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Thursday, 20 April 2023

लेनिन की एकमात्र कविता- वह एक तूफानी साल



*महान क्रान्तिकारी, लेनिन के जन्मदिवस दिवस पर उनकी लिखी एकमात्र कविता*

*लेनिन की एकमात्र कविता- वह एक तूफानी साल*

(लेनिन की कविता नाम से काफी दिनों से इंटरनेट पर एक पोस्टर-कविता प्रचालन में है जो वस्तुतः लेनिन की नहीं है। लेनिन ने केवल एक ही कविता लिखी थी और वह भी उनकी रचनाओं के किसी संकलन में शामिल नहीं है। इस कविता का हिंदी अनुवाद श्री कंचन कुमार (संपादक- आमुख) ने किया था और पुस्तिका के रूप में उन्होंने ही इसे 1980 के दशक में प्रकाशित किया था। काफी प्रयास के बाद वह पुस्तिका मिल पायी जिसे यहाँ हुबहू दिया जा रहा है। अरुण मित्र द्वारा लिखित इसकी भूमिका में कविता के बारे में जो ऐतिहासिक तथ्य दिए गए हैं, वे भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।)

*लेनिन की कविता के बारे में*

1907 की गर्मी में लेनिन भूमिगत रूप से फिनलैण्ड में रहे। ज़ार के हुक्म से दूसरी दूमा 'रूसी संसद' उस वक्त तोड़ दी गई थी। लेनिन व सोशल डेमोक्रेट दल के दूसरे कार्यकर्ताओं के गिरफ़्तार होने का खतरा था। लेनिन फिनलैण्ड से भागकर बाल्टिक के किनारे उस विस्ता गांव में छहा्र नाम से कई महीने रहे। डेढ़ साल के लगातार तीव्र राजनीतिक कामों 'जिसका अधिकांश भूमिगत रूप से करना पड़ा था,' के बाद लेनिन को कुछ समय के लिए आराम करने का मौका मिला। इस अज्ञातवास में उनकी पार्टी के ही एक साथी उनके साथ रहे। एक दिन बाल्टिक के किनारे टहलते हुए लेनिन ने अपने साथी से कहा-पार्टी जनता में प्रचार के काम के लिए काव्य विधा का अच्छी तरह इस्तेमाल नहीं कर रही है; उनका दुख यह था कि प्रतिद्वन्द्वी सोशल रेवोल्येशनरी दल इस मामले में काफी समझदारी का परिचय दे रहे हैं। 'काव्य रचना सबके बूते की बात नहीं है', उनके साथी के यह बात कहने पर लेनिन ने कहा 'जिन्हें लिखने का अभ्यास है, काफी मात्रा में क्रान्तिकारी आकांक्षा तथा समझ है वह क्रांन्तिकारी कविता भी लिख सकते है'। उनके साथी ने उन्हें कोशिश करने के लिए कहा, इस पर, उन्होंने एक 'कविता' लिखने की शुरुआत की और तीन दिन बाद उसे पढ़कर सुनाया। इस लम्बी कविता में लंनिन ने 1901-1907 की क्रान्ति का एक चित्र उकेरा है- जिसके शुरुआती दौर को उन्होंने 'वसन्त' कहा है, उसके बाद शुरु हुए प्रतिक्रिया के दौर को उन्होंने 'शीत' कहा है, आहवान किया है मुक्ति के नये संग्राम के लिए। लेनिन की कविता जेनेवा में चन्द रूसी डेमोक्रेट कार्यकर्त्ताओं द्वारा स्थापित पत्र 'रादुगा' (इन्द्रधनुष) में छपने की बात थी। लेनिन ने कहा था, कविता में लेखक का नाम 'एक रूसी' दिया जाए, न कि उनका नाम। मगर कविता छपने से पहले ही वह पत्रिका बन्द हो गयी। पीटर्सबुर्ग से निर्वाचित डिप्टी, सोशल डेमोक्रेट ग्रेगोयार आलेकशिन्स्की का भूमिगतकालीन नाम पियतर आल था। कविता अब तक उनके संग्रह में ही छिपी रही। उन्होंने 1946 इसका फ्रांसीसी अनुवाद पहली बार फ्रेंच पत्रिका -L' arche में प्रकाशित किया। किसी भाषा में इससे पहले यह प्रकाशित नहीं हुई। जहाँ तक पता चलता है, इसके अलावा लेनिन ने और कोई कविता नहीं लिखी। यही उनकी एकमात्र कविता है। फ्रांसीसी से अनुवाद करके कविता नीचे दी जा रही है। जहां तक सम्भव है-लगभग शाब्दिक अनुवाद किया गया है। मर्जी मुताबिक कुछ जोड़ने या घटाने की कोशिश नहीं की गई है।

अरुण मित्र
शारदीय स्वाधीनता, 1947

वह एक तूफानी साल

वह एक तूफानी साल।
आँधी ने सारे देश को अपनी चपेट में ले लिया। बादल बिखर गए
तूफान टूट पड़ा हम लोगों पर, उसके बाद ओले और वज्रपात
जख्म मुँह बाए रहा खेत और गाँव में
चोट दर चोट पर।
बिजली झलकने लगी, खूँखार हो उठी वह झलकन।
बेरहम ताप जलने लगा, सीने पर चढ बैठा पत्थर का भार।
और आग की छटा ने रोशन कर दिया
नक्षत्रहीन अंधेरी रात के सन्नाटे को।

सारी दुनिया सारे लोग तितर-बितर हो गए
एक रूके हुए डर से दिल बैठता गया
दर्द से दम मानो धुटने लगा
बन्द हो गए तमाम सूखे चेहरे।
खूनी तूफान में हजारों हजार शहीदों ने जान गँवायी
मगर यूँ ही उन्होंने दुख नहीं झेला, यूँ ही काँटों का सेहरा नहीं पहना।
झूठ और अंधेरे के राज में ढोंगियों के बीच से
वे बढ़ते गए आनेवाले दिन की मशाल की तरह।

आग की लपटों में, हमेशा जलती हुई लौ में 
हमारे सामने ये कुर्बानी के पथ उकेर गए,
ज़िन्दगी की सनद पर, गुलामी के जुए पर, बेड़ियों की लाज पर
उन्होंने नफरत की सील-मुहर लगा दी।

बर्फ ने साँस छोड़ी, पत्ते बदरंग होकर झरने लगे,
हवा में फँसकर घूम-घूम कर मौत का नाच नाचने लगे।
हेमन्त आया, धूसर गालित हेमन्त।

बारिश की रुलाई भरी, काले कीचड़ में डूबे हुए।
इन्सान के लिए जिन्दगी घृणित और बेस्वाद हुई,
ज़िन्दगी और मौत दोनों ही एक-से असहनीय लगे उन्हें।
गुस्सा और र्दद लगातार उन्हें कुरेदने लगा।
उनका दिल उनके घर की तरह ही
बर्फीला और खाली और उदास हो गया।

उसके बाद अचानक वसन्त! 
एकदम सड़ते हेमन्त के बीचोंबीच वसन्त,
हम लोगों के उपर उतर आया एक उजला खूबसूरत वसन्त
फटेहाल मुरझाये मुल्क में स्वर्ग की देन की तरह,
ज़िन्दगी के हिरावल की तरह, वह लाल वसन्त!
मई महीने की सुबह सा एक लाल सवेरा
उग आया फीके आसमान में,
चमकते सूरज ने अपनी लाल किरणों की तलवार से
चीर डाला बादल को, कुहरे की कफन फट गयी।
कुदरत की वेदी पर अनजान हाथ से जलायी गयी
शाश्वत होमाग्नि की तरह
सोये हुए आदमियों को उसने रोशनी की ओर खींचा

जोशीले खून से पैदा हुआ रंगीन गुलाब,
लाल लाल फूल, खिल उठे
और भूली-बिसरी कब्रों पर पहना दिया
इ़ज्ज़त का सेहरा।
मुक्ति के रथ के पीछे
लाल झण्डा फहरा कर
नदी की तरह बहने लगी जनता
मानो वसन्त में पानी के सोते फूट पड़े हैं।
लाल झण्डा थरथराने लगा जुलूस पर,
मुक्ति के पावन मन्त्र से आसमान गूँज उठा,
शहीदों की याद में प्यार के आँसू बहाते हुए
जनता शोक-गीत गाने लगी।
खूशी से भरपूर।

जनता का दिल उम्मीद और ख्वाबों से भर गया,
सबों ने आनेवाली मुक्ति में एतबार किया
समझदार, बूढ़े, बच्चे सभी ने।
मगर नींद के बाद आता है जागरण।
नंगा यथार्थ,
स्वप्न और मतवालेपन के स्वर्गसुख के बाद ही आता है
वंचना का कडुवा स्वाद।
अन्धेरे की ताकतें छाँह में छिपकर बैठी थीं,
धूल में रेंगतें हुए वे फुफकार रहे थे;
वे घात लगाकर बैठे थे।
अचानक उन्होंने दाँत और छुरा गड़ा दिया
वीरों की पीठ और पाँव पर।
जनता के दुश्मनों ने अपने गन्दे मुँह से
गरम साफ खून पी लिया,
बेफिक्र मुक्ति के दोस्त लोग जब मुश्किल
राहों से चलने की थकान से चूर थे,
निहत्थे वे जब उनींदी बाँसे ले रहे थे
तभी अचानक उन पर हमला हुआ।

रोशनी के दिन बुझ गए,
उनकी जगह अभिशप्त सीमाहीन काले दिनों की कतार ने ले ली।
मुक्ति की रोशनी और सुरज बुझ गया,
अन्धरे में खड़ा रहा एक साँप-नजर।
घिनौने कत्ल, साम्प्रदायिक हिंसा, कुत्सा प्रचार
घोषित हो रहा है देशप्रेम के तौर पर,
काले भूतों का गिरोह त्योहार मना रहा है।
बेलगाम संगदिली से,
जो लोग बदले के शिकार हुए हैं
जो लोग बिना वजह बेरहमी से
विश्वासघाती हमले में मारे गये हैं
उन तमाम जाने-अनजाने शिकारों के खून से वे रंगे हैं।

शराब की भाप में गाली-गलौज करते हुए मुट्ठी  संभाले
हाथ में वोद्का की बोतल लिये कमीनों के गिरोह
दौड़ रहे है पशुओं के झुण्ड की तरह
उनकी जेब में खनक रहे गद्दारी के पैसे
वे लोग नाच रहे हैं डाकुओं का नाच।
मगर इयेमलिया,(1) वह गोबर गणेश
बम से डर से और भी बेवकूफ बन कर चूहे की तरह थरथराता है
और उसके बाद निस्संकोच कमीज़ पर
''काला सौ''(2) दल का प्रतीक टाँकता है।
मुक्ति और खुशी की मौत की घोषणा कर
उल्लुओं की हँसी में
रात के अन्धेरे में प्रतिध्वनि करता है।
शाश्वत बर्फ के राज्य से
एक खूखार जाड़ा बर्फीला तुफान लेकर आया,
सफेद कफन की तरह बर्फ की मोटी परत ने
ढँक लिया सारे मुल्क को।
बर्फ की साँकल में बाँधकर जल्लाद जाड़े ने बेमौसम मार डाला
वसन्त को।

कीचड़ के धब्बे की तरह इधर-उधर दीख पड़ते हैं
बर्फ से दबे बेचारे गाँवों की छोटी-छोटी काली कुटियों के शिखर
बुरे हाल और बदरंग जाड़े के साथ भूख ने
अपना गढ़ बना लिया है सभी जगह तमाम दूषित घरों को।
गर्मी में लू जहाँ आग्नेय उत्ताप को लाती है
उस अन्तहीन बर्फीले क्षेत्र को घेर कर
सीमाहीन बेइन्तहा स्तेपी को घेर कर
तुषार के खूखार वेग आते-जाते हैं सफेद चिड़ियों की तरह।
बंधन तोड़ वे तमाम वेग सांय-सांय गरजते रहे,
उनके विराट हाथ अनगित मुठियों से लगातार बर्फ फेंकते रहे।
वे मौत का गीत गाते रहे
जैसे वे सदी-दर-सदी गाते आए हैं।
तूफान गरज पड़ा रोएँदार एक जानवर की तरह
ज़िदगी की धड़कन जिनमें थोड़ी सी भी बची है उन पर टूट पड़े,
और दुनिया से ज़िदगी के तमाम निशान धो डालने के लिए
पंखवाले भयंकर साँप की तरह झटपट करते हुए उड़ने लगे।
तूफान ने पहाड़ सा बर्फ इकट्ठा करके
पेड़ पौधों को झुका दिया, जंगल तहस-नहस कर दिया।
पशु लोग गुफा में भाग गये हैं।
पथ की रेखाएँ मिट गयी हैं, राही नदारद हैं।

हडडीसार भूखे भेडिए दौड़ आए,
तूफान के इर्द-गिर्द घूमने-फिरने लगे,
शिकार लेकर उनकी उन्मत छीनाझपटी
और चाँद की ओर चेहरा उठाकर चीत्कार,
जो कुछ जीवित हैं सारे डर से काँपने लगे।
उल्लू हँसते हैं, जंगली लेशि(3) तालियाँ बजाते हैं
मतवाले होकर काले दैत्यलोग भँवर में घूमते हैं
और उनके लालची होंठ आवाज करते हैं-
उन्हें मारण-यज्ञ की बू मिली है,
खूनी संकेत का वे इन्तजार करते हैं।

सब कुछ के उपर, हर जगह मौन, सारी दुनिया में बर्फ जमी हुई।
सारी ज़िन्दगी मानो तबाह है,
सारी दुनिया मानो कब्र की एक खाई है।
मुक्त रोशन ज़िदगी का और कोई निशान नहीं है।

फिर भी रात के आगे दिन की हार अभी भी नहीं हुई,
अभी भी कब्र का विजय-उत्सव ज़िदगी को नेस्तानाबूद नहीं करता।
अभी भी राख के बीच चिनगारी धीमी-धीमी जल रही है,
ज़िदगी अपनी साँस से फिर उसे जगाएगी।

पैरों से रौंदे हुए मुक्ति के फूल
आज एकदम नष्ट हो गये हैं,
''काले लोग''(4) रोशनी की दुनिया का खौफ देख खुश हैं,
मगर उस फूल के फल ने पनाह ली है। 
जन्म देने वाली मिट्टी में।
माँ के गर्भ में विचित्र उस बीज ने
आँखों से ओझल गहरे रहस्य में अपने को जिला रखा है,
मिट्टी उसे ताकत देगी, मिट्टी उसे गर्मी देगी,
उसके बाद एक नये जन्म में फिर वह उगेगा।
नयी मुक्ति के लिए बेताब जीवाणु वह ढो लाएगा,
फाड़ डालेगा बर्फ की चादर,
विशाल वृक्ष के तौर पर बढ़कर लाल पत्ते फैलाए
दुनिया को रोशन करेगा,
सारी दुनिया को,
तमाम राष्ट्र की जनता को उसकी छाँह में इकट्ठा करेगा।

हथियार उठाओ, भाइयो, सुख के दिन करीब हैं।
हिम्मत से सीना तानो। कूद पड़ो, लड़ाई में आगे बढ़ो।
अपने मन को जगाओ। घटिया कायराना डर को दिल से भगाओ!
खेमा मजबूत करो! तनाशाह और मालिकों के खिलाफ
सभी एकजुट होकर खड़े हो जाओ!
जीत की किस्मत तुम्हारी मतबूत मजदूर मुट्ठी में!
हिम्मत से सीना तानो! ये बुरे दिन जल्दी ही छंट जाएंगे!
एकजुट होकर तुम मुक्ति के दुशमन के खिलाफ खड़े हो!
वसन्त आएगा... आ रहा है... वह आ गया है।
हमारी बहुवांछित अनोखी खूबसूरत वह लाल मुक्ति 
बढ़ती आ रही है हमारी ओर!
तनाशाही, राष्ट्रवाद, कठमुल्लापन ने
बगैर किसी गलती के अपने गुणों को साबित किया है
उनके नाम पर उन्होंने हमें मारा है, मारा है, मारा है,
उन्होंने किसानों की हाड़माँस तक नोचा है,
उन लोगों ने तोड़ दिए है दाँत,
जंजीर से जकड़े हुए इन्सान को उन्होंने कैदखाने में दफनाया है।
उन्होंने लूटा है,  उन्होंने कत्ल किया है
हमारी भलाई के लिए कानून के मुताबिक,
ज़ार की शान के लिए, साम्राज्य की भलाई के लिए!
जार  के गुलामों ने उसके जल्लादों को तृप्त किया है,
उनकी सेनाओं ने उसके लालची ग़िद्धो को दावत दी है
राष्ट्र की शराब और जनता के खून से।
उनके कातिलों को उन्होंने तृप्त किया है,
उनके लोभी गिद्धों को मोटा किया है,
विद्रोही और विनीत विश्वासी दासों की लाश देकर।
ईसा मसीह के सेवकों ने प्रार्थना के साथ
फांसी के तख्तों के जंगल में पवित्र जल का छिड़काव किया है।
शाबाश, हमारे ज़ार की जय हो!
जय हो उसका आशीर्वादप्राप्त फाँसी की रस्सी की!
जय हो उसकी चाबुक-तलवार-बन्दूकधारी पुलिस की!

अरे फौजियो, एक गिलास वोद्का में
अपने पछतावों को डुबो दो!
अरे ओ बहादुरों, चलाओ गोली बच्चो और औरतों पर!
जहाँ तक हो सके अपने भाइयों का कत्ल करो
ताकि तुम लोगों के धर्म पिता खुश हो सकें!
और अगर तुम्हारा अपना बाप गोली खाकर गिर पड़े
तो उसे डूब जाने दो अपने खून में, हाथ के कोड़े से टपकते खून में!
जार की शराब पीकर हैवान बनकर
बगैर दुविधा के तुम अपनी माँ को मारो।

क्या डर है तुम्हें?
तुम्हारे सामने जो लोग हैं वे तो जापानी(5) नहीं हैं।
वे निहायत ही तुम्हारे अपने लोग हैं
और वे बिल्कुल निहत्थे हैं।
हे ज़ार के नौकरो, तुम्हें हुक्म दिया गया है
तुम बात मत करो, फाँसी दो!
गला काटों! गोली चलाओं! घोडे़ के खुर के नीचे कुचल दो!
तुम लोगों के कारनामों का पुरस्कार पदक और सलीब मिलेगा...
मगर युग-युग से तुमलोगों पर शाप गिरेगा
अरे ओ जूडास के गिरोह!

अरी ओ जनता, तुम लोग अपनी आखिरी कमीज दे दो,
जल्दी जल्दी! खोल दो कमीज!
अपनी आखिरी कौड़ी खर्च करके शराब पीओ,
ज़ार की शान के लिए मिट्टी में कुचल कर मर जाओ!
पहले की तरह बोझा ढोनेवाले पशु बन जाओ!
पहले की बोझा ढोने वाले पशु बन जाओ!
हमेशा के गुलामों, कपड़े के कोने से आंसु पोंछो
और धरती पर सिर पटको!
विश्वसनीय सुखी
आमरण ज़ार को जान से प्यारी, हे जनता,
सब बर्दाश्त करते जाओ, सब कुछ मानते चलो पहले की तरह...
गोली! चाबुक! चोट करो!

हे ईश्वर, जनता को बचाओ(6)
शक्तिमान, महान जनता को!
राज करे हमारी जनता, डर से पसीने-पसीने हों ज़ार के लोग!
अपने घिनौने गिरोह को साथ लेकर हमारा जार आज पागल है,
उनके घिनौने गुलामों के गिरोह आज त्योहार मना रहे हैं,
अपने खून से रंगे हाथ उन्होंने धोये नहीं!
हे ईश्वर, जनता को बचाओ!
सीमाहीन अत्याचार!

पुलिस की चाबुक!
अदालत में अचानक सजा
मशीनगन की गोलियों की बौछार की तरह!
सजा और गोली बरसाना,
फाँसी के तख्तों का भयावह जंगल,
तुमलोगों को विद्रोह की सजा देने के लिए!

जेलखाने भर गए हैं
निर्वासित लोग अन्तहीन दर्द से कराह रहें हैं,
गोलियों की बौछार रात को चीर डाल रही है।
खाते खाते गिद्धों को अरुचि हो गई है।
वेदना और शोक मातृ भूमि पर फैल गया है।
दुख में डूबा न हो, ऐसा एक भी परिवार नहीं है।
अपने जल्लादों को लेकर
ओ तानाशाह, मनाओ अपना खूनी उत्सव
ओ खून चूसनेवालों, अपने लालची कुत्तों को लगाकर
जनता का माँस नोंच कर खाओ!
अरे तानाशाह, आग बरसाओ!
हमारा खून पिओ, हैवान!
मुक्ति, तुम जागो!
लाल निशान तुम उड़ो!

और तुम लोगों अपना बदला लो, सजा दो,
आखिरी बार हमें सताओ!
सज़ा पाने का वक्त करीब है,
फैसला आ रहा है, याद रखो!
मुक्ति के लिए
हम मौत के मुँह में जाएंगे; मौत के मुँह में
हम हासिल करेंगे सत्ता और मुक्ति,
दुनिया जनता की होगी!

गैर बराबरी की लड़ाई में अनगिनत लोग मारे जाएँगे!
फिर भी चलो हम आगे बढ़ते जाऐँ 
बहुवांछित मुक्ति की ओर!
अरे मजदूर भाई! आगे बढ़ो!
तुम्हारी फौज लड़ाई में जा रही है
आजाद आँखें आग उगल रही हैं
आसमान थर्राते हुए बजाओ श्रम का मृत्युंजयी घण्टा!
चोट करो, हथौड़ा! लगातार चोट करो!
अन्न! अन्न! अन्न!

बढ़े चलो किसानों, बढ़े चलो।
जमीन के बगैर तुम लोग जी नही सकते।
मलिक लोग क्या अभी भी तुमलोगों का शोषण करते रहेंगे?
क्या अभी भी अनन्तकाल तक वे तुमलोगों को पेरते रहेंगे?

बढ़े चलो छात्र, बढ़े चलो।
तुमलोंगों में से अनेकों जंग में मिट जाएँगे।
लालफीता लपेट कर रखा जाएगा
मारे गए साथियों का शवाधार।

जानवरों के शासन के जुए
हमारे लिए तौहीन हैं।
चलो, चूहों को उनके बिलों से खदेडें 
लड़ाई में चलों, अरे ओ सर्वहारा!
नाश हो इस दुखदर्द का!
नाश हो ज़ार और उसके तख्त का!
तारों से सजा हुआ मुक्ति का सवेरा
वह देखों उसकी दमक झिलमिला रही है!

खुशहाली और सच्चाई की किरण
जनता की नजर के आगे उभर रही है।
मुक्ति का सूरज बादलों को चीर कर
हमें रोशन करेगा।

पगली घण्टी की जोशीली आवाज
मुक्ति का आवाहन करेगी
और ज़ार के बदमाशों को डपटकर कहेगी
''हाथ नीचा करो, भागो तुम लोग।''

हम जेलखाने तोड़ डालेंगे।
जायज गुस्सा गरज रहा है।
बन्धनमोचन का झण्डा
हमारे योद्धाओं का संचालन है।

सताना, उखराना,(7)
चाबुक, फाँसी के तख्तों का नाश हो!
मुक्त इन्सानों की लड़ाई, तुम तुफान सी पागल बनो!
जलिमों, मिट जाओ!

आओ जड़ से खत्म करें
तानाशाह की ताकत को।
मुक्ति के लिए मौत इज्जत है,
बेड़ियों में जकड़ी हुई जिन्दगी शर्म है।

आओ तोड़ डालें गुलामी को,
तोड़ डालें गुलामी की शर्म को।
हे मुक्ति, तुम हमें
दुनिया और आजादी दो!

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1.         रूसी लोग इयेमलिया नाम बेवकूफी के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते है।
2.         ज़ार के जमाने का चरम प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दल।
3.         रूस का अपदेवता।
4.         हर जगह ''काला सौ'' न कहकर ''काला'' से ही लेनिन ने उस दल को बताया है।
5         साफ है लेनिन ने रूस-जापान युद्ध में ज़ार की सेनाओं के पलायन तथा पराजय का उल्लेख        किया है।
6    ज़ार साम्राज्य संगीत की पंक्ति 'हे ईश्वर, ज़ार को बचाओं' को बदल कर लेनिन ने इस तरह          इस्तेमाल किया है।
7    क्रान्तिकारी आन्दोलन के दमन में जुटा हुआ ज़ार का राजनीतिक गुप्तचर विभाग।

साभारः विकल्प

साहित्य के अध्येताओं के लिए एक सूचना और कि इस अनुवाद में धूमिल की प्रमुख भूमिका थी। पुस्तिका में उनका नाम भी अनुवादक के रूप में छपा था ।
साभार : गोपाल प्रधान

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अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (मई दिवस) 1 मई 2022



*अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (मई दिवस) 1 मई 2022*
   
आधुनिक मशीनों पर अपनी श्रमशक्ति बेचने वाला मजदूर और आधुनिक मशीनों का मालिक दोनों साथ साथ पैदा हुए। मजदूर हमेशा नहीं थे और पूंजीपति भी। इनका इतिहास बहुत पुराना नहीं है।  
 
कबीलाई युग में सभी लोग काम करते मिल बांटकर खाते थे। कोई मालिक और कोई मजदूर नहीं था। निजी सम्पत्ति के उदय के बाद दास और दास मालिक नाम के दो वर्ग बने। दास प्रथा के युग में मालिक वर्ग श्रम करने वालों को ही खरीद लेता था। सामंती युग आया तो श्रमिक भूदासों के उत्पादों को ही लगान के तौर पर सामन्ती मालिक वर्ग हड़पने लगा। फिर पूंजीवादी युग आया इस युग में मालिक वर्ग श्रम करने वाले मजदूरों की श्रमशक्ति खरीदने लगा। 
  
मजदूर जो मूल्य पैदा करता है पूंजीपति उस मूल्य का एक छोटा सा भाग मजदूर की श्रमशक्ति खरीदने में लगाता है बाकी सारा अतिरिक्त मूल्य हड़प लेता है। मजदूर की दशा दिनो-दिन बदतर होती जाती है और पूंजीपति दिनों-दिन अमीर से अमीर होता जाता है। यहीं से शुरू होता है मजदूरों और पूंजीपतियों के बीच अन्तर्विरोध। 'उत्पादन सामूहिक और मालिकाना व्यक्तिगत' यही अन्तर्विरोध का मुख्य आधार होता है। शुरुआत में मजदूर संगठित होकर हल्की तोड़-फोड़ करते हैं, फिर कुछेक कारखानों में हड़ताल होती है, फिर कई कारखानों में होते हुए हड़ताल देशव्यापी हो जाता है। पहले वे आर्थिक मांगों को लेकर लड़ते हैं, इसमें राबर्ट ओवेन जैसे समाजवादी विचारक आते हैं जो पूंजीपतियों को समझा-बुझाकर मजदूरों की दशा को बेहतर बनाना चाहते हैं। फिर मजदूर वर्ग के बाहर से मार्क्स, एंगेल्स जैसे बुद्धिजीवी मजदूर आन्दोलन में शामिल होते हैं, ये लोग मजदूरों में क्रान्तिकारी विचारों का बीजारोपण करते हैं। और बताते हैं कि राबर्ट ओवेन का मानना है कि समाजवाद पूंजीपतिवर्ग की इच्छा से आएगा यह काल्पनिक समाजवाद है जो कभी नहीं आने वाला है क्योंकि पूंजीपतिवर्ग अपनी कब्र खुद नहीं खोदेगा, और यह भी बताया कि मजदूर वर्ग बलपूर्वक पूंजीपतिवर्ग का तख्तापलट कर ही समाजवाद कायम करेगा। 

मार्क्स एंगेल्स के विचारों के आधार पर मजदूर वर्ग की अपनी पार्टी बनती है, और मजदूर वर्ग पहली बार 1871 में फ्रान्स में पूंजीपतिवर्ग का तख्तापलट कर अपनी सरकार बनाता है। इससे पूरी दुनियां का पूंजीपतिवर्ग थर्रा उठता है। मजदूर वर्ग सत्ता पर काबिज होकर समाजवादी अर्थव्यवस्था की बुनियाद डालता है जिसमें सबको योग्यतानुसार काम और काम के अनुसार दाम मिलता है। मगर सिर्फ 72 दिन तक ही मजदूरों की सरकार चल पाती है। कई देशों के पूंजीपति मिलकर अपनी सेना भेजकर 'मजदूर वर्ग की पेरिस कम्यून क्रान्ति' को खून की नदी में डुबो देते हैं। इसके बाद 1917 में रूस में मजदूरों ने एक करोड़ बयालिस लाख सैनिकों वाली जारशाही हुकूमत का तख्तापलट दिया और दुनिया भर के पूंजीपतियों के तमाम हमलों, घेरेबन्दियों के बावजूद रूस में 72 साल तक सरकार चलाई। सन 1949 में चीन में मजदूरों ने 80 लाख सैनिकों वाली च्यांगकाई शेक की सरकार को परास्त कर अपनी सरकार बनायी जो आज भी बहुत शानदार तरीके से चल रही है। इसके अलावा क्यूबा, वियतनाम, वल्गारिया, लाओस, कम्बोडिया, उत्तर कोरिया आदि दर्जनों देशों में मजदूर वर्ग की कम्यूनिस्ट पार्टियों की सरकारें चल रही हैं। बताते चलें कि मजदूर वर्ग के इन संघर्षों में किसानों की भी बड़ी भूमिका रही है।

मजदूरों का यह शानदार इतिहास मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्से तुंग विचारधारा पर चलने के कारण बना है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी जैसे शोषक वर्ग के मजबूत नेता भी कम्यूनिस्ट विचारधारा से भयभीत होकर कहते हैं- "...विचारधारा बहुत खतरनाक है।"
  
आज  जिन देशों में मजदूरों की दुर्दशा हो रही है, वह मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्से तुंग विचारधारा न अपनाने या रूस की तरह छोड़ देने या सही तरीके से अमल न कर पाने के कारण हो रही है। 
  
आज की अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखें तो विश्वपूंजीवाद भयानक महामंदी में फंसा हुआ है। 2008 से जारी विश्वपूंजुवाद की महामंदी अब अन्तहीन महामंदी में बदल चुकी है। इससे उबरने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद विश्वयुद्ध करना चाहता है, परन्तु शक्ति संतुलन उसके पक्ष में अभी नहीं है तो वह यूक्रेन को रूस के खिलाफ लड़ा कर एक तरफ़ अपना हथियार और दवाएं बेचकर भारी सूद, रायल्टी और मुनाफा कमा रहा है तो दूसरी तरफ यूक्रेन होते हुए यूरोप जाने वाली रूस की गैस पाइपलाइन के निर्माण में व्यवधान डाल रहा है, साथ ही साथ चीन की बेल्ट एण्ड रोड इनीशियेटिव जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना जो यूक्रेन होते हुए यूरोप जा रही है, उसमें भी टांग अड़ा रहा है। साथ ही साथ तीसरी दुनिया के देशों में कालेधन का इस्तेमाल करके जाति, धर्म, रंग, लिंग, नस्ल भाषा, क्षेत्र के नाम पर जनता को जनता से लड़ा रहा है। 

हमारे देश का मजदूर जातिवादी सम्प्रदायवादी नरपिशाचों के चंगुल में फंसा है जिसके कारण भयानक बेरोजगारी का दंश झेल रहा है। नरपिशाचों ने 44 श्रम कानूनों को रद्द कर चार श्रमसंहितायें लागू कर दिया है। जिससे मजदूरों के वे सारे अधिकार लगभग खत्म होते जा रहे हैं जिन अधिकारों को वे महान कुर्बानियां देकर हासिल किये थे।
हमारे देश में भूमिहीन व गरीब किसान भुखमरी के कगार पर खड़ा है, नौजवानों के पास रोजगार नहीं है, चुनाव जीतने के लिए सीमा पर जवानों का वध कराया जा रहा है। जातिवादी और साम्प्रदायिक ताकतें राष्ट्रवाद और संस्कृति की खोल ओढ़ कर जनता को जनता से लड़ा रही हैं। जितना ही मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी आदि में बढ़ोत्तरी हो रही है उतना ही काला धन झोंका जा रहा है, जितना ही काला धन झोंका जा रहा है उतना ही भाड़े के दंगाई लोग गाय, गोबर, गंगा, गीता, मन्दिर, मस्जिद के नाम पर दंगे-फसाद बढ़ाते जा रहे हैं।

 ऐसी ही परिस्थिति में हम मई दिवस यानी अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर मना रहे हैं।
राबर्ट ओवेन के काल्पनिक विचारों को मार्क्स,-ऐंगेल्स अपना कम्यूनिस्ट घोषणा पत्र लिख कर खारिज कर चुके थे। कम्यूनिस्ट घोषणापत्र के आलोक में 1871 की पेरिस कम्यून क्रान्ति हो चुकी थी। इसी विचारधारा की रोशनी में 15-20 घंटे की बजाय 8 घंटे काम की मांग को लेकर  4 मई 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर के हे मार्केट में मजदूरों ने भारी प्रदर्शन किया। अमेरिकी पुलिस ने आन्दोलन को कुचलने के लिए मजदूरों पर बेरहमी से गोलियां चलाई जिसमें दर्जनों मजदूर शहीद हो गए। कई मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर कारावास और फांसी तक की सजा दी गयी। इन्हीं मजदूरों की याद में हम 1 मई को प्रतिवर्ष अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है।

इसको मनाने का इतिहास इस तरह है- इंटरनेशनल वर्किंगमेन एसोसिएशन, जिसे फर्स्ट इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है, जिसकी स्थापना 1864 में लंदन में सभी समाजवादी और कम्युनिस्ट संगठनों के लिए एक 'छतरी संगठन' के रूप में हुआ था। 1876 ​​में कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते फर्स्ट इंटरनेशनल के भंग होने के बाद, सेकेण्ड इंटरनेशनल 1889 में समाजवादी और श्रमिक दलों के एक संयुक्त संगठन के रूप में उभरा। यही वह संगठन था जिसकी 1889 की पहली बैठक में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। बताते चलें कि 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा भी इसी बैठक में हुई। 
 
तभी से हम 1मई को मजदूर वर्ग की शानदार शहादतों से भरे हुए इतिहास को याद करते हैं।
                                       इंकलाब जिन्दाबाद।
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*शिकागो के शहीद मज़दूर नेता*
(1)अल्बर्ट पार्सन्स, जन्म: 20 जून 1848, मृत्यु: 11 नवम्बर 1887 को फांसी, पेशा: प्रिंटिंग प्रेस का मजदूर।
(2)आगस्ट स्पाइस, जन्म: 10 दिसम्बर 1855, मृत्यु: 11 नवम्बर 1887 को फाँसी,पेशा: फर्नीचर कारीगर।
(3) एडॉल्फ़ फिशर, जन्म 1858, मृत्यु 11 नवम्बर 1887 को फाँसी, पेशा: प्रिण्टिंग प्रेस का मज़दूर।
(4) जॉर्ज एंजिल, जन्म : 15 अप्रैल 1836, मृत्यु: 11 नवम्बर 1887 को फाँसी, पेशा: खिलौने बेचने वाला।
(5) सैमुअल फील्डेन, जन्म: 25 फ़रवरी 1847, मृत्यु: 7 फ़रवरी 1922, पेशा: सामानों की ढुलाई करने वाला मजदूर।
(6) माइकेल श्राब, जन्म: 9 अगस्त 1853, मृत्यु: 29 जून 1898, पेशा: बुकबाइण्डर।
(7) लुइस लिंग्ग, जन्म: 9 सितम्बर 1864, मृत्यु: 10 नवम्बर 1887 (जेल की कोठरी में आत्महत्या) पेशा: बढ़ई।
(8) ऑस्कर नीबे, जन्म: 12 जुलाई 1850, मृत्यु: 22 अप्रैल 1916, पेशा: खमीर बेचनेवाली एक दुकान में भागीदारी।

*इंकलाब - जिन्दाबाद!   साम्राज्यवाद- मुर्दाबाद!!*

*रजनीश भारती*
*जनवादी मजदूर सभा*

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मई दिवस पर


*दुनिया के मजदूरों एक हो*

"सर, आप लोग मुझे क़त्ल के इल्जाम में फांसी देना चाहते हैं, मैं इसलिए उसका विरोध कर रहा हूँ क्योंकि मैंने किसी का क़त्ल नहीं किया. हाँ, अगर आप मझे मेरे विचारों के लिए फांसी पर लटका रहे होते, इसलिए मुझे सज़ा-ए-मौत दे रहे होते कि मैं इंसानों की आज़ादी, बराबरी और भाईचारे, उनके गरिमापूर्ण जीवन की बात करता हूँ तो मैं उसका विरोध भी ना करता. मैं क़ातिल नहीं हूँ. अगर सच्चाई के साथ खड़े होने की सज़ा मौत है तो मैं ख़ुशी से अपनी जान अर्पित कर देता. मुझे क़ातिल कहे जाने से आपत्ति है. हाँ, मैं ये स्वीकार करता हूँ कि 4 मई 1886 को हे मार्केट में हुई मज़दूर सभा के आयोजकों में मैं भी था, मैं सभा में भी मौजूद था और मैंने अपने मज़दूर साथियों के अधिकारों के लिए भाषण भी दिया था. मैंने भाषण दिया, बम नहीं फेंका. (उसी वक़्त मज़दूरों के वकील मशहूर मानवाधिकार योद्धा मोसेस सालोमन उनके कटघरे में गए और उनके कान में फुसफुसाया लेकिन उन्होंने उन्हें भी पीछे धकेल दिया; मुझे बोलने दो). एक दिन पहले पुलिस ने हमारे साथियों को जिस तरह मारा उससे मैं बहुत आक्रोशित था. रात में हमारी मीटिंग हुई. मुझे परचा लिखने की ज़िम्मेदारी दी गई. मैंने परचा लिखा और उसकी 25000 प्रतियाँ छपवाईं और बांटीं. मैंने पर्चे में लिखा की मज़दूरो मीटिंग में 'तैयारी के साथ' आओ क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि पुलिस हम मज़दूरों को एक दिन पहले की तरह भून डाले. हालाँकि जब साथी पार्संस ने मुझे समझाया कि ऐसा लिखना ग़लत है क्योंकि इसका ग़लत अर्थ निकाला जा सकता है तो मैं मान गया था कि वो सही कह रहे हैं. हमने अपने साथियों के, पुलिस द्वारा गोलियां बरसाकर किए गए हत्याकांड का विरोध करने करने के लिए मीटिंग आयोजित की थी. हम वहाँ किसी को मारने के लिए मीटिंग नहीं कर रहे थे. मीटिंग पूरी भी नहीं हुई थी कि बारिश होने लगी. फिर हम कई साथी ज़ेम्फ हॉल में चले गए. मैंने और पार्सन्स ने बियर मंगाई. वो ख़त्म भी नहीं हुई थी कि बाहर बिस्फोट हो गया. क़त्ल तो छोडिए, मैंने अपने जीवन में कोई अपराध नहीं किया.

अगर आप ये जानना चाहते हैं कि क़ातिल कौन है, तो मैं कहता हूँ, असली क़ातिल ग्रिन्नेल है. (ग्रिन्नेल सरकारी वकील था). ये सब झूठे गवाह ग्रिन्नेल ही लेकर आ रहा है. वे सब झूठी कसम खाकर झूटे बयान दे रहे हैं जिसका परिणाम हम सब के क़त्ल में होगा. ग्रिन्नेल होने वाले क़ातिल का नाम है. एक बात मैं स्पष्ट कर दूँ, अगर शासक वर्ग सोचता है कि हमें मारने से आप हमारे विचारों को मार पाएँगे तो आप ग़लत सोच रहे हैं. हम वो लोग हैं जिन्हें अपने विचार अपनी जान से ज्यादा प्यारे होते हैं. विचारों को फांसी नहीं दी जा सकती. दबाने से वे और फैलेंगे. सच बात तो ये है कि ज्यूरी के जो 12 'सम्माननीय जज' हैं, वे अगर हमारी मौत की सज़ा सुनाएँगे तो हमारे विचारों का प्रचार-प्रसार करने में वे बहुत अहम योगदान करेंगे. आपका ऐसा फैसला बोलने की आज़ादी, प्रेस की आज़ादी और सोचने की आज़ादी पर एक भयानक हमला होगा. बस मुझे और कुछ नहीं कहना."

*एडोल्फ फिशर*
*शिकागो के शहीद मजदूर नेता*

उन्हें 11 नवम्बर 1887 को जॉर्ज एंजिल, अल्बर्ट पार्संस और अगस्त स्पाइस के साथ फांसी पर लटका दिया गया था. चारों साथियों ने पहले पेरिस कम्यून का मर्शेल्स गीत गाया और फिर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल. फांसी से पहले अगस्त स्पाइस ने चीखकर कहा था "वक़्त आने वाला है जब हमारी बंद आवाजें दहाड़ेंगी". इन क्रांतिकारियों को फांसी सरे आम दी गई थी. उनके परिवार वालों को आने की अनुमति नहीं थी जबकि शहर के बड़े उद्योगपति वो 'तमाशा' देखने को मौजूद थे.

*मई दिवस जिंदाबाद*

*शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम*

*सत्य वीर सिंह*

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*सुना है हमने*

सरकार कहती है
चल रहा है नक्सलमुक्त अभियान
क्योंकि,
नक्सलवाद ने बाध्य कर रखा है 
गांवों के विकास को,

अगर यह सच है तब
पूर्ण विकसित होना चाहिए वह क्षेत्र
जहां नहीं हैं हथियारबंद दस्ता
यानी जहां नहीं है नक्सलवाद

यानी शहरों में, कस्बों में....
पर सुना है हमने

देश के खदानों में 
कैद है कई मुर्दे
शायद सुरंग धंस जाने से 
मर जाते हैं मजदूर।
सुना है हमने
फोर लेन सड़कों के किनारें
बड़े मॉल के बाहर
स्टेशनों और चौराहों पर
मिलते हैं मासूम बच्चे
भीख मांगते या प्लास्टिक चुनते
शायद आज भी उनके भविष्य का
कोई ठिकाना नहीं

सुना है हमने
आज भी शहरों में
घुमते हैं खानाबदोश
ढुंढते रहते हैं दर—बदर आशियाना
शायद उनके सर पर
आज भी छत नहीं है

सुना है हमने
आज भी अस्पताल के सामने
तोड़ देते हैं दम लोग
शायद महंगा इलाज 
उनकी क्षमता के बाहर होता है

सुना है हमने
ईंट ढोतीं मजदूर औरतें
सहती है जुल्म और अपमान
गंदी नजरों का शोषण
फिर भी साधती हैं चुप्पी
शायद बच्चों के भूखे चेहरे
उसे मजबूर करते हैं 
अपमान सहकर भी काम करने को

सुना है हमने
एक औरत अपनी बच्ची को
डरती है
अकेले कहीं भेजते वक्त 
शायद महसूस करती है
बेटियों की असुरक्षा को

सुना है हमने
आज भी हर बच्चों की पहुंच से
दूर है पढ़ाई
क्योंकि सरकारी स्कूलेों की इमारतें
हैं बस ढांचे बनकर खड़ी
और दूसरी तरफ 
बिक रही है शिक्षा बहुत महंगें दामों में

सुना है हमने
आज भी युवा करते हैं सुसाइड
शायद सारे सर्टिफिकेट भी उन्हें
नहीं दिला पाता एक रोजगार

सुना है हमनें 
जगह जगह चल रहा है 
मजदूरों का संघर्ष
शायद इतना तीखा है शोषण का रूप 

सुना है हमने
चार पांच मंजिलों वाले क्वाटर के लोग भी
जूझ रहें हैं पानी बिजली की समस्या से
महंगाई, बेरोजगारी की समस्या से

सुना है हमने
फैक्टरियों के अंदर धूं—धूं करके
जल जाते हैं मजदूर असुरक्षा के कारण
कोई कानून उनकी रक्षा नहीं करता
शायद कानून उनकी रक्षा 
करना भी नहीं चाहता

सुना है हमने
आज भी संतोष के नाम पर
कुछ नहीं है लोगों के पास
और लगता है हमें
हमने जो सुना है 
बहुत कम सुना है
समस्याओं की सच्चाई 
इससे कहीं जटिल हैं

क्या सरकार बता सकती है
ऐसा क्यों हैं?
जहां रोड हैं, इमारतें हैं,
फैक्टरियां हैं कारखानें हैं
स्कूल हैं, अस्पताल हैं
वहां समस्याएं क्यों हैं?
किसने किया है वहां विकास को बाधित

सरकार के मनसूबे साफ हैं
नहीं चाहिए उन्हें जनता का विकास
चाहिए पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का विकास
इसलिए चल रहा है नक्सलमुक्त अभियान

जो मासूम और भोले आदिवासी
नहीं जानते किसी का हिस्सा भी छीनना
छीनी जा रही है उनसे
उनकी शांतिपूर्ण जीवन जीने की आजादी
और सरकार चाहती है कि हम चुप रहें

क्योंकि सरकार कहती है
चल रहा नक्सलमुक्त अभियान
ऐसे में हमें तय करना होगा कि
हमें कहां खड़ा होना है
ऐसे शोषणमूलक अभियान के पक्ष में या
शोषण के विरूद्ध जनता की लड़ाई के साथ

*इलिका प्रिये*

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मजदूर दिवस

*मजदूर दिवस*

एक नहीं,कई-कई पीढ़ियों को वार देंगे
लड़ते हुए हम तुमसे सदियाँ गुज़ार देंगे

अँधेरों ने मेरे हिस्से का उजाला न दिया तो
हम रात के सीने में ख़ंजर उतार देंगे

*राज प्रभाकर*

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14वीं सदी के अंग्रेज किसानों के एक विद्रोह में उनका नारा वो बडा सरल सा सवाल था जिसका जवाब शासक वर्ग व उसके बुद्धिबेचू कभी नहीं दे सकते - 
जब आदम-हव्वा दुनिया में थे, तब भद्रजन कौन थे?
गौरतलब है कि जेंटलमैन/लेडी, सज्जन या भद्रलोक/भद्र महिला सभी भाषाओं में ये शब्द दूसरों के श्रम की लूट पर जीने वाले संपत्ति मालिकों के लिए ही प्रयुक्त होते हैं, पसीना बहाने वाले मेहनतकश जेंटलमैन/लेडी नहीं होते। सवाल सीधा था कि आदम-हव्वा के समय में जेंटलमैन अर्थात निजी संपत्ति मालिक नहीं थे तो निजी संपत्ति कहां से आई, कैसे बनी। 
यह बहुत सरल सवाल निजी संपत्ति की व्यवस्था के हमेशा से चले आने, कुदरती होने जैसे शासक वर्ग और उसके धर्मों, दर्शन, नैतिकता, आदि के प्रचार पर सीधी चोट था।
आज जब आधी से अधिक आबादी पूरी तरह संपत्ति विहीन अर्थात सर्वहारा बना दी गई है, जिंदा रहने वास्ते रोज अपना शरीर अर्थात श्रम शक्ति बेचना उसकी मजबूरी है, जबकि लगभग दस फीसदी के पास दौलत के अंबार इकट्ठा हैं, यह सवाल इस मजदूर वर्ग को और भी ऊंची आवाज में बुलंद करना होगा, इन मालिकों की संपत्ति को जब्त कर उसे सामाजिक संपत्ति बनाना होगा ताकि जो उत्पादन में हाथ लगायेगा, वही खाने के लिए हाथ बढाने का हकदार होगा, बैठकर खाने की गुंजाइश नहीं होगी। 
1 मई मजदूर दिवस का शिकागो के वीर मजदूर शहीदों के खून से लाल झंडा यही याद दिलाता है कि यह लडाई अभी भी जारी है, पूर्ण विजय तक जारी रहेगी।
मई दिवस जिंदाबाद!

*मुकेश असीम*

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*आह्वान*

आओ एक नये समाज बनाने की
 राह में बढ़ें।
वही समाज जिसके सपने के लिए
शिकागो के मजदूर शहीद हुए
वही सपना जिसके लिए
रुस व चीन की धरती लाल हुई
और लाल झंडे का परचम लहराया
जिसके बाद, उस सपने के लिए
होने लगे पूरे विश्व में संघर्ष  
हां शोषण मुक्त समाज का सपना
बराबरी के समाज का सपना
मेहनतकशों  के सत्ता का सपना
जिस सपने के लिए
आज भी जगह-जगह हो रहे हैं संघर्ष
अपने देश के अंदर भी
इस  बदलाव के लिए
चल पड़े हैं कई लोग संघर्ष की राह।

आओ अपने स्वार्थ को भूलकर
एक ऐसे समाज बनाने की
 राह में बढ़ें
दमन और शोषण को सहते हुए
बलिदान की राह पर चलते हुए
पूरी तत्परता से संघर्ष करते हुए
आओ पूरे आसमां में गूंजाए
इंकलाब के नारे
मजदूर एकता जिंदाबाद
इंकलाब जिंदाबाद
और आह्वान करें
इस बेहतर सपने के लिए
दुनिया के मजदूरों एक हो।
दुनिया के मेहनतकशों एक हो।।

*इलिका प्रिय*

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जॉर्ज एंजेल 11 दिसम्बर 1887 को शहीद हुए चार मज़दूर नेताओं में से एक

*दुनिया के मज़दूरो एक हो*

*जॉर्ज एंजेल 11 दिसम्बर 1887 को शहीद हुए चार मज़दूर नेताओं में से एक*

मैंने जर्मनी 1872 में  छोड़ा क्योंकि मशीनों ने कारीगरों को कंगाल कर दिया था और इन्सान जैसी ज़िन्दगी जीने लायक काम भी उनके हाथों को मिलना मुश्किल हो गया था. मैं अपने परिवार के साथ उस अमेरिका में आ गया जहाँ के आज़ादी के किस्से हमने बहुत सुने थे. आप मेरा पिछला इतिहास देख सकते हैं. बम फेंकना छोडिए, मैंने कभी कोई अपराध नहीं किया. ये पहला मौका है जब मैं किसी अदालत के अन्दर घुसा हूँ. अमेरिका महान देश है, दुनिया में सबसे अमीर है लेकिन यहाँ भी मैंने ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो कचरे के डिब्बे से निकालकर अपना पेट भरते हैं. उनकी ज़िन्दगी में कोई आनंद नहीं, कोई उत्साह नहीं. इस 'आज़ाद' मुल्क में आकर जब मैंने गौर से देखा तो पाया कि यहाँ भी कमोबेश वही हालात हैं. काम की तलाश में न्युयोर्क, फिलाडल्फिया भटका और बाद में शिकागो आ गया. हर तरफ वही हालात हैं. 

हम काम करना चाहते हैं. हमारे हाथों को काम क्यों नहीं मिलता? मैं ये सोचकर परेशान रहने लगा. फिर मैंने किसी से कार्ल मार्क्स का नाम सुना. मेरी मेहनत की कमाई के जो भी पैसे मेरी जेब में थे उनसे मैंने कार्ल मार्क्स, लासेल और हेनरी जॉर्ज की किताबें खरीदीं. मैं राजनीति को समझने लगा और जल्दी ही मेरी समझ आ गया कि 'चुनाव का अधिकार' तो एक धोखा है, एक पाखंड है. मैं जिस सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सभाओं में जाने लगा था, वो मैंने बंद कर दिया और 'इंटरनेशनल वर्किंग मेन एसोसिएशन' से जुड़ गया. मुझे जर्मनी में सुनी कार्ल शुर्त्ज़ की बात समझ आ गई कि समाजवाद के बगैर मज़दूरों की मुक्ति नहीं हो सकती. वे कहीं के भी नागरिक बनें,, बनें या ना भी बनें, मज़दूरों को इस व्यवस्था में कोई अधिकार नहीं मिल सकते. सारे कानून ऐसे हैं जो मज़दूरों की ज़िन्दगी से आज़ादी और खुशियों की चाह छीन लेते हैं. मैंने देखा, शिकागो के मज़दूर उसी समाजवाद की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे मैंने किताबों में पढ़ा था और मुझे उनसे जुड़कर बहुत ख़ुशी हुई.

मैं सरकारी वकील ग्रिन्नेल और उसके सहायक फर्दमेन को बताना चाहता हूँ कि आप हम 7 मज़दूरों को फांसी और एक को 15 साल जेल में डालकर समाजवादी आन्दोलन को नहीं रोक पाओगे. बस यही होगा कि अगर आप बोलने नहीं दोगे तो हम लड़ने का तरीका बदल लेंगे. मज़दूर बना कुछ भी सकते हैं, ये बात अगर आप की समझ नहीं आई है तो समझ लीजिए. मैंने हे मार्केट मीटिंग में भाषण दिया था और उससे पहले भी अनेकों बार भाषण दिया है. एक बात बताइये, मज़दूर ज़मीन के अन्दर खानों में जाकर ऐसी पुरानी जर्जर मशीनों में काम करते हैं जिनकी मरम्मत नहीं होती. फिर हादसा होता है सैकड़ों मज़दूर मर जाते हैं, क्या आप उस मालिक को फांसी देते हैं जो उन सब का कातिल है. नहीं ना? फिर जब हम इन्सान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए काम के घंटे 8 करना चाहते हैं, पगार में 10 सेंट बढ़ोत्तरी के लिए सभा करते हैं तो आप हम पर गोलियां क्यों चलाते हैं? और एक बात, क्या आप लोगों को ये 'चुनाव की आज़ादी' बिन लड़े मिल गई थी? आज जैसे हालात हैं उनमें मैं चुप नहीं बैठ सकता, ये बात मै स्पष्ट कर देना चाहता हूँ.

सारे अधिकार अमीरों को ही क्यों मिलते हैं? मज़दूरों के हिस्से कुछ भी क्यों नहीं आता. ऐसी सरकारों का मैं कभी भी सम्मान नहीं कर सकता. उनकी पुलिस और जासूसों के बावजूद मैं ऐसी सरकारों से लडूंगा. मैं पूंजीपतियों से भी ज्यादा ऐसी सत्ता से नफ़रत करता हूँ जो इस पूंजीवादी व्यवस्था को चलाती है, उन्हें ही सारे अधिकार देती है. जहाँ तक मेरे ऊपर इस आरोप की बात है कि मैं पूंजीवाद के नकारात्मक प्रभाव में आ गया हूँ , उस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना. मेरी सबसे बड़ी चाहत एक ही है कि मज़दूर अपने दोस्तों और दुश्मनों को जल्दी पहचान जाएँ. 

*जॉर्ज एंजेल  (15.04.1836-11.11.1887) *

*मई दिवस जिंदाबाद*
*शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम*

*साभार- सत्य वीर सिंह*



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Wednesday, 19 April 2023

चार्ल्स डार्विन : वो व्यक्ति जिसके सिद्धांतों ने बदल दी दुनिया

चार्ल्स डार्विन : वो व्यक्ति जिसके सिद्धांतों ने बदल दी दुनिया

19 अप्रैल महान वैज्ञानिक डार्विन की पुण्यतिथी पर

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डार्विन की युगांतरकारी पुस्तक 'ऑरिजन ऑफ स्पीसीज' के प्रकाशन के डेढ़ सौ साल पूरे हो रहे हैं। प्रकाशित होते ही इस किताब ने न सिर्फ दुनिया बल्कि खुद को देखने के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया था। हम कौन हैं? क्यों हैं? और कहां से आए हैं? आदिकाल से इंसान के दिमाग में उठने वाले इन सवालों का पहली बार सटीक और वैज्ञानिक जवाब डार्विन ने दिया था। विज्ञान के इतिहास में शायद 'प्राकृतिक चयन द्वारा जीवों के विकास' जैसा सरल और सुगम सिद्धांत कोई और न हो, फिर भी डेढ़ सदी में किसी दूसरे सिद्धान्त को इतना विरोध नहीं झेलना पड़ा है। हालांकि विज्ञान की बेशुमार खोजों, परीक्षणों और कठिन जांच-पड़तालों में यह सिद्धान्त खरा उतरा है। विकासवाद के सिद्धान्त के बिना आज जीव-विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

चार्ल्स डार्विन का जन्म बारह फरवरी, 1809 को ग्रामीण इंग्लैण्ड के शिक्षित और सम्पन्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनका मन बंधी-बंधाई स्कूली शिक्षा में नहीं लगता था। वे दिन रात पशु-पक्षियों के पीछे भागने, कीड़े-मकोड़े और पौधों की किस्में इकट्ठा करने में लगे रहते थे। चिढ़कर चिकित्सक पिता ने बालक चार्ल्स को एक पत्र में लिखा, ''तुम कुत्ता मारने और चूहा पकड़ने के अलावा किसी और काम के काबिल नहीं हो।'' यही चार्ल्स आगे चलकर विज्ञान और मानव जाति के लिए बहुत बड़ा वरदान साबित हुआ। पुराणपंथी शास्त्रीय शिक्षा व्यवस्था में न फंसकर डार्विन ने बचपन से ही खुली आंखों से दुनिया को देखने और खुले मन से उन पर विचार करने का हुनर सीख लिया था। सत्रह साल की उम्र में चार्ल्स ने एडिनबरा विश्वविद्यालय से चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई शुरू की। लेकिन वे परीक्षा में उत्तीर्ण न हो सके। पिता ने सोचा, डॉक्टर न सही, बेटा पादरी ही बन जाए। उन्हें धर्मशास्त्र में स्नातक बनने के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया गया। वहां भी डार्विन का ज्यादा समय प्रकृति वैज्ञानिकों के अड्डे पर बीतता। यहां कीड़े-मकोड़ों के नमूने इकट्ठा करने का उनका पुराना शौक जारी रहा। इस बीच वे कैंब्रिज में वनस्पति विभाग के अध्यक्ष प्रो. हेंसलो के काफी करीबी बन गये।

1831 में डार्विन ने जैसे-तैसे धर्मशास्त्र की पढ़ाई पूरी की। तभी प्रो हेंसलो ने दक्षिणी अमेरिका के तटीय और भूवैज्ञानिक अध्ययन के लिए पांच साल की यात्रा पर निकलने वाले जहाज एचएमएस बीगल में प्रकृति वैज्ञानिक के तौर पर उनका नाम सुझाया। मानो डार्विन के मन की मुराद पूरी हो गई हो। पिता से मुश्किल से इजाजत मिलने के बाद दिसम्बर 1831 को वे बीगल की रोमांचक यात्रा पर निकल पड़़े। इस यात्रा ने न सिर्फ एक डार्विन को पैदा किया, बल्कि जीव विज्ञान के भविष्य को पूरी तरह से बदल दिया।

दक्षिणी अमेरिका के बरसाती वनों में जीवन का प्राचुर्य और विविधता को देख डार्विन अवाक रह गये। उन्होंने हजारों की संख्या में पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, समुद्री जीवों के नमूने और प्राचीन विलुप्त प्राणियों के जीवाश्म (फॉसिल) इकट्ठा किए और उन्हें लंदन के संग्रहालयों में जांच-पड़ताल के लिए भेजते रहे। उनके दिमाग में कई सवाल भी उठते रहे।

बचपन से ही डार्विन को यह विश्वास दिलाया गया था कि आज से कोई छः हजार साल पहले ईश्वर ने धरती और उसके सभी प्राणियों सहित ब्राहमांड की हर चीज को, आज वह जिस रूप में है, उसी तरह रचा था। बाइबिल और कुरान के मुताबिक, अगर सृष्टि का यह काम यह सिर्फ छः दिनों में पूरा हुआ तो कुछ लोगों का कहना था कि भगवान ने एक साथ चौंसठ लाख योनियों में प्राणी जगत के हर सदस्य की अपरिवर्तनीय रूप में रचना की। फिर प्राचीन चट्टानों के नीचे दबे विलुप्त प्राणियों के जीवाश्म क्या हैं? और आज के प्राणियों से उनका क्या रिश्ता है? डार्विन को प्राचीन जीवाश्मों और आज के जीवों के बीच भिन्नताओं के साथ-साथ ढेर सारी समानताएं नजर आईं। तो क्या प्रजातियों के साथ-साथ बदलाव आया है?

इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ने में भू-विज्ञान के क्षेत्र में एक नए सिद्धांत ने डार्विन की मदद की। बीगल की यात्रा के दौरान जहाज के कप्तान फित्ज रॉय ने मशहूर भू-वैज्ञानिक चार्ल्स लॉयल की नई किताब 'प्रिंसिपल ऑफ जीओलॉजी' उन्हें भेंट की। सर लॉयल भू-आकृतियों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के अध्ययन के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे थे कि पृथ्वी की वर्तमान शक्ल करोड़ों सालों तक चलने वाले क्रमिक प्राकृतिक बदलाव के कारण बनी है। अब तक यह समझा जाता था कि यह देवी प्रकोप का नतीजा है। डार्विन ने सोचा कि क्या प्राणी जगत पर भी यह सिद्धांत लागू नहीं होता।

गलापगोस द्वीप समूह के अलग-अलग टापुओं में डार्विन को एक ही जाति के कछुओं और छोटे पक्षियों में थोड़ी-थोड़ी भिन्नता नजर आई। किसी द्वीप की फिंच चिड़ियों की चोंच लंबी और नुकीली थी तो दूसरे में मोटी और सख्त। आखिर ईश्वर ने आस-पास के दो द्वीपों में एक ही पक्षी को थोड़ा-थोड़ा अलग बनाने की जहमत क्यों उठाई? या फिर इन्होंने हरेक द्वीप की विशेष परिस्थिति के मुताबिक खुल को ढाल लिया है?

इंग्लैण्ड लौटने के बाद अपने नमूनों की पहचान और उन्हें सूचीबद्ध करते हुए डार्विन को उनके बीच भिन्नताओं के साथ-साथ एक अद्भुत समानता और रिश्ते की एक डोर-सी दिखाई दी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती धर्मशास्त्र पर आधारित उस समय के प्रकृति विज्ञान की यह समझ थी, 'प्रजाति कभी बदलती नहीं है। हरेक प्राणी को सचेतन रूप से अलग-अलग गढ़ा गया है'।

वैकल्पिक सिद्धांत की खोज में डार्विन ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा इकट्ठा किए गये तथ्यों और उनके विचारों को मथ डाला। जीवों का भौगोलिक वितरण, प्राचीन और वर्तमान प्राणियों के कंकालों के बीच भिन्नता और समानता व भ्रूणावस्था में चूहे, खरगोश, मछली, मेंढ़क और मनुष्य जैसे विविध प्राणियों के बीच अद्भुत समानता की ओर डार्विन का ध्यान आकृष्ट हुआ। उन्होंने समूचे प्राणी जगत के इतिहास की एक पारिवारिक वंश-वृक्षावली (फैमिली ट्री) के रूप में कल्पना की। उस वृक्ष के मूल में सरल और सूक्ष्म एक कोशिकीय प्राणी थे। ऊपर की ओर उसकी शाखा-प्रशाखाएं जितनी बंटती चली गईं, वे जटिल से जटिलतर होते गए। उस वृक्ष की हरेक टहनी जीव-जगत की एक-एक शाखा थी और हरेक छोर एक-एक प्रजाति। डार्विन को उसके ऊपरी हिस्से में एक शाख पर आदम की प्रजाति दिखाई दी।

डार्विन से पहले भी कई वैज्ञानिकों ने विकासवाद की बात की थी। पर प्रजातियों में बदलाव क्यों होता है और कैसे होता है, इसका जवाब वे नहीं दे पाए थे। इन सवालों का प्रमाणिक उत्तर ढूंढे बिना डार्विन अपनी समझ को जगजाहिर नहीं करना चाहते थे।

इस बीच उन्हें जनसंख्या वृद्धि के सिद्धांत पर माल्थस की किताब पढ़ने को मिली। माल्थस की समझ थी कि औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैण्ड में उपलब्ध साधनों से कहीं ज्यादा जनसंख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे में जमीन और भोजन हासिल करने की होड़ में जो सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर हैं, वे मिट जाएंगे और सम्पन्न तथा ताकतवर लोग बचे रहेंगे। आधुनिक समाज के इतिहास में माल्थस का सिद्धान्त कभी कारगर नहीं हुआ, पर डार्विन ने देखा कि प्रकृति में यह हूबहू लागू होता है। जीवों की हर प्रजाति जिंदा रहने के लिए जरूरी संसाधनों से कई गुणा अधिक संख्या में बच्चे पैदा करती है। बचे रहने की होड़ में उनमें से अधिकतर अगली पीढ़ी को पैदा किये बिना ही मर जाते हैं। जीवन के इस संघर्ष में सफलता की कुंजी क्या भाग्य, नियति या चांस भर है?

डार्विन ने देखा कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग सदस्यों के बीच थोड़ी-थोड़ी भिन्नता मौजूद रहती है। किसी के दांत थोड़े अधिक नुकीले हैं तो किसी की गर्दन थोड़ी लंबी। जिंदा रहने के संघर्ष में यही मामूली से फर्क फैसलाकुन साबित होते हैं। परिस्थिति के मुताबिक योग्यता वाले ये गुण ही अगली पीढ़़ी में ज्यादा मात्रा में पहुंच जाते हैं। मौसम में बदलाव के कारण अगर किसी इलाके में बचे रहने की संभावना अधिक हो तो झुंड में थोड़ी ऊंची गर्दन वाले अधिक संख्या में बच्चे पैदा करने की उम्र तक पहुंच पायेंगे। अगली पीढ़ी में ऊंची गर्दन वाला गुण भी ज्यादा मात्रा में मौजूद होगा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऊंची से ऊंची और उसमें भी ऊंची गर्दन वालों की संख्या बढ़ जाएगी। और एक समय ऐसा आएगा जब बहुमत में मौजूद ऊंची गर्दन वाले अपनी मूल प्रजाति से मिलकर बच्चे पैदा नहीं कर पायेंगे और वे एक नई प्रजाति का रूप ले लेंगे। इस प्रक्रिया में परिवेश में बदलाव और भौगोलिक अलगाव भी अहम भूमिका अदा करते हैं।

इस प्रकार दैवीय या किसी भी तरह की बाह्य शक्ति के दखल के बिना कुदरत की कोख में चल रहे प्रजातियों में बदलाव और एक से दूसरी प्रजाति के जन्म के प्रक्रिया को डार्विन ने प्राकृतिक चयन या नेचुरल सेलेक्शन की संज्ञा दी। इस प्रक्रिया में किसी लक्ष्य और योजनाबद्ध डिजाइन या किसी सृष्टिकर्ता की जरूरत नहीं होती है। यह स्वतः स्फूर्त ढंग से अनवरत चलता रहता है।

डार्विन की नजर सेलेक्टिव ब्रीडिंग द्वारा पालतू कुत्तों और कबूतरों की नई नस्लें पैदा करने वालों की ओर भी गई। वे किसी एक गुण मसलन लंबे कान को छांटकर लंबे से लंबे और उसमें भी लंबे कान वालों के बीच बच्चे पैदा कराकर कुछ ही पीढ़ि़यों में लंबे कान वाली नई नस्ल पैदा कर देते हैं। योग्यतम के जिंदा बचने की लड़ाई में प्रकृति ये काम स्वतः स्फूर्त ढंग से करती है। फर्क सिर्फ समय का होता है। डार्विन ने अपने नोट में लिखा- 'इसे हम तब तक नहीं देख सकते हैं, जब तक कि काल का चक्र युगों तक न घुस जाए'।

सारा प्रमाण इकट्ठा कर लेने के बाद भी डार्विन अपने सिद्धांत को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे। उन्हें पता था कि उनकी खोज दकियानूसी विक्टोरियाई समाज में भूचाल पैदा कर देगी। उन दिनों यूरोप में असंतोष और क्रांति की हवा बह रही थी। इंग्लैण्ड में चार्टिस्ट आंदोलन चरम सीमा पर था। शासक वर्ग मुनाफा बढ़ाने के लिए नई खोजों का इस्तेमाल तो करना चाहता था, लेकिन उन्हें यह मंजूर न था कि वैज्ञानिक सोच व्यवस्था और यथास्थिति के प्रति लोगों की आस्था को कमजोर कर दे। नए विचारों को दबाने में चर्च व्यवस्था के साथ था। डार्विन को यह भी डर था कि संभ्रांत वर्ग में उनकी प्रतिष्ठा कम न हो जाए।

लगभग बीस सालों तक डार्विन की खोज की जानकारी उनके कुछ एक वैज्ञानिक मित्रों तक ही महदूद रही। तभी मलाया से आए युवा वैज्ञानिक फील्ड वर्कर अल्फ्रेड रसेल वासेल के एक पत्र ने उन्हें खुल कर सामने आने के लिए मजबूर किया। रसेल ने अपना एक लेख डार्विन की राय जानने के लिए उन्हें भेजा था। डार्विन हैरान थे कि रसेल लगभग उन्हीं नतीजों तक पहुंच चुके थे, जो उनके थे। हालांकि रसेल को डार्विन की खोज की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने रसेल के लेख के साथ ही प्राकृतिक चयन के सिद्धांत पर अपना एक विस्तृत निबंध छपवा दिया। उसके बाद 1859 में उनकी युगांतकारी पुस्तक 'ऑरीजिन ऑफ स्पीसीज' प्रकाशित हुई।

दो दिनों के अंदर ही पुस्तक की सारी प्रतियां बिक गईं। कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ और ढेर सारे संस्करण छपे। मानो तेजी से करवट ले रहा समाज सृष्टि के वैकल्पिक सिद्धांत के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। कोपरनिकस और गैलीलियो की खोज ने जिस वैज्ञानिक संघर्ष को जन्म दिया था, डार्विन के विकासवाद के साथ वह अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया।

यथास्थिति के समर्थकों ने डार्विन को 'इंग्लैण्ड का सबसे खतरनाक व्यक्ति' घोषित कर दिया। दूसरी तरफ खुली सोच रखने वाले वैज्ञानिक और विचारक और बदलाव के हामी उनके सिद्धांत के समर्थन में खुलकर मैदान में उतर पड़े। उन्हीं दिनों कार्ल्स मार्क्स अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एक और युगांतकरकारी सिद्धांत पर काम कर रहे थे। इंसानी सोच को बदलने में डार्विन की खोज के दूरगामी प्रभाव को वे समझ रहे थे। उन्होंने अपनी अमरकृति 'दास कैपिटल' को डार्विन के नाम समर्पित करना चाहा, लेकिन डार्विन ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। उनका कहना था कि वे अर्थशास्त्र के क्षेत्र में कोई दखल नहीं रखते हैं।

डार्विन ने एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों के बीच थोड़ी-थोड़ी भिन्नता और जिंदा रहने के संघर्ष में उनमें से योग्यतम गुणों का अगली पीढ़ी में अधिक संख्या में पहुंच पाने की बात की। लेकिन उस समय का विज्ञान इस सवाल का जवाब नहीं दे सका था कि ये भिन्नताएं कैसे होती हैं और वे अगली पीढ़ी तक पहुंचती कैसे हैं। बीसवीं सदी में जीन विज्ञान की खोज के बाद ही इन सवालों का जवाब देना संभव हुआ। जीन विज्ञान ने डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को न केवल सही साबित किया, बल्कि उसे पूर्ण भी बनाया।

जीन लड़ी की शक्ल में हर कोशिका में मौजूद सूचना का भंडार-सा है। इन्हीं के निर्देश पर जीवों की शक्लों-सूरत, अंग-प्रत्यंग, उनके गुणों और चरित्रों का निर्माण और विकास होता है। डार्विन के जमाने में आनुवांशिकी की यह समझ थी कि माता और पिता के गुण लाल और नीले रंग जैसे होते हैं। वे अगली पीढ़ी में पहुंच कर आपस में घुल-मिल जाते हैं। डार्विन की यह आलोचना की गई कि योग्य गुण अगर लाल हैं तो बच्चों में नीले रंग से मिलकर वे लाल नहीं रह जायेंगे बल्कि एक तीसरा रंग बैंगनी हो जाएगा।

अब पता चल गया है कि माता या पिता के एक खास गुण का वाहक एक जीन या तो पूरा का पूरा अगली पीढ़ी में पहुंचता है या नहीं पहुंचता है। जीन आपस में घुल-मिल नहीं जाते हैं।
जीन की सूचना की इकाई डीएनए है। यह चार रासायनिक अक्षरों- ए टी सी और जी से लिखा जाता है। जीन में छिपी सूचना और उसके द्वारा दिये जाने वाले निर्देश इन्हीं अक्षरों की तरतीब पर निर्भर करते हैं। पुनरोत्पादन के दौरान जब कोशिकाएं बंटती हैं, डीएनए अरबों-खरबों की संख्या में अपनी प्रतिलिपियां बनाते हैं। कापी करने के क्रम में कई बार कुछ गलतियां हो जाती हैं और अक्षरों के तरतीब बदल जाते हैं। स्वतः स्फूर्त ढंग से होने वाली इन गलतियों को म्यूटेशन या उत्परिवर्तन कहा जाता है। इन्हीं के चलते एक ही प्रजाति के अलग-अलग सदस्यों के बीच थोड़ी-थोड़ी भिन्नता पैदा होती है।

जीन विज्ञान प्राणियों के बीच भिन्नता को ही नहीं, बल्कि उससे अधिक उनके बीच समानता को दर्शाता है। मनुष्य के जीनों का पूरा नक्शा बना लेने के बाद यह साफ हो गया है कि हमारे और चिंपाजी के बीच सिर्फ तीन फीसद भिन्नता है। इतना ही नहीं, हाथी-घोड़े, सांप-छछूंदर, मेढ़क-मछली और यहां तक कि एक कोशिकीय अमीबा के जीनों के साथ भी हमारी भिन्नता कम और समानता अधिक है। ये तथ्य रिश्ते के डोर में बंधे डार्विन के जीवन वृक्ष को पूरी तरह से स्थापित करते हैं।

हालांकि 'ऑरिजिन ऑफ स्पीसीज' पुस्तक में डार्विन ने मानव जाति की उत्पत्ति और विकास की चर्चा नहीं की थी, लेकिन तार्किक रूप से वह मनुष्य की प्रजाति को प्रजातियों के विकास क्रम से जोड़ देता था। 1871 में प्रकाशित पुस्तक 'डीसेंट ऑफ मैन' में उन्होंने प्राचीन मानव प्रजातियों और नर वानरों के फॉसिल कंकालों में तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर बताया कि आदम के पूर्वज दरअसल नर वानरों की एक उन्नत प्रजाति ही थी।

उन दिनों अखबार के कार्टूनों में डार्विन को बंदर की शक्ल में दिखाना आम बात थी। अब विकासवाद पर परंपरावादियों का हमला और तेज हो गया। यह लड़ाई आज भी जारी है। अकाट्य प्रमाणों और हजारों-लाखों तथ्यों के बावजूद अब भी डार्विन के सिद्धांत को हमारे पाठ्यक्रमों में समुचित स्थान नहीं दिया गया है। अमेरिका जैसे विकसित देश में भी 1950 और 60 के दशक में अंतरिक्ष के क्षेत्र में सोवियत संघ से पिछड़ जाने के बाद ही विज्ञान को बढ़ावा देने की मजबूरी में पहली बार विकासवाद को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। आज विज्ञान और रूढ़िवाद के बीच संघर्ष में विकासवाद एक केन्द्र बिन्दु बन गया है। इस लड़ाई में विज्ञान को स्थापित करके ही बेहतर इंसानी भविष्य का निर्माण हो सकता है।

साभार : यह लेख प्रदीप भट्टाचार्य द्वारा डार्विन की दूसरे जन्मसदी वर्ष के अवसर पर जनसत्ता में 15 फरवरी 2009 के अंक में लिखा गया था।

चार्ल्स_डार्विन: क्रमविकास (evolution) के सिद्धान्त के जनक


27दिसंबर1831के दिन इंग्लैंड के तट पर से बीगल नाम के सरकारी जहाज पने दक्षिण अमेरिका की ओर कूच किया.जहाज के कप्तान की आदेश दिया गया था कि वह दक्षिणअमेरिका के दक्षिणी कोने का चक्कर लगाकर उसके तट और समुद्र का सर्वेक्षण करे.बीगल नेदक्षिण अमेरिका का चक्कर लगाकर प्रशान्त महासागर और हिन्द महासागर को पार किया और अफ्रीका का चक्कर लगाकर पांच साल बाद वापस लौटा. इस प्रकार कप्तान ने अपना काम पूरा किया.लेकिन बात इतनी सी होती तो आज उसे कोई याद नहीं करता.लेकिन इतिहास में बीगल को अमर होना था.

लेकिन उसी जहाज पर 20-25 साल का एक नौजवान था.बीगल को सौंपे गए काम सरकारी काम से उसे कोई मतलब नहीं था.जहाज पर जिस काम से वह गया था उसके लिए उसे कोई वेतन नहीं मिलनेवाला था . इस नौजवान का नाम था चार्ल्स डार्विन.उन्हें शौक था प्राणी, वनस्पति और उसके प्राचीन अवशेषों का संग्रह करना.वे केवल संग्रह ही नहीं कर रहे थे बल्कि वहां के प्राणियों और वनस्पतियों के बारे में अध्ययन कर रहे थे.

1836 में डार्विन अपने घर लौटे. इन तमाम जानकारियों के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले. उन्होंने देखा कि इन प्राणियों मे कुछ अदभुत समानताएँ थी और फर्क भीथा. यह बात को वह समझ गए कि इन सारी जीवो में आपस में सम्बन्ध रही होगी. अलग अलग तरीकों से विकसित होकर अलग हुए होंगे.इसी यात्रा के दौरान उदविकासका आधारभूत सिद्धांत उनके दिमाग में आया. डार्विन आगामी बीस साल तक इसी पर अन्वेषण करते रहे. 1842 में वे इन विचारों को लिखा.फिर काफी चिन्तन के बाद 1858 में इन विचारों के वैज्ञानिक जगत के सामने रखा. हालांकि यह  संयोग है  कि  मलाया  से  वालेस ने डार्विन को इसी विषय पर इन्हीं विचारों से जुड़े शोध प्रवंध भेजा. दोनो का शोध प्रबंध एक ही समय दुनिया के सामने आया .लेकिन उदविकास  के  सिद्धांत  का  श्रेय डार्विन को ही दिया गया क्योंकि 1858से कई साल पहले वह इन सिद्धांतो को ढूंढ़ा और सारे सबूतों के साथ पेश किया.1859में डार्विन का अविस्मरणीय ग्रन्थ प्रकाशित हुआ जो द ऑरिजीन आफ स्पीसीज के नाम से जाना जाता है जिसने वैचारिक जगत में क्रांति ला दी. 

इस सिद्धांत नें दो बातें प्रमुख थीं ---
(1)सभी प्राणियों में चक्रवृद्धि दर से वंश बढ़ाने की प्रवृति होती है.
(2)इतना प्रजनन होने के बावजूद भी आम तौर किसी भी प्रजाति के प्राणियों की संख्या स्थिर होती है.
इन दो बातों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि सभी प्राणियों में जीवन के लिए संघर्ष चलता रहता है.सभी प्राणियों में जीवन संघर्ष,उसके शरीर में पायी जानेवाली विऎविधता और 'प्राकृतिक चयन 'के संयोग में जीवसृष्टि में उदविकास होता चला गया.डार्विन के सिद्धांत का यही सार है.

अपनी  प्रसिद्ध  पुस्तक 'द ऑरिजीन आफ स्पीसीज' में डार्विन ने लिखा कि इस सिद्धांत से मनुष्य कीउत्पत्ति हुईफिर भी उनके इस एक वाक्य सेहो-हल्ला उठ खड़ा हुआ.परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ  रचना के बारे में इस तरह का नास्तिकऔर जड़वादी विचार पेश करने के कारण उनपर जोरदारहमला बोल दिया गया. लेकिन डार्विन अपने सिद्धांत पर अडिग रहे और अन्तमें1871में डिसेंट आफ मैन (मनुष्य)नामक पुस्तक में उन्होंने इन विचारों को स्पष्ट पूर्वक से पेशकिया.

लेकिन चारों तरफ डार्विन का जमकर विरोध शुरू हो गया था. खुद के खिलाफ हो रहे विरोध से डार्विन इतने आहत थे कि इसका जिक्र करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, 'यह नर्क जैसा है.' चर्च के साथ मीडिया ने भी इस किताब के लिए डार्विन को आड़े हाथों लिया था. बताया जाता है कि यह जानकर कि इंसान वानर का वंशज हैं अमेरिका औऱ यूरोप के कई लोग बुरी तरह से हिल गए थे. उसी का परिणाम था कि किताब के प्रकाशन के बाद अमेरिका और पूरे यूरोप केस्कूलकॉलेजोंमें डार्विन की  थ्योरी  पढ़ाने  पर  पाबंदी लगा  दी गई थी. डार्विन के सिद्धांत पढ़ाने पर जीव विज्ञान के एक अध्यापक पर अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा आधुनिक दुनिया के सबसे चर्चित केसों में से एक चलाया गया था जिसे मंकी ट्रायल के नाम से जाना जाता है. 

जब यह मुकदमा चल रहा था.कुछ प्रतिष्ठित लोग बाहों पर पट्टी लगाए अदालत के सामने मोर्चा निकाला जिसमें लिखाथा, "हम बंदर नहीं हैं और कोई हमें बंदर नहीं बना सकता.अंत उस न्यायाधीशने फैसला में कहा कि कि मानव और बंदर ने कोई रिश्ता नहीं है.उस शिक्षक 500 डालर का दंड दिया गया है. 

आखिर ऐसी क्या चीज थी इस पुस्तक में कि पूरा धार्मिक समुदाय इसके खिलाफ हो गया.तमाम इसाईधर्म गुरूओं की मानना था किपृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी. लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखों-करोड़ों वर्ष पहले का बताती थी. डार्विन के तर्कों से धर्मगुरूओं को दूसरी बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी जिसमें उसने पेड़-पौधे, जीव-जंतु, पहाड़-नदियां और मनुष्य को अलग-अलग छह दिन में बनाया था. (बाइबिल के मुताबिक परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी बनाए. दूसरे दिन आसमान. तीसरे दिन पानी को एक जगह इकठ्ठा कर ईश्वर ने धरती और समुद्र बनाए और धरती पर पेड़-पौधे लगाए. चौथे दिन परमेश्वर ने तारों का निर्माण किया. पांचवें दिन परमेश्वर ने समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं के साथ उड़ने वाले पक्षियों को बनाया और छठे दिन परमेश्वर ने धरती और जानवरों पर अधिकार के लिए अपनी छवि में इंसान की रचना की और उसे गिनती में बढ़ने का आशीर्वाद दिया.इसप्रकार सृष्टि की रचना एक सप्ताह में हुई.

लेकिन डारविन ने अपनी पुस्तक में बताया कि
'मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने अलग-अलग बनाया था.' डार्विन कहते थे कि ये सारे जीव कुछ चुनिंदा जीवों के वंशज हैं जिनमें वक्त के साथ परिवर्तन आते गए और धरती पर लाखों प्रजातियों का जन्म हुआ. उनके मुताबिक पीढ़ी दर पीढ़ी सूक्ष्म बदलावों के कारण बड़े बदलाव घटित हुए, जैसे मछलियां जल-थल जंतुओं में तब्दील हो गईं और बंदर इंसान में. इन्ही बदलावों को 'महाविकास' कहा जाता है.'तभी  तो उनके जीवन से जुड़ी फिल्म 'क्रिएसन' जो पुस्तक 'आरिजीन आफ स्पेसिज'  में थामस हेनरी डेविड हक्सले से कहते हैं
,"इसके बाद ईश्वर एक सप्ताह में सारे सजीवों के निर्माण का दावा नहीं कर सकता, आपने ईश्वर का कत्ल कर दिया है श्रीमान.'

आज भी बहुत सारे लोग उस टेनेसी के न्यायाधीश की तरह हैं. लेकिन आज भी वह मंकी ट्रायल जारी है.केन्द्रिय मंत्री सत्पाल मलिक आज भी कहते हैं कि   डारविन का सिद्धांत सिद्धांत: गलत है.मेरे पूर्वज बंदर नहीं हैं.एक बार चीन के प्रसिद्ध कथा कार लुशुन से इसी सवाल किसी ने यह साधारण बुद्धि का सवाल पूछा तो इसके जबाब में उन्होंने कहा कि चार पैरों से चलने वाले बंदरों में से कुछ ने अपने अनुभवोंके आधार पर दो पैड़ों से चलना ज्यादा मुफीद समझा लेकिन बाकी सबने यहकर विरोध किया कि लाखों साल से हमारे पूर्वज चार पैड़ों से चल रह् हैं.हम उनके रास्ते पर चलेंगे.लुशुन ने कहा कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर इस प्रकार के परिवर्तनों को स्वीकार आगे बढ़ते गये वे ही आज के मनुष्य हैं और आज की सभ्यता केहर मोड़ पर इसी प्रकार पूर्वजों के पथ पर चिपके रहने की दलीलों पर अनेक लोग मनुष्यरूपी बंदर के तौर परपीछे रह जाते हैं उनमें हमारे मंत्री सतपालजी भी हैं जो पूर्वजों के पथ पर  आंख मूंदकर चलने वाले."तो आज भी कोशिस जारी है कि ऐसे अवैज्ञानिक बातों को फैलाने की ताकि सच पर हमेशा के लिए ग्रहण लग जाय.

जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने 1953 मे एक ऐसी खोज की, जिससे चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित अधिकतर सिद्धांतों की पुष्टि होती है. उन्होंने जीवधारियों के भावी विकास के उस नक्शे को पढ़ने का रासायनिक कोड जान लिया था, जो हर जीवधारी अपनी हर कोषिका में लिये घूमता है. यह नक्शा केवल चार अक्षरों वाले डीएनए-कोड के रूप में होता है. अपनी खोज के लिए 1962 में दोनो को चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला था. वे कहते हैं कि जिसे डबलहेलिक्स स्ट्रक्चर कहते हैं, सहखोजी हैं और मानते हैं कि आनुवंशिकी भी पग-पग पर डार्विन की ही पुष्टि करती लगती हैः
"मेरे लिए तो चार्ल्स डार्विन इस धरती पर जी चुका सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है."

एडवर्ड ऑसबर्न विल्सन आजकल के सबसे जानेमाने विकासवादी वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं और वे भी डार्विन के आगे सिर झुकाते हैं:
"हर युग का अपना एक मील का पत्थर होता है. पिछले 200 वर्षों के आधुनिक जीवविज्ञान का मेरी दृष्टि में मील का पत्थर है 1859, जब जैविक प्रजातियों की उत्पत्ति के बारे में डार्विन की पुस्तक प्रकाशित हुई थी. दूसरा मील का पत्थर है 1953, जब डीएनए की बनावट के बारे में वॉटसन और क्रिक की खोज प्रकाशित हुई."भारत के प्रसिद्ध भौतिकविद जयंत नार्लिकर कहते हैं
        Charles Darwin's theory of evolution is based "completely on several scientific observations and there is no reason to believe that it is inc
स्टीफन हीकिंग  विकासवाद पर कहते हैं
We are just an advanced breed of monkeys on the  minor planet of average star.

विज्ञान जगत में तहलका मचादेनेवाले चार्ल्स डार्विनका जन्म 12 फरवरी 1809 ईसवी को इंग्लैंड में हुआ था.अपने माता-पिता की पांचवी संतान डार्विन एक बहुत ही पढ़े – लिखे और अमीर परिवार में पैदा हुए थे.उनके पिता राबर्ट डार्विन एक जानेमाने डॉक्टर थे. डार्विन जब महज 8 साल के थे तो उनकी माता की मृत्यु हो गई थी.चार्ल्स डार्विन को मेडिकल में कोई ज्यादा रूचि नहीं थी.चार्ल्स डार्विन को मेडिकल में कोई ज्यादा रूचि नहीं थी। वो हमेशा प्रकृति का इतिहास जानने की कोशिश करते रहते। विविध पौधों के नाम जानने की कोशिश करते रहते और पौधों के टुकडो को भी जमा करते थे.जब चार्ल्स डार्विन क्राइस्ट कॉलेज में थे तभी प्रोफेसर जॉन स्टीवन से उनकी अच्छी दोस्ती हो गई थी जॉन स्टीवन भी डार्विन की ही तरह प्रकृति विज्ञान  में  रूचि रखते थे.19 अप्रैल 1882 को चार्ल्स डार्विन की दिल की धड़कन बंद हो जाने के कारण मृत्यु हो गई.ऐंगल्स (Friedrich Engels)ने कहा ----

Just as Darwin discovered the law of development or organic nature, so Marx discovered the law of development of human history.
(Copied from fb post of Sunil Singh)