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Monday, 26 September 2022

पाप और विज्ञान - प्रस्तावना



किसी भी आधुनिक नगर में सामाजिक परिपक्वता प्राप्त करने वाला कोई भी इन्सान कह सकता है कि अपराध, पाप और विज्ञान का मतलब तो खुद ही जाहिर है। हममें से अधिकतर, कम-से-कम हिन्दुस्तान के रहने वाले लोग जानते हैं कि अलग-अलग धर्मों में पाप की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं। एक मुसलमान के लिए शराब पीना पाप है। एक हिन्दू के लिए गाय का माँस खाना पाप है। पर, एक ईसाई ये दोनों ही काम रत्ती भर आत्मसन्ताप के बिना कर सकता है। पाप की ये अलग-अलग व्याख्याएँ समाज के नियन्त्रण के लिए काफी सिद्ध नहीं हुईं। इसलिए, कुछ कामों को जिन्हें अपराध कहा जाता है- रोकने के लिए कानूनी कार्रवाइयाँ की जाती हैं। इन कामों के लिए सजा देने का अधिकार पुलिस और अदालतों को दिया जाता है। सज़ा कारगर हो, इसके लिए जरूरी होता है कि अपराध का पता लगाया जाये और अपराधी के खिलाफ कुछ कानूनी कार्रवाई की जाये। पर अधिकतर मामलों में यह साबित करना मुश्किल होता है कि अब पाप का फल मिल गया है। इसलिए, यह कहकर सन्तोष कर लिया जाता है कि पापी अपने पापों का फल दूसरी दुनिया में या अगले जन्म में भोगेगा। पर, विज्ञान के अन्तर्गत नतीजों की नाप-जोख सावधानी से किये गये प्रयोगों और अनुभवों के तर्कपूर्ण भौतिकवादी विश्लेषण के आधार पर ही होती है। इसमें आध्यात्मिक और अदालती नियमों का समावेश नहीं। ज़हर की एक पुड़िया चाट जाने वाला इन्सान मरेगा ज़रूर, भले ही यह काम क़ानूनी हो या न हो। शरीर के अन्दर किसी रोग के कीटाणुओं के उचित मात्रा में पहुँच जाने पर वह रोग होगा जरूर, भले ही भगवान की इच्छा हो या न हो। साथ ही, रोग का निश्चित रूप से घटना - बढ़ना भी जारी रहेगा।


अगर किसी काम के सम्बन्ध में इन तीनों (धार्मिक, कानूनी और वैज्ञानिक - अ.) नज़रियों से हम एक ही नतीजे पर पहुँचे, यानी उस काम को


प्रस्तावना / 7


करने से रोग हो जाने की भारी सम्भावना हो, साथ ही वह अपराध भी हो, तो समाज उस ख़तरनाक बुराई को उखाड़ फेंकने की भरसक कोशिश करता दिखायी पड़ता है। यौन-सम्बन्धों तथा उससे सम्बन्धित बातों तलाक़ गुप्त रोग, - वेश्यावृत्ति के नियन्त्रण के बारे में तो बात ऐसी है ही। उसी तरह शराबखोरी तथा इन्सान, उसके परिवार और समाज पर मशीनी युग में बढ़ती दुर्घटनाओं के रूप में प्रकट होने वाले इसके प्रभाव के नियन्त्रण के बारे में भी बात ऐसी ही है।


अभी हाल में मौजूदा ज़माने की दो एकदम अलग-अलग सभ्यताओं ने - जो अपने-अपने ढंग की आदर्श सभ्यताएँ हैं इन बुराइयों को उखाड़ फेंकने के - लिए कुछ तरीके अपनाये हैं। डाइसन कार्टर ने उनकी सच्ची और निष्पक्ष रिपोर्ट पेश की है। कोई इस बात से इन्कार नहीं कर सकता कि अमेरिका में विज्ञान का महत्वपूर्ण विकास हुआ है। पर कोई इस बात से भी इन्कार नहीं कर सकता कि वहीं पुलिस - शक्ति का उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण विकास हुआ है। अमेरिका के सभी धार्मिक दल ऐसे मसलों पर अपनी पूरी ताक़त जुटा देते हैं। फिर भी, वहाँ तलाक़ों की संख्या दुनिया भर में करीब-करीब सबसे ऊँची है। " "सुधार" के राजनीतिक आन्दोलनों, पुलिस की विशेष कार्रवाइयों और गिरजाघरों में लगातार धर्मोपदेश के बावजूद अमेरिका में गुप्त रोग, वेश्यावृत्ति और शराबखोरी अपनी-अपनी जगह पर ज्यों-की-त्यों बरकरार हैं। सोवियत रूस एक नयी समाज-व्यवस्था का पहला और सबसे बड़ा प्रतिनिधि है । वहाँ इस बात की पूरी गुंजाइश थी कि वर्तमान समाज की ये खौफ़नाक वसीयतें पूरे जोर-शोर से भड़क उठें। क्रान्ति ने संगठित धर्म-व्यवस्था को ख़त्म कर दिया था। पहले के अधिकांश प्रतिबन्ध हटा दिये गये थे। वेश्या को अपराधी मानकर दण्ड नहीं दिया जाता था। तलाक़ बहुत आसान हो गया था। सरकार की ओर से सस्ती शराब का प्रबन्ध कर दिया गया था। इनके साथ-साथ, क्रान्ति के बाद विदेशियों के आक्रमणों और उत्पादन की बढ़ती हुई दर से उत्पन्न कठिनाइयों के बारे में भी सोचिए । पूँजीवादी तर्क - पद्धति आपको इसी नतीजे पर पहुँचायेगी कि अब वहाँ व्यभिचार का खूब बोलबाला होगा। पर, हम देखते यह हैं कि सोवियत रूस में वेश्यावृत्ति एकदम ख़त्म हो गयी है। तलाक़ों की दर को घटाकर न्यूनतम स्तर पर ला दिया गया है। जो देश कभी किसानों और मज़दूरों की नशेबाज़ी से बदनाम था, वहाँ अब शराबखोरी का क़रीब क़रीब लोप हो चुका है।


ये परिणाम, जो बड़े विचित्र और असंगत प्रतीत होते हैं, सोवियत रूस में वैज्ञानिक अनुसन्धान के द्वारा इन समस्याओं की जड़ों का पता लगाकर ही प्राप्त किये गये थे। पूँजीवादी देशों में पुलिस वाला जिस सवाल को उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता, पादरी जिस सवाल को उठा नहीं सकता, वैज्ञानिक जिस सवाल


8 / पाप और विज्ञान


को उठाता ही नहीं, वह यह है- आखिर इन बुराइयों की जड़ क्या है? सोवियत रूस का उत्तर है कि कुछ वर्ग इन बुराइयों से बेशुमार मुनाफ़े कमाते हैं, इसलिए ये मौजूद हैं। इस तरह सामाजिक बुराइयों से मुनाफा कमाना, सामाजिक बुराइयों से लाभ उठाना, जनता के बहुसंख्यक भाग के आम शोषण का ही नतीजा है। इससे जनता का बहुत बड़ा भाग इनकी तरफ झुकता है । इसीलिए ये फैलती हैं। जनता के आम शोषण का अन्त होने से ही, सोवियत रूस में इनके मूल कारणों का भी अन्त हुआ है। जो इनसे मुनाफा कमाते थे उनको कड़ा दण्ड दिया गया, उन लोगों को नहीं जो इनके शिकार हुए थे; अर्थात चकले चलाने वालों को, वेश्याओं को नहीं; गैर-कानूनी तौर पर शराब बनाने वालों को, शराब पीने वालों को नहीं। साथ ही, सोवियत रूस में काम पाने का अधिकार हर नागरिक का अधिकार बना दिया गया । हरेक के लिए अच्छा रहन-सहन मुमकिन बना दिया गया। नयी आज़ादी का असर आसानी से दिखायी देने लगा। कानून, पार्टी के प्रचार और जनता की वैज्ञानिक शिक्षा का सहारा लेना सरल बन गया। जनता को पूरी तरह शिक्षित बनाने का प्रबन्ध किया गया। सस्ती व अच्छी पठन सामग्री का प्रबन्ध किया गया। सभी के लिए सुन्दर संगीत, अच्छे से अच्छे सिनेमा, संस्कृति पार्कों और खेलकूद के मैदानों द्वारा मनोरंजन और थकान मिटाने के भिन्न-भिन्न साधनों की व्यवस्था कर दी गयी। पहले की सभी बुराइयाँ छू-मन्तर हो गयीं, क्योंकि अब उनके टिकने की कोई वजह नहीं रह गयी थी। मनुष्य का जीवन पहली बार रहने के लायक़ सुखमय जीवन बना। जीवन से कतराने और भागने की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गयी।


भारत में, हमारे सामने भी यही समस्याएँ हैं। भारत में उन्हें दूर करने के लिए अमेरीकी तरीके अपनाये जा रहे हैं; उदाहरण के लिए शराबबन्दी । किन्तु देशवासियों से जीवन की आवश्यक चीजें छीनकर मुनाफाखोर उनके जीवन को तिल-तिल घटाते रहने को तैयार हैं। और यह काम वह समाज के प्रतिष्ठित वर्ग के एक सम्मान प्राप्त सदस्य की हैसियत से करता है। उत्पीड़ितों के क्रोध से पुलिस उसकी और उसके मुनाफों की रक्षा करती है। भुखमरी, गन्दी बस्तियों और शिक्षा की कमी से आम जनता को कैसी हानि पहुँच रही है, इसे तो वैज्ञानिक भुला देता है। पर वह सुझावों, डॉक्टरी मदद, यहाँ तक की प्रशंसा के द्वारा पूँजीपति की सहायता के लिए दौड़ पड़ता है, क्योंकि धनी के सिवा अच्छी रकमें दे ही कौन सकता है? जिन लोगों ने भारी मुनाफ़े कमाये हैं, उनके अलावा खोजबीन के लिए रकमें खर्च कर ही कौन सकता है? जहाँ तक धर्म की बात है, वह सिर्फ इतनी घोषणा कर देता है कि पीड़ितों को अगले किसी जन्म में उनका हक मिल जायेगा। कुछ और तसल्ली देना हुई, तो धर्म कह देता है : ये


प्रस्तावना / 9


लोग ज़रूर ही अपने किसी पिछले जन्म के पापों का फल भोग रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उनकी तरफ़ नज़र ही न उठायी जाये, या कहिये, उनका और भी डटकर शोषण किया जाये। अपनी शुभेच्छाओं के बावजूद क्रान्ति के तमाम फलों को सुधारक लोग, बिना क्रान्ति किये ही हासिल कर लेना चाहते


प्रोफेसर डी. डी. कोसाम्बी


पूना


10 / पाप और विज्ञान


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Sunday, 25 September 2022

Mephisto: एक कलाकार जिसने अपनी आत्मा फासीवादियों को बेच दी….



जर्मन फासीवाद पर वैसे तो कई बेहतरीन फिल्में हैं, लेकिन 1981 में आयी यह फिल्म एकदम अलग तरह की है।
'हेन्डरिक' एक स्टेज कलाकार है। वह आम तौर से वाम की ओर झुका हुआ हैै। और उसी तरह के नाटक करता है। उसके ग्रुप में ज्यादातर कलाकार वाम की ओर झुके हुए हैं। यह वह समय है जब जर्मनी में नाजीवाद तेजी से अपने पैर पसार रहा है। फिर एक दिन अचानक से खबर आती है कि हिटलर ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है।
परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है। हेन्डरिक के बहुत से दोस्त 'प्रतिरोध दस्तों' में शामिल हो जाते है और बहुत से देश छोड़ के चले जाते हैं। हेन्डरिक की पत्नी भी देश छोड़ कर फ्रान्स चली जाती है। जाने से पहले वह हेन्डरिक को भी देश छोड़ने के लिए मनाती है। लेकिन वह नहीं मानता और तर्क देता है कि ये नाजी लोकतान्त्रिक तरीके से ही तो सत्ता में आये है, और मेरा काम थियेटर करना है और मुझे कुछ नहीं पता। जब उसके दोस्त उसे प्रतिरोध दस्ते में शामिल होने के लिए कहते हैं तो वह कहता है कि मुझे रिजर्व में रख लो। अभी तत्काल मैं शामिल नहीं हो सकता। 
यहीं से उसका व्यक्तित्व बदलने लगता है। और वह अपने आपको नयी परिस्थिति में ढालने में लग जाता है और उसके अनुसार ही तर्क भी गढ़ने लगता है।
आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि फिल्म का नाम 'मेफिस्टो' का मतलब क्या है। जर्मन लोक कथा में 'फास्ट' और 'मेफिस्टो' को लेकर अनेक कहानियां हैं। फास्ट एक कलाकार-बुद्धिजीवी है। मेफिस्टों एक 'दानव' है। मेफिस्टों हमेशा लोगो की आत्मा का सौदा करने के लिए घूमता रहता है। जो उसे अपनी आत्मा बेच देता है उसे वह खूब सारा धन व शोहरत देता है। एक दिन फास्ट भी मेफिस्टो को अपनी आत्मा बेच देता है और इस ऐवज में उसे बहुत सा धन व शोहरत मिलती है।
इसी दौरान एक बार स्टेज पर 'मेफिस्टो' का रोल करते हुए वीआइपी दर्शक दीर्घा में बैठा हुआ नाजी जनरल हेन्डरिक के अभिनय से प्रभावित हो जाता है और उसे अपने पास बुलाता है। दोनो के मिलन को दर्शक सांस बांधे देख रहे हैं। यह पूरी फिल्म का बहुत ही पावरफुल दृश्य है और बेहद प्रतीकात्मक है। मानो यहीं पर फास्ट यानी हेन्डरिक अपनी आत्मा का सौदा मेफिस्टो यानी नाजी जनरल के साथ करता है। और उसके बाद शुरु होती है आत्मा विहीन खोखले हेन्डरिक की शोहरत की यात्रा और जल्द ही उसे संस्कृति का पूरा जिम्मा दे दिया जाता है।
इसी समय सांस्कृतिक मंत्रालय की तरफ से उसे फ्रांस जाना होता है वहां वह अपनी पूर्व पत्नी से मिलता है। वह आश्चर्य करती है कि वह ऐसे माहौल में बर्लिन में कैसे रह पा रहा है। वह कहता है कि मैं थियेटर में रहता हूं। तो उसकी पूर्व पत्नी बोलती है कि आखिर थियेटर बर्लिन में ही तो है। यह बहस इस सर्वकालिक बहस की ओर संकेत करती है कि कला निरपेक्ष होती है या समाज सापेक्ष। इससे पहले भी जब उसकी पत्नी उससे स्टैण्ड लेने को कहती है तो वह बोलता है कि मेरा स्टैण्ड शेक्सपियर है (उस समय वह शेक्सपियर का नाटक 'हैमलेट' करने जाने वाला था)। उसकी पत्नी गुस्से से बोलती है कि तुम शेक्सपियर के पीछे छिप नहीं सकते। नाजी लोग अपनी गन्दगी पर पर्दा डालने के लिए शेक्सपियर जैसा क्लासिक नाटक करते हैं। तुम्हे इसे समझना चाहिए।

आज भारत की परिस्थिति में भी हम इसे देख सकते हैं। जब नाटककार या कलाकार आज के तीखे सवालों से आंख चुराते हुए अपनी कायरता पर पर्दा डालने के लिए पुराने 'क्लासिक' नाटक के पीछे अपने को छुपा लेते हैं।
फ्रांस में जब हेन्डरिक की अपनी पूर्व पत्नी से बहस हो रही होती है तो वही पास में बैठा उसका एक पुराना दोस्त इसे सुन रहा होता है। कुछ समय बाद वह आता है और हेन्डरिक को एक थप्पड़ जड़ देता है। यह दृश्य बहुत ही पावरफुल है। हेन्डरिक इस थप्पड़ का जरा भी विरोध नहीं करता। 'क्लोज अप' में चेहरे का भाव यह बताता है कि उसे पता है कि वह इसी लायक है।

जब उसकी दूसरी काली पार्टनर (जिसके साथ वह कभी पब्लिक में नहीं होता क्योकि उस दौरान जर्मनी में प्रचलित नस्लीय शुद्धता के सिद्वान्त से यह मेल नहीं खाता, इसलिए वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी काली पार्टनर को देश से निकल जाने के लिए बाध्य करता है और उस पर यह अहसान भी जताता है कि उसने उसे सम्भावित नाजी हमले से बचा लिया) अकेले में उसे उसके समझौते या कहे कि उसकी मक्कारी के लिए धिक्कारती है तो वह कोई प्रतिरोध नहीं करता बल्कि तुरन्त आइने में देखता है कि क्या वह सचमुच कमीना है।
नाजी जनरल की चापलूसी करते हुए वह यहां तक चला जाता है कि एक प्रोग्राम में वह कहता है-''बिना संरक्षण के कला टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह होती है।''
दरअसल जब जब कैमरा हेन्डरिक का क्लोज अप लेता है तो उसके व्यक्तित्व का खोखलापन बहुत पावरफुल तरीके से सामने आ जाता है। और यही लगता है कि जब वो आरम्भ में वाम की ओर झुका था तब भी उसे वाम से कुछ लेना देना नहीं था बस उस समय वाम ही उसके आगे बढ़ने के लिए एक सीढ़ी की तरह था जैसे इस समय नाजी हंै।
फिल्म में एक और दृश्य बहुत ही प्रतीकात्मक और शक्तिशाली है। एक बार जब वह अपने आफिस आता है तो देखता है कि किसी ने आफिस के अन्दर नाजी-विरोधी पर्चे फेंके हुए है। वह जल्दी से जल्दी दूसरे लोगों के आने से पहले सभी पर्चे इकट्ठा करता है, बाथरुम में जाकर उन्हें जलाता है और फिर करीने से राख को इकट्ठा करके उसे अपनी जेब में रख लेता है। दरअसल ऐसे कलाकारो का यही मुख्य काम होता है- प्रतिरोध की आंच से व्यवस्था को बचाना। भारत में भी ऐसे कितने कलाकार हैं जो इस काम में जी जान से लगे हुए हैं।
फिल्म का अन्त बहुत शक्तिशाली है। नाजी जनरल हेन्डरिक को विशाल नवनिर्मित नाटक हाल में ले जाता है और कहता है कि यहां तुम्हारे प्रदर्शन पर तुम्हें बहुत शोहरत मिलेगी। उसे जबर्दस्ती हाल के बीच में जाने को कहा जाता है और उस पर चारों तरफ से लाइट डाली जाती है। इस तेज लाइट से बचने के लिए वह अपना चेहरा छुपाने का असफल प्रयास करता है और अपने से कहता है कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं, आखिर मैं एक कलाकार ही तो हूं। यहीं पर 'फ्रीज फ्रेम' के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है।
इस पूरी फिल्म को यदि हम आज के अपने देश के हालात में और उसमें कलाकारों की भूमिका के सन्दर्भ में अनुदित करें तो हमें गजब का साम्य नजर आयेगा। आपको भारत के फास्ट (हेन्डरिक जैसे कलाकार) और मेफिस्टो (फासीवादी यानी सरकारी तंत्र) के बीच की जुगलबन्दी को पहचानने में ज्यादा वर्जिश नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन यह काम मैं आप पर ही छोड़ता हूं।

वे नहीं कहेंगे कि वह समय अंधकार का था
वे पूछेंगे कि
उस समय के कवि
चुप क्यो थे?
-ब्रेख्त

[इस फिल्म को 1981 में विदेशी भाषा की कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का आस्कर अवार्ड भी मिला। इस फिल्म को हंगरी के डायरेक्टर 'Istvan Szabo' ने निर्देशित किया।]

#मनीषआज़ाद

(रीपोस्ट)


अंधविश्वास मुक्त नवरात्रि मनाने की पहल करें

*अंधविश्वास मुक्त नवरात्रि मनाने की पहल करें*

"नवरात्रि के दिनों में एक बार भानू भैया के साथ उनके मामा के घर गया तो उन्होंने खाने में मांस परोस दिया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि नवरात्रि में मेरे नानी घर में मांस तो दूर, प्याज-लहसुन और सामान्य नमक भी नहीं खाया जाता था। उन्होंने मेरी स्थिति समझी और बताया कि उनके यहां नवरात्रि के दिनों में हर दिन बलि देने की प्रथा है। और यह मांस उसी बलि का प्रसाद है।

आज देश में शाकाहारी, मांसाहारी की बहस चल रही है। नवरात्रि में मांस की दुकानें जबरन बंद कराई जा रही हैं। हर तरफ आस्था और भावनाओं के आहत होने का वास्ता दिया जा रहा है। सोशल मीडिया, टेलीविजन हर तरफ इसी का शोर है। इन्ही शोर के बीच मुझे अपना घर-गांव, इलाका याद आ रहा है। धार्मिक परिवार में जन्म लेने के बाद भी कभी मांसाहारी भोजन पर नियंत्रण जैसी चीज नहीं देखी। मांसाहार बेचने, खाने को लेकर कभी समुदायों के बीच तनातनी नहीं देखी। मेरे दादाजी सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद पंडिताई भी करते थे। सरस्वती पूजा, दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में लोग उन्हें बुलाते थे। लेकिन इससे उनके खान पान पर कभी असर नहीं पड़ा। न ही उन्होंने दूसरों के खान पान में कभी हस्तक्षेप किया। यह सिर्फ उनकी बात नहीं है। मिथिला में तो कई त्योहारों में मांस-मछली बनाने की प्रधानता रही है।

मिथिला के सांस्कृतिक त्योहार कोजगरा, भैया दूज में मछली बनते देखा है। जितिया के नहाई-खाय के दिन मछली खाई जाती है और उसके अगले दिन माएं बेटों के लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास करती हैं।

हमारे यहां श्राद्ध कर्म में तेरहवीं के बाद चौदहवें दिन "मांस-मछली" अनिवार्य रूप से खाया जाता है। दादी मां गुजरी तो मैं सोचने लगा कि पापा तो मांस-मछली खाते नहीं है। क्या वे खाएंगे? उस दिन जब उन्होंने खाना खा लिया तो सिर्फ रीति के मुताबिक उनकी थाली में मछली गिरा दी गयी।

मिथिला की शादियों में मांस-मछली खाना खास चर्चा का विषय रहता है। हर कोई अपनी खाने की लिमिट से कहीं ज्यादा खाता है। हर टेबल पर हड्डियों का ढेर लगा रहता है। मछली का मुड़ा खाना नाक की बात होती है। जो जितना बड़ा मुड़ा खाता है, उसे बारात में उतनी ज्यादा इज्जत मिलती है। लोग दो किलो, 4 किलो और इससे भी ज्यादा वजन का मुड़ा खाते हैं। और इसी तरह छककर मांस भी खाते हैं।

मेरे एक रिश्तेदार कभी प्याज-लहसुन भी नहीं खाते हैं। बहुत धार्मिक व्यक्ति हैं। एक दिन उनके घर गया तो देखा कि मांस खा रहे हैं। पूछने पर बताया कि यह तो बलि का प्रसाद है और इसे प्याज-लहसुन के बगैर ही पकाया गया है। वे यह प्रसाद खाते हैं।

इसलिए जब यह बहस हो रही कि महज मांस की दुकान खुलने भर से भावनाएं आहत हो रही हैं और आस्था को चोट पहुंच रही है? तो मैं सोचता हूं कि क्या मेरे दादाजी, पिताजी और हमारे इलाके के लोग हिन्दू नहीं हैं? अधिकांश तो बहुत धार्मिक हैं। सुबह उठकर पूजा-पाठ करते हैं। हर छोटी बात में भगवान को याद करते हुए। कोई मुसीबत आती है तो सबसे पहले भगवान से यही कहते हैं कि इस मुसीबत को दूर कर दीजिए, फलां चीज़ चढ़ाएंगे?
ऐसा करने वाले भी क्या हिन्दू माने जाएंगे? यह सवाल बार-बार मेरे जेहन में आ रहा है।

हालांकि यह बात भी कोरी कल्पना है कि अधिकतर हिन्दू मांसाहार नहीं खाते या सभी मुसलमान मांस खाते हैं। सिर्फ हमारे इलाके के लोग ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश लोग मांस खाते हैं। और यह बात मैं नहीं बल्कि सरकारी आंकड़े कह रहे हैं।

चौथे राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 42.8% महिलाएं और 48.9% पुरुष प्रत्येक सप्ताह मांसाहार का सेवन करते हैं।
एस आर एस सर्वे 2014 के अनुसार भारत में 71.6% पुरुष और 70.7% महिलाएं मांस खाते हैं। बिहार, झारखंड, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल जैसे हिन्दू बाहुल्य राज्यों में मांसाहार का सेवन करने वाले लोगों की संख्या 90% से अधिक है। जाहिर तौर पर इसकी भौगौलिक और सांस्कृतिक वजहें हैं।
सामाजिक मुद्दों पर अध्ययन करने वाली संस्था प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन से यह पता चलता है कि 56% हिन्दू मांस खाते हैं। अर्थात पूरे देश में सबसे अधिक मांस खाने वाले लोग हिन्दू ही हैं।
इसी अध्ययन से यह भी पता चला है कि 8% जैन और 75% बौद्ध मांसाहार का सेवन करते हैं। आमतौर पर इन दोनों धर्म के लोगों को शाकाहारी माना जाता है लेकिन ऐसा मानना ठीक नहीं है।
प्यू रिसर्च बताता है कि 8% मुसलमान भी मांस नहीं खाते हैं।

इन सभी आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि मांसाहारी भोजन का संबंध किसी धर्म से नहीं है। खानपान का संबंध कई अन्य चीजों से है, जिसमें धर्म एक बहुत छोटी सी भूमिका निभाता है।"

आज शासक वर्ग (लुटेरे पूंजीवादी वर्ग) नवरात्रि को विराट मजदूर वर्ग के विभिन्न समुदाय में वैमनस्य फैलाने के लिये एक अवसर की तरह नवरात्रि पर्व का उपयोग कर रहा है, मजदूरवर्ग इनके तमाम बदमाशी भरे प्रचार एवम कार्यवाइयों की निंदा करने, उसका भंडाफोड़ करने के लिये कृतसंकल्प है। हमारी मिहनतकस जनता की संस्कृति इतना उन्नत रही है कि यह पर्व-त्योहारों पर भी मांसाहारी भोजन पर नियन्त्र करने के खिलाफ रही है। हमे इस संस्कृति को जारी रखने का संकल्प लेना होगा एवम नवरात्रि के अवसर पर इस संस्कृति का न केवल का प्रचार प्रसार करना चाहिये बल्कि सामूहिक मांसाहारी भोजन का आयोजन भी करना चाहिये।

*सर्वहारा संस्कृति जिंदाबाद!*
*पतनशील बुर्जुवा संस्कृति मुर्दाबाद!*





Saturday, 24 September 2022

फ़िल्म लाइफ इस ब्यूटीफुल

इमिग्रेशन कैम्प या डिंटेशन सेंटर वह जगह होती है, जहां वीजा उल्लंघन, अवैध प्रवेश या अनधिकृत तरीकों से देश में आने वाले लोगों को रखा जाता है। हॉलीवुड में कुछ मशहूर फिल्में बनी हैं जिन्होंने डिटेंशन सेंटर की हकीकत को पर्दे पर गंभीरता से दिखाया गया है।

लाइफ इस ब्यूटीफुल इसी तरह की फ़िल्म है। साल 1997 में रिलीज हुई 'लाइफ इस ब्यूटिफुल' विश्व युद्ध 2 के दौरान जर्मन फोर्स से पीड़ित परिवार की कहानी है। फिल्म में एक यहूदी-इटालियन वेटर और उसके छोटे बेटे को कॉन्सनट्रेशन कैंप भेज दिया जाता है। इसके बाद पिता अपने बेटे को यह यकीन दिलाता है कि यह एक खेल चल रहा है और इसे जीतने पर ईनाम मिलेगा। फिल्म का निर्देशन ऑस्कर विजेता एक्टर रॉबर्टो बेनिग्नी ने किया है। रॉबर्टो इस फिल्म में मुख्य भूमिका में भी हैं। फिल्म ने तीन ऑस्कर समेत 67 पुरस्कार अपने नाम किए थे।

Friday, 23 September 2022

दोस्तोयेव्स्की और "रजत रातें"



महान लेखक और चिन्तक दोस्तोयेव्स्की मुख्यतः अपने बड़े सामाजिक- दार्शनिक उपन्यासों के लिये ही विश्व-विख्यात है । किन्तु "अपराध और दण्ड" तथा "कारामाजोव बन्धु " के रचयिता के कृतित्व मे लघु उपन्यासों और कहानियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है ।

दोस्तोयेव्स्की की पहली रचना "दरिद्र नारायण" १८४६ में प्रकाशित हुई । तब से ७ वे दशक के मध्य तक लघु उपन्यास ही उनका प्रिय और लगभग एकमात्र साहित्यिक विधा बना रहा। एक के बाद एक लघु उपन्यास पढते हुए हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन सम्बन्धी विशद सामग्री को धीरे-धीरे पचाते हुए सृजनात्मक प्रौढ़ता प्राप्त करने तक उन्होंने कितना जटिल मार्ग तय किया ।

दोस्तोयेव्स्की के पहले लघु उपन्यास " दरिद्र नारायण " का प्रकाशन पाचवें दशक में साहित्य - जगत की एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना माना गया। इस छोटी-सी रचना में ही गोगोल की साहित्यिक प्रवृत्ति के मूलभूत विचार इतने स्पष्ट और पूर्ण रूप मे झलके कि बेलीन्स्की आत्म-विभोर हो उठे और उन्होंने दोस्तोयेव्स्की के महान लेखक होने की भविष्यवाणी की ।

योदोर मिखाईलोविच दोस्तोयेव्स्की का जन्म ११ नवम्बर १८२१ को मास्को मे हुआ। उनके पिता मास्को के मारीइन्स्की अस्पताल के एक मामूली से और निर्धन चिकित्सक थे। दोस्तोयेव्स्की का बचपन से ही प्रभावों और दुख मुसीबतों से पाला पड़ा, वे स्वभाव से अत्यधिक अनुभूतिशील व्यक्ति थे और छोटी उम्र में उन्हे नगर के दीन-हीनों की दुर्दशा का ज्ञान हो गया था। पीटर्सबर्ग के सैन्य इंजीनियरी . विद्यालय में उनकी शिक्षा के वर्ष जीवन के वास्तविक अनुभव की दृष्टि से बहुत



महत्वपूर्ण रहे। इस महानगर के सामाजिक वैषम्य ने तरुण दोस्तोयेव्स्की के हृदय पर अमिट छाप अंकित कर दी। इजीनियरी, विद्यालय की पढाई ख़त्म करने के बाद दोस्तोयेव्स्की ने सेना मे कोई अच्छा ओहदा पाने की इच्छा प्रकट नही की । साहित्य ने उन्हें अपनी और खींच लिया। उसी में उन्हें स्पष्ट रूप से अपना भविष्य दिखाई दिया । पुश्किन और गोगोल, बाल्जाक और शिल्लर के अत्यधिक श्रद्धालु दोस्तोयेव्स्की साहित्य को जीवन-बोध और मानवीय आत्मा को प्रभावित करने का महान साधन मानते थे । वे सुखी और श्रेष्ठ मानव की कल्पना करते थे, किन्तु अपने चारो ओर निर्दयता और अधिकारहीनता, पीड़ितो के दुखभरे आंसू और अत्यधिक, लगभग कल्पनातीत गरीबी पाते थे। दोस्तोयेव्स्की के पहले बड़े नगर के इन मामूली और बदकिस्मत लोगो की दुर्दशा का किसी ने भी ऐसा करुण चित्र प्रस्तुत नही किया था ।

'दरिद्र नारायण', - यह एक लघु उपन्यास का नाम ही नही, उससे कही "" बढ़कर है, दोस्तोयेव्स्की ने अनेक वर्षों तक के अपने साहित्य-सृजन के मुख्य " विषय के बारे मे उक्त मत प्रकट किया था। दीनो और भाग्यहीनों की स्थायी चिन्ता उन्हे सदा बेचैन किये रही और यही शाश्वत बेचैनी तथा सत्य की यही अन्तहीन और यातनापूर्ण खोज ही शायद उनकी प्रतिभा का सब से जोरदार पहलू है ।

पाचवे दशक के अन्त में दोस्तोयेव्स्की ने नये विषय की ओर ध्यान दिया। उन्होने एक गरीब बुद्धिजीवी, एक स्वप्नदर्शी, उच्च मानसिक और बौद्धिक स्तर के एक  नायक की रचना की। पीटर्सबर्ग का बुद्धिजीवी यदि धनी और कुलीन नही था, ' निर्धनता और निपट एकाकीपन ही उसका भाग्य होते थे। दोस्तोयेव्स्की के चरित्र चित्रण के अनुसार ऐसा व्यक्ति दयालु, किन्तु दुर्बल है, वह कठोर वास्तविकता से नाता तोड़कर कल्पना और सपनो की दुनिया में जा बसता है। " रजत राते " (१८४८) का नायक यह स्वीकार करता हुआ कहता है- "मैं स्वप्नदर्शी हूं । मेरा वास्तविक जीवन बहुत कम है।" धीरे-धीरे वह तो बातचीत करना भी भूल जाता है और बात करता है तो इतने अधिक "सुन्दर" ढंग से मानो किताब लिख रहा हो । यदि कोई व्यक्ति हमेशा अकेला रहा हो, किसी से भी उसने कभी कोई बातचीत न की हो और यदि उसकी अपनी कोई "कहानी" भी न हो, तो इसमें हैरानी की बात ही कौन-सी है! इसके साथ ही स्वप्नदर्शी प्रतिभाशाली और चिन्तनशील व्यक्ति है - लगभग लेखक की शैली में ही उसके मुंह से कहानी कहलवायी जाती है। स्वप्नदर्शी की चेतना में कल्पना और वास्तविकता घुलमिल जाती है, उसके जीवन


मे रजत रातो की शीतत रोशनी सूरज के प्रखर प्रकाश का स्थान लेती है । जितनी जल्दी से रजत रात बीतती है, उसी तेजी से स्वप्नदर्शी की अल्पकालीन खुशी और जीवन के साथ उसके वास्तविक सम्पर्क का भी अन्त हो जाता है। एक के बाद एक चार रातें झलक दिखाकर गायब हो जाती है। लघु उपन्यास में भी इन्ही के अनुसार चार परिच्छेद है - "पहली रात ", 'दूसरी रात "... " "... और फिर सुबह हो गयी। स्वप्नदर्शी कहता है-" सुबह मेरी रातों का अंत बनी। दिन बुरा था। पानी बरस रहा था और मेरी खिड़की के शीशे पर उदासी भरी टपटप हो रही थी। मेरे छोटे-से कमरे में अंधेरा था, बाहर बादल छाये हुए थे।" प्रकृति-वर्णन बहुत ही बारीकी से नायक की मन स्थिति को व्यक्त करता कहानी कहनेवाला खुद भी कल्पना की उड़ानें भरनेवाला रोमानी व्यक्ति है और प्रकृति को अपनी ही नज़र से देखता है - " बहुत ही प्यारी रात थी, ऐसी रात, जो केवल तभी हो सकती है, जब हम जवान होते हैं, कृपालु पाठक।" स्वप्नदर्शी मन से कवि है- उसके लिये किसी अपरिचित के चेहरे से ही उसके चरित्र की कल्पना करना कुछ कठिन नही है, उसकी तो घरों से भी जान-पहचान है, वह उनके भाग्यों से परिचित है, उनकी "आवाजों" का अन्तर जानता है वह खुद भी तो कवि बनने का सपना देखता है, जो शुरू में अज्ञात रहता है मगर बाद मे ख्याति के शिखर पर पहुंच जाता है।

दोस्तोयेव्स्की की शक्ति इस बात में निहित है कि " रजत राते" के नायक के प्रति पूरी सहानुभूति रखते हुए भी उन्होने उसकी दुर्बलताओं को उभारा है । वास्तविकता के सम्पर्क के क्षण ही स्वप्नदर्शी के सर्वाधिक प्रिय क्षण थे । यदि गोगोल के स्वप्नदर्शी चित्रकार पिस्कार्योव ( " नेव्स्की प्रोस्पेक्त ") के लिये जीवन के साथ पहला ही टकराव घातक सिद्ध हुआ, क्योकि वास्तविकता ने उसकी कल्पना के पंख तोड़ डाले, तो "रजत राते" के नायक ने जीवन में ही वह कुछ पाया, जो सर्वश्रेष्ठ है, जो कल्पना से बढ़-चढ़कर है । इसी वास्तविक जीवन के सामने कल्पना की सभी उडान, सभी सपनों का सदा के लिये रंग फीका पड़ गया। "रजत राते" के उदासी भरे और विषादपूर्ण अन्त का आशय यह है कि सपने पालकर और अधिक जीना सम्भव नही और प्रियतमा के जाने से वास्तविक सुख का महल भी गिर चुका है ।

... दोस्तोयेव्स्की की साहित्यिक गतिविधि का सिलसिला अचानक ही टूट गया। पेट्राशेववादियों के क्रान्तिकारी मण्डल पर चलाये गये मुकदमे के सम्बन्ध में उन्हें २३ अप्रैल १८४९ को गिरफ़्तार करके पीटर पाल किले में बन्द कर दिया गया। दोस्तोयेव्स्की ने सेम्योनोव्स्की मैदान में मृत्यु दण्ड के क्रूर नाटक, कठोर



श्रम-दण्ड और साइवेरिया में निर्वासन के भयानक वर्षों को साहसपूर्ण सहन किया।

निर्वासनकाल के लम्बे मौन के बाद १८५६ में, सामाजिक उत्थान के नये युग में, उन्होंने फिर से अपनी कलम सम्भाली। किन्तु वे निर्वासन से पहले जिस प्रेरणा से अनुप्राणित थे, उसी को संजोये हुए सामाजिक और साहित्यिक जीवन की ओर नही लौटे। वे संघर्ष-पथ पर बढते हुए वास्तविकता को बदलने, उसे बेहतर बनाने की सम्भावना में अपना विश्वास खो चुके थे। मानवजाति के दुःखी-कष्टो को अपनी आत्मा में उतारकर उन्होंने उनकी अन्तहीनता के आगे घुटने टेक दिये ।

लेखक के पीटर्सवर्ग लौटने पर उनके बड़े उपन्यास "अपमानित और अवमानित" (१८६१), "अपराध और दण्ड " (१८६६), "बुद्ध" " (१८६८), "भूत" (१८७१- १८७२), "तरुण" (१८७५), "कारामाजोव वन्धु " (१८७६ - १८८० ) प्रकाश में आये।

इन उपन्यासों ने दोस्तोयेव्स्की को रूमी और विश्वसाहित्य को एक महानतम उपन्यासकार बना दिया। उन्होने दार्शनिक विचारों से ओतप्रोत और मनोवैज्ञानिक गहराइयो को छूनेवाले विशेष ढंग के उपन्यास रचे, जो मानवीय आत्मा के 'अनुसन्धान" का विलक्षण रूप धारण कर लेते है । अपने उपन्यासों में वे बड़े उत्साह  और अथक रूप से सत्य की खोज करते रहे। " मानव के प्रति पीड़ा " की वह भावना उनमे निरंतर बनी रही जिसे प्रगतिशील आलोचको ने उनकी प्रारम्भिक रचनाओ में ही  स्पष्टतः भाप लिया था। उनका समूचा कृतित्व इसी पीड़ा, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था से मानवतावादी लेखक के अत्यधिक असन्तोष, सभी लोगो के भाग्य के लिये प्रत्येक के उत्तरदायित्व की उच्च भावना की चेतना, बेचैनीभरे और पथ खोजते हुए विचारों से भरपूर है ।

दोस्तोयेव्स्की का देहान्त ९ फ़रवरी १८८१ को पीटर्सवर्ग में हुआ। लेखक के रूप में दोस्तोयेव्स्की का मूल्यांकन करते हुए म० गोर्की ने लिखा है - "दोस्तोयेव्स्की की प्रतिभासम्पन्नता निर्विवाद है, अभिव्यजना शक्ति की दृष्टि से शायद, केवल शेक्सपीयर से ही उनकी तुलना की जा सकती है।"

त० रोजेनब्ल्यूम

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संविधान और फर्जी...........

भारत के संविधान पर क्रांतिकारी कवि 'पाश' ने एक कविता लिखी थी. उनकी कविता में संविधान के प्रति रोष साफ झलकता है.

संविधान
यह पुस्‍तक मर चुकी है
इसे मत पढ़ो
इसके लफ़्ज़ों में मौत की ठण्‍डक है
और एक-एक पन्‍ना
ज़िन्दगी के अन्तिम पल जैसा भयानक
यह पुस्‍तक जब बनी थी
तो मैं एक पशु था
सोया हुआ पशु
और जब मैं जागा
तो मेरे इन्सान बनने तक
ये पुस्‍तक मर चुकी थी
अब अगर इस पुस्‍तक को पढ़ोगे
तो पशु बन जाओगे
सोए हुए पशु.

पाश की ये कविता कहती है कि अंधेरी कोठरी में मटर की पोटली खोजते वक्त सुबकते इंसान की आहें संविधान में नहीं दर्ज होती हैं. मत पढ़िए उसे. हथेलियों के गिट्ठे, पैरों के गुरखुलों का चुभता दर्द नहीं लिखा जाता संविधान में. मत पढ़िए उसे. सजल आंखों पर जब थप्पड़ पड़ता है तो दर्द और आंसू दोनों साथ छलकते हैं, सिस्टम के आगे हाथ जोड़कर खड़े उस बूढ़े की मजबूरी कोई नहीं लिखता उसमें. मत पढ़िए उसे.

'नापाम गर्ल ' के 50 साल...



कुछ फोटो ऐसी होती हैं जो 'फोटो' बनने से इंकार कर देती हैं।
वह किसी फ्रेम में कैद नहीं होती। वह हमारे साथ साथ चलती हैं, अपने पूरे इतिहास के साथ।
बहुचर्चित 'नापाम गर्ल' (नीचे वाली फोटो) वाली फोटो ऐसी ही एक फोटो है। 9 साल की  किम फुक (Kim Phuc) आज से ठीक 50 साल पहले साउथ वियतनाम के एक गांव में अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी। 6 जून को 'न्यूयार्क टाइम्स' में छपे अपने लेख में किम फुक कहती हैं कि माँ बताती थी कि बचपन मे मैं बहुत हँसती थी।
उस दिन भी जब वह दोस्तों के साथ खेलते हुए जोर जोर से हंस रही थी, तभी वियतनाम को बर्बाद करने के उद्देश्य से अमेरिका ने वहां एक 'नापाम बम' गिराया। उसकी जलन त्वचा पर ऐसी थी कि किम फुक अपने कपड़े उतारते हुए भागने लगी और निर्वस्त्र हो गयी। तभी एसोसिएटेड प्रेस के एक फोटोग्राफर निक उट (Nick Ut) ने यह फोटो खींचा। 
लेकिन यह कम लोगो को पता है कि पत्रकार का धर्म निभाते ही उन्होंने मनुष्य का धर्म निभाने के लिए अपना कैमरा पैक किया और किम फुक को एक कपड़े में लपेटकर अस्पताल पहुँचाया और उनकी जान बचाई। 
आज किम फुक दुनिया में जहाँ कहीं भी युद्व हो रहा है, वहां जाती हैं और प्रभावित बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करती हैं।
यह फोटो हमें लगातार यह याद दिलाती है कि पृथ्वी पर युद्ध थोपने वाले साम्राज्यवादी देश लगातार प्रति दिन 'नापाम गर्ल' तैयार कर रहे हैं। 
इन 'नापाम गर्ल' का असली इलाज तो यही है कि हम इस 'जलती निर्वस्त्र दुनिया' को जितनी जल्दी हो बदल डाले, ताकि फिर किसी लड़की की बिंदास हंसी जलती चीख में न बदले। उसे अपनी फूलों वाली फ्रॉक को जलती त्वचा के कारण फाड़ कर फेंकना न पड़े।

#मनीषआज़ाद