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Saturday, 18 February 2023

दक्षिण भारत में शिवरात्रि



आज हैदराबाद में एक देव संस्थानम में गया। शिवरात्रि पर लोग शिवजी को पूजने आये थे। यहाँ शिवलिंगों पर सुबह जल नहीं चढ़ाया जाता। लोग केवल शिवलिंग का दर्शन कर रहे थे। यहाँ कई लोग तेलुगु में लिटरेचर बाँट रहे थे, उन्हें लेंस से अनुवाद कर पढ़ा।  यहाँ शिव जी को कलियुग की उत्पत्ति माना जाता है। वह अदेह हैं। उनके विवाह की कोई बात यहाँ की कथाओं में नहीं है, उनकी न कोई पत्नी है, न कोई पुत्र। शिवलिंग की धारणा भी अलग है। शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा ज्योति है और नीचे का हिस्सा दीप। शिवलिंग की उत्तर भारतीयों की धारणा को ये विभत्स और अश्लीलता पूर्ण बताते हैं। यहाँ न साँप है , न बैल, न त्रिशुल और न कोई डमरू।
इनका आरोप है कि हिन्दी वालों ने जबरन अपने शंकर को यहाँ के शिव  में मिला दिया है।

ओडिशा में भी लोगों न बताया था कि  भगवान जगन्नाथ को उत्तर वालों ने मनगढंत कृष्ण और विष्णु बना दिया है।
 ये उत्तर भारतीयों को सांस्कृतिक उपनिवेशवादी बताते हैं।

इब्नबतूता की भारत यात्रा: चौदहवी शताब्दी का भारत


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         प्राचीन काल से भारत मे विदेशी यात्री आते रहे हैं. कुछ आक्रमणकारियों के साथ, कुछ व्यापारियों के साथ,तो कुछ धार्मिक-तात्विक ज्ञान की खोज में आते रहें.आये-गए तो कितने ही होंगे मगर सभी ने यात्रा विवरण दर्ज नहीं किया.बहुतों ने दर्ज किया भी होगा मगर समय-प्रवाह में वे काल-कलवित हो गयें हैं. मगर सौभाग्य से कुछ यात्रियों के यात्रा विवरण सुरक्षित रह गए हैं, जिससे उस दौर के इतिहास को जानने में मदद मिलती है. इनमे मेगस्थनीज, फाह्यान, व्हेनसांग,अल-बिरुनी, इब्नबतूता, बर्नियर प्रमुख हैं.

               इब्नबतूता मोरक्को का निवासी था, अपने धार्मिक-वृत्तिवश 22 वर्ष की अवस्था मे ही(1325 ई.) मक्का आदि सुदूर पवित्र स्थानों की यात्रा के लिए निकल पड़ा.शुरू में उसका विचार केवल हज करने का ही था, मगर बाद में कुछ धर्म गुरुओं से मिलने के बाद उसके मन मे  'संसार' भ्रमण की इच्छा जागृत हो गई.मक्का से भारत के लिए स्थल मार्ग से मक्का, कस्तूनतुनियाँ, कास्पियन समुद्र, मध्य एशिया, खुरासान, हिंदुकुश, हिरात, काबुल, कुर्रम घाटी होकर 734 हि. (1333ई.) में सिंधुनद के किनारे भारत की सीमा पर पहुंचा.

‌           उस समय दिल्ली में तुगलक वंश के मोहम्मद बिन तुगलक (1325-1351ई.) का शासन था.उस समय दरबार मे विदेशियों का काफी सम्मान होता था और उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त भी किया जाता था.बतूता को भी  सम्राट ने दिल्ली के 'काजी' का महत्वपूर्ण पद दिया.इस पद पर रहते हुए बतूता ने राजदरबार और सम्राट के रहन-सहन,राजकीय कार्य-प्रणाली, षड्यंत्र, सैन्य-अभियान, सूचना-तंत्र, दंड-विधान को करीब से देखा.अफवाहों, षड्यंत्रों से बनते-बिगड़ते सम्बन्ध से बतूता भी अछूते नहीं थे, वह सम्राट के प्रिय थे मगर ऐसा भी समय आया जब उन्हें सम्राट में कोपभाजन का शिकार होना पड़ा.मगर शीघ्र ही स्थिति उनके अनुकूल हो गई और सम्राट ने उन्हें अपना राजदूत बना अमूल्य रत्नादि देकर दलबल सहित चीन सम्राट की सेवा में भेजा. बतूता 743 (1342ई.) हिजरी को चीन के लिए प्रस्थान किया.अलीगढ़, कन्नौज, चंदेरी, दौलताबाद, खम्बात होते हुए वह कालीकट पहुँचा. वहां से आगे बढ़ने और लुटेरों द्वारा समस्त संसाधन लूट लिए जाने और राजसेवकों के नष्ट हो जाने के कारण सम्राट के कोपभाजन की आशंका से बतूता ने दिल्ली लौटने का विचार त्याग दिया.वहां से इधर-उधर भटकते , कई देशों की यात्रा करते 750 हि. को वह अपने देश मोरक्को वापस पहुंच गया.इस तरह वह 25 वर्ष देश से बाहर रहा, जिसका अधिकांश समय यात्रा में ही व्यतीत हुआ.श्री यूल के अनुसार उसने लगभग 75000 मील की यात्रा की.यातायात के आधुनिक साधनों के अभाव में इतनी लंबी यात्रा आश्चर्य जनक है. आश्चर्यजनक यह भी है कि उसने अपना विवरण यात्रा के पश्चात स्मृति के आधार पर लिखा है.इतने लोगों, स्थानों ,घटनाओं को बहुत कम त्रुटि के साथ दर्ज करना विस्मय पैदा करता है.बहुत सम्भव है वह यात्रा के दौरान उसे किसी ढंग से दर्ज करता रहा हो(जिसका खुद उसने कहीं उल्लेख नहीं किया है),लेकिन उसके कहे अनुसार लुटेरों द्वारा उसका सर्वस्व लूट लिया गया था.बहरहाल यह माना जाता है कि उसने स्मृति के सहारे ही अपना विवरण लिखा है.

‌           बतूता के इस यात्रा विवरण से मुख्यतः तत्कालीन राजकीय जीवन की झांकी मिलती है, मगर 'सामान्य' जनजीवन के झलक भी जगह-जगह मिल जाते हैं. चूंकि शासक वर्ग इस्लाम का अनुयायी था और बतूता ख़ुद भी, इसलिए इसमें मुख्यतः इस्लाम से सम्बंधित रीति-रिवाजों और कर्मकांडो का चित्रण है.इसमे बतूता के धार्मिक 'पूर्वाग्रह' भी स्पष्ट दिखते हैं, जहां वह 'हिन्दुओ' को अधिकतर 'लुटेरा' और 'डाकू' के रूप में चित्रित करता है. निश्चित रूप से मध्यकालीन सामंती वैचारिक सीमा में बतूता से अधिक उम्मीद की भी नहीं जा सकती.वैसे भी जिस प्रकार से राजदरबारों में षड्यंत्र और सत्ता के लिए हत्याएं होती थी, सामन्तो में आपसी झगड़े होते थें वहां 'धर्म' गौण हो जाता था.

‌           बतूता के इस विवरण का  ऐतिहासिक महत्व है.इतिहासकारो को इतिहास के कई गुत्थियों को सुलझाने में इससे मदद मिली है. श्री मदनगोपाल के अनुसार "सम्राट(मोहम्मद बिन तुगलक) तथा उसके शासन के संबंध में फैले हुए 'चीन की चढ़ाई' आदि वर्तमानकालीन भ्रमों को दूर करने के अतिरिक्त बतूता ने तत्कालीन भारतीय इतिहास के कुछ अन्य बातों पर भी प्रकाश डाला है; कुतुबुद्दीन ऐबक की दिल्ली विजय तिथि, बंगाल के मुसलमान गवर्नरों का शासनकाल, तुगलक वंश का तुर्क जातीय होना, कोरोमंडल तट के मुस्लिम शासकों का वृत और तत्कालीन भारतीय मुद्रा आदि विषयों की जानकारी के संबंध में इस विवरण से यथेष्ट सहायता मिलीं है".

‌.         विवरण में स्त्रियों का जितना चित्रण मिलता है, उसमे उनकी 'बेबसी' ही झलकती है.युद्ध मे पराजित राजाओं में स्त्रियों जो बहुधा हिन्दू ही अधिक हैं; दरबारों में नचवाई जाती थी, तत्पश्चात सम्राट उन्हें युवराजों, अमीरों को बांट देता था.जब राज घरानों का यह हाल था तो सामान्य घर के स्त्रियों की कल्पना की जा सकती है.उन्हें दासियों के रूप में खरीदा बेचा जाता था, कोई 'अच्छी' लगे तो उससे शादी कर ली जाती थी.पुरुषों को भी दास के रूप में खरीदा-बेचा जाता था.उनसे कुली,मजदूरी, समान ढोने का काम लिया जाता था. कई जगह किराए पर भी मजदूर प्राप्त करने का उदाहरण आता है, इससे पगार देकर मजदूरी कराने की पुष्टि होती है, जो व्यापारिक पूंजीवाद का लक्षण है.अब तक मुद्रा का चलन व्यापक हो गया था, विदेशों से व्यापार होता था, इससे मध्यकालीन समाज के 'गतिशीलता' का पता चलता है.

‌             बतूता ने आँखो-देखी 'सती-वृतांत' का जो चित्रण किया है, वह मार्मिक है.मध्यकालीन सामंती मूल्यों की यह विडंबना थी कि एक स्त्री को अपना जीवन समाप्त करना पड़ता था.बतूता लिखता है यह अनिवार्य नहीं था मगर यह 'मूल्य' बन गया था, और इसे 'वंश प्रतिष्ठा' गिना जाता था.मगर इसके अलावा अन्य कारण भी थे जिस तरफ बतूता का ध्यान जाना सम्भव नहीं था. जहां युद्ध के बाद पराजित खेमे के स्त्रियों को समान की तरह खरीदा-बेचा जाता था, उन्हें कदम-कदम पर अपमानित किया जाता था;वहां ऐसी 'प्रथा' को पनपने में अवश्य बढ़ावा मिलता है.

‌.           मध्यकालीन इतिहास ने मोहम्मद बिन तुगलक के चरित्र और व्यवहार विवादपूर्ण रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि वह 'विरोधाभाषी प्रवृत्तियों' का 'मिश्रण' था.हालांकि इस पर भी मतभेद हैं. उसके कुछ निर्णय यथा 'दोआब में कर वृद्धि', 'सांकेतिक मुद्रा का चलाना', 'कराचिल अभियान' 'राजधानी परिवर्तन' की 'असफलता' की काफी आलोचना होती है. बतूता ने कराचिल अभियान और राजधानी परिवर्तन का जिक्र किया है.राजधानी परिवर्तन का कारण बतूता लिखता है कि वहाँ(दिल्ली) की जनता सम्राट को गालियों भरा पत्र लिखती थी.हालांकि इतिहासकार मात्र इसे ही कारण नहीं मानते.बतूता लिखता है  "यह सम्राट रुधिर की नदियां बहाने तथा पात्रापात्र का विचार किए बिना ही दान देने के लिए अति प्रसिद्ध है.शायद ही कोई दिन ऐसा बिताता होगा कि जब वह सम्राट किसी भिखमंगे को धनाढ्य न बनाता हो और किसी मनुष्य का वध न करता हो" .‌सामन्तवाद में सम्राट की 'इच्छा' ही  'न्याय' होता है.यहां भी बिना किसी मुकदमे के बहुत साधारण बातों पर लोगो के वीभत्स तरीके से वध का चित्रण है.हालत यह थी कि अपनी निर्दोषिता के पक्ष में तर्क करना प्रताड़ित होकर मरना था, इसलिए लोग 'अपराध' कबूल कर सीधे मरना 'पसन्द' करते थे.हाँ इस 'इच्छा' के कारण सम्राट भी एक जगह 'अपराध' के लिए  इक्कीस छड़ी की मार खा लेता है.

‌       बतूता ने तत्कालीन डाक प्रबंध का रोचक वर्णन किया है "पैदल डाक का प्रबंध इस भांति होता है कि एक मील में, जिसको इस देश मे 'क्रोह' कहते हैं, हरकारों के लिए तीन चौकियां बनी होती है. इनको 'दावह' कहते हैं. प्रत्येक 1/3 मील की दूरी पर गांव बसे होते हैं जिनके बाहर हरकारों के लिए बुर्जियां बनी होती है.प्रत्येक बुर्जी में हरकारे कमर कसे बैठे रहते हैं. प्रत्येक हरकारे के पास दो गज लंबा डंडा होता है जिसमे छोर पर तांबे के घुंघरू बंधे होते हैं. नगर से डाक भेजते समय हरकारे के एक हाथ मे चिट्ठी होती है और दूसरे में डंडा.वह अपनी पूरी शक्ति से दौड़ता है.दूसरा हरकारा घुंघरू का शब्द सुनकर तैयार हो जाता है और उससे चिट्ठी लेकर तुरन्त दौड़ने लगता है.इस प्रकार इच्छानुसार सर्वत्र चिट्ठियां भेजी जा सकती है. यह डाक घोड़ों के डाक से भी शीघ्र जाती है"

‌           विवरण में इनके अतिरिक्त तत्कालीन जन-जीवन के कई चित्र हैं. यहां के फल, अनाज,नगर स्थापत्य, राजभवन का चित्रण, सम्राट का दरबार, तत्कालीन भोजन पद्धति,दिल्ली का तुगलक पूर्व इतिहास,तत्कालीन विद्रोह,बतूता के निजी जीवन के झलक, यात्रा के दौरान आने वाली समस्यांए, लोग आदि. विवरण से बतूता का जो व्यक्तित्व दिखाई देता है, उससे वह शांतिप्रिय, सामान्य जीवन जीनेवाला,धार्मिक, जिज्ञासु, व्यक्ति नज़र आता है.अपने धर्म के प्रति अतिरिक्त लगाव भी स्पष्ट दिखाई देता है.

‌          यह यात्रा विवरण इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण तो रहा ही है.इतिहास में रुचि रखने वाले सामान्य पाठको के लिए भी रोचक है.इस विवरण की सार्थकता और सीमा तो अधिकारी विद्वान ही बताते रहे हैं. हमारी प्रतिक्रिया महज जिज्ञासु पाठक की प्रतिक्रिया ही है.

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[2018]
‌●अजय चन्द्रवंशी, ,कवर्धा(छत्तीसगढ़)
‌    मो. 9893728320

दलित कवियित्री सुकीरथरणी ने अडाणी के विरोध में ठुकराया सम्मान

दलित कवियित्री सुकीरथरणी ने अडाणी के विरोध में ठुकराया सम्मान

'हालांकि नास्तिक होने की वजह से मैं देवी के नाम पर मिलने वाले सम्मान को लेने से हिचक भी रही थी। लेकिन लोगों ने मुझे बताया कि यह महिला शक्ति का सम्मान है। इसके बाद मैंने 28 दिसंबर, 2022 को उन्हें सम्मान लेने की स्वीकृति दे दी थी।'
किसी ऐसी संस्था से या किसी ऐसे समारोह में अवार्ड लेने में मुझे कोई ख़ुशी नहीं होगी जिसे अडानी समूह द्वारा वित्तीय मदद मिल रही हो, क्योंकि ऐसा करना मेरी राजनीति और विचारधारा के ख़िलाफ़ होगा। ये बातें बीते दिनों तमिल दलित कवियित्री सुकीरथरणी ने अपने बयान में कहा जब उन्हें 'न्यू इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा देवी पुरस्कार देने की घोषणा की गई और उन्हें जानकारी मिली कि प्रायोजकों में अडाणी समूह का नाम भी शामिल है। 
किए। तीन फ़रवरी को मैंने वीडियो देखा तो उस पर अडानी समूह का लोगो था।" 
अपने साहसिक लेखन के लिए विख्यात सुकीरथरणी का जन्म एक गरीब दलित परिवार में 1973 में हुआ। उनके पिता एक फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर थे। वह तमिलनाडु के रानीपेट ज़िले के लालापेट में सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं। वह तमिल भाषा पढ़ाती हैं। उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी अनेक कविताओं का अंग्रेज़ी, मलयालम, कन्नड़, हिंदी और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यहां तक कि तमिलनाडु के स्कूली पाठ्यक्रम में भी उनकी कवितायें पढ़ाई जाती हैं। 
बताते चलें कि 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाने वाले उनके और दलित लेखिका बामा के लेखन को हटा दिया गया। इस फैसले की व्यापक निंदा की गई थी। स्वयं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इसकी निंदा की थी। 
सुकीरथरणी के समूचे लेखन में दलितों और वंचितों के पक्ष में आवाज़ उठाई गई है। दलितों ख़ास तौर पर दलित औरतों के लिए सरोकार उनके लेखन में बहुतायत से मिलता है। इस अवार्ड से पहले उनको पुदुमैपीतन अवार्ड, द वीमेन अचीवर्स अवार्ड, द आवी अवार्ड, द वाइब्रेंट वोइस ऑफ़ सबाल्टर्न अवार्ड मिल चुके हैं। 




चुनौती

महमूद दरवेश ( प्रसिद्ध फिलिस्तीनी कवि)

चुनौती

तुम मुझे चारों तरफ से बाँध दो
छीन लो मेरी पुस्तकें और चुरूट
मेरा मुँह धूल से भर दो
कविता मेरे स्पंदित हृदय का रक्त है
मेरी रोटी का खारापन
मेरी आँखों की तरलता

यह लिखी जाएगी नाखूनों से
आँखों के कोटरों से , छुरों से
मैं इसे गाऊँगा
अपनी कैद- कोठरी में , स्नानघर में
अस्तबल में , चाबुक के नीचे
हथकडियों के बीच , जंजीरों में फंसा हुआ
लाखों बुलबुल मेरे भीतर हैं
मैं गाऊँगा
अपने संघर्षशील गीत

शिव सत्य हैं..

शिव सत्य हैं...

शिव सुंदर हैं...

शिव आदि हैं...

शिव अनादि हैं...

शिव अंत हैं...

शिव अनंत हैं...

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Bla bla bla....

ये काल्पनिक बातें हैं। विज्ञान इन बातों को नहीं मानता। मिथक इसलिए पैदा हुए थे क्योंकि उस वक़्त प्रकृति और प्राकृतिक घटनाओं के बारे में इंसानी समझ बहुत कम विकसित थी। वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि दार्शनिक तौर पर भी यह पिछड़ी हुई चेतना का प्रतीक है। आज के युग में इसकी जरूरत नहीं है।

Navneet Nav


स्वयंस्फूर्त जनन

जीवन के मृत पदार्थ से पैदा होने को स्वयंस्फूर्त जनन कहते हैं। इसका मतलब होता है बिना बाहर के मदद से जीवन की उत्पत्ति। 

पुराने जमाने मे विद्वान लोग स्वयंस्फूर्त जनन की अवधारणा को सही मानते थे।

1668 में एक इतालवी डॉक्टर फ्रांसिस्को रेयडी(1626-1697) ने इस अवधारणा का परीक्षण करने की ठानी। हो सकता है कि कुछ छोटे जिंदा जीव सड़े मीट पर अंडे सेते हो। अंडे इतने छोटे हों कि लोगो को दिखाई ही न देते हो। और शायद इन अदृश्य अंडो से भुनगे निकलते हो। 

अपने प्रयोग के लिए रेयडी ने ताजे मीट को आठ भिन्न-भिन्न कांच के फ्लासकों में रखा। उसने चार बर्तनो को सील किया जिससे कि उनमें कोई चीज अंदर न जा पाए। चार बर्तनों को खुला छोड़ा जिससे कि मक्खियां बर्तन में घुस कर मीट पर बैठ सके।

कुछ दिन बीतने के बाद खुले बर्तनों में मीट सड़ने लगा, उनमे बदबू आने लगी और उनपर भुनगे भुनभुनाने लगे। जब रेयडी ने सीलबंद बर्तनों को खोला तो उनके अंदर का मीट भी सड़ा और बदबूदार था पर उनमे भुनगे नही थे।

क्या स्वच्छ हवा के अभाव में भुनगे नही जन्मे थे? रेयडी ने एक और प्रयोग करने की ठानी। उसने फिर कुछ बर्तनों में ताजा मीट रखा। उसने बर्तनों के मुंह पर कपड़े की जाली बांधी। इस जाली में से साफ हवा तो अंदर जा सकती थी परन्तु मक्खियां नहीं। नतीजा? 

मीट सड़ गया परंतु उसमे भुनगे पैदा नही हुए।

इसका निष्कर्ष एकदम साफ था। मक्खियों ने अंडे सेये। और उन अंडों में से भुनगे निकले। जो बाद में खुद मक्खियां बनें। बिल्कुल उसी तरह जैसे इल्लियों से तितलियां बनती है।

स्वयंस्फूर्त जनन की अवधारणा का यह खण्डन था।

क्रमश.....

-( आईजिक ऐसिमोव)




Friday, 17 February 2023

धर्म और मार्क्सवाद 
ईश मिश्र

  मार्क्सवाद समाज को समझने का विज्ञान और उसे बदलने का आह्वान है। समाज के हर पहलू पर इसकी सत्यापित स्पष्ट राय है, धर्म पर भी। 'हेगेल के अधिकार के दर्शन की समीक्षा में एक योगदान'  में मार्क्स ने लिखा है  "………धर्म की आलोचना सभी आलोचनाओं की पूर्व शर्त है." उसी के आगे उसी ग्रंथ में वे लिखते हैं कि धर्म की आलोचना की बुनियाद यह ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म या ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने अपनी ऐतिहासिक जरूरतों के अनुसार, भौतिक परिस्थितियों तथा तदनुरूप सामाजिक चेतना के स्वरूप और स्तर के संदर्भ में ईश्वर और धर्म का निर्माण किया। इसीलिए देश-काल के परिवर्तन के साथ धर्म और ईश्वर का चरित्र परिवर्तित होता रहता है। पहले ईश्वर गरीब और जरूरतमंद की मदद करता था अब जो अपनी मदद कर सकता है, उसकी (God helps those, who help themselves)। 

'राजनैतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा में एक योगदान' के प्राक्कथन में भौतिक उत्पादन के  चरण के अनुरूप सामाजिक चेतना के स्वरूप की बात करते हैं। फॉयरबॉक  पर तीसरी प्रमेय में कहते हैं कि चेतना भौतिक परिस्थियों का परिणाम है और बदली हुई चेतना बदली हुई परिस्थियों का परिणाम है लेकिन परिस्थितियां अपने आप नहीं बदलती बल्कि उन्हें बदलता है मनुष्य का चैतन्य क्रांतिकारी कर्म।

 "परिस्थियों और मनुष्य के व्यवहार या आत्म-परिवर्तन में बदलाव के संयोग को तार्किक रूप से क्रांतिकारी व्यवहार के अर्थों में ही की जा सकती है"। धार्मिक चेतना को बदले बिना धर्म को नहीं समाप्त किया जा सकता है, उसी तरह जैसे सामाजिक चेतना के जनवादीकरण यानि मजदूरों में वर्गचेतना के संचार के बिना सर्वहारा क्रांति नहीं हो सकती। द थेसेस ऑन फॉयरबाक की चौथी थेसिस है, "फॉयरबाक अपनी बात धार्मिक आत्मविरक्ति (सेल्फ-एलीनेसन),  धार्मिक दुनिया और भौतिक (धर्मनिरपेक्ष) दुनिया के दुहरेपन से शुरू करते हैं। उनका समाधान धार्मिक दुनिया का अपने भौतिक आधार में समाहित करना है। लेकिन भौतिक आधार का खुद को खुद से अलग करके आसमान में स्वतंत्र आसियाना बनाने की बात की व्याख्या, भौतिक आधार के अंदर की दरारों औऱ आत्म-विरोधाभासों के अर्थों में ही की जा सकती है। इसलिए जरूरत है भौतिक आधार के अंतरविरोधों को समझने की और व्यवहार में उनके जनवादीकरण की। जब यह पता चल गया कि उहलोक के परिवार (द होली फेमिली ) का रहस्य इहलोक के परिवार में ही छिपा है तो पहले सिद्धांत और व्यवहार में जरूरत इहलोक को नष्ट करने की है"। धार्मिक आत्मवियोग भौतिक आत्मवियोग की ही अभिव्यक्ति है।

प्रचीन यूनानी चिंतक प्लेटो के अंतिम ग्रंथ कानून (द लॉज) में वर्णित राज्य को उनका दूसरा सर्वश्रेष्ठ राज्य कहा जाता है, सर्वश्रेष्ठ राज्य रिपब्लिक का आदर्श राज्य है। द लॉज में दंड के प्रावधानों का मकसद सुधार था, उत्पीड़न नहीं। नास्तिकता जैसे विरले मामलों में ही मृत्युदंड देना चाहिए, जब 'अपराधी' का अस्तित्व उसके और समाज दोनों के लिए खतरनाक हो जाय। असमानता और गुलामी को प्रकृति प्रदत्त और परिवर्तन को खतरनाक बुराई मानने वाले उनके शिष्य अरस्तू निरंकुश शासकों को धर्मात्मा दिखना चाहिए और पूजा और बलि चढ़ाने में सदा आगे रहना चाहिए। लोग इस डर से विद्रोह से बाज आएंगे कि जब देवता गण ही उसके साथ हैं तो उससे नहीं जीता जो सकता। कौटिल्य का राज्य का सिद्धांत धर्मशास्त्रीय समझ से मुक्त है, लेकिन वह राजा को धार्मिक अंधविश्वासों और धर्मांधता को समाप्त करने की नहीं अपद्धर्म को रूप में उनका इस्तेमाल करने की। राजधर्म है रक्षण, पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना। रक्षण पालन में धर्म (वर्णाश्रम धर्म) का भी रक्षण, पालन शामिल है। मैक्यावली ने राजनीति को धर्मशास्त्र के चंगुल से मुक्त कर उसे एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में पुनर्प्रतिष्ठि किया। लेकिन वह भी राजा को सलाह देता ही कि धर्म की मान्यताएं और रीति-रिवाज कितने भी प्रतिगामी क्यों न हों, उसे उनसे न महज छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए बल्कि उनका अनुपालन भी सुनिश्चत करना चाहिए। धर्म लोगों को संगठित और वफादार बनाए रखने का सबसे प्रभावी औजार है। जॉन लॉक के राज्य में नास्तिकता की सजा मृत्यु बताई गयी है। 
उपरोक्त भूमिका का मकसद यह रेखांकित करना है कि ऐतिहासिक रूप से धर्म शासक वर्ग उनके प्रतिनिधियों का प्रभावी औजार रहा है। धर्म कोई साश्वत विचार नहीं है बल्कि देश-काल सापेक्ष विचारधारा है। विचारधारा मिथ्या चेतना होती है क्योंकि वह खास मान्यताओं कि विशिष्ट संरचना को सार्वभौमिक और अंतिम सत्य के रूप में पेश करती है। विचारधारा न केवल उत्पीड़क/शासक को प्रभावित करती है बल्कि पीड़ित/शासित को भी। जैसे मर्दवाद की विचारधारा न सिर्फ पुरुष को प्रभावित करती है बल्कि स्त्री को भी, न केवल पिताजी को लगता था कि उन्हें आज्ञा देने का अधिकार था बल्कि मां को भी लगता था कि आज्ञापालन उसका कर्तव्य था। (था इसलिए लिखा कि यह समीकरण टूट रहा है, भले ही गति मंद हो, यह अपवाद नियम बनने को अग्रसर है।) धर्म में उहलोक का छलावा है, इसलिए इसे तोड़ने का मतलब है उहलोक के छलावे का पर्दाफाश करना।

 पुजारी, लोगों के उहलोक को ठीक करने की दक्षिणा से अपना इहलोक ठीक करता है। पुजारी जानबूझकर नहीं धोखा देता बल्कि आत्म-छलावे का शिकार होता है। उसे खुद अपनी बातों की सत्यता में पूर्णविश्वास है। मेरे बाबा (दादा जी) पंचाग के ज्ञाता और कट्टर अनुयायी थे। ग्रह-नक्षत्रों की गणना से मुहूर्त का निर्धारण वे न सिर्फ लोगों के लिए बताते थे (बिना दक्षिणा के), बल्कि उनका खुद उनमें पूर्ण विश्वास था। 1967 में हमारी जूनियर हाई स्कूल (आठवीं) की बोर्ड परीक्षा का केंद्र 20-25 किलोमीटर दूर पड़ा था और परीक्षा तिथि से पहली वाली रात 12 बजे प्रस्थान की शुभ मुहूर्त। 12 बजे रात हम दोनों ऊबड़-खाबड़ रास्ते से निकल पड़े। बाबा 6 फुट लंबे बलिष्ठ व्यक्ति थे, मैं 12 साल का दुबला-पतला, मरियल सा। कुछ दूर पैदल चलता था और कुछ दूर बाबा कंधे पर बैठा लेते थे। 7 बजे की परीक्षा के लिए हम 5 बजे पहुंच गए। परीक्षा परिणाम अच्छा आने से उन्हें अपनी गणनाओं पर विश्वास और दृढ़ हो गया होगा। जिस तरह शुभ मुहूर्त पर प्रस्थान शुभ की खुशफहमी देता है वैसे ही धर्म खुशी की खुशफहमी देता है। इसी लिए उपरोक्त ग्रंथ में मार्क्स ने लिखा है कि "लोगों की खुशी की खुशफहमी के रूप में धर्म के उन्मूलन का मतलब है उनके लिए वास्तविक खुशी की मांग करना है। लोगों से अपने हालात में खुशफहमी (भ्रम) छोड़ने को कहने का मतलब है उन हालात को छोड़ना जिनके चलते खुशफहमी की जरूरत पड़ती है। इसलिए धर्म की आलोचना भ्रूणावस्था में उस अश्रुसागर की आलोचना है, धर्म जिसका आभामंडल है"।

अपने पालन-पोषण और समाजीकरण के दौरान वे मनुष्य धर्म को जीवन के सहारे के रूप में आत्मसात कर लेते हैं जो आत्मबोध अभी तक प्राप्त नहीं कर सके हैं या खो चुके हैं, धर्म उनकी "आत्मचेतना और आत्मानुभूति" बन जाता है। "किंतु यह व्यक्ति दुनिया से दूर भ्रमण करने वाला कोई अमूर्त जीव नहीं है। यह व्यक्ति मनुष्यों की दुनिया – राज्य और समाज का व्यक्ति है। यह समाज और राज्य धर्म निर्मित करते हैं जो दुनिया की विलोमित चेतना है क्योंकि दुनिया ही उल्टी है। धर्म इस दुनिया का सामान्य सिद्धांत; इसका सर्वज्ञानसंपन्न संकलन; इसका लोकप्रिय तर्क; इसका आध्यात्मिक शिखर; इसकी उमंग; इसकी नैतिक संस्तुति; इसका एकमात्र अनुपूरक; और दिलाशा तथा औचित्य का इसका सार्वभौमिक आधार है"।

 लोग धर्म के अफीम होने का उद्धरण संदर्भ से काट कर देते हैं। उपरोक्त ग्रंथ में मार्क्स ने आगे लिखा है, "धार्मिक कष्ट वास्तविक कष्ट की अभिव्यक्ति भी है और उसके विरुद्ध प्रतिरोध भी। धर्म उत्पीड़ित की आह है; हृदयविहीन दुनिया का हृदय है;  और आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा है। धर्म लोगों की अफीम है"। मार्क्सवाद राज्य को नहीं समाप्त करना चाहता बल्कि उन कारण-कारकों (वर्गीय अंतविरोध) को खत्म करना चाहता है जिनके चलते राज्य की जरूरत पड़ी, राज्य अपने आप अनावश्यक होकर बिखर जाएगा। उसी तरह मार्क्सवाद, धर्म को नहीं उन परिस्थितियों को खत्म करना चाहता है, जिनके चलते धर्म का अस्तित्व है। धर्म खुशी की खुशफहमी देता है, वास्तविक खुशी मिलने से खुशफहमी की जरूरत खत्म हो जाएगी, धर्म अनावश्यक हो स्वतः समाप्त हो जाएगा।              
17.02.2018

Prof Ish Mishra