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Monday, 10 April 2023

हाथरस सामूहिक बलात्कार कांड से उभरते कुछ सवाल


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किसी नारी का बलात्कार ,उसका क्रूरतम  उत्पीड़न व  दमन है। चिंता की बात है कि ऐसी घटनाएंँ साल-दर-साल बढ़ती जा रही हैं । ' राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो' के अनुसार भारत में हर रोज औसतन 87 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है जिनमें 4 महिलाएंँ अनुसूचित जाति( "दलित") की होती हैं। इसी माह एक महिला मजदूर के साथ दुष्कर्म के मामले की सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट यह  कहे बिना नहीं रह सका कि " भारत भूमि दुष्कर्मियों की भूमि में बदल गई" है । दरअसल ,शोषक-शासक पूंँजीपति वर्ग नारी को "उत्पादन के एक औजार" एवं "वासना की दासी" व "भोग की वस्तु" समझता है । नारी के प्रति उपरोक्त विचार ही निजी स्वामित्व पर आधारित, इस पुरुष विशेषाधिकारवाले  पूंँजीवादी व्यवस्था में प्रभुत्वशील  विचार  है , जिसका दुष्परिणाम सामान्यता तमाम नारियों को और विशेषकर मजदूर वर्ग की नारियों को झेलना पड़ रहा है।                                         
                                हाथरस की घटना ने एक पूंँजीवादी राज्य के गुंडागर्दीवाले चरित्र को भी खोल कर रख दिया है। सबको पता है कि गुंडा एक व्यक्तित्व -विघटित व  असामाजिक व्यक्ति होता है जो मनमानी, डराने-धमकाने एवं निर्दोष व्यक्तियों पर अत्याचार करके दहशत फैलाता है। उत्तर प्रदेश में यही देखने को मिल रहा है । एक तो बलात्कार की घटना के 72 घंटे की बजाय 11 दिन बाद मेडिकल जांँच की प्रक्रिया शुरू हुई ; दूसरे, 19 वर्षीया युवती की मौत के बाद उसकी लाश परिजनों को नहीं सौंपी गई ,उन्हें घरों में बंद कर ढाई बजे रात में ही पेट्रोल छिड़ककर अपमानजनक ढंग से लाश जला दी गई । मीडिया को भी इजाजत नहीं थी । इसके बाद हाथरस के जिलाधिकारी ने सरकार की ओर से 25 लाख रुपए देने की घोषणा की एवज में मृत लड़की के पिता (पार्ट टाइम सफाई मजदूर) से कहा," मीडिया के सामने ऐसे बोल देना कि अब सब सही है और कोई दबाव नहीं है"  ...कि " मीडियावाले तो आजकल में चले जाएंँगे, मैं ही यहांँ रहूंँगा "आदि । बूलगढ़ी गांँव को चारों ओर से पुलिस ने घेर रखा था ताकि मीडिया या कोई व्यक्ति पीड़ित परिवार से न मिल सके । यहांँ तक कि घर में पुलिस जमी बैठी थी और परिवार के लोगों से मोबाइल तक छीन लिए गए थे । यहांँ सवाल उठता है कि दहशत पैदा करनेवाला ऐसा राज्य व्यापक मेहनतकश जनता के भला किस काम का ? मजदूर वर्ग को उत्पीड़न-दमन-अपमान  के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपना राज्य कायम करने के लिए लड़ना ही होगा।
           इस घटना के सिलसिले में आमजनों के सामने इस बात की फिर से पुष्टि हुई  कि यदि किसी साधु या धार्मिक गुरु या महंथ के हाथ में शासन की बागडोर आ जाए तो पूंँजीपति वर्ग के अन्य सेवकों की तुलना में वह और अधिक निर्ममता से जनता की छाती पर मूंग दलने लगता है। चूँकि वह भक्तों को अपना सेवक और अपने को उसका प्रभु समझने का अभ्यस्त होता है ,इसलिए राजनीति में आने पर वह पूंँजीवादी जनवाद व कानून के समक्ष समता की भावना को पैरों तले रौंदता है ।नारियों के गले पर गुलामी का फंदा और अधिक कस जाता है। हमें पता है, अफगानिस्तान में तालिबानी मुल्लों ने आम जनता पर कैसा कहर ढाया था !!
                                              क्रांतिकारी मजदूर वर्ग "पूंँजीपति वर्ग और उसके राज्य का गुलाम" है लेकिन उसी के कंधे पर इतिहास ने यह कार्यभार सौंपा है कि पूंँजीपति वर्ग को सत्ता से उखाड़ फेंके । निजी स्वामित्व को समाप्त कर , वह शोषण- दमन के तमाम रूपों का खात्मा करे और सदियों से चली आ रही नारियों की दोहरी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ डाले। कहना न होगा कि नारी- मुक्ति का सवाल मजदूर वर्ग के आंदोलन के उत्थान के साथ जुड़ा हुआ  है । परजीवी पूंँजीपति वर्ग और उसकी पार्टियांँ यह नहीं चाहते कि अपनी आजीविका हेतु श्रम शक्ति बेचनेवाले तमाम मजदूर एक वर्ग में संगठित होकर अपनी स्वतंत्र राजनीति करे; यही कारण है कि मजदूर वर्ग को धर्म, जाति आदि जैसे प्रतिक्रियावादी आधारों पर लगातार विभाजित करने की कोशिशें की जाती हैं । पूंँजीवादी -प्रतिक्रियावादी विचारों व राजनीति का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि कठुआ (जम्मू )में 8 साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में उसके मुसलमान होने के पहलू को प्रधानता देने , उछालने और बलात्कारियों के हिंदू होने को प्रधानता देने के चलते बलात्कारियों के पक्ष में धार्मिक प्रतिक्रियावादी शक्तियांँ गोलबंद होकर सड़क पर उतर आईं। आज बूलगढ़ी ( हाथरस)की घटना में पूंँजीवादी पार्टियों व जातिवादी संगठनों द्वारा बलात्कृत लड़की के "दलित "होने को प्रधानता देने, मुख्य पहलू बताने के सिलसिले में बलात्कारियों के पक्ष में "12 गांँव के सवर्णों की पंचायत" होने एवं 'अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा' द्वारा बलात्कार का आरोप हटाने को लेकर गांँव के बाहर प्रदर्शन की खबरें आ रही हैैं । पूँजीवादी समाज में बलात्कार जैसे जघन्य कुकृत्य व बहुत बड़ी समस्या पर एक "जाति "या" जाति समूह "के विरुद्ध दूसरी" जाति" या "जाति समूह" के खड़े होने से मरणासन्न पूंँजीवादी व्यवस्था ,मानव द्रोही शासक वर्ग व उसका राज्य छिप जाता है। मजदूर वर्ग द्वारा शासक पूंँजीपति वर्ग को कटघरे में खड़े करने के अभियान को भारी धक्का पहुंँचता है, जब मजदूर वर्ग के पिछड़े हिस्से धर्म या जाति के आधार पर पूंँजीपतियों के पीछे गोलबंद हो जाते हैं।
यदि उत्पादन- संबंधों  या संपत्ति संबंधों  की बात की जाए तो पूंँजीवादी संबंध ही  प्रभुत्वशील नजर आएगा और इसलिए जिस समाज में हम रह रहे हैं ,उसे पूंँजीवादी समाज कहते हैं। साम्यवाद ( कम्युनिज्म ) का क,ख,ग जाननेवाला भी यह मानता है कि पूंँजीवादी समाज की यह विशेषता है कि वह अधिकाधिक मुख्यत: दो विरोधी वर्गों-- पूंँजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग-- में बँटता जाता है एवं वर्गीय शोषण -उत्पीड़न -दमन सर्वप्रमुख -सर्वव्यापक  स्थान ग्रहण कर लेता है ।लेकिन,शासक पूंँजीपति वर्ग ,उसके विचारक व राजनीतिज्ञ धनी -गरीब की मौजूदगी को स्वीकारते हुए भी उपरोक्त विज्ञानसम्मत वर्गीय विभाजन को नहीं मानते और धर्म व  जाति जैसे प्रतिक्रियावादी आधारों पर समाज को हिंदू- मुसलमान ,आदि में तथा "अगड़ा" ," पिछड़ा" ," दलित", "आदिवासी "आदि में बाँटकर वर्गीय शोषण-दमन पर पर्दा डालना चाहते हैं । समस्या है कि कम्युनिस्ट नामधारी अवसरवादी पार्टियांँ जो संसदीय लोकतंत्र यानी पूंँजीवादी लोकतंत्र का महिमामंडन करती हैं ,शोषक वर्ग की खास पार्टियों का पिछलग्गू बन उनके सुर में सुर मिलाती नजर आती हैं। ऐसी कम्युनिस्ट पार्टियांँ व संगठन जो वर्तमान समाज को पूंँजीवादी समाज के रूप में नहीं देखते यानी आधुनिक वर्ग- विभाजन से सहमति नहीं रखते ,वे जाने-अनजाने शोषक- शासक पूंँजीपति वर्ग द्वारा किए गए प्रतिक्रियावादी विभाजन को मजबूती प्रदान कर बैठते हैं । इसके अलावे ऐसे भी कम्युनिस्ट संगठन हैं जो पूँजीपति वर्ग व उसके अमले-जमले द्वारा धर्म व धार्मिक उत्पीड़न, जाति व  जातिगत उत्पीड़न के संबंध में लगातार व जोरदार ढंग से फैलाए जा रहे पूँजीवादी विचारों से भ्रमित हो जाते हैं, क्रांतिकारी सिद्धांत में विश्वास खोने लगते हैं और परिणामस्वरूप वर्ग के साथ जाति, वर्गीय संघर्ष के साथ  विजातीय संघर्ष( गैर वर्गीय संघर्ष ) की खिचड़ी पकाने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में मजदूर वर्ग की एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी जरूरी है जो क्रांतिकारी सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए पूंँजीपति वर्ग का भंडाफोड़ करे एवं मजदूर -विरोधी विचारों का भंडाफोड़ करते हुए मजदूर वर्ग के मुक्ति- आंदोलन को सही दिशा में नेतृत्व दे।
                                                जयप्रकाश ललन

Sunday, 9 April 2023

भारत की जनविरोधी टैक्स व्यवस्था



*भारत की जनविरोधी टैक्स व्यवस्था*


भारत की टैक्स व्यवस्था को लेकर एक बेहद ग़लत धारणा प्रचलित है कि भारत में कुछ मुट्ठी-भर लोग ही टैक्स देते हैं, जबकि बहुसंख्या कोई टैक्स नहीं देती, बल्कि यह तबक़ा बिना टैक्स दिए सरकारों से मुफ़्त में सुविधाएँ माँगता है या जैसे मोदी ने एक बार कहा था कि यह हिस्सा "रेवड़ियों" का आदी है। टैक्स वितरण के बारे में यह धारणा मौलिक रूप से ही ग़लत है। यह झूठी धारणा शासकों द्वारा फैलाया गया झूठ है, जिसका मक़सद आम जनता की जेब पर लगते टैक्सों के भारी कट के बदले मिलने वाली नाममात्र सुविधाओं को और दूसरी तरफ़ अमीरों को दी जा रही रियायतों को छिपाना है।



कौन देता है ज़्यादा टैक्स?


किसी मुल्क़ का निज़ाम कितना जनपक्षधर है, यह तय करने का मोटा-मोटा पैमाना यह देखना है कि उस व्यवस्था में आम लोगों पर टैक्सों का बोझ कितना डाला जा रहा है यानी उस निज़ाम में ज़िंदगी जीने की लागत कितनी है? दूसरा यह कि टैक्सों के इस बोझ के बदले आम लोगों को कितनी सुविधाएँ मिलती हैं? अगर इन दोनों जायज़ पैमानों के आधार पर बात करें, तो हम कह सकते हैं कि भारतीय निज़ाम मेहनतकश जनता पर सबसे ज़्यादा बोझ डालने वाला निज़ाम है और बदले में यहाँ की आम आबादी को बेहद कम सुविधाएँ मिलती हैं।


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जनवरी के दूसरे हफ़्ते में 'ऑक्सफ़ैम' नाम की संस्था ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें भारत में ग़ैर-बराबरी का एक भयानक आँकड़ा सामने आया कि भारत में 2022 में आर्थिक तौर पर नीचे की 50% आबादी ने केंद्र सरकार की कुल जी.एस.टी. आमदनी में 64% हिस्सा डाला, जबकि इस हिस्से के पास भारत की कुल संपत्ति का सिर्फ़ 3% हिस्सा है। दूसरी ओर, ऊपर की 10% धनवान आबादी, जो कुल संपत्ति का 74% हिस्सा है, उसने टैक्स में सिर्फ़ 3% का योगदान दिया। जैसे कि शासक वर्ग के मीडिया से उम्मीद थी, भारत की टैक्स व्यवस्था की इस भयंकर ग़ैर-बराबरी पर किसी ने कोई चर्चा करनी ज़रूरी नहीं समझी।


वैसे तो अकेला यही आँकड़ा भारत की टैक्स व्यवस्था के बारे में प्रचलित झूठी धारणा को ख़ारिज करने के लिए काफ़ी है, लेकिन फिर भी हम विस्तार में देखते हैं कि कैसे भारत के मेहनतकश लोगों पर विभिन्न बहानों और ढंगों द्वारा टैक्सों का बोझ लादा जाता है।


भारत की मेहनतकश जनता को मुफ़्तख़ोर साबित करने के लिए दो आँकड़े दिए जाते हैं – पहला यह कि काम करने वाले 55-60 करोड़ लोगों में से सिर्फ़ ढाई-तीन करोड़ लोग ही आमदनी वाला टैक्स भरते हैं, जो कि बेहद कम गिनती है। दूसरा यह कहा जाता है कि भारत में कुल घरेलू उत्पादन में टैक्स आमदनी का हिस्सा 17-18% ही है, बल्कि अन्य विकसित और कम विकसित पूँजीवादी देशों में यह दर 24-40% तक है।


भारत की जनता पर टैक्स के बोझ की चर्चा करने से पहले इन दोनों तर्कों के बारे में बात करते हैं। भारत की कुल मेहनतकश आबादी में आमदनी टैक्स देने वाले लोगों की गिनती इतनी कम होने का कुतर्क मेहनतकश जनता पर सवाल नहीं, बल्कि इस व्यवस्था पर सवाल है, जहाँ सरकार द्वारा बनाए गए पैमानों के मुताबिक़ ही बहुसंख्य लोगों की आमदनी इतनी भी नहीं कि वे टैक्स दे सकें। आज भारत में प्रति व्यक्ति औसत आमदनी करीब सवा लाख रुपए सालाना है यानी काम करने वाले 60 करोड़ लोगों में करीब 57 करोड़ लोगों की आमदनी इतनी भी नहीं कि वे टैक्स दे सकें! असमानता पर टिकी इस पूँजीवादी व्यवस्था के नाजायज होने पर इससे बड़ा सवाल और क्या होगा? जहाँ तक दूसरे कुतर्क का सवाल है, तो इसे नीचे तालिका में दिए अन्य देशों के टैक्स हिस्से से मिलाकर समझते हैं।


उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि अन्य मुल्क़ों के मुकाबले भारत में प्रति-व्यक्ति आमदनी पाँच-छह से लेकर कई गुना कम होने के बावजूद भी यहाँ कुल घरेलू उत्पादन में टैक्स आमदनी का हिस्सा ठीक-ठाक यानी 17% तक है। पर इस तालिका में भी टैक्स बोझ की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पाती। उपरोक्त आँकड़े आमदनी टैक्स संबंधी हैं, लेकिन भारत में टैक्स का बड़ा हिस्सा ग़ैर-आमदनी टैक्स यानी खपत टैक्स द्वारा आम लोगों से लिया जाता है। इस मामले में भारत यहाँ के लोगों पर सबसे ज़्यादा टैक्स लगाने वाले मुल्क़ों में से है।


भारत में अहम खपत टैक्स जी.एस.टी. की औसत दर 18% है, जबकि दुनिया के लिए यह औसत 14% है। लेकिन जी.एस.टी. के बिना पेट्रोल, डीजल, बिजली-पानी, मकानों की रजिस्ट्री, टोल टैक्स वग़ैरा के रूप में लगाया जाने वाला टैक्स इस सबसे अलग है। अकेले पेट्रोल-डीजल पर केंद्र सरकार के टैक्स वग़ैरा के अलावा 15-35% टैक्स राज्यों द्वारा लगाया जाता है, जिससे तकरीबन 35 रुपए की लागत वाला यह तेल बाज़ार में 90-100 तक बिकता है। अगर यह सारा टैक्स जोड़ लिया जाए तो दुनिया की औसत 14% के मुक़ाबले भारत में यह खपत टैक्स 25% से ऊपर चला जाता है। और टैक्स का यह बोझ पिछले एक दशक में बेतहाशा बढ़ता गया है। साल 2010-2022 के दरमियान भारत का कुल घरेलू उत्पादन 76.5 लाख करोड़ से बढ़कर 147.40 लाख करोड़ हो गया यानी इसमें 93% का इज़ाफ़ा हुआ। पर सरकार की तानाशाही देखिए कि इस अरसे में केंद्र सरकार की टैक्स आमदनी 6.2 लाख करोड़ से बढ़कर 25.2 लाख करोड़ हो गई यानी इसमें 303% रिकॉर्ड तोड़ इज़ाफ़ा हुआ! यानी इन पूरे बारह सालों के अरसे में इस अर्थव्यवस्था के विकास की रफ़्तार का तीन गुना ज़्यादा बोझ मेहनतकश जनता पर डाला गया है और यह बोझ और भी बढ़ रहा है। इसके अलावा राज्य सरकारें अलग से 36-37 लाख करोड़ कुल टैक्स वसूल करती है यानी भारत की मेहनतकश जनता से एक साल में तकरीबन 60 लाख करोड़ से ज़्यादा टैक्स वसूला जाता है।  


इतने भारी टैक्स के बदले मेहनतकश जनता को मिलता क्या है?


हम ऊपर आँकड़ों से देख सकते हैं कि भारत में औसतन हर मेहनतकश की आमदनी का 35-45% हिस्सा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष टैक्सों द्वारा सरकार को चला जाता है। लेकिन बदले में इस तबक़े को सरकार से क्या मिलता है?


भारत में ज़्यादातर सरकारी स्कूलों की बेहद खस्ता हालत होने के कारण 50% माँ-बाप अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए महँगी फ़ीस, किताबें, वर्दियाँ आदि के ख़र्चे सभी आम लोगों की जेबों से जा रहे हैं। इन सभी चीज़ों पर लोग खपत टैक्स भी भरते हैं यानी टैक्स की दोगुनी मार सहकर लोग अपने बच्चों को निजी संस्थानों में पढ़ा रहे हैं। अगर स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें, तो भारत के दो-तिहाई मेहनतकश लोग दवा-इलाज, जाँच आदि के लिए निजी अस्पतालों, क्लीनिकों पर निर्भर हैं और मेडिकल के सारे सामान पर भी टैक्स लगा होता है। और देखें, अगर सरकार यह दावा करती है कि वह लोगों को मुफ़्त राशन देती है (जो अब लगातार ख़त्म किया जा रहा है) तो उस राशन को पकाने के लिए ज़रूरी गैस, मसाले आदि सब पर लोग टैक्स भर रहे हैं! यानी आम लोग सरकार से कुछ भी मुफ़्त नहीं ले रहे हैं, सबकी महँगी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है। आमदनी का 35-45% हिस्सा सरकारों को चुकाने के बाद भी आबादी के बड़े हिस्से के पास ना नौकरी की गारंटी है, ना कम-से-कम वेतन के नियम लागू होते हैं, ना कोई पेंशन-भत्तों की सुविधा मिलती है, ना ढंग की शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएँ है, सड़की, रेल, हवाई आदि सब ट्रांसपोर्ट निजी हाथों में दिया जा चुका है।


फिर आम लोगों के टैक्स का पैसा कौन खा जाता है?


अब सवाल यह उठता है कि अपनी आमदनी का इतना हिस्सा टैक्स भरकर भी अगर आम लोगों को सरकारी सुविधाएँ नाममात्र की मिलती हैं, तो यह सारा पैसा जाता कहाँ है? जवाब है अमीरों के पास!


पहले की सरकारें और अब मोदी सरकार ज़ोर-शोर से बड़े पूँजीपतियों के पक्ष में नीतियाँ बना रही हैं, जिसके तहत उन्हें लगातार टैक्स रियायतें, सब्सिडियाँ दी जा रही हैं। भारत में बड़े पूँजीपतियों पर लगने वाले कारपोरेट टैक्स की दर को मोदी हुकूमत ने 2019-20 में 30% से घटाकर 22% कर दिया था, जिससे पहले दो सालों में ही केंद्र सरकार को 1.84 लाख करोड़ का नुक़सान हुआ, पर यह नुक़सान सरकार ने मेहनतकश लोगों पर टैक्स बढ़ाकर पूरा कर लिया। इसी तरह पूँजीपतियों को सस्ते क़र्ज़ देना, उन क़र्ज़ों को माफ़ करना और नतीजतन होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए आम लोगों पर टैक्स बढ़ाना – यह सरकार की आम नीति हो गई है। सिर्फ़ पिछले पाँच सालों में ही मोदी सरकार में सरकारी बैंकों ने बड़े पूँजीपतियों का 10 लाख करोड़ से ज़्यादा का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है। एक और अहम बात यह है कि मेहनतकश जनता पर विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाने वाली इस सरकार ने आज तक अमीरों की दौलत पर कोई संपत्ति टैक्स नहीं लगाया। अगर भारत के ऊपर के 10% अमीरों पर 10-20% ही संपत्ति टैक्स लगाया जाए, तो इससे भारत की बाक़ी की करोड़ों की आबादी को सभी जन-कल्याणकारी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध करवाई जा सकती हैं। लेकिन मौजूदा पूँजीवादी निज़ाम ऐसा नहीं करेगा। यहाँ पूँजीपति सरकार बनाते ही इसलिए हैं कि वह उनकी सेवा करे, उन्हें रियायतें दें और बदले में सरकार की आमदनी में जो कमी आए, उसे आम लोगों पर विभिन्न टैक्स लगाकर वसूल करे। मौजूदा पूँजीवादी निज़ाम के जनविरोधी स्वभाव को उसकी टैक्स प्रणाली को देखकर साफ़ समझा जा सकता है। इस पूरी व्यवस्था का बोझ अपने कंधों पर ढो रही मेहनतकश जनता की मुक्ति इस भ्रष्ट व्यवस्था को बदलकर और जनपक्षधर समाजवादी व्यवस्था स्थापित करके ही प्राप्त की जा सकती है।


मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 29 ♦ अप्रैल 2023 में प्रकाशित
















हो_ची_मिन्ह

आज #वियतनाम की जनता के महान नेता व साम्राज्यवादियों की चूलें हिलाने वाले योद्धा  #हो_ची_मिन्ह का #जन्मदिवस है।
#19मई1890 को उनका जन्म हुआ था।कॉमरेड हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम की जनता ने फ्रेंच उपनिवेश से मुक्ति पायी थी और फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद को शिकस्त दिया था। 1960 के दशक में लोकप्रिय नारा था नौजवानों का,
Ho Chi Monh , Ho Chi Minh
We shall fight, We shall win.

हो ची मिन्ह एक साधारण परिवार में जन्मे थे। वियतनाम तब फ़्रांसीसी साम्राज्यवादी उपनिवेश था। 1917 की रूसी क्रांति ने "हो" को अपनी ओर आकर्षित किया और सभी समस्याओं का हल "हो" को इसी अक्टूबर क्रांति में दिखाई पड़ा। हो कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाये जा रहे वियतनाम मुक्ति संघर्ष में कूद पड़े। "हो" 1945 तक हिंद चीन के कम्यूनिस्ट आंदोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के सक्रिय नेता रहे। "लंबे अभियान" और जापान विरोधी युद्ध में भी उपस्थित थे। इस संघर्ष में इन्हें अनेक यातनाएँ भी सहनी पड़ीं। 

फ़्रांसीसी साम्राज्यवादियों से लम्बे संघर्ष के बाद 2 सितंबर 1945 को "हो" ने 'वियतनाम जनवादी गणराज्य' की स्थापना की। पर फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने अंग्रेज साम्राज्यवादियों की मदद से फिर से साम्राज्य वापस लेना चाहा। भयंकर लड़ाइयों का दौर आरंभ हुआ और आठ वर्षों की खूनी लड़ाई के पश्चात् फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को 1954 में वियतनामी जनता के हाथों भयंकर मात खानी पड़ी। इसी वर्ष हो-चि मिन्ह वियतनामी जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति नियुक्त हुए। 
पर वियतनाम पर दुनियाँ भर के साम्राज्यवादियों की गिद्ध दृष्टि लगी रही, फ्रांसीसियों के हटते ही अमेरिकनों ने वियतनाम के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। युद्ध बढ़ता गया। दुनियाँ के सबसे शक्तिशाली अमेरिकी साम्राज्यवाद ने द्वितीय विश्वयुद्ध में यूरोप पर जितने बम गिराए थे, उसके दुगुने बम तथा जहरीली गैसों का प्रयोग अकेले वियतनाम को बर्बाद करने में किया। तब की तीन करोड़ की वियतनामी जनता ने 20 साल (1 नवम्बर 1955 - 30 अप्रैल 1975) तक चले अमेरिकी हमले में अंततः कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्यवादियों को धूल चटा दी, उन्हें वहाँ से भागना पड़ा। 
हो चि मिन्ह की विश्वसाम्राज्यवादियों की जड़ें उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका कथन था वियतनामी मुक्तिसंग्राम विश्व-मुक्ति-संग्राम का ही एक हिस्सा है और मेरी जिंदगी विश्वक्रांति के लिए समर्पित है।
वियतनाम के पूर्व प्रधान मंत्री, वियतनाम का मुक्ति संग्राम का महान योद्धा कॉमरेड हो ची मिन्ह को लाल सलाम।

धर्मेंद्र आज़ाद

साम्राज्यवाद विरोधी वियतनामी योद्धा : हो ची मिन्ह

साम्राज्यवाद विरोधी वियतनामी योद्धा : हो ची मिन्ह

2 सितंबर हो की बरसी पर 
(19 May 1890 - 2 Sep. 1969)

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हो चि मिन्ह का जन्म मध्य वियतनाम के किम लियन ग्राम में एक अध्यापक और चिकित्सक के परिवार में 19 मई सन् 1890 ई. को हुआ था।

हो चि मिन्ह जन्म के समय 'ङ्युएन शिन्ह कुंग' के नाम से जाने जाते थे, किंतु 10 वर्ष की अवस्था में इन्हें 'ङ्युएन तत थाऐन्ह' के नाम से पुकारा जाने लगा। इनके पिता को भी राष्ट्रीयता के कारण गरीबी की जिंदगी बितानी पड़ी। उनका देहांत सन् 1930 ई. में हुआ। इनकी बहन 'ङ्युएन थि थाऐन्ह' को कई वर्षों तक जेल की सजा तथा अंत में देश निकाले का दंड दिया गया। ऐसे फ्रांसीसी साम्राज्यवाद विरोधी परिवार में तथा भयंकर साम्राज्यवादी शोषण से पीड़ित देश वियतनाम में, जहाँ देश का नक्शा लेकर चलनेवालों को देशद्रोह की सजा दी जाती थी, हो ची मिन्ह का जन्म हुआ था।

हो चि मिन्ह ने फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड तीनों देशों की यात्रा में सर्वत्र साम्राज्यवादी शोषण को अपनी आँखों से देखा था। 1917 की रूसी क्रांति ने 'हो' को अपनी ओर आकर्षित किया और सभी समस्याओं का हल 'हो' को इसी अक्टूबर क्रांति में दिखाई पड़ा। 'हो' ने तब मार्क्सवाद और लेनिनवाद का गहरा अध्ययन किया और फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। इसी कम्युनिस्ट पार्टी की मदद और समर्थन से हो चि मिन्ह ने फ्रांस में एक क्रांतिकारी पत्रिका 'ल पारिया' निकालना आरंभ किया।

 'ल पारिया' फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के विरुद्ध उसके सभी उपनिवेशों में शोषित जनता को क्रांति के लिए प्रोत्साहित करती थी। 1923 में पार्टी की तरफ से 'हो' को अंतरर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी के पांचवे सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए सोवियत रूस भेजा गया। वहीं पर 1925 में वो स्टालिन से मिले। 'हो' को कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय की ओर से चीन में क्रांतिकारियों के संगठन तथा हिंदचीन में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष तेज करने के लिए भेजा गया। 'हो' 1945 तक हिंद चीन के कम्युनिस्ट आंदोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के सक्रिय नेता रहे। माओ के लांग मार्च और जापान विरोधी युद्ध में भी वो उपस्थित थे। इस संघर्ष में इन्हें अनेक यातनाएँ सहनी पड़ीं। च्यांग काई शेक की सेना ने इन्हें पकड़कर अमानवीय दशाओं में एक वर्ष तक कैद में रखा जिसमें वो अंधे लगभग होते हुए बचे।

2 सितंबर 1945 को 'हो' ने 'वियतनाम जनवादी गणराज्य' की स्थापना की। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने अंग्रेज साम्राज्यवादियों की मदद से हिन्दचीन के पुराने सम्राट् 'बाऔ दाई' की ओट लेकर फिर से साम्राज्य वापस लेना चाहा। भयंकर लड़ाइयों का दौर आरंभ हुआ और आठ वर्षों की खूनी लड़ाई के पश्चात् फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को 1954 में भयंकर मात खानी पड़ी। मजबूर होकर साम्राज्यवादियों द्वारा जिनेवा सम्मेलन बुलाना स्वीकार किया गया। इसी वर्ष हो-चि मिन्ह वियतनामी जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति नियुक्त हुए।

फ्रांसीसियों के हटते ही अमेरिकियों ने दक्षिणी वियतनाम में 'बाऔ दाई' का तख्ता अपने कठपुतली 'ङ्यो दीन्ह यियम' नामक राष्ट्रपति के माध्यम से पलटवा कर वियतनामी क्रांतिकारियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। युद्ध बढ़ता गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली अमेरिकी साम्राज्यवाद ने द्वितीय विश्वयुद्ध में यूरोप पर जितने बम गिराए थे, उसके दुगने बम तथा जहरीली गैसों का प्रयोग वियतनाम पर किया। तीन करोड़ की वियतनामी जनता ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हौसले पस्त कर दिए। मरने के एक दिन पूर्व 3 सितंबर 1969 ई. को हो चि मिन्ह ने अपनी जनता से साम्राज्यवादियों का 'टोनकिन' की खाड़ी में डुबा देने की बात कही थी।

विश्व साम्राज्यवाद की जड़ें कमजोर करने में हो ची मिन्ह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका कहना था वियतनामी मुक्तिसंग्राम विश्व-मुक्ति-संग्राम का ही एक हिस्सा है और मेरी जिंदगी विश्वक्रांति के लिए समर्पित है। साम्राज्यवाद विरोधी इस महान योद्धा की बरसी पर उन्हें हमारा सलाम।

(साभार : कुछ संशोधनों के साथ Wikipedia)

#हो_ची_मिन्ह
#HoChiMinh

मोहम्मद अली और वियतनाम युद्ध

दुनिया के महानतम खिलाडियों में से एक मोहम्मद अली नहीं रहे! श्रद्धांजलि!!!
ये हमारे तथाकथित 'महानायकों' या क्रिकेट के 'भगवानों' जैसे नहीं थे जिन्होंने कभी अन्याय और बेईमानी का विरोध नहीं किया। 
मोहम्मद अली असली महानायक थे जिन्होंने वियतनाम युद्ध का विरोध करने ौर फौज में भर्ती होने से मना करने के लिये जेल जाना और अपना हेवीवेट बॉक्सिंग का विश्व खिताब गंवाना स्वीकार किया था और उनको अपने खेल जीवन के चरम पर ४ साल तक नहीं खेलने दिया गया! 
मोहम्मद अली का वियतनाम युद्ध पर बयानः
"मेरा जमीर मुझे इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं बडे, ताकतवर अमेरिका के लिये अपने भाइयों या और काले लोगों या कुछ गरीब भूखे लोगों को गोली मारूँ। और किसलिये? उन्होंने मुझे नीग्रो नहीं कहा, मुझे कत्ल नहीं किया, मेरे ऊपर कुत्ते नहीं छोडे, उन्होंने मुझसे मेरा देश नहीं छीना, मेरी माँ के साथ बलात्कार और मेरे पिता का कत्ल नहीं किया। उनको गोली किस लिये मार दूँ? उन गरीब लोगों को कैसे मारूँ? चलो मुझे जेल ही ले चलो"
कुछ और उद्धरणः
'He who is not courageous enough to take risks will accomplish nothing in life.'
"I was always the greatest when I was fighting for something."
"I wish people would love everybody else the way they love me. It would be a better world."
और ये उनकी भारत यात्रा के दौरान गायक मोहम्मद रफी के साथ एक यादगार फोटो। दूसरे फोटो में वियतनाम युद्ध पर उनका बयान।

मुकेश असीम

Saturday, 8 April 2023

सरकार द्वारा बनाई गईं मज़दूर कल्याण योजनाएँ – असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के साथ भद्दा मज़ाक़

सरकार द्वारा बनाई गईं मज़दूर कल्याण योजनाएँ – असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के साथ भद्दा मज़ाक़

हमारे देश में बहुत बड़ी संख्या में मज़दूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। निर्माण मज़दूर, खेत मज़दूर, भट्ठा मज़दूर, घरों में साफ़-सफ़ाई के काम करने वाली औरतें और ऐसे अनेकों ठेके और पीस रेट पर दिहाड़ी-मज़दूरी के काम जो उद्योग में नहीं होते, ये सारे काम असंगठित क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र के मज़दूर सख़्त शारीरिक मेहनत और बहुत कम मज़दूरी मिलने के कारण ग़रीबी भरी ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। आँकड़ों के मुताबिक़ कुल मज़दूरों का 83 फ़ीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है।

इन मज़दूरों की बहुत ही छोटी-सी संख्या है, जिनके मज़दूर-कार्ड बने हैं या अन्य मज़दूर कल्याण योजनाओं के तहत पंजीकृत हैं। बाक़ी मज़दूर पंजीकृत ना होने के कारण इन योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे। क्योंकि मज़दूर-कार्ड या अन्य मज़दूर कल्याण योजनाएँ लागू कराने की प्रक्रिया आम मज़दूर के लिए बड़ी दुश्वारियाें भरी हैं। यदि थोड़ी-सी संख्या में पंजीकृत मज़दूरों की बात करें तो इनमें भी बड़े हिस्से को सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल रहा, जिसका कारण अनेक तकनीकी और दस्तावेज़ी झमेले हैं।

पिछले समय में सरकार ने असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए 'ई-श्रम कार्ड' नामक एक नई योजना शुरू की थी। जिसके ज़रिए असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए दो लाख पेंशन देने के बारे में कहा गया था। जैसे कि ऊपर बताया गया है कि असंगठित क्षेत्र के बड़ी संख्या में मज़दूर तो पहले ही सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले रहे और जो छोटी-सी संख्या में मज़दूर इन योजनाओं के लिए पंजीकरण कराते हैं, उनमें से भी ज़्यादातर इन योजनाओं का लाभ नहीं ले सकते क्योंकि उनके आधार कार्ड और बैंक खाते जड़े हुए नहीं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, अनेक योजनाओं के लाभ बैंक खाते और आधार कार्ड जुड़े न होने के कारण बड़ी संख्या में लाभार्थियों तक नहीं पहुँच रहे। ई-श्रम पोर्टल पर दर्ज जानकारी के अनुसार पंजीकृत 5.29 करोड़ असंगठित मज़दूरों में से 74.78 फ़ीसदी या 3.9 करोड़ मज़दूरों के बैंक खाते आधार से नहीं जुड़े हुए।

ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत कराने के दौरान मज़दूर को एक 12 अंकों का पहचान नंबर जारी किया जाता है, इसके बिना पोर्टल पर पंजीकरण नहीं माना जाता, लेकिन ई-श्रम नंबर होने के बावजूद भी मज़दूर योजनाओं का लाभ नहीं ले सकते, क्योंकि इनके बैंक खाते और आधार कार्ड जुड़े हुए नहीं हैं। सर्वोच्च अदालत का आदेश है कि चाहे किसी मज़दूर के पास आधार नंबर नहीं है, फिर भी उसे राशन समेत सेवाएँ देने से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन काला धन रोकने से संबंधित क़ानून इसके विपरीत हैं। मनी लॉन्डरिंग रोकथाम नियम 2019 के तीसरे संशोधन के मुताबिक़ यदि कोई भी व्यक्ति किसी तरह की सब्सिडी प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपना आधार नंबर और बैंक खाता जोड़ना ज़रूरी है और अब तक सभी सरकारी कल्याण योजनाएँ चाहे वह घरेलू गैस सब्सिडी, प्रधानमंत्री आवाज़ योजना हो या प्रधानमंत्री-किसान सम्मान निधी योजना, इनका लाभ लेने के लिए लाभार्थी की पहचान को प्रमाणित करने के उद्देश्य से बैंक खाते और आधार को जोड़ना ज़रूरी है।

समस्या यह है कि सख़्त मेहनत वाले काम करते वक़्त मज़दूरों के हाथ घिस जाने के कारण उनकी उँगलियों के निशान नहीं आते और आम तौर पर ऐसी हालत में बैंक और अन्य जगहों पर लोगों के बार-बार चक्कर लगवाए जाते हैं। बहुत से मज़दूरों के राशन कार्ड भी इसी कारण के चलते काट दिए गए हैं और ऐसी समस्याएँ बैंक खाते से आधार लिंक करने में भी आती हैं। दूसरी समस्या है कि यह तबक़ा हर रोज़ कुआँ खोदकर पानी पीने की स्थिति में जीता है यानी हर रोज़ दिहाड़ी मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता है, बीमारी की हालत में भी ये मज़दूर सख़्त मज़दूरी करते हैं और इसलिए छुट्टियाँ लेकर बैंकों और अन्य जगहों के चक्कर काटना इनके बस की बात नहीं होती। तीसरी समस्या है मज़दूरों-ग़रीबों के साथ भेदभाव और रिश्वत, जिसके चलते इनके थोड़े-बहुत दस्तावेज़ी काम भी लंबे समय के लिए लटक जाते हैं। इनकी वजह से ही आधार कार्ड और बैंक खाते होने के बावजूद भी ये मज़दूर सरकारी योजनाओं के ज़रिए कोई लाभ या सब्सिडी नहीं ले पाते। इस समस्या के हल के लिए श्रम विभाग, सरकार और न्यायपालिका द्वारा चुप्पी धारण की हुई है। क्योंकि ये मज़दूरों के लिए कोई भी क़दम नहीं उठाना चाहते बल्कि बड़े पूँजीपतियों की तोंदें भरने में ही मशरूफ़ हैं। पिछले लंबे वक़्त के दौरान कोरोना के नाम पर लगाए गए लॉकडाउन ने श्रम मज़दूरों को बुरी तरह से झकझोरकर रख दिया। सबसे बुरी हालत असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की हुई, इनमें से भी प्रवासी मज़दूरों की हालत अधिक बुरी हुई, उनके रोज़गार छिने, भयंकर भुखमरी जैसे हालातों से सिर पर छत्त भी नहीं रही और प्रवासी होने के कारण रिहायश के सबूत आदि जमा ना करा सकने के कारण सरकारी योजनाओं के लाभ भी नहीं ले सकते और दूसरी ओर सरकानों ने अमीरों के घाटों को पूरा करने के लिए ख़ज़ाने खोल दिए और ग़रीबों के लिए योजनाओं के विज्ञापन जारी करने के सिवाए कुछ नहीं किया। हर सरकार के पास संकट के वक़्त लोगों को राहत देने के लिए अलग कोष होता है जो लोगों से ही वसूला जाता है, लेकिन लॉकडाउन की भयंकर हालातों के दौरान भी इसका इस्तेमाल लोगों को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि पूँजीपति वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए किया। इसके अलावा केवल मतदान सूची में दर्ज लोगों की थोड़ी-सी मदद के लिए जो राशन किटें भेजीं, उन पर भी अपनी फ़ोटो और चुनाव निशान लगाकर वोटें पक्की करने की राजनीति की गई। ऐसे में असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों तक तो राशन किटें भी नहीं पहुँची, क्योंकि उनके पास वोट-कार्ड नहीं हैं।

देखा जाए तो यदि सरकार को मेहनतकश-मज़दूरों की कोई चिंता होती तो लॉकडाउन का बहाना बनाकर उन्हें घरों में ठूँसकर, उनके मुँह पर मास्क लगाकर ज़ुबानबंदी करके, आफ़त नहीं मौक़ा जैसे नारे देती हुई मोदी सरकार मज़दूरों के कल्याण के लिए बने श्रम क़ानूनों को पूँजीपतियों के हक़ में क्यों संशोधित करती। वक़्त-वक़्त पर सरकार द्वारा बनाई गईं कल्याण के नाम पर योजनाएँ केवल लोगों के आक्रोश को दबाने के लिए जुमले साबित हो जाती हैं। इन जुमलों की राजनीति अब मेहनतकश जनता कब तक सहारेगी।                   

– बलजीत कौर

मुक्ति संग्राम  – बुलेटिन 13 ♦ दिसंबर 2021 में प्रकाशित

Saturday, 1 April 2023

दंगानवमी

1931 में कानपुर में हुए दंगों में स्व.गणेशशंकर विद्यार्थी मारे गए थे। "जोश " मलीहाबादी ने इस दंगे को लेकर  एक बहुत ही मार्मिक कविता लिखी थी। रामनवमी को जिस प्रकार सांप्रदायिक संगठन दंगानवमी  बना देना चाहते हैं, ऐसे माहौल में ऐसी कविताओं को पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना हर संवेदनशील व्यक्ति का कर्तव्य है। अपनी समझ से इसका भावार्थ भी मैने नीचे दे दिया है।

ऐ सियह रू, बेहया, वहसी, कमीने, बदगुमाँ! 
ऐ जबीने अर्ज़ के दाग़, ऐ दनी हिन्दोस्ताँ !! -1
तुझ पै लानत ऐ फिरंगी के गु़लामे बेशऊर !
यह फ़िजाये सुलह परवर, यह क़ताले कानपुर।।-2
तेगे़बुर्राँ और औरतका गला क्यों बदसिफ़ात ?
छूट जायें तेरी नब्जे़ं, टूट जाएंँ तेरे हात।।-3
कोहनियों से यह तेरी कैसा टपकता है लहू ?
यह तो है ऐ संगदिल ! बच्चोंका खूने मुश्कबू।।-4
मर्द है तो उससे लड़ पहले जो मारे फिर मरे।
तूने बच्चों को चबा डाला, खुदा गा़रत करे।।-5
तूने ओ बुज़दिल ! लगाई है घरोंमें जिनके आग।
क्या इन्हीं हाथोंमें लेगा रख़्शे आजादी की बाग ?-6
इस तरह इन्सान, और शिद्दत करे इन्सानपर।
तुफ़ है तेरे दीनपर, लानत तेरे ईमानपर।।-7

(भावार्थ)
  1.ऐ कलंकित मुख वाले, बेहया, वहशी, शक्की! ऐ धरती के माथे के दाग, ऐ हिन्द के कमीने!!
  2.लानत है तुझपे ऐ फिरंगी के बर्बर गुलाम! मेल मिलाप का यह मौसम, और यह मारकाट का कानपुर।।
   3.गर तेरी तलवार इतनी ही तेज, तो औरत का गला क्यों रे दुष्ट? तेरी धड़कन रुक जाय, तेरे हाथ  टूट जाँय ।।
  4.तेरे कोहनी से यह कैसा लहू टपक रहा ? ऐ पत्थर दिल, इससे बच्चों के खून की कस्तूरी महक आ रही।।
  5.मर्द है तो उससे लड़ जो मारे और मरे। तूने बच्चों को मारा, खुदा तेरा नाश करे।।
  6.अरे ओ कायर, जिन हाथों से घरों में तूने आग लगाई, क्या इन्हीं हाथों से आजादी के अश्व की बागडोर थामेगा ।।
  7.इन्सान होकर इन्सान पर ऐसा अत्याचार। तेरे धर्म पर थू, तेरे ईमान पर धिक्कार।।

(आदरणीय  Jagadishwar Chaturvedi जी के वॉल से साभार ली गयी यह कविता)