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Saturday, 17 December 2022

सर्वहारा नेतृत्व बनाम जातीय नेतृत्व

सर्वहारा नेतृत्व बनाम जातीय नेतृत्व

एक दलितवादी सरकारी शिक्षक हैं, वे एक शिक्षक संघ छोटे-मोटे पदाधिकारी भी हैं, उनके शिक्षक संघ के सबसे बड़े नेता एक ब्राह्मण हैं। उस दलित वादी शिक्षक
को अपने ब्राह्मण शिक्षक नेता की जाति से कोई एतराज़ नहीं है।  

 यह तो अच्छा है, इसपर एतराज़ होना भी नहीं चाहिए। जब शिक्षक हितों का सवाल है तो नेता किस जाति में पैदा हुआ यह सवाल खड़ा करना बेहूदगी है। 

मगर वही दलित वादी शिक्षक जब गाँव में भूमिहीन गरीब किसानों, मजदूरों के बीच जाते हैं तो उनसे कहते हैं कि कम्यूनिस्टों के साथ मत जाओ इनका नेता ब्राह्मण है। और ब्राह्मण आपका दुश्मन है। तुम अपनी जाति का संगठन बनाओ। 

 जरा देखिए, अपने शिक्षक हितों की लड़ाई हर जाति के शिक्षकों को गोलबंद करके लड़ रहे हैं, मगर मजदूरों किसानों को जातियों का संगठन बनाने की शिक्षा दे रहे हैं।
 जातिवादी विचारकों का यही घिनौना रूप आप को कमोवेश पूरे देश में मिलेगा।
 
इसी तरह के दोगले चरित्र वाले लोग अक्सर आवाज उठाते हैं कि दलित ही सर्वहारा है कम्यूनिस्ट पार्टियों में सर्वहारा के नेता ब्राह्मण हैं यह ब्राह्मणों की पार्टी है। 

  चूँकि भारत में जातिव्यवस्था है इसलिए जातिवाद से लड़े बगैर क्रान्तिकारी विचारों को स्थापित नहीं किया जा सकता। अत: इन दोगले चरित्र के मजदूर किसान विरोधियों का जवाब देना अत्यन्त आवश्यक है-

  मार्क्स ने जिस सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की बात की है वो है आधुनिक औद्योगिक मशीनों पर काम करने वाला वह मजदूर जिसके पास अपना श्रम बेचने के अलावा और कोई आजीविका का साधन नहीं है। यही है आधुनिक सर्वहारा।

 कुछ अर्धसर्वहारा होते हैं, जो अपनी छोटी मशीनों पर काम करते हैं, जैसे एक दर्जी जो अपनी खुद की मशीन पर काम करता है, या एक मोची के पास अपने खुद के औजारों से जूता बनाकर बेचता है, या कोई रिक्शावाला खुद का रिक्शा चलाता है ऐसे लोग अर्धसर्वहारा होते हैं। 

  कुछ सर्वहारा जो गांवों में अपना श्रम बेचते हैं और व्यक्ति केन्द्रित औजारों पर काम करते हैं वे ग्रामीण सर्वहारा होते हैं, इनमें ज्यादातर भूमिहीन व गरीब किसान होते हैं।

  ये सभी क्रान्तिकारी बदलाव चाहते हैं। मगर इनमें सबसे आगे बढ़ी हुई चेतना उनकी होती है जो आधुनिक औद्योगिक मशीनों पर काम करते हैं। 

   दरअसल बड़ी मशीनें अकेले एक व्यक्ति से चल ही नहीं सकती हैं अतः इन बड़ी मशीनों पर काम करने वाले मजदूर समूहों में एक साथ तालमेल बनाकर काम करते हैं, कारखानों में विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न ज्ञान रखने वाले मजदूरों का एक साथ, उठना, बैठना, रहना होता है।

 इससे वे एक दूसरे से सीखते रहते बड़ी मशीनें सामूहिक प्रयास से ही चल सकती हैं, इस लिए इन पर काम करने वाले मजदूरों में "मैं" की बजाय "हम" की भावना अधिक होती है। 

 इसलिए सामाजिक मालिकाने के सबसे आगे बढ़े हुए प्रबल समर्थक यही होते हैं। आधुनिक मशीनों पर सबके साथ मिलकर काम करने के कारण इनकी चेतना का स्तर अन्य सभी मजदूरों से उच्च हो जाती है।

  इस सर्वहारा के ऊपर सबसे अधिक विस्वास इसलिए भी किया जाता है कि जो आधुनिक पूँजीपति वर्ग है उससे इसकी सीधी टक्कर होती रहती है, तथा पूँजीपतियों से जो इसका अन्तर्विरोध है वह शत्रुतापूर्ण होता है, इसमें किसी तरह के समझौते से इस अन्तर्विरोधों के हल होने के गुंजाइश नहीं होती है। 

इनका नेतृत्व इसलिए कि इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, अत: ये सर्वहारा सीबीआई और ईडी के छापा मारने से झुकने वाले नहीं।

चूँकि ये सर्वहारा आर्थिक रूप से विपन्न होते हैं अतः सभी उत्पीड़ितों को साथ लिए बगैर अपनी मुक्ति की लड़ाई भी नहीं जीत सकते। 

 अत: सभी उत्पीड़ित वर्ग की लड़ाई लड़ना उनकी मजबूरी भी है। इस तरह की मजबूरी और योग्यता मध्यम या धनी किसानों, निम्नपूंजीपतियों, सामंतों आदि किसी भी वर्ग में कत्तई नहीं होती।

   अत: ये सभी वर्ग क्रान्ति में सहयोगी भूमिका तो अदा कर सकते हैं, मगर सही नेतृत्वकारी भूमिका नहीं अदा कर सकते।

 अगर इन मध्यवर्गियों को नेतृत्वकारी भूमिका में लाएँगे तो ये सभी लोग पूरे क्रान्तिकारी आन्दोलन को संशोधनवाद के दलदल में फँसा देंगे। सीबीआई, ईडी का डण्डा देखते ही मायावती और अखिलेश की तरह रोने गिड़गिड़ाने लगेंगे। 

भारत की मुख्यधारा की कम्यूनिस्ट पार्टियों में मध्यवर्गियों, निम्नपूंजीपतियों के नेतृत्व प्रभाव ज्यों-ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों ये पार्टियां संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के दलदल में फँसती चली गईं।

 आप कहेंगे कि मार्क्स, एँगेल्स तो खुद पूंजीपति घरानों से थे वे कैसे नेतृत्वकारी भूमिका में आ गए और वे तो मरते दम तक सही नेतृत्व करते रहे?

 दरअसल मार्क्स, एँगेल्स, लेनिन, माओ, फिदेल कास्त्रो आदि लोग सम्पन्न घरानों में पैदा जरूर हुए मगर उन्होंने अपने वर्ग के साथ गद्दारी किया और मजदूर वर्ग में आकर मिल गए। 

 जैसे एक चाय बेचने वाला गरीब आदमी गरीबों के साथ गद्दारी करके पूँजीपतियों के खेमे में शामिल हो जाता है। कोई भूमिहीन की बेटी अपने वर्ग से गद्दारी करके पूँजीपतिवर्ग से मिल जाती है, और अपने वर्ग के लोगों का वोट बेचकर अरबपति बन जाती है। इसी तरह कोई मध्यम किसान वर्ग में पैदा होकर पूँजीपति वर्ग से मिल जाता है, अपनी जाति के लोगों के अधिकारों का सौदा करके अरबपति बन जाता है।

 वैसे ही कोई करोड़पति या अरब पति अपने वर्ग से गद्दारी करके सर्वहारावर्ग में आकर मिल जाता है। अपना सबकुछ छोड़कर अपना सर्वहाराकरण कर लेता है। इतिहास गवाह है कि ऐसे डीक्लास(वर्गच्युत) बुद्धिजीवी अक्सर अच्छा नेतृत्व देते रहे हैं।

गरीब परिवारों में पैदा हुए अनेक बुद्धिजीवी भाजपा कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी पूँजीवादी पार्टियों में शामिल होकर सोने की कटोरी में झूठ मलाई चाटने के लिए शोषक वर्ग की सेवा कर रहे हैं।
 
 जबकि जमींदार परिवार में पैदा हुए कई लोग सर्वहारावर्ग की मुक्ति के विचारों से लैस होकर सोने की कटोरी को लात मारकर झोपड़ियों में पत्तल में खाना खाते रहें हैं।

जहाँ कई नेता शोषित वर्ग में पैदा होकर शोषित जनता को लूटकर खुद और अपने परिवार एवं नजदीकी रिश्तेदारों को मालामाल करते रहे हैं।

 वहीँ जमींदार या पूँजीपति घरानों में पैदा हुए हजारों लोग खुद को डिक्लास करके यानी अपना सर्वहाराकरण करके बड़े-बड़े कम्यूनिस्ट नेता बने। जिन्होंने अपने परिवार, रिश्तेदारों यहाँ तक कि अपने बाप तक के खिलाफ बगावत किया था।

 इनमें से लाखों लोग जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा जेलों में बिताए हैं और उनमें से हजारों शहीद हुए।

इसलिए कौन कहाँ किस जाति/वर्ग में पैदा हुआ यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण यह है कि वह किस वर्ग के लिए काम कर रहा है। 

इसके उल्ट शोषक वर्ग के के विचारों से प्रभावित होकर कुछ दिमागी दलित लोग अपनी विरादरी के नेता को ही कम्यूनिस्ट संगठनों का नेता न बनाएं जाने की शिकायत करते हैं।

इन जाहिलों को ये नहीं मालूम कि कम्यूनिस्ट पार्टी में जातियों का नेतृत्व नहीं होता, इसमें सर्वहारावर्ग का नेतृत्व होता है। इसमें लीडरशिप जाति, वंश, धर्म, रंग, लिँग, नस्ल, भाषा, क्षेत्र के आधार पर नहीं तय होती।

  जो संगठन वर्गयुद्ध के लिए होते हैं उनमें वही लीडरशिप कर सकेगा जो सही रणनीति या रणकौशल बनाने की कला जानता/समझता होगा और लागू करने की क्षमता रखता होगा। चाहे वो किसी भी जाति धर्म में पैदा हुआ हो।
                       रजनीश भारती
                जनवादी किसान सभा


Wednesday, 14 December 2022

भव स्वतंत्रता का गान !

भव स्वतंत्रता का गान !
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अमरीका , यूरोप के कामगार साथियो
एशियाई , अफ्रीकी , मज़दूर भाइयो
दुनिया भर के सताए और ग़ुलाम बंदियो
एक साथ मिल के उठो सारे मेहनती अवाम
आओ , चलो गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

दौलतों के दुर्ग चंद मुट्ठी भर ठिकाने हैं
ये हमारे श्रम को लूटने के जो घराने हैं
उनके पास मर्ज़ी के कानून हैं, बहाने हैं
उनकी हरकतों को , उनकी चालों को करें नाकाम
आओ , मिलके गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

है मुनाफ़ा , बस मुनाफ़ा , उनके पोर-पोर में
सब तहस-नहस किया , निज लालचों की होड़ में
सारी दुनिया त्रस्त हाँफती है वहशी दौड़ में
ध्वस्त करो शोषणों - उत्पीड़नों का यह निजाम
आओ साथी, गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

यह जो युद्ध से मची हैं हर तरफ तबाहियाँ
सुनो तो , लूटपाट की हैं एक सी कहानियाँ
नोचीं - रौंदी जा रहीं मेरी - तेरी जवानियाँ
तोड़ने होंगे उनके साथियो , जबड़े तमाम
आओ , साथ गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

रंग-नस्ल , जाति-धर्म , भेदभाव भूलकर
आज का जो सच है वर्ग-भेद , वो कबूल कर
दुनिया के मज़दूरो ! चलो , बढ़ें एक उसूल पर
और हाथ में हो अपने लाल झंडे का निशान
आओ , आओ गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

इस ज़माने का सरूप हमको ही बदलना है
पूंजी का ये राज , कामरेड ! अब तो ढहना है
ज़ुल्म की इस रात को; ढलना है, साथी ढलना है
हर दिशा से उगने वाला है नया - नया विहान
आओ , साथ गाएँ हम - भव स्वतंत्रता का गान !

                            ---  आदित्य कमल

Tuesday, 13 December 2022

शायर

ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनका दूसरा मिसरा इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द उदाहरण यहाँ पेश हैं:

"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है,
*वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"
 *- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*
 
"भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
*ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*
 *- माधव राम जौहर*
 
"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
*आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*
 *- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*
 
"दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से,
*इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*
 *- महताब राय ताबां*
 
"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
*रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*
 *- क़मर बदायुनी*
 
"क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो,
*ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।"*
 *- मियाँ दाद ख़ां सय्याह*
 
'मीर' अमदन भी कोई मरता है,
*जान है तो जहान है प्यारे।"*
 *- मीर तक़ी मीर*
 
"शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
*रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"*
 *- जलील मानिकपूरी*
 
"शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
*कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।"*
 *- शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी*
 
"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।"*
 *- मुज़फ़्फ़र रज़्मी*

Friday, 9 December 2022

विघटनकारी नारों के पीछे कौन?

विघटनकारी नारों के पीछे कौन?

  जेएनयू में विघटनकारी नारे लिखे गये हैं, और सरकार उसकी जाँच कराने की बात कर रही है। सरकार जाँच तो करा सकती है मगर जाँच में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों को छू भी नहीं सकती। वरना खुद बेनकाब हो जाएगी।

   जब यह बात वैज्ञानिक तथ्यों पर खरी उतरती है कि अमीर लोग ही शोषण कर सकते हैं तथा गरीब लोग शोषण नहीं कर सकते और यह भी सिद्ध हो चुका है कि अमीर आदमी चाहे किसी भी जाति-धर्म का हो वही शोषण कर सकता है। और यह भी देखा गया है कि अमीर लोग ही मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी, जुआखोरी, अश्लीलता को बढ़ावा देकर जनता को बेरहमी से लूट रहे हैं, और यह भी जाहिर हो गया है कि यही शोषकवर्ग ही उत्पीड़न को बढ़ावा देता है। धार्मिक या जातीय उत्पीड़न भी यही करवाता है तो ऐसे खतरनाक शोषक वर्ग से लड़ने की बजाय, जाति, धर्म, नस्ल, भाषा के नाम पर जनता आपस में क्यों लड़ रही है? जरूर कोई है जो जनता को गुमराह करके आपस में लड़ा रहा है। 

"मुसलमानों भारत छोड़ो", "ब्राह्मणों भारत छोड़ो" "सवर्णों भारत छोड़ो", "ब्राह्मणों कैम्पस छोड़ो", किसका नारा है? जयमूलनिवासी, विदेशी या डीएनए जाँच की बात कौन लोग कर रहे हैं? क्या यह सब छिपा है? नहीं, नहीं, यह सब जगजाहिर है। जनता को आपस में लड़ा कौन रहा है? यह छिपा नहीं है। विघटनकारी ताकतें यह सब डंका बजाकर कर रही हैं। खुलेआम उनके मंच लगते हैं, सरकार उनकी सुरक्षा करती है, आप उनके हजारों वीडियो सोशल मीडिया पर देख सकते हैं? अत: जातिधर्म के नाम पर जनता में विद्वेष फैलाने का काम कौन लोग कर रहे हैं, इसकी जांच कराने की कोई जरूरत नहीं है। जाँच तो इसकी होनी चाहिए कि इनको जातिवाद और साम्प्रदायिकता फैलाने के लिए धन कौन दे रहा? 

अगर इसकी सही से जाँच हो जाए तो पता चल जाएगा कि जो शोषक वर्ग दलितवादियों को चन्दा देता है वही शोषक वर्ग सवर्णवादियों को भी चन्दा देता है। जो शोषकवर्ग हिन्दूवादी संगठनों को चन्दा देता है वही शोषकवर्ग मुस्लिमवादी संगठनों को भी चन्दा देता है। 
सही जांच हो तो शोषक वर्ग बेनकाब हो जाएगा।
              रजनीश भारती
          जनवादी किसान सभा

Wednesday, 7 December 2022

साहित्य - मिख़ाईल शोलोख़ोव

आज तथाकथित साहित्यिक अवांगार्द की चर्चा बहुत होती है, और इस शब्‍द का अभिप्राय मुख्‍यत: रूप के क्षेत्र में होने वाले फैशनेबुल प्रयोगों से ही होता है। मेरे विचार में सच्‍चे अवांगार्द, सच्‍चे हरावल वे रचनाकार हैं, जो अपनी कृतियों में हमारे युग के जीवन के लक्षण निर्धारित करनेवाली नयी अंतर्वस्‍तु को उजागर करते हैं। सामान्‍यत: यथार्थवाद और यथार्थवादी उपन्‍यास -- दोनों ही अतीत के महान रचनाकारों के कलात्‍मक अनुभव पर आधारित हैं। परंतु अपने विकास में उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण नये, आधुनिक लक्षण प्राप्‍त किये हैं। 
मैं इस यथार्थवाद की चर्चा कर रहा हूँ, जो जीवन के नवीकरण का, मानव के हित में उसके पुनर्गठन का विचार लिए होता है। बेशक, मैं उस यथार्थवाद की बात कर रहा हूँ, जिसे हम समाजवादी यथार्थवाद कहते हैं। उसकी मौलिकता इस बात में है कि वह उस विश्‍वदृष्टिकोण को व्‍यक्‍त करता है, जो न मात्र अवलोकन को स्‍वीकार करता है और न ही वास्‍तविकता से पलायन को, जो मानवजाति की प्रगति के लिए संघर्ष का आह्वान करता है तथा कोटि-कोटि जनता के प्रिय लक्ष्‍यों को समझना तथा इन लोगों के लिए संघर्ष का पथ आलोकित करना संभव बनाता है।
मानवजाति एकाकी व्‍यक्तियों की भीड़ मात्र नहीं है, जो पृथ्‍वी के गुरुत्‍वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकले अंतरिक्षनाविक की भांति भारहीनता की अवस्‍था में तिरते रहते हैं। हम पृथ्‍वी पर रहते हैं, उसके नियमों से शासित हैं, और हमारे जीवन पर हावी हैं दैनिक चिंताएँ और अपेक्षाएँ, उज्‍ज्‍वल भविष्‍य की आशाएँ। पृथ्‍वी के आबादी के विराट संस्‍तर एकसमान आकांक्षाओं से प्रेरित हैं, उनके समान हित हैं, जो उन्‍हें एक-दूसरे से अलग करने की अपेक्षा कहीं अधिक हद तक उन्‍हें एक सूत्र में पिरोते हैं।
ये श्रमिक जन हैं, वे लोग हैं, जो अपने हाथों और मस्तिष्‍क से सभी वस्‍तुओं का सृजन करते हैं। मैं उन लेखकों में से हूँ, जो अपना सर्वोच्‍च मान और सर्वोपरि स्‍वतंत्रता अपनी कलम से श्रमिक जनता की सेवा करने की निर्बाध संभावना में ही देखते हैं।
-- मिख़ाईल शोलोख़ोव

Tuesday, 6 December 2022

महाकाय मार्क्स और बौने अम्बेडकर

महाकाय मार्क्स और बौने अम्बेडकर के बीच फ़र्ज़ी एकरूपताएं खोजने में लगे अम्बेडकरी, उनके बीच एकमात्र समानता को नहीं देख पाए।
यह समानता, उनके धुर विरोधी विचारों नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक-राजनीतिक हैसियत और भूमिका से जुड़ी है। 
मार्क्स और अम्बेडकर, दोनों ने ही, उन सामाजिक वर्गों से खुला घात किया, जिनसे वे आए थे, जिनमें उनका जन्म, लालन-पालन और शिक्षा दीक्षा हुई थी।
जर्मन बुर्जुआज़ी में जन्मे और पले-बढ़े मार्क्स ने, उसके विरुद्ध विद्रोह कर, उसके शत्रु-पक्ष, सर्वहारा का पक्ष लिया और उसके ऐतिहासिक मिशन को अपना मिशन बनाकर, जीवन भर उसके पक्ष में और बुर्जुआज़ी के विरुद्ध डटे रहे। इस मिशन- समाजवादी क्रांति- के लिए, उन्होंने अपना सर्वस्व होम कर दिया।
अम्बेडकर, सर्वहारा वर्ग में पैदा हुआ, पला-बढ़ा और उसने भी अपने वर्ग से द्रोह किया। सर्वहारा से द्रोह कर, वह उसके शत्रु-पक्ष- शासक बुर्जुआज़ी- की गोद में जा बैठा और बुर्जुआ जनवाद का बड़ा पैरोकार बना। दलितों, गरीबों को धोखा देकर बुर्जुआ जनवाद के पीछे बांधे रखने में उसने महती भूमिका निभाई और इसके बदले उसने शासक बुर्जुआज़ी से जमकर बिल वसूली की। वह बुर्जुआ संविधान सभा और मंत्रिमण्डलों में उच्च पदों पर रहा और आजीवन पदों, पुरस्कारों के पीछे दौड़ता रहा।

Workers socialist party

Monday, 5 December 2022

मज़दूरों का गीत/ मज़ाज़ लखनवी



हम क्या हैं कभी दिखला देंगे
हम नज़्म-ए-कुहन को ढा देंगे
हम अर्ज़-ए-समा को हिला देंगे
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम 

हम जिस्म में ताक़त रखते हैं
सीनों में हरारत रखते हैं
हम अज्म-ए-बगावत रखते हैं
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

जिस रोज़ बगावत कर देंगे
दुनिया में क़यामत कर देंगे
ख्वाबों को हकीक़त कर देंगे
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

हम क़ब्ज़ा करेंगे दफ्तर पर
हम वार करेंगे क़ैसर पर
हम टूट पड़ेंगे लश्कर पर
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

(साभार कविता कोष)

क्रांतिकारी कवि असरार-उल-हक़ उर्फ़ मजाज़ लखनवी को उनके स्मृति दिवस पर खिराज़-ए-अकीदत