलिन! क्या तुम जानती हो जब तुम नन्ही बच्ची थी तो रात-रातभर मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हें स्लीपिंग ब्यूटी की कहानी सुनाया करता था। मैं तुम्हारे सपनों का साक्षी हूं। मैंने तुम्हारा भविष्य देखा है, मंच पर नाचती एक लड़की मानो आसमान में उड़ती परी। लोगों की करतल ध्वनि के बीच उनकी प्रशंसा के ये शब्द सुने हैं, इस लड़की को देखो! वह एक बूढ़े विदूषक की बेटी है, याद है उसका नाम चार्ली था।
...हां! मैं चार्ली हूं! बूढ़ा विदूषक! अब तुम्हारी बारी है! मैं फटी पेंट में नाचा करता था और मेरी राजकुमारी! तुम रेशम की खूबसूरत ड्रेस में नाचती हो। ये नृत्य और ये शाबाशी तुम्हें सातवें आसमान पर ले जाने के लिए सक्षम है। उड़ो और उड़ो, पर ध्यान रखना कि तुम्हारे पांव सदा धरती पर टिके रहें। तुम्हें लोगों की जिन्दगी को करीब से देखना चाहिए। गलियों-बाजारों में नाच दिखाते नर्तकों को देखो जो कड़कड़ाती सर्दी और भूख से तड़प रहे हैं। मैं भी उन जैसा था, जिरल्डाइन! उन जादुई रातों में जब मैं तुम्हें लोरी गा-गाकर सुलाया करता था और तुम नीद में डूब जाती थी, उस वक्त मैं जागता रहता था। मैं तुम्हारे चेहरे को निहारता, तुम्हारे हृदय की धड़कनों को सुनता और सोचता, चार्ली! क्या यह बच्ची तुम्हें कभी जान सकेगी? तुम मुझे नहीं जानती, जिरल्डाइन! मैंने तुम्हें अनगिनत कहानियां सुनाई हैं पर, उसकी कहानी कभी नहीं सुनाई। वह कहानी भी रोचक है। यह उस भूखे विदूषक की कहानी है, जो लन्दन की गंदी बस्तियों में नाच-गाकर अपनी रोजी कमाता था। यह मेरी कहानी है। मैं जानता हूं पेट की भूख किसे कहते हैं! मैं जानता हूं कि सिर पर छत न होने का क्या दंश होता है। मैंने देखा है, मदद के लिए उछाले गये सिक्कों से उसके आत्म सम्मान को छलनी होते हुए पर फिर भी मैं जिंदा हूं, इसीलिए फिलहाल इस बात को यही छोड़ते हैं।
...तुम्हारे बारे में ही बात करना उचित होगा जिरल्डाइन! तुम्हारे नाम के बाद मेरा नाम आता है चेपलिन! इस नाम के साथ मैने चालीस वर्षों से भी अधिक समय तक लोगों का मनोरंजन किया पर हंसने से अधिक मैं रोया हूं। जिस दुनिया में तुम रहती हो वहा नाच-गाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आधी रात के बाद जब तुम थियेटर से बाहर आओगी तो तुम अपने समृद्ध और सम्पन्न चाहने वालों को तो भूल सकती हो, पर जिस टैक्सी में बैठकर तुम अपने घर तक आओ, उस टैक्सी ड्राइवर से यह पूछना मत भूलना कि उसकी पत्नी कैसी है? यदि वह उम्मीद से है तो क्या अजन्मे बच्चे के नन्हे कपड़ों के लिए उसके पास पैसे हैं? उसकी जेब में कुछ पैसे डालना न भूलना। मैंने तुम्हारे खर्च के लिए पैसे बैंक में जमा करवा दिए हैं, सोच समझकर खर्च करना।
...कभी कभार बसों में जाना, सब-वे से गुजरना, कभी पैदल चलकर शहर में घूमना। लोगों को ध्यान से देखना, विधवाओं और अनाथों को दया-दृष्टि से देखना। कम से कम दिन में एक बार खुद से यह अवश्य कहना कि, मैं भी उन जैसी हूं। हां! तुम उनमें से ही एक हो बेटी!
...कला किसी कलाकार को पंख देने से पहले उसके पांवों को लहुलुहान जरूर करती है। यदि किसी दिन तुम्हें लगने लगे कि तुम अपने दर्शकों से बड़ी हो तो उसी दिन मंच छोड़कर भाग जाना, टैक्सी पकड़ना और पेरिस के किसी भी कोने में चली जाना। मैं जानता हूं कि वहां तुम्हें अपने जैसी कितनी नृत्यागनाएं मिलेंगी। तुमसे भी अधिक सुन्दर और प्रतिभावान फर्क सिर्फ इतना है कि उनके पास थियेटर की चकाचौंध और चमकीली रोशनी नहीं। उनकी सर्चलाईट चन्द्रमा है! अगर तुम्हें लगे कि इनमें से कोई तुमसे अच्छा नृत्य करती है तो तुम नृत्य छोड़ देना। हमेशा कोई न कोई बेहतर होता है, इसे स्वीकार करना। आगे बढ़ते रहना और निरंतर सीखते रहना ही तो कला है।
...मैं मर जाउंगा, तुम जीवित रहोगी। मैं चाहता हूं तुम्हें कभी गरीबी का एहसास न हो। इस खत के साथ मैं तुम्हें चेकबुक भी भेज रहा हूं ताकि तुम अपनी मर्जी से खर्च कर सको। पर दो सिक्के खर्च करने के बाद सोचना कि तुम्हारे हाथ में पकड़ा तीसरा सिक्का तुम्हारा नहीं है, यह उस अज्ञात व्यक्ति का है जिसे इसकी बेहद जरूरत है। ऐसे इंसान को तुम आसानी से ढूंढ सकती हो, बस पहचानने के लिए एक नजर की जरूरत है। मैं पैसे की इसलिए बात कर रहा हूं क्योंकि मैं इस राक्षस की ताकत को जानता हूं।
...हो सकता है किसी रोज कोई राजकुमार तुम्हारा दीवाना हो जाए। अपने खूबसूरत दिल का सौदा सिर्फ बाहरी चमक-दमक पर न कर बैठना। याद रखना कि सबसे बड़ा हीरा तो सूरज है जो सबके लिए चमकता है। हां! जब ऐसा समय आये कि तुम किसी से प्यार करने लगो तो उसे अपने पूरे दिल से प्यार करना। मैंने तुम्हारी मां को इस विषय में तुम्हें लिखने को कहा था। वह प्यार के सम्बन्ध में मुझसे अधिक जानती है।
...मैं जानता हूं कि तुम्हारा काम कठिन है। तुम्हारा बदन रेशमी कपड़ों से ढका है पर कला खुलने के बाद ही सामने आती है। मैं बूढ़ा हो गया हूं। हो सकता है मेरे शब्द तुम्हें हास्यास्पद जान पड़ें पर मेरे विचार में तुम्हारे अनावृत शरीर का अधिकारी वही हो सकता है जो तुम्हारी अनावृत आत्मा की सच्चाई का सम्मान करने का सामर्थ्य रखता हो।
...मैं ये भी जानता हूं कि एक पिता और उसकी सन्तान के बीच सदैव अंतहीन तनाव बना रहता है पर विश्वास करना मुझे अत्यधिक आज्ञाकारी बच्चे पसंद नहीं। मैं सचमुच चाहता हूं कि इस क्रिसमस की रात कोई करिश्मा हो ताकि जो मैं कहना चाहता हूं वह सब तुम अच्छी तरह समझ जाओ।
...चार्ली अब बूढ़ा हो चुका है, जिरल्डाइन! देर सबेर मातम के काले कपड़ों में तुम्हें मेरी कब्र पर आना ही पड़ेगा। मैं तुम्हें विचलित नहीं करना चाहता पर समय-समय पर खुद को आईने में देखना उसमें तुम्हें मेरा ही अक्स नजर आयेगा। तुम्हारी धमनियों में मेरा रक्त प्रवाहित है। जब मेरी धमनियों में बहने वाला रक्त जम जाएगा तब तुम्हारी धमनियों में बहने वाला रक्त तुम्हें मेरी याद कराएगा। याद रखना, तुम्हारा पिता कोई फरिश्ता नहीं, कोई जीनियस नहीं, वह तो जिन्दगी भर एक इंसान बनने की ही कोशिश करता रहा। तुम भी यही कोशिश करना।

ढेर सारे प्यार के साथ
चार्ली
क्रिसमस 1965 

जातीय उत्पीड़न सिर्फ कानून बना कर नही खत्म किया जा सकता,जब तक जातिगत शोषण या उत्पीड़न की बुनियाद में आर्थिक असमानता को खत्म नही किया जाता।

इतना छुआछूत?
आप हैरान हैं कि
  आज भी इतना छुआछूत?
 पानी का मटका छूने पर एक अबोध बालक की
  जघन्य हत्या…
  ये कैसी आजादी? 
75 साल बाद भी वर्णव्यवस्था, जातिगत छुआछूत के चलते इन्द्र कुमार नाम के अबोध दलित बच्चे की निर्मम हत्या हो जाती है। यही नहीं ऐसे लाखों बच्चे आये दिन जातिगत भेद भाव के शिकार होते रहते हैं जिन्हें मीडिया में जगह नहीं मिल पाती, जिससे हम नहीं जान पाते।
 ऐसा क्यूं है?
दलितों में भी गरीबों की बात छोड़िए बहुत से करोड़पति और अरबपति हैं, उनके बच्चों के साथ भी कभी कभार जातिगत भेद भाव हो जाता है।
जब कि सवर्णों में बहुत ऐसे बच्चे हैं, जो गरीब हैं मगर
उनके साथ जातिगत अपमान नहीं होता?

  इन तथ्यों के आधार पर कुछ लोगों ने निष्कर्ष निकाला कि भारत में असल लड़ाई जातिगत भेदभाव की ही है। यहाँ अमीर और गरीब के बीच कोई लड़ाई है ही नहीं। इसी से प्रेरित होकर 15/85, मूलनिवासी के नारे गढ़े गये। अगड़ा, पिछड़ा, हिजड़ा, दलित, अतिदलित, अतिपिछड़ा… करते-करते कुछ धूर्त नेताओं ने मनुवाद, ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर ब्राह्मणों को खूब गालियां दिया, हालांकि सत्ता की मलाई चाटने के लिए वे अन्ततः गरीब ब्राह्मणों की गोद में नहीं बल्कि अमीर सामन्ती ब्राह्मणों की गोद में भी बैठ गए।

  इन्हीं गोदी नेताओं के कहने पर देश की अधिकांश शोषित उत्पीड़ित जनता सात दशकों से जातिवाद कर रही है, और शोषक वर्ग के संविधान को ही अपना संविधान मानकर उसकी पूजा कर रही है।

 जो संविधान सवर्णों को शोषक और दलितों, पिछड़ों आदिवासियों को शोषित मान कर वर्णव्यवस्था पर आधारित आरक्षण की वकालत करता है, जिस आरक्षण का फायदा सिर्फ 1% लोगों को ही मिल सकता है। मगर जातिप्रमाण पत्र सबको बनवाना पड़ता है। इस प्रकार वर्ण एवं जाति व्यवस्था की गुलामी को मजबूत करता है,

 जो संविधान इस तरह 'फूट डालो शासन करो' की नीति लागू करके एक तरफ जनता को कमजोर तो दूसरी तरफ शोषक वर्ग को मजबूत करता है,
  जिस संविधान के रहते 70 साल बाद भी दलितों एवं आदिवासियों में 98%, पिछड़ी जातियों में 90%, तथा अगड़ी जातियों में लगभग 20-30% लोग गुलामी की अवस्था में जीने के लिए बाध्य हैं,
 जिस संविधान की रजामंदी से शोषक वर्ग मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी, जुआखोरी, अश्लीलता… को बढ़ावा देकर जनता को लूट रहा है, 
  शोषित-पीड़ित वर्ग के अधिकांश लोग उसी भारतीय संविधान को अपना संविधान कहकर उसकी रक्षा करने के नाम पर आजादी के इतने दिन बाद भी शोषक वर्ग का साथ देना जारी रखे हुए हैं।
  फिर भी लोग पूछते हैं कि आजादी के इतने दिन बाद भी दलितों का उत्पीड़न क्यों?
  सवर्ण गरीब हैं तो भी सम्मान, तथा दलित अमीर हो जाए तो भी अपमान क्यों? इस प्रश्न का सही उत्तर न जानने के कारण ही रट्टू तोते की तरह मनुवाद ब्राह्मणवाद को गाली देते-देते लोग जातिवादियों के जाल में फँस जाते हैं, और महत्वपूर्ण आर्थिक सवालों को छोड़ देते हैं।

  सवर्ण गरीब हैं तो भी सम्मान, तथा दलित अमीर हो जाए तो भी अपमान इसलिए होता है कि सवर्णों में मध्यवर्ग एवं धनी लोगों की संख्या अधिक है। सवर्णों में कोई गरीब है तो उसके ज्यादातर रिश्तेदार अमीर मिल जाएंगे। इसलिए गरीब सवर्णों का भी अपमान करने की हिम्मत अक्सर कोई नहीं करता। इसके विपरीत दलितों में अधिकांश भूमिहीन, गरीब किसान और मजदूर हैं इसी लिए इनमें कुछ थोड़े लोग सम्पन्न होते भी हैं तो उनके ज्यादातर रिश्तेदार गरीब ही होते हैं, इसी लिए अमीर होने के बाद भी उन्हें कभी-कभी जातीय अपमान झेलना पड़ता है। इससे साफ जाहिर हो जाता है कि जातिगत शोषण या उत्पीड़न की बुनियाद में भी आर्थिक असमानता ही मुख्य तत्व है।
  जब तक लोग जाति, धर्म के झगड़ों को छोड़कर आर्थिक असमानता के खिलाफ नहीं लड़ेंगे, ऐसे ही शोषण, दमन, उत्पीड़न के शिकार बनते रहेंगे। और जातिगत अपमान से भी छुटकारा नहीं मिलेगा। पानी के मटके तक पहुँचने के लिए ऐसे ही कितने इन्द्र मेघवाल मारे जाते रहेंगे।
                             रजनीश भारती
                          जनवादी किसान सभा

Sunday, 14 August 2022

बगलें मत झाँको दो जवाब क्या यही स्वराज तुम्हारा है! - शंकर शैलेन्‍द्र

#75_साल_का_हासिल

बगलें मत झाँको दो जवाब क्या यही स्वराज तुम्हारा है!
- शंकर शैलेन्‍द्र 

 तुमने माँगें ठुकराई हैं तुमने तोड़ा है हर वादा
 छीना हमसे सस्ता अनाज तुम छँटनी पर हो आमादा
 तो अपनी भी तैयारी है तो हमने भी ललकारा है

 मत करो बहाने संकट है, मुद्रा प्रसार इन्फ्लेशन है
 इन बनियों-चोर-लुटेरों को क्या सरकारी कंसेशन है
 बगलें मत झाँको दो जवाब क्या यही स्वराज तुम्हारा है!

 मत समझो हमको याद नहीं वो जून छियालिस की रातें
 जब काले गोरे बनियों में चलती थीं सौदे की बातें
 रह गई गुलामी बरकरार हम समझे अब छुटकारा है!

 क्या धमकी देते हो साहब दम दाँटी में क्या रक्‍खा है
 यह वार तुम्हारे अग्रज अंग्रेजों ने भी तो चक्‍खा है,
 दहला था सारा साम्राज्य जो तुमको इतना प्यारा है!

 समझौता? कैसा समझौता हमला तो तुमने बोला है
 महँगी ने हमें निगलने को दानव जैसा मुँह खोला है,
 हम मौत के जबड़े तोड़ेंगे, एका हथियार हमारा है!

 अब सँभलें समझौतापरस्त घुटनाटेकू ढुलमुलयक़ीन
 हम सब समझौतेबाज़ों को अब अलग करेंगे बीन-बीन,
 जो रोकेगा बह जायेगा, ये वो तूफ़ानी धारा है!
 
 हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है...

(रचनाकाल सम्भवतः 1948-49)

ईरान की शायरा शाहरुख़ हैदर की नज़्म ~ "मैं एक शादीशुदा औरत हूँ!" ----------------------------------



मैं एक औरत हूँ 
ईरानी औरत

रात के आठ बजे हैं
यहां ख़याबान सहरूरदी शिमाली पर
बाहर जा रही हूँ रोटियां ख़रीदने

न मैं सजी धजी हूँ 
न मेरे कपड़े ख़ूबसूरत हैं
मगर यहां 
सरेआम
ये सातवीं गाड़ी है...
मेरे पीछे पड़ी है

कहते हैं 
शौहर है या नहीं
मेरे साथ घूमने चलो
जो भी चाहोगी तुम्हें ले दूंगा।

यहां तंदूरची है...
वक़्त साढ़े आठ हुआ है
आटा गूंथ रहा है 
मगर पता नहीं क्योंझ
मुझे देखकर आंख मार रहा है

नान देते हुए 
अपना हाथ 
मेरे हाथ से मिस कर रहा है!!

ये तेहरान है...

सड़क पार की तो 
गाड़ी सवार मेरी तरफ आया
गाड़ी सवार.. क़ीमत पूछ रहा है, 
रात के कितने ?
मैं नहीं जानती थी 
रातों की क़ीमत क्या है!!

ये ईरान है...
मेरी हथेलियां नम हैं
लगता है बोल नहीं पाऊंगी
अभी मेरी शर्मिंदगी और रंज का पसीना
ख़ुश्क नहीं हुआ था कि घर पहुंच गई।
इंजीनियर को देखा...
एक शरीफ़ मर्द 
जो दूसरी मंज़िल पर 
बीवी और बेटी के साथ रहता है

सलाम...
बेगम ठीक हैं आप ?
आपकी प्यारी बेटी ठीक है ?

वस्सलाम...
तुम ठीक हो? ख़ुश हो ?
नज़र नहीं आती हो ?

सच तो ये है 
आज रात मेरे घर कोई नहीं
अगर मुमकिन है तो आ जाओ
नीलोफ़र का कम्प्यूटर ठीक कर दो
बहुत गड़बड़ करता है

ये मेरा मोबाइल है
आराम से चाहे जितनी बात करना

मैं दिल मसोसते हुए कहती हूँ
बहुत अच्छा अगर वक़्त मिला तो ज़रूर!!

ये सरज़मीने-इस्लाम है
ये औलिया और सूफ़ियों की सरज़मीन है
यहां इस्लामी क़ानून राइज हैं
मगर यहां जिन्सी मरीज़ों ने
मादा ए मन्विया (वीर्य) बिखेर रखा है।
न दीन न मज़हब न क़ानून
और न तुम्हारा नाम हिफ़ाज़त कर सकता है।

ये है 
इस्लामी लोकतंत्र...
और मैं एक औरत हूँ

मेरा शौहर 
चाहे तो चार शादी करे
और चालीस औरतों से मुताअ

मेरे बाल 
मुझे जहन्नुम में ले जाएंगे

और मर्दों के बदन का इत्र
उन्हें जन्नत में ले जाएगा

मुझे 
कोई अदालत मयस्सर नहीं
अगर मेरा मर्द तलाक़ दे 
तो इज़्ज़तदार कहलाए

अगर मैं तलाक़ मांगू 
तो कहें
हद से गुज़र गई शर्म खो बैठी

मेरी बेटी को शादी के लिए
मेरी इजाज़त दरकार नहीं
मगर बाप की इजाज़त लाज़िमी है।

मैं दो काम करती हूँ
वह काम से आता है आराम करता है
मैं काम से आकर फिर काम करती हूँ
और उसे 
सुकून फ़राहम करना मेरा ही काम है।

मैं एक औरत हूँ...
मर्द को हक़ है कि मुझे देखे
मगर ग़लती से अगर 
मर्द पर मेरी निगाह पड़ जाए
तो मैं आवारा और बदचलन कहलाऊं।

मैं एक औरत हूँ...
अपने तमाम पाबंदी के बाद भी औरत हूँ
क्या मेरी पैदाइश में कोई ग़लती थी ?
या वह जगह ग़लत थी जहां मैं बड़ी हूई ?

मेरा जिस्म 
मेरा वजूद
एक आला लिबास वाले मर्द की सोच और 
अरबी ज़बान के चंद झांसे के नाम बिका हुआ है।

अपनी किताब बदल डालूं 
या
यहां के मर्दों की सोच
या 
कमरे के कोने में क़ैद रहूं ?
मैं नहीं जानती...

मैं नहीं जानती 
कि क्या मैं दुनियां में
बुरे मुक़ाम पर पैदा हुई हूं
या बुरे मौके पर पैदा हुई हूं।

Tuesday, 9 August 2022

महानगर में कविता : कुछ नोट्स —-----–----------------------- * विजय कुमार

महानगर में कविता : कुछ नोट्स
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          *  विजय कुमार 

अली सरदार जाफरी साहब की एक मशहूर नज़्म है मुंबई पर-

न जाने क्या कशिश है बम्बई तेरे  शबिस्तां में       
कि हम शामे-अवध, सुब्हे-बनारस छोड़ आये हैं

तेरे ज़िंदा की तारीकी में रातें हमने काटी हैं
तेरी सड़कों पे सोए, तेरी बारिश में नहाए हैं

कभी अश्कों के तारे आस की पलकों से टूटे हैं
कभी उम्मीद के दामन में मोती जगमगाए हैं

मगर फिर भी हमारा आलमे-मिहर-ओ-वफ़ा यह है
कि तुझको लखनऊ की तरह सीने से लगाए हैं    

स्थानिकताओं  के अपने इतिहास होते हैं- कुछ ज्ञातऔर कुछ अज्ञात।इस महानगर में  देश के अन्य इलाकों से लेखकों - साहित्यकारों की  कितनी ही पीढ़ियां आईं और  फिर यहीं  रच बस गईं। इस शहर में उनका जीवन  ,  अपने समय और परिवेश  की  समझ और  अपनी रचना धर्मिता  में  बुने गए उनके अनुभवों की एक लंबी दास्तान है। 
  युद्धोत्तर समय से लेकर आज तक  हिंदी कवियों की अनेक पीढियां यहां विकसित हुईं हैं  ।  उनके रचनात्मक योगदान  की विविधरंगी छटाएं हैं । हिंदी के वे अनेक छोटे - बड़े कवि    जो इस महानगर के बाशिंदे बने , अपनी जड़ -  ज़मीन और  अपने  गांव - कस्बों से  उखड़ कर यहाँ आये -   कवि पीढ़ियों का यह इतिहास  बीसवीं सदी में दूसरे महायुध्द के आसपास या उसके बाद के वर्षों  में आकार लेता है । इस शहर की  आबोहवा को इन कवियों ने आत्मसात किया, जीवकोपार्जन के लिए छोटी -बड़ी नौकरियां की, वे कल - कारखानों में श्रमिक बने   , व्यापारिक संस्थानों या स्कूल कॉलेजों से  जुड़े ,   अखबारों और आकाशवाणी में  सेवारत रहे,   सिनेमा में लेखन किया  , साहित्यिक संस्थाए बनायीं, कवि सम्मेलनों के मंच पर  अपनी कविताएं पढ़ीं  और  इस  बहुभाषी महानगर में हिंदी कविता के एक वातावरण को रचा । इन रचनाकारों के  जीवन और  कृतित्व  में कभी व्यक्त और कभी  अव्यक्त रूप से इस शहर का एक इतिहास बोलता रहा । कहीं   कोई स्वप्न ,  कहीं वर्तमान का   संघर्ष ,कुछ तल्ख अनुभव,  यहाँ की  दौड़ - भाग ,  मरना - खटना , परदेसी होने के विशिष्ट अनुभव , मिलन और बिछोह ,  भीड़ और  अकेलापन, उम्मीद और हताशाएं  , टूटन और थकन ,  कुछ नैतिक  मूल्य और आदर्श । और इसी के साथ पीछे छूट गए गांव -घर ,नदी , अमराई ,खेत- खलिहान  , ऋतुओ और पर्व त्योहारों की  स्मृतियाँ ।   बेहद दिलचस्प हैं उनके  जिये हुए परिवेश ,  उनकी अनुभव की वह  सम्पदा और उनकी रचनाओ  में धड़कती जीवन लय। यह  ज़रूरी नहीं कि हर रचनाकार   युग पुरुष ही बन जाये और हर रचना कालजयी कहलाये   , लेकिन ऐसे  अनेकानेक स्वर मिलकर  एक समूचे समय  और परिवेश का  लैंडस्केप ज़रूर बनाते हैं । स्थानिकताओं के अलिखित अध्याय  शायद सबसे रोचक होते हैं।

चालीस के दशक में प्रगतिशील लेखक संगठन का गठन यहाँ हुआ  और  । उसकी पहली सभा  चर्नी रोड स्थित मारवाड़ी विद्यालय में हुई थी।  सीपीआई के नेता पीसी जोशी और  सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानी सज्जाद ज़हीर जैसे व्यक्तित्वों  के प्रयत्न से मुंबई में  तरक्कीपसन्द लेखकों कवियों का एक ' कम्यून ' भी बना था। हिंदी कवि शील  के साथ साथ  नेमिचन्द्र जैन दम्पति  (पत्नी रंगकर्मी  रेखा जैन  )उस कम्यून में कुछ समय तक रहे थे। इसके थोड़ा पहले स्वतंत्रता पूर्व के  उन दशकों में प्रेमचंद  ,  उदय शंकर भट्ट, रामविलास शर्मा ,शमशेर ,भगवती चरण वर्मा और उपेंद्र नाथ अश्क जैसे साहित्यकारों का कुछ समय मुंबई शहर में प्रवास रहा ।  चालीस के दशक में  भगवती चरण वर्मा  बॉम्बे टाकीज में फ़िल्म लेखन कर रहे थे और उन्होंने यहां रहकर दैनिक 'नवजीवन ' का सम्पादन भी किया। 1953 में प्रकाशित  भगवती बाबू का उपन्यास 'आखिरी दांव' उनके फिल्मी जीवन के अनुभवों पर आधारित है।यह सच है कि हिंदी के  इन विख्यात साहित्यकारों की   इस शहर में उपस्थिति की कोई भी महत्वपूर्ण स्मृति अब यहां के स्थानीय लोगों में  नहीं  है  पर फिर भी वह  इस शहर की साहित्यिकता का एक महत्वपूर्ण  इतिहास है।

पं. प्रदीप, पं. नरेंद्र शर्मा, भरत व्यास और  सरस्वती कुमार दीपक जैसे हिंदी के  सुप्रसिद्ध कवि लगभग समवयस्क थे। ये सभी बीसवीं सदी में पहले महायुध्द के आसपास के वर्षों में  जन्मे थे । चालीस के दशक   के  आरंभिक वर्षों में ये कवि अपनी युवावस्था में  बम्बई आते हैं और यहां सिनेमा की दुनिया से जुड़ते हैं।पं.  प्रदीप का 1940 में बॉम्बे टाकीज की फ़िल्म'  'बंधन'  के लिए  सरस्वती देवी के  संगीत निर्देशन में रचा गया गीत ' चल चल रे नौजवान ' उन्हें दर घर मे लोकप्रिय बना देता है। फ़िल्म  ' किस्मत ' के गीत 'दूर हटो के दुनियावालो , हिंदुस्तान हमारा है' की वजह से वे ब्रिटिश  सरकार के कोप भाजन बनते हैं और उन्हें भूमिगत होना पड़ता है। 

पं. प्रदीप के बाद पं.नरेंद्र शर्मा की यात्रा 1943 में बॉम्बे टॉकीज की फ़िल्म' हमारी बात' से आरम्भ होती है । लगभग 100 फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। पचास के दशक में पंडित नेहरू के अनुरोध पर  वे ऑल इंडिया रेडियो की शाखा 'विविध भारती ' आरम्भ करते हैं और देश के सांस्कृतिक जगत का एक नया सोपान खुलता  है।

भरत व्यास ने 1943 में पहली बार फ़िल्म 'दुहाई'के लिए गीत लिखा था। वी. शांताराम की फ़िल्म 'दो आँखे बारह हाथ'मे उनके लिखे गीत 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ' ने एक क्लासिक का दर्जा पाया।सरस्वती कुमार दीपक ने लगभग 100 फिल्मों में 400 गीत लिखे।'सुहागन ', बूट पॉलिश ', 'आग 'और 'अफसाना 'जैसी फिल्मों के उनके गीत आज भी याद किये जाते हैं। कुछ बाद में आये शंकर शैलेन्द्र यहाँ वामपंथी सांस्कृतिक मोर्चे और 'इप्टा ' से जुड़े हुए थे और माटुंगा रेलवे वर्कशॉप मे श्रमिक थे।1949 में राजकपूर की फ़िल्म 'बरसात 'से शरू हुआ उनका सफ़र उन्हें हिंदी सिनेमा का एक शिखर  गीतकार बना देता है। इंदीवर और अनजान भी लोकप्रिय सिने गीतकारों के रूप में उभरे ।   नीलकंठ तिवारी ने भी अनेक फिल्मों में  गीत लिखे । 

सिने संसार  से जुड़े इन लोकप्रिय  गीतकारों के समानान्तर  कवि सम्मेलन मंच के गीतकारों की एक बड़ी संख्या यहाँ रही ।    इसके अलावा कविता  की एक धारा वह थी जिसे अकादमिक जगत के हिंदी  प्राध्यापकों  ने मूर्त किया। वंशीधर पंडा ,अनंत कुमार पाषाण, श्रीहरि ,  नंदलाल पाठक ,सुधाकर मिश्र ,हनुमंत नायडू ,शिवाधार शुक्ल  , शोभनाथ यादव  आदि  ने हिंदी कविता की  एक महत्वपूर्ण पहचान यहां बनाई। इसमें परम्परागत गीत ,ग़ज़ल और    मुक्तक से लेकर आधुनिक छंद - मुक्त कविता तक  रचनाधर्मिता के अनेक रूपाकार उभरे। 

गीतकारों और  अकादमिक जगत के कवियों से अलग एक तीसरी धारा उन वरिष्ठ कवियों की रही जो हिंदी पत्रकारिता और  कविता के आधुनिक बोध से जुड़े । इनकी रचनाओं में समसायिक सन्दर्भो , साहित्य के एक व्यापक जगत से सम्वाद और कविता के नये  मुहावरे की प्रमुखता रही। इनमें  धर्मयुग के  सम्पादक और  नयी कविता के चर्चित  हस्ताक्षर  डॉ.  धर्मवीर भारती का नाम तो प्रमुखता से उभरता ही   है  पर उन्हीं के साथ वीरेन्द्र कुमार जैन  ,अनन्त कुमार पाषाण  ,  वसन्त देव , रामावतार चेतन  ,कन्हैयालाल नंदन  आदि  के योगदान को भी हमेशा याद किया जाता रहेगा।' नयी कविता ' युग की चर्चित  कवयित्री कीर्ति चौधरी अपने पति ओंकारनाथ श्रीवास्तव  के  साथ लदंन स्थानान्तरित होने से पहले साठ के दशक में अनेक वर्षों तक बम्बई में रहीं । 

समय करवट बदलता है।साठ और सत्तर के दशक में  शहर  और कविता के रिश्तों को बुनती    एक  युवा पीढी इस शहर में आकार लेती  है  । उन  वर्षों में हिंदी प्रदेश में उभरी युवा लेखन की मुख्य धारा के समानांतर एक उपधारा इस महानगर में  ऐसी युवा पीढी  की थी जिसने अपना होश ही इस महानगर में सम्भाला था । बदलते दृश्य में  ये सांस्कृतिक दृष्टि से ये  बड़े परिवर्तन थे। साठ के दशक के उन अंतिम वर्षों में जब कुछ  युवा कवि यहां उभर रहे थे तो उन्हीं के समांतर  इस महानगर में कहानी विधा में भी जितेंद्र भाटिया, सुदीप,विश्वेश्वर, निरुपमा सेवती , हृदय लानी,  राम अरोड़ा और साजिद रशीद जैसे कुछ युवा कथाकार उभर रहे थे।  उन्हीं वर्षों में यहाँ थियेटर  बड़े सभागारों से निकल कर  प्रयोगात्मक  नाट्य आंदोलन  के रूप में दादर के छबीलदास  स्कूल के  सादा से अंतरंग  सभागार  में  पहुंच रहा  था। मराठी में दलित कविता की धूम थी। इन सांस्कृतिक परिवर्तनों के बीच हिंदी कविता में वह  युवा पीढी  यहां उभरी जो इस शहर को अपना 'परदेस' नहीं मानती थी। उसमें पीछे छूट गए की स्मृतियाँ नहीं ,अपने वर्तमान की तल्खी थी। इस युवा पीढी का  स्वभाव , लेखन की विषय वस्तु ,  शैली  , प्राथमिकताएं अपनी पिछली पीढ़ियों से भिन्न थीं ।  साठ और सत्तर के ये  दशक  बहुत तीव्र उथल -  पुथल  से भरे हुए  थे।   समय, समाज और संस्कृति को लेकर यह एक तीव्र मोहभंग का समय था।   इन युवाओं  का हिन्दी क्षेत्र की तमाम लघु पत्रिकाओं और नव लेखन की बहसों से एक निकट सम्बन्ध बन रहा था।  कविता के परिदृश्य में एक तरुणाई और एक नयी चेतना के साथ जो कवि यहाँ उभरे उनमें कुंतल कुमार जैन , अक्षय जैन , सोहन शर्मा , विश्वनाथ सचदेव ,सतीश वर्मा,  यज्ञ शर्मा,  विनोद गोदरे,    महेंद्र कार्तिकेय , मनोज सोनकर , विजय कुमार , हरजिंदर सेठी आदि के नाम लिए जा सकते हैं। देश भर में युवा लेखन की सरगर्मी थी।  पहली बार  इस शहर में भी  युवा लेखन  की  एक संस्था 'क्रमशः '  गठित होती है। पीछे मुड़कर देखो तो आज ये  घटनाएं किसी महत्वपूर्ण मोड़ की तरह से प्रतीत होती हैं।  साठ के दशक के अंतिम वर्षों में रुइया  कॉलेज में  'क्रमशः ' की ओर से 'कविता की एक शाम' नाम से  मुंबई के इन युवा कवियों की एक  महत्वपूर्ण  गोष्ठी हुई थी , जिसमें आठ  युवा कवियों ने काव्य पाठ  किया और धर्मवीर भारती उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे । भारती जी जैसे शिखर व्यक्तित्व की ऐसे किसी कार्यक्रम में सहभागिता ही   एक बड़ी बात थी।  बदलते समय और युवा कविता के नए मिजाज पर राम मनोहर त्रिपाठी और  डॉ. चंद्रकांत  बांदिवडेकर जैसे वरिष्ठों ने इस गोष्ठी में अपने  महत्वपूर्ण पर्चे पढे थे। युवा रचनाशीलता के  व्यवस्था विरोधी   स्वर  और अंदाज़    से असहमत धर्मवीर भारती ने  कार्यक्रम में अपने   अध्यक्षीय व्याख्यान में युवाओं के बागी तेवर को  लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाए थे ।वह एक विचारोत्तेजक , असहमतियों  , संवेदना दृष्टि की  टकराहटों और बहसों से भरा समय था। स्वयं भारती जी ने यह स्वीकार किया  कि  बम्बई महानगर में रचनाशीलता का ऐसा जीवंत दृश्य उन्होंने पहली बार देखा है  और  उभरते हुए युवाओं   के महत्व को अस्वीकार करना किसी के लिए संभव नहीं है । उन्हीं दिनों अक्षय जैन , रविनाथ सिंह और मनोज सोनकर का एक संयुक्त कविता संग्रह 'पंख कटा मेघदूत 'नाम से प्रकाशित हुआ था और तभी वरिष्ठ कवयित्री कीर्ति चौधरी का भी कविता संग्रह 'खुले आसमान के नीचे' शीर्षक से  आया था।के. सी.  कॉलेज में इन दो कविता संग्रहों  की समीक्षा के बहाने धर्मवीर भारती की ही उपस्थिति में '  युवा लेखन बनाम पिछली पीढी की रचनाशीलता ' को लेकर एक विचारोत्तेजक और  तीखी गोष्ठी हुई थी। और इसके कुछ समय बाद   मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ सी .एल. प्रभात ने 'कविता ' नाम से  नवलेखन  की कविताओं का एक महत्वपूर्ण संकलन संपादित किया था जिसमें अक्षय जैन ,कुंतल कुमार जैन ,नामवर ,मनोज सोनकर, रविनाथ सिंह ,विनोद गोदरे, विश्वनाथ सचदेव, शोभनाथ यादव ,सतीश वर्मा ,सोहन शर्मा और विजय कुमार की कविताएं संकलित की गई थीं । अक्षय जैन ने डॉ. रविनाथ सिंह के सम्पादन में युवा लेखन की एक महत्वपूर्ण लघु पत्रिका 'अन्विता ' आरम्भ की। सीमित साधनों के कारण उसके कुछ ही अंक निकले पर वह एक महत्वपूर्ण पत्रिका मानी गयी । रामावतार चेतन ने अपनी त्रैमासिक कला पत्रिका 'आधार' का एक पूरा अंक ही इस महानगर  के  युवा लेखन पर केंद्रित किया था।  आज यह सब इस शहर के एक अलिखित साहित्यिक  इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय  लगता है।   सत्तर के दशक में यहाँ नवलेखन  की नियमित गोष्ठियां होने लगीं थीं। इस तरह इस महानगर में साहित्य के अनेक समय थे ।एक मंचीय कविताओं वाला समय। दूसरा   बंधे- बंधाये  प्राध्यापकीय सोच वाला अकादमिक समय ।और  तीसरा उभरते हुए युवाओं का एक प्रश्नाकुल बेचैन समय। कालबादेवी के महाजन टी हाउस में होने वाली 'काव्य कुंज ' की गोष्ठियों में  पुराने  गीतकार और शायर भाग लेते थे  तो  कालाघोडा के आर्टिस्ट सेंटर में  प्रख्यात  चित्रकार  के.एच. आरा के सानिध्य में होने वाली 'छकड़ा ' संस्था की  अंतरंग  काव्यगोष्ठियों से  नव लेखन से जुड़े  से कवियों की मंडली  मौजूद रहती  थी । 

 इस दृश्य   में इसके कुछ समय बाद शामिल हुए अनूप सेठी,  हृदयेश मयंक,  आलोक भट्टाचार्य ,  हरि मृदुल, आलोक श्रीवास्तव , बोधिसत्व ,संजय भिसे ,  आदि   का भी कृतित्व  इस शहर में उभरने लगता   है। गीत चतुर्वेदी का आरंभिक समय मुम्बई में बीता है। इस शहर में  सिनेमा के प्रोफेशनल लेखन और अपनी गम्भीर साहित्यिक सृजनात्मकता  के बीच जिन युवाओं ने एक पुल बनाया उनमें बोधिसत्व, निलय उपाध्याय,इरशाद कामिल  और संजय मासूम के नाम लिए जा सकते  हैं।

समकालीन कविता के रूप में जो काव्य प्रवृतियां  रेखांकित की  जा रही थीं उनमें   अपने परिवेश के अंतर्विरोध थे,विडम्बनाओं के आख्यान थे,   खंडित चेतनाओं  के नए धरातल थे,   कभी कुछ   वैचारिक प्रतिबद्धताएं थीं  और  शहर एक सामान्य संदर्भ नहीं,बल्कि जीवन यथार्थ के विरोधाभासों    को रचता  एक  रूपक  , एक प्रतीक  था।  इस कविता में स्मृति का कोई  पुराना रोमान नहीं रह गया था   ।  

इन अर्थों में मुम्बई  में  लिखी गयी हिन्दी कविता का यह विकास बहुत महत्वपूर्ण है ।  इसके अलावा गीत और गज़ल  की विधा को कवियों की एक  पुरानी पीढी  ने जहाँ छोड़ा था ,  बाद के समय में    यहाँ सूर्यभानु गुप्त , राजेश रेड्डी , हस्तीमल हस्ती ,  सिब्बन बैज़ी और राकेश शर्मा जैसी समर्थ प्रतिभाएं  उस विधा में निरी रुमानियत को अपदस्थ करते हुए    आधुनिकता बोध , महानगरीय जीवन के विरोधाभासों  और राजनीतिक  चेतना के रंग भरती हैं  , उसमें  अनुभव के नये आयाम जोड़ती हैं और भाषा शिल्प के नये नये प्रयोग करती हैं ।   
इधर के वर्षों में इस महानगर  में लिखी जा रही कविता में और एक नया अध्याय जुड़ा  है । पिछले कुछ वर्षों में  हिंदी कविता के अनेक  संभावनाशील  युवा स्त्री स्वर यहां से उभरे हैं। संवेदना रावत, अनुराधा सिंह,  चित्रा देसाई ,आभा बोधिसत्व ,रीता दास राम , शैलजा पाठक जैसे नाम सहज  ही रेखांकित किये जा सकते हैं। ये सभी स्त्री – स्वर अब   राष्ट्रीय  फलक पर  जाने –  पहचाने  नाम हैं।  

मुम्बई  महानगर भले ही कार्पोरेट संस्कृति , तिज़ारत ,   कल -कारख़ानों , श्रम शक्ति, भीड़, तेज गति,   और यांत्रिक जीवन  शैली  के लिए जाना जाता  हो पर उसकी भीतरी तहों में मनुष्य की धड़कनों का एक मार्मिक संसार भी है। इसे यहां  अनेक भाषाओं में लिखी गयी  कविताओं  ने दर्ज किया है।हिंदी कविता  में भी यह अनुभव जगत  अलग अलग तरह से   उभरा  है। हृदयेश मयंक ने अपनी दो निबंध पुस्तकों में इस शहर की हिंदी  रचनाशीलता के कुछ उदाहरणों  को  रेखांकित भी किया  हैं।पर  इस सांस्कृतिक इतिहास को व्यवस्थित रूप से लिखा जाना अभी  शेष है।  महानगरीय परिवेश में उभरा लेखन    अपने अनेक  समाज शास्त्रीय पहलुओं, संवेदना के विविध  धरातलों  और समय शिला पर घटित  परिवर्तनों की शिनाख्त   के रूप में  हमेशा एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ बना रहेगा   । उसकी  साहित्यिक    विवेचना  को     जब शहरी विकास,  राजनीति, नागरिक  जीवन ,घर -परिवार के बदलते ढांचों  ,  आर्थिक और  सांस्कृतिक परिवर्तनों  के विविध  पहलुओं और  मनोविज्ञान से सम्बंधित  बातों से सम्बध्द किया जाएगा तो   वह एक समय, स्थानिकता और रचनाशीलता  के परिवर्तनों  का एक  रोचक  सांस्कृतिक  इतिहास  बन जाएगा । अकादमिक जगत में इस तरह के अध्य्यन  होने अभी बाकी हैं।
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                                                                          मो. 9820370825 
 
विजय कुमार  के वाल से

Monday, 8 August 2022

दलित-पिछड़ावादियों से कुछ बातें

दलित-पिछड़ावादियों से कुछ बातें


मण्डल कमीशन के शुरुआत से ही दलित-पिछड़ावादी राजनीति करके हमने देखा है।  हम पहली बार मंडल कमीशन के सवाल पर गिरफ्तार हुए थे, तब हम कक्षा 11 में पढ़ते थे। कई बार जेल गए हैं, कई बार पुलिस की लाठियां खाये, दर्जनों बार-बार गिरफ्तार हुए। तब मार्क्सवाद पढ़ा तो समझ में आया कि सम्पत्ति वान जो भी हैं, सभी उत्पीड़न कर रहे हैं। कहीं भी देख लीजिए।
 हम किसी जाति को उत्पीड़क नहीं मानते।
मगर भारत का संविधान सवर्णों को शोषक उत्पीड़क बता रहा है, जब कि गुजरात में आप का बैकवर्ड पटेल, उ.प्र., विहार में यादव, कुर्मी, कहीं-कहीं जाट आदि जातियों में पैदा होने वाले कुछ लोग भी सम्पत्ति वान होकर जातीय उत्पीड़न करते रहे हैं। महाराष्ट्र में महारों की स्थिति यूपी के यादवों से कमजोर न समझिए, वहां उत्पीड़ित चमार जाति के लोग महारों से अपना आरक्षण अलग करवाने के लिए मांग कर रहे हैं। 
  कहीं-कहीं तो सवर्णों से ज्यादा बैकवर्ड लोग छुआछूत का भेदभाव करते दिख जाएंगे। सबसे पक्के हिन्दू तो यही बने हुए हैं, दलित भी पीछे नहीं, ऊंचे पदों पर जाने के बाद वे दलितों से ही कितना भेदभाव कर रहे हैं , यह किसी से छिपा नहीं है। एक कुर्मी परिवार में मुझे प्लास्टिक की थाली में खाना खिलाया गया, मैं उस परिवार से कत्तई नाराज नहीं हुआ। दो-एक यादव परिवार में भी ऐसा ही हुआ, मैं उनसे जरा सा भी नाराज़ नहीं हुआ। मैं फिर उस परिवार में जाकर उनके प्लास्टिक के बर्तन में खाना चाहता हूँ, मुझे कोई नाराजगी नहीं। क्योंकि छुआछूत किसी एक व्यक्ति या किसी एक परिवार की बुराई नहीं है, यह हमारे पूरे समाज की बुराई है, इसे हम सब मिलकर ठीक करेंगे।

 यू पी और विहार में यादवों के उत्पीड़न को मुद्दा बनाकर भाजपा ने सपा और राजद को हरा दिया था। तो क्या किसी जाति को उत्पीड़क मान लिया जाये?
हमारी समझ से किसी जाति को उत्पीड़क या शोषक कहना ग़लत है।
  क्योंकि न सारे सवर्ण उत्पीड़क होते हैं, न सारे यादव, न सारे जाट, न सारे कुर्मी या अन्य किसी भी जाति के सारे लोग भी उत्पीड़क नहीं होते।
 जो भी सबल है, सम्पत्ति वान है वो उत्पीड़न कर रहा है।    हम बार-बार कह रहे हैं उत्पीड़कों की कोई जाति नहीं होती,
आप का कहना है कि होती है।
जैसे आप उत्पीड़कों में सवर्ण जाति खोजते हैं, वैसे ही आरएसएस आतंकवाद में मुसलमान खोजता है।
 
क्या फर्क है आप और आरएसएस में
उसने आतंकवाद का धर्म खोज लिया,
 आप ने शोषकों- उत्पीड़कों की जाति खोज लिया। 
इसी बहाने आप जातिवाद की दुकान चलाइए और आरएसएस साम्प्रदायिकता की दुकान चलाए। दोनों मिलकर वोट बेचो, सरकार बनाओ। मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी, अश्लीलता बढ़ाईए, अडानी अंबानी का मुनाफा बढ़ाइए।
गरीब मेहनतकश जनता जाए भाड़ में।
                                               रजनीश भारती
                                          जनवादी किसान सभा


फिल्‍म परिचय - गर्म हवा



फिल्‍म इस लिंक से देखी जा सकती है - https://www.youtube.com/watch?v=eHfrHDBxCFU

परिचय साभार - https://www.facebook.com/LucknowCinephiles/

इस फ़िल्म को बने आधी सदी गुज़र गयी है लेकिन कई चीज़ें आज भी नहीं बदली हैं। 1973 में इस फ़ि‍ल्‍म को बनाते समय निर्देशक एम.एस. सथ्‍यू को तीखे विरोध और दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा था। हालत यह थी कि आगरा में शूटिंग के समय जगह-जगह होने वाले उग्र विरोध से बचने का यह तरीक़ा निकाला गया कि एक नकली फ़ि‍ल्‍म यूनिट को कैमरे के साथ शहर में भेज दिया जाता था ताकि विरोधियों का ध्‍यान उधर चला जाये और असली शूटिंग किसी और जगह चुपचाप कर ली जाती थी। बाद में सेंसर बोर्ड ने भी महीनों तक इसे लटकाये रखा। काफ़ी कोशिशों के बाद जब इसे मंज़ूरी मिली तो शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने ऐलान कर दिया कि बम्बई में जो सिनेमा हॉल इसे दिखायेगा उसे जला दिया जायेगा। फ़ि‍ल्‍म देखे बिना ही उन्‍होंने इसे ''मुसलमान-परस्‍त'' और भारत-विरोधी करार दिया। हालाँकि आख़ि‍रकार जब फ़ि‍ल्‍म रिलीज़ हुई तो काफ़ी पसन्‍द की गयी और इसे कई राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिले।

संक्षिप्‍त कथानक

फ़ि‍ल्‍म का मुख्‍य किरदार सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) आगरा में जूतों का एक छोटा कारख़ाना चलाता है। विभाजन के बाद उसके परिवार के लोग एक-एक करके पाकिस्‍तान चले जा रहे हैं मगर वह कहता है कि मैं अपना वतन छोड़कर कहीं नहीं जाउँगा। वह बार-बार कहता है कि गांधीजी की शहादत के बाद अब लोग इन हालात के बारे में सोचने पर मजबूर होंगे और धीरे-धीरे सबकुछ ठीक हो जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है। नफ़रत, कट्टरपन और सन्‍देह का माहौल हावी रहता है और मिर्ज़ा परिवार को क़दम-क़दम पर उपेक्षा, अविश्‍वास और अपमान का सामना करना पड़ता है। फ़ि‍ल्‍म कुछ मुस्लिम नेताओं की मौक़ापरस्‍ती और स्‍वार्थ को भी सामने लाती है और दूसरी तरफ़ यह भी दिखाती है कि उस माहौल में भी कई हिन्‍दू मिर्ज़ा की मदद करते हैं। मिर्ज़ा का बड़ा बेटा भी तंग आकर पाकिस्तान चला जाता है। मिर्ज़ा की बेटी काज़ि‍म से प्‍यार करती है मगर उसका परिवार पाकिस्‍तान चला जाता है। आमिना से शादी करने के लिए काज़ि‍म लौटकर आता है लेकिन पुलिस उसे पकड़कर वापस भेज देती है। उसका दूसरा प्रेमी भी एक दिन परिवार के साथ पाकिस्‍तान चला जाता है और फिर ख़बर मिलती है कि वह वहीं शादी कर रहा है। आमिना ख़ुदकुशी कर लेती है। एक मामूली सी बात पर भड़के दंगे में मिर्ज़ा का कारख़ाना जला दिया जाता है। लेकिन वह हिम्‍मत हारने के बजाय मज़दूरों के साथ मिलकर ख़ुद जूते बनाने लगता है।

मिर्ज़ा का छोटा बेटा सिकन्‍दर पढ़ाई पूरी करके नौकरी तलाश कर रहा है। कई जगह उसे भी पाकिस्‍तान चले जाने के ताने सुनने को मिलते हैं लेकिन वह कहता है कि हमें भागने के बजाय यहीं रहकर आम लोगों के कन्धे से कन्धा मिलाकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए। वह अपने बेरोज़गार दोस्‍तों के साथ मिलकर एक माँगपत्रक तैयार करता है। इसी बीच मिर्ज़ा को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार कर लिया जाता है क्‍योंकि उसने अपने घर का नक्‍शा अपने बेटे के पास पाकिस्‍तान भेजा था। अदालत में वह बरी हो जाता है लेकिन हर जगह उसे उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ता है।

आख़ि‍रकार मिर्ज़ा  भी टूट जाता है और बेटे व पत्‍नी के साथ पाकिस्‍तान चले जाने का फ़ैसला कर लेता है। ताँगे पर स्‍टेशन की ओर जाते हुए उन्‍हें रास्‍ते में एक जुलूस की वजह से रुक जाना पड़ता है। शहर के नौजवान काम के अधिकार को लेकर मोर्चा निकाल रहे होते हैं। सिकन्‍दर के दोस्‍त उसे देखकर आवाज़ देते हैं। मिर्ज़ा कहता है कि अब मैं तुम्‍हें नहीं रोकूँगा, इंसान अख़िर कब तक अकेला रह सकता है। सिकन्‍दर जुलूस में शामिल होकर नारे लगाने लगता है। कुछ पल सोचने के बाद मिर्ज़ा भी बीवी को घर भेजकर जुलूस के पीछे-पीछे चल देता है। पृष्ठभूमि से सुनायी देती इन पंक्तियों से फ़िल्म का अन्त होता है:

जो दूर से तूफ़ान का करते हैं नज़ारा, उनके लिए तूफ़ान वहाँ भी है यहाँ भी
धारे में जो मिल जाओगे बन जाओगे धारा, ये वक़्त का एलान वहाँ भी है यहाँ भी 
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🖥 प्रस्तुति - Uniting Working Class