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Wednesday, 27 April 2022

दर्द - तेजू भगत




मेहसूस किया मैंने कल,
दर्द को बहुत करीब से,
अधमरे चेहरे पे, अभाव बन के उभरते हुए,
खुरदुरी हथेली से, बोझ बनके चिपकते हुए,
सख्त पड़ चुके एड़ियों में बेबसी बन के चुभते हुए,
छिल गए घुटनों से अनिश्चितता बन के रिस्ते हुए,
धस चुके पेट को, भूख बन के कुरेदते हुए,
थक चुके शरीर को, " विकाश" बन के रौंदते हुए,

दर्द मनों ठहर सा गया था कल,
मेरे आंखों के सामने, जम सी गई थी सभी संवेदनाएं,
उस पल सब कुछ रुक सा गया था,
और फिर देखा मैंने
 इस ववस्था के चीथड़े  में लिपटे,
कुछ लोग, चले जा रहे थे,
अपने अपने घर की ओर,
एक अनवरत और अंतहीन शून्य की ओर,
दर्द से तरबतर।

मई दिवस

माइकल जे शाक, 1886 के मई महीने में शिकागो में पुलिस कप्तान तैनात था. ये ही वो व्यक्ति था जो मामले की सारी हकीक़त जानता था, किसने बम फेंका, कैसे मज़दूर नेताओं को उसमें फंसाया गया. शिकागो के क्रांतिकारी मज़दूर नेताओं की गिरफ़्तारी भी उसी की निगरानी में हुई और वो ही उस मामले का मुख्य चश्मदीद गवाह था जिसमें उन क्रांतिकारियों को फांसी की सज़ा हुई. 11 नवम्बर 1887 उन्हें फांसी दिए जाते वक़्त भी वह मौजूद था. उसने रिटायर होकर एक किताब लिखी, 'Anarchy and Anarchists'. ज़ाहिर है वो मालिकों का गुरगा था और क्रांतिकारी मज़दूरों से नफ़रत करता था. अपनी किताब के आखरी अध्याय में माइकल जे शाक लिखता है;

"जज ने अगस्त स्पाइस से पूछा, आपको फांसी कि सज़ा क्यों ना दी जाए, आपको कुछ कहना है? 'मैं एक वर्ग के प्रतिनिधि की हैसियत से दूसरे वर्ग के प्रतिनिधि से बोल रहा हूँ. उसकी आवाज गरिमापूर्ण, ऊँची और चीरती हुई थी...अगर आप लोग सोचते हैं कि हमें फांसी पर लटकाकर आप मज़दूर आन्दोलन को कुचल देंगे तो आओ, आगे बढ़ो, हमें फांसी पर लटका दो. .. सतह के नीचे एक ज्वाला धधक रही है जिसे आप और आपका निज़ाम बुझा नहीं पाएगा...मेरे विचार मुझे बहुत प्रिय हैं, मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता. अगर सच बोलने की सज़ा फांसी है तो हमें मंज़ूर है. मैं ख़ुशी से ये क़ीमत चुकाने को तैयार हूँ...बुलाओ अपने जल्लाद को. सच्चाई के लिए फांसी चढ़े सुकरात, ईसा मसीह, गिओरदानो ब्रूनो, गैलिलिओ आज भी जिंदा हैं. हमें ये रास्ता इन्होने और इनके जैसे अनेक क्रांतिकारियों ने दिखाया है और हम ख़ुशी से इस रास्ते पर चलने को तैयार हैं.."

मई दिवस जिंदाबाद
शिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम
दुनिया के मजदूर एक हो

Tuesday, 26 April 2022

बेरोजगारी

बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ते जा रही है- यह मुख्यरूप से किसकी असफलता को दर्शाता है? सरकार की, पूँजी मालिको की, जिनके पास सारे उत्पादन के साधन है या पूंजीवादी व्यवस्था की? चूंकि बेरोजगारी के लिये मुख्य रूप से पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है इसलिये बेरोजगारी दूर करने का संघर्ष समाजवाद के लिये संघर्ष से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

चिंता - - वरवर राव


———
मैंने बम नहीं बाँटा था
ना ही विचार
तुमने ही रौंदा था
 चींटियों के बिल को
नाल जदेक जूतों से ।

रौंदी गयी धरती से
तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा

मधुमक्खीयों के छत्तों पर
तुमने मारी थी लाठी
अब अपना पीछा करती मधुमक्खीयों की गूँज से
काँप रहा है तुम्हारा दिल ।

आँखों के आगे अंधेरा है
उग आए हैं तुम्हारे चेहरे पर भय के चकत्ते ।

जनता के दिलों में बजते हुए
 विजय- नगाड़ों को
तुमने समझा था मात्र एक ललकार और
तान दीं उस तरफ़ अपनी बंदूक़ें
अब दसों दिशाओं से आ रही है
क्रांति की पुकार ।
                                

Monday, 25 April 2022

'लेनिन एक मानव' ■/ एन. क्रुप्सकाया



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लेनिन पूरे तौर से एक क्रांतिकारी मार्क्सवादीऔर सामूहिकतावादी थे। उनका सारा जीवन और कार्य एक ही महान् लक्ष्य के लिए अर्पित था - समाजवाद को विजयी बनाने के लक्ष्य के लिए। इसकी छाप उनके समस्त विचारों और भावनाओं पर थी। उस क्षुद्रता, निकृष्ट ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिशोध-भाव, मिथ्या अहंकार और आडंबर का उनमें लेशमात्र भी चिन्ह नहीं था जो छोटी सम्पत्तिवादी मनोवृत्ति रखने वाले व्यक्तिवादियों में इतनी प्रचुरता से पाया जाता है।

लेनिन डटकर लड़ते थे, वे तीखे सवाल पूछते थे ; बहस के दौरान कभी कोई व्यक्तिगत चीज वे नहीं उठाते थे , बल्कि प्रश्नों पर सदैव विषय के महत्व के अनुसार विचार करते थे ; और यही वजह थी कि साथी उनके तीखे ढंग का अक्सर बुरा नहीं मानते थे । वे लोगों को बहुत नजदीक से समझने की कोशिश करते थे , उनको जो कुछ कहना होता था उसे सुनते थे , उनकी बात के सार का समझने की चेष्टा करते थे और इसीलिए महत्वहीन बातों की भूल-भुलैयों के बीच भी आदमी की असलियत को हृदयंगम करने में वे सफल हो जाते थे। लोगों के साथ वे अद्भुत संवेदना के साथ बातें करते थे, और उनके अंदर उस चीज को ढूंढ लेते थे जो कल्याणकारी और मूल्यवान होती थी और जिसका सामान्य लक्ष्य के हित में उपयोग किया जा सकता था।

मैं अक्सर देखती थी कि इलिच से मिलने के बाद लोग बदल जाते थे , और इसकी वजह से साथी इलिच से प्रेम करते थे और इलिच खुद भी लोगों के साथ अपनी मुलाकातों के जरिए जितना ज्ञान प्राप्त कर लेते थे उतना बहुत ही कम लोग कर सकते थे । जीवन से, दूसरे लोगों से, हर कोई नहीं सीख सकता। पर इलिच जानते थे कि उनसे कैसे सीखा जाये। लोगों के साथ बातचीत में दांवपेंच , अथवा कूटनीति का वे कभी नहीं इस्तेमाल करते थे; वे उनके साथ छल - कपट कभी नहीं करते थे, और उनकी सच्चाई तथा स्पष्टवादिता को लोग समझते थे।

अपने साथियों का वे बेहद ख्याल रखते थे । चाहे वे जेल में हों, चाहे बाहर , चाहे जलावतनी की हालत में, चाहे प्रवास में, और चाहे उस समय जबकि जन मंत्री परिषद के वे अध्यक्ष निर्वाचित हो चके थे, अपने साथियों की उन्हें हमशा फिक्र रहती थी। वे केवल अपने साथियों की ही नहीं , बल्कि ऐसे सर्वथा अपरिचित लोगों की भी फिक्र रखते थे जिन्हें उनकी सहायता की जरूरत होती थी। इलिच का एकमात्र पत्र जो मेरे पास बच रहा है उसमें निम्न शब्द लिखे है : " सहायता के लिए तुम्हारे पास कभी-कभी जो पत्र आते हैं उन्हें मैं पढ़ता हूं और उनके संबंध में जो भी संभव होता है उसे करने की कोशिश करता हूं ।"  यह 1919 के ग्रीष्म काल की बात है , उस समय की जिस समय कि इलिच के पास फिक्र करने के लिए जरूरत से ज्यादा चीजें थीं। गृह - युद्ध चरम शिखर पर था। उसी पत्र में उन्होंने लिखा था: " लगता है कि श्वेत गाडों ने फिर क्राइमिया पर कब्जा कर लिया है।" उनके हाथ काम से बुरी तरह भरे रहते थे, किंतु लोगों की मदद करने का सवाल जब भी उठा इलिच को यह कहते कभी मैंने नहीं सना कि उनके पास समय नहीं है। 

वे मुझसे हमेशा कहते रहते थे कि जिन साथियों के साथ मैं काम करती थी उनका मुझे और अधिक ख्याल रखना चाहिए; और, एक बार, पार्टी मेम्बरों की काट - छांट तथा सफाई के दौर में जन शिक्षा मंत्रालय के मेरे एक कार्यकर्ता पर जब अन्यायपूर्ण ढंग से हमला किया गया था, तो समय निकालकर पुराने प्रकाशनों की उन्होंने खुद जांच पड़ताल की थी और ऐसी सामग्री ढूंढ निकाली थी जो इस बात की पुष्टि करती थी कि उक्त कार्यकर्ता ने अक्टूबर से पहले भी, जब वह ' बुंद ' का सदस्य था, बोल्शेविकों की ही हिमायत और तरफदारी की थी।

कुछ लोग कहते हैं, लेनिन दयालु थे। किन्तु ' पुण्य ' की पुरानी शब्दावली से लिया गया यह ' दयालु ' शब्द इलिच के स्वभाव से मेल नहीं खाता, वह कुछ अपर्याप्त और त्रुटिपूर्ण लगता है। 

पारिवारिक जत्थेबंदी अथवा दलबंदी की भावना, जो उन पुराने दिनों में इतनी आम थी, इलिच में बिल्कुल नहीं थी। व्यक्तिगत को सामाजिक से कभी वे अलग नहीं रखते थे। उनके जीवन में वह सब एक ही चीज थी। ऐसी किसी स्त्री से कभी वे प्रेम न कर पाते जिसके विचार स्वयं उनके विचारों से भिन्न होते, जो काम में उनकी सहयोगिनी न होती। लोगों के साथ वे गहरी मित्रता के बंधनों में बंध जाते थे। प्लेखानोव के प्रति, जिनसे उन्होंने इतना कुछ सीखा था, उनकी अनुरक्ति इस चीज की एक अच्छी मिसाल थी, किंतु जब उन्होंने देखा कि प्लेखानोव गलती कर रहे हैं, उनका दृष्टिकोण लक्ष्य को नुकसान पहुंचा रहा है तो उनकी यह अनुरक्ति प्लेखानोव के खिलाफ निर्मम संघर्ष छेड़ने के मार्ग में कभी बाधा न बन सकी; प्लेखानोव जब सुरक्षावादी बन गये तो उनके प्रति इलिच का प्रेमभाव उनसे पूर्णरूप से संबंध विच्छेद करने के मार्ग में बाधक न बन सका। 

सफल काम को देखकर इलिच को बहुत खुशी होती थी । लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया जाने वाला काम ही उनके जीवन का मुख्य संबल था, वही वह चीज थी जिससे वे मुहब्बत करते थे और अत्यधिक प्रभावित होते थे । लेनिन आम लोगों के अधिक से अधिक नजदीक पहंचने की कोशिश करते थे और इसमें वे कामयाब भी होते थे। मजदूरों के साथ नजदीकी संबंध रखने से उन्हें अत्यधिक बल मिलता था। इसकी वजह से सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के संबंधित कामों की हर मंजिल में उन्हें वास्तविक समझदारी प्राप्त होती रहती थी। यदि हम ध्यानपूर्वक अध्ययन करें कि अध्ययनार्थी के रूप में, प्रचारक के रूप में, विद्वान के रूप में, संपादक और संगठनकर्ता के रूप में लेनिन किस प्रकार काम करते थे, तो मानव के रूप में भी हम उन्हें अच्छी तरह समझ जाएंगे।

- एन. क्रुप्सकाया (1869-1939)
(रूसी क्रांतिकारी व राजनीतिज्ञ, लेनिन की जीवनसाथी)
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PSO: Progressive students organisation

Friday, 22 April 2022

फूलन देवी की हत्या करने वाले शेर सिंह राणा पर फिल्म

नारी अधिकार और स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए अपना बलिदान देने वाली देश की पूर्व सांसद, लोकप्रिय नेता वीरांगना फूलन देवी की हत्या करने वाले शेर सिंह राणा पर फिल्म आ रही है। देश के सभी जागरूक लोगों को इस फिल्म का विरोध करना चाहिए। यह फिल्म देश की व्यवस्था पर एक जोरदार तमाचा है। इस फिल्म को नहीं रोका गया तो देश का बच्चा-बच्चा सड़कों पर आएगा।

शेर सिंह राणा को किस लिए हीरो बनाया जा रहा है क्या इसलिए कि वीरांगना फूलन देवी पिछड़ी जाति की थीं या इसलिए कि उन्होंने वर्ण व्यवस्था और ऊंच-नीच पोषण करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था और ब्राह्मण-वैदिक मत से त्रस्त आकर बुद्ध की शरण में जाकर बौद्ध मत स्वीकार कर लिया था।

कहां सो रहे हो तथाकथित बहुजनवादी, पिछड़ावादी पार्टियों के नेताओं डूब कर मर क्यों नहीं जाते। 

शेर सिंह राणा को हीरो बनाने का प्रयास करने वाली इस फिल्म का विरोध अभी तक किसी भी देश के बहुसंख्यक समाज की पार्टी अर्थात पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली पार्टी ने नहीं किया।

मैं फिल्म निर्माता, डायरेक्टर, सेंसर बोर्ड सभी को चेतावनी देता हूं कि हमारे समाज की शान वीरांगना फूलन देवी के हत्यारे को हीरो बनाने वाली यह फिल्म तुरंत वापस होनी चाहिए अन्यथा अच्छा नहीं होगा।

~संतोष शाक्य


कायर शेर सिंह राणा

ऐसे ही अमानवीय जातिवादी सामंतियो को प्राचीन काल से नायक बनाने की भारतीय इतिहास में परंपरा चली आ रही है. अपनी अस्मिता लूटने वालों को मौत के घाट उतारने वाली फूलन देवी को यहाँ दुर्गा अवतार इसलिये घोषित नहीं किया जायेगा क्योंकि वो मनुवादी वर्णव्यवस्था मे उपर की दो जातियों(ब्राह्मण या क्षत्रिय) मे नहीं आती. अपितु चौथे शूद्र वर्ग मे आती हैं. और उनके साथ कई दिनों तक ब्लातकार करने वाले ठाकुर/क्षत्रिय समाज के थे. जिन्हें मारकर फूलन ने अपना बदला लिया था. 

कायर शेर सिंह राणा जो उस स्थान से भी नहीं आता जहाँ ये घटना घटी थी. लेकिन जाति की भावना मे बहकर उसने फूलन देवी की धोखे से हत्या कर दी. इस कुकर्म को क्षत्रिय समाज ने अपने अपमान का प्रतिशोध समझकर शेर सिंह को हर आर्थिक, कानूनी सहायता प्रदान कर उसे बचा लिया. भाजपा के एक ठाकुर नेता ने उससे अपनी कन्या ब्याह दी. अब भी मन नहीं भरा था तो पूरे बहुजन समाज(दलित, पिछड़े, अदिवासी) को और सामंतवादी जूता भिगोकर मारने के लिए ये फिल्म ही बनवा दी. क्योंकि इन्हें पता है बहुजनों का अधिकांश हिस्सा हिंदू बनकर लात खाने और मंदिर से भगाने पर भी बहुत खुश है. 

याद कीजिये जब 'पद्मावत' फिल्म आई थी तो राजपूत सेना, करणी सेना सहित बहुत से सामंती संगठनों ने देश भर इस फिल्म के विरोध में ताण्डव किया था. और तर्क दिया था कि इससे राजपूत समाज की भावनाएं आहत हुई हैं. दीपिका पादुकोण के नाक काटने पर करोड़ों के ईनाम की इन्हीं संगठनों ने घोषणा की थी. भारत सरकार और अन्य कुछ राज्यों की सरकारों का इन्हें मौन समर्थन प्राप्त था.

क्या आज बहुजन समाज(पिछड़े, दलित, शोषित, आदिवासी) की भावनाएं इससे आहत नहीं होंगी?? यही समाज तो भारत मे बहुसंख्यक है. यदि बहुजनों ने इसका बहिष्कार कर दिया तो फिर किसी खुरापाती फिल्म निर्माता ऐसा अमानवीय निर्णय नहीं लेगा.

                    ✍️Shiva Nand Yadav 
       (शोधछात्र, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर)