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Sunday, 15 January 2023

मानस की सर्वाधिक लोकप्रिय उक्तियाँ

मानस की सर्वाधिक लोकप्रिय उक्तियाँ
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जैसे अंग्रेजी में शेक्सपियर, वैसे ही हिंदी में तुलसीदास सर्वाधिक उद्धृत किये जाने वाले कवि हैं। 16वीं सदी की सांस्कृतिक चेतना को समझने के लिए उनके मानस से बेहतर कृति कोई नहीं है। इसके अलावे,  अपनी काव्यगत खूबियों के चलते मानस को हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति होने का सौभाग्य प्राप्त है। 
प्रस्तुत है तुलसी की 100 सर्वाधिक उद्धृत की जाने वाली पंक्तियां या प्रसंग। रामचरित मानस का सार (सकारात्मक या नकारात्मक) भी इन्हीं पक्तियों में है।
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बाल काण्ड
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1.
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई ॥
2.
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥
3..
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा ॥
4.
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
5.
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥
6.
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥
7.
को बड़ छोट कहत अपराधू। 
8.
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
9.
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥
10.
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
11.
जस दूलहु तसि बनी बराता।
12.
 बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा ॥
13.
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं।पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥
14.
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी ॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा ॥
15.
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं ॥
16.
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा ॥
17.
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
18.
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ ॥ 
19.
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
20.
जेहि पर जेहि कर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥
21.
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुके पुनि का पछताने।।
22.
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
23.
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं ॥
24.
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥
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अयोध्या कांड
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25.
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती ॥
26.
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥
27.
निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥
28.
को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई ॥
29.
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई ॥
30.
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना ॥
31.
कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥
32.
दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥
33.
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें ॥
34.
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥
35.
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥
36.
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥ 

37.
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना ॥
38.
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥
39.
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी ॥
40.
आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा ॥
41.
नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥
42.
दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥
43.
उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥
44.
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा ॥
45.
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥
46.
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥
47..
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥ ३१५ ॥
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अरण्य काण्ड
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48.
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी ॥
49..
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
50...
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥
51.
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
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किष्किंधा काण्ड
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52.
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥
53.
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा ॥
54.
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी ॥
55.
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई ॥
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा ॥
56.
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी ॥
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई ॥
57.
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना ॥
58.
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा ॥
59.
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई ॥
60.
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥
61.
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई ॥
62.
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ॥
63.
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ॥

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सुन्दर काण्ड
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64.
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
65.
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा ॥
66.
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥
67.
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
68.
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥
69.
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ 
70.
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥
71.
जहाँ सुमति तहँसंपति नाना। जहाँकुमति तहँ बिपति निदाना ॥
72.
जानि न जाइ निसाचर माया।
73.
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ ४३ ॥
74.
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥
75.
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥
76..
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा ॥
77.
भय बिनु होइ न प्रीति ॥ 

78.
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥

79.
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।
80.
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥
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लंका काण्ड
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81.
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
82.
नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया ॥
83.
फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरुख हृदयँन चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम
84.
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना ॥
85.
सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना ॥

86.
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥
अस बिचारि जियँजागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥

87.
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। 

88.
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे ॥
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँन कतहुँ रिपु ताकें ॥
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥ 

89.
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥
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उत्तर काण्ड
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90.
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
91.
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥

92.
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी ॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा ॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥

93.
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥ 
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥ 

94.
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई ॥
95.
गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥
96.
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥

97.
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही ॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती ॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें ॥

98.
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥
99.
कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥
100.
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ॥
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अमृत काल में भी दलितों के हिस्से मानव मल- नागरिक अखबार



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दिसंबर 2022 के अंतिम सप्ताह में एक इंसानियत को शर्मशार करने वाला कुकृत्य किया गया। तमिलनाडु के जिला पुदुकोट्टई के एक गांव में दलितों के पानी पीने के लिए बनी टंकी में मानव मल डाल दिया गया। 100 परिवारों वाली बस्ती में जब कई बच्चे बीमार हो गए तो डॉक्टरों ने बताया कि गंदा पानी पीने से बच्चे बीमार पड़ रहे हैं। डॉक्टरों के कहने पर गांव में बनी पानी की टंकी को चेक किया गया तो उसमें भारी मात्रा में मानव मल पड़ा हुआ था। शिकायत करने पर पुदुकोट्टई जिले के डीएम और एसपी वहां पहुंचे। वहां पहुंचने पर उन्हें एक और बात पता चली। दलित लोगों ने बताया कि गांव में छुआछूत की प्रथा अभी भी कायम है। उक्त गांव के मंदिर में दलितों को नहीं जाने दिया जाता है और गांव की चाय की दुकान पर दलितों के लिए अलग से गिलास रखे जाते हैं।

पीने के पानी में मानव मल की इतनी बड़ी शर्मसार करने वाली घटना के बावजूद जिले के डीएम व एसपी द्वारा दोषियों की पहचान नहीं की जा सकी। डीएम और एसपी द्वारा दलितों को मंदिर में प्रवेश कराया गया एवं चाय के दुकानदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। डीएम और एसपी ने दलितों से ही कहा है कि वह पता करें कि पानी की टंकी में मानव मल किसने डाला है। इस पर कोई जांच बैठाई जाए और जांच एजेंसियां पानी की टंकी में मल डालने वाले दोषियों की पहचान करें, ऐसी खबर अभी तक नहीं आई है।

तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद के खिलाफ लंबा संघर्ष चला है। सब जानते हैं कि हिन्दू ब्राह्मणवादी मूल्यों के हिसाब से बड़ी जातियों के लोग दलितों से छुआछूत रखते हैं। छुआछूत के खिलाफ अपने स्वाभिमान के लिए जब दलित खड़े होते हैं, आवाज उठाते हैं तो ऊंची जाति के लोगों द्वारा उनके खिलाफ इंसानियत को शर्मसार करने वाले घृणित कृत्य किए जाते हैं।

तमिलनाडु पेरियार की भूमि रही है। यहां पर आदि द्रविड़ जातियों (दलितों) द्वारा हिन्दू ब्राह्मणवाद, छुआछूत एवं सभी तरह के दलित और महिला उत्पीड़न के खिलाफ बराबरी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई थी। लेकिन द्रविड़ आन्दोलन से निकलीं डीएमके व एआईएडीएमके जैसी पूंजीवादी पार्टियों के नेतृत्व पर गैर दलित ताकतवर पिछड़ी जातियों के नेता काबिज हैं। इन पार्टियों ने गैर बराबरी के खिलाफ दलितों पिछड़ों में जो चेतना पैदा हुई थी, उसे वोट की राजनीति तक सीमित रखा। महंगाई-बेरोजगारी, भ्रष्टाचार बढ़ाने के साथ इन पार्टियों ने जातिवादी एवं धार्मिक राजनीति को ही बढ़ावा दिया है।

तमिलनाडु हमारे देश का वह राज्य हैं जहां पर 20 प्रतिशत से अधिक दलित आबादी रहती है। यह राष्ट्रीय औसत 16.6 प्रतिशत से अधिक है। राज्य के 94 प्रतिशत दलितों के पास जमीन नहीं है। राज्य की अधिकांश जमीनों पर ऊंची जातियों एवं ताकतवर पिछड़ी जातियों का मालिकाना हक है। अधिकांश आबादी खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करती है। ऊंची जातियां आज भी बहुत से काम यजमानी प्रथा एवं बेगार के तौर पर कराती हैं। राज्य में अभी भी मैला ढोने की प्रथा जारी है। 2018-19 में 3000 से अधिक परिवारों ने सरकार को लिखकर बताया था कि वे अपनी आजीविका के लिए मानव मल ढ़ोने का काम करते हैं। तमिलनाडु में 600 से अधिक गांव में अभी भी खुलेआम अस्पृश्यता छुआछूत जारी है।

तमिलनाडु में पिछले कुछ सालों के आंकड़े देखें तो दलितों पर अत्याचार और हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

2011 से जुलाई 2015 तक तमिलनाडु में 213 दलितों की हत्या गैर दलित जातियों ने की है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2014 से जून 2017 के बीच देश में दलितों पर हिंसा के 32,000 मामले दर्ज हुए हैं। उनमें से 5300 दलित उत्पीड़न के मामले केवल तमिलनाडु में दर्ज हुए हैं। तमिलनाडु में 2019 में 1144, 2020 में 1274 एवं 2021 में 1377 दलित हिंसा के मामले दर्ज हुए हैं। राज्य में 2021 में ही 53 दलितों की हत्या कर दी गई थी। राज्य में दलित समुदाय पर हमलों में वृद्धि देखने को मिल रही है। 2020 में कोविड के समय लॉकडाउन में दलितों पर सामूहिक हमले के मामले में तमिलनाडु देश में पांचवें स्थान पर था।

फरवरी 2020 में चेन्नई के पास विल्लुपुरम में सड़क किनारे शौच करने पर 24 वर्षीय दलित युवक की सरेआम पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। आज भी बहुत से गांवों में दलितों को आम रास्ते पर चलने की मनाही है। जनवरी 2016 में नागपट्टनम जिले के थिरुनाल कोंडाचेरी गांव में चेल्लामुथु नाम के दलित व्यक्ति के शव को ऊंची जातियों ने आम रास्तों से नहीं ले जाने दिया था। चेल्लामुथु के पुत्र ने चेन्नई हाईकोर्ट में अपील की थी और हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी जिले के पुलिस प्रशासन ने चेल्लामुथु के शव को आम रास्ते से ले जाने के लिए प्रशासनिक प्रबंध नहीं किया। पुलिस-प्रशासन ने सवर्ण जातियों से मिलीभगत कर खुद ही चेल्लामुथु के शव का अंतिम संस्कार कर दिया था। गत 5 वर्षों में दलित हत्याओं के 300 मामले दर्ज हुए हैं लेकिन केवल 13 मामलों में ही सजा हुई है।

शेष बहुत से मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं हो सकी है।

तमिलनाडु में गैर दलित जातियों की लड़कियों से प्रेम करने व शादी करने वाले दलित युवक की निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती है। बहुत जगहों पर दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता है।

तमिलनाडु में एससी/एसटी एक्ट 1989 का क्रियान्वयन निराशाजनक है। तमिलनाडु में अदालती कार्रवाई की बात की जाए तो दलितों पर हिंसा के केवल 6 प्रतिशत मामले में ही आरोपियों को सजा मिल सकी है। बहुत से मामलों में अभी तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं हो सकी है ।

देश में तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहां पर दलितों, आदिवासियों एवं पिछड़ी जातियों को 69 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। किन्तु इसके बाद भी तमिलनाडु में आर्थिक-सामाजिक असमानता अपने चरम पर है। शिक्षा के निजीकरण के कारण गरीब परिवारों के बच्चे शिक्षा से खासकर उच्च शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। नौजवान बेरोजगार हैं। रोजगार के नाम पर कम्पनियों में ठेकेदारी, निर्माण क्षेत्र में मजदूरी, खेत मजदूरी आदि कर लोग अपना जीवन यापन कर रहे हैं। बड़ी आबादी अभी भी सामंती ब्राह्मणवादी ताकतवर जातियों के दमन-उत्पीड़न के नीचे पिस रही है।

सवाल यह है कि आजादी के 75वें साल में भी जब मोदी सरकार इसे अमृत काल घोषित कर अमृत महोत्सव मना रही हैं, तब देश में दलित हिंसा का शिकार क्यों हो रहे हैं। दलितों के पीने के पानी की टंकी में मानव मल डालने जैसे घृणित व इंसानियत को शर्मसार करने वाले कुकृत्य क्यों हो रहे हैं।

तमिलनाडु ई वी रामासामी पेरियार की धरती है। रामासामी पेरियार ने हिंदू ब्राह्मणवादी सामंती मूल्य मान्यताओं एवं पितृसत्तात्मक मूल्य-मान्यताओं के खिलाफ लंबा संघर्ष किया है। उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथों को खुलेआम जलाया और एक समता मूलक जातिविहीन समाज बनाने की ओर बढ़ने का आह्वान किया था। पेरियार के द्रविड़ आंदोलन ने तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी, सामंती एवं पितृसत्तात्मक मूल्यों के खिलाफ एक प्रगतिशील चेतना पैदा की थी। वैसे तो देश में ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख से लेकर पेरियार व अंबेडकर आदि ने ब्राह्मणवादी सामंती पितृसत्तात्मक मूल्यों के खिलाफ एक प्रगतिशील सामाजिक चेतना को जन्म दिया था। लेकिन क्या कारण है कि आज वह प्रगतिशील सामाजिक चेतना निजी स्वार्थों में विलीन हो गई। पुनः सामंती-जातिवादी-महिला विरोधी ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक मूल्यों-मान्यताओं को बढ़ावा देकर हिंसक धार दी जा रही है। इसके पीछे क्या कारण है? आज के धार्मिक-जातीय एवं महिला हिंसा के पीछे पुरानी जातीय व्यवस्था के पैरोकार पुराने पुरोहित व सामंत नहीं खड़े हैं। आज की धार्मिक, जातीय व महिला हिंसा की जड़ें पूंजीवादी कारपोरेट वित्तीय पूंजी से अपना खाद-पानी ग्रहण कर रही हैं।

आज देश में उत्पादन और वितरण का काम पूंजीवादी तौर-तरीकों से हो रहा है और इस पर कारपोरेट और वित्तीय मल्टीनेशनल कंपनियों का नियंत्रण है। पूंजीपति वर्ग ने ना केवल उत्पादन और वितरण के काम को नियंत्रित किया है बल्कि यह भारतीय राज्य और सभी छोटी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियों को भी नियंत्रित कर रहे हैं।

आज पूंजीवादी तौर-तरीके में सामंती-पितृसत्तात्मक मूल्यों को घोलकर आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर दलित-पिछड़ी जातियों के मजदूरों एवं महिलाओं के श्रम का निर्ममतापूर्वक शोषण किया जा रहा है। पूंजीपति वर्ग सस्ते श्रम के लिए व लूट के निजाम को बनाए रखने के लिए सामंती एवं पितृसत्तात्मक मूल्यों-मान्यताओं को खाद-पानी देकर पाल-पोस रहा है। पूंजीपति वर्ग अपने खिलाफ जन गोलबंदी को रोकने के लिए सामंती एवं पितृसत्तात्मक मूल्यों-मान्यताओं को हिंसक धार भी देता है। जातियों एवं धर्मों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ाकर दंगा करवाता है।

मौजूदा समय में निजीकरण की बढ़ती रफ्तार के साथ देश में नए-नए जाति धार्मिक संगठन खड़े हो रहे हैं। इन संगठनों के नेताओं को पूंजीवादी लूट में से एक हिस्सा मिलता आज जातीय-धार्मिक-सामंती एवं पितृसत्तात्मक मूल्य मान्यताओं के खिलाफ लड़ाई पूंजीवाद विरोधी लड़ाई का हिस्सा मात्र है। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ लड़ाई को खड़े किए बिना सामंती-पितृसत्तात्मक, जातीय-धार्मिक व महिला उत्पीड़न, गैर बराबरी एवं वर्चस्व के खिलाफ लड़ाई को जीता नहीं जा सकता।

Saturday, 14 January 2023

दो परंपराएं, दो कवि- तुलसीदास & रैदास -संदर्भ बिहार के शिक्षा मंत्री का बयान

दो परंपराएं, दो कवि- तुलसीदास (ब्राह्मणवादी कवि) रैदास (श्रमण-बहुजन कवि) दोनों को आमने-सामने रखकर देखिए, तब हकीकत पता चलेगी.

संदर्भ बिहार के शिक्षा मंत्री का बयान (रामचरित मानस ब्राह्मणों की श्रेष्ठता की स्थापना और बहुजनों-महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए लिखा गया है)
   

डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब 'प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति' में भारत के इतिहास को क्रांतियों और प्रतिक्रांतियों के इतिहास के रूप में चिन्हित किया है. वे बहुजन-श्रमण परंपरा को क्रांतिकारी परंपरा रूप में रेखांकित करते हैं, जिसके केंद्र में बौद्ध परंपरा रही है. वे वैदिक परंपरा को प्रतिक्रांतिकारी परंपरा के तौर  चिन्हित करते हैंं. वे सनातन, ब्राह्मणवादी और हिंदू परंपरा को बदलते समय के साथ वैदिक परंपरा के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द के रूप में देखते हैं, हालांकि सबका मुख्य तत्व एक है- वर्णाश्रम व्यवस्था व्यवस्था का गुणगान और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता का दावा. 

इसके विपरीत बहुजन-श्रमण पंरपरा है, जो वर्ण-जाति व्यवस्था को खारिज करती रही है और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता के दावे को पूरी तरह नकारती रही है और सभी इंसान को समान दर्जा देने की हिमायती रही है. 

वैदिक और बहुजन-श्रमण परंपरा के बीच, प्राचीन काल में शुरू हुआ संघर्ष, किसी न किसी रूप में आज भी जारी रहा. 

हिंदी पट्टी में मध्यकाल में यह संघर्ष बहुजन संत कवियों की निर्गुण धारा और द्विज भक्त कवियों की सगुण धारा के रूप में सामने आया. 

हिंदी भाषा-भाषी समाज में बहुजन निर्गुण संत कवियों की धारा के प्रतिनिधि कवि रैदास और कबीर हैं, तो सगुण भक्त कवियों के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास और सूरदास हैं, विशेष तौर रामचरित मानस के  रचयिता तुलसीदास.

सिर्फ जन्म के आधार ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का दावा, वैदिक परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति तुलसदीस इन शब्दों में करते हैं-

  पूजहिं विप्र सकल गुणहीना, 
  सूद्र न पूजहिं ज्ञान प्रवीना
  (रामचरित मानस) 

इसके विपरीत गुण-कर्म आधारित श्रेष्ठता, बहुजन-श्रमण परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति रैदास इन शब्दों में करते हैं-
                  
रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुनहीन,
पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन।
                                          (संत  रैदास)                   

वैदिक परंपरा परजीवी मूल्यों की वाहक रही है और जबकि बहुजन-श्रमण पंरपरा, श्रम को एक श्रेष्ठ मूल्य के रूप में स्वीकार करती है.

यही कारण है कि द्विज जातियां दलित-बहुजनों के श्रम पर पलती रही हैं, और इस परजीवीपन पर अभिमान करती रही हैं और इसके आधार पर भी अपनी श्रेष्ठता का दावा करती रही हैं. उनकी नजर में जो व्यक्ति श्रम से जितना ही दूर है, वह उतना ही श्रेष्ठ है और जो सबसे ज्यादा श्रम करता है, उसे सबसे निम्न कोटि का ठहरा दिया गया! 

इसके विपरीत दलित-बहुजन परंपरा, श्रम संस्कृति की वाहक रही है. 

रैदास स्वयं भी श्रम करके जीवन-यापन करते थे और श्रम करके जीने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे. घर-बार छोड़कर वन जाने या संन्यास लेने को ढोंग-पाखण्ड कहते थे —

नेक कमाई जउ करइ गृह तजि बन नहिं जाए।

रैदास अभिमानी परजीवी ब्राह्मण की तुलना में श्रमिक को ज्यादा महत्व देते हैं-

धरम करम जाने नहीं, मन मह जाति अभिमान।
ऐ सोउ ब्राह्मण सो, भलो रविदास श्रमिकहु जान।।

ब्राह्मणवादी द्विज परंपरा के विपरीत दलित-बहुजन परंपरा के कवि रैदास श्रम की संस्कृति में विश्वास करते हैं. उनका मानना था कि हर व्यक्ति को श्रम करके ही खाना खाने का अधिकार है—

रविदास श्रम कर खाइए, जौ-लौ-पार बसाय।
नेक कमाई जो करई,
कबहु न निष्फल जाय।।

बुद्ध की तरह रैदास ने भी ऊंच-नीच अवधारणा और पैमाने को पूरी तरह उलट दिया. वे कहते हैं कि जन्म के आधार पर कोई नीच नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति नीच होता है, जिसके हृदय में संवेदना और करुणा नहीं है —

दया धर्म जिन्ह में नहीं,
हद्य पाप को कीच।
रविदास जिन्हहि जानि हो
महा पातकी नीच।।

उनका मानना है कि व्यक्ति का आदर और सम्मान उसके कर्म के आधार पर करना चाहिए, जन्म के आधार पर कोई पूज्यनीय नहीं होता है. 

बुद्ध, कबीर, फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह रैदास भी साफ कहते हैं कि कोई ऊंच या नीच अपने मानवीय कर्मों से होता है, जन्म के आधार पर नहीं। वे लिखते हैं —

रैदास जन्म के कारने
होत न कोई नीच।
नर कूं नीच कर डारि है,
ओछ करम की कीच।।

आंबेडकर की तरह रैदास का भी कहना है कि जाति एक ऐसा रोग है, जिसने भारतीयों की मनुष्यता का नाश कर दिया है. जाति इंसान को इंसान नहीं रहने देती. उसे ऊंच-नीच में बांट देती है. एक जाति का आदमी दूसरे जाति के आदमी को अपने ही तरह का इंसान मानने की जगह ऊंच या नीच के रूप में देखता है. रैदास का कहना है कि जब तक जाति का खात्मा नहीं होता, तब तक लोगों में इंसानियत जन्म नहीं ले सकती —
जात-पात के फेर मह
उरझि रहे सब लोग।
मानुषता को खात है,
रैदास जात का रोग।।

वे यह भी कहते हैं कि जाति एक ऐसी बाधा है, जो आदमी को आदमी से जुड़ने नहीं देती है.
वे कहते हैं एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से तब तक नहीं जुड़ सकता, जब तक जाति का खात्मा नहीं हो जाता—
रैदास ना मानुष जुड़ सके,
जब लौं जाए न जात।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह रैदास भी हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई भेद नहीं करते. वे दोनों के पाखण्ड को उजागर करते हैं. वे साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मस्जिद से; क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है —

मस्जिद सो कुछ घिन नहीं,
मन्दिर सो नहीं प्यार।
दोउ अल्ला हरि नहीं,
कह रविदास उचार।।

रैदास मंदिर-मस्जिद से अपने को दूर रखते हैं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों से प्रेम करते हैं—
मुसलमान से दोस्ती,
हिन्दुवन से कर प्रीत।
रविदास ज्योति सभ हरि की,
सभ हैं अपने मीत।।

रैदास बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है. जिन तत्त्वों से हिंदू बने हैं, उन्हीं तत्त्वों से मुसलमान. दोनों के जन्म का तरीका भी एक ही है -

हिन्दू तुरुक महि नाहि कछु भेदा दुई आयो इक द्वार।
प्राण पिण्ड लौह मास एकहि रविदास विचार।।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह रैदास के मन में भी अपनी जाति और पेशे को लेकर कोई हीनता बोध का भाव नहीं है. वे यह कहते हैं —

ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार।
....
तुलसी के वर्णाश्रम आधारित रामराज्य के विपरीत, रैदास बेगमपुरा के रूप में  एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं, जो जोतीराव फुले के आदर्श बलि राज, डॉ. आंबेडकर के आदर्श समाज की कल्पना और मार्क्स के समाजवादी समाज की कल्पना से मेल खाता है- 

बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।।
अब मोहि खूब बतन गह पाई,
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु-दाइमु सदा पातिसाही,
दोम न सोम एक सो आही।।
आबादानु सदा मसहूर,
ऊहाँ गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।
कह 'रविदास' खलास चमारा,
जो हम सहरी सु मीतु हमारा। 
बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।
अब मोहि खूब बतन गह पाई,
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु-दाइमु सदा पातिसाही,
दोम न सोम एक सो आही।
आबादानु सदा मसहूर,
ऊहाँ गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।
कह 'रविदास' खलास चमारा,
जो हम सहरी सु मीतु हमारा।

इस पद में संत रैदास ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुखविहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम बेगमपुरा या बेगमपुर शहर है. 

रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है; जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छूतछात का भेद नहीं है. जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है..कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है. 

रैदास अपने शिष्यों से कहते हैं — 'ऐ मेरे भाइयो ! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है. उसमें कोई भी दूसरे–तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि सब एक समान हैं. वह देश सदा आबाद रहता है. वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं. जो चाहे कर्म  (व्यवसाय) करते हैं. उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है. उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं..

रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है.'   

रैदास के बेगमपुरा के विपरीत तुसलीदास के रामराज्य की परिकल्पना वर्णाश्रम धर्म यानि वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित है. 

राम-राज्य का सबसे बड़ा लक्षण बताते हुए तुलसीदास लिखते हैं कि राम-राज्य में सभी लोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए वेदों के दिखाए रास्ते पर चलते हैं-

वर्णाश्रम निज निज धरम
निरत वेद पथ लोग। 
चलहिं सदा पावहिं सुखद
नहिं भय शोक न रोग।।

रामराज्य में वर्णाश्रण व्यवस्था को कोई उल्लंघन नहीं कर सकता है. हम सभी जानते हैं कि वर्णाश्रम धर्म का पालन का मतलब है कि शूद्र द्विजों की सेवा करें और महिलाएं पुरुषों की सेवा करें. उत्पादन और सेवा के सारे कार्य गैर-द्विज शूद्र-अतिशूद्र करें. वर्ण-धर्म का पालन ही राम-राज्य है.

तुलसीदास कहते हैं कि राम राज्य के आदर्श राजा राम का जन्म ही ब्राह्मणों और गाय के हितों के लिए हुआ है-

"विप्र, धेनु, सुर, संत हित
लीन्ह मनुज अवतार।  
निज इच्छा निर्मित तनु
माया गुन गो पार।।"    

इतना ही नहीं रामराज्य के आदर्श राजा राम स्वयं ही घोषणा करते हैं  कि उन्हें द्विज (सवर्ण) सबसे प्रिय हैं-

सब मम प्रिय सब मम उपजाए। 
सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी
तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥ 

इतना ही नहीं, तुसलीदास शूद्रों-अतिशूद्रों की समता की मांग को कलयुग एक बड़ा लक्षण बताते हुए कहते हैं कि...

कलयुग में शूद्र द्विजों (सवर्णों) से कहते हैं कि हम तुमसे कम नहीं है और जो ब्राह्मण ब्रह्म ज्ञानी हैं; उनको शूद्र आंख तरेरते हुए डाटते हैं — 
     
बादहिं सृद्र द्विजन्ह सन,
हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो विप्रवर,
आँखि देखावहिं डाटि।

तुलसी के आदर्श रामराज्य के राजा राम उन्हीं शूद्रों-अतिशूद्रों (पिछड़े-दलितों) को गले लगाते हैं, जो खुद को उनके दास या सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं. तुलसी के राम स्वयं कहते हैं कि शूद्र (नीच प्राणी) तभी मुझे प्रिय हो सकता है, जब वह उनका दास बन जाए और उनका भक्त बन जाए. राम साफ शब्दों में कहते हैं कि — 
                       
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। 
मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥ 
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संत रैदास के उलट तुलसी के राम चरित मानस और राम का चरित्र पूरी तरह द्विजों और मर्दों के वर्चस्व की स्थापना करने वाला है. 

सच तो यह है कि राम के चरित्र का गुणगान करने वाला रामचरित मानस, मनु-स्मृति और पुराणों की कलात्मक अभिव्यक्ति है.

राम के चरित्र को न्याय का प्रतीक बताकर और रामचरित मानस को प्रगतिशील साहित्य घोषित कर रामविलास शर्मा, शिवकुमार मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर सिंह जैसे वामपंथी आलोचकों ने भी उत्तर भारत में द्विज पुरुषों के सांस्कृतिक वर्चस्व की परंपरा को और मजबूत बनाया. अनेक अन्य हिंदी लेखकों ने भी अपने सृजनात्मक साहित्य के माध्यम से यही किया. ऐसा करके उन्होंने हिंदी समाज के वर्ण-जातिवादी और पितृसत्तात्मक चरित्र को ही मजबूत बनाया. 

इसके बरक्स बहुजन परंपरा के आलोचकों चंद्रिका प्रसाद 'जिज्ञासु', कंवल भारतीय और डॉ. धर्मवीर जैसे बहुजन आलोचकों  संत रैदास को बहुजन-श्रमण परंपरा के शीर्ष कवि के रूप में स्थापित किया और भारत की क्रांतिकारी बहुजन-श्रमण परंपरा को को स्थापित करने की कोशिश किया.

न्याय, समता, बंधुता और समृद्धि के समान बंटवारे पर आधारित प्रबुद्ध भारत का निर्माण रैदास के बेगमपुरा का निर्माण करके किया जा सकता है, रामराज्य की स्थापना करके नहीं!

Dr. Siddhartha Ramu........

प्रेमचंद, रामचरितमानस और तुलसीदास

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बात 1935 की है. बनारसी दास चतुर्वेदी ने प्रेमचंद को कलकत्ता के तुलसी जयंती के आयोजन में अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया. प्रेमचंद ने उन्हें जवाब दिया, "मैं इस  काम के लिए सबसे कम योग्य व्यक्ति हूँ. एक ऐसे उत्सव की अध्यक्षता करना जिसमें मैंने कभी कोई रुचि नहीं ली, हास्यास्पद बात है. मुझे अपने भीतर आत्मविश्वास की कमी जान पड़ती है, डर लगता है. सच बात तो यह है कि मैंने रामायण भी आदि से अंत तक नहीं पढ़ी है. यह लज्जाजनक स्वीकारोक्ति है, मगर बात ठीक है."
इसी के पन्द्रह दिन बाद प्रेमचंद ने बनारसी दास चतुर्वेदी को एक दूसरे पत्र में यह भी  लिखा कि "अगर आपने तुलसी उत्सव मेरे ऊपर न लगा दिया होता तो मैं आता. लेकिन एक ऐसे व्यक्ति का तुलसी जयंती में सभापतित्व करना, जिसने कभी उन्हें पढ़ा नहीं और जो उनके संबंध में कही जाने वाली अतिमानवी बातों में विश्वास नहीं करता, हास्यास्पद है. उन्होंने राम और हनुमान को देखा और वह बंदरवाली घटना सब खुराफात. मगर क्या तुलसी-भक्त लोग मेरी काफिरों जैसी बात पसंद करेंगें? इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह विक्रम संवत् दस में पैदा हुए या बीस में या चालीस में?  क्यों अपनी बुद्धि खामखाह इसके पीछे बर्बाद करो जबकि और भी न जाने कितनी चीजें करने को पड़ी हैं. वह एक महान कवि थे,, उनकी व्याख्या करो, दार्शनिक व्याख्या, मनोवैज्ञानिक व्याख्या, प्राणिशास्त्रीय व्याख्या, शरीरशास्त्रीय व्याख्या जो चाहे करो, मगर उन्हें ईश्वर काहे बनाते हो." ..(प्रेमचंद, चिठ्ठी- पत्री खंड दो पुस्तक से.)





Friday, 13 January 2023

वर्ष की गणना

हिदु वर्ष कुल बारह महीनों का होता है। हर महीने की गणना तीस दिन या 15-15 दिन के दो पक्षो यानि कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष से की जाती है। वर्ष की गणना सुर्य और चंद्रमा की चाल पर निर्धारित होती है। संपूर्ण हिंदु वर्ष में 355 दिन होते है। तीन साल में बाकी के 30 तीन एडजस्ट करके मलमास का वक्त माना जाता है,यानी औसतन 365 दिन का एक वर्ष!

 इसे हम मुलतः विक्रम संवत के नाम से जानते है। महान राजा विक्रमादित्य के नाम पर हिदु वर्ष का नाम करण हुआ है। अधिकांश लोगो कि मान्यता के अनुसार फिलहाल हम 2077 विक्रम संवत में संचार कर रहे है। 

वैसे अलग-अलग स्थितियों,तिथियों की भौगोलिक गणना के अनुसार हिन्दु या सनातन धर्म में मुलतः तीन नव वर्ष होते है।

इस्लाम में भी एक साल में बारह महीने होते है लेकिन उनका हर महीना लगभग 29 दिन का होता है। इस कारण एक साल कभी 355 दिन तो किसी वर्ष 354 दिन का हो जाता है। इस वजह से इस्लाम धर्म में हर साल, हर त्योहार कभी 10 तो कभी 11 दिन पीछे चले जाते है। 

दुनियाभर में लगभग 4234 धर्म है। हर धर्म का अपना खुद का एक कैलेंडर (दिनदर्शिका) है। सभी का अपना साल, अपना महीना,अपना सप्ताह होता है। उसी कैलेंडर के हिसाब से जन्म,मरण,तीज, त्योहार सब का निर्णय होता है। 

आज 01 जनवरी है,नये साल का पहला दिन है। कुछ मुढ धर्मिक लोग बकवास कर रहे है कि यह हमारा नव वर्ष नही है। यह हमारी संस्कृती नही है। यह तो ईसाई नव वर्ष है। यह तो अंग्रेजी नव वर्ष है। 

यह अलग बात है कि खुद का जन्म दिन वे इसी तथाकथित अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से मनाते है लेकिन 01 जनवरी को नया साल मनाते समय इनको उबकाई आने लगती है।

आपको अचरज होगा,यह जानकर कि जो महाशय हमेशा संस्कृती,परंपरा की दुहाई देते रहते है। उनमे से 98.5% लोगो को ठीक-ठीक पता नही होता है कि संस्कृती और परंपरा किस चिड़िया का नाम है। बस Copy-Paste ज्ञान की गंगा में बहे जाते है।

आप को जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि साल को नापने के लिए ईसाई वर्ष जैसी कोई मुल गणना ही नही है। कुछ लोग जिसे ईसाई धर्म का वर्ष समझते है, उसका दावा करते है। वह ईसाई वर्ष है ही नही। वैसे यह गलत फहमी अधिकांश ईसाईयों को भी है, ऐसे में गैर ईसाईयों को क्या दोष देना ?

यह 365 दिन,06 घंटे और 25 मिनट की तो वैज्ञानिक कसौटी पर बनी एक वार्षिक गणना है,जिसे दिन मान के पैमाने पर खरा उतरने के बाद में युरोपीय देशो में रह रहे ईसाईयों ने अपना लिया था। 

यह गणना पृथ्वी के सुर्य का चक्कर लगाने, साथ ही अपनी धुरी पर घुमने और अपने उपग्रह चंद्रमा के चक्कर लगाने की गणना पर निर्भर है। यह पूर्णतया एक वैज्ञानिक अनुसंधान पर निर्भर एक पैमाना है। इस का ईसाई या किसी भी धर्म से मुलतः कोई लेना देना नही है।

इस लिए बंधुओं बहकावे में मत आओ,अपनी अकल लगाओ!

                         😆जय हिंद 🇮🇳
-धीरज फूलमती सिंह



कवि शेली की इंग्लैंड के मजदूरों और किसानों को संबोधित एक कविता

अंग्रेजी साहित्य के महान क्रांतिकारी  कवि शेली की इंग्लैंड के मजदूरों और किसानों को संबोधित एक कविता का भावानुवाद:
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ओ मेरे मजदूर भाइयों !
पैरों तले कुचलने वाले
इन सामंतों के खेतों में 
फसल उगाने क्यों तुम जाते? 
क्यों इन क्रूर लुटेरों खातिर
इतनी मिहनत और लगन से
उनके शाही वस्त्र बनाते?
 
क्यों ऐसे कृतघ्न परजीवी
रक्त पिपासु पशुओं को तुम
जन्म से लेकर मरण काल तक
भोजन देते, कपड़े देते,
उनके लिए होम हो जाते ?

ओ मेरे मजदूर भाइयों !
क्यों इन घोर निकम्मों खातिर
तरह तरह के शस्त्र बनाते?
कोड़े औ' जंजीर बनाते?
इन शस्त्रों के बल पर ही ये
तेरी उपज लूट ले जाते।

इतनी मिहनत और मशक्कत
में ओ उम्र गंवाने वालों?
कभी तुझे आराम मिला क्या?
शांति और विश्राम मिला क्या?
कोई आश्रय-धाम मिला क्या?
भरपेट भोजन कभी मिला क्या?
दुख हर ले, वह प्यार मिला क्या? 

बीज जो रोपे,  काटा दूजा;
संपत्ति पाए, हड़पा दूजा ;
वस्त्र बनाए, पहना दूजा;
शस्त्र बनाए, ले गया दूजा।

ओ मेरे मजदूर भाइयों !
फसल लगाओ अपने खातिर,
संपत्ति पाओ, अपने खातिर,
वस्त्र बनाओ, अपने खातिर,
शस्त्र बनाओ, अपने खातिर ।

(मूल पाठ)

A Song: "Men of England"
BY PERCY BYSSHE SHELLEY

Men of England, wherefore plough
For the lords who lay ye low?
Wherefore weave with toil and care
The rich robes your tyrants wear?

Wherefore feed and clothe and save
From the cradle to the grave
Those ungrateful drones who would
Drain your sweat—nay, drink your blood?

Wherefore, Bees of England, forge
Many a weapon, chain, and scourge,
That these stingless drones may spoil
The forced produce of your toil?

Have ye leisure, comfort, calm,
Shelter, food, love's gentle balm?
Or what is it ye buy so dear
With your pain and with your fear?

The seed ye sow, another reaps;
The wealth ye find, another keeps;
The robes ye weave, another wears;
The arms ye forge, another bears.

Sow seed—but let no tyrant reap:
Find wealth—let no imposter heap:
Weave robes—let not the idle wear:
Forge arms—in your defence to bear.
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नया साल किसे मानेंगे?

★★★★★★★★★★



भारत के लोग साल में दो तीन बार नया साल मनाते हैं इसका कारण यहाँ पाए जाने वाले कैलेंडरों की विविधता है । इसके अलावा तीज त्योहार भी   कई तरह से मनाते हैं ।

तीज - त्योहारों की बात आई है तो  सबसे पहले चाँद के कैलेण्डर के बारे में बात करना ज़रूरी है । यह तो आप जानते ही होंगे कि हिन्दू धर्म के अलावा इस्लाम में भी सारे त्योहार चांद के घटने - बढ़ने पर ही आधारित होते हैं ।

इसका कारण यह है कि मनुष्य ने सबसे पहले आकाश  में चाँद को घटते बढ़ते देखा । सूरज तो रोज एक जैसा ही दिखता था । इसलिए  चांद का कैलेंडर ही मनुष्य का पहला कैलेंडर बना। 

आपको ज्ञात होगा कि बहुत  सारे तीज त्यौहार चाँद पर ही आधारित हैं । 

*चाँद का वर्ष* 354-355  दिनों का होता है जबकि सूरज का साल यानि सौर वर्ष 365-366 दिनों का होता है ।  

दोनों कैलेण्डर में 10-11  दिनों का अंतर है । हम मकर संक्रांति हर साल 14-15 जनवरी को मनाते  हैं क्योंकि यह सूर्य के केलेंडर पर आधारित है लेकिन चाँद पर आधारित कैलेण्डर में ईद और दीवाली हर साल 10 दिन पहले आ जाती है । बल्कि हर त्योहार दस दिन पहले आता है ।

जैसे 2012  में दिवाली 13  नवम्बर को आई थी ।
 2013 में 3 नवम्बर को आई थी 
और 2014  में 23 अक्टूबर को आई थी ।

देखिये सभी में 10-11 दिन कम होते गए , इस घटते क्रम से इसे 2015 में 12 या 13 अक्तूबर को आना था लेकिन 2015 में यह 2012 की दीवाली से मिलती -जुलती तारीख 11 नवम्बर को आई ।

*ऐसा क्यों हुआ?*

 इसका कारण यह है कि पर्व में प्रतिवर्ष 10-11 दिन कम होते जाते हैं और फिर  तीन साल बाद जब एक माह के 30-31 दिन जमा हो जाते हैं हर चौथे साल में 1 माह जोड़ दिया जाता है ,इसे अधिक मास या खर मास कहते हैं ।

 और फिर यह क्रम पूर्ववत चलने लगता है ।  लेकिन हिजरी केलेंडर में तीन साल बाद एक माह नहीं जोड़ा जाता इसलिए  ईद हर साल 10-11  दिन पहले आ जाती है ।  जैसे 2012 में 20 अगस्त को आई , 2013 में 9 अगस्त को आई , 2014 में 29 जुलाई ,2015  में 19 जुलाई , और 2016 में 8 जुलाई को आई  ।  अगले साल फिर इसमें दस या ग्यारह  दिन कम हो जायेंगे ।

*ऐसा कैसे हुआ?*

यह कुछ इस तरह हुआ कि डेढ़ हजार साल पहले जब हिजरी कैलेण्डर बना तब हजरत पैगम्बर ने एक बैठक ली और तय किया कि सूर्य के कैलेण्डर की तुलना में वे हर साल इस कैलेण्डर में दस दिन कम करते जायेंगे । ऐसा कुरआन में उल्लेख है ।

 कैलेण्डरों  की यह व्यवस्था हमारे पूर्वजों द्वारा की गई है और अब तक उसका पालन हो रहा है । हिन्दू हों या मुस्लिम हम धार्मिक त्योहारों में चाँद के कैलेण्डर का इस्तेमाल करते हैं । और यह एक दूसरे के पूरक हैं विरोधी नहीं । जो एक के लिए दूज का चांद है वह दूसरे के लिये ईद का चांद है ।

हम भले ही अपनी अपनी पद्धति को लेकर एक दूसरे से लड़ें लेकिन हम सभी अपनी भौतिक जीवन शैली के अनुसार ग्रेगोरियन यानि सूर्य के कैलेण्डर का इस्तेमाल करते हैं । जन्मदिन सूर्य के कैलेंडर से मनाते हैं , यात्रा की तारीख सूर्य के कैलेंडर से तय होती है , बच्चों की परीक्षाओं का टाइम टेबल सूर्य के कैलेंडर से बनता है । इसमें धर्म का न कोई हस्तक्षेप है न कोई मदद ।

दुनिया के सारे धर्मो के लोगों के लिए चाँद और सूरज  एक हैं , ऐसा नही हो सकता कि हम अपने अपने चाँद सूरज पैदा कर लें । अफसोस यह फिर भी हमने उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार बांट लिया है । चाँद सूरज तो भौतिकीय परिघटना के अनुसार पैदा हुए लेकिन हमने अपने हिसाब से उनके जन्म की अलग अलग कथा गढ़ ली ।

जब प्रकृति सब के लिए एक जैसी है ,चाँद सूरज सबके लिए एक जैसे हैं , ग्रह नक्षत्र सबके लिए एक जैसे हैं तो फिर क्यों हम लोग अपने बनाये धर्म के नाम पर अपने अपने देवी देवता ,  पूजा पद्धति , परम्परा , रीति रिवाज , कर्म काण्ड और तीज त्योहारों को लेकर आपस में  लड़ते रहते हैं ? अगर शनि आपका कुछ बिगाड़ सकता है तो अमेरिका वालों का क्यों कुछ नहीं बिगाड़ता ?

*फिर यह उनका नया साल है , यह हमारा नया साल है ,यह उनका त्योहार है यह हमारा त्योहार है , यह उनका खानपान है यह हमारा खानपान है , यह उनकी वेशभूषा है , यह हमारी वेशभूषा है..क्या है यह सब?*

फ़र्ज़ करें, अगर हम लोगों को आपस मे लड़ता  देखकर जिस दिन चाँद सूरज निकलना बंद कर देंगे , सब समझ में आ जायेगा ।

(घबड़ाये नहीं ऐसा नही होगा यह कवि कल्पना है । 😀

*लेकिन हम मनुष्य लोग आपस मे धर्म के नाम पर लड़ते हुए पूरी तरह खत्म हो जाएंगे ..यह कवि कल्पना नहीं है ।*


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*शरद कोकास*
की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक
*मस्तिष्क की सत्ता* से
8871665060

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