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Monday, 9 January 2023

मतिभ्रम कुलेखकों की बाढ़

हिंदी में अतिसक्रियता व संपर्कशीलता भी आपको महत्वपूर्ण लेखक बना देती है। दरअसल यहाँ 'दिखना' लोगों को इतना आतंकित करता है कि जो हर जगह दिखता है, लोग उसे पूजने लगते हैं। प्रतिभा हो न हो, लेखन चाहे जितना बासी व बोदा हो पर लगातार लोगों से संपर्क बनाना, लल्लो-चप्पो करना, यहाँ-वहाँ ही-ही करते फिरना, लेखन के नाम पर 'नित्यकर्म' करते रहना, संपादकों को साधना व कुछ भी छपवाते रहना आपको केंद्र में ला देता है। दो-चार मैग्जिन में आपकी रचना (कूड़ा कहिए) दिखते लोग आपसे आतंकित होना शुरू कर देते हैं। अब हर एडिटर बगैर पढ़े आपको छापना शुरू कर देता है। बड़े-बड़े लोगों के साथ आप उठना-बैठना शुरू कर देते हैं व अपने एकांत को त्याग कर सोशलाइट बन जाते हैं। रोज़ कुछ लोगों से मिलने की चाह व निरंतर वाह-वाह की आकांक्षा, निरंतर चर्चा में बने रहने की जुगत आपकी रही-सही प्रतिभा का भी गला घोंट देती है। मगर आप निरंतर डिमांड पर जो हग कर फैलाते हैं, उसे ही तमाम सूअरें निष्ठा से सूंघती व उसे लेकर चीकरती रहती हैं। आपको लगता है, हो गए लेखक। काश कि आप अपने लिखे के प्रति आलोचनात्मक हो पाते, कुछ ठहर कर सोच पाते, अपने एकांत को तलाशते, अपनी उद्विग्नता में धँसते पर आपको क्या मतलब इनसे! भेड़ों के बीच होना व उनका भेंभियाना आपको कुछ सोचने दे तब न! ऐसे मतिभ्रम कुलेखकों की बाढ़ है हिन्दी में। हर शहर में। बजबजा रहा है माहौल।

Hareprakash Upadhyay

Sunday, 8 January 2023

तारों, खगोल और प्राकृतिक जगत्-सम्बन्ध

आकाश को अनन्त कहकर पूर्वजों ने उसके विस्तार का एक अन्दाजा लगा लिया था, लेकिन वह अत्यन्त वास्तविकता की भित्ति पर न होकर अधिकतर अज्ञान के आधार पर आश्रित था। प्रकाश की गति प्रति सेकेण्ड एक लाख अस्सी
हजार मील है। आज तक जो तारा हमसे सबसे नजदीक मालूम हुआ है; वह इतनी दूर है कि उसकी किरण को हम तक पहुँचने में ढाई बरस लगते हैं। ध्रुव तारा हमसे बहुत दूर नहीं है, तो भी उसके जिस रूप को हम इस वक्त देख रहे हैं, वह आज से पचास बरस पहले का है। 
दस-दस बीस-बीस हजार बरस में
अपनी किरणों को हम तक पहुँचाने वाले तारों की भारी संख्या से हमें आश्चर्य करने की जरूरत नहीं। नक्षत्र-मण्डल में ऐसे भी तारे हैं जिनकी दूरी को किरणों की यात्रा के वर्षों की संख्या में बतलाना मुश्किल है। तारों, खगोल और प्राकृतिक
जगत्-सम्बन्ध की अपनी इस अज्ञानता को मनुष्य देवता और ईश्वर की आड़ में छिपाता था।

महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के जन्म दिवस के अवसर पर



"स्टीफन हॉकिंग और आधुनिक भौतिक विज्ञान"

(स्टीफन की मृत्यु के बाद नागरिक अखबार में छपा लेख)

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मार्च के मध्य में प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग की मृत्यु हो गई। वे आज के सबसे जाने-पहचाने वैज्ञानिक थे और अक्सर ही उनकी लोकप्रिय हस्तियों में गिनती होती थी। पदार्थ और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति व संरचना पर लिखी उनकी किताब 'समय का एक संक्षिप्त इतिहास' अपने प्रकाशन के समय से ही 'बेस्ट सेलर' किताब रही है।

अपनी युवावस्था के शुरुआती चरण में ही पता चला कि स्टीफन हाकिंग एक खास किस्म की बीमारी के शिकार हैं। इसे कम तकनीकी भाषा में मोटर न्यूरान बीमारी कहते हैं जिसका आशय है कि दिमाग व रीढ़ से जो तंत्रिकाएं मांसपेशियों तक संदेश पहुंचाती हैं, उनकी बीमारी। इस बीमारी के कारण मांसपेशियां गतिमान नहीं हो सकतीं और इस बीमारी का शिकार व्यक्ति अपने अंगों का संचालन नहीं कर सकता। तब डाॅक्टरों का कहना था कि स्टीफन हाकिंग कुछ ही समय तक जिन्दा रह पायेंगे। पर स्टीफन हाकिंग ने डाॅक्टरों को गलत साबित किया और सत्तर साल से ज्यादा जिन्दा रहे। बस वे सारी जिन्दगी पहिया कुर्सी पर रहे और समय के साथ बोलने-चलने के लिए भी मशीन पर निर्भर होते गये। बाद में उनकी मशीनी आवाज उनका ट्रेड मार्क बन गई। 

उनकी लोकप्रियता में उनके वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अलावा उनकी खास जिन्दगी और जिजीविषा का भी योगदान था हालांकि यह अनुचित नहीं था। उनकी जिन्दगी आंतरिक प्रेरणा और लक्ष्य को समर्पित जिन्दगी का अदभुत उदाहरण थी।

यह महत्वपूर्ण है कि इतनी कष्टप्रद जिन्दगी जीने वाला व्यक्ति पूर्णतया नास्तिक था और नास्तिकता का खुलेआम प्रचार भी करता था। उनकी नास्तिकता ब्रह्माण्ड के बारे में उनके सिद्धान्तों से जुड़ी हुई थी।

आज आधुनिक भौतिक विज्ञान बहुत ज्यादा गणितीय और तकनीकी हो चुका है। उस स्तर पर उसे समझ पाना उस क्षेत्र के लोगों के लिए ही संभव है। स्टीफन हाकिंग के शोध उसी स्तर के हैं। पर उनके शोधों से निकलने वाले निष्कर्षों को सरलीकृत रूप में आम लोगों के लिए भी प्रस्तुत किया जा सकता है। स्वयं स्टीफन हाकिंग ने अपनी लोकप्रिय किताबों में यही करने का प्रयास किया था। उनकी किताब 'समय का एक संक्षिप्त इतिहास' की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि इसमें विज्ञान के आज के जटिल सिद्धान्तों को सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है। आगे स्टीफन हाकिंग के वैज्ञानिक सिद्धान्तों की पृष्ठभूमि, उनके सिद्धान्तों और इनकी विवेचना को प्रस्तुत किया गया है।

आइंस्टीन के बारे में एक किस्सा प्रचलित है जो सच भी है। आइंस्टीन ने जब 1916 में सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्त प्रस्तुत किया तो इसके समीकरणों से यह निष्कर्ष निकलता प्रतीत हुआ कि ब्रह्माण्ड स्थिर नहीं है और फैल रहा है। तब विज्ञान में यह सिद्धान्त मान्य था कि एक बार पैदा हो जाने के बाद ब्रह्माण्ड स्थिर है। तारे, ग्रह, उपग्रह अपनी धुरी पर और अपनी कक्षा में घूम रहे हैं पर यह पूरी व्यवस्था स्थिर है। अपने समीकरणों को तब प्रचलित मान्यता के खिलाफ जाता देख आइंस्टीन ने उनमें एक स्थिरांक जोड़ दिया। इसे जोड़ने के बाद समीकरणों में ब्रह्माण्ड स्थिर हो गया। पर ब्रह्माण्ड स्थिर तो था नहीं। कुछ ही साल बाद एक नये बड़े टेलीस्कोप से पता चला कि ब्रह्माण्ड की सारी आकाशगंगाएं एक-दूसरे से दूर भाग रही हैं। यह प्रेक्षण स्थिर ब्रह्माण्ड की धारणा के खिलाफ था। कुछ ही समय में स्पष्ट हो गया कि ब्रह्माण्ड स्थिर नहीं है बल्कि फैल रहा है। फैलते ब्रह्माण्ड की धारणा स्थापित हो जाने के बाद आइंस्टीन ने कहा कि अपने सापेक्षिकता के सिद्धान्तों में स्थिर ब्रह्माण्ड के लिए बनावटी रूप से एक स्थिरांक जोड़ना उनके वैज्ञानिक जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। 

फैलते ब्रह्माण्ड की धारणा स्थापित हो जाने के बाद यह निष्कर्ष निकलना स्वाभाविक था कि यदि समय में पीछे लौटें तो एक समय आयेगा जब सारा ब्रह्माण्ड एक बिंदु पर था। यहीं से ब्रह्माण्ड शुरु हुआ होगा जो तब से लगातार फैलता गया है और अभी भी फैल रहा है। बाद में इसी निष्कर्ष से बिग बैंग की धारणा पैदा हुई। इस धारणा के अनुसार आज से करीब तेरह अरब साल पहले एक बहुत बड़े धमाके में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। द्रव्य, ऊर्जा, दिक् और काल की तभी उत्पत्ति हुई। प्राचीन भारत में सारा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान खोज निकालने वाले संघी यह दावा कर सकते हैं कि महाभारत में कहा गया है कि शुरू में ब्रह्माण्ड एक गोला था।

बिग बैंग के सिद्धान्त ने पदार्थ, ऊर्जा, दिक्-काल और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में जितने सवाल हल किये उससे ज्यादा पैदा किये। मसलन बिग बैंग के समय सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा एक बिन्दु पर केन्द्रित रही होगी। अंकगणित के अनुसार बिन्दु का तो कोई आयाम होता नहीं। यानी अपने क्षेत्रफल में वह शून्य होता है। अब शून्य पर सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा कैसे समा सकती है। गणित के हिसाब से देखें तो किसी भी अंक को शून्य से भाग देने पर परिणाम अनंत आता है जिसका कोई मतलब नहीं होता। भौतिक विज्ञान में इस स्थिति को 'सिंगुलैरिटी' कहते हैं। बिग बैंग के सिद्धान्त की सबसे बड़ी समस्या यही थी कि बिग बैंग सिंगुलैरिटी से कैसे निपटा जाये? एक बिन्दु पर सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा केन्द्रित हो जाने से जो विज्ञान के नियम गड़बड़ा जाते लगते हैं, उस स्थिति से कैसे निपटा जाये? क्या इस स्थिति में विज्ञान के कोई अन्य नियम हैं? या कि 'सिंगुलैरिटी' जैसी स्थिति असल में होती ही नहीं?

यहीं से भौतिक विज्ञान के दूसरे छोर की चर्चा आ जाती है। ब्रह्माण्ड के बारे में छानबीन, पदार्थ-ऊर्जा, दिक्-काल की वृहद स्तर की छानबीन है जबकि पदार्थ की संरचना की छानबीन क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर स्तर की ओर ले जाती है। भौतिक विज्ञान इसे क्वाण्टम मैकेनिक्स कहता है। 

परमाणु और उससे भी नीचे के कणों मसलन इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान, मेसान, इत्यादि की गति के नियमों की व्याख्या करने वाला क्वांटम मैकेनिक्स अपने आप में टुकड़ों (क्वांटम) का सिद्धान्त है। यह चीजों को निरन्तरता में नहीं बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में देखता है। यही नहीं, यह कहता है कि इस सूक्ष्म स्तर पर चीजें निश्चित तौर पर नहीं बल्कि संयोग के रूप में होती हैं। यदि कोई निश्चितता होती भी है तो वह संयोग से पैदा होती है। यह स्वाभाविक है कि यह माना जाय कि जब बिग बैंग में ब्रह्माण्ड पैदा हुआ तो उस समय वह इसी स्थिरांक अवस्था में था और क्वांटम मैकेनिक्स के हिसाब से गति कर रहा था।

आइंस्टीन का सापेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्त साथ ही गुरुत्वाकर्षण का भी सिद्धान्त था। और गुरुत्वाकर्षण ब्रह्माण्ड के वृहद स्तर पर यानी आकाशगंगाओं, तारों, ग्रहों-उपग्रहों के स्तर पर गति का आम नियामक है। यानी ब्रह्माण्ड के इस स्तर पर गति आइंस्टीन के सापेक्षिकता के आम सिद्धान्त के हिसाब से होती है। अब सापेक्षिकता का सिद्धान्त टुकड़ों की नहीं बल्कि निरन्तरता की बात करता है। इसी तरह वह संयोग की नहीं बल्कि निश्चितता की बात करता है। इस तरह सापेक्षिकता का सिद्धान्त क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धान्त का ठीक उल्टा है।

अब दोनों सिद्धान्तों के ठीक उल्टे चरित्र से एक बड़ी समस्या पैदा हो जाती है। क्या पदार्थ वृहद और सूक्ष्म स्तर पर बिल्कुल विपरीत नियमों के हिसाब से गति करता है? यदि ऐसा है तो एक-दूसरे में रूपान्तरित कैसे हो जाता है? टुकड़ा-टुकड़ा (क्वांटम) निरंतरता में और संयोग निश्चितता में कैसे रूपान्तरित हो जाता है? ब्रह्माण्ड के ठोस संदर्भ में बात करें तो अपनी उत्पत्ति के समय क्वांटम रूप में व्यवहार करने वाला ब्रह्माण्ड बाद में निरंतरता के हिसाब से व्यवहार कैसे करने लगा? यह संक्रमण कब और कैसे सम्पन्न हुआ?

हालांकि आइंस्टीन के जिन्दा रहते बिग बैंग की धारणा मुकम्मल नहीं हुई थी, आइंस्टीन सापेक्षिकता का आम सिद्धान्त प्रस्तुत करने के बाद ताउम्र इस समस्या से जूझते रहे कि पदार्थ की सूक्ष्म और वृहद स्तर पर गति के सिद्धान्त अपने चरित्र में बिल्कुल विपरीत क्यों हैं? आइंस्टीन हमेशा यह मानते रहे कि इसका कारण इन सिद्धान्तों का आंशिक होना है। उनकी नजर में कोई अन्य तीसरा और ऊंचा गति का नियम प्रकृति में विद्यमान है तथा गति के ये दोनों नियम (सापेक्षिकता का सिद्धान्त और क्वांटम मैकेनिक्स) पदार्थ के दो स्तरों पर उसकी दो आंशिक अभिव्यक्तियां हैं। आंइस्टीन अपने जिन्दा रहते इस तीसरे ज्यादा ऊंचे नियम की खोज में लगे रहे लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

तकनीकी बारीकियों को छोड़ दें तो स्टीफन हाकिंग भी सार रूप में इसी समस्या से जूझते रहे।

स्टीफन हाकिंग का तकनीकी काम ज्यादातर ब्लैकहोल से सम्बन्धित रहा है हालांकि उन्होंने शुरुआत फ्रेड हायेल और जयंत नार्लिकर के सिद्धान्त को चुनौती देने से की थी। फ्रेड हायेल और जयंत नार्लिकर का प्रस्ताव था कि ब्रह्माण्ड स्थिर गति से लगातार फैलता जा रहा है और अनंत काल तक फैलता रहेगा। हाकिंग का कहना था कि इसके लिए पदार्थ और ऊर्जा का निरंतर पैदा होना जरूरी है और यही नहीं हो सकता। इसलिए एक समय ऐसा आयेगा जब ब्रह्माण्ड का फैलना बन्द हो जायेगा और सिकुड़ना शुरु हो जायेगा। अंततः वह फिर एक बिन्दु पर सिमट जायेगा- बिग क्रंच में। शुरूआत बिग बैंग से हुई थी और अंत बिग क्रंच में होगा हालांकि यह हजारों अरब साल बाद होगा।

ब्रह्माण्ड के एक बिन्दु पर सिमट जाने से स्टीफन हाकिंग ब्लैकहोल की अपनी अवधारणा पर पहुंचे हालांकि ब्लैकहोल की अवधारणा उनसे पहले रोजर पेनरोज ने दी थी। यदि ब्रह्माण्ड सिकुड़ कर कभी एक बिन्दु पर पहुंचेगा तो 'सिंगुलैरिटी' की समस्या पैदा हो जायेगी। इस 'सिंगुलैरिटी' पर गुरुत्वाकर्षण अनंत हो जायेगा क्योंकि आइंस्टीन के सापेक्षिकता के आम सिद्धान्त के अनुसार गुरुत्वाकर्षण और कुछ नहीं दिक्-काल की चर्तुआयामी चादर पर द्रव्य से पड़ने वाली सिकुड़न है जो एक बिन्दु पर ब्रह्माण्ड की समस्त पदार्थ-ऊर्जा के केन्द्रित होने से अनंत हो जायेगी। इस अनंत गुरुत्वाकर्षण से कोई भी चीज बच नहीं सकती और जो भी चीज इसके पास से गुजरेगी वह इसमें समा जायेगी।

ब्लैक होल ब्रह्माण्ड के ऐसे क्षेत्र हैं जहां गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा होता है कि उसके पास से गुजरने वाली प्रकाश की किरण भी उसमें समा जाती हैं। ब्लैक होल किसी बड़े तारे के जीवन चक्र पूरा कर लेने के बाद उनके सिकुड़ने से पैदा होते हैं। हालांकि बाद में यह धारणा प्रस्तुत की गई कि ब्लैक होल अत्यंत सूक्ष्म यानी परमाणु के नाभिक के बराबर हो सकते हैं। यहां तक कहा गया कि परमाणु के नाभिक दरअसल ब्लैक होल ही हैं।

ब्लैक होल की धारणा में 'सिंगुलैरिटी' की समस्या से बचने के लिए स्टीफन हाकिंग ने क्वांटम ग्रेविटी का सिद्धान्त विकसित किया। यह आइंस्टीन के सिद्धान्त को क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धान्त के साथ मिलाने की कोशिश थी। इस मिलन से कई रोचक निष्कर्ष निकले पर उनकी परीक्षा करने का कोई तरीका नहीं था।

स्टीफन हाकिंग का मानना था कि सापेक्षिकता के सिद्धान्त और क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धान्त के मेल से जो क्वांटम ग्रेविटी सिद्धान्त पैदा हुआ है उससे भौतिक जगत की व्याख्या का अंतिम सिद्धान्त पैदा हो गया है। यह सभी कुछ की व्याख्या करता है। हाकिंग ने एक लोकप्रिय किताब इसी नाम से लिखी 'सब कुछ का सिद्धान्त' (थ्योरी आव एवरीथिंग)। पदार्थ की संरचना के सुपरस्ट्रिंग थ्योरी के साथ यह मान लिया गया कि भौतिक विज्ञान अपने अंतिम स्तर पर पहुंच गया है। 

जैसा कि पहले कहा गया है स्टीफन हाकिंग ने जो सिद्धान्त प्रस्तुत किये वे बहुत जटिल गणितीय सिद्धान्त हैं। बस उनके रोचक निष्कर्ष ही आमजन तक पहुंच सके। पर इन जटिल गणितीय सिद्धान्तों के पीछे जो दार्शनिक पहुंच है उस पर सवाल उठते रहे हैं और उन्हें सही नहीं कहा जा सकता। 

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का बिग बैंग सिद्धान्त ब्रह्माण्ड को दिक् और काल में सीमित मान लेता है। इससे स्वतः ही यह सवाल पैदा होता है कि इस ब्रह्माण्ड से परे और इससे पहले क्या है और क्या था? स्टीफन हाकिंग द्वारा स्पष्ट तौर पर ईश्वर को नकारने के बावजूद इससे ईश्वर के लिए जगह पैदा हो जाती है। इससे यह कह कर नहीं बचा जा सकता कि भौतिकी के वर्तमान नियम यह सीमा बांध देते हैं कि बिग बैंग के समय सिद्धान्त (टाइम होराइजन) से परे की चीज इस ब्रह्माण्ड को प्रभावित नहीं कर सकती।

दर्शन में प्राचीन काल से ही यह बहस रही है कि दिक् और काल (और इसमें निहित ब्रह्माण्ड) अनन्त है या सीमित। अठारहवीं सदी में कान्ट ने दोनों पक्षों को विस्तार से प्रस्तुत करने के बाद कहा था कि तर्क से इसका निपटारा नहीं किया जा सकता। पर क्वांटम ग्रेविटी का वर्तमान सिद्धान्त इसका इस रूप में निपटारा करता है कि दिक्-काल और इसीलिए ब्रह्माण्ड सीमित हैं। इसका एक आदि है और एक अंत है। इसी तरह सूक्ष्मतर स्तर पर सुपरस्ट्रिंग के रूप में पदार्थ की संरचना की भी एक सीमा है।

पर दार्शनिक स्तर पर इसे मानने का कारण नहीं है। यदि यह मान भी लिया जाये कि बिग बैंग जैसी कोई चीज हुयी थी तो भी यह हो सकता है कि यह और भी ज्यादा बड़े ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा भर हो। यदि दिक्-काल को अनंत माना जाये तो ब्रह्माण्ड में ऐसे अनंत बिग बैंग हो सकते हैं और बिग क्रंच भी। तब ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी संरचनाएं आकाशगंगाएं नहीं बल्कि ऐसे बिग बैंग से पैदा उप ब्रह्माण्ड होंगे। इसलिए ऊपर की भी संरचनाएं होंगी। इसी तरह सूक्ष्मतर स्तर पर सुपरस्ट्रिंग को अंतिम संरचना मान लेना उचित नहीं। नीचे भी ऐसे ही अनंत संरचनाएं होंगी। 

कहा जा सकता है कि ये सब तो दार्शनिक उड़ान है। विज्ञान के ठोस सिद्धान्त तो कुछ और ही कहते हैं। पर विज्ञान के उपरोक्त सिद्धान्त उतने ठोस नहीं हैं। वे जटिल गणितीय माॅडल भर हैं। उनके किसी भी निष्कर्ष का वैज्ञानिक प्रेक्षण नहीं हो सका है। ये गणितीय माॅडल देखने में सुन्दर हैं पर वे सही भी हों यह जरूरी नहीं। आइंस्टीन सारी जिन्दगी जिस समस्या का समाधान ढूढंते रहे वह हल हो गई है, यह नहीं कहा जा सकता। और कहा जा सकता है कि प्रकृति के बारे में उपरोक्त सोच सही समाधान तक पहुंचने के रास्ते में बाधा है। विज्ञान में शताब्दियों से समय-समय पर माना जाता रहा है कि प्रकृति के अंतिम रहस्य तक पहुंचा जा चुका है, कि उसके अंतिम नियमों की खोज हो चुकी है। पर बार-बार यह पाया गया है कि ऐसा नहीं है। प्रकृति की संरचना के और भी स्तर तथा उसके और भी गहरे व ऊंचे नियम हैं। आगे भी यही होगा। प्रकृति अनादि और अनंत है और इसीलिए उसके नियमों की खोज का भी कोई अंत नहीं। आगे और भी न्यूटन और आइंस्टीन और भी स्टीफन हाकिंग आते रहेंगे और विज्ञान बढ़ता रहेगा।

मानगढ़ आंदोलन

मानगढ़ आंदोलन
राजस्थान का जलियावाला बाग हत्याकाण्ड

१७ नवम्बर १९१३ को मानगढ़ में भील समुदाय के हज़ारों लोगों को अंग्रेज़ सरकार ने गोली बरसाकर हत्या कर दी थी। इसे ही मानगढ़ नरसंहार कहते हैं। [1] स्थानीय लोग इस घटना को जलियावाला बाग हत्याकांड के समरूप बताते हैं।[2] भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड की खूब चर्चा होती है; पर मानगढ़ नरसंहार को संभवतः इसलिए भुला दिया गया, क्योंकि इसमें बलिदान होने वाले लोग निर्धन वनवासी थे।

मानगढ़, राजस्थान में बांसवाड़ा जिले का एक पहाड़ी क्षेत्र है। यहां मध्यप्रदेश और गुजरात की सीमाएं भी लगती हैं। यह सारा क्षेत्र आदिवासी बहुल है। मुख्यतः यहां भील आदिवासी रहते हैं। स्थानीय सामन्त, रजवाड़े तथा अंग्रेज इनकी अशिक्षा, सरलता तथा गरीबी का लाभ उठाकर इनका शोषण करते थे। इनमें फैली कुरीतियों तथा अंध परम्पराओं को मिटाने के लिए गोविन्द गुरु के नेतृत्व में एक बड़ा सामाजिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन हुआ जिसे 'भगत आन्दोलन' कहते हैं।

गोविन्द गुरु का जन्म 20 दिसम्बर, 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेड़िया) गांव में हुआ ।

गोविंद गुरु ने भगत आंदोलन 1890 के दशक में शुरू किया था। आंदोलन में अग्नि को प्रतीक माना गया था। अनुयायियों को अग्नि के समक्ष खड़े होकर धूनी करना होता था। 1883 में उन्होने 'सम्प सभा' की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी, व्यभिचार आदि से दूर रहने; परिश्रम कर सादा जीवन जीने; प्रतिदिन स्नान, यज्ञ एवं कीर्तन करने; विद्यालय स्थापित कर बच्चों को पढ़ाने, अपने झगड़े पंचायत में सुलझाने, अन्याय न सहने, अंग्रेजों के पिट्ठू जागीरदारों को लगान न देने, बेगार न करने तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी का प्रयोग करने जैसे सूत्रों का गांव-गांव में प्रचार किया।[3]

कुछ ही समय में लाखों लोग उनके भक्त बन गये। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को सभा का वार्षिक मेला होता था, जिसमें लोग हवन करते हुए घी एवं नारियल की आहुति देते थे। लोग हाथ में घी के बर्तन तथा कन्धे पर अपने परम्परागत शस्त्र लेकर आते थे। मेले में सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं की चर्चा भी होती थी। इससे वागड़ का यह वनवासी क्षेत्र धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार तथा स्थानीय सामन्तों के विरोध की आग में सुलगने लगा।

17 नवम्बर, 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को मानगढ़ की पहाड़ी पर वार्षिक मेला होने वाला था। इससे पूर्व गोविन्द गुरु ने शासन को पत्र द्वारा अकाल से पीड़ित आदिवासियों से खेती पर लिया जा रहा कर घटाने, धार्मिक परम्पराओं का पालन करने देने तथा बेगार के नाम पर उन्हें परेशान न करने का आग्रह किया था; पर प्रशासन ने पहाड़ी को घेरकर मशीनगन और तोपें लगा दीं। इसके बाद उन्होंने गोविन्द गुरु को तुरन्त मानगढ़ पहाड़ी छोड़ने का आदेश दिया। उस समय तक वहां लाखों भगत आ चुके थे। पुलिस ने कर्नल शटन के नेतृत्व में गोलीवर्षा प्रारम्भ कर दी, जिससे हजारों लोग मारे गये। इनकी संख्या 1,500 से तक कही गयी है।

पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर पहले फांसी और फिर आजीवन कारावास की सजा दी। 1923 में जेल से मुक्त होकर वे भील सेवा सदन, झालोद के माध्यम से लोक सेवा के विभिन्न कार्य करते रहे। 30 अक्तूबर, 1931 को ग्राम कम्बोई (गुजरात) में उनका देहान्त हुआ। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को वहां बनी उनकी समाधि पर आकर लाखों लोग उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं।

Saturday, 7 January 2023

1873 की शानदार दलित (नमोशूद्र) हड़ताल

1873 की शानदार दलित (नमोशूद्र) हड़ताल 
हिंदू व मुस्लिम दोनों के उच्च जाति जमींदारों के जातिगत शोषण-अत्याचार के विरुद्ध आज के बंगलादेश के फरीदपुर जिले में 1873 में नमोशूद्र दलितों की शानदार हड़ताल हुई थी जिसमें बाद में अन्य दलित जन भी शामिल हो गए और यह जैसोर तथा बाडिसाल जिलों तक फ़ैल गई| नामशूद्र मल्लाह व कृषि मजदूर थे| उन्होंने एक सभा बुलाकर ब्राह्मण-कायस्थ व उच्च जाति मुस्लिम सभी जमींदारों के लिए किसी भी किस्म का श्रम करने से इंकार कर दिया था| यहाँ तक कि जेलों में नमोशूद्र कैदियों ने भी वे काम करने से मना कर दिया जो 'उच्च' जाति के कैदियों से नहीं कराये जाते थे| इस हड़ताल से जमींदारों की खेती ही बंद नहीं हुई बल्कि मुख्यतः नौवहन के जरिये ही चलने वाला व्यापार-यातायात भी ठप हो गया तथा हाट-बाजार, मंडियां बंद पड़ गईं तथा इस क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था की गति अवरुद्ध हो गई| 
6 महीने तक चलने वाली 8-10 लाख दलित जनता की यह शानदार तरीके से सुसंगठित, सशक्त हड़ताल जमींदारों-अंग्रेज शासन द्वारा जातिगत अत्याचार की रोक के अहम ऐलानों की कामयाबी के पश्चात ही समाप्त हुई|
19 वीं सदी के उत्तरार्ध और 20 वीं सदी के शुरुआती दशकों में बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, आदि विभिन्न स्थानों में इस तरह के जुझारू दलित आंदोलनों का एक सशक्त ज्वार पैदा हो रहा था जो सशक्त जनांदोलनों से अपने न्यायपूर्ण अधिकार हासिल करने का संघर्ष कर रहे थे| किंतु महाड के बाद से दलित आंदोलन मुख्यतः राज्य व्यवस्था को प्रतिवेदनों-निवेदनों द्वारा क्रमिक क़ानूनी सुधार प्राप्ति तक सीमित हो गया| आजादी के बाद तो इसकी मुख्यधारा इस या उस चुनावी पार्टी के अंग बनने तक ही रह गई जबकि बिहार व अन्य कुछ स्थानों पर जमींदार से पूंजीपति फार्मर बने सवर्ण भूपतियों के अत्याचार के खिलाफ दलित श्रमिकों की सशक्त जुझारू लड़ाइयां मुख्यधारा के दलित आंदोलन के समानांतर ही चलती रहीं|  
रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या, ऊना, सहारनपुर-चंद्रशेखर रावण से 2 अप्रैल के भारत बंद तक हम एक नया उभार देख रहे हैं| दलित आंदोलन सिर्फ क़ानूनी सुधारों के संघर्ष के दायरे से आगे बढ़कर जनसंघर्षों की ताकत से ब्राह्मणवादी जातिगत अन्याय के प्रतिरोध के लिए खड़ा हो रहा है यद्यपि वैचारिक तौर पर अभी पुरानी बातें ही कही जा रही हैं और दलित मध्यवर्ग का एक हिस्सा इससे सशंकित है| 
इस नई अंगड़ाई का खैरमक़दम, पूरा समर्थन होना चाहिए| ब्राह्मणवाद की पराजय का रास्ता इधर से ही बनेगा|

- Mukesh Aseem

Thursday, 5 January 2023

इस वर्ष की शुरुवात 12 बेहतरीन नज्मों के साथ



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ख़ौफ़नाक शर्मिन्दगी

कैसा अजीब ख़ौफ़नाक मौसम है कि
बेहद सादगी से  अगर कोई सीधा-सादा इंसान
कोई सीधी-सच्ची बात कह दे 
तो लोग उसे यूँ देखते हैं जैसे वह 
सीधे मंगल ग्रह से चला आया हो।
पेड़ों की नंगी टहनियों पर अगर कहीं
नये पत्ते दिख जायें
तो अचरज से या डर से
लोगों की आँखें फटी रह जाती हैं।
जिस शहर में साल भर के भीतर
एक भी औरत के गुप्तांग में
न पत्थर भरे गये हों न सरिया घुसेड़ा गया हो,
एक भी औरत के चेहरे पर
 तेजाब न फेंका गया हो, 
एक भी औरत को सामूहिक बलात्कार के बाद
बोटी-बोटी न काटा गया हो, 
एक भी प्रेमी जोड़े को पंखे या पेड़ या
बिजली के खंभे  से न टाँगा गया हो, 
एक भी दंगा, या मॉब लिंचिंग का 
एक भी मामला न हुआ हो, 
सौ-पचास घरों पर भी बुलडोजर न चले हों, 
एक भी भव्य मंदिर या एक भी विशाल स्टैच्यू
या एक भी अद्वितीय रिवरफ्रण्ट
निर्माणाधीन न हो, 
एक भी मुसलमान देशद्रोही होने
या पाकिस्तान से रिश्ते के पुख़्ता सबूतों के साथ
पकड़ा न गया हो, 
एक भी कवि या लेखक ख़ुद को 
वामपंथी कहते-कहते
फ़ासिस्टों की अकादमी या किसी सेठ के
प्रतिष्ठान से पुरस्कृत होने
या किसी रंगारंग साहित्यिक मेले में शामिल होने
अचानक राजधानी न चला गया हो, 
उस शहर के लोग लगभग देशद्रोही जैसा ही
समझते हैं अपने आप को।
वे इतनी शर्मिन्दगी और ज़िल्लत से
भरे रहते हैं कि दूसरे किसी शहर 
अपने किसी रिश्तेदार या दोस्त से 
मिलने तक नहीं जाते
और अगर अपने शहर से बाहर उन्हें 
जाना ही पड़े किसी वजह से
तो वे किसी अनजान को यह कतई नहीं बताते
कि वे किस शहर के रहवासी हैं! 
सिर्फ़ इतना ही नहीं, अपने शहर की 
सड़कों पर भी वे बहुत कम निकलते हैं
और अगर निकलते भी हैं
तो नज़रें झुकाये, एक-दूसरे से बचते हुए
बगल से निकल लेते हैं 
या किसी परिचित से नज़रें मिलने से पहले ही
बाजू वाली गली में मुड़ जाते हैं।
ऐसे शहर के बच्चे तक सोचते हैं इनदिनों
कि आख़िर वे गर्व करें तो किस बात पर करें
जियें तो कैसे जियें
और कैसे करके खौलायें अपना ख़ून
और ख़ुद को और सभी देशभक्तों को
यक़ीन दिलायें कि उनकी रगों में भी जो
बह रहा है वह पानी नहीं ख़ून है
एकदम शुद्ध और पवित्र धार्मिक लहू!

कात्यायनी

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बेटी  निकलती  है  तो  
कहते  हो  छोटे  कपडे  
पहन  कर  मत  जाओ.
पर   बेटे  से  नहीं  कहते  
हो  कि  नज़रों  मैं  गंदगी 
मत  लाओ.

बेटी  से  कहते  हो  कि 
कभी   घर  कि  इज्जत 
ख़राब  मत  करना.
बेटे  से  क्यों  नहीं  कहते 
कि  किसी  के   घर  कि 
इज्जत से  खिलवाड़  नहीं  करना.

हर  वक़्त  रखते  हो   नज़र  
बेटी  के  फ़ोन  पर.
पर ये  भी  तो   देखो  बेटा  
क्या  करता  है  इंटरनेट  पर. 

किसी  लड़के  से  बात करते  देखकर  
जो   भाई  हड़काता  है.
वो ही   भाई  अपनी  गर्लफ्रेंड के  किस्से  घर  मैं  हंस   हंस  कर  सुनाता  है . 
  
बेटा  घूमे   गर्लफ्रेंड के  साथ  तो  कहते  हो  अरे  बेटा  बड़ा  हो  गया  .         
बेटी  अपने  अगर  दोस्त से  भी  
बातें  करें  तो  कहते हो  बेशर्म  हो  गयी.

"पहले  शोषण   घर  से  बंद  करो  
तब  शिकायत  करना समाज  से".
        
हर   बेटे  से  कहो  कि 
हर   बेटी  कि  इज़ज़त  करे  
आज  से। 

बात  निकली  है  तो  दूर 
तक  जानी  चाहिए ।

सोशल मीडिया से प्राप्त 

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राजा का ऐलान था
हमें राष्ट्र को शक्तिशाली बनाना है.
इसलिए हर एक को, हर एक पर नज़र रखनी होगी
और सब पर राजा की नज़र होगी.
आज से सभी नागरिक संदेहास्पद माने जाएंगे.

राजा ने राष्ट्र को संबोधित किया-
'राष्ट्र को महान बनाने के लिए जागना बहुत ज़रूरी है,
इसलिए फिलहाल नींद पर पाबंदी लगाई जाती है.'

संदेह राष्ट्र को कमज़ोर बनाता है
इसलिए दर्शन और कविता पर पाबंदी लगा दी गयी

संदेह तो इतिहास से भी पैदा होता है
लेकिन राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए इतिहास ज़रूरी है.

राजा ने सर झटका!
कहीं यह संदेह उसे कमज़ोर न बना दे?

उसने आदेश दिया कि संदेह को इतिहास से बाहर निकाल दिया जाय.
और इस तरह एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण हो गया;

लेकिन,
नींद पर पाबंदी के कारण सपने सिकुड़़ने लगे.

दर्शन बिना मानव-गुरुत्वाकर्षण के यहां वहां भटकने लगा.
कविता मानवीय गर्माहट के लिए तरसने लगी.
संदेह बेचैन होने लगा..

शक्तिशाली राष्ट्र में इनका प्रवेश अब ज़रूरी बन गया.
इसके लिए  संकरे व गुप्त रास्ते की खोज की गयी .
लेकिन सवाल यह था कि 
सबसे पहले कौन प्रवेश करेगा इस शक्तिशाली राष्ट्र में?

काफी माथापच्ची के बाद तय हुआ-
पहले स्वप्न, फिर कविता, उसके बाद दर्शन और फिर संदेह.

अब इस शक्तिशाली राष्ट्र में राजा की इजाज़त के बिना
स्वप्न, कविता, दर्शन और संदेह अपना गुप्त डेरा डाल चुके थे.

स्वप्न ने लाल हो चुकी आंखों पर हमला बोला
कविता ने प्रवचनों को निशाना बनाया.
दर्शन ने धर्म सभाओं को उलट दिया.
और संदेह ने गली नुक्कड़ों पर जमकर उत्पात मचाया.

राजा बेचैन था
उसका शक्तिशाली राष्ट्र कमज़ोर हो रहा था
उसके वैज्ञानिक अभी तक उस बम का अविष्कार नहीं कर पाए थे
जिससे वह स्वप्न, कविता, दर्शन व संदेह को नेस्तनाबूद कर दे.

राजा के सैनिक जिस भी व्यक्ति को पकड़ते
स्वप्न, कविता, दर्शन और संदेह उछलकर दूसरे इंसान में प्रवेश कर जाते.

राजा घबराया और डरा हुआ था
अब उसका राष्ट्र ही नहीं, वह खुद इतना कमज़ोर हो चुका था
कि उसे अपने ही अस्तित्व पर संदेह होने लगा था
उसकी आँखों के सामने उसका  शक्तिशाली राष्ट्र धराशायी हो रहा था.

और घबराया राजा 
अब किसी संकरे और गुप्त रास्ते की तलाश में था....

Manish Azad 

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काट दो उन सबों के नाम !
उन सबों को
 भारत के नागरिकों की लिस्ट से 
नाम काट दो
 जो तुम्हारे खिलाफ हैं,
 मेरा नाम सबसे ऊपर में लिखो
 गिरफ्तार करो या छोड़ दो,
 कोई फर्क नहीं पड़ता
 क्योंकि पूरा देश ही जेलखाना है
तुमने सबुत माँगा है नागरिक होने का
बाहर से आये या यहीं का हूं
साबित करने के लिए
दस्तावेज मांगा है
एक ही उदर से  जन्मा मेरा भाई गोरा है
 और मैं काला हूँ
जरूर आई होगी हमारी जीनें 
हजारों वर्षों पहले अफ्रीका,  यूरोप
 या काकेशिया से
भेज दो जहाँ भेज सकते हो
 नष्ट कर दो वह सब कुछ जो आया हैं
 तुम्हारे देश की सीमा रेखा के बाहर से
अपना भी डीएनए जंचवा लो
किस नस्ल की पैदाइश हो
किस रिश्ते ने पैदा किया इतनी घृणा तुम में
मनुष्य के खिलाफ खड़े हो कर 
देश बनाने का स्वांग रचने से पहले
देश के संस्थानों को बेचने से पहले
भूमि पुत्रों की हत्या से पहले
 जांच लो हमारी मिट्टी की उर्वरा
और तिजोरी में बंद पूंजी में
 विदेशी निवेश के डीएनए को
फिर लगा देना मुहर अपने बिल पर 
और काट देना उन सबों के नाम 
जो साहस रखते हैं 
तुम्हें ललकारने का

Narendra Kumar 

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बोलो , सूरज बाबा बोलो ....
( सूरज से बातचीत )
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कवि-
कल सूरज को ढ़लते देखा
चेहरा  पीला  पड़ते  देखा ।

दिन-दिन भर की दौड़-भाग में
खूब  पसीना  चलते  देखा ।

माथे के सिलवट पर मानो
गहरी  सोच  टहलते  देखा ।

बोलो , सूरज  बाबा  बोलो
दुनिया  किस ऐंगल से देखा ?

सूरज -
दो तरह का सच था ,बचवा
सच  बोलूँ , सच जैसे  देखा ?

सुख  के  ऊँचे  टीले , नीचे
दुःख  का  ढ़ेर पिघलते देखा ।

रौशन दिखती थी जो दुनिया
अँधेरा वहीं  पसरते  देखा ।

शांतिवार्ताओं के संग ही
युद्ध का बादल घिरते देखा ।

ज़िंदा लोगों की आँखों में 
मुर्दा  शहरी  पलते  देखा ।

कवि -
ठहरो , ठहरो , चले न जाना
और सुनाओ कैसे देखा ...?

सूरज -
मालिक लोगों को कोठी में
छल-प्रपंच सब गढ़ते देखा ।

खुलेआम कर लूट -डकैती
निजी  तिजोरी  भरते देखा ।

जुल्म को फलते-फूलते देखा
लोग को भूखों मरते देखा ।

गद्दी  पर  ऊँचे  लोगों  को
लाश से होकर चढ़ते देखा ।

कवि -
ठहरो , अभी डूब मत जाना
आगे भी कुछ होगा देखा ...?

सूरज - 
हाँ , हाँ , अभी कहानी बाक़ी
कहता हूँ सब , जैसे देखा ।

मज़दूरों  को  भिड़ते  देखा
मज़लूमों  को  अड़ते  देखा ।

कई तरह के झंडे - नारे
भइया यहाँ फहरते देखा ।

लेकिन सबसे , सबके ऊपर
लाल पताका उड़ते देखा ।

दौलत के ज़ालिम महलों को
इतिहासों  में  ढ़हते  देखा ।

प्यारा सूरज फिर आएगा
बच्चों  को यह पढ़ते देखा ।

आदित्य कमल
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सच में कितने महान हैं ये लोग 

वे भूखे हैं,,, 
पर आदमी का मांस नहीं खाते।
वे प्यासे हैं,,,, 
मगर दूसरों का लहू नहीं पीते।

वे नंगे हैं,,,,, 
पर दूसरों के लिए कपड़े बुनते हैं।
उनके छत नहीं है,,,, 
मगर दूसरों के मकान बनाते हैं।

वे भूखे हैं
पर औरों के लिए अन्न उगाते हैं।
वे धनहीन है ,,,,,,
मगर दूसरों के धन में इजाफा करते हैं।

वे संपत्ति विहीन है ,,,,,,
पर वे दूसरों की संपत्तियों में बढ़ोतरी करते हैं।
वे वस्त्र विहीन हैं,,,,, 
मगर दूसरों के लिए कपड़े बनाते हैं।

वे अनपढ़ हैं,,,,,,,
मगर दूसरों के लिए किताबी छापते हैं।
वे अशिक्षित हैं,,,,
मगर दूसरों के लिए स्कूल बनाते हैं।

वे मंदिर नहीं जा सकते 
मगर दूसरों के लिए मंदिर बनाते हैं।
उनके पास घर नहीं हैं 
मगर वे दूसरों के लिए शानदार मकान बनाते हैं।

वे धन दौलत पैदा करते हैं
नगर वे धन धान्य से पूरी तरह वंचित है
वे अन्याय के शिकार हैं 
मगर दूसरों के लिए न्यायालय बनाते हैं।

ये सब कुछ करते हैं
फिर भी अभावग्रस्त ही रहते हैं,
इसीलिए मार्क्स ने कहा था
दुनिया भर के मेहनतकशों एक हो।

,,,,सच में ये लोग कितने महान हैं।

मुनेश त्यागी 

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विचारहीनता बहुत शोर करती है।

हृदयहीनता बहुत अधिक  करुणा का नाट्य रचती है।
अकर्मक बौद्धिकता बहुत अधिक विमर्श करती है।
पाखण्ड के चेहरे पर बहुत अधिक भड़कीला मेकअप होता है।
सारहीन जीवन में बहुत अधिक ड्रामा होता है।
विदूषक के हृदय में बहुत अधिक दु:ख और संताप होता है।
जिससे मिलकर आप को बहुत अधिक ख़ुशी मिलती है, कई बार वह अपने भीतर बहुत अधिक उदासी लिए रहता है।
जिसमें बहुत अधिक सहृदयता होती है, उसके अपने दु:ख बहुत अधिक अलक्षित होते हैं।
अँधेरे में हँसते हुए लोग बहुत अधिक भयावह लगते हैं।
फ़ासिस्ट समय में बस मनुष्यता, करुणा, शांति और प्रेम की बात करने वाली कविता बहुत अधिक कुरूप और अमानवीय होती है।
आलोचना के शस्त्र से मठाधीश बहुत अधिक डरते हैं।
अधकचरा ज्ञानी बहुत अधिक आत्मधर्माभिमानी होता है।
प्यार का बहुत अधिक प्रदर्शन करने वाले ख़ुद से बहुत अधिक प्यार करते हैं।

Katyayani Lko 

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मैं कितना हिंदू हूँ?

सवाल पूछा है किसी ने आप कितने हिंदू हो 
मैंने कहा मंदिर में रखी
मूर्ति जितनी हिंदू होती है, उतना हिंदू हूँँ 
मंदिर में चढ़ने वाला नारियल
जितना हिंदू होता है, उतना हिंदू हूँँ
भोग में चढ़ने वाली खीर, बर्फी, पेड़ा
बल्कि चने और गुड़ जितना भी हिंदू हूँ
और हाँँ गाय जितना हिंदू तो हूँँ ही 
पीपल और वटवृक्ष जितना हिंदू भी हूँ

और भी बताऊँ लक्ष्मी के वाहन, जितना हिंदू हूँँ
और चार खाने के कपड़े से बनी कमीज जितना भी
 
मैंं सवाल पूछने वाला ऐसा हिंदू हूँँ
जो मुसलमान भी है
मैं उतना हिंदू हूँ,जितना हर मुसलमान, हिंदू होता है

मैं चींटी जितना हिंदू तो हूँँ ही
मच्छर जितना हिंदू भी हूँ
मैं ऐसा हिंदू हूँँ जो 
किसी की जात -धर्म चुपके से
भी जानने की कोशिश नहीं करता
मैं इतना ज्यादा हिंदू हूँ 
कि भूल ही जाता हूँ कि क्या हूँ

भैंस पानी में जाकर जितनी हिंदू हो जाती है
उतना हिंदू हूँँ 
बाकी जो हूँ,सो तो हूँ ही।

सोशल मीडिया से प्राप्त 

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मज़दूरों का गीत/ मज़ाज़ लखनवी 

हम क्या हैं कभी दिखला देंगे 
हम नज़्म-ए-कुहन को ढा देंगे 
हम अर्ज़-ए-समा को हिला देंगे 
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम  

हम जिस्म में ताक़त रखते हैं 
सीनों में हरारत रखते हैं 
हम अज्म-ए-बगावत रखते हैं 
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

जिस रोज़ बगावत कर देंगे 
दुनिया में क़यामत कर देंगे 
ख्वाबों को हकीक़त कर देंगे 
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

हम क़ब्ज़ा करेंगे दफ्तर पर 
हम वार करेंगे क़ैसर पर 
हम टूट पड़ेंगे लश्कर पर 
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम 

(साभार कविता कोष)
 
क्रांतिकारी कवी असरार-उल-हक़ उर्फ़ मजाज़ लखनवी

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दोस्तो आज बिल्कुल अलग तरह की रचना आपकी अदालत में

घुप्प अँधेरा छा जाता या बत्ती जल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

गोरे-गोरे मुखड़े पर भी कालिख मल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

आफ़त आ जाती है या फिर आई टल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

बात  लगे फूलों  सी वो काँटों सी खल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

मन हो जाता साफ़ कहीं पर कुंठा पल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

लोहे  की भी  नाल  तुरत सोने में  ढल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

बेल  हरी  मुरझाती  या  सूखी ही फल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

तेल  में  कच्ची  रह जाती पानी में तल जाती
जाति पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

जाति सुधारक का भी सारा ज्ञान निगल जाती
वर्ग  पता चलते ही फ़ौरन दृष्टि बदल जाती

Kavi Mahendra Mihonvi

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वक्त और साजिश की आंधी में 
बुझ जांऊ,
मैं वह लौ नहीं, 
सीजती है रह -रह कर मुझको 
पूर्वजों का त्याग,
और अपनो का प्रेम  
कमजोर नहीं जिसकी नींव 
कि इन आंधियों से घबरा जाऊं 
लडूंगी, संघर्ष करूंगी साथी.. 
आखिरी दम और सांस तक।
एक और जीवन 
होगा समर्पित संघर्ष के नाम ...l

प्रवीण बसंती खेस्स

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स्त्रियों की प्रेम कविताओं के बारे में एक अप्रिय, कटु यथार्थवादी कविता

आम तौर पर स्त्रियाँ जब प्रेम कविताएँ लिखती हैं 
तो ज़्यादातर, वे भावुकता से लबरेज 
और बनावटी होती हैं क्योंकि 
उनमें वे सारी बातें नहीं होती हैं 
जो वे लिख देना चाहती हैं और 
लिखकर हल्का हो लेना चाहती हैं |
इसलिए प्रेम कविताएँ लिखने के बाद 
उनका मन और भारी, और उदास हो जाता है |
स्त्रियाँ जब अपने किसी सच्चे प्रेमी के लिए भी 
प्रेम कविताएँ लिखती हैं 
तो उसमें सारी बातें सच्ची-सच्ची नहीं लिखतीं 
चाहते हुए भी |
शायद वे जिससे प्रेम करती हैं 
उसे दुखी नहीं करना चाहतीं 
या शायद वे उसपर भी पूरा भरोसा नहीं करतीं,
या शायद वे अपनी ज़िंदगी की कुरूपताओं को 
किसी से बाँटकर 
और अधिक असुरक्षित नहीं होना चाहतीं, 
या फिर शायद, वे स्वयं कपट करके किसी अदृश्य 
अत्याचारी से बदला लेना चाहती हैं |
स्त्रियाँ कई बार इस डर से सच्ची प्रेम कविताएँ नहीं लिखतीं 
कि वे एक लंबा शोकगीत बनने लगती हैं, 
और उन्हें लगता है कि दिग-दिगन्त तक गूँजने लगेगा 
एक दीर्घ विलाप |
स्त्रियाँ चाहती हैं कि एक ऐसी 
सच्ची प्रेम कविता लिखें 
जिसमें न सिर्फ़ मन की सारी आवारगियों, फंतासियों,
उड़ानों का, अपनी सारी बेवफ़ाइयों और पश्चातापों का 
बेबाक़ बयान हो, बल्कि यह भी कि 
बचपन से लेकर जवान होने तक 
कब, कहाँ-कहाँ, अँधेरे में, भीड़ में , अकेले में, 
सन्नाटे में, शोर में, सफ़र में, घर में, रात में, दिन में,
किस-किस ने उन्हें दबाया, दबोचा, रगड़ा, कुचला, 
घसीटा, छीला, पीसा, कूटा और पछींटा
और कितनों ने कितनी-कितनी बार उन्हें ठगा, धोखा दिया,
उल्लू बनाया, चरका पढ़ाया, सबक सिखाया और 
ब्लैकमेल किया |
स्त्रियाँ प्रेम कविताएँ लिखकर शरीर से भी ज़्यादा
अपनी आत्मा के सारे दाग़-धब्बों को दिखलाना चाहती हैं 
लेकिन इसके विनाशकारी नतीज़ों को सोचकर 
सम्हल जाती हैं |
स्त्रियाँ अक्सर प्रेम कविताएँ भावनाओं के 
बेइख्तियार इजहार के तौर पर नहीं 
बल्कि जीने के एक सबब, या औज़ार के तौर पर लिखती हैं |
और जो गज़ब की प्रेम कविताएँ लिखने का 
दावा करती कलम-धुरंधर हैं 
वे दरअसल किसी और चीज़ को प्रेम समझती हैं 
और ताउम्र इसी मुगालते में जीती चली जाती हैं |
कभी अपवादस्वरूप, कुछ समृद्ध-कुलीन स्त्रियाँ 
शक्तिशाली हो जाती हैं, 
वे प्रेम करने के लिए एक या एकाधिक 
पुरुष पाल लेती हैं या फिर खुद ही ढेरों पुरुष
उन्हें प्रेम करने को लालायित हो जाते हैं |
वे स्त्रियाँ भी उम्र का एक खासा हिस्सा 
वहम में तमाम करने के बाद 
प्रेम की वंचना में बची सारी उम्र तड़पती रहती हैं 
और उसकी भरपाई प्रसिद्धि, सत्ता और 
सम्भोग से करती रहती हैं |
स्त्रियाँ सच्ची प्रेम कविताएँ लिखने के लिए 
यथार्थवादी होना चाहती हैं, 
लेकिन जीने की शर्तें उन्हें या तो छायावादी बना देती हैं 
या फिर उत्तर-आधुनिक |
जो न मिले उसे उत्तर-सत्य कहकर 
थोड़ी राहत तो मिलती ही है !
सोचती हूँ, एस.एम.एस. और व्हाट्सअप ने 
जैसे अंत कर दिया प्रेम-पत्रों का, 
अब आवे कोई ऐसी नयी लहर 
कि नक़ली प्रेम कविताओं का पाखण्ड भी मिटे 
और दुनिया की वे कुरूपताएँ थोड़ी और 
नंगी हो जाएँ जिन्हें मिटा दिया जाना है 
प्रेम कविताओं में सच्चाई और प्रेम को 
प्रवेश दिलाने के लिए |

सोशल मीडिया से प्राप्त 

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सावित्रीबाई के साथ फातिमा को भी याद करो* ------------

*साझा संघर्ष : साझी विरासत* 
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*सावित्रीबाई के साथ फातिमा को भी याद करो* 
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*सावित्रीबाई फुले : पहली महिला शिक्षिका* 
*फातिमा शेख : पहली मुस्लिम  शिक्षिका !!*

आज से लगभग 150 सालों तक भी शिक्षा बहुसंख्य लोगों तक नहीं पहुँच पाई थी। जब विश्व आधुनिक शिक्षा में काफी आगे निकल चूका था लेकिन भारत में बहुसंख्य लोग शिक्षा से वंचित थे। लडकियों की शिक्षा का तो पूछो मत क्या हाल था। क्रांतीसुर्य ज्योतिराव फुले पूना में 1827 में पैदा हुए. उन्होंने बहुजनो की दुर्गति को बहुत ही निकट से देखा था। उन्हें पता था की बहुजनों के इस पतन का कारण शिक्षा की कमी ही है, इसीलिए वो चाहते थे कि बहुसंख्य लोगों के घरों तक शिक्षा का प्रचार प्रसार होना ही चाहिए विशेषतः वो लड़कियों के शिक्षा के जबरदस्त पक्षधर थे। और इसका आरंभ उन्होंने अपने घर से ही किया। उन्होंने सब से पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया। ज्योतिराव अपनी पत्नी को शिक्षित बनाकर अपने कार्य को और भी आगे ले जाने की तय्यारियों में जुट गए। 

ये बात उस समय के सनातनियों को बिलकुल भी पसंद नहीं आई। उनका चारों ओर से विरोध होने लगा। ज्योतिराव फिर भी अपने कार्य को मजबूती से करते रहे। ज्योतिराव नहीं माने तो उनके पिता गोविंदराव पर दबाव बनाया गया। अंततः पिता को भी प्रस्थापित व्यवस्था के सामने विवश होना पड़ा। मज़बूरी में जोतीराव फुले को अपना घर छोड़ना पडा। उनके एक दोस्त उस्मान शेख पूना के गंज पेठ में रहते थे। उन्होंने ज्योतिराव फुले को रहने के लिए अपना घर दिया। यहीं जोतीराव फुले ने अपना पहला स्कूल शुरू किया। उस्मान शेख भी लड़कियों की शिक्षा के महत्व को समझते थे। उनकी एक बहन फातिमा थीं जिसे वो बहुत चाहते थे। उस्मान शेख ने अपनी बहन के दिल में शिक्षा के प्रति रूचि निर्माण की। सावित्रीबाई के साथ वो भी लिखना पढना सिखने लगीं. बाद में उन्होंने शैक्षिक सनद प्राप्त की। 

क्रांतीसुर्य जोतीराव फुले ने लड़कियों के लिए कई स्कूल कायम किये। सावित्रीबाई और फातिमा ने वहां पढ़ाना शुरू किया। वो जब भी रास्ते से गुज़रतीं तो लोग उनकी हंसी उड़ाते और उन्हें पत्थर मारते। दोनों इस ज्यादती को सहन करती रहीं लेकिन उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया फातिमा शेख के ज़माने में लडकियों की शिक्षा में असंख्य रुकावटें थीं. ऐसे ज़माने में उन्होंने स्वयं शिक्षा प्राप्त की. दूसरों को लिखना पढना सिखाया। वो शिक्षा देने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं जिनके पास शिक्षा की सनद थी. फातिमा शेख ने लड़कियों की शिक्षा के लिए जो सेवाएँ दीं, उसे भुलाया नहीं जा सकता। घर घर जाना, लोगों को शिक्षा की आवश्यकता समझाना, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए उनके अभिभावकों की खुशामद करना, फातिमा शेख की आदत बन गयी थी। आखिर उनकी मेहनत रंग आने लगी। लोगों के विचारों में परिवर्तन आया। वो लड़कियों को स्कूल भेजने लगे। लडकियों में भी शिक्षा के प्रति रूचि निर्माण होने लगी। स्कूल में उनकी संख्या बढती गयी। मुस्लिम लड़कियां भी ख़ुशी ख़ुशी स्कूल जाने लगीं। 

विपरीत परिस्थितियों में प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में जाकर शिक्षा के महान कार्य में जोतीराव एवं सावित्रीबाई फुले को मौलिक साथ सहयोग देने वाली पहली मुस्लिम शिक्षिका फातिमा शेख को दिल से सलाम !!

इन दोनों का साझा संघर्ष ही हमारी विरासत है जिसे इन दिनों खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है जो चिंता का विषय है।