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Tuesday, 24 January 2023

निजीकरण, राष्टीयकरण और समाजवाद

जब उत्पादन और परिवहन के साधन वास्तव में इतना विकसित हो जाते हैं कि ज्वाइंट स्टाक कंपनियों द्वारा प्रबंध उनके लिए अपर्याप्त हो जाता है, और इसलिए जन राज्य का उन्हें अपने हाथ में लेना आर्थिक दृष्टि से अनिवार्य हो जाता है, तभी हम यह कह सकते हैं कि चाहे आज का ही राज्य उन्हें अपने हाथ में ले, यह आर्थिक प्रगति है, एक आगे बढ़ा हुआ कदम है, उत्पादन की तमाम शक्तियों पर समाज के अधिकार की भूमिका है। मगर हाल में जब से बिस्मार्क ने उद्योग-संस्थानों पर राज्य के स्वामित्व की नीति अपनायी है, तब से एक तरह के नक़ली समाजवाद का उदय हुआ है, जो कभी कभी पतित होकर बहुत कुछ चाटुकारिता का रूप ले लेता है और जो झटपट यह फ़तवा दे डालता है कि राज्य द्वारा समस्त स्वामित्व, चाहे वह बिस्मार्क की ही क़िस्म का क्यों न हो, समाजवादी है। अगर राज्य का तम्बाकू के उद्योग का अपने हाथ में लेना समाजवादी है, तो समाजवाद के संस्थापकों में नेपोलियन और मेटरनिख की भी गिनती होनी चाहिए। अगर बेलजियम की सरकार ने अत्यंत साधारण राजनीतिक और आर्थिक कारणों से अपनी मुख्य रेल लाइनों का स्वयं निर्माण किया है, अगर बिस्मार्क ने बिना किसी आर्थिक विवशता के प्रशिया की मुख्य रेल लाइनों को राज्य के नियंत्रण में कर लिया है - सिर्फ़ इसलिए कि युद्ध अवस्था में वह ज्यादा सहूलियत के साथ उन्हें अपने अधिकार में रख सके, मूक पशुओं की तरह रेल कर्मचारियों से सरकार के लिए वोट दिलवा सके, और ख़ासकर अपने लिए आमदनी का एक ऐसा ज़रिया निकाल सके, जो पालमिंट के वोटों पर निर्भर न हो तो यह किसी भी अर्थ में, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जानबूझकर या अनजान में समाजवादी कार्य नहीं है। अगर ऐसा न हो तो हमें शाही तिजारती जहाजी कम्पनी को, चीनी मिट्टी के शाही उद्योग को, और यहां तक कि रेजीमेंट के सिलाई विभाग को भी समाजवादी संस्था मानना होगा। यही नहीं, फ्रेडरिक विल्हेल्म तृतीय के राज्य-काल में एक कांइयां आदमी ने गंभीरतापूर्वक यह प्रस्ताव किया था कि राज्य को वेश्यालयों पर अधिकार कर लेना चाहिए। ( *एंगेल्स का नोट ।*, समाजवाद : काल्पनिक और वैज्ञानिक पुस्तक से )

Sunday, 22 January 2023

रामचरितमानस ७/९९)

_हरइ शिष्य धन सोक न हरई।_

_सो गुरु घोर नरक महुँ परई॥_      

*_(रामचरितमानस ७/९९)_*

 ```जो गुरु अपने अपने शिष्य से धन की मांग करता है, वह घोर नरक में जा गिरता है। गोस्वामी तुलसीदास का यह वचन अध्यात्म और धर्म की शिक्षा देने वाले गुरुओं/बाबाओं के सन्दर्भ में है। यह चौपाई  उन महापतित गुरुओं/बाबाओं के प्रति गोस्वामी जी के क्रोध और घृणा को प्रकट करता है जो धर्म और अध्यात्म का व्यापार करते हैं। जब गोस्वामी जी  घोर नरक शब्द का प्रयोग करते हैं , लगता है कि उनकी इच्छा यह है कि ऐसे ढोंगी पंडितों, बाबाओं, धर्मगुरुओं को खौलते हुए तेल की कड़ाही में डाल दिया जाए। यह निर्भीकता और स्पष्टता गोस्वामी जी की विशेषता है जो उन्हें उस काल के धूर्त और ठग पंडितों से अलग करती है। साथ - साथ तुलसीदास यह भी कहते हैं कि ऐसे भ्रष्ट पंडित जो शिष्य के धन का हरण करते हैं, धन देने वाले यजमान के शोक का हरण करने में असमर्थ होते हैं। निष्कर्ष यह कि धूर्तों, मक्कारों, नक्कालों और अंधविश्वासी महात्माओं से बचें! ज्ञान, विवेक ,  नियमित अध्ययन और तर्क को वरीयता दें।```
              *_अध्यात्म के पवित्र सूत्र_*

रामकथा: उत्पत्ति और विकास-फादर कामिल बुल्के

'रामकथा: उत्पत्ति और विकास'

यह जानकर आश्चर्य होता है कि किसी ईसाई मिशनरी की सर्वश्रेष्ठ कृति हिंदू देवता राम से संबंधित हो सकती है. लेकिन यह सच है कि ज्यादातर आलोचकों की नजर में फादर कामिल बुल्के रचित 'रामकथा : उत्पत्ति और विकास' उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है. यूं तो उन्होंने इस विषय पर ही अपनी पीएचडी थीसिस जमा की थी. लेकिन इस विषय पर वे बाद में 18 साल तक काम करते रहे. इस ग्रंथ के बारे में उनके गुरु और हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान डॉ धीरेंद्र वर्मा ने लिखा, 'इसे रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्वकोश कहा जा सकता है. वास्तव में यह शोध पत्र अपने ढंग की पहली रचना है. हिंदी क्या किसी भी यूरोपीय या भारतीय भाषा में इस प्रकार का कोई दूसरा अध्ययन उपलब्ध नहीं है.'

राम के बारे में फादर कामिल बुल्के लिखते हैं कि वे वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं बल्कि एक इतिहास पुरुष थे. उनका मानना है कि उनके बारे में कालक्रम में थोड़ी बहुत चूक हो सकती है, लेकिन वे कोई मिथकीय पात्र नहीं हैं. उन्होंने कई उदाहरणों से साबित किया कि रामकथा अंतरराष्ट्रीय कथा है जो वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक फैली है. उन्होंने यह भी लिखा कि रामायण केवल धार्मिक साहित्य नहीं बल्कि जीवन जीने का दस्तावेज भी है.

फादर कामिल बुल्के की नजर में हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास थे. तुलसीदास की रचनाओं को समझने के लिए उन्होंने अवधी और ब्रज तक सीखी. उन्होंने रामकथा और तुलसीदास और मानस-कौमुदी जैसी रचनाएं तुलसीदास के योगदान पर ही लिखी थीं.
उन्होंने 1950 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी के लिए शोध प्रबंध अंग्रेजी के बजाय हिंदी में ही लिखा. उनसे पहले देश के सभी विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में शोध प्रबंध लिखने का नियम नहीं था. हालांकि वे खुद अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, लै​टिन और ग्रीक भाषाओं में सहज थे. लेकिन उन्होंने अपने गाइड और हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान माता प्रसाद गुप्त से साफ कह दिया कि वे शोध-प्रबंध लिखेंगे तो हिंदी में ही.

हिंदी भाषा के प्रति किसी विदेशी छात्र के इस लगाव ने तमाम लोगों को अचंभित कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि विश्वविद्यालय को अपने नियम बदलने पड़े. इसके बाद ही देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में शोधकर्ताओं को अपनी भाषा में थीसिस जमा करने की अनुमति मिलने लगी.

अलेक्सेई पैत्रोविच और तुलसीदास

जब सोवियत संघ विश्व की एक बड़ी महाशक्ति हुआ करता था | साम्यवाद और अनीश्वरवाद का वर्चस्व था | जोसेफ़ स्टालिन सत्तासीन थे | उस दौर में भी गोस्वामी तुलसीदास के रामकथा का गहरा प्रभाव अलेक्सेई पैत्रोविच वरान्निकोव पर पड़ा | वे प्रोफ़ेसर थे | हिंदी के माहिर थे | रूसी और हिंदी दोनों भाषाओँ पर उनका समान अधिकार था | वे तुलसीदास जी के *_राम चरित मानस_* से इतना प्रभावित हुए कि उसका रुसी भाषा में अनुवाद करना शुरू कर दिया ! अलेक्सेई पैत्रोविच वरान्निकोव ने लगभग साढ़े दस वर्षों में *_राम चरित मानस_* का रूसी में पद्यानुवाद किया | इस पुस्तक की भूमिका में उन्होंने तुलसीदास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को बख़ूबी उजागर किया | साथ ही भारत के मध्यकाल के सामाजिक परिवेश का भी चित्रण किया |
अलेक्सेई पैत्रोविच वरान्निकोव ने अपनी वसीयत में लिखा कि *_मेरी मृत्यु के बाद मेरी क़ब्र पर मेरा प्रिय दोहा रूसी भाषा के साथ देवनागरी हिंदी में भी अंकित किया जाए |_*  उनकी समाधि आज भी उनके गांव कापोरोव, जो कि सेंट पीटर्सबर्ग के उत्तर मेंलेनिनग्राद के निकट स्थित है। उनकी समाधि पर 'रामचरितमानस' का निम्न दोहा रूसी और हिंदी लिपियों में अंकित हैं-
'भलो भलाई पै लहहिं, लहै निचाई नीच।
सुधा सराही अमरता, गरल सराही मीच॥'
*_अलेक्सेई पैत्रोविच वरान्निकोव को इस अमर रचना के लिए सोवियत संघ के सर्वोच्च सम्मान " आर्डर आफ लेनिन " से सम्मानित किया गया।_*  जी हाँ , एक नास्तिक देश में यह भी संभव हुआ, जिसे गोस्वामी तुलसीदास का प्रताप और असर ही माना जाएगा |

– Dr RP Srivastava, Editor-in-Chief,"Bharatiya Sanvad"

Saturday, 21 January 2023

शोषक वर्गों के गोबर गणेश



*शोषक वर्गों के गोबर गणेश*

पूँजीवादी व्यवस्था "थोड़े से लोगों द्वारा, थोड़े से लोगों के लिए, थोड़ा सा उत्पादन" ही कर सकती है। अगर यह पूँजीवादी व्यवस्था विदेशी साम्राज्यवादियों की बन्दूक और उनकी आवारा वित्तीय पूंजी के सहारे सामंतवाद की बुनियाद पर टिकी हो तो इसकी उत्पादन क्षमता थोड़ी से भी थोड़ी हो जाती है। यानी बहुत कम हो जाती है।

 जब बहुत थोड़ा सा ही उत्पादन होगा तो सबको खुशहाली कैसे मिल सकती है? ऐसी व्यवस्था में बहुसंख्यक जनता गरीबी तंगहाली झेलने के लिए बाध्य रहेगी ही। 

 इस समस्या का समाधान यह है कि जनता बलपूर्वक इस व्यवस्था का तख्तापलट करके समाजवादी व्यवस्था कायम करे।

 मगर जनता मौजूदा व्यवस्था को पलट न दे, इसके लिए जनता को गुमराह करने के लिए, शोषक वर्ग ने भिन्न-भिन्न प्रकार के गोबर गणेश पैदा किया है।

 इन गोबरगणेशों में जो दलित वादी हैं वे बताते हैं कि  सारी समस्याओं के लिए मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था नहीं, सवर्ण लोग दोषी हैं। 

हिन्दू वादी गोबरगणेशों का कहना है- मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था नहीं बल्कि मुसलमान दोषी हैं।

मुस्लिमवादी गोबर गणेशों का कहना है कि मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था नहीं बल्कि हिन्दू दोषी हैं।

सवर्ण वादी गोबरगणेशों का कहना है कि मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था नहीं बल्कि दलितों पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने से ही दुनिया की सारी समस्यायें पैदा हुई हैं।

इनमें दलितवादी /जातिवादी चिन्तक खुद को सबसे बड़ा समाजसेवक कहते हैं, मगर मेहनतकश जनता में फूट डालकर शोषक वर्गों के ही  सेवक बने रहते हैं।

जितने भी दलितवादी चिन्तक हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर सभी जातिवादी हैं, और दार्शनिक तौर पर दरिद्र हैं। उनको शोषक वर्ग ने गोबर गणेश बनाकर जातिवाद को बढ़ावा देने का काम सौंप दिया है।

 इन अघाए हुए गोबर गणेशों का काम है मजदूरों किसानों में जातीय भावना को भड़काना। मजदूरों किसानों में फूट डालकर शोषक वर्ग को मजबूत करना। ब्राह्मणवादियों की तरह जाति के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन करना। फूट डालना बदले में आरक्षण की मलाई चाटना।

यह वही वर्ग है जिसकी संख्या पूरे दलितों में से 2% है। यही वर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण की मलाई चाट रहा है। 

 यह खुद तो इसी व्यवस्था में अघाया हुआ है और आगे अपनी संतानों को भी वही  मलाई चटाने के लिए इस व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है। 

 शेष 98% दलितों को अधिकार मिले या न मिले इसकी चिन्ता नहीं, इन अघाए हुए लोगों को अपने सम्मान की बड़ी चिन्ता है। 

 इसी लिए ये लोग तुलसीदास की तरह कहते हैं कि 'सामाजिक अपमान गरीबी से अधिक खटकता है।' 
जैसे तुलसी ने भी लिखा था-
 जदपि जगत दारुन दुख नाना।
सबसे अधिक जाति अपमाना।।
मगर बाद में तुलसी ने "नहिं दरिद्र हम दुख जग माहीं" कहकर खुद को सुधारा।

 मगर जातिवाद के नशे में धुत हो चुके दलितवादियों एवं पिछड़ावादियों को होश नहीं आ रहा। शोषक वर्ग ने 5किलो राशन देकर इनके आधार को ही झकझोर दिया फिर भी इनकी आँख नहीं खुल रही है, इन्हें 98% दलितों के भूख की चिन्ता अब भी नहीं। 

सवर्ण मानसिकता वाले धूर्त विद्वानों की तरह ये लोग भी मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था को बदलना नहीं चाहते। इसीलिए तो वे आरक्षण की मलाई चाटकर मौजूदा व्यवस्था के सामने दुम हिलाने का काम कर रहे हैं।

सवर्णवादियों, हिन्दूवादियों, मुस्लिमवादियों, क्षेत्रवादियों.. की भी दशा कमोवेश ऐसी ही है। इनके पीछे जो भी चलता है उसे ही ये लोग बेच देते हैं। सभी जातिवादी नेताओं ने तो मायावती जी की नकल करते हुए खुलेआम इसे ही अपना धंधा बना लिया है।

   अगर उनमें से कुछ लोग वास्तव में जनता के दुखों से चिन्तित हैं तथा जनता की मौजूदा समस्याओं मँहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, तंगहाली, आदि का समाधान चाहते हैं, तो उन्हें मेहनतकश वर्ग के पक्ष में मानवीय संवेदना विकसित करना होगा।

  इसके लिए उन्हें खुद को डीक्लास (वर्गच्युत) करना होगा। इसके लिए उन्हें अपनी अट्टालिकाओं से बाहर आना होगा। उच्च मध्यवर्गीय मानसिकता को त्यागना होगा। 

 जातीय या धार्मिक घृणा की जगह वर्गीय घृणा पैदा करना होगा। अगर वे शोषक वर्गों से घृणा नहीं करेंगे तो सच्चे अर्थों में उन्हें शोषित-पीड़ित से प्रेम नहीं हो पायेगा। 

शोषित-पीड़ित वर्गों से प्रेम करके ही वे जनपक्षधर बन पाएँगे। वरना वे लोग जाने-अनजाने शोषक वर्गों के गोबर गणेश बनकर उनकी सेवा करते ही रहेंगे।

  मोदी, माया, ओवैशी, भागवत, बाभन मेश्राम और इन जैसे सारे धार्मिक/जातिवादी मठाधीश, मूलनिवासी/दलित चिन्तक, सवर्ण चिन्तक, पिछड़ा वादी, हिजड़ावादी, नारीवादी, मर्दवादी, चिन्तक/विचारक/नेता लोग  बड़े पूंजीपतियों/विदेशी साम्राज्यवादियों के गोबर गणेश हैं।

  हमारे देश की भोली-भाली जनता जब तक इन गोबर गणेशों को पूजती  रहेगी तब तक मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी, जमाखोरी... आदि की गुलामी से मुक्ति नहीं मिलेगी।
                                         
*रजनीश भारती*
*जनवादी किसान सभा*

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महान क्रान्तिकारी संत रैदास



*महान क्रान्तिकारी संत रैदास*

चेतना हमेशा पदार्थ से निकलती है। पदार्थ से अलग चेतना का कोई वजूद नहीं हो सकता। रैदास के जो क्रान्तिकारी विचार हैं वे विचार उस वक्त की भौतिक परिस्थितियों में ही पैदा हो सकते थे। हम उस वक्त की भौतिक परिस्थितियों से जोड़कर ही रैदास के क्रान्तिकारी विचारों को सही अर्थों में जान सकते हैं।

क्रान्तिकारी संत रैदास का जन्म पंद्रहवीं सदी में हुआ। इनका जन्म स्थान आज के उ.प्र. के वाराणसी जिले में हुआ था। इन्हें रविदास के नाम से भी जाना जाता है। पश्रन्तु इनका नाम "रविदास"  नहीं था, 'रविदास' नाम तो पाखण्डियों द्वारा अभी हाल ही में दिया गया है। 

महान क्रान्तिकारी संत रैदास कबीर के समकालीन थे। ये वो दौर था जब हमारा समाज दस्तकारी युग से मैन्यूफैक्चरी के युग की ओर बढ़ रहा था। आप जानते होंगे कि दस्तकारी में एक कारीगर एक माल के सभी हिस्से को अकेले तैयार करता है, जब कि मैन्यूफैक्चरी में एक माल के अलग-अलग भाग को अलग-अलग कारीगर बनाते हैं। उदाहरण के लिये एक जूते को अकेले एक कारीगर पूरी तरह बनाता है तो इसे दस्तकारी कहते हैं, और जब जूता बनाने के लिये एक छत के नीचे कई कारीगर होते हैं और प्रत्येक कारीगर जूते के अलग-अलग हिस्से को बनाता है, तब जाकर सभी हिस्सों को जोड़कर एक जूता पूरी तरह तैयार होता है। इस तरह किसी एक जूते के अलग-अलग हिस्से को अलग-अलग कारीगर बनाते हैं,इसी को मैन्यूफैक्चरी कहते हैं। इस तरह दस्तकारी के उत्पाद को बनाने वाला कोई कारीगर यह दावा कर सकता है कि इसे मैंने बनाया है मगर मैन्यूफैक्चरी के उत्पाद को कोई एक कारीगर नहीं कह सकता कि यह मेरा उत्पाद है। इसमें सामूहिक उत्पादन होता है। यह मैन्यूफैक्चरी आगे चलकर बड़े उद्योगों का आधार तैयार करती है।
  
मैन्यूफैक्चरी में सामूहिक उत्पादन होता था, इसी लिये दस्तकारी के मुकाबले मैन्यूफैक्चरी का उत्पादन अधिक होता है। कई कारीगरों के हाथों से गुजरने के बाद ही माल तैयार हो पाता है तो उत्पादित माल की गुणवत्ता भी दस्तकारी की अपेक्षा बढ़िया होती है। 

रैदास कोई साधारण मोची नहीं थे, वे एक शाही मोची थे। मैन्यूफैक्चरी के रूप में इनकी छोटी सी कार्यशाला थी, जिसमें इनके कई शागिर्द काम करते थे। इनकी मैन्यूफैक्चरी के बने जूते बहुत बड़े-बड़े राजे रजवाड़े पहनते थे। राजे रजवाड़े इन्हें जूते की कीमत तो देते ही थे, साथ-साथ बक्शीश भी देते थे। जिससे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी। जब पेट भरने लगता है तो नये-नये विचार भी पैदा होते हैं, सम्मान की भूख भी जाग उठती है। 
 
जब शूद्रों के पास कोई सम्पत्ति नहीं हुआ करती थी तो उन्हें मन्दिर में प्रवेश करने की बात छोड़िये। उनको मंत्र उच्चारण तक की मनाही थी। परन्तु जब शूद्रों के पास भी थोड़ी सम्पत्ति आने लगी तो कुछ प्रगतिशील पण्डों ने समझा कि उन शूद्रों से भी दान, चन्दा, चढ़ावा वसूला जा सकता है, अत: उन्हें भी गुरुमंत्र देने और मन्दिर में प्रवेश देने की वकालत शुरू कर दिया।
  
इसी समय भारत में इस्लाम धर्म का प्रचार तेजी से बढ़ रहा था, हिन्दू धर्म के मठाधीशों को लगा कि अब कहीं सारे शूद्र मुसलमान बन जायेंगे तो हमें कौन पूछेगा। इस दबाव के कारण जहां तुलसी दास ने राम द्वारा शबरी नामक भीलनी का जूठा बेर खाने वाली कहानी गढ़ कर सवर्णों को शूद्रों के प्रति छुआछूत खत्म करने की प्रेरणा देना पड़ा। वहीं गुरु रामानन्द ने रैदास और कबीर जैसे लोगों को गुरुमंत्र देना शुरू किया। 

ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध रैदास हर मनुष्य में ईश्वर का वास मानकर सबका बराबर सम्मान चाहते थे। मगर लोग सोचते थे कि ईश्वर तो सिर्फ मन्दिर मस्जिद में होता है। इसी वजह से बड़े-बड़े धर्म के ठेकेदार दान, चन्दा, चढ़ावा, खैरात, जकात के नाम पर गरीबों को निचोड़ रहे थे। तब रैदास ने लोगों को बताया-

मस्जिद से कुछ घिन्न नहिं, मन्दिर से नहिं प्यार।
दोउ में अल्ला राम नहिं कह रैदास चमार।।

रैदास जैसे लोगों की छोटी सी कार्यशाला ज्यों-ज्यों बड़ा रूप लेने लगती है, त्यों-त्यों रैदास जैसे लोगों का सम्मान भी बढ़ता गया। यह बात उन पाखण्डियों को खटकती है जो 'पूजिय विप्र शील गुण हीना। शूद्र न गुन-गन ज्ञान प्रवीणा।।' वाली धारणा पाले हुए थे। तब रैदास ने चुनौती भरे लहजे में कहा-

एक बूंद से सब जग उपज्या, को बाभन को शूदा।

उस वक्त वर्ण-व्यवस्था और जाति व्यवस्था में शूद्रों को कूड़े-कचरे के समान समझा जाता था। शूद्र लोग गुलामी भरी जिन्दगी जी रहे थे। रैदास ने उन्हें आजाद होने के लिये प्रेरित किया-

पराधीनता पाप है जानि लेउ रे मीत।
पराधीन बेदीन से, कौन करे है प्रीत।।

इस तरह रैदास ने गुलाम बनने को पाप बताया और उससे मुक्ति के लिये लोगों को उकसाया। साथ ही साथ आजादी क्या चीज़ होती है उस का नक्शा भी प्रस्तुत किया-
 
ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिलै सभन को अन्न।
ऊंच-नीच सब मिटि रहे, रैदास रहे प्रसन्न।।

रैदास सिर्फ हथकड़ी बेड़ी खोल देने को आजादी नहीं कहते बल्कि सबकी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति को आजादी कहते हैं। वे एक ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें बराबरी हो, सबकी मानवीय आवश्यकताएं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा, सम्मान, आदि सुलभ हो सकें। अभावों से भरी जिन्दगी को रैदास आजादी नहीं मानते।

उस दौर में इस्लामिक इफेक्ट के कारण ही निराकार ईश्वर की भक्ति का प्रभाव बढ़ रहा था। अपने-अपने धर्म की दुकान चलाने के लिये कुछ पण्डे-पुरोहित मुस्लिम धर्म के खिलाफ नफरत पैदा कर रहे थे तो वहीं कुछ कठमुल्ले हिन्दू धर्म के खिलाफ आग उगल रहे थे। मुगलों के रूप में जो नया शासक वर्ग आ चुका था, उसे मालूम था कि हिन्दुओं में यदि मुसलमानों के प्रति नफ़रत बढ़ेगी तो मुस्लिम शासकों के प्रति भी नफरत बढ़ेगी, तब भारत भूमि पर लम्बे समय तक शासन करना मुश्किल होगा। ऐसी परिस्थिति के कारण इन शासकों ने भी कबीर और रैदास जैसे संतों को सहयोग दिया। वरना उस वक्त कबीर यह नहीं कह पाते कि- 

ब्राह्मण से गदहा भला, गढ़े देव से कुत्ता।
मुल्ला से मुर्गा भला, नगर जगावे सुत्ता।।

प्राय: मौसम और समय के मामले में ब्राह्मण की भविष्यवाणी गलत पायी गयी हैं, मगर गधा बहुत ठीक समय पर प्रतिदिन बोलता है। अगर वह अचानक घाट से भागकर घर आ जाये तो समझिये, आंधी या पानी कुछ तो आने ही वाला है। उस गधे की भविष्यवाणी गलत नहीं होती। इसीलिये गधे को भला कहा। दोहे का बाकी अंश तो सभी जानते ही हैं।

अगर शाही मोची न होते तो रैदास यह नहीं कह पाते कि-

चारों वेद करे खण्डवतो।
तेहि रैदास करे दण्डवतो।।

अर्थात जो चारो वेदों को नहीं मानता है रैदास ऐसे लोगों को दण्डवत प्रणाम करता है। अगर रैदास शाही मोची नहीं होते तो ऐसा नहीं कह पाते।

 रैदास अपने शुरुआती दौर में भले ही ईश्वर भक्त रहे हों मगर अनुभव की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद ईश्वर को भी झूठ समझने लगे थे।
बाभन झूठा वेद भी झूठा झूठा ब्रह्म अकेला रे।
जीवन चारि दिवस का मेला रे ।
मंदिर भीतर मूरति बैठी,
पूजत बाहर चेला रे ।
लड्डू भोग चढावत जनता,
खाते बाभन चेला रे ।
सबको लूटत बाभन सारे,
प्रभु जी देत न धेला रे ।
पुण्य-पाप और पुनर्जन्म का,
बाभन कीन्हा खेला रे ।
स्वर्ग नरक बैकुंठ पधारो,
गुरु शिष्य या चेला रे ।
जितना दान देउगे जैसा,
वैसा निकले तेला रे ।
बाभन जाति सबको बहकावे,
जँह तँह मचे बवेला रे ।
छोड़ि के बाभन आ संग मेरे,
कहै रैदास अकेला रे ।

उपरोक्त चंद लाइनें तो झांकी भर हैं। उन्होंने अपने दौर में सभी धर्मों के पाखण्डियों को जमकर लताड़ा है। कुछ लोग जो सुनी-सुनाई अतार्किक बातों के आधार पर संविधान को बहुत बड़ा तोप समझते हैं और कहते हैं कि 'संविधान नहीं था तो हम बोल भी नहीं पाते थे', वे अपनी धारणा बदल दें। रैदास के समय में यह संविधान नहीं था, फिर भी वे जैसा बोल लेते थे। आज वैसा बोलने पर धार्मिक आस्था पर ठेस पहुंचाने के नाम पर जेलों में ठूंस दिया जायेगा।
    
अगर अंग्रेज़ नहीं आते तो कबीर जैसे लोगों की पीढ़ियों में से टाटा पैदा होते, रैदास जैसे लोगों की पीढ़ियों में से बांटा पैदा होते। तब बड़े-बड़े स्लाटर हाउसों के मालिक कोई ब्राह्मण नहीं बल्कि कसाईयों में से होते, डेयरी उद्योग के मालिक अहीरों और गड़ेरियों में से होते। यूरोप की तर्ज पर भारत में भी दस्तकारों में से पूंजीपति निकलते तो आज यही लोग शासक होते, तब वर्ण-व्यवस्था जातिवाद कूड़ेदान में चले जाते। परन्तु ऐसा विकास भारत में नहीं हो पाया। 
 दरअसल जब भारत में कबीर और रैदास जैसे दस्तकारों की छोटी सी कार्यशाला विकसित होकर मैन्यूफैक्चरी में प्रवेश कर चुकी थी, और सत्रहवीं सदी आते-आते उनकी मैन्यूफैक्चरी विकसित होकर उद्योग का रूप लेने जा रही थी, उसी वक्त अंग्रेज आ गये। शुरुआत में तो अंग्रेज हमारी मैन्यूफैक्चरी का कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे, परन्तु जब उनके पास भाप का इंजन आ गया तब वे भाप के इंजन के सहारे बड़े पैमाने का उत्पादन करने लगे, जिससे उनका माल हमसे सस्ता पड़ने लगा। जिससे वे पूरे बाजार में छा गये। उनकी पूंजी ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी त्यों-त्यों हमारी आदिम पूंजी को निगलती गयी। हमारी छोटी-छोटी मैन्यूफैक्चरी जो विकसित होते हुए आगे चल कर कल कारखाने का रूप ले सकती थी उसे अंग्रेजों ने ध्वस्त कर दिया। और अन्ततः हमारे मैन्यूफैक्चरर और दस्तकार उजड़ गये तथा उनमें से बहुत से लोग अंग्रेजों के यहां मामूली तनख्वाह पर नौकरी करने के लिये बाध्य हो गये।
 
अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में जहां किसानों वे दस्तकारों में से कुछ लोगों को सिर्फ छोटी-मोटी नौकरियां दिया, वहीं सामन्ती वर्गों को ठेका,पट्टा, कोटा, परमिट, लाइसेंस, एजेंसी, अनुदान, जमींदारी, सस्ते कर्ज, आधुनिक शिक्षा, अपनी सेना पुलिस का संरक्षण आदि देकर उन्हें बहुत मजबूत बना दिया।
   
अंग्रेजों के आने से पहले ही कबीर और रैदास के विचार भारत ही नहीं कई पड़ोसी देशों तक में फ़ैल चुके थे। जब अंग्रेजों ने भारत में अपनी सत्ता कायम की तो उनको कबीर और रैदास के विचार खटकने लगे। वे जानते थे कि कबीर और रैदास जैसे क्रान्तिकारी सन्तों की तार्किक विचारधारा जिन्दा रहेगी तो भारत को लम्बे समय तक गुलाम नहीं बनाये रखा जा सकता। इसलिए एक सुनियोजित साज़िश के तहत ही अंग्रेजों ने रैदास और कबीर जैसे संतों के क्रान्तिकारी विचारों को कुचलने का काम किया। इन संतों के विचारों को कुचलने के लिये अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म के पाखण्डियों को बढ़ावा दिया। उन्हें मठ-मंदिर बनाने के के नाम पर पूरे देश में लाखों एकड़ जमीन दिया। कई मठों को तो जमींदारियां भी दे दिया। भारी आर्थिक मदद पाने से इनका पाखण्ड बढ़ता गया। इन पाखण्डियों ने रैदास और कबीर के विचारों को कुचलने के लिये उनके विचारों में बहुत घाल-मेल किया। जैसे- सीना फाड़कर जनेऊ दिखाना, कटौती में से कंगन निकालना, मरे हुए को जिन्दा कर देना…. और अन्ततः उन्हें भगवान का अवतार घोषित कर देना ये सब रैदास के विचारों में घालमेल के ही रूप हैं। 
  
ज्ञान पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाने के लिये जहां कबीर को विधवा ब्राह्मणी के पेट से पैदा हुआ बताया गया, वहीं रैदास को पूर्व जन्म में ब्राह्मण बता दिया गया। इन मनगढ़ंत कहानियों से वे सिद्ध करना चाहते हैं कि ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाला ही विद्वान हो सकता है।
 
आज शोषक वर्ग अपनी शोषणकारी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए एक साज़िश के तहत पाखण्ड को बढ़ावा दे रहा है। ऐसी परिस्थिति में कबीर व रैदास के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक हो गये हैं।

*रजनीश भारती*
*राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा*

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Wednesday, 18 January 2023

रामचरितमानस की विवादास्पद चौपाइयां

रामचरितमानस की दो चौपाइयां अत्यंत विवादास्पद रही हैं।  ये  चौपाइयां निम्नांकित हैं।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ (अरण्य कांड-33:)
तथा
ढोल, गंवार, सूद्र, पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।। (सुन्दर काण्ड-58)
इन दोनो चौपाइयों में शुद्र का जिक्र है। दूसरी में शुद्र के साथ आधी आबादी (नारी) को भी रखा गया है।

हिंदुस्तान के घटिया से घटिया कवि ने भी ऐसी मानव विरोधी और ओछी बातें कभी नहीं किया होगा। तो फिर सवाल है कि सारे जड़ चेतन में सीता और राम को देखनेवाले और सभी जीवों से अपार प्रेम करने वाले हमारे संत महाकवि ने ऐसी बातें कैसे लिख दी?
थोड़ा विस्तार से देखें,
प्रथम चौपाई:
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दुर्वासा के श्राप से राक्षस योनि में जन्म पाये तथा राम के हाथों मृत और तत्पश्चात पापमुक्त गंधर्व, कबंध, से श्रीराम कहते हैं:
सापत ताड़त परुष कहंता। 
बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। 
सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥
(शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी बिप्र पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी बिप्र पूजनीय है। और गुणों से भरा और ज्ञान में निपुण होने के बावजूद भी शूद्र पूजनीय नहीं है।)

पर पूरे मानस में एक भी प्रसंग नहीं है जिसमें तुलसीदास गुण-विहीन व्यक्ति, बिप्र या अन्य, के पक्ष में खड़े दिखें। रावण और कुम्भकर्ण भी बिप्र हैं। पर वे सदाचारी नहीं हैं अतः राक्षस हैं। मानस में जिन खलों का बारम्बार जिक्र है, वे प्रायः सभी ‛ऊंच निवास नीच करतूती' वाले ब्राह्मण वर्ण के हैं। 
इसके विपरीत समाज के जो भी तिरस्कृत और प्रताड़ित हैं –कोल, भील, किरात, बानर, भालू, गिद्ध, निषाद, शबरी, जटायु आदि सभी– अपने सदाचार के चलते श्रीराम को अपने भ्राताओं सदृश प्रिय हैं।
मानस में जिस एक शुद्र का स्पष्ट जिक्र है ,वह है निषाद  जिसके बारे में शब्द हैं
लोक बेद सब भाँतिहि नीचा। 
जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।
(जो लोक और वेद दोनों में सब तरह से नीचा माना जाता है,जिसकी छाया छू जाने से भी स्नान करना होता है।)
पर इस निषाद से तो राम तथा बाद में भरत अँकवार भर कर गले मिलते हैं। उसकी छाया तो क्या, शरीर से भी अशुद्ध नहीं होते।
राम के अयोध्या लौटने पर जब निषाद  विदा लेता है, तब राम कहते हैं,
तुम मम सखा भरत सम भ्राता
सदा रहेऊ पुर आवत जाता
जो लोग कहते हैं कि तुलसी वर्णाश्रम धर्म के प्रतिपालक थे उन्हें यह जानना चाहिए कि तुलसी के राम ने उच्च वर्ण के किसी को भी न तो सखा कहा और न भरत सम भ्राता कहा।
शबरी भी शुद्र वर्ण की है, पर राम उसके झूठे फल खाने में भी कोई संकोच नहीं करते।

द्वितीय चौपाई:
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समुद्र श्रीराम की सेना को लंका जाने की राह नहीं दे रहा। राम क्रोध में धनुष उठा लेते हैं।  श्रीराम के क्रोध से भयभीत समुद्र हाथ जोड़े प्रकट होता है, और क्षमा की प्रार्थना करते हुए कहता है;
गगन समीर अनल जल धरनी। 
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।
(हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी– ये सभी डाँट के ही योग्य हैं)

रामचरितमानस के इन  प्रसंगों में ये दोनों चौपाइयां अपने स्थान पर पूरे तौर से बेतुकी और अप्रासंगिक लगती हैं, और उतना ही अप्रासंगिक शुद्र या नारी की बातें जबरदस्ती घुसेड़ना। ऐसी गलती तुलसी जैसे श्रेष्ठ कवि से असंभव थी। 

निष्कर्ष यह है कि  ये चौपाइयां तुलसी की नहीं बल्कि ब्राह्मण पुरोहितों की चमत्कारी लेखनी से मानस में घुसी है जिसके द्वारा शातिर पंडितों- पुजारियों ने लोकप्रिय हो चुकी रामचरितमानस को अपने मनोनुकूल बना लिया। इस काम में वे सदियों से दक्ष थे। वाल्मीकि रामायण के साथ यह कांड वे बहुत पहले कर चुके थे। 

मध्यकालीन भक्त कवियों को पढ़ते वक्त हमें यह मूल बात दिमाग में रखनी होगी कि कबीर, तुलसी, सूर, रैदास, नानक सहित उस काल के सारे भक्त कवि उदार एवम मानववादी थे और ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के  विरोधी थे।
तुलसी ने तो खुद लिखा:
"मेरे जाति-पाँति न, चहौं काहू की जाति-पाँति,
मेरे कोऊ कामको, न हौं काहू के कामको।"
(कवितावली, उत्तरकांड)
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