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Friday, 14 August 2020

सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्षेविक) का इतिहास

चौथा अध्याय

स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में मेन्शेविक और बोल्शेविक। बोल्शेविकों द्वारा स्वतंत्र मार्क्सवादी पार्टी का निर्माण।

(1908-1912)

 

1.   स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद। विरोधी बुद्धिजीवियों में फूट। पतन। पार्टी के बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का .मार्क्सवाद   के दुश्मनों से जाकर मिलना और .मार्क्सवाद   के सिद्धांत में संशोधन करने के प्रयत्न। लेनिन द्वारा अपनी पुस्तक 'भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना' में संशोधनवादियों का खण्डन और मार्क्सवादी पार्टी के सैद्धांतिक आधारों का समर्थन।

ज़ार सरकार ने 3 जून 1907 को, दूसरी राज्य दूमा भंग कर दी। इतिहास में इसे आम तौर से 3 जून का बलपूर्वक सत्ताहरण कहते हैं। ज़ार सरकार ने तीसरी राज्य दूमा के चुनाव के लिये एक नया कानून बनाया। इस तरह, उसने 17 अक्तूबर के खुद अपने घोषणापत्र को तोड़ा, जिसमें कहा गया था कि दूमा की सहमति से ही नये कानून जारी किये जा सकेंगे। दूसरी दूमा के सोशल-डेमोक्रेटिक गुट के सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया। मज़दूर वर्ग के प्रतिनिधियों को सख्त मेहनत और निर्वासन का दण्ड मिला।

नये चुनाव-कानून का मसौदा इस तरह तैयार किया गया कि दूमा में जमींदारों और व्यापारी और औद्योगिक पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों की तादाद काफ़ी बढ़ जाये।

       इसके साथ ही, किसानों और मजदूरों का प्रतिनिधित्व, जो पहले ही कम था, अब पहले की संख्या का बहुत ही छोटा सा अंश कर दिया गया।

तीसरी दूमा में यमराज सभाओं और काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों की बहुतायत थी। कुल 442 प्रतिनिधियों में, 171 दक्षिण पंथी 1⁄4यमराज सभा वाले1⁄2, 113 अक्तूबर पंथी या इन्हीं जैसे गुटों के सदस्य, 101 काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों या इन्हीं जैसे गुटों के सदस्य, 13 त्रुदोविक और 18 सोशल-डेमोक्रैट थे।

दक्षिण पंथी (दूमा में दाहिनी तरफ़ बैठने की वजह से उनका यह नाम पड़ा था) मजदूरों और किसानों के सबसे कट्टर दुश्मनों - यमराज सभा वाले सामंती जमींदारों - के प्रतिनिधि थे। इन कट्टर दुश्मनों ने किसान आन्दोलन का दमन करते हुए, किसानों को सामूहिक तौर से बेतों से पीटा और गोलियों से उड़ाया था। ये यहूदियों के कत्लेआम, प्रदर्शनकारी मजदूरों को पीटने, क्रांति के दौर में सभा-स्थलों को बर्बरता से जलाने के संगठनकर्ता थे। दक्षिण पंथियों का मत था कि मेहनतकश जनता का खूब कठोरता से दमन किया जाये और ज़ार के पास अपरिमित अधिकार हों। 17 अक्तूबर 1905 के ज़ार के घोषणापत्र का वे विरोध करते थे।

अक्तूबर पंथी पार्टी, या 17 अक्तूबर का यूनियन, दूमा में दक्षिण पंथियों का निकट अनुवर्ती था। अक्तूबर पंथी बड़ी औद्योगिक पंूजी के हितों और पंूजीवादी ढंग से अपनी रियासतें चलाने वाले बड़े जमींदारों के हितों के प्रतिनिधि थे (1905 की क्रांति के आरंभ में बड़े जमींदारों की एक भारी तादाद जो पहले काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी में थी, अक्तूबर पंथियों की ओर हो गयी)। अक्तूबर पंथियों को जो बात दक्षिण पंथियों से अलग जाहिर करती थी, वह 17 अक्तूबर के घोषणापत्र की स्वीकृति - वह भी सिर्फ शब्दों में - थी। अक्तूबर पंथी ज़ार सरकार की घरेलू और वैदेशिक नीति का पूरी तरह समर्थन करते थे।

पहली और दूसरी दूमा के मुकाबिले में, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी को तीसरी दूमा में कम सीटें मिलीं। इसका सबब यह था कि जमींदारों के वोट का एक हिस्सा काॅन्स्टीटयूशनल, डेमोक्रेटिक के बदले अक्तूबर पंथियों को मिल गया था।

तीसरी दूमा में मध्यवित्त जनवादियों का एक छोटा गुट था, जिसे त्रुदोविक कहते थे। वे काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों और लेबर-डेमोक्रेटों (बोल्शेविकों) के बीच में फिसलते रहते थे। लेनिन ने बतलाया था कि हालांकि त्रुदोविक दूमा में बहुत ही कमज़ोर थे, फिर भी वे आम जनता के, किसान जनता के प्रतिनिधि थे। काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों और लेबर-डेमोक्रेटों के बीच त्रुदोविकों का फिसलना, छोटे मालिकों की वर्ग-स्थिति का लाजिमी नतीजा था। लेनिन ने बोल्शेविक प्रतिनिधियों, लेबर-डेमोक्रेटों के सामने यह काम रखा कि वे "कमजोर मध्यवित्त जनवादियों की मदद करें, उन्हें उदार पंथियों के असर से निकाल लें, सिर्फ दक्षिण पंथियों के खिलाफ नहीं, बल्कि क्रांति-विरोधी काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों के खिलाफ भी जनवादी खेमें को बटोरें...।")लेनिन सं.ग्र . , अं.सं., मास्को, 1947, खण्ड1, पृ. 535)

1905 की क्रांति के दौर में, और उसकी हार के बाद खास तौर से, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों ने दिन पर दिन जाहिर कर दिया कि वे एक क्रांति-विरोधी शक्ति हैं। अधिकाधिक अपनी 'जनवादी' नकाब उतारते हुए, वे वस्तुतः सम्राटवादियों की तरह, ज़ारशाही के समर्थकों की तरह, काम करने लगे। 1909 में, प्रमुख काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेट लेखकों के एक गुट ने एक लेख-संग्रह छापा, जिसका नाम था वेखी (मार्ग-चिन्ह)। इसमें पूंजीपतियों की तरफ से उन्होंने ज़ार का शुक्रिया अदा किया कि उसने क्रान्ति को कुचल दिया है। लाठी और फांसी की सरकार ज़ार की हुकूमत के सामने घुटने टेकते हुए और जीभ निकालते हुए, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रैटों ने इस किताब में सीधे-सीधे लिख दिया कि "हमें इस सरकार की जय मनानी चाहिये, जो अपनी संगीनों और जेलों की बदौलत जनता के क्रोध से हमारी ( उदार पंथी पूंजीपतियों की) एकमात्र रक्षक है।"

दूसरी राज्य दूमा भंग करने के बाद और दूमा के सोशल-डेमोक्रेटिक गुट का ठिकाना लगाने के बाद, ज़ार सरकार जोश के साथ सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक और आर्थिक संगठनों को तोड़ने में लग गयी। सख्त मेहनत के जेलखाने, किले और निर्वासन की जगहें क्रांतिकारियों से ठसाठस भर गयीं। जेलखानों में वे निर्दयता से पीटे जाते थे और उन्हें तरह-तरह से यंत्रणा और यातनायें दी जाती थीं। यमराज सभाओं का आतंक बेरोकटोक जारी रहा। ज़ार के मंत्री स्तोलिपिन ने सारे देश में फांसी के तख्ते लगा दिए। कई हज़ार क्रांतिकारियों को मार डाला गया। उन दिनों फांसी का नाम 'स्तोलिपिन की नैकटाई' पड़ गया था।

मजदूरों और किसानों के क्रांतिकारी आन्दोलन को कुचलने की कोशिश में, ज़ार सरकार अपना काम दमन, सज़ा के दस्ते, गोलीकाण्ड, जेल और सख्त मेहनत की सज़ाओं तक सीमित न रख सकी। उसने भय के साथ महसूस किया कि 'छोटे पिता, ज़ार' में किसानों की भोली भाली श्रद्धा बराबर खत्म हो रही है। इसलिये, उसने एक बड़ा पैंतरा चलने का विचार किया। उसने अपने लिये देहात में ग्रामीण पूंजीपतियों के बडे़ वर्ग, धनी किसानों, में अपने लिये दृढ़ समर्थक पैदा करने की सोची।

9 नवम्बर 1906 को, स्तोलिपिन ने एक नया खेती का कानून बनाया, जिससे कि किसान कम्यून छोड़ सकते थे और अलग खेती कर सकते थे। स्तोलिपिन के कृषि-कानून ने सामूहिक भूमि-अधिकार की व्यवस्था तोड़ दी। किसानों से कहा गया कि वे अपने हिस्सों पर निजी सम्पत्ति की तरह अधिकार कर लें और कम्यूनों से अलग हो जायें। अब वे अपने हिस्से बेच सकते थे, जिसके लिये पहले उन्हें आज्ञा न थी। जब किसान अपना कम्यून छोड़ता था, तब कम्यून इसके लिये वाध्य था कि ज़मीन का एक मिला-जुला टुकड़ा (खुतोर, अत्रूब) उसे दे।

धनी किसानों - कुलकों - को अब अवसर मिला कि कम कीमत पर गरीब किसानों की ज़मीन खरीद लें। कुछ ही साल कानून चालू हुआ था कि दस लाख से ऊपर गरीब किसान अपनी ज़मीन से पूरी तरह हाथ धो बैठे और एकदम तबाह हो गये। जैसे-जैसे ग़रीब किसानों के हाथ से उनकी ज़मीन गयी, वैसे-वैसे कुलकों के खेत बढ़ने लगे। कहीं-कहीं पर बाकायदा रियासतें बन गयीं, जहां बडे़ पैमाने पर किराये की मज़दूरी - खेत मजदूरों - से काम कराया जाता था। सरकार किसानों को मजबूर करती थी कि कम्यून की सबसे अच्छी जमीन कुलक किसानों को दी जाये।

किसानों की 'मुक्ति' के दौरान में, जमींदारों ने किसानों से उनकी जमीन लूट ली थी। अब कुलक कम्यूनों से उनकी जमीन लूटने लगे। वे सबसे अच्छी जमीन पाने लगे और कम कीमत पर गरीब किसानों के हिस्से खरीदने लगे।

ज़ार सरकार ने जमीन खरीदने के लिये और अपने खेत सुसज्जित करने के लिये कुलकों को भारी रकमें उधार दीं। स्तोलिपिन चाहता था कि कुलक छोटे जमींदार बन जायें, निरंकुश ज़ारशाही के वफादार समर्थक बन जायें।

1906-'15 तक, नौ वर्षों में ही बीस लाख से ऊपर कुटुम्ब कम्यूनों से अलग हुए।

जिन किसानों के पास ज़मीन के छोटे हिस्से आये थे, उनकी और ग़रीब किसानों की हालत स्तोलिपिन की नीति के फलस्वरूप पहले से भी बदतर हो गयी। किसानों में अलगाव की प्रक्रिया और स्पष्ट दिखाई देने लगी। किसान कुलकों से टक्कर लेने लगे। इसके साथ ही, किसानों ने अनुभव किया कि वे रियासती जमीन पर तब तक क़ब्जा न पायेंगे जब तक कि ज़ार सरकार, जमींदारों और काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों की राज्य दूमा बनी रहेगी।

जिस समय एक बड़ी तादाद में कुलक फ़ार्म बन रहे थे, उस समय (1907-'09) किसान आन्दोलन मन्द पड़ने लगा था। लेकिन तुरंत बाद ही, 1910, 1911 में और उसके बाद गांव के कम्यून के सदस्यों और कुलकों की टक्करों की वजह से जमींदारों और कुलकों के खिलाफ किसान आन्दोलन की तेज़ी बढ़ गयी।

क्रान्ति के बाद, उद्योग-धंधों में भी बडे़ परिवर्तन हुए। उद्योग-धंधों का केन्द्रीयकरण, यानी दिन पर दिन शक्तिशाली, बनते हुए पूंजीवादी गुटों के हाथ में उद्योग-धंधों का केन्द्रीयकरण और कारखानों का विशाल बनना, और तेज़ी के साथ हुआ। 1905 की क्रांति के पहले भी, पूंजीपति इस उद्देश्य से संघ बनाने लगे थे कि देश में चीजों का भाव ऊंचा किया जाये और इस तरह जो भारी मुनाफे मिलें उनसे निर्यात व्यापार में बढ़ती की जाये। इस तरह, वे चाहते थे कि विदेश में कम कीमत पर अपना माल भर दें और विदेशी बाज़ारों पर क़ब्जा कर लें। पूंजीपतियों के ये संघ (मोनोपली), टंस्ट और सिण्डिकेट कहलाते थे। क्रांति के बाद, उनकी संख्या और भी बढ़ गयी। बडे़ बैंकों की तादाद में भी बढ़ती हुई। उद्योग-धंधों में इनकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो गयी। रूस में विदेशी पूंजी का आयात बढ़ गया।

इस तरह, रूस में पूंजीवाद बढ़ते हुए पैमाने पर इज़ारेदार पूंजीवाद, साम्राज्यवादी पंूजीवाद बन रहा था। कई साल के गतिरोध के बाद, उद्योग-धंधे फिर से चेतने लगे। कोयला, धातुएं, तेल, सूती कपड़ा और शक्कर की पैदावार बढ़ गयी। गल्ले का निर्यात व्यापार बहुत बडे़ पैमाने पर होने लगा।

हालांकि रूस ने इस समय कुछ औद्योगिक उज्डाति की, फिर भी पच्छिमी यूरोप के मुकाबिले में वह पिछड़ा हुआ था और अब भी विदेशी पूंजीपतियों पर निर्भर था। रूस मशीनें और मशीनों के पुर्जे न बनाता था - वे बाहर से मंगवाये जाते थे। उसके पास मोटरों के या रसायन के धंधे न थे। नकली खाद भी वहां तैयार न होती थी। लड़ाई का सामान तैयार करने में भी रूस दूसरे पूंजीवादी देशों से पिछड़ा हुआ था।

लेनिन ने बतलाया था कि धातुओं के खर्च के स्तर का नीचा होना देश के पीछडे़ होने की निशानी है। लेनिन ने लिखा था:

"किसानों की मुक्ति के बाद, पचास साल में रूस में लोहे का खर्च 5 गुना बढ़ा है। फिर भी, रूस अभूतपूर्व ढंग से और अविश्वसनीय रूप से पिछड़ा हुआ निर्धन और अर्द्ध-संस्कृत है। इंग्लैंड के मुकाबिले में, पैदावार के आधुनिक साधन उसके पास एक चैथाई है, जर्मनी के मुकाबिले में 1/5 और अमरीका के मुकाबिले में 1/10 है।" (लेनिन ग्रंथावली, रू.सं., खण्ड 16, पृष्ठ 543)

रूस के आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछडे़ होने का एक सीधा परिणाम यह था कि रूसी पूंजीवादी और खुद ज़ारशाही दोनों ही पच्छिमी यूरोप के पूंजीवाद पर निर्भर थे।

यह इस बात से ज़ाहिर होता था कि ऐसे महत्वपूर्ण उद्योग-धंधे जैसे कि कोयला, तेल, बिजली का सामान और धातुओं की पैदावार - ये सब विदेशी पूंजी के हाथ में थे। ज़ारशाही रूस को अपने लिये लगभग सभी मशीनें और मशीनों का सामान बाहर से मंगवाना पड़ता था।

यह इससे भी ज़ाहीर होता था कि विदेशी ऋण की बेड़ी पड़ी हुई थी। इस ऋण का ब्याज देने के लिये, ज़ारशाही हर साल जनता से करोड़ों रूबल दुह लेती थी।

इसके अलावा, यह इस बात से ज़ाहिर होता था कि रूस के 'मित्रों' से गुप्त संधियां की गयी थीं जिनसे ज़ार सरकार ने वायदा किया था कि लड़ाई होने पर लाखों रूसी सिपाही साम्राज्यवादी मोर्चों पर 'मित्रों' की मदद के लिये और अंगे्रज और फ्रांसीसी पूंजीपतियों के भारी मुनाफों की रक्षा करने के लिये पहुंच जायेंगे।

स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में, हथियारबन्द सिपाहियों और पुलिस ने खास तौर से मज़दूर वर्ग पर खूंखार हमले किये। ज़ार के उकसावा पैदा करने वाले जासूसों ने और यमराज सभा के गुण्डों ने हमले किये। लेकिन, अकेले ज़ार के लगुओं-भगुओं ने ही मजदूरों को परेशान नहीं किया और सताया बल्कि इस मामले में कारखानेदारों और मिलमालिकों ने भी कम जोश नहीं दिखलाया। औद्योगिक गतिरोध और बढ़ती हुई बेकारी के दिनों में मजदूर वर्ग के खिलाफ़ इनके हमले ने खास तौर से जोर पकड़ा। कारखानेदारों ने तालेबन्दी का ऐलान किया और वर्ग चेतन मजदूरों की, जो हड़तालों में सक्रीय हिस्सा लेते थे, काली फे़हरिस्तें बनाई। एक बार आदमी का नाम इन फ़ेहरिस्तों में आ जाये तो किसी खास धंधे के कारखानेदारों के संघ के कारखाने में उसे काम न मिल सकता था। 1908 में ही, तनख्वाह में दस से पन्द्रह फ़ीसदी तक कटौती हुई। हर जगह काम के घण्टे 10 से 12 तक बढ़ा दिए गये। भारी जुर्माने करने की प्रथा फिर ज़ोरों से चल पड़ी।

1905 की क्रांति की पराजय से, क्रांति के सहयात्रियों की पांति में विघटन और पतन का सिलसिला शुरू हो गया। खास तौर से बुद्धिजीवियों में अस्वस्थ और पतनशील रुझान बढ़ चले। जो सहयात्री पूंजीवादी खेमें से क्रांति की उठान के दिनों में आन्दोलन के साथ आ गये थे, वे प्रतिक्रियावाद के दिनों में पार्टी से अलग हो गये। उनमें से कुछ ने क्रांति के खुले दुश्मनों का साथ दिया। दूसरे लोग अब तक के बचे-खुचे क़ानूनी तौर से चलने वाले मजदूर वर्ग के सभा-समाजों में जम गये। वे कोशिश करने लगे कि सर्वहारा वर्ग को क्रान्ति के रास्ते से हटा दें और सर्वहारा वर्ग की क्रांन्तिकारी पार्टी को बदनाम करें। क्रांति का साथ छोड़ कर, सहयात्री कोशिश करने लगे कि वे प्रतिक्रियावादियों के स्नेहभाजन बनें और ज़ारशाही के साथ शान्ति का सम्बन्ध कायम करके दिन बितायें।

ज़ार सरकार ने क्रान्ति की हार से फायदा उठाकर, क्रांति के सहयात्रियों में से जो ज्यादा कायर और स्वार्थी थे, उन्हें अपना उकसावा पैदा करने वाला जासूस बनाया। ये नीच गद्दार ज़ार की ओखराना की तरफ से मजदूर वर्ग और पार्टी-संगठनों में भेजे जाते थे, जहां वे भीतर घुस कर जासूसी करते थे और क्रांतिकारियों को पकड़वा देते थे।

क्रांति-विरोध का हमला सैद्धान्तिक मोर्चे पर भी हुआ। ऐसे फै़शनेबिल लेखकों का पूरा गिरोह सामने आया जो .मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करता था और उसका 'खण्डन' करता था। यह गिरोह क्रान्ति का मज़ाक बनाता था, उसकी खिल्लियंा उड़ाता था, गद्दारी की तारीफ़ करता था और 'व्यक्तिवाद' के नाम पर कामुक दुराचार की तारीफ करता था।

दर्शन के क्षेत्र में .मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करने और उसमें संशोधन करने की कोशिशें बढ़ती गयीं। अर्द्ध-वैज्ञानिक सिद्धांतों का नक़ाब ओढे़, तरह-तरह के मज़हबी सुझाव भी सामने आये।

.मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करना फ़ैशन में शामिल हो गया।

इन सभी सज्जनों का उद्देश्य एक ही था, हालांकि उनके लिबास अलग-अलग थे। वह उद्देश्य था - जनता को क्रान्ति के रास्ते से हटाना।

पतनशीलता और सन्देहवाद का असर पार्टी-बुद्धीजीवियों के एक हिस्से पर भी पड़ा। ये वे लोग थे जो अपने को मार्क्सवादी कहते थे, लेकिन .मार्क्सवाद   के कभी दृढ़ समर्थक न रहे थे। इनमें बुग्दानोव, बज़ारोव लूनाचास्र्की (जिसने 1905 में बोल्शेविकों का साथ दिया था), यूश्केविच और वलेन्तिनोव (ये दोनों मेन्शेविक थे) जैसे लेखक थे। इन्होंने एक तरफ़ तो अपनी आलोचना का हल्ला मार्क्सवादी सिद्धांत के दार्शनिक आधार, यानी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, के खिलाफ़ बोला और साथ ही दूसरी तरफ़ ऐतिहासिक विज्ञान के बुनियादी मार्क्सवादी उसूलों यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद के खिलाफ़ बोला। आम तौर से जो आलोचना होती थी, उससे यह आलोचना इस बात में भिज्डा थी कि वह खुलकर और मैदान में आकर न की जाती थी। वह नक़ाब डाल कर  और बेईमानी से .मार्क्सवाद   के बुनियादी उसूलों के 'समर्थन' के बहाने की जाती थी। ये लोग दावा करते थे कि मुख्यतः वे मार्क्सवादी हैं, लेकिन .मार्क्सवाद   को और 'उन्नत' करना चाहते हैं। वे उसे उज्डात करना चाहते थे, उसके कुछ बुनियादी उसूलों को निकाल कर। वास्तव में, वे .मार्क्सवाद   के विरोधी थे। उन्होंने उसके सैद्धांतिक आधार को कमज़ोर बनाने की कोशिश की, हालांकि वे बेईमानी से .मार्क्सवाद   का विरोधी होना मंजूर न करते थे। वे दुरंगी नीति से अपने को मार्क्सवादी कहते थे। इस बेईमानी से भरी हुई आलोचना का खतरा इस बात में था कि उससे पार्टी के साधारण सदस्य बरगलाये जा सकते थे और वे रास्ते से भटक सकते थे। .मार्क्सवाद   के सैद्धांतिक आधार को कम़जोर बनाने के उद्देश्य से, यह आलोचना जितनी ही धूर्ततापूर्ण बनती गयी, उतनी ही वह पार्टी के लिये ज्यादा खतरनाक बनती गयी। कारण यह कि वह उतनी ही पार्टी के खिलाफ, क्रान्ति के खिलाफ, प्रतिक्रियावादियों के आम आन्दोलन से घुल-मिल गयी। कुछ बुद्धिजीवी, जो .मार्क्सवाद   से नाता तोड़ चुके थे, एक नया धर्म तक क़ायम करने का समर्थन करने लगे (ये लोग 'देवताओं को खोजने वाले' और 'देवताओं को बनाने वाले' कहलाये)। मार्क्सवादियों के लिये यह बहुत जरूरी हो गया कि मार्क्सवादी सिद्धांत के प्रति इन गद्दारी करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाये, उनके चेहरों से नक़ाब खींच ली जाये, पूरी तरह उनका पर्दाफाश किया जाये और इस तरह मार्क्सवादी पार्टी के सैद्धांतिक आधार की रक्षा की जाये।

उम्मीद की जा सकती थी कि प्लेखानोव और उसके मेन्शेविक दोस्त, जो अपने को 'उच्चकोटि का मार्क्सवादी सिद्धांतकर' समझते थे, यह काम उठायेंगे, लेकिन उन्होंने अखबारी किस्म के एक दो आलोचनात्मक टिप्पणियों के छर्रे दाग कर ही मैदान छोड़ देना ज्यादा अच्छा समझा।

1909 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना में, यह काम लेनिन ने किया।

लेनिन ने लिखा था:

"छः महीने से भी कम में चार किताबें निकली हैं, जिनमंे, मुख्यतः और करीब-करीब अकेले द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर हमले किये गये हैं। इनमें सबसे पहले बज़ारोव, बुग्दानोव, लूनाचास्र्की, बरमान, हेलफोण्ड, यूश्केविच और सुवोरोव का लेख-संग्रह है। इसका नाम है - माक्र्सीय दर्शन का (ज्यादा उचित होता कि माक्र्सीय दर्शन के 'खिलाफ) अध्ययन यह शीर्षक होता (पीतरबुर्ग, 1908)। दूसरी किताब यूश्केविच की भौतिकवाद और आलोचनात्मक यथार्थवाद है। तीसरी बरमान की आधुनिक ज्ञान-मीमांसा के प्रकाश में द्वंद्ववाद है, और चैथी वलैन्तिनोव की .मार्क्सवाद   की दार्शनिक रूपरेखा... । ये सभी लोग तीव्र राजनीतिक मतभेद होते हुए भी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का विरोध करने में एक हैं। इसके साथ ही, वे अपने को दर्शन में मार्क्सवादी भी कहते हैं! बरमान का कहना है कि एंगेल्स का द्वंद्ववाद 'रहस्यवाद' है। बज़ारोव ने चलते-फिरते कहा है कि "एंगेल्स के विचार पुराने पड़ गये हैं", मानों यह कोई स्वयंसिद्ध बात हो। इस तरह, मालूम होता है कि हमारे साहसी योद्धाओं ने भौतिकवाद का खण्डन कर दिया है। ये लोग गर्व के साथ 'आधुनिक ज्ञान-मीमांसा' 'नवीन दर्शन' ) या 'पिछले दिनों का पौजिटिविज्म'), 'आधुनिक प्रकृति-विज्ञान के दर्शन', या 'बीसवीं सदी के प्रकृति-विज्ञान का दर्शन' का भी हवाला देते हैं। (लेनिन, "भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना", अं.सं., मास्को, 1947, पृष्ठ 9)

लूनाचास्र्की ने अपने दोस्तों - दर्शन शास्त्र के संशोधनवादियों - की हिमायत में कहा था: "शायद हम भटक गये हैं, लेकिन रास्ता ढूंढ़ रहे हैं।" लेनिन ने लूनाचास्र्की को जवाब देते हुए कहा था:

"जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मैं भी दर्शन शास्त्र में कुछ "ढूंढ रहा हंू।" इन टिप्पणियों (यानि भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना – सं.) में, मैंने अपने सामने यह काम रखा है कि इस बात का पता लगाऊं कि इन लोगों के सामने ऐसी कौन सी अड़चनें थीं जिनकी वजह से .मार्क्सवाद   के लिबास में इन्होंने जो कुछ पेश किया है, वह इतना उलझा हुआ, घपले में पड़ा हुआ और प्रतिक्रियावादी है कि उस पर विश्वास नहीं होता।" (उप., पृष्ठ 10)

वास्तव में लेनिन की किताब इस विनम्र कर्तव्य से बहुत आगे जा पहुंची। दरअसल, यह किताब बुग्दानोव, यूश्केविच, बज़ारोव और वलैन्तिनोव और उनके दर्शन-गुरुओं - अवेनारियस और माख - की आलोचना से बढ़ कर भी कुछ और है। ये दर्शन-गुरु कोशिश करते थे कि अपनी कृतियों में मार्क्सवादी भौतिकवाद के खिलाफ़ नफ़ीस और सुसंस्कृत भाववाद पेश करें। लेनिन की किताब में .मार्क्सवाद   के सैद्धांतिक आधार - द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद - का समर्थन भी है। एंगेल्स की मृत्यु से लेकर लेनिन की भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना के निकलने तक, इस समूचे ऐतिहासिक दौर में विज्ञान ने जो कुछ तत्व और महत्व की बातें ढूंढ निकाली थीं, और खास तौर से प्रकृती-विज्ञान ने ढूंढ निकाली थीं, उन सबसे लेनिन ने भौतिकवादी ढंग से आम नतीजे निकाल कर इस किताब में इकट्ठे किये थे।

 

इस किताब में रूसी अनुभवसिद्ध आलोचकों और उनके विदेशी गुरूओं की समुचित आलोचना करने के बाद, लेनिन ने दार्शनिक और सैद्धांतिक संशोधनवाद के बारे में निम्नलिखित नतीजे निकाले हैं:

(1)     ".मार्क्सवाद के लिबास में .मार्क्सवाद   को और भी चतुराई से झुठलाना, भौतिकवाद-विरोधी सिद्धान्तों को और भी चतुराई से पेश करना अर्थ शास्त्र में, कार्यनीति के सवालों पर और दर्शन शास्त्र में आम तौर से आधुनिक संशोधनवाद की यह विशेषता है।" (उप., पृष्ठ 342-43)

(2)    "माख और अवेनारियस की पूरी-पूरी विचारधारा भाववाद की तरफ़ बढ़ रही है।" (उप., पृष्ठ 370)

(3)     "हमारे सभी माखवादी भाववाद के जाल में फंस गये हैं।" 1⁄4उप., पृष्ठ 3591⁄21⁄441⁄2 "अनुभवसिद्ध आलोचना के तमाम ज्ञान सम्बन्धी शास्त्रार्थ के पीछे दर्शन के क्षेत्र में पार्टियों के संघर्ष को न देखना असंभव है। यह संघर्ष ऐसा है जो छानबीन करने पर अंत में मौजूदा समाज के विरोधी वर्गों के रुझान और विचारधारा को ज़ाहिर करता है।" (उप., पृष्ठ 371)

(4)    "अनुभवसिद्ध आलोचना की वस्तुगत, वर्गगत भूमिका पूरी तरह इस बात में है कि वह श्रद्धावादियों (प्रतिक्रियावादियों, जो श्रद्धा को विज्ञान से बढ़ कर मानते थे – सं.) की वफादारी से सेवा करती है यह सेवा भौतिकवाद के खिलाफ आम तौर से, और ऐतिहासिक भौतिकवाद के खिलाफ खास तौर से, श्रद्धावादियों के संघर्ष में प्रकट होती है।" (उप., पृष्ठ 371)

(5)     "दार्शनिक भाववाद... धर्म सम्बन्धी अंधविश्वास तक पहुंचने के लिये एक सड़क है।" (लेनिन ग्रन्थावली, रूसी संस्करण, खण्ड 13, पृष्ठ 304)

यह जानने के लिए कि हमारी पार्टी के इतिहास में लेनिन की पुस्तक ने कैसी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और यह समझने के लिये कि स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में संशोधनवादियों और गद्द़ारों की रंगबिरंगी जमात से लेनिन ने किस सैद्धान्तिक निधि की रक्षा की, हमें द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों से संक्षेप में ही सही, परिचित हो जाना चाहिये।

यह सब इसलिये और भी जरूरी है कि द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद कम्युनिज्म का सैद्धांतिक आधार है, वह मार्क्सवादी पार्टी का सैद्धांतिक आधार है और इसलिये, हमारी पार्टी के हर सक्रिय सदस्य का कर्तव्य है कि वह इन उसूलों को जाने और इसलिये उनका अध्ययन करे।

तब, (1) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और (2) ऐतिहासिक भौतिकवाद हैं क्या?

 

चौबीसवां पोस्ट "सोवियत संघ की

कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) का इतिहास"

 

चौथा अध्याय

स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में मेन्शेविक और बोल्शेविक। बोल्शेविकों द्वारा स्वतंत्र मार्क्सवादी पार्टी का निर्माण।

(1908-1912)

 

1. स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद। विरोधी बुद्धिजीवियों में फूट। पतन। पार्टी के बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का मार्क्सवाद   के दुश्मनों से जाकर मिलना और मार्क्सवाद   के सिद्धांत में संशोधन करने के प्रयत्न। लेनिन द्वारा अपनी पुस्तक 'भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना' में संशोधनवादियों का खण्डन और मार्क्सवादी पार्टी के सैद्धांतिक आधारों का समर्थन।

ज़ार सरकार ने 3 जून 1907 को, दूसरी राज्य दूमा भंग कर दी। इतिहास में इसे आम तौर से 3 जून का बलपूर्वक सत्ताहरण कहते हैं। ज़ार सरकार ने तीसरी राज्य दूमा के चुनाव के लिये एक नया कानून बनाया। इस तरह, उसने 17 अक्तूबर के खुद अपने घोषणापत्र को तोड़ा, जिसमें कहा गया था कि दूमा की सहमति से ही नये कानून जारी किये जा सकेंगे। दूसरी दूमा के सोशल-डेमोक्रेटिक गुट के सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया। मज़दूर वर्ग के प्रतिनिधियों को सख्त मेहनत और निर्वासन का दण्ड मिला।

नये चुनाव-कानून का मसौदा इस तरह तैयार किया गया कि दूमा में जमींदारों और व्यापारी और औद्योगिक पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों की तादाद काफ़ी बढ़ जाये।

 

इसके साथ ही, किसानों और मजदूरों का प्रतिनिधित्व, जो पहले ही कम था, अब पहले की संख्या का बहुत ही छोटा सा अंश कर दिया गया।

तीसरी दूमा में यमराज सभाओं और काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों की बहुतायत थी। कुल 442 प्रतिनिधियों में, 171 दक्षिण पंथी (यमराज सभा वाले), 113 अक्तूबर पंथी या इन्हीं जैसे गुटों के सदस्य, 101 काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों या इन्हीं जैसे गुटों के सदस्य, 13 त्रुदोविक और 18 सोशल-डेमोक्रैट थे।

दक्षिण पंथी (दूमा में दाहिनी तरफ़ बैठने की वजह से उनका यह नाम पड़ा था) मजदूरों और किसानों के सबसे कट्टर दुश्मनों - यमराज सभा वाले सामंती जमींदारों - के प्रतिनिधि थे। इन कट्टर दुश्मनों ने किसान आन्दोलन का दमन करते हुए, किसानों को सामूहिक तौर से बेतों से पीटा और गोलियों से उड़ाया था। ये यहूदियों के कत्लेआम, प्रदर्शनकारी मजदूरों को पीटने, क्रांति के दौर में सभा-स्थलों को बर्बरता से जलाने के संगठनकर्ता थे। दक्षिण पंथियों का मत था कि मेहनतकश जनता का खूब कठोरता से दमन किया जाये और ज़ार के पास अपरिमित अधिकार हों। 17 अक्तूबर 1905 के ज़ार के घोषणापत्र का वे विरोध करते थे।

अक्तूबरपंथी पार्टी, या 17 अक्तूबर का यूनियन, दूमा में दक्षिण पंथियों का निकट अनुवर्ती था। अक्तूबर पंथी बड़ी औद्योगिक पंूजी के हितों और पंूजीवादी ढंग से अपनी रियासतें चलाने वाले बड़े जमींदारों के हितों के प्रतिनिधि थे (1905 की क्रांति के आरंभ में बड़े जमींदारों की एक भारी तादाद जो पहले काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी में थी, अक्तूबर पंथियों की ओर हो गयी)। अक्तूबर पंथियों को जो बात दक्षिण पंथियों से अलग जाहिर करती थी, वह 17 अक्तूबर के घोषणापत्र की स्वीकृति - वह भी सिर्फ शब्दों में - थी। अक्तूबर पंथी ज़ार सरकार की घरेलू और वैदेशिक नीति का पूरी तरह समर्थन करते थे।

पहली और दूसरी दूमा के मुकाबिले में, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी को तीसरी दूमा में कम सीटें मिलीं। इसका सबब यह था कि जमींदारों के वोट का एक हिस्सा काॅन्स्टीटयूशनल, डेमोक्रेटिक के बदले अक्तूबर पंथियों को मिल गया था।

तीसरी दूमा में मध्यवित्त जनवादियों का एक छोटा गुट था, जिसे त्रुदोविक कहते थे। वे काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों और लेबर-डेमोक्रेटों (बोल्शेविकों) के बीच में फिसलते रहते थे। लेनिन ने बतलाया था कि हालांकि त्रुदोविक दूमा में बहुत ही कमज़ोर थे, फिर भी वे आम जनता के, किसान जनता के प्रतिनिधि थे। काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों और लेबर-डेमोक्रेटों के बीच त्रुदोविकों का फिसलना, छोटे मालिकों की वर्ग-स्थिति का लाजिमी नतीजा था। लेनिन ने बोल्शेविक प्रतिनिधियों, लेबर-डेमोक्रेटों के सामने यह काम रखा कि वे "कमजोर मध्यवित्त जनवादियों की मदद करें, उन्हें उदार पंथियों के असर से निकाल लें, सिर्फ दक्षिण पंथियों के खिलाफ नहीं, बल्कि क्रांति-विरोधी काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों के खिलाफ भी जनवादी खेमें को बटोरें...।")लेनिन सं.ग्र., अं.सं., मास्को, 1947, खण्ड1, पृ. 535)

1905 की क्रांति के दौर में, और उसकी हार के बाद खास तौर से, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों ने दिन पर दिन जाहिर कर दिया कि वे एक क्रांति-विरोधी शक्ति हैं। अधिकाधिक अपनी 'जनवादी' नकाब उतारते हुए, वे वस्तुतः सम्राटवादियों की तरह, ज़ारशाही के समर्थकों की तरह, काम करने लगे। 1909 में, प्रमुख काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेट लेखकों के एक गुट ने एक लेख-संग्रह छापा, जिसका नाम था वेखी (मार्ग-चिन्ह)। इसमें पूंजीपतियों की तरफ से उन्होंने ज़ार का शुक्रिया अदा किया कि उसने क्रान्ति को कुचल दिया है। लाठी और फांसी की सरकार ज़ार की हुकूमत के सामने घुटने टेकते हुए और जीभ निकालते हुए, काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रैटों ने इस किताब में सीधे-सीधे लिख दिया कि "हमें इस सरकार की जय मनानी चाहिये, जो अपनी संगीनों और जेलों की बदौलत जनता के क्रोध से हमारी (उदार पंथी पूंजीपतियों की) एकमात्र रक्षक है।"

दूसरी राज्य दूमा भंग करने के बाद और दूमा के सोशल-डेमोक्रेटिक गुट का ठिकाना लगाने के बाद, ज़ार सरकार जोश के साथ सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक और आर्थिक संगठनों को तोड़ने में लग गयी। सख्त मेहनत के जेलखाने, किले और निर्वासन की जगहें क्रांतिकारियों से ठसाठस भर गयीं। जेलखानों में वे निर्दयता से पीटे जाते थे और उन्हें तरह-तरह से यंत्रणा और यातनायें दी जाती थीं। यमराज सभाओं का आतंक बेरोकटोक जारी रहा। ज़ार के मंत्री स्तोलिपिन ने सारे देश में फांसी के तख्ते लगा दिए। कई हज़ार क्रांतिकारियों को मार डाला गया। उन दिनों फांसी का नाम 'स्तोलिपिन की नैकटाई' पड़ गया था।

मजदूरों और किसानों के क्रांतिकारी आन्दोलन को कुचलने की कोशिश में, ज़ार सरकार अपना काम दमन, सज़ा के दस्ते, गोलीकाण्ड, जेल और सख्त मेहनत की सज़ाओं तक सीमित न रख सकी। उसने भय के साथ महसूस किया कि 'छोटे पिता, ज़ार' में किसानों की भोली भाली श्रद्धा बराबर खत्म हो रही है। इसलिये, उसने एक बड़ा पैंतरा चलने का विचार किया। उसने अपने लिये देहात में ग्रामीण पूंजीपतियों के बडे़ वर्ग, धनी किसानों, में अपने लिये दृढ़ समर्थक पैदा करने की सोची।

9 नवम्बर 1906 को, स्तोलिपिन ने एक नया खेती का कानून बनाया, जिससे कि किसान कम्यून छोड़ सकते थे और अलग खेती कर सकते थे। स्तोलिपिन के कृषि-कानून ने सामूहिक भूमि-अधिकार की व्यवस्था तोड़ दी। किसानों से कहा गया कि वे अपने हिस्सों पर निजी सम्पत्ति की तरह अधिकार कर लें और कम्यूनों से अलग हो जायें। अब वे अपने हिस्से बेच सकते थे, जिसके लिये पहले उन्हें आज्ञा न थी। जब किसान अपना कम्यून छोड़ता था, तब कम्यून इसके लिये वाध्य था कि ज़मीन का एक मिला-जुला टुकड़ा (खुतोर, अत्रूब) उसे दे।

धनी किसानों - कुलकों - को अब अवसर मिला कि कम कीमत पर गरीब किसानों की ज़मीन खरीद लें। कुछ ही साल कानून चालू हुआ था कि दस लाख से ऊपर गरीब किसान अपनी ज़मीन से पूरी तरह हाथ धो बैठे और एकदम तबाह हो गये। जैसे-जैसे ग़रीब किसानों के हाथ से उनकी ज़मीन गयी, वैसे-वैसे कुलकों के खेत बढ़ने लगे। कहीं-कहीं पर बाकायदा रियासतें बन गयीं, जहां बडे़ पैमाने पर किराये की मज़दूरी - खेत मजदूरों - से काम कराया जाता था। सरकार किसानों को मजबूर करती थी कि कम्यून की सबसे अच्छी जमीन कुलक किसानों को दी जाये।

किसानों की 'मुक्ति' के दौरान में, जमींदारों ने किसानों से उनकी जमीन लूट ली थी। अब कुलक कम्यूनों से उनकी जमीन लूटने लगे। वे सबसे अच्छी जमीन पाने लगे और कम कीमत पर गरीब किसानों के हिस्से खरीदने लगे।

ज़ार सरकार ने जमीन खरीदने के लिये और अपने खेत सुसज्जित करने के लिये कुलकों को भारी रकमें उधार दीं। स्तोलिपिन चाहता था कि कुलक छोटे जमींदार बन जायें, निरंकुश ज़ारशाही के वफादार समर्थक बन जायें।

1906-'15 तक, नौ वर्षों में ही बीस लाख से ऊपर कुटुम्ब कम्यूनों से अलग हुए।

जिन किसानों के पास ज़मीन के छोटे हिस्से आये थे, उनकी और ग़रीब किसानों की हालत स्तोलिपिन की नीति के फलस्वरूप पहले से भी बदतर हो गयी। किसानों में अलगाव की प्रक्रिया और स्पष्ट दिखाई देने लगी। किसान कुलकों से टक्कर लेने लगे। इसके साथ ही, किसानों ने अनुभव किया कि वे रियासती जमीन पर तब तक क़ब्जा न पायेंगे जब तक कि ज़ार सरकार, जमींदारों और काॅन्स्टीटयूशनल डेमोक्रेटों की राज्य दूमा बनी रहेगी।

जिस समय एक बड़ी तादाद में कुलक फ़ार्म बन रहे थे, उस समय (1907-'09) किसान आन्दोलन मन्द पड़ने लगा था। लेकिन तुरंत बाद ही, 1910, 1911 में और उसके बाद गांव के कम्यून के सदस्यों और कुलकों की टक्करों की वजह से जमींदारों और कुलकों के खिलाफ किसान आन्दोलन की तेज़ी बढ़ गयी।

क्रान्ति के बाद, उद्योग-धंधों में भी बडे़ परिवर्तन हुए। उद्योग-धंधों का केन्द्रीयकरण, यानी दिन पर दिन शक्तिशाली, बनते हुए पूंजीवादी गुटों के हाथ में उद्योग-धंधों का केन्द्रीयकरण और कारखानों का विशाल बनना, और तेज़ी के साथ हुआ। 1905 की क्रांति के पहले भी, पूंजीपति इस उद्देश्य से संघ बनाने लगे थे कि देश में चीजों का भाव ऊंचा किया जाये और इस तरह जो भारी मुनाफे मिलें उनसे निर्यात व्यापार में बढ़ती की जाये। इस तरह, वे चाहते थे कि विदेश में कम कीमत पर अपना माल भर दें और विदेशी बाज़ारों पर क़ब्जा कर लें। पूंजीपतियों के ये संघ (मोनोपली), टंस्ट और सिण्डिकेट कहलाते थे। क्रांति के बाद, उनकी संख्या और भी बढ़ गयी। बडे़ बैंकों की तादाद में भी बढ़ती हुई। उद्योग-धंधों में इनकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो गयी। रूस में विदेशी पूंजी का आयात बढ़ गया।

इस तरह, रूस में पूंजीवाद बढ़ते हुए पैमाने पर इज़ारेदार पूंजीवाद, साम्राज्यवादी पंूजीवाद बन रहा था। कई साल के गतिरोध के बाद, उद्योग-धंधे फिर से चेतने लगे। कोयला, धातुएं, तेल, सूती कपड़ा और शक्कर की पैदावार बढ़ गयी। गल्ले का निर्यात व्यापार बहुत बडे़ पैमाने पर होने लगा।

हालांकि रूस ने इस समय कुछ औद्योगिक उज्डाति की, फिर भी पच्छिमी यूरोप के मुकाबिले में वह पिछड़ा हुआ था और अब भी विदेशी पूंजीपतियों पर निर्भर था। रूस मशीनें और मशीनों के पुर्जे न बनाता था - वे बाहर से मंगवाये जाते थे। उसके पास मोटरों के या रसायन के धंधे न थे। नकली खाद भी वहां तैयार न होती थी। लड़ाई का सामान तैयार करने में भी रूस दूसरे पूंजीवादी देशों से पिछड़ा हुआ था।

लेनिन ने बतलाया था कि धातुओं के खर्च के स्तर का नीचा होना देश के पीछडे़ होने की निशानी है। लेनिन ने लिखा था:

"किसानों की मुक्ति के बाद, पचास साल में रूस में लोहे का खर्च 5 गुना बढ़ा है। फिर भी, रूस अभूतपूर्व ढंग से और अविश्वसनीय रूप से पिछड़ा हुआ निर्धन और अर्द्ध-संस्कृत है। इंग्लैंड के मुकाबिले में, पैदावार के आधुनिक साधन उसके पास एक चैथाई है, जर्मनी के मुकाबिले में 1/5 और अमरीका के मुकाबिले में 1/10 है।" (लेनिन ग्रंथावली, रू.सं., खण्ड 16, पृष्ठ 543)

रूस के आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछडे़ होने का एक सीधा परिणाम यह था कि रूसी पूंजीवादी और खुद ज़ारशाही दोनों ही पच्छिमी यूरोप के पूंजीवाद पर निर्भर थे।

यह इस बात से ज़ाहिर होता था कि ऐसे महत्वपूर्ण उद्योग-धंधे जैसे कि कोयला, तेल, बिजली का सामान और धातुओं की पैदावार - ये सब विदेशी पूंजी के हाथ में थे। ज़ारशाही रूस को अपने लिये लगभग सभी मशीनें और मशीनों का सामान बाहर से मंगवाना पड़ता था।

यह इससे भी ज़ाहीर होता था कि विदेशी ऋण की बेड़ी पड़ी हुई थी। इस ऋण का ब्याज देने के लिये, ज़ारशाही हर साल जनता से करोड़ों रूबल दुह लेती थी।

इसके अलावा, यह इस बात से ज़ाहिर होता था कि रूस के 'मित्रों' से गुप्त संधियां की गयी थीं जिनसे ज़ार सरकार ने वायदा किया था कि लड़ाई होने पर लाखों रूसी सिपाही साम्राज्यवादी मोर्चों पर 'मित्रों' की मदद के लिये और अंगे्रज और फ्रांसीसी पूंजीपतियों के भारी मुनाफों की रक्षा करने के लिये पहुंच जायेंगे।

स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में, हथियारबन्द सिपाहियों और पुलिस ने खास तौर से मज़दूर वर्ग पर खूंखार हमले किये। ज़ार के उकसावा पैदा करने वाले जासूसों ने और यमराज सभा के गुण्डों ने हमले किये। लेकिन, अकेले ज़ार के लगुओं-भगुओं ने ही मजदूरों को परेशान नहीं किया और सताया बल्कि इस मामले में कारखानेदारों और मिलमालिकों ने भी कम जोश नहीं दिखलाया। औद्योगिक गतिरोध और बढ़ती हुई बेकारी के दिनों में मजदूर वर्ग के खिलाफ़ इनके हमले ने खास तौर से जोर पकड़ा। कारखानेदारों ने तालेबन्दी का ऐलान किया और वर्ग चेतन मजदूरों की, जो हड़तालों में सक्रीय हिस्सा लेते थे, काली फे़हरिस्तें बनाई। एक बार आदमी का नाम इन फ़ेहरिस्तों में आ जाये तो किसी खास धंधे के कारखानेदारों के संघ के कारखाने में उसे काम न मिल सकता था। 1908 में ही, तनख्वाह में दस से पन्द्रह फ़ीसदी तक कटौती हुई। हर जगह काम के घण्टे 10 से 12 तक बढ़ा दिए गये। भारी जुर्माने करने की प्रथा फिर ज़ोरों से चल पड़ी।

पचीसवां पोस्ट "सोवियत संघ की

कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) का इतिहास"

 

1905 की क्रांति की पराजय से, क्रांति के सहयात्रियों की पांति में विघटन और पतन का सिलसिला शुरू हो गया। खास तौर से बुद्धिजीवियों में अस्वस्थ और पतनशील रुझान बढ़ चले। जो सहयात्री पूंजीवादी खेमें से क्रांति की उठान के दिनों में आन्दोलन के साथ आ गये थे, वे प्रतिक्रियावाद के दिनों में पार्टी से अलग हो गये। उनमें से कुछ ने क्रांति के खुले दुश्मनों का साथ दिया। दूसरे लोग अब तक के बचे-खुचे क़ानूनी तौर से चलने वाले मजदूर वर्ग के सभा-समाजों में जम गये। वे कोशिश करने लगे कि सर्वहारा वर्ग को क्रान्ति के रास्ते से हटा दें और सर्वहारा वर्ग की क्रांन्तिकारी पार्टी को बदनाम करें। क्रांति का साथ छोड़ कर, सहयात्री कोशिश करने लगे कि वे प्रतिक्रियावादियों के स्नेहभाजन बनें और ज़ारशाही के साथ शान्ति का सम्बन्ध कायम करके दिन बितायें।

ज़ार सरकार ने क्रान्ति की हार से फायदा उठाकर, क्रांति के सहयात्रियों में से जो ज्यादा कायर और स्वार्थी थे, उन्हें अपना उकसावा पैदा करने वाला जासूस बनाया। ये नीच गद्दार ज़ार की ओखराना की तरफ से मजदूर वर्ग और पार्टी-संगठनों में भेजे जाते थे, जहां वे भीतर घुस कर जासूसी करते थे और क्रांतिकारियों को पकड़वा देते थे।

क्रांति-विरोध का हमला सैद्धान्तिक मोर्चे पर भी हुआ। ऐसे फै़शनेबिल लेखकों का पूरा गिरोह सामने आया जो .मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करता था और उसका 'खण्डन' करता था। यह गिरोह क्रान्ति का मज़ाक बनाता था, उसकी खिल्लियंा उड़ाता था, गद्दारी की तारीफ़ करता था और 'व्यक्तिवाद' के नाम पर कामुक दुराचार की तारीफ करता था।

दर्शन के क्षेत्र में .मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करने और उसमें संशोधन करने की कोशिशें बढ़ती गयीं। अर्द्ध-वैज्ञानिक सिद्धांतों का नक़ाब ओढे़, तरह-तरह के मज़हबी सुझाव भी सामने आये।

.मार्क्सवाद   की 'आलोचना' करना फ़ैशन में शामिल हो गया।

इन सभी सज्जनों का उद्देश्य एक ही था, हालांकि उनके लिबास अलग-अलग थे। वह उद्देश्य था - जनता को क्रान्ति के रास्ते से हटाना।

पतनशीलता और सन्देहवाद का असर पार्टी-बुद्धीजीवियों के एक हिस्से पर भी पड़ा। ये वे लोग थे जो अपने को मार्क्सवादी कहते थे, लेकिन .मार्क्सवाद   के कभी दृढ़ समर्थक न रहे थे। इनमें बुग्दानोव, बज़ारोव लूनाचास्र्की (जिसने 1905 में बोल्शेविकों का साथ दिया था), यूश्केविच और वलेन्तिनोव (ये दोनों मेन्शेविक थे) जैसे लेखक थे। इन्होंने एक तरफ़ तो अपनी आलोचना का हल्ला मार्क्सवादी सिद्धांत के दार्शनिक आधार, यानी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, के खिलाफ़ बोला और साथ ही दूसरी तरफ़ ऐतिहासिक विज्ञान के बुनियादी मार्क्सवादी उसूलों यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद के खिलाफ़ बोला। आम तौर से जो आलोचना होती थी, उससे यह आलोचना इस बात में भिज्डा थी कि वह खुलकर और मैदान में आकर न की जाती थी। वह नक़ाब डाल कर  और बेईमानी से .मार्क्सवाद   के बुनियादी उसूलों के 'समर्थन' के बहाने की जाती थी। ये लोग दावा करते थे कि मुख्यतः वे मार्क्सवादी हैं, लेकिन .मार्क्सवाद   को और 'उन्नत' करना चाहते हैं। वे उसे उज्डात करना चाहते थे, उसके कुछ बुनियादी उसूलों को निकाल कर। वास्तव में, वे .मार्क्सवाद   के विरोधी थे। उन्होंने उसके सैद्धांतिक आधार को कमज़ोर बनाने की कोशिश की, हालांकि वे बेईमानी से .मार्क्सवाद   का विरोधी होना मंजूर न करते थे। वे दुरंगी नीति से अपने को मार्क्सवादी कहते थे। इस बेईमानी से भरी हुई आलोचना का खतरा इस बात में था कि उससे पार्टी के साधारण सदस्य बरगलाये जा सकते थे और वे रास्ते से भटक सकते थे। .मार्क्सवाद   के सैद्धांतिक आधार को कम़जोर बनाने के उद्देश्य से, यह आलोचना जितनी ही धूर्ततापूर्ण बनती गयी, उतनी ही वह पार्टी के लिये ज्यादा खतरनाक बनती गयी। कारण यह कि वह उतनी ही पार्टी के खिलाफ, क्रान्ति के खिलाफ, प्रतिक्रियावादियों के आम आन्दोलन से घुल-मिल गयी। कुछ बुद्धिजीवी, जो .मार्क्सवाद   से नाता तोड़ चुके थे, एक नया धर्म तक क़ायम करने का समर्थन करने लगे (ये लोग 'देवताओं को खोजने वाले' और 'देवताओं को बनाने वाले' कहलाये)। मार्क्सवादियों के लिये यह बहुत जरूरी हो गया कि मार्क्सवादी सिद्धांत के प्रति इन गद्दारी करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाये, उनके चेहरों से नक़ाब खींच ली जाये, पूरी तरह उनका पर्दाफाश किया जाये और इस तरह मार्क्सवादी पार्टी के सैद्धांतिक आधार की रक्षा की जाये।

उम्मीद की जा सकती थी कि प्लेखानोव और उसके मेन्शेविक दोस्त, जो अपने को 'उच्चकोटि का मार्क्सवादी सिद्धांतकर' समझते थे, यह काम उठायेंगे, लेकिन उन्होंने अखबारी किस्म के एक दो आलोचनात्मक टिप्पणियों के छर्रे दाग कर ही मैदान छोड़ देना ज्यादा अच्छा समझा।

1909 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना में, यह काम लेनिन ने किया।

लेनिन ने लिखा था:

"छः महीने से भी कम में चार किताबें निकली हैं, जिनमंे, मुख्यतः और करीब-करीब अकेले द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर हमले किये गये हैं। इनमें सबसे पहले बज़ारोव, बुग्दानोव, लूनाचास्र्की, बरमान, हेलफोण्ड, यूश्केविच और सुवोरोव का लेख-संग्रह है। इसका नाम है - माक्र्सीय दर्शन का (ज्यादा उचित होता कि माक्र्सीय दर्शन के 'खिलाफ) अध्ययन यह शीर्षक होता (पीतरबुर्ग, 1908)। दूसरी किताब यूश्केविच की भौतिकवाद और आलोचनात्मक यथार्थवाद है। तीसरी बरमान की आधुनिक ज्ञान-मीमांसा के प्रकाश में द्वंद्ववाद है, और चैथी वलैन्तिनोव की .मार्क्सवाद   की दार्शनिक रूपरेखा... । ये सभी लोग तीव्र राजनीतिक मतभेद होते हुए भी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का विरोध करने में एक हैं। इसके साथ ही, वे अपने को दर्शन में मार्क्सवादी भी कहते हैं! बरमान का कहना है कि एंगेल्स का द्वंद्ववाद 'रहस्यवाद' है। बज़ारोव ने चलते-फिरते कहा है कि "एंगेल्स के विचार पुराने पड़ गये हैं", मानों यह कोई स्वयंसिद्ध बात हो। इस तरह, मालूम होता है कि हमारे साहसी योद्धाओं ने भौतिकवाद का खण्डन कर दिया है। ये लोग गर्व के साथ 'आधुनिक ज्ञान-मीमांसा' 'नवीन दर्शन' ) या 'पिछले दिनों का पौजिटिविज्म'), 'आधुनिक प्रकृति-विज्ञान के दर्शन', या 'बीसवीं सदी के प्रकृति-विज्ञान का दर्शन' का भी हवाला देते हैं। (लेनिन, "भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना", अं.सं., मास्को, 1947, पृष्ठ 9)

लूनाचास्र्की ने अपने दोस्तों - दर्शन शास्त्र के संशोधनवादियों - की हिमायत में कहा था: "शायद हम भटक गये हैं, लेकिन रास्ता ढूंढ़ रहे हैं।" लेनिन ने लूनाचास्र्की को जवाब देते हुए कहा था:

"जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मैं भी दर्शन शास्त्र में कुछ "ढूंढ रहा हंू।" इन टिप्पणियों (यानि भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना सं.) में, मैंने अपने सामने यह काम रखा है कि इस बात का पता लगाऊं कि इन लोगों के सामने ऐसी कौन सी अड़चनें थीं जिनकी वजह से .मार्क्सवाद   के लिबास में इन्होंने जो कुछ पेश किया है, वह इतना उलझा हुआ, घपले में पड़ा हुआ और प्रतिक्रियावादी है कि उस पर विश्वास नहीं होता।" (उप., पृष्ठ 10)

वास्तव में लेनिन की किताब इस विनम्र कर्तव्य से बहुत आगे जा पहुंची। दरअसल, यह किताब बुग्दानोव, यूश्केविच, बज़ारोव और वलैन्तिनोव और उनके दर्शन-गुरुओं - अवेनारियस और माख - की आलोचना से बढ़ कर भी कुछ और है। ये दर्शन-गुरु कोशिश करते थे कि अपनी कृतियों में मार्क्सवादी भौतिकवाद के खिलाफ़ नफ़ीस और सुसंस्कृत भाववाद पेश करें। लेनिन की किताब में .मार्क्सवाद   के सैद्धांतिक आधार - द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद - का समर्थन भी है। एंगेल्स की मृत्यु से लेकर लेनिन की भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना के निकलने तक, इस समूचे ऐतिहासिक दौर में विज्ञान ने जो कुछ तत्व और महत्व की बातें ढूंढ निकाली थीं, और खास तौर से प्रकृती-विज्ञान ने ढूंढ निकाली थीं, उन सबसे लेनिन ने भौतिकवादी ढंग से आम नतीजे निकाल कर इस किताब में इकट्ठे किये थे।

 

इस किताब में रूसी अनुभवसिद्ध आलोचकों और उनके विदेशी गुरूओं की समुचित आलोचना करने के बाद, लेनिन ने दार्शनिक और सैद्धांतिक संशोधनवाद के बारे में निम्नलिखित नतीजे निकाले हैं:

(1)     ".मार्क्सवाद   के लिबास में .मार्क्सवाद   को और भी चतुराई से झुठलाना, भौतिकवाद-विरोधी सिद्धान्तों को और भी चतुराई से पेश करना अर्थ शास्त्र में, कार्यनीति के सवालों पर और दर्शन शास्त्र में आम तौर से आधुनिक संशोधनवाद की यह विशेषता है।" (उप., पृष्ठ 342-43)

(2)    "माख और अवेनारियस की पूरी-पूरी विचारधारा भाववाद की तरफ़ बढ़ रही है।" (उप., पृष्ठ 370)

(3)     "हमारे सभी माखवादी भाववाद के जाल में फंस गये हैं।" 1⁄4उप., पृष्ठ 3591⁄21⁄441⁄2 "अनुभवसिद्ध आलोचना के तमाम ज्ञान सम्बन्धी शास्त्रार्थ के पीछे दर्शन के क्षेत्र में पार्टियों के संघर्ष को न देखना असंभव है। यह संघर्ष ऐसा है जो छानबीन करने पर अंत में मौजूदा समाज के विरोधी वर्गों के रुझान और विचारधारा को ज़ाहिर करता है।" (उप., पृष्ठ 371)

(4)    "अनुभवसिद्ध आलोचना की वस्तुगत, वर्गगत भूमिका पूरी तरह इस बात में है कि वह श्रद्धावादियों (प्रतिक्रियावादियों, जो श्रद्धा को विज्ञान से बढ़ कर मानते थे सं.) की वफादारी से सेवा करती है यह सेवा भौतिकवाद के खिलाफ आम तौर से, और ऐतिहासिक भौतिकवाद के खिलाफ खास तौर से, श्रद्धावादियों के संघर्ष में प्रकट होती है।" (उप., पृष्ठ 371)

(5)     "दार्शनिक भाववाद... धर्म सम्बन्धी अंधविश्वास तक पहुंचने के लिये एक सड़क है।" (लेनिन ग्रन्थावली, रूसी संस्करण, खण्ड 13, पृष्ठ 304)

यह जानने के लिए कि हमारी पार्टी के इतिहास में लेनिन की पुस्तक ने कैसी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और यह समझने के लिये कि स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में संशोधनवादियों और गद्द़ारों की रंगबिरंगी जमात से लेनिन ने किस सैद्धान्तिक निधि की रक्षा की, हमें द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों से संक्षेप में ही सही, परिचित हो जाना चाहिये।

यह सब इसलिये और भी जरूरी है कि द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद कम्युनिज्म का सैद्धांतिक आधार है, वह मार्क्सवादी पार्टी का सैद्धांतिक आधार है और इसलिये, हमारी पार्टी के हर सक्रिय सदस्य का कर्तव्य है कि वह इन उसूलों को जाने और इसलिये उनका अध्ययन करे।

तब, (1) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और (2) ऐतिहासिक भौतिकवाद हैं क्या?

 

    2. द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद।

 

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी का विश्व-दर्शन है। इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद इसलिये कहते हैं कि प्रकृति के घटना प्रवाह की तरफ़ इसका रुख, उसका अध्ययन करने और उसे समझने का इसका तरीका द्वंद्ववादी है। प्रकृति के घटना प्रवाह की व्याख्या करने, इस घटना प्रवाह के बारे में उसके विचार, उसके सिद्धांत भौतिकवादी हैं।

ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक जीवन में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के उसूलों को लागू करता है। वह सामाजिक जीवन के घटना प्रवाह में, समाज और उसके इतिहास के अध्ययन में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के उसूलों को लागू करता है।

मार्क्स और एंगेल्स जब अपने द्वंद्वात्मक तरीके का वर्णन करते हैं तो वे आम तौर से दार्शनिक हेगेल का हवाला देते हैं, जिसने द्वन्द्ववाद के मुख्य लक्षण बतलाये थे। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स और एंगेल्स का द्वंद्ववाद हेगेल के द्वंद्ववाद से बिल्कुल मिलता-जुलता है। दरअसल, मार्क्स और एंगेल्स ने हेगेल के द्वंद्ववाद से उसका 'बुद्धिसंगत तत्व' ही लिया था। उन्होंने हेगेल के भाववाद का छिलका अगल कर दिया था। उन्होंने द्वंद्ववाद को और आगे विकसित किया था, जिससे उसे एक आधुनिक वैज्ञानिक रूप मिले।

मार्क्स ने कहा था:

"मेरा द्वन्द्ववादी तरीका हेगेल के तरीके से भिन्न् ही नहीं है, बल्कि उसका ठीक उल्टा है। हेगेल ... विचार करने की प्रक्रिया को 'विचार' के नाम पर एक स्वतंत्र विषय तक बना देता है। उसके लिये यही चिंतन वास्तविक संसार की प्रेरणा-शक्ति (उसका रचयिता) है। उसके लिये वास्तविक संसार सिर्फ़ 'विचार' का बाहरी, घटना प्रवाह वाला रूप है। इसके विपरीत, मेरे लिये विचार इसके सिवा कुछ नहीं है कि भौतिक  संसार ही इंसान के दिमाग में प्रतिबिम्बित हुआ है और विचार के रूपों में तब्दील हो गया है।" (कार्ल मार्क्स, पूंजी, खण्ड 1, पृष्ठ 30, जार्ज ऐलेन एण्ड अनविन लिमिटेड, 1938)

 

अपने भौतिकवाद का वर्णन करते हुए, मार्क्स और एंगेल्स अक्सर दार्शनिक फ़ायरबाख का हवाला देते हैं, जिसने भौतिकवाद को उसके उचित अधिकार दिलाये थे। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स और एंगेल्स का भौतिकवाद फ़ायरबाख के भौतिकवाद से बिल्कुल मिलता-जुलता है। दरअसल, मार्क्स और एंगेल्स ने फ़ायरबाख के भौतिकवाद से उसका 'आंतरिक तत्व' निकाल लिया था। उन्होंने उसे भौतिकवाद के वैज्ञानिक दार्शनिक सिद्धांत के रूप में विकसित किया। उन्होंने उसके  भाववादी और धार्मिक-नैतिक लावादे को फेंक दिया। फ़ायरबाख बुनियादी तौर से भौतिकवादी था, लेकिन हम जानते हैं कि वह भौतिकवाद, इस नाम पर आपत्ति करता था। एंगेल्स ने कई बार कहा था कि भौतिकवादी "बुनियाद के बावजूद 'फायरबाख' भाववाद की परम्परागत, बेड़ियों में जकड़ा रहा" और "फ़ायरबाख का असली भाववाद  वैसे ही ज़ाहिर हो जाता है जैसे ही हम धर्म और नैतिकता के उसके दर्शन के नज़दीक पहुंचते हैं।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , अं.सं., मास्को, 1946, खण्ड 1, पृष्ठ 373-375)

दियालेक्तिका (द्वंद्ववाद) शब्द ग्रीक धातु दियालेगो से बना है, जिसका अर्थ है चर्चा करना, वाद-विवाद करना। पुराने ज़माने में, द्वंद्ववाद वह कला थी जिससे विरोधी की दलीलों में असंगतियां दिखला कर और उन असंगतियों को दूर करके सत्य तक पहुंचा जा सकता था। पुराने ज़माने में, ऐसे दार्शनिक थे जो समझते थे कि चिन्तन की असंगतियां प्रकट करना और विरोधी विचारों का टकराना सच्चाई तक पहुंचने का सबसे अच्छा तरीक़ा है। चिन्तन का यह द्वंद्ववादी तरीका, जो बाद में के घटना प्रवाह पर भी लागू किया गया, विकसित होकर प्रकृति को जानने-पहचानने का द्वंद्ववादी तरीका बन गया। इस तरीके़ के अनुसार, प्रकृति का घटना प्रवाह सदा ही गतिशील है और सदा ही परिवर्तनशील है। इस तरीक़े के अनुसार, प्रकृति का विकास प्रकृति की असंगतियों के विकास का ही नतीजा है, प्रकृति के भीतर विरोधी शक्तियों के घात-प्रतिघात का ही नतीजा है।

तत्व रूप से, द्वंद्ववाद अधिभूतवाद (मेटाफ़िजिक्स) का ठीक उल्टा है।

 (1) मार्क्सीय द्वंद्वात्मक तरीके़ के मुख्य लक्षण ये हैं:

(क) अधिभूतवाद के खिलाफ, द्वंद्ववाद प्रकृति को वस्तुओं का आकस्मिक संग्रह नहीं मानता, उसे एक-दूसरे से विच्छिन्न्, एक-दूसरे से अलग और स्वतंत्र घटना प्रवाह नहीं मानता। उसके अनुसार, प्रकृति एक सुसम्बद्ध और अविच्छिन्न् इकाई है जिसमें वस्तुएं, घटना प्रवाह एक-दूसरे से आंतरिक रूप से सम्बंधित हैं, एक-दूसरे पर निर्भर हैं और एक-दूसरे की रूपरेखा निश्चित करती हैं।

इसलिये द्वंद्ववादी तरीके़ के अनुसार, प्रकृति के किसी भी घटना प्रवाह को अकेले लेकर, आसपास के घटना प्रवाह से अलग करके नहीं समझा जा सकता। कारण यह कि प्रकृति के क्षेत्र में कोई भी घटना प्रवाह आसपास की परिस्थितियों के संदर्भ में न देखा जाये, बल्कि उनसे अलग करके देखा जाये तो वह हमारे लिये अर्थहीन हो जाता है। इसी तरह, कोई भी घटना प्रवाह यदि अपने आसपास के घटना प्रवाह के अटूट संदर्भ में देखा जाये, आसपास के घटना प्रवाह से उसकी रूपरेखा निश्चित होती है, यह ध्यान में रख कर देखा जाये, तो वह समझा जा सकता है और उसकी व्याख्या की जा सकती है।

(ख) अधिभूतवाद के खिलाफ, द्वंद्ववाद का कहना है कि प्रकृति स्थिरता और गतिहीनता, ठहराव और परिवर्तनशीलता की दशा नहीं है। वह सतत गतिशीलता और परिवर्तनशीलता, सतत नवीनता और विकास की दशा है। वह ऐसी दशा है जिसमें कोई चीज हमेशा उगती और विकसित होती रहती है और कोई चीज हमेशा जर्जर होती और मरती रहती है।

इसलिये, द्वंद्ववादी तरीके़ की मांग है कि घटना प्रवाह पर इसी दृष्टि से विचार न किया जाये कि वह दूसरे से सम्बन्धित और उस पर निर्भर है, बल्कि इस दृष्टि से भी कि वह गतिशील है, बदलता है, विकसित होता है, जन्मता है और मरता है।

द्वंद्वात्मक तरीके़ के अनुसार, सबसे ज्यादा महत्व उस चीज का नहीं है जो किसी खास समय टिकाऊ तो मालूम होती है लेकिन जिसका ह्रास शुरू हो चुका है। सबसे महत्व की चीज वह है जो उग रही है और विकसित हो रही है, भले ही किसी खास समय वह टिकाऊ न मालूम होती हो। द्वंद्ववादी तरीका उसी को अजेय मानता है जो उग रही हो और विकासमान हो।

एंगेल्स ने लिखा है:

"छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी तक, बालू के कण से लेकर सूरज तक, प्रोस्टिटा (मूल जीवन सेल - सम्पादक) से लेकर मनुष्य तक, प्रकृति जन्म और निर्वाण की निरंतर दशा में है। वह एक चिरन्तन गतिशीलता, गति और परिवर्तन की अविराम दशा में है।" (एंगेल्स, प्रकृति-सम्बन्धी द्वंद्ववाद)। इसलिये, एंगेल्स का कहना है कि द्वंद्ववाद "वस्तुओं को और उनके गोचर प्रतिरूपों को तत्व रूप से एक-दूसरे से सम्बन्धित, उनके संयोग, उनकी गतिशीलता उनके जन्म और निर्वाण की दशा में देखता है।" (एंगेल्स डूयरिंग मत-खण्डन)

 (ग) अधिभूतवाद के विपरीत, द्वंद्ववाद के लिये विकास का सिलसिला साधारण प्रगति का सिलसिला नहीं है। वह ऐसा सिलसिला नहीं है जिसमें परिमाण की तब्दीली से गुण में तब्दीली नहीं होती। वह ऐसा विकास है जो परिमाण में बहुत ही मामूली और क़रीब-क़रीब न दिखाई देने वाली तब्दीली से खुली, बुनियादी तब्दीली की तरफ़, गुण में तब्दीली की तरफ़ बढ़ जाता है। वह ऐसा विकास है जिसमें गुण में तब्दीली धीरे-धीरे नहीं होती, बल्कि तेज़ी से और सहसा होती है, वह एक दशा से दूसरी दशा तक छलांग का रूप लेती है। यह तब्दीली आकस्मिक नहीं होती, बल्कि परिमाण में प्रायः अस्पष्ट और धीरे-धीरे होने वाली तब्दीली के संचय का स्वाभाविक नतीजा होती है।

इसलिये, द्वंद्ववादी तरीके़ का कहना है कि विकास के सिलसिले को एक ही चक्र में घूमने वाली गति की तरह, जो पहले ही हो चुका है उसी के मामूली दुहराने की तरह, न समझना चाहिये। विकास के सिलसिले को आगे की तरफ़ और ऊपर की तरफ़ गति के रूप में समझना चाहिये। उसे पुरानी गुणात्मक दशा से एक नयी गुणात्मक दशा की तरफ़ आगे बढ़ने के रूप में समझना चाहिये। उसे ऐसा विकास समझना चाहिये जो साधारण से संश्लिष्ट की तरफ़, निम्न से उच्चतर की तरफ़ होता है।

एंगेल्स का कहना है:

"द्वंद्ववाद की कसौटी प्रकृति है। कहना पडे़गा कि आधुनिक प्रकृति विज्ञान ने इस कसौटी के लिये बहुत ही भरीपूरी सामग्री दी है, जो दिन पर दिन बढ़ती जाती है। इस तरह, आधुनिक प्रकृति-विज्ञान ने साबित कर दिया है कि आखिर तक छानबीन करने पर प्रकृति का क्रम द्वंद्ववादी है, न कि अधिभूतवादी। यह क्रम सदा के लिये समान और सदा ही दुहराये जाने वाले घेरे में नहीं होता, बल्कि उसके विकास का सच्चा इतिहास है। यहां पर सबसे पहले डारविन का जिक्र  करना चाहिये, जिसने प्रकृति के बारे में अधिभूतवादी विचार पर करारी चोट की।

उसने साबित किया कि आज का जीवित संसार, पौधे और पशु और फलतः मनुष्य भी, सभी ऐसे विकास क्रम की उपज हैं जिसकी प्रगति लाखों साल से होती आयी है।"(उप.)

द्वंद्वात्मक विकास परिमाण की तब्दीली से गुण की तब्दीली की तरफ़ बढ़ता है, यह बतलाते हुए एंगेल्स ने कहा है:

"भौतिक विज्ञान (फ़िजिक्स) में... हर तब्दीली परिमाण की गुण में तब्दीली है। यह तब्दीली गति के किसी रूप की परिमाण सम्बन्धी तब्दीली का नतीजा होती है। गति का यह रूप या तो किसी वस्तु में निहित होता है या बाहर से उसे दिया  जाता है। मिसाल के लिये, पानी की गरमी का पहले उसकी तरलता पर कोई असर नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे द्रवित जल की गरमी बढ़ती या कम होती है, एक क्षण ऐसा आता है जब यह भीतरी दशा बदल जाती है और पानी या तो भाप बन जाता है या बरफ़ बन जाता है।... प्लैटिनम के तार को एक निश्चित अल्पतम करेण्ट की जरूरत होती है। हर धातु तापमान के किसी बिन्दु पर पहुंच कर गलने लगती है। हर एक द्रव पदार्थ एक बिन्दु पर पहुंच कर जमने लगता है और एक निश्चित दबाव पड़ने पर खौलने लगता है। और, हम प्राप्य साधनों से इन आवश्यक तापमानों तक पहुंच सकते हैं। इसी तरह, हरेक गैस का भी एक ऐसा विशेष बिन्दु होता है जहां जरूरी दबाव या ठण्डक पहुचाने से उसे हम द्रव पदार्थ में बदल सकते हैं। ... भौतिक विज्ञान में जिन्हें हम 'कान्स्टेण्ट' (स्थिर बिन्दु) ख्वह बिन्दु जहां एक दशा दूसरी में तब्दील हो जाती है - सम्पादक, कहते हैं, वे ज्यादातर 'नोडल पाइंट' (चरम बिन्दु) के नाम हैं, जहां पर परिमाण की (तब्दीली - सम्पादक) गति की घटती या बढ़ती किसी वस्तु की दशा में गुणात्मक तब्दीली पैदा कर देती है और इसके फलस्वरूप जहां पर परिमाण गुण में बदल जाता है।" (प्रकृति सम्बन्धी द्वंद्ववाद)।

आगे, रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) की तरफ़ आकर एंगेल्स कहते हैं: "रसायन के लिये कहा जा सकता है कि यह गुणात्मक तब्दीलियों का विज्ञान है। परिमाण सम्बन्धी बनावट की तब्दीली के फलस्वरूप, वस्तुओं में गुणात्मक तब्दीली होती है। हेगेल को इस बात का तभी पता था।... मिसाल के लिये, 'आक्सिजन' लीजिये। अगर परमाणु (मालीक्यूल) में सहज दो के बदले तीन अणु (एटम) हों तो 'ओज़ोन' बन जाता है। यह वस्तु अपनी गंध और प्रतिक्रिया में मामूली 'आॅक्सीजन' से निश्चित रूप से भिन्न होती है। और, इस बात का जिक्र ही क्या कि अलग-अलग तादाद में अगर 'आॅक्सीजन' को 'नाइट्रोजन' या गंधक से मिलाया जाये तो हर बार ऐसी चीज बनेगी जो गुण में उसे बनाने वाली सभी चीजों से भिन्न् होगी।" (उप.)

अंत में, एंगेल्स ने इस सिलसिले में डूयरिंग की आलोचना की है। डूयरिंग ने पूरा जोर लगा कर हेगेल को डांट-फटकार बतलाई थी, लेकिन उसने चोरी-चोरी हेगेल का यह प्रसिद्ध विचार ले लिया था कि अचेतन संसार से चेतन की तरफ़ प्रगति, निर्जीव पदार्थों के संसार से सजीव पदार्थों के संसार की तरफ प्रगति, एक नयी दिशा की तरफ़ छलांग भरना है।

एंगेल्स ने लिखा है:

"यह हेगेल की माप सम्बन्धी 'नोडल लाइन' (चरम रेखा) ही है। किसी निश्चित चरम बिन्दु तक पहुंच कर सिर्फ़ परिमाण की घटती या बढ़ती से गुणात्मक छलांग पैदा हो जाती है। मिसाल के लिये, जब पानी को गरम करते हैं या ठण्डा करते हैं तो उसके खौलने और जमने के बिन्दु वे चरम बिन्दु हैं जहां पर - सहज दबाव पड़ने पर - एक पूर्ण नयी दशा की तरफ़ छलांग भरी जाती है और इसके फलस्वरूप, जहां परिमाण गुण में बदल जाता है।" (एंगेल्स, डूयरिंग मत-खण्डन)।

(घ) अधिभूतवाद के खिलाफ, द्वंद्ववाद का कहना है कि सभी वस्तुओं और प्रकृति के सभी घटना प्रवाहों में अंतर्विरोध निहित हैं। उन सभी का आस्ति पक्ष और नास्ति पक्ष होता है, भूत और भविष्य होता है, कुछ तत्व मरते और कुछ तत्व विकासमान होते हैं। इन विरोधी तत्वों का संघर्ष, पुराने और नये का संघर्ष मरणशील और अभ्युदयशील का संघर्ष, निर्वाणशील और विकासमान का संघर्ष विकास-क्रम की भीतरी विषय-वस्तु है, वह परिमाण में तब्दीलियों के गुण में तब्दीलियां बनने की भीतरी विषय-वस्तु है।

इसलिये, द्वंद्ववादी तरीके़ का कहना है कि निम्न से उच्चतर की तरफ़ विकास का सिलसिला घटना प्रवाह की शान्तिमय प्रगति का रूप नहीं लेता। वह वस्तुओं और घटना प्रवाह में निहित असंगतियों के प्रकट होने का रूप लेता है, वह उन विरोधी रुझानों के 'संघर्ष' का रूप लेता है जो रुझान इन असंगतियों के आधार पर क्रियाशील होते हैं।

लेनिन का कहना है:

"अपने सही अर्थ में, द्वंद्ववाद वस्तुओं के मूल तत्व में ही असंगतियों का अध्ययन है।" (लेनिन, दर्शन सम्बन्धी नोटबुक, रूसी संस्करण, पृष्ठ 263)

और आगे:

"विकास विरोधी तत्वों का 'संघर्ष' है।" (लेनिन ग्रन्थावली , रूसी संस्करण, खण्ड 13, पृष्ठ 301)

मार्क्सीय द्वंद्वात्मक प्रणाली के मुख्य लक्षण, संक्षेप में, ये हैं:

यह समझना आसान है कि द्वंद्वात्मक तरीके़ के उसूलों को सामाजिक जीवन और समाज के इतिहास के अध्ययन पर लागू करना कितना महत्वपूर्ण है और समाज के इतिहास और सर्वहारा वर्ग की पार्टी की अमली कार्यवाही पर उन्हें लागू करना कितने  भारी महत्व की बात है।

अगर संसार में अलग-अलग घटना प्रवाह नहीं हैं, अगर सभी घटना प्रवाह परस्पर निर्भर और सम्बन्धित हैं, तो यह बात साफ़ है कि किसी समाज-व्यवस्था या इतिहास के किसी सामाजिक आन्दोलन का मूल्यांकन 'शाश्वत न्याय' के विचार से और किसी पूर्व निश्चित धारणा के अनुसार न करना चाहिये, जैसा कि इतिहासकार बहुत बार करते हैं। यह मूल्यांकन उन परिस्थितियों के लिहाज से करना चाहिये जिन्होंने उस व्यवस्था को या उस सामाजिक आन्दोलन को जन्म दिया था और जिससे वे सम्बन्धित हैं।

आजकल की परिस्थितियों में गुलामी की प्रथा निरर्थक, मूर्खतापूर्ण और अस्वाभाविक होगी। लेकिन उन परिस्थितियांे में, जब आदिम साम्यवादी व्यवस्था टूट रही थी, तब गुलामी की प्रथा बिल्कुल सार्थक और एक स्वाभाविक घटना प्रवाह थी। कारण यह कि उस समय वह आदिम साम्यवादी व्यवस्था से आगे बढ़ी हुई व्यवस्था थी।

जब ज़ारशाही और पूंजीवादी समाज 1905 के रूस में मौजूद थे, तब पूंजीवादी-जनवादी प्रजातंत्र की मांग एक बिल्कुल सार्थक, उचित और क्रांतिकारी मांग थी क्योंकि उस समय पूंजीवादी प्रजातंत्र एक आगे बढ़ा हुआ क़दम होता। लेकिन, अब सोवियत संघ की परिस्थितियों में पूंजीवादी-जनवादी प्रजातंत्र की मांग एक निरर्थक और क्रान्ति-विरोधी मांग होगी; क्योंकि सोवियत प्रजातंत्र के मुकाबिले में पूंजीवादी प्रजातंत्र पीछे की तरफ़ क़दम होगा। सब कुछ परिस्थितियों पर, देश और काल पर निर्भर है।

यह बात साफ़ है कि सामाजिक घटना-प्रवाह की तरफ़ इस ऐतिहासिक रूख के बिना इतिहास-विज्ञान का अस्तित्व और विकास नामुमकिन है। यही रुख इतिहास-विज्ञान को इस बात से बचाता है कि वह केवल घटना-संग्रह और बेहद भद्दी भूलों की सूची न बन जाये।

और भी, अगर संसार सतत गतिशीलता और विकास की दशा में है, अगर प्राचीन का मरना और नवीन की बढ़ती विकास का नियम है, तो यह बात साफ़ है कि कोई भी समाज-व्यवस्था 'अजर-अमर' नहीं है, व्यक्तिगत सम्पत्ति और शोषण के कोई भी 'अमर सिद्धांत' नहीं हैं, कोई भी ऐसे 'शाश्वत विचार' नहीं हैं जिनके अनुसार किसान जमींदार की, और मजदूर पूंजीपति की गुलामी करे।

 इसलिये, समाजवादी व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था की जगह ले सकती है, ठीक जैसे एक समय पूंजीवादी व्यवस्था ने सामन्ती व्यवस्था की जगह ली थी। इसलिये, हमें अपने दृष्टिकोण का आधार समाज के उन स्तरों को न बनाना चाहिये जो अब विकसित नहीं हो रहे हैं, भले ही वह इस समय एक प्रमुख शक्ति हों।

हमे उन स्तरों को अपना आधार बनाना चाहिये जो विकसित हो रहे हैं और जिनके सामने भविष्य है, भले ही इस समय वे प्रमुख शक्ति न बन पाये हों।

1880 के लगभग, जब  मार्क्सवादियों और लोकवादियों में संघर्ष हो रहा था तब रूस का सर्वहारा वर्ग आबादी का एक तुच्छ अल्पसंख्यक भाग था, और निजी मिल्कियत वाले किसान आबादी का भारी बहुसंख्यक हिस्सा थे। लेकिन, वर्ग रूप में सर्वहारा विकसित हो रहा था, जबकि वर्ग रूप में किसान टूट रहे थे। और, इसी वजह से कि वर्ग रूप में सर्वहारा विकसित हो रहा था, मार्क्सवादियों ने सर्वहारा को अपने दृष्टिकोण का आधार बनाया। और, इसमें उन्होंने भूल न की थी क्योंकि, जैसा हम जानते हैं, सर्वहारा वर्ग आगे चल कर एक नगण्य शक्ति से बढ़ कर प्रथम कोटि की ऐतिहासिक और राजनीतिक शक्ति बन गया।

इसलिये नीति में ग़लती न करने के लिये, यह जरूरी है कि हमारी दृष्टि आगे की तरफ़ हो न कि पीछे की तरफ़।

और भी, अगर धीरे-धीरे होने वाली परिमाण की तब्दीली तेज़ी से और सहसा होने वाली गुण की तब्दीली बन जाती है और यह विकास का नियम है तो, यह बात साफ़ है कि पीड़ित वर्ग जब क्रांति करते हैं तो यह काम एकदम स्वाभाविक और लाज़िमी घटना होता है।

इसलिये, पूंजीवाद से समाजवाद की तरफ़ प्रगति और पूंजीवाद की गुलामी से मज़दूर वर्ग की मुक्ति धीमी-धीमी तब्दीली से, सुधारों से, नहीं हो सकती बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के गुण में ही तब्दीली से, क्रान्ति से ही हो सकती है।

इसलिये नीति में ग़लती न करने के लिये, यह जरूरी है कि हम क्रान्तिकारी हों  न कि सुधारवादी।

और भी, अगर विकास का सिलसिला भीतरी असंगतियों के उभर कर सामने आने से चलता है, इन असंगतियों के आधार पर विरोधी शक्तियों की टक्कर से होता है और इन असंगतियों को खत्म करके होता है, तो यह बात साफ़ है कि सर्वहारा का वर्ग-संघर्ष एक बिल्कुल स्वाभाविक और लाज़िमी घटना है।

 इसलिये, हमें पूंजीवादी व्यवस्था की असंगतियों पर पर्दा न डालना चाहिये बल्कि उन्हें उभारना और प्रकट करना चाहिये। हमें वर्ग-संघर्ष को रोकना न चाहिये, बल्कि उसके परिणाम तक उसे ले जाना चाहिये।

इसलिये नीति में ग़लती न करने के लिए, जरूरी है कि हम बिना समझौते की सर्वहारा की वर्ग-नीति का पालन करें, हम मज़दूरों और पूंजीपतियों के हितों के सामंजस्य की सुधारवादी नीति का पालन न करें, हम समझौतावादियों की इस नीति का पालन न करें कि "पूंजीवाद बढ़ते-बढ़ते समाजवाद में बदल जायेगा।"

सामाजिक जीवन पर, समाज के इतिहास पर लागू किया जाने वाला माक्र्सीय द्वंद्वात्मक तरीक़ा यही है।

जहां तक मार्क्सवादी दार्शनिक भौतिकवाद का सम्बन्ध है, वह बुनियादी तौर से दार्शनिक भाववाद का ठीक उल्टा है।

(2) मार्क्सीय दार्शनिक भौतिकवाद के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

(क) भाववाद के अनुसार, संसार एक 'निरपेक्ष विचार', एक 'सर्व-व्यापी आत्मा',  'चेतना' का मूर्त स्वरूप है। इसके खिलाफ, मार्क्स के दार्शनिक भौतिकवाद का कहना है कि संसार अपने स्वभाव से ही भौतिक है, संसार के नाना घटना प्रवाह गतिशील भूत (पदार्थ) के विभिन्न्ा रूप हैं। द्वंद्ववादी पद्धति ने घटना प्रवाहों का जो परस्पर सम्बन्ध और निर्भरता क़ायम की है, वह गतिशील भूत के विकास का नियम है। संसार भूत की गति के नियमों के अनुसार विकसित होता है और उसे 'विश्वव्यापी आत्मा' की कोई जरूरत नहीं है।

एंगेल्स ने लिखा है:

"प्रकृति के बारे में भौतिकवादी दर्शन का इसके सिवा कोई मतलब नहीं है कि प्रकृति जैसी है, बिना किसी बाहरी मिलावट के, वैसी ही समझी जाये।"  (एंगेल्स, लुडविग फ़ायरबाख ़, अं. सं., मास्को, 1934, पृष्ठ 79)

प्राचीन दार्शनिक हिरैक्लाइटस का मत था कि "संसार को, अनेक की एकता को, किसी देवता या मनुष्य ने न रचा था बल्कि वह एक सजीव ज्योति थी, है और हमेशा रहेगी, जो नियमित रूप से जल उठती है और नियमित रूप से ही ठण्डी पड़ जाती है।" इस मत की चर्चा करते हुए, लेनिन ने टिप्पणी लिखी थी: "द्वंद्वात्मक भौतिकवाद  के मूल तत्वों की यह बहुत अच्छी व्याख्या है।" (लेनिन, दर्शन सम्बन्धी नोट बुक, रूसी  संस्करण, पृष्ठ 318)

 (ख) भाववाद का दावा है कि वास्तव में केवल हमारी चेतना की ही सत्ता है; भौतिक संसार, सत्ता, प्रकृति, केवल हमारी चेतना में, हमारे संवेदनों में, विचारों और गोचरता में रहती है। इसके खिलाफ़, माक्र्सीय भौतिकवादी दर्शन का कहना है कि भूत, प्रकृति, सत्ता एक वस्तुगत सच्चाई है। उसका अस्तित्व हमारी चेतना से बाहर और स्वतंत्र होता है। मूल वस्तु भूत है क्योंकि वही संवेदनों, विचारों और चेतना का स्त्रोत है। चेतना गौण है, उसी से उत्पन्न् है क्योंकि वह भूत का प्रतिबिंब है, सत्ता का प्रतिबिम्ब है। विचार भूत की ही उपज है, ऐसा भूत जो अपने विकास में पूर्णता के ऊंचे स्तर तक, यानी दिमाग तक, पहंुच गया है। दिमाग़ चिंतन करने की इंद्रिय है। इसलिये चिंतन को भूत से अलग करना भारी ग़लती करना है। एंगेल्स ने लिखा था:

"चिंतन से सत्ता के सम्बन्ध का सवाल, प्रकृति से आत्मा के सम्बन्ध का सवाल, तमाम दर्शन का मुख्य सवाल है। ... इस सवाल का दार्शनिकों ने जो जवाब दिया, उससे वे दो बडे़ दलों में बंट गये। जो कहते थे कि प्रकृति के मुकाबिले में आत्मा मूल है... वे भाववाद के दल में शामिल हुए। दूसरे लोग जो कहते थे कि प्रकृति मूल है, वे भौतिकवाद के विभिन्न्ा स्कूलों में शामिल हैं।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , अं.सं., मास्को, 1946, खण्ड 1, पृष्ठ 366-67)

और आगे:

"वह संसार जो भौतिक है, इन्द्रियों से जाना जाता है, जिसमें हम स्वयं हैं, एकमात्र सच्चाई है। हमारी चेतना और चिंतन, वे इन्द्रियों से जितने चाहे परे अतीन्द्रिय मालूम पडें, वे एक भौतिक, शारीरिक इन्द्रिय - दिमाग - की उपज है। भूत चेतना की उपज नहीं है, बल्कि चेतना ही खुद भूत की सबसे उंची उपज है।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , रू.सं., खण्ड 1 पृष्ठ 332)

भूत और चिंतन के सवाल पर, मार्क्स ने लिखा है:

"चिन्तनशील भूत से चिंतन को अलग करना असंभव है। तमाम परिवर्तनों की विषय-वस्तु भूत ही है।"  (उप., पृष्ठ 335)

माक्र्सीय दार्शनिक भौतिकवाद का वर्णन करते हुए, लेनिन ने लिखा है: "आम तौर से भौतिकवाद वस्तुगत रूप से वास्तविक सत्ता (भूत) को चेतना, संवेदना और अनुभव से स्वतंत्र मानता है। ... चेतना सत्ता का ही प्रतिबिम्ब है, अधिक से अधिक वह सत्ता का लगभग सच्चा (पर्याप्त, बिल्कुल वैसा ही) प्रतिबिम्ब है।" (लेनिन, भौतिकवाद और अनुभव सिद्ध आलोचना , अं.सं., मास्को, 1947, पृष्ठ 337-38)

और आगे:

-"भूत वह है जो हमारी इन्द्रियों पर आघात करके संवेदना पैदा करता है। भूत वह वस्तुगत सच्चाई है जो हमें संवेदना से मिलती है... भूत, प्रकृति, सत्ताभौतिक जगत - मूल है; और आत्मा, चेतना, संवेदन, मानसिक जगत गौण है।" (उप., पृष्ठ 145-146)

-"संसार का दृष्य इस बात का दृश्य है कि भूत में गति कैसे होती है और  'भूत चिंतन' कैसे करता है।" (उप. 367)

-"दिमाग चिंतन की इन्द्रिय है।" (उप. 152)

(ग) भाववाद इस बात को अस्वीकार करता है कि हम संसार और उसके नियमों को जान सकते हैं। उसे हमारे ज्ञान की प्रामाणिकता पर विश्वास नहीं है। वह वस्तुगत सच्चाई को स्वीकार नहीं करता, उसका कहना है कि संसार 'अज्ञेय वस्तुओं' से भरा हुआ है, जिन्हें विज्ञान कभी नहीं जान सकता। भाववाद के खिलाफ़, माक्र्सीय भौतिकवाद का कहना है कि संसार और उसके नियम पूरी तरह से जाने जा सकते हैं। प्रकृति के नियमों का हमारा ज्ञान, जिसे हम प्रयोग और अभ्यास से परखते हैं, सच्चा ज्ञान है। उसकी प्रामाणिकता वस्तुगत सच्चाई की सी है। संसार में ऐसी वस्तुएं नहीं हैं जो जानी न जा सकें। संसार में केवल ऐसी वस्तुएं हैं जो अभी तक जानी नहीं गयीं, लेकिन जो विज्ञान और अमल के प्रयत्नों से प्रकट की जायेंगी और जानी जायेंगी।

ऐंगेल्स ने काण्ट और दूसरे भाववादियों की इस धारणा की आलोचना की थी कि संसार अज्ञेय है और उसमें ऐसी 'अज्ञेय वस्तुएं' हैं जो जानी नहीं जा सकतीं। एंगेल्स ने इस प्रसिद्ध भौतिकवादी धारणा का समर्थन किया था कि हमारा ज्ञान प्रामाणिक ज्ञान है। इस सिलसिले में, उन्होंने लिखा था:

"इस धारणा और इसी तरह की दूसरी दार्शनिक उड़ानों का सबसे ज़ोरदार खण्डन व्यवहार है, यानी प्रयोग और उद्योग है। किसी प्राकृतिक क्रम की अपनी समझ को अगर हम खुद उस क्रम को रच कर सही साबित कर दें, उसकी  परिस्थितियों से उसे निकाल कर उसे जन्म दे दें और घाते में उससे अपना काम भी निकाल लें, तो उससे काण्ट की न समझ में आने वाली, 'अज्ञेय वस्तु' का खात्मा हो जाता है। पौधों और पशुओं की देह में पैदा होने वाले रासायनिक  पदार्थ ऐसी ही 'अज्ञेय वस्तुएं' रहीं जब तक कि जैविक रसायन शास्त्र (आॅरगैनिक कैमिस्ट्री) ने उन्हें एक के बाद एक बनाना शुरू नहीं कर दिया। उसके बाद, वे 'अज्ञेय वस्तुएं' हमारे लिये वस्तुएं बन गयीं? मिसाल के लिये, मज़ीठ का रंग देने वाला पदार्थ 'अलीज़रीन' होता है। उसे हम खेत में मज़ीठ की जड़ों में नहीं उगाते। अब उसे हम ज्यादा सस्ते और सीधे ढंग से बना लेते हैं। तीन सौ साल तक कोपरनिकस का सौर मण्डल एक कल्पना रहा। उसके पक्ष में सौ, हज़ार, या दस हज़ार बातें हो सकती थीं और विपक्ष में एक ही, फिर भी वह कल्पना ही रहा। लेकिन, जब लवेरियर ने सौर मण्डल से प्राप्त सामग्री के ज़रिये एक अज्ञात नक्षत्र के होने की ज़रूरत ही न निकाल ली बल्कि उस जगह का भी हिसाब लगा लिया जहां आकाश में इस नक्षत्र को ज़रूर ही होना था और जब गाले ने सचमुच वह नक्षत्र ढूंढ निकाला तब कोपरनिकस का सौर मण्डल सिद्ध हो गया।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , अं.सं., मास्को, 1946, खं. 1 पृ. 368)

लेनिन ने बुग्दानोव, बजारोव, यूश्केविच और माख के दूसरे अनुयायियों पर श्रद्धावादी होने का आरोप लगाया था। उन्होंने इस, प्रसिद्ध भौतिकवादी स्थापना का  समर्थन किया कि प्रकृति के नियमों का हमारा विज्ञान सम्मत ज्ञान प्रामाणिक ज्ञान है और विज्ञान के नियम वस्तुगत सत्य जाहिर करते हैं। इस सिलसिले में, लेनिन ने लिखा था:

"आजकल का श्रद्धावाद विज्ञान को तो नहीं ठुकराता। वह सि़र्फ 'बढ़े-चढ़े दावों' को ठुकराता है, यानी यह दावा कि विज्ञान वस्तुगत सच्चाई दे सकता है। अगर वस्तुगत सच्चाई है (जैसा कि भौतिकवादी  मझते हैं), अगर मनुष्य  के 'अनुभव' में, बाहरी संसार को प्रतिबिम्बित करते हुए, प्रकृति-विज्ञान ही हमें वस्तुगत सचाई दे सकता है, तो सभी श्रद्धावाद का पूरी तरह खण्डन हो जाता है।" (लेनिन, भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना, अं.सं., मास्को, 1947, पृष्ठ  123-24)

संक्षेप मेंमार्क्सीय दार्शनिक भौतिकवाद के मुख्य लक्षण ये हैं।

यह समझना आसान है कि सामाजिक जीवन के अध्ययन पर, समाज के इतिहास के अध्ययन पर, दार्शनिक भौतिकवाद के उसूलों को लागू करना कितने भारी महत्व की बात है और समाज के इतिहास और सर्वहारा वर्ग की पार्टी की अमली कार्यवाही पर उन्हें लागू करना कितने भारी महत्व की बात है।

अगर प्रकृति के घटना प्रवाह परस्पर सम्बन्धित और निर्भर हैं और यह प्रकृति के विकास का नियम है, तो उससे नतीजा निकलता है कि सामाजिक जीवन के घटना प्रवाहों का परस्पर सम्बन्ध और निर्भरता समाज के विकास का नियम है और आकस्मिक बात नहीं है।

इसलिये सामाजिक जीवन, समाज का इतिहास, 'आकस्मिक घटनाओं' का संग्रह नहीं है। वह निश्चित नियमों के अनुसार समाज के विकास का इतिहास बन जाता है और सामाजिक इतिहास के अध्ययन का विज्ञान बन जाता है।

इसलिये, सर्वहारा वर्ग की पार्टी की अमली कार्यवाही का आधार 'महापुरुषों' की शुभ कामनाओं को न बनाना चाहिये, 'बुद्धि' की पुकार को न बनाना चाहिये, 'विश्वजनीन नैतिकता' वगैरह को न बनाना चाहिये, बल्कि सामाजिक विकास के नियमों को और इन नियमों के अध्ययन को बनाना चाहिये।

और भी, अगर संसार जाना जा सकता है और प्रकृति के विकास के नियमों की हमारी जानकारी प्रामाणिक जानकारी है, जिसकी प्रामाणिकता वस्तुगत सच्चाई जैसी है, तो उससे नतीजा निकलता है कि सामाजिक जीवन, सामाजिक विकास भी जाना जा सकता है और सामाजिक विकास के नियमों के बारे में विज्ञान की दी हुई सामग्री सच्ची सामग्री है जिसकी प्रामाणिकता वस्तुगत सच्चाई जैसी है।

इसलिये, समाज के इतिहास का विज्ञान, सामाजिक जीवन के पेचीदे घटना प्रवाह के बावजूद, उतना ही निश्चयात्मक विज्ञान हो सकता है जितना, मिसाल के लिये, प्राणि-शास्त्र (बायलाॅजी), और वह अमली उद्देश्य के लिये सामाजिक विकास के नियमों से लाभ उठा सकता है।

इसलिये, सर्वहारा वर्ग की पार्टी को अपनी अमली कार्यवाही में अनिश्चित उद्देश्यों से अपना रास्ता न निश्चित करना चाहिये बल्कि सामाजिक विकास के नियमों से, और इन नियमों से अमली नतीजे निकाल कर, निश्चित करना चाहिये।

इसलिये, समाजवाद मानव जाति के सुन्दर भविष्य के लिये एक सपना न रह कर विज्ञान बन जाता है।

इसलिये, विज्ञान और अमली कार्यवाही का सम्बन्ध, सिद्धांत और अमल का सम्बन्ध, उनकी एकता, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिये ध्रुव नक्षत्र बन जानी चाहिये।

और भी, अगर प्रकृति, सत्ता, भौतिक संसार मूल है और चेतना, विचार गौण है। उससे उत्पन्न्ा है, अगर भौतिक संसार ऐसी वस्तुगत सच्चाई है जो मनुष्यों की चेतना से स्वतंत्र है, जबकि चेतना इसी वस्तुगत सच्चाई का प्रतिबिम्ब है; तो नतीजा यह निकलता है कि समाज का भौतिक जीवन, उसकी सत्ता भी मूल है और उसका मानसिक जीवन गौण है, उससे उत्पन्न्ा है, और समाज का भौतिक जीवन ऐसी वस्तुगत सच्चाई है जो मनुष्यों की इच्छा से स्वतंत्र है, जबकि समाज का मानसिक जीवन इस वस्तुगत सच्चाई का प्रतिबिम्ब है, सत्ता का प्रतिबिम्ब है।

इसलिये, समाज के मानसिक जीवन के निर्माण का स्रोत, सामाजिक विचारों, सामाजिक सिद्धांतों, राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओं का स्रोत्र खुद विचारों, सिद्धांतों, मतों और राजनीतिक संस्थाओं में न ढूंढना चाहिये बल्कि समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों में, सामाजिक सत्ता में ढूंढ़ना चाहिये, जिनका प्रतिबिम्ब ये विचार, सिद्धांत, मत वगैरह हैं।

इसलिये, सामाजिक इतिहास के विभिन्न्ा युगों में विभिन्न्ा सामाजिक विचार, सिद्धांत, मत और राजनीतिक संस्थायें देखी जाती हैं। अगर गुलामी की प्रथा वाले समाज में कोई खास सामाजिक विचार, सिद्धांत, मत और राजनीतिक संस्थायें मिलती हैं, सामंतशाही में दूसरी मिलती हैं और पंूजीवाद में और भी दूसरी, तो इसका कारण विचारों, सिद्धांतों, मतों और राजनीतिक संस्थाओं की खुद उनकी 'प्रकृति' उनके 'गुणों' में नहीं है बल्कि इसका कारण सामाजिक विकास के विभिन्न्ा युगों में, समाज के भौतिक जीवन की विभिन्न्ा परिस्थितियों में है।

समाज की जो भी सत्ता होती है, समाज के भौतिक जीवन की जो भी परिस्थितियां होती हैं, वैसे ही उस समाज के विचार, सिद्धांत, राजनीतिक मत और राजनीतिक संस्थायें होती हैं।

इस सिलसिले में, मार्क्स ने लिखा है: "मनुष्य की चेतना उनकी सत्ता की नियामक नहीं है बल्कि इसके विपरीत, उनकी सामाजिक सत्ता उनकी चेतना की नियामक है।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , अं.सं., मास्को, 1946, खण्ड 1, पृष्ठ 300)

इसलिये नीति में ग़लती न करने के लिये जरूरी है, हम निष्क्रिय सपने देखने वालों की जगह न ले लें। इसके लिये जरूरी है कि सर्वहारा वर्ग की पार्टी अपनी कार्यवाही का आधार 'मानव विवेक के' हवाई 'सिद्धांतों' को न बनाये बल्कि समाज के भौतिक जीवन की ठोस परिस्थितियों को बनाये, जो कि सामाजिक विकास की नियामक शक्ति हैं; 'महापुरुषों' की शुभ कामनाओं को न बनाये बल्कि समाज के भौतिक जीवन के विकास की सच्ची आवश्यकताओं को बनाये।

कल्पनावादियों, जिनमें लोकवादी शामिल हैं, अराजकवादियों और समाजवादी क्रांतिकारियों का पतन इसलिये भी हुआ कि वे सामाजिक विकास में समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों की प्रमुख भूमिका को नामंजूर करते थे। भाववाद की सतह तक उतर कर, वे अपनी अमली कार्यवाही का आधार समाज के भौतिक जीवन के विकास की आवश्यकताओं को न बनाते थे बल्कि इन आवश्यकताओं से स्वतंत्र और उनके बावजूद 'आदर्श योजनाओं' और 'व्यापक कार्यक्रम' को बनाते थे, जो समाज के वास्तविक जीवन से दूर थे।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद की शक्ति और सजीवता इस बात में है कि उनकी अमली कार्यवाही का आधार समाज के भौतिक जीवन के विकास की आवश्यकताएं हैं। वह अपने को समाज के वास्तविक जीवन से कभी अलग नहीं करता।

लेकिन, मार्क्स के शब्दों से यह नतीजा नहीं निकलता कि समाज के जीवन में सामाजिक विचारों, सिद्धांतों, राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओं का कोई महत्व नहीं, और वे बदले में सामाजिक सत्ता, सामाजिक जीवन की भौतिक परिस्थितियों के विकास पर असर नहीं डालतीं। अभी तक हम सामाजिक विचारों, सिद्धांतों, मतों और राजनीतिक संस्थाओं के स्रोत की बात कर रहे थे, उनका जन्म कैसे होता है इसकी  चर्चा कर रहे थे, समाज का मानसिक जीवन उसके भौतिक जीवन की परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब है, - इसकी चर्चा कर रहे थे। जहां तक सामाजिक विचारों, सिद्धांतोंमतों और राजनीतिक संस्थाओं के महत्व का सवाल है, इतिहास में उनकी भूमिका का सवाल है, वहां उसे अस्वीकार करना तो दूर, ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक जीवन में, समाज के इतिहास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और उनके महत्व पर ज़ोर देता है।

सामाजिक विचार और सिद्धांत तरह-तरह के होते हैं। पुराने विचार और सिद्धांत होते हैं, जिनके दिन बीत चुके हैं और जो समाज की उन शक्तियों का हित साधते हैं जिनकी गति रुक गयी है। उनका महत्व इस बात में है कि वे समाज के विकास, उसकी प्रगति को रोकते हैं। फिर, नये और आगे बढे़ हुए विचार और सिद्धांत होते हैं, जो समाज की आगे बढ़ी हुई शक्तियों का हित साधते हैं। उनका महत्व इस बात में है कि वे समाज के विकास, उसकी प्रगति को आसान बनाते हैं। उनका महत्व उतना ही बढ़ जाता है जितना ही सही-सही वे समाज के भौतिक जीवन के विकास की आवश्यकताओं को प्रकट करते हैं।

नये सामाजिक विचार और सिद्धांत तभी पैदा होते हैं जब समाज के भौतिक जीवन का विकास समाज के सामने नये काम पेश कर चुका होता है। लेकिन, एक बार पैदा हो जाने पर वह बहुत ही समर्थ शक्ति बन जाते हैं। यह शक्ति उन नये कामों को पूरा करने  में मदद देती है जिन्हें समाज के भौतिक जीवन के विकास ने पेश किया था। वह ऐसी शक्ति है जो समाज की प्रगति में मदद देती है। ठीक यहीं पर नये विचारों, नये सिद्धांतों, नये राजनीतिक मतों और नयी राजनीतिक संस्थाओं का भारी संगठन करने वाला, बटोरने  वाला और तब्दीली करने वाला मूल्य प्रकट होता है। नये सामाजिक विचार ठीक इसीलिये

पैदा होते हैं कि वे समाज के लिये जरूरी हैं, इसलिये कि अगर वह संगठित करने, बटोरने और तब्दील करने का काम न करें तो समाज के भौतिक जीवन के विकास के लिये जरूरी काम पूरे करना मुमकिन हो जाये। नये सामाजिक विचार और सिद्धांत उन नये कामों से पैदा होते हैं जिन्हें समाज के भौतिक जीवन का विकास पेश करता है।

फिर, वे अपना रास्ता बना लेते हैं, वे आम जनता की सम्पत्ति बन जाते हैं, समाज की गतिहीन शक्तियों के खिलाफ़ उसे बटोरते और संगठित करते हैं और इस तरह, समाज के भौतिक जीवन को रोकने वाली इन शक्तियों को परास्त करने में मदद देते हैं।

इस तरह, सामाजिक विचार, सिद्धांत और राजनीतिक संस्थाएं समाज के भौतिक जीवन के विकास, सामाजिक सत्ता के विकास के जरूरी कामों के आधार पर पैदा होते हैं। उसके बाद वे खुद सामाजिक सत्ता पर, समाज के भौतिक जीवन पर असर डालते हैं। वे ऐसी परिस्थितियां तैयार करते हैं जो समाज के भौतिक जीवन के लिये जरूरी कामों को पूरी तरह करने के लिये और समाज के भौतिक जीवन का अगला विकास मुमकिन बनाने के लिये आवश्यक होते हैं।

इस सिलसिले में, मार्क्स ने लिखा है:

"जनता के हृदय में घर कर लेने पर, सिद्धांत एक भौतिक शक्ति बन जाते हैं" (हेगेल के दर्शन की आलोचना )।

इसलिये, समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियो पर असर डालने के लिये और उनके विकास और सुधार की गति को तेज़ करने के लिये, सर्वहारा वर्ग की पार्टी को ऐसे सामाजिक सिद्धांत का भरोसा करना चाहिये जो सही तौर पर समाज के भौतिक जीवन के विकास की आवश्यकताओं को ज़ाहिर करता हो और इसलिये, जो इस योग्य हो कि विशाल जनता को गतिशील बना सके और सर्वहारा पार्टी की भारी फ़ौज के रूप में उन्हें बटोर सके और संगठित कर सके। यह ऐसी फौज होगी जो प्रतिक्रियावादी शक्तियों का ध्वंस करने के लिये और समाज की प्रगतिशील शक्तियों का रास्ता साफ़ करने के लिये तैयार हो।

'अर्थवादियों' और मेन्शेविकों का पतन इसलिये भी हुआ कि वे प्रगतिशील सिद्धांत, प्रगतिशील विचारों को बटोरने वाली, संगठित करने वाली और तब्दीली करने वाली भूमिका को नामंजूर करते थे। घटिया भौतिकवाद की सतह पर आकर, उन्होंने इन चीजों की भूमिका नहीं के बराबर कर दी थी और इस तरह पार्टी को निष्क्रिय और  निठल्ली बनी रहने के लिये छोड़ दिया था।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद की शक्ति और सजीवता इस बात में है कि वह प्रगतिशील सिद्धांत का सहारा लेता है, ऐसे सिद्धांत का जो समाज के भौतिक जीवन के विकास की आवश्यकताओं को सही तौर पर प्रतिबिम्बित करता है। वह सिद्धांत को उचित सतह तक उठाता है और अपना कर्तव्य समझता है कि इस सिद्धांत में जो बटोरने, संगठित करने और तब्दील करने की ताक़त है, उसे रत्ती-रत्ती इस्तेमाल कर ले।

सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना का सम्बन्ध क्या है, भौतिक जीवन के विकास की परिस्थितियों और समाज के मानसिक जीवन के विकास का सम्बन्ध क्या है, इस सवाल का यही जवाब ऐतिहासिक भौतिकवाद देता है।

 (3) ऐतिहासिक भौतिकवाद

अब एक सवाल का जवाब देना बाक़ी रह गया है: ऐतिहासिक भौतिकवाद के दृष्टिकोण से 'समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों' का क्या मतलब है, जो आखिरी छानबीन में समाज का रूप, उसके विचार, मत, राजनीतिक संस्थायें वगै़रह निश्चित करती हैं।

आखिर, यह 'समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियां' हैं क्या, उनके विशेष लक्षण क्या हैं?

इसमें कोई सन्देह नहीं कि 'समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियां' – इस धारणा मे प्रकृति शामिल है जो समाज को घेरे हुए है, भौगोलिक परिस्थितियां शामिल हैं जो समाज के भौतिक जीवन के लिए एक लाज़िमी और सदा रहने वाली शर्त हैं और जो अवश्य ही समाज के विकास पर असर डालती हैं। सामाजिक विकास में  भौगोलिक परिस्थिति कौन सा पार्ट अदा करती है? क्या भौगोलिक परिस्थिति वह मुख्य शक्ति है जो समाज के रूप को, मनुष्य की समाज-व्यवस्था के रूप को, एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था की ओर प्रगति को निश्चित करती है?

ऐतिहासिक भौतिकवाद इस सवाल के जवाब में कहता है - नहीं।

निस्संदेह, भौगोलिक परिस्थितियां सामाजिक विकास के लिये एक लाज़िमी और हमेशा रहने वाली शक्ति हैं और अवश्य ही सामाजिक विकास पर असर डालती हैं, उस विकास की गति तेज़ करती हैं, या उसे रोकती हैं। लेकिन, उनका असर नियामक नहीं है। कारण यह कि समाज के परिवर्तन और विकास, भौगोलिक परिस्थितियों के परिवर्तन और विकास से निस्बतन कहीं ज्यादा तेज होते हैं। तीन हज़ार साल की अवधि में, तीन विभिन्न्ा समाज-व्यवस्थायें यूरोप में एक के बाद एक आ चुकी हैं:

आदिम साम्यवादी व्यवस्था, ग़ुलामी की व्यवस्था और सामन्ती व्यवस्था। यूरोप के पूर्वी  हिस्से में, सोवियत संघ में चार व्यवस्थायें एक के बाद एक आ चुकी हैं। लेकिन, इसी अवधि में, यूरोप की भौगोलिक परिस्थितियां या तो बदली ही नहीं हैं या इतनी कम बदली हैं कि भूगोल ने उन पर ध्यान ही नहीं दिया है, और यह बिल्कुल स्वाभाविक है। भौगोलिक परिस्थिति में महत्वपूर्ण तब्दीली के लिये लाखों वर्ष चाहिये, जब कि मानव समाज की व्यवस्था में बहुत ही महत्वपूर्ण तब्दीलियों के लिये भी कुछ शताब्दियां या एक-दो हज़ार साल काफ़ी होते हैं।

इससे नतीजा यह निकलता है कि भौगोलिक परिस्थितियां सामाजिक विकास का मुख्य कारण, उसका नियामक नहीं कही जा सकतीं। जो वस्तु स्वयं लाखों साल तक अपरिवर्तित रहे, वह उस चीज के विकास का मुख्य कारण नहीं हो सकती जिसमें कुछ शताब्दियों में ही बुनियादी तब्दीली हो।

और भी, इसमें सन्देह नहीं कि 'समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियां' - इस धारणा में जनसंख्या  बढ़ती भी शामिल है, आबादी का कमोवेश घना होना भी शामिल है, क्योंकि इंसान समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों का जरूरी तत्व है और बिना एक निश्चित अल्पतम जनसंख्या के समाज का भौतिक जीवन हो ही  नहीं सकता। तब क्या जनसंख्या की बढ़ती वह मुख्य शक्ति नहीं है जो मनुष्य की समाज-व्यवस्था का रूप निश्चित करती है?

ऐतिहासिक भौतिकवाद इस सवाल के जवाब में भी कहता है - नहीं।

अवश्य ही, जनसंख्या की बढ़ती समाज के विकास पर असर डालती है, समाज के विकास की गति को तेज़ करने या रोकने में मदद देती है। लेकिन, वह सामाजिक विकास की मुख्य शक्ति नहीं हो सकती और सामाजिक विकास पर उसका असर नियामक नहीं हो सकता। कारण यह कि सिर्फ जनसंख्या की वृद्धि से इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि किसी समाज-व्यवस्था के बदले कोई, विशेष नयी समाज-व्यवस्था ही क्यों आती है और कोई दूसरी क्यों नहीं आती; आदिम साम्यवादी व्यवस्था के बदले ठीक गुलामी की व्यवस्था ही क्यों आती है, गुलामी की व्यवस्था के बदले सामंती व्यवस्था और सामंती व्यवस्था के बदले पंूजीवादी व्यवस्था ही क्यों आती है, कोई दूसरी क्यों नहीं आती।

अगर जनसंख्या की बढ़ती सामाजिक विकास की नियामक शक्ति हो तो जनसंख्या के अधिक घने होने से वैसी ही ऊंचे स्तर की समाज-व्यवस्था भी पैदा हो जाये। लेकिन, हम देखते हैं कि ऐसा नहीं होता। चीन की आबादी अमरीका से चार गुना ज्यादा घनी है, फिर भी सामाजिक विकास-क्रम में अमरीका चीन से ऊपर है। कारण यह कि चीन में अर्द्ध-सामन्ती व्यवस्था अब भी चालू है जब कि अमरीका बहुत पहले पूंजीवाद के उच्चतम विकास की मंजिल तक पहुंच गया है। बेल्जियम की आबादी अमरीका से 19 गुना घनी है और सोवियत संघ से 26 गुना घनी है। फिर भी, अमरीका सामाजिक विकास-क्रम में बेल्जियम से ऊपर है। जहां तक सोवियत संघ का सवाल है, बेल्जियम हमारे देश से एक ऐतिहासिक युग पीछे है; क्योंकि बेल्जियम में पूंजीवादी व्यवस्था चालू है जब कि सोवियत संघ ने पहले ही पूंजीवादी व्यवस्था खत्म कर दी है और समाजवादी व्यवस्था क़ायम कर ली है।

इससे यह नतीजा निकलता है कि जनसंख्या की बढ़ती सामाजिक विकास की मुख्य शक्ति, ऐसी शक्ति जो समाज का रूप, समाज-व्यवस्था का रूप निश्चित करती हो, न है और न हो सकती है।

 क) मुख्य निर्धारक शक्ति क्या है?

 

तब समाज के भौतिक जीवन की परिस्थितियों के व्यूह में वह मुख्य शक्ति कौन सी है जो समाज का रूप, समाज-व्यवस्था का रूप निश्चित करती है, जो एक से दूसरी व्यवस्था की ओर समाज की प्रगति निश्चित करती है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद का कहना है कि यह शक्ति मानव जीवन के लिये आवश्यक ज़िन्दगी के साधनों को हासिल करने का तऱीका है, यह भौतिक मूल्यों की पैदावार का तरीक़ा है - खाना, कपड़ा, जूते, घर, ईंधन, पैदावार के साधन वगैरह -जो सामाजिक जीवन और विकास के लिये अनिवार्य हैं।

जिन्दा रहने के लिये जरूरी है कि लोगों के पास खाना, कपड़ा, जूते, रहने की जगह, ईंधन वगैरह हों। इन भौतिक मूल्यों को हासिल करने के लिये, यह ज़रूरी है कि लोग उन्हें पैदा करें। उन्हें पैदा करने के लिये ज़रूरी है कि लोगों के पास पैदावार के साधन हों, जिनसे कि खाना-कपड़ा, जूते, रहने की जगह ईंधन वगैरह पैदा किये जाते हों। यह जरूरी है कि लोग इन साधनों को पैदा कर सकें और उन्हें काम में ला सकें।

पैदावार के औज़ार, जिनसे भौतिक मूल्य पैदा किये जाते हैं, वे लोग जो पैदावार के औज़ारों को काम में लाते हैं और एक निश्चित पैदावार के अनुभव और श्रम-कौशल से भौतिक मूल्यों की पैदावार करते जाते हैं - ये सब तत्व कुल मिलाकर समाज की उत्पादक शक्तियां हैं।

लेकिन, उत्पादक शक्तियां पैदावार का सिर्फ़ एक पहलू हैं, पैदावार के तरीके़ का सिर्फ़ एक पहलू हैं। यह ऐसा पहलू है जो मनुष्यों के और प्रकृति की वस्तुओं और शक्तियों के सम्बन्ध को प्रकट करता है। इन वस्तुओं और शक्तियों को इन्सान भौतिक मूल्य पैदा करने के लिये काम में लाते हैं। पैदावार का दूसरा पहलू, पैदावार के तरीके़ का दूसरा पहलू उत्पादन-क्रम में मनुष्यों का आपसी सम्बन्ध है, मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्ध हैं। भौतिक मूल्यों को पैदा करने के लिये मनुष्य जब प्रकृति से संघर्ष करते हैं और प्रकृति को काम में लाते हैं तो वे एक-दूसरे से अलग-थलग रह कर, व्यक्तिगत रूप से अलग रहकर नहीं करते बल्कि मिलकर, गुटों में, समाजों में ऐसा करते हैं। इसलिये, उत्पादन सभी समय और सभी परिस्थितियों में सामाजिक उत्पादन होता है। भौतिक मूल्यों की  पैदावार में उत्पादन के भीतर मनुष्य आपस में एक या दूसरी तरह के सम्बन्ध क़ायम करते हैं, वे एक या दूसरी तरह के उत्पादन-सम्बन्ध क़ायम करते हैं। ये संबंध इस तरह के लोगों में, जो शोषण से मुक्त हैं, सहयोग और परस्पर सहायता के संबंध हो सकते हैं।

वे प्रभुत्व और पराधीनता के संबंध हो सकते हैं, और अंत में उत्पादन-सम्बन्धों के एक रूप से दूसरे रूप की तरफ़ बढ़ने की दशा के हो सकते हैं। लेकिन, उत्पादन-सम्बन्धों का जो भी रूप हो, वे हमेशा और हर व्यवस्था में पैदावार का वैसा ही ज़रूरी हिस्सा होते हैं, जैसा कि समाज की उत्पादक शक्तियां।

मार्क्स ने लिखा था:

"पैदावार में इंसान प्रकृति पर ही नहीं बल्कि एक-दूसरे पर भी अपना प्रभाव डालते हैं। किसी निश्चित तरीके़ से सहयोग करके ही और अपनी कार्यवाही की परस्पर अदला-बदली करके ही, वह पैदावार कर सकते हैं। पैदावार करने के लिये, वे एक-दूसरे से निश्चित सम्पर्क और सम्बन्ध स्थापित करते हैं और इन सामाजिक सम्पर्क और सम्बन्धों के भीतर ही प्रकृति पर प्रभाव पड़ता है, उनकी पैदावार होती है।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं., अं. सं., मास्को, 1946, खण्ड 1, पृष्ठ 211)

नतीजा यह कि पैदावार में, पैदावार के तरीके़ में, दोनों चीजें शामिल हैं समाज की उत्पादक शक्तियां और मनुष्यों के उत्पादक-सम्बन्ध। इस तरह, पैदावार, पैदावार का तरीक़ा, भौतिक मूल्यों के उत्पादन-क्रम में उत्पादक शक्तियों और उत्पादन-सम्बन्धों की एकता का मूर्त रूप है।

 () उत्पादन(पैदावार) की पहली विशेषता

पैदावार का पहला लक्षण यह है कि वह ज्यादा समय के लिये किसी एक जगह स्थिर नहीं रहती। वह हमेशा परिवर्तन और विकास की दशा में रहती है। इसके सिवा, पैदावार के तरीके़ में तब्दीली होने से लाज़िमी तौर पर समूची समाज-व्यवस्था में, सामाजिक विचारों, राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओं में तब्दीली होती है; समूची सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की फिर से रचना होती है। विकास की विभिन्न्ा मंजिलों में लोग पैदावार के विभिन्न्ा तरीके़ इस्तेमाल करते हैं, या मोटे रूप में कहें, विभिन्न्ा तरह की जिन्दगी बसर करते हैं। आदिम कम्यून में, पैदावार का एक तरीक़ा होता है, गुलामी की प्रथा में पैदावार का दूसरा तरीक़ा होता है, सामन्तशाही में पैदावार का तीसरा तरीक़ा होता है, इत्यादि। और, इसी के अनुकूल मनुष्यों की समाज-व्यवस्था, मनुष्यों का मानसिक जीवन उनके मत और राजनीतिक संस्थायें भी बदलती हैं।

किसी समाज के पैदावार का तरीक़ा जैसा होता है, मुख्य रूप से वैसा ही वह समाज होता है, वैसे ही उसके विचार और सिद्धांत, उसके राजनीतिक मत और संस्थायें होती हैं।

या, मोटे रूप में कहें - इंसान की जैसी जिन्दगी होती है, वैसे ही उसके विचार होते हैं।

इसका अर्थ यह है कि सामाजिक विकास का इतिहास सबसे पहले पैदावार के विकास का इतिहास है, पैदावार के उन तरीक़ों का इतिहास है जो शताब्दियों के दौरान में एक के बाद एक आते हैं, उत्पादक शक्तियों और मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्धों के विकास का इतिहास है।

इसलिये, सामाजिक विकास का इतिहास साथ ही खुद भौतिक मूल्य पैदा करने वालों का भी इतिहास है, उस श्रमिक जनता का इतिहास है जो उत्पादन-क्रम की मुख्य शक्ति है और जो समाज की जिन्दगी के लिये आवश्यक भौतिक मूल्यों की पैदावार जारी रखती है।

इसलिये, अगर इतिहास के विज्ञान को सचमुच विज्ञान बनना है तो वह सामाजिक विकास के इतिहास को घटाकर राजाओं और सेनापतियों की कार्यवाही, 'विजेताओं' और दूसरे राज्यों को 'पराधीन करने वालों' का इतिहास नहीं बनाया जा सकता।

इतिहास-विज्ञान को सबसे पहले भौतिक मूल्य पैदा करने वालों के इतिहास, श्रमिक जनता के इतिहास, जन-साधारण के इतिहास की तरफ़ ध्यान देना होगा।

इसलिये, समाज के इतिहास के नियमों का अध्ययन करने के लिये इंसान के दिमागों में, समाज के मतों और विचारों में सूत्र न खोजना चाहिये बल्कि पैदावार के तरीके में ढूंढना चाहिये, जो किसी विशेष ऐतिहासिक युग में समाज के अन्दर चालू हों। वह सूत्र समाज के आर्थिक जीवन में ढूंढना चाहिये।

इयलिये, इतिहास-विज्ञान का मुख्य काम यह है कि पैदावार के नियमों, उत्पादक शक्तियों और उत्पादन-सम्बन्धों के विकास के नियमों, समाज के आर्थिक विकास के नियमों का अध्ययन करे और उन्हें जाहिर करे।

इसलिये, सर्वहारा वर्ग की पार्टी को अगर सच्ची पार्टी बनना है तो उसे सबसे पहले पैदावार के विकास के नियमों का, समाज के आर्थिक विकास के नियमों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।

इसलिये नीति में ग़लती न करने के लिये, यह जरूरी है कि सर्वहारा वर्ग की पार्टी अपने प्रोग्राम का मसौदा बनाने में और अमली कार्यवाही में भी सबसे पहले पैदावार के विकास के नियमों के आधार पर, समाज के आर्थिक विकास के नियमों के आधार पर आगे बढे़।

 (ग) पैदावार का दूसरा लक्षण

पैदावार का दूसरा लक्षण यह है कि उसकी तब्दीली और विकास हमेशा उत्पादक शक्तियों की तब्दीली और विकास से शुरू होता है और, सबसे पहले, पैदावार  के साधनों में तब्दीली और विकास से शुरू होता है। इसलिये, उत्पादक शक्तियां पैदावार का सबसे गतिशील और क्रांतिकारी तत्व हैं। पहले समाज की उत्पादक शक्तियां बदलतीं और विकसित होती हैं और उसके बाद, इन्हीं तब्दीलियांे पर निर्भर और इन्हीं के अनुकूल, मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्ध, उनके आर्थिक सम्बन्ध बदलते हैं। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं है कि उत्पादन-सम्बन्धों का असर उत्पादक शक्तियों के विकास पर नहीं पड़ता और ये उत्पादक शक्तियां उत्पादन-सम्बंधों पर निर्भर नहीं हैं। उत्पादन-सम्बन्धों का विकास उत्पादक शक्तियों के विकास पर निर्भर जरूर है, लेकिन वे खुद अपनी बार उत्पादक शक्तियों के विकास पर असर डालते हैं, उनकी गति को तेज़ करते हैं या रोकते हैं। इस सिलसिले में, इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि पैदावार के सम्बन्ध बहुत दिनों तक उत्पादक शक्तियों की बढ़ती से पीछे और उनसे विरोध की दशा में नहीं रह सकते। कारण यह कि उत्पादक शक्तियां पूरी तरह से तभी बढ़ सकती हैं जब उत्पादन के सम्बन्ध उनके रूप से, उनकी दशा से मेल खाते हों और उन्हें पूरी तरह विकसित होने का मौका देते हों। इसलिये, पैदावार के सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के विकास के चाहे जितने पीछे रहें, उन्हें आगे-पीछे उत्पादक शक्यिों के विकास की सतह के अनुकूल, उत्पादक शक्तियों के रूप के अनुकूल बनना ही पडे़गा - और दरअसल वे उसके अनुकूल बन जाते हैं। ऐसा न हो तो पैदावार की व्यवस्था में उत्पादक शक्तियों और पैदावार के सम्बन्धों की एकता बुनियादी तौर से टूट जाये, समूची पैदावार में तोड़-फोड़ हो जाये, पैदावार में संकट आ जाये, उत्पादक शक्तियों का नाश हो जाये।

इस बात की मिसाल, जबकि पैदावार के सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के रूप के अनुकूल नहीं होते, उनसे टक्कर लेते हैं, पूंजीवादी देशों का आर्थिक संकट है।

वहां पैदावार के साधनों की निजी पूंजीवादी मिल्कियत उत्पादन-क्रम के सामाजिक रूप, उत्पादक शक्तियों के रूप की खुल्लमखुल्ला विरोधी है। इससे आर्थिक संकट पैदा होते हैं, जिनसे उत्पादक शक्तियों का नाश होता है। और भी, यह विरोध खुद सामाजिक क्रांति का आर्थिक आधार बन जाता है। इस क्रांति का उद्देश्य होता है, पैदावार के मौजूदा सम्बन्धों को खत्म करना और पैदावार के ऐसे नये सम्बन्ध रचना जो उत्पादक शक्यिों के रूप के अनुकूल हों।

इसके विपरीत, इस बात की मिसाल, जहां पैदावार के सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के रूप के पूरी तरह अनुकूल हैं, सोवियत संघ की समाजवादी राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था है। यहां पर पैदावार के साधनों की सामाजिक मिल्कियत उत्पादन-क्रम के सामाजिक रूप के पूरी तरह अनुकूल है और इस वजह से, यहां आर्थिक संकट और उत्पादक शक्तियों के विनाश का नाम नहीं है।

नतीजा यह कि उत्पादक शक्तियां न सिर्फ़ पैदावार का सबसे गतिशील और क्रान्तिकारी तत्व हैं, बल्कि पैदावार के विकास का नियामक तत्व भी हैं।

जैसी उत्पादक शक्तियां होती हैं, वैसे ही पैदावार के सम्बन्ध होते हैं।

उत्पादक शक्तियों की दशा क्या है, इससे इस बात का पता चलता है कि मनुष्य अपने लिये आवश्यक भौतिक मूल्यों को पैदावार के किन साधनों से उत्पन्न्ा करते हैं।

पैदावार के साधनों की दशा क्या है, इससे एक दूसरी बात का पता चलता है कि पैदावार के साधनों (जमीन, जंगल, जलाशय, खानें, कच्चा माल, पैदावार के साधन, पैदावार की जगह, यातायात और समाचार भेजने के साधन वगैरह) का मालिक कौन है; पैदावार के साधन किसके अधिकार में हैं, पूरे समाज के अधिकार में हैं या अलग-थलग लोगों, गुटों या वर्गों के हाथ में है, जो उन्हें दूसरे लोगों, गुटों या वर्गो का शोषण करने के लिये इस्तेमाल करते हैं?

पुराने ज़माने से लेकर आज तक उत्पादक शक्तियों के विकास की एक मोटी रूपरेखा यह है। भोंडे़ पत्थर के औज़ारों से लोग धनुष-बाण की तरफ़ बढे़ और उसके साथ ही, शिकारियों की जिन्दगी छोड़ कर पशुपालन और आदिम चारागाहों की तरफ़ बढ़े। लोग पत्थर के औज़ार छोड़ कर धातुओं के औज़ार (लोहे की कुल्हाड़ी, लोहे का  फाल लगा हुआ लकड़ी का हल वगैरह) की तरफ़ बढे़ और उसके साथ ही जोतने, बोने और खेती की तरफ़ बढे़। इसके बाद, सामान तैयार करने के लिये धातु के औज़ारों में और सुधार हुआ, लोहार की धौंकनी काम में लायी जाने लगी, मिट्टी का बर्तन बनना शुरू हुआ, उसके साथ ही दस्तकारी का विकास हुआ, दस्तकारी खेती से जुदा हुई, दस्तकारी के स्वतंत्र उद्योग विकसित हुए और आगे चल कर कारख़ाने कायम हुए। दस्तकारी से औज़ार छोड़ कर लोग मशीनों की तरफ़ आये और दस्तकारी और कारखानों की पैदावार मशीनों के उद्योग-धंधों में बदल गयी। इसके बाद, लोग मशीनों की व्यवस्था की तरफ बढ़े और आधुनिक, बड़े पैमाने पर मशीनों से चलने वाले उद्योग-धंधे क़ायम हुए। मानव इतिहास के दौर में समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास की यह मोटी और अपूर्ण रूपरेखा है। इससे साफ हो जायेगा कि पैदावार के साधनों का विकास और उनमें सुधार उन लोगों ने किया जिनका पैदावार से संबंध था, यह विकास और सुधार उनसे स्वतंत्र नहीं हुआ। यह काम मनुष्यों से स्वतंत्र नहीं हुआ। नतीजा यह कि पैदावार के साधनों की तब्दीली और विकास के साथ उत्पादक शक्तियों के सबसे महत्वपूर्ण तत्व इंसानों में तब्दीली और विकास हुए, उनके पैदावार के अनुभव, उनके श्रम-कौशल, पैदावार के औज़ारों को इस्तेमाल करने की उनकी योग्यता में तब्दीली और विकास हुआ।

इतिहास के दौर में, समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास और परिवर्तन के अनुकूल, मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्ध, उनके आर्थिक सम्बन्ध भी बदले और विकसित हुए।

इतिहास में उत्पादन-सम्बन्धों के पांच मुख्य रूप मिलते हैं: आदिम साम्यवादी, गुलामी की प्रथा, सामन्ती, पूंजीवादी और समाजवादी।

आदिम साम्यवादी व्यवस्था में पैदावार के सम्बन्धों की बुनियाद यह है कि पैदावार के साधनों पर सामाजिक मिल्कियत होती है। यह बात उस समय की उत्पादक शक्तियों के रूप से मुख्यतः मेल खाती है। पत्थर के औज़ारों से और आगे चल कर तीर-कमान से लोग अलग-थलग रह कर प्रकृति की शक्तियों और हिंसक जंतुओं का मुक़ाबिला न कर सकते थे। जंगल से फल इकट्ठे करने के लिये, मछली पकड़ने के लिये, किसी तरह की रहने की जगह बनाने के लिये मनुष्यों को मिलकर काम करने पर मजबूर होना पड़ा वर्ना वे भूख से मरते या हिंसक जंतुओं या पड़ोसी समाजों के शिकार होते। एक साथ मेहनत करने से पैदावार के साधनों पर और पैदावार की उपज पर भी मिली-जुली मिल्कियत हुई। यहां अभी पैदावार के साधनों की निजी मिल्कियत का भाव पैदा न हुआ था। लोगों के पास निजी मिल्कियत के नाम पर सिर्फ़ पैदावार के कुछ औज़ार होते थे, जो साथ ही हिंसक जंतुओं से रक्षा करने के साधन का काम देते थे। यहां अभी न शोषण था, न वर्ग थे।

ग़ुलामी की प्रथा वाली व्यवस्था में पैदावार के सम्बन्धों की बुनियाद यह थी कि पैदावार के साधनों का मालिक गुलामों का स्वामी होता था। पैदावार में काम करने वाले, यानी गुलाम, पर भी उसका अधिकार होता था, जिसे वह खरीद या बेच सकता था या जान से मार सकता था, मानो वह जानवर हो। इस तरह के उत्पादन-सम्बन्ध उस समय की उत्पादक-शक्तियों की दशा के मुख्यतः अनुकूल थे। पत्थर के औज़ारों के बदले, अब लोगों के हाथ में धातु के औज़ार थे। शिकारी की गयी-बीती और आदिम गिरिस्ती के बदले, जो न जोतना-बोना जानता था न चरागाह रखना जानता था, अब चरागाह, खेती, दस्तकारी सामने आयी और पैदावार की इन शाखाओं में मेहनत का बंटवारा हुआ। अब व्यक्तियों और समाजों के बीच में उपज की अदला-बदली मुमकिन हुई, मुट्ठी भर लोगों के हाथ में दौलत का इकट्ठा होना, अल्पसंख्यक लोगों के हाथ में पैदावार के साधनों का सचमुच केन्द्रित हो जाना और बहुसंख्यक लोगों का थोडे़ से लोगों द्वारा पराधीन बनाया जाना और बहुसंख्यक लोगों का दासों में तब्दील होना - यह सब मुमकिन हुआ।

अब उत्पादन-क्रम में समाज के सभी लोग मिलजुल कर और आज़ादी से मेहनत न करते थे। यहां अब गुलामों की बेगार चालू हो गयी, जिन्हें उनके खुद मेहनत न करने वाले मालिक शोषित करते थे। इसलिये, यहां पैदावार के साधनों या पैदावार की उपज की मिलीजुली मिल्कियत न रह गयी थी। उसकी जगह, निजी मिल्कियत ने ले ली। यहां गुलामों का मालिक अक्षरशः सम्पत्ति के पहले और मुख्य स्वामी के रूप में प्रकट होता है।

धनी और ग़रीब, शोषक और शोषित, अधिकारयुक्त और अधिकारहीन लोग और इनके बीच घोर वर्ग-संघर्ष - गुलामी की व्यवस्था की यही तस्वीर है।

सामन्ती व्यवस्था में उत्पादन-सम्बन्धों की बुनियाद यह है कि सामन्ती मालिक पैदावार के साधनों का स्वामी होता है और पैदावार में काम करने वाले भूदास का पूरी तरह मालिक नहीं होता। वह अब उसकी जान नहीं मार सकता, लेकिन उसे बेच और खरीद सकता है। सामन्ती मिल्कियत के साथ, किसान और दस्तकार की निजी मिल्कियत भी रहती है। यह मिल्कियत पैदावार के औज़ारों और उसकी अपनी मेहनत पर चलने वाले निजी धंधे की होती है। इस तरह के उत्पादन-संबन्ध उस समय की उत्पादक शक्तियों के मुख्यतः अनुकूल होते हैं। लोहे के गलाने और उसकी चीजें बनाने में और तरक्क़ी, लोहे के हल और करघे का प्रसार; खेती, बागबानी, अंगूरबानी  और डेरी के काम का और विकास; दस्तकारों की दुकान के साथ-साथ कारखानों का बनना - उत्पादक शक्तियों की दशा की ये अपनी विशेषतायें हैं।

नयी उत्पादक शक्तियों की मांग होती है कि मेहनत करने वाला पैदावार में किसी तरह की पहलक़दमी और काम के लिये रुझान, काम से दिलचस्पी ज़ाहिर करे। इसलिये, सामन्ती मालिक गुलाम से नाता तोड़ लेता है। गुलाम ऐसा मेहनत करने वाला है जिसे काम से कोई दिलचस्पी नहीं होती और जो क़तई पहलक़दमी नहीं करता। उसके बदले, सामन्ती मालिक भूदास से नाता जोड़ना पसन्द करता है।

भूदास की अपनी गिरिस्ती होती है, पैदावार के अपने औज़ार होते हैं और काम में इतनी दिलचस्पी होती है जितनी ज़मीन की काश्तकारी के लिये और सामन्ती मालिक को फ़सल का एक हिस्सा ग़ल्ले के रूप में देने के लिये जरूरी हो।

यहां निजी मिल्कियत का और विकास होता है। शोषण क़रीब-क़रीब वैसा ही कठोर होता है जैसा गुलामी में - अब वह जरा सा मद्धिम होता है। शोषक और शोषितों के बीच वर्ग-संघर्ष सामन्ती व्यवस्था का मुख्य लक्षण है।

पूंजीवादी समाज में पैदावार के सम्बन्धों की बुनियाद यह है कि पैदावार के साधनों के मालिक पूंजीपति होते हैं न कि पैदावार में काम करने वाले मजदूर, जो पगार पर मजदूरी करते हैं। इन्हें पूंजीपति न मार सकता है, न बेच सकता है क्योंकि वे निजी तौर पर आज़ाद हैं। लेकिन, उनके पास पैदावार के साधन नहीं होते और भूख से न मर जायें, इसलिये उन्हें मजबूर होकर अपनी श्रम-शक्ति पूंजीपति को बेचनी पड़ती  है और शोषण का जुआं बर्दाश्त करना पड़ता है। पैदावार के साधनों में पूंजीवादी सम्पत्ति के साथ-साथ, पैदावार के साधनों में, पहले एक बडे़ पैमाने पर, किसानों और दस्तकारों की निजी सम्पत्ति दिखाई देती है। ये किसान और दस्तकार भूदास नहीं होते और उनकी निजी सम्पत्ति उनकी अपनी मेहनत का फल होती है। दस्तकारों की दूकानों और कारखानों के बदले, अब बड़ी-बड़ी मिलें और मशीनों से लैस कारखाने उठ खड़े होते हैं। जमींदारों की रियासतों के बदले, जिन्हें किसान पैदावार के आदिम औज़ारों से जोतते-बोते थे, अब बडे़-बडे़ पूंजीवादी फ़ार्म सामने आ जाते हैं, जिनमें वैज्ञानिक ढंग से काम होता है और जिनके पास खेती करने की मशीनें होती हैं।

नयी उत्पादक शक्तियों की मांग होती है कि पैदावार में काम करने वाले, कुचले हुए अनपढ़ भूदासों के मुकाबिले में, ज्यादा शिक्षित और ज्यादा चतुर हों, वे मशीनों का काम समझ सकें और उन्हें ठीक से चला सकें। इसलिये, पूंजीपति पगार पाने वाले मज़दूरों से काम लेना ज्यादा पसन्द करते हैं। ये मज़दूर भूदास प्रथा के बन्धनों से मुक्त होते हैं और इतने शिक्षित होते हैं कि मशीनों से सही तौर पर काम ले सकें।

लेकिन उत्पादक शक्तियों को जबर्दस्त सीमा तक विकसित करने के बाद, पूंजीवाद ऐसी असंगतियों में फंस गया है जिन्हें वह हल नहीं कर पाता। अधिकाधिक तादाद में बिकाऊ माल पैदा करके और उनके भाव गिराकर, पूंजीवाद होड़ को तेज करता है, छोटे और मध्यम श्रेणी के निजी मिल्कियत वालों को तबाह कर देता है, उन्हें सर्वहारा में तब्दील कर देता है और उनकी खरीदने की ताक़त कम कर देता है। नतीजा यह होता है कि जो बिकाऊ माल तैयार किया जाता है, उसे ठिकाने लगाना असंभव हो जाता है। दूसरी तऱफ, पैदावार को फैलाकर और लाखों मज़दूरों को बड़ी-बड़ी मिलों और कारखानों में केन्द्रित करके पूंजीवाद उत्पादन-क्रम को एक सामाजिक रूप दे देता है और इस तरह, खुद अपनी जड़ कमज़ोर करता है। कारण यह कि उत्पादन-क्रम के सामाजिक रूप की मांग होती है कि पैदावार के साधनों की मिल्कियत भी सामाजिक हो। लेकिन, पैदावार के साधन पूंजीपतियों की निजी दौलत ही रहते हैं, जो उत्पादन-क्रम के सामाजिक रूप के बिल्कुल प्रतिकूल होता है।

उत्पादक शक्तियों के रूप और उत्पादन-सम्बन्धों के बीच दूर न होने वाले ये अंतर्विरोध समय-समय पर अति-पैदावार के संकटों के रूप में ज़ाहिर होते हैं। उस समय खुद अपनी तरफ़ से तबाह किये हुए आम लोगों की ग़रीबी की वजह से अपने माल की खासी मांग न देखकर पूंजीपतियों को मजबूरन अपनी उपज जला देनी पड़ती है, कारखानों में तैयार किया हुआ माल नष्ट कर देना होता है, पैदावार का काम मुल्तवी कर देना पड़ता है और ऐसे समय उत्पादक शक्तियों का नाश करना पड़ता है जब लाखों लोग मजबूरन बेकारी और भुखमरी के शिकार होते हैं, इसलिये नहीं कि काफ़ी माल है, नहीं, बल्कि इसलिये कि माल की अति-पैदावार हो गयी है।

इसका अर्थ यह होता है कि पैदावर के पूंजीवादी सम्बन्ध समाज की उत्पादक शक्तियों की दशा से अब मेल नहीं खाते और उन शक्तियों से अब उनका कभी न सुलझने वाला विरोध पैदा हो गया है।

इसका अर्थ यह होता है कि पूंजीवाद के गर्भ में क्रांति पुष्ट हो रही है, जिसका काम है - पैदावार के साधनों की मौजूदा पूंजीवादी मिल्कियत की जगह समाजवादी मिल्कियत क़ायम करना।

इसका अर्थ यह होता है कि पूंजीवादी व्यवस्था का मुख्य लक्षण शोषक और शोषितों के बीच बहुत ही तीव्र वर्ग-संघर्ष है।

समाजवादी व्यवस्था में, जो अभी तक सिर्फ़ सोवियत संघ में क़ायम हुई है, पैदावार के साधनों की बुनियाद यह है कि पैदावार के साधनों की मिल्कियत सामाजिक होती है। यहां पर अब और शोषित नहीं हैं। जो माल पैदा किया जाता है वह लोगों की मेहनत के अनुसार बांट दिया जाता है। इसका असूल है: "जो काम न करेगा वह खायेगा भी नहीं।" यहां उत्पादन-क्रम में लोगों के आपसी सम्बन्धों की विशेषता यह  है कि शोषण से मुक्त मजदूर भाईचारे का सहयोग करते हैं और समाजवादी ढंग से एक-दूसरे की मदद करते हैं। यहां पैदावार के सम्बन्ध पूरी तरह उत्पादक शक्तियों के अनुकूल होते हंै, क्योंकि उत्पादन-क्रम के सामाजिक रूख को पैदावार के साधनों की सामाजिक मिल्कियत और मज़बूत कर देती है।

इस वजह से, सोवियत संघ में समाजवादी पैदावार न तो अति-पैदावार के समय-समय पर आने वाले संकट जानती है और न उनके साथ की यहां बेहूदगियां होती हैं।

इस वजह से, यहां उत्पादक शक्तियां और तेज़ तफ्तार से  विकसित होती हैं, क्योंकि उनसे मेल खाने वाले सम्बन्ध ऐसे विकास के लिये उन्हें पूरा मौक़ा देते हैं।

मानव इतिहास के दौरान में, मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्धों के विकास की यही तस्वीर है।

पैदावार के सम्बन्धों का विकास समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास पर  इस तरह निर्भर है और सबसे पहले पैदावार के औज़ारों के विकास पर निर्भर है।

इस निर्भरता की वजह से, उत्पादक शक्तियों की तब्दीली और विकास आगे-पीछे  उत्पादन-सम्बन्धों में वैसी ही तब्दीली और विकास पैदा कर देते हैं।

मार्क्स ने लिखा था:

"मेहनत करने के औज़ारों"1 का इस्तेमाल और उनका निर्माण बीज रूप में कुछ खास तरह के पशुओं में जरूर मौजूद रहता है, लेकिन मनुष्य की मेहनत का जो सिलसिला होता है, उसकी यह अपनी विशेषता है। इसलिये, फ्रेंकलिन ने मनुष्य की यह व्याख्या की थी कि वह औज़ार बनाने वाला पशु है। मेहनत करने के पुराने औज़ारों के अवशेष खत्म हो चुकने वाले समाज के आर्थिक रूपों की जांच-पड़ताल के लिये उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि पशुओं की खत्म हो चुकी जातियां पहचानने के लिये हड्डियों के अवशेष। विभिन्न्ा आर्थिक युगों को हम इस बात से नहीं पहचानते कि उस समय कौन सी चीजें बनायी जातीं थीं, बल्कि इससे पहचानते हैं कि वे कैसे और किन औज़ारों से बनायी जाती थीं। मेहनत करने के औज़ारों से इसी का माप-दण्ड नहीं मिलता कि मनुष्य की मेहनत किस हद तक विकसित हुई है, बल्कि उनसे उन सामाजिक परिस्थितियांे का भी पता चलता है जिनमें वह मेहनत की गयी थी।" (कार्ल मार्क्स, पूंजी , लंदन, 1908, खण्ड 1, पृष्ठ 159)

और आगे:

-"उत्पादक शक्तियों से सामाजिक सम्बन्धों का नज़दीकी सम्बन्ध है। नयी उत्पादक शक्तियां हासिल करने में मनुष्य अपनी पैदावार के तरीके बदल देते हैं। पैदावार का अपना तरीका बदलने में, अपनी रोजी हासिल करने का तरीका बदलने में, वे अपने तमाम सामाजिक सम्बन्ध भी बदल देते हैं। हाथ की चक्की हमें ऐसा समाज देती है जिसमें सामन्ती स्वामी होता है। मशीन से चलने वाली मिल ऐसा समाज देती है जिसमें औद्योगिक पूंजीपति होता है।" (कार्ल मार्क्स, दर्शनशास्त्र का दारिद्रय , अं.सं., मास्को, 1935, पृष्ठ 92)

-"उत्पादक शक्तियों की बढ़ती में सामाजिक सम्बन्धों के विनाश में, विचारों के निर्माण में निरंतर गति होती है। एक ही चीज गतिहीन है और वह गतिशीलता का भाव है।" (उप., पृष्ठ 93)

कम्युनिस्ट घोषणापत्र में ऐतिहासिक भौतिकवाद की जो व्यवस्था की गयी है, उसकी चर्चा करते हुए एंगेल्स ने लिखा है: "हर ऐतिहासिक युग की आर्थिक पैदावार और उससे लाज़िमी तौर से पैदा होने वाली समाज की बनावट उस युग के राजनीतिक और बौद्धिक इतिहास की बुनियाद है। ...इसलिये, (जबसे, जमीन की आदिम पंचायती मिल्कियत खत्म हुई),

सभी इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है, सामाजिक विकास की विभिन्न्ा मंजिलों में शोषक और शोषितों, सत्तारूढ़ और शासित वर्गों के संघर्षों का इतिहास रहा है। ...लेकिन, यह संघर्ष अब ऐसी मंजिल तक पहुंच गया है जहां कि शोषित और पीड़ित वर्ग (सर्वहारा) अपना शोषण और उत्पीड़न करने वाले वर्ग (पूंजीपतियों) से अपना छुटकारा बिना इस बात के हासिल नहीं कर सकता कि वह साथ-साथ हमें शक्ति के लिये समूचे समाज को शोषण, उत्पीड़न और वर्ग-संघर्षों से हमेशा के लिये मुक्त कर दे।" (कम्युनिस्ट घोषणापत्र के जर्मन संस्करण की भूमिका, कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं., मास्को, 1946, खं. 1, पृष्ठ100-01)

  (घ)    पैदावार का तीसरा लक्षण

पैदावार का तीसरा लक्षण यह है कि नयी उत्पादक शक्तियों और उनके अनुकूल पैदावार के सम्बन्धों का जन्म पुरानी व्यवस्था से अलग, उस व्यवस्था के खत्म हो जाने पर नहीं होता बल्कि पुरानी व्यवस्था के अन्दर ही होता है। यह जन्म मनुष्य की सोच-विचार वाली और सचेत कार्यवाही के फलस्वरूप नहीं होता बल्कि अपने-आप, अचेत रूप से, मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र होता है। उसके मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र और अपने-आप होने के दो कारण हैं।

पहला कारण यह है कि मनुष्य इस बात में स्वतंत्र नहीं हैं कि वे पैदावार का एक तरीक़ा अपनायें या दूसरा। जब कोई भी नयी पीढ़ी जीवन में प्रवेश करती है तो वह ऐसी उत्पादक शक्तियों और उत्पादन-सम्बन्धों को पहले से ही मौजूद पाती है जो पहले की पीढ़ियों की मेहनत का फल हैं। इसलिये, पैदावार के क्षेत्र में उसे जो कुछ पहले से तैयार चीज मिलती है, उसे मजबूरन उसे पहले स्वीकार करना पड़ता है और अपने को उसके अनुकूल बनाना पड़ता है, जिससे कि वह भौतिक मूल्य पैदा कर सके।

दूसरा कारण यह है कि जब मनुष्य पैदावार का कोई औज़ार सुधारते हैं, उत्पादक शक्तियों का कोई तत्व सुधारते हैं, तब वे महसूस नहीं करते, समझते नहीं हैं, या सोचने के लिये रुकते नहीं हैं कि इन सुधारों का सामाजिक परिणाम क्या होगा। वे  सिर्फ अपने दैनिक हितों की बात सोचते हैं, अपनी मेहनत को हल करने और अपने लिये कोई सीधा और प्रत्यक्ष लाभ हासिल करने की बात सोचते हैं।

जब धीरे-धीरे और टटोलते हुए आदिम साम्यवादी समाज के कुछ सदस्य पत्थर के हथियारों से लोहे के हथियारों के प्रयोग की तरफ बढे़, तब अवश्य ही वे न जानते थे और यह सोचने के लिये वे न रुके थे कि इन आविष्कार से कौन से सामाजिक परिणाम निकलेंगे। वे यह न जानते थे या न महसूस करते थे कि धातु के औज़ारों की तरफ बढ़ना पैदावार में एक क्रांति करना होगा, कि आगे चलकर उससे गुलामी की प्रथा पैदा होगी, वे सिर्फ अपनी मेहनत हल्की करना चाहते थे। उनकी सचेत कार्यवाही उनके दैनिक हितों के तंग दायरे में सीमित थी।

जब सामंती व्यवस्था के युग में छोटी पंचायती दूकानों के साथ-साथ यूरोप का तरूण पंूजीपति वर्ग बड़े कारखाने बनाने लगा और इस तरह उसने समाज की उत्पादक शक्तियों को आगे बढ़ाया, तब अवश्य ही वह यह न जानता था और यह सोचने के लिये वह न रूका था कि इस आविस्कार के कौन से सामाजिक परिणाम निकलेंगे। उसने यह न महसूस किया था या न समझा था कि इस 'छोटे से' आविष्कार का फल यह होगा कि सामाजिक शक्तियां नयी तरह से संगठित होंगी और इससे राजाओं की शक्ति के खिलाफ, जिनकी कृपा को वह इतना महत्व देता था, क्रांति होगी और उन सरदारों के खिलाफ क्रान्ति होगी जिनकी पांति में बैठने के लिये उसके प्रमुख प्रतिनिधि अक्सर लालायित रहते  थे। वह सिर्फ माल पैदा करने की क़ीमत कम करना चाहता था, एशिया और अभी हाल  में ढूंढे हुए अमरीका के बाज़ारों में माल ज्यादा तादाद में भेजना चाहता था और ज्यादा मुनाफे़ कमाना चाहता था। उसकी सचेत कार्यवाही इस मामूली व्यवहारिक उद्देश्य के तंग दायरे में सीमित थी।

जब रूसी पूंजीपतियों ने विदेशी पूंजीपतियों से मिल कर रूस में जोर-शोर से आधुनिक बडे़ पैमाने के मशीनों वाले उद्योग-धंधे क़ायम किये और ज़ारशाही को बरकरार रहने दिया और किसानों को जमींदारों के कृपा-कटाक्ष पर छोड़ दिया, तब अवश्य ही वे यह न जानते थे और न यह सोचने के लिये वे रुके थे कि उत्पादक शक्तियों की इस विशाल बढ़ती से कौन से सामाजिक परिणाम निकलेंगे। उन्होंने यह महसूस न किया या न समझे थे कि समाज की उत्पादक शक्तियों के क्षेत्र में इस भारी छलांग का फल यह होगा कि सामाजिक शक्तियां फिर से संगठित होंगी, जिससे कि सर्वहारा वर्ग किसानों से एका कायम कर सकेगा और विजयी समाजवादी क्रांति कर सकेगा। वे सिर्फ़ उद्योग-धंधों की पैदावार आखिरी हद तक बढ़ाना चाहते थे, विशाल घरेलू बाज़ार पर कब्जा करना चाहते थे, इज़ारेदार बनना चाहते थे और राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से जितना भी हो सके मुनाफ़ा खींचना चाहते थे। उनकी सचेत कार्यवाही उनके मामूली और एकदम व्यवहारिक हितों के दायरे के बाहर नहीं गयी।

इसीलिये मार्क्स ने लिखा था:

"अपने जीवन की सामाजिक पैदावार में (यानी मनुष्यों के जीवन के लिये आवश्यक भौतिक मूल्यों की पैदावार में - सम्पादक) मनुष्य ऐसे निश्चित सम्बन्ध कायम करते हैं जो लाजिमी होते हैं और उनकी इच्छा से स्वतंत्र1 होते हैं।

पैदावार के ये सम्बन्ध उत्पादन की अपनी भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल से मेल खाते हैं।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. , अं.सं., मास्को 1946, खण्ड 1 पृष्ठ 300)

लेकिन, इसका यह मतलब नहीं है कि उत्पादन-सम्बन्धों में तब्दीली और पैदावार के पुराने सम्बन्धों से नये उत्पादन-सम्बन्धों की तरफ़ प्रगति शांतिमय ढंग से, बिना संघर्षों के और बिना हलचल के हो जाती है। इसके विपरीत, इस तरह की प्रगति आम तौर से पुराने उत्पादन-सम्बन्धों को क्रांतिकारी ढंग से खत्म करके और पैदावार के नये सम्बन्ध क़ायम करके होती है। एक वक़्त तक उत्पादक शक्तियों का विकास और पैदावार के संबंधों के क्षेत्र में तब्दीली अपने-आप होती है, मनुष्यों की इच्छा से स्वतंत्र होती है। लेकिन, ऐसा एक वक्त तक ही होता है जब तक कि नयी और विकसित होती हुई उत्पादक शक्तियां बढ़ कर अच्छी तरह पुष्ट नहीं हो जातीं। नयी उत्पादक शक्तियों के पुष्ट हो जाने के बाद, पैदावार के मौजूदा सम्बन्ध और उनके हिमायती - शासक वर्ग - एक 'भारी' अड़चन बन जाते हैं, जिसे नये वर्गों की सचेत कार्यवाही से ही हटाया जा सकता है, जिसे इन वर्गों की बलपूर्वक कार्यवाही से, क्रांति से ही हटाया जा सकता है।

यहां नये सामाजिक विचारों, नयी राजनीतिक संस्थाओं और नयी राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त भूमिका1 बहुत ही स्पष्ट दिखाई देती है। इनका काम होता है कि पैदावार के पुराने सम्बन्धों को बलपूर्वक खत्म कर दें। नयी उत्पादक शक्तियों और पैदावार के पुराने सम्बन्धों के संघर्ष से, समाज की नयी आर्थिक मांगों से, नये सामाजिक विचार पैदा होते हैं। नये विचार आम जनता को और संगठित करते हैं। आम जनता एक राजनीतिक सेना में सुगठित हो जाती है। वह एक नयी क्रांतिकारी सत्ता रचती है और उसका इसलिये इस्तेमाल करती है कि उत्पादन-सम्बन्धों की पुरानी व्यवस्था को बलपूर्वक खत्म कर दे और दृढ़ता से नयी व्यवस्था क़ायम करे। विकास के अपने-आप होने वाले सिलसिले की जगह मनुष्यों की सचेत कार्यवाही ले लेती है, शान्तिमय विकास की जगह बलपूर्वक  होने वाली हलचल ले लेती है, विकास की जगह क्रांति ले लेती है।

मार्क्स ने लिखा था:

"पूंजीपतियों से संघर्ष करते समय, परिस्थितियों की वजह से सर्वहारा वर्ग को एक वर्ग रूप में अपने को संगठित करना पड़ता है। ...क्रांति के जरिये वह अपने को शासक वर्ग बनाता है और इस तरह पैदावार की पुरानी परिस्थितियों को बलपूर्वक खत्म कर देता है।" (कम्युनिस्ट घोषणापत्र, कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं. ,अं.सं., मास्को, 1946, खण्ड 1, पृष्ठ 131)

और भी आगे:

-"सर्वहारा वर्ग अपने राजनीतिक प्रभुत्व का इस्तेमाल इसलिये करेगा कि क्रमशः पूंजीपतियों से सभी पूंजी छीन ले और राज्य के, यानी शासक वर्ग के, रूप में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथ में पैदावार के सभी साधन केन्द्रित कर ले और जहां तक हो सके कुल उत्पादक शक्तियों को बढ़ाये।" (उप., पृष्ठ 129)

-"पुरानी समाज-व्यवस्था के गर्भ में जब नयी समाज-व्यवस्था आ जाती है, तब उसके जन्म के लिये धाय के रूप में बल आवश्यक होता है।" (कार्ल मार्क्स, पूंजी, खण्ड 1, पृष्ठ 776)

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अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र की आलोचना की ऐतिहासिक भूमिका में, मार्क्स ने 1859 में ऐतिहासिक भौतिकवाद के सार तत्व का मसौदा दिया था जो एक प्रतिभाशाली दिमाग की उपज है:

"अपने जीवन की सामाजिक पैदावार में मनुष्य ऐसे निश्चित सम्बन्ध कायम करते हैं जो लाजिमी होते हैं और उनकी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं। पैदावार के ये सम्बन्ध उत्पादन की भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल से मेल खाते हैं। इन उत्पादन-सम्बन्धों का कुल जोड़ समाज की आर्थिक बनावट है - वह सच्ची बुनियाद जिस पर कानून और राजनीति की सारी इमारत खड़ी होती है और जिसके अनुकूल सामाजिक चेतना के विभिन्न्ा रूप होते हैं। भौतिक जीवन की पैदावार का तरीका आम तौर से सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन का क्रम निश्चित करता है। मनुष्यों की चेतना उनकी सत्ता को निश्चित नहीं करती बल्कि इसके विपरित उनकी सामाजिक सत्ता उनकी चेतना को निश्चित करती है। विकास की एक मंजिल तक पहुंच कर, समाज की भौतिक उत्पादक शक्तियां उस समय के उत्पादन-सम्बन्धों से टकराती हैं, या - उसी चीज को क़ानूनी शब्दावली में यों कहा जा सकता है - वे अब तक सम्पत्ति के जिन सम्बन्धों में काम करती आती थीं, उनसे टकराती हैं। उत्पादक शक्तियों के विकास के रूप न रह कर, ये सम्बन्ध उनके लिये बेड़ियां बन जाते हैं। तब सामाजिक क्रांति का युग शुरू होता है। आर्थिक बुनियाद बदलने के साथ, ऊपर की समूची भारी इमारत  भी बहुत कुछ जल्द ही बदल जाती है। इस तरह की तब्दीलियों पर विचार करते हुए, एक भेद ध्यान में रखना चाहिये। एक तो पैदावार की आर्थिक परिस्थितियांेकी, जो प्रकृति-विज्ञान के नपे तुले तरीके से निश्चित की जा सकती हैं, भौतिक तब्दीली होती है। दूसरी कानूनी, राजनीतिक, धार्मिक, सौंदर्य सम्बन्धी या दार्शनिक तब्दीली - संक्षेप में, विचारधारा के रूप बदलते हैं, जिन रूपों में मनुष्य इस संघर्ष के प्रति सचेत होते हैं और निपटारे के लिये लड़ते हैं। जैसे किसी व्यक्ति के बारे में हमारी धारणा इस बात पर निर्भर नहीं होती कि वह अपने बारे में क्या सोचता है, उसी तरह तब्दीली के दौर के बारे में खुद उसकी चेतना के आधार पर हम राय क़ायम नहीं कर सकते। इसके विपरीत, भौतिक जीवन की असंगतियों के आधार पर, समाज की उत्पादक शक्तियों और पैदावार के सम्बन्धों की मौजूदा टक्कर के आधार पर, इस चेतना की व्याख्या करनी चाहिये। कोई भी समाज-व्यवस्था तब तक खत्म नहीं होती जब तक कि उसके अन्दर गूंजाइश रहते हुए तमाम उत्पादक शक्तियां विकसित नहीं हो जातीं। पैदावार के नये और उच्चतर सम्बन्ध तब तक कभी सामने नहीं आते जब तक कि उनके जीवन की भौतिक परिस्थितियां पुराने समाज के गर्भ में ही पुष्ट न हो चुकी हों। इसलिये, मनुष्य जाति अपने सामने हमेशा ऐसे ही काम रखती है जिन्हें वह कर सकती है। कारण यह कि इस विषय को नज़दीक से देखने पर हमेशा हम यही पायेंगे कि काम हमेशा तभी सामने आता है जब उसे पूरा करने के लिये ज़रूरी भौतिक परिस्थितियां पहले ही मौजूद हों, या कम से कम निर्माण की हालत में हों।" (कार्ल मार्क्स, सं.ग्रं., अं.सं., मास्को, 1946, खण्ड ! पृष्ठ 300-01)

सामाजिक जीवन, समाज के इतिहास पर लागू किया जाने वाला माक्र्सीय  भौतिकवाद इस तरह का है।

द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद के मुख्य लक्षण इस तरह के हैं। इससे स्पष्ट हो जायेगा कि लेनिन ने पार्टी के लिये कौन सी सैद्धांतिक निधि की रक्षा की थी और संशोधनवादियों और गद्दारों के हमलों से उसे बचाया था और हमारी पार्टी के विकास के लिये लेनिन की पुस्तक भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना का प्रकाशन कितना महत्वपूर्ण था।

 

3.   स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में बोल्शेविक और मेन्शेविक। विसर्जनवादियों और बहिष्कारवादियों (ओतजोविस्ट)  के खिलाफ़ बोल्शेविकों का संघर्ष।

जिस समय क्रांति का विकास हो रहा था, उसके मुकाबिले में प्रतिक्रियावाद के दिनों पार्टी-संगठनों में काम करना बहुत मुश्किल हो गया था। पार्टी सदस्यों की तादाद बहुत तेजी से घट गयी थी। पार्टी के बहुत से निम्नपूंजीवादी सहयात्री, और खास तौर से बुद्धिजीवी, ज़ार सरकार के दमन से डर कर उसकी पांति छोड़ कर भाग खडे़ हुए थे।

लेनिन ने कहा था कि ऐसे मौकों पर क्रांतिकारी पार्टियों को अपना ज्ञान भरा-पूरा बनाना चाहिये। क्रांति की उठान के दौर में, उन्होंने आगे बढ़ना सीखा था। प्रतिक्रियावाद के दौर में, उन्हें यह सीखना चाहिये कि सही तौर पर किस तरह पीछे हटें, अंडरग्राउंड (भूमिगत) किस तरह से हो जायें, गैरकानूनी पार्टी को किस तरह बनाये रखें और मजबूत करें, कानूनी सुविधाओं को कैसे काम में लायें, आम जनता से अपना सम्बन्ध दृढ़ करने के लिये किस तरह तमाम कानूनी संगठनों, खास तौर से जन संगठनों का उपयोग करें।

मेन्शेविक होशहवास खोकर पीछे हटने लगे। उन्हें वह भरोसा नहीं था कि क्रान्ति का नया ज्वार फिर आयेगा उन्होंने बेशर्मी से कार्यक्रम की क्रान्तिकारी मांगों और पार्टी के क्रांतिकारी नारों को तज दिया। वे सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी गै़रकानूनी पार्टी का विसर्जन करना चाहते थे, उसे खत्म करना चाहते थे। इस वजह से, इस तरह के मेन्शेविक विसर्जनवादी कहलाये।

मेन्शेविकों के विपरीत, बोल्शेविकों को विश्वास था कि अगले कुछ वर्षो में क्रान्ति का ज्वार फिर उठेगा। उनका कहना था कि इस नयी उठान के लिये आम जनता को तैयार करना पार्टी का फर्ज़ है। क्रान्ति की बुनियादी समस्यायें हल न हुई थीं। किसानों को जमींदारों की जमीन न मिली थी। मज़दूरों के काम करने का दिन आठ घण्टे का न हुआ था। जिससे जनता इतनी नफरत करती थी, उस निरंकुश ज़ारशाही का तख्ता उल्टा न गया था और 1905 में जनता ने उससे जो थोड़े से राजनीतिक अधिकार पाये थे, उसने उन्हें फिर खत्म कर दिया था। इसलिये जिन कारणों से 1905 की क्रांति का जन्म हुआ था, वह अब भी मौजूद थे। यही सबब है कि बोल्शेविकों को विश्वास था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन का नया ज्वार आयेगा। वे उसके लिये तैयारी करने लगे और मज़दूर वर्ग की शक्तियों को बटोरने लगे।

क्रान्ति का ज्वार निश्चय ही फिर उठेगा, बोल्शेविकों के इस विश्वास का कारण यह भी था कि 1905 की क्रांति ने मजदूर वर्ग को अपने अधिकारों के लिये आम क्रांतिकारी संघर्ष चलाना सिखा दिया था। प्रतिक्रियावाद के दौर में, जब पूंजीपतियों ने हमला शुरू किया तब, मजदूर 1905 के सबक भूल न सकते थे। लेनिन ने मजदूरों के खतों से उद्धरण दिये, जिनमें उन्होंने बतलाया था कि कारखानेदार किस तरह उन्हें सता रहे हैं और उन्हें अपमानित कर रहे हैं। इन खतों में मजदूरों ने कहा था: "ठहरो, 1905 फिर आयेगा।"

बोल्शेविकों का बुनियादी राजनीतिक उद्देश्य वही रहा जो 1905 में था, यानि ज़ारशाही का खात्मा, पूंजीवादी-जनवादी क्रान्ति को आखिरी मंजिल तक ले जाना और समाजवादी क्रांति की तरफ़ बढ़ना। बोल्शेविक एक क्षण के लिये भी यह उद्देश्य न भूले और वे आम जनता के सामने मुख्य क्रांतिकारी नारे रखते रहे - जनवादी प्रजातंत्र, रियासतों की जमीन जब्त करना और काम के दिन के आठ घंटे तय करना।

लेकिन, पार्टी की कार्यन नीति वही न हो सकती थी जो 1905 में क्रान्ति के उठते हुए ज्वार के समय थी। मिसाल के लिये, निकट भविष्य में आम जनता से आम राजनीतिक हड़ताल करने के लिये या सशस्त्र विद्रोह करने के लिये कहना गलत होता, क्योंकि क्रांतिकारी आन्दोलन मंद पड़ रहा था, मजदूर वर्ग बहुत ही थकान की हालत में था और प्रतिक्रियावादी वर्गों की स्थिति काफ़ी मजबूत हो चुकी थी। पार्टी को यह नयी हालत ध्यान में रखनी थी। हमलावर कार्यन ीति के बदले रक्षा की कार्यन नीति, शक्तियों को बटोरने की कार्यनीतिक, कार्यकर्ताओ को अंडरग्राउंड में हटा ले जाने की कार्यनीति, अंडरग्राउंड रह कर पार्टी का काम चलाने की कार्यनीति और कानूनी मजदूर संगठनों में काम करने के साथ गै़र क़ानूनी काम चलाने की कार्यनीति से काम लेना था।

और, बोल्शेविकों ने साबित कर दिया कि वे यह काम कर सकते हैं।

लेनिन ने लिखा था:

"क्रान्ति से पहले के लम्बे वर्षों में कैसे काम करना चाहिये, यह हम जानते थे। लोग यों ही नहीं कहते कि हम चट्टान की तरह दृढ़ हैं। सोशल-डेमोक्रेटों ने एक सर्वहारा पार्टी बनाई है जो पहले हथियारबन्द आक्रमण की असफलता से हिम्मत न हारेगी, अपने होशहवास न खो देगी और मुहीमबाजी में न फंसेगी।" 1⁄4लेनिन, सं.ग्रं., अं.सं., मास्को 1947, खण्ड 1, पृष्ठ 4671⁄2

बोल्शेविकों ने कोशिश की कि गैर क़ानूनी पार्टी-संगठनों को बनाये रखें और उन्हें मजबूत करें। इसके साथ ही, वे जरूरी समझते थे कि हर कानूनी मौके, हर कानूनी सुविधा से फ़ायदा उठा कर आम जनता से सम्बन्ध बनाये रखें और इस सम्बन्ध की हिफ़ाजत करें और इस तरह से पार्टी को मजबूत करें।

"यह वह दौर था जब हमारी पार्टी ज़ारशाही के खिलाफ खुले क्रान्तिकारी संघर्ष का रास्ता छोड़ कर संघर्ष के टेढे़-मेढे़ तरीकों की तरफ़ आयी, जब वह परस्पर-सहयोग-समितियों से लेकर दूमा के मंच तक हर कानूनी मौक़ा इस्तेमाल करने लगी। यह 1905 की क्रान्ति में हमारी पराजय के बाद पीछे हटने का दौर था। इस मोड़ ने हमारे लिये जरूरी कर दिया कि हम संघर्ष के नये तरीकों में माहिर हों, जिससे कि हम अपनी शक्ति बटोर सकें और ज़ारशाही के खिलाफ़ खुला क्रान्तिकारी संघर्ष चला सकें।"  (स्तालिन, 15 वीं पार्टी कांग्रेस की शब्दशः रिपोर्ट, रूसी संस्करण, पृष्ठ 366-67, 1935)

बचे हुए कानूनी संगठन एक तरह का पर्दा थे, जिनकी आड़ में पार्टी के गुप्त संगठन काम करते थे और जिनके जरिये आम जनता से सम्बन्ध क़ायम रखा जाता था। आम जनता से सम्बन्ध कायम रखने के लिये, बोल्शेविकों ने टंेड यूनियनों और दूसरी कानूनी तौर पर चलने वाली सार्वजनिक संस्थाओं से काम लिया - जैसे रोगी-सहायक-सभा, मजदूरों की सहयोग-समितियां, क्लबें, शिक्षा-सभाएं और जन-सभायें वगैरह। बोल्शेविकों ने राज्य दूमा के मंच से काम लिया, जिससे कि वे ज़ारशाही नीति का पर्दाफाश कर सकें, काॅस्टीटयूशनल डेमोक्रेटों का भंडाफोड़ कर सकें और सर्वहारा वर्ग के लिये किसानों का समर्थन हासिल कर सकें। गैरकानूनी पार्टी-संगठन बनाये रखने से और इस संगठन के जरिये और सभी तरह का राजनीतिक काम चलाने की वजह से, पार्टी एक सही नीति पर चल सकी और क्रान्ति के ज्वार की नयी उठान के लिये तैयारी करने की शक्ति बटोर सकी।

बोल्शेविकों ने दो मोर्चों पर लड़ाई करके, अपनी क्रान्तिकारी लाइन चालू रखी। यह लड़ाई पार्टी के अन्दर दो तरह के अवसरवाद के खिलाफ थी: विसर्जनवादियों के खिलाफ़ थी, जो पार्टी के खुले दुश्मन थे और उन लोगों के खिलाफ थी, जो बहिष्कारवादी कहलाते थे और पार्टी के छिपे हुए दुश्मन थे।

लेनिन ने, बोल्शेविकों ने, विसर्जनवाद के जन्म लेते ही, इस अवसरवादी रुझान के खिलाफ डट कर संघर्ष किया। लेनिन ने कहा कि विसर्जनवादी पार्टी के अन्दर उदारपंथी पूंूजीपतियों के प्रतिनिधि हैं।

दिसम्बर 1908 में, रू.सो.डे.ले.पा. की पांचवीं (अखिल रूसी) कांफ्रेंस पैरिस में हुयी। लेनिन के प्रस्ताव पर, इस कांफ्रेंस ने विसर्जनवाद की निन्दा की यानी पार्टी बुद्धिजीवियों के एक हिस्से (मेन्शेविकों) की इन कोशिशों की निन्दा की कि "रू.सो.डे.ले.पाके मौजूदा संगठन को खत्म कर दिया जाये और किसी भी कीमत पर, सीधे-सीधे प्रोग्राम छोड़ देने की कीमत पर भी पार्टी की कार्यनीति और परम्परायें छोड़ देने की कीमत पर भी, पार्टी के बदले कानूनी तौर से काम करता हुआ एक रूपरेखाहीन सम्मेलन कायम किया जाये।"  (सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) के प्रस्ताव, रूसी संस्करण, पहला भाग, पृ. 128)

कांफ्रेंस ने सभी पार्टी संगठनों का आववान किया कि विसर्जनवादियों की कोशिशों के खि़लाफ़ डट कर संघर्ष करें।

लेकिन, मेन्शेविकों ने कांफ्रेंस का यह फैसला न माना और दिन पर दिन विसर्जनवाद में गहरे पैठते गये, उन्होंने क्रान्ति से गद्दारी की और काॅस्टीटयूशनल डेमोक्रेटों से सहयोग किया। दिन पर दिन मेन्शेविक खुल कर सर्वहारा पार्टी के क्रान्तिकारी प्रोग्राम को छोड़ रहे थे, वे जनवादी प्रजातंत्र, काम के आठ घंटे और रियासती जमीन को जब्त करने की मांगें छोड़ रहे थे। वे चाहते थे कि पार्टी का प्रोग्राम और कार्यनीति छोड़ने की कीमत पर ज़ार सरकार से इस बात की मंजूरी ले लें कि एक खुली, क़ानूनी और तथा कथित 'लेबर' पार्टी काम कर सके। स्तोलिपिन शासन से सुलह करने और अपने को उसके माफ़िक बनाने के लिये वे तैयार थे। इसीलिये, विसर्जनवादियों को 'स्तोलिपिन' की लेबर पार्टी कहा जाने लगा।

विसर्जनवादी क्रान्ति के खुले विरोधी थे। इनके नेता दान, ऐक्सेलरोद और पोत्रेसोव थे, और मारतोव, त्रात्स्की और दूसरे मेन्शेविक इनके मददगार थे। इनके खिलाफ़ लड़ने के अलावा, बोल्शेविकों ने छिपे हुए विसर्जनवादियों, बहिष्कारवादियों (अतजोवपंथियों)  के खिलाफ़ भी डट कर संघर्ष किया। ये लोग अपने अवसरवाद को 'वामपंथी' लफ्फ़ाजी से छिपाते थे। कुछ पहले के बोल्शेविक यह मांग कर चुके थे कि राज्य दूमा से मजदूरों के प्रतिनिधियों को वापस बुला लिया जाये और मौजूदा कानूनी संगठनों में काम करना कतई बन्द कर दिया जाये। इसलिये, ये लोग बहिष्कारवादी (अतजोवपंथी) कहलाये, (अतज्व, वापस बुलाना)।

1908 में, कुछ बोल्शेविकों ने राज्य दूमा से सोशल-डेमोक्रेटिक प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की मांग की। इसलिये, वे बहिष्कारवादी कहलाये। इन्होंने अपना अलग गुट बनाया 1⁄4बुग्दानोव, लूनाचास्र्की, एलेक्सेन्स्की, पत्रोक्व्स्की, बुबनोव, वगैरह1⁄2, जिसने लेनिन और लेनिन की नीति के खिलाफ़ संघर्ष शुरू किया। बहिष्कारवादियों ने जिद की कि मज़दूरों के टंेड यूनियनों में और दूसरी क़ानूनी तौर से चलने वाली सभाओं में काम करेंगे ही नहीं। इस हरकत से, उन्होंने मजदूरों के उद्देश्य को काफ़ी नुकसान पहुंचाया। बहिष्कारवादी पार्टी और मजदूर वर्ग के बीच दरार डाल रहे थे, जिससे गैर पार्टी जनता से पार्टी के सम्बन्ध टूट जाते। वे अपने को गुप्त संगठन में अलग कर लेना चाहते थे ; साथ ही कानूनी पर्दे को इस्तेमाल करने के अवसर को नामंजूर करके उन्होंने गुप्त संगठनों को भी खतरे में डाल दिया था। बहिष्कारवादी यह न समझते थे कि राज्य दूमा में, और राज्य दूमा के जरिये, बोल्शेविक किसानों पर असर डाल सकते थे, ज़ार सरकार की नीति का पर्दाफाश कर सकते थे और काॅस्टीटयूशनल डेमोक्रेटों की भी नीति का पर्दाफ़ाश कर सकते थे, जो फ़रेब से किसानों को अपनी तरफ लाना चाहते थे। बहिष्कारवादी क्रान्ति की नयी प्रगति के लिये शक्ति बटोरने के काम में बाधा डाल रहे थे। इसलिये, बहिष्कारवादी 'छिपे हुये विसर्जनवादी' थे। वे कोशिश करते थे कि कानूनी तौर से चालू संगठनों को इस्तेमाल करने की संभावना खत्म हो जाये और दरअसल उन्होंने आम गै़र पार्टी जनता के सर्वहारा-नेतृत्व का काम छोड़ दिया, क्रान्तिकारी काम छोड़ दिया।

बोल्शेविक अखबार प्रोलेतरी (सर्वहारा) के विस्तृत सम्पादक-मण्डल की कांफ्रेंस 1909 में बुलायी गयी कि वह बहिष्कारवादियों के व्यवहार पर विचार करे। कांफ्रेंस ने उनकी निन्दा की। बोल्शेविकों ने ऐलान किया कि उनमें और विसर्जनवादियों में कोई साम्य नहीं है और उन्हें बोल्शेविक संगठन से निकाल दिया।

विसर्जनवादी और बहिष्कारवादी, दोनों ही सर्वहारा वर्ग और उसकी पार्टी के निम्नपूंजीवादी सहयात्रियों के अलावा और कुछ न थे। जब सर्वहारा वर्ग के लिये मुश्किल वक्त़ आया तब विसर्जनवादियों का सही रूप खास तौर से स्पष्ट होकर सामने आ गया।

35वा पोस्ट, "सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) का इतिहास"

 

4. त्रात्स्कीवाद के खिलाफ़ बोल्शेविकों का संघर्ष। पार्टी-विरोधी अगस्त गुट।

जिस समय बोल्शेविक दो मोर्चों पर - विसर्जनवादियों के खिलाफ़ और बहिष्कारवादियों के खिलाफ - डट कर संघर्ष कर रहे थे और सर्वहारा पार्टी की सुसंगत नीति की रक्षा कर रहे थे, उस समय त्रात्स्की मेन्शेविक विसर्जनवादियों की मदद कर रहा था। इस समय लेनिन ने उसे 'जूडास'1 त्रात्स्की', कहा था। त्रात्स्की ने वियना, (आॅस्टिंया)  में लेखकों का एक गुट बनाया और वहां से, कहने को गुटबंदी से अलग लेकिन वास्तव में, एक मेन्शेविक अख़बार निकालना शुरू किया। उस समय लेनिन ने लिखा था: "त्रात्स्की का व्यवहार महापतित, अपनस्वार्थी और गुटबाज़ का है। ... वह मुंह से पार्टी का भक्त बनता है लेकिन उसका व्यवहार किसी भी गुटबाज से बदतर है।"

आगे चल कर 1912 में, त्रात्स्की ने अगस्त गुट का संगठन किया। यह गुट सभी बोल्शेविक-विरोधी गुटों और रुझानों की जमात था, जो लेनिन के खिलाफ़ और बोल्शेविक पार्टी के खिलाफ था। विसर्जनवादियों और बहिष्कारवादियों ने इस बोल्शेविक-विरोधी गुुट से एका कर लिया और इस तरह सबको अपनी जात बता दी। सभी बुनियादी मसलों पर त्रात्स्की और त्रात्स्की पंथियों ने विसर्जनवादी रुख अपनाया। लेकिन, त्रात्स्की ने अपने विसर्जनवाद को केन्द्रवाद के लिबास में छिपाया, यानी दोनों में मेल-मिलाप कराने का बहाना किया। वह कहता था कि न तो वह बोल्शेविकों के साथ है, न मेन्शेविकों के साथ है, बल्कि वह दोनों में समझौता कराना चाहता है। इस सिलसिले में, लेनिन ने कहा था कि त्रात्स्की खुले विसर्जनवादियों से ज्यादा नीच और हानिकर है, इसलिये कि वह मज़दूरों को यह विश्वास दिला कर धोखा देना चाहता है कि वह 'गुटबाजी से परे' है, जबकि वह दरअसल मेन्शेविक विसर्जनवादियों का पूरी तरह समर्थन करता है। त्रात्स्कीपंथी वह मुख्य गुट थे जो केन्द्रवाद का समर्थन करते थे।

( 1. जूडास - ईसा मसीह का एक शिष्य, जिसने चांदी के 30 टुकड़ों के लोभ में पड़ कर उन्हें रोमन सिपाहियों से पकड़वा दिया था – अनुवादक)

कामरेड स्तालिन ने लिखा है:

"केन्द्रवाद एक राजनीतिक धारणा है। उसकी विचारधारा यह है कि एक ही पार्टी के अन्दर सर्वहारा वर्ग के हितों को निम्नपूंजीवादियों के हितों के अनुकूल बनाया जाये, उनके मातहत किया जाये। यह विचारधारा लेनिनवाद के लिये गैर और हेय है।" (स्तालिन, लेनिनवाद की समस्याएं, नवां रूसी संस्करण, पृ. 379)

इस दौर में, कामेनेव, जिनोवियेव और राइकोव दरअसल त्रात्स्की के छिपे हुए दलाल थे, क्योंकि वे अक्सर लेनिन के खिलाफ़ उसकी मदद करते थे। जिनोवियेव, कामेनेव, राइकोव और त्रात्स्की के दूसरे छिपे हुए साथियों की मदद से, लेनिन की इच्छाओं के खिलाफ़, जनवरी 1910 में केन्द्रीय समिति का विस्तृत अधिवेशन बुलाया गया। उस समय तक कई बोल्शेविकों की गिरफ्तारी की वजह से, केन्द्रीय समिति की बनावट बदल चुकी थी और उसमें ढुलमुल यकीन लोग अपने लेनिनवाद-विरोधी फै़सले पास करा सके। इस तरह, इस अधिवेशन में तय हुआ कि बोल्शेविक अखबार प्रोलेतरी बन्द कर दिया जाये और वियना से प्रकाशित होने वाले त्रात्स्की के अखबार प्राव्दा की आर्थिक सहायता की जाये। कामेनेव त्रात्स्की के अखबार के सम्पादक-मण्डल में शामिल हो गया और जिनोवियेव के साथ मिल कर, उसने कोशिश की कि उसे केन्द्रीय समिति का मुखपत्र बना दे।

लेनिन के जोर देने पर ही, केन्द्रीय समिति के जनवरी अधिवेशन में विसर्जनवाद और बहिष्कारवाद की निन्दा करते हुए एक प्रस्ताव पास किया। लेकिन, यहां भी जिनोवियेव और कामेनेव त्रात्स्की के इस प्रस्ताव पर अडे़ रहे कि विसर्जनवादियों का इस तरह नाम लेकर हवाला न होना चाहिये।

जैसा कि लेनिन ने पहले ही देख लिया था और आगाह कर दिया था: सिर्फ़ बोल्शेविकों ने केन्द्रीय समिति के अधिवेशन का फ़ैसला माना और अपना मुखपत्र प्रोलेतरी बन्द कर दिया, जब कि मेन्शेविक अपना गुटबाज विसर्जनवादी अख़बार गोलोस सोत्सियाल देमोक्राता (सोशल-डेमोक्रैट की आवाज़) प्रकाशित करते रहे।

कामरेड स्तालिन ने लेनिन की बात का पूरी तरह समर्थन किया। सोत्सियाल देमोक्रात के 11वें अंक में उन्होंने एक लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने त्रात्स्कीवाद के साथी-संघातियों के व्यवहार की निन्दा की और इस जरूरत की चर्चा की कि बोल्शेविक गुट के अन्दर कामेनेव, जिनोवियेव और राईकोव की गद्दारी से जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गयी है, उसे खत्म किया जाये। लेख में जो फ़ौरी काम बताये गये, वे प्राग की पार्टी कान्फ्रेन्स में पूरे किये गये। वे काम ये थे: आम पार्टी कांफ्रेंस बुलाना, कानूनी तौर से निकलने वाले पार्टी अख़बार का प्रकाशन और रूस में एक गैरकानूनी व्यवहारिक पार्टी केन्द्र की रचना। कामरेड स्तालिन का लेख बाकू-कमिटी के फै़सलों पर आधारित था। बाकू-कमिटी ने लेनिन का पूरी तरह समर्थन किया था।

त्रात्स्की के पार्टी-विरोधी अगस्त गुट में विसर्जनवादियों और त्रात्स्की पंथियों से लेकर बहिष्कारवादियों और देवनिर्माताओं तक विशुद्ध पार्टी-विरोधी तत्व भरे हुऐ थे। इनका मुकाबिला करने के लिये, एक पार्टी गुट बनाया गया जिसमें ऐसे लोग थे जो सर्वहारा वर्ग की गै़रकानूनी पार्टी की हिफ़ाजत करना चाहते थे और उसे मजबूत करना चाहते थे। इस गुट में बोल्शेविक थे, जिनके अगुवा लेनिन थे और कुछ थोडे़ से पार्टी का पक्ष करने वाले मेन्शेविक थे, जिनके अगुआ प्लेखानोव थे। प्लेखानोव और पार्टी का पक्ष करने वाले मेन्शेविकों का उसका गुट कई सवालों पर मेन्शेविक दृष्टिकोण क़ायम रखते थे, लेकिन उन्होंने जो़रदार तरीके़ से अगस्त गुट और विसर्जनवादियों से अपने को अलग कर लिया था और वे बोल्शेविकों से समझौता करना चाहते थे। लेनिन ने प्लेखानोव का प्रस्ताव मान लिया और पार्टी-विरोधी लोगों के खिलाफ़ उसके साथ एक अस्थायी गुट बनाने के लिये राजी हो गये। कारण यह था कि इस तरह का गुट पार्टी के लिये लाभदायी और विसर्जनवादियों के लिये घातक होता।

काॅमरेड स्तालिन ने इस गुट का पूरी तरह समर्थन किया। वह उस समय निर्वासन में थे और वहां से लेनिन को एक खत लिखा। उसमें उन्होंने लिखा था:

"मेरी राय में गुट की (लेनिन-प्लेखानोव की) नीति एकमात्र सही नीति है।

"(1) यह नीति और केवल यही नीति रूस में काम के सच्चे हित प्रकट करती है। काम के हितों की मांग है कि पार्टी के सभी सच्चे तत्व एकजुट हों ;

"(2) यह लाइन और केवल यही लाइन मेक1 "कार्यकर्ताओं और विसर्जनवादियों के बीच दरार डाल कर और विसर्जनवादियों को तितर-बितर करके और ठिकाने लगाकर कानूनी संगठनों को विसर्जनवादियों के चंगुल से आजाद करेगी।" (लेनिन और स्तालिन, रू.सं., खं. 1, पृष्ठ 529-30)

क़ानूनी और गैर क़ानूनी काम को चतुराई से मिलाने की वजह से, बोल्शेविक कानूनी मजदूर संगठनों में भारी शक्ति बन सके। यह बात इससे भी ज़ाहिर हुई कि इस समय जो क़ानूनी तौर पर चार कांग्रेसें हुईं, उनमें मजदूरों के गुटों पर बोल्शेविक  भारी असर डाल सके। एक कांगे्रस जन विश्वविद्यालयों की थी, दूसरी स्त्रियों की, तीसरी मिलों के डाक्टरों की और चैथी शराबबन्दी की। इन कांग्रेसों में, बोल्शेविकों के भाषण बहुत ही राजनीतिक महत्व के होते थे और समूचे देश में उसका असर हुआ। मिसाल के लिये, जन विश्वविद्यालयों की कांग्रेस में बोल्शेविक मजदूरों के प्रतिनिधि-मण्डल ने ज़ारशाही की नीति का पर्दाफ़ाश किया, जो सभी सांस्कृतिक कार्यवाही का गला घोंटती थी। प्रतिनिधि-मण्डल ने दावा किया कि जब तक ज़ारशाही का खात्मा न होगा, तब तक सच्ची सांस्कृतिक प्रगति देश में हो ही नहीं सकती। मिल-डाक्टरों की कांगे्रस, में मज़दूरों के प्रतिनिधि-मण्डल ने उन भयानक गन्दगी से भरी हुई परिस्थितियों का बयान किया जिनमें मज़दूरों को रहना और काम करना पड़ता था और यह नतीजा निकाला कि कारखानों में स्वास्थ्य-रक्षा तब तक नहीं हो सकती जब तक ज़ारशाही का खात्मा न किया जाये।

बोल्शेविकों ने बचे हुए विभिज्डा कानूनी संगठनों से धीरे-धीरे विसर्जनवादियों को निकाल फेंका। प्लेखानोव के पार्टी-पक्षी गुट के साथ संयुक्त मोर्चे की विशेष कार्यनीति से बोल्शेविक कई मेन्शेविक मजदूर संगठनों को (विबोर्ग जिले में, एकातेरीनोस्लाव वगैरह में) अपनी तरफ़ कर सके। इन मुश्किल दिनों में, बोल्शेविकों ने इस बात की मिसाल पेश की कि क़ानूनी काम के साथ किस तरह गै़रकानूनी काम करना चाहिये।

 

5.   प्राग पार्टी कांफ्रेंस, 1912। बोल्शेविकों द्वारा अपनी स्वतंत्र मार्क्सवादी पार्टी का निर्माण।

विसर्जनवादियों और बहिष्कारवादियों के खिलाफ, साथ ही त्रात्स्की पंथियों के खिलाफ़ संघर्ष ने बोल्शेविकों के सामने यह तीव्र आवश्यकता पैदा की कि सभी बोल्शेविकों को एक करें और उनकी एक स्वतंत्र बोल्शेविक पार्टी बनायें। यह काम इसीलिये क़तई जरूरी नहीं था कि पार्टी के अन्दर जो अवसरवादी रुझान मजदूर वर्ग में फूट डाल रहे थे, उन्हें खत्म किया जाये बल्कि इसलिये भी कि मजदूर वर्ग की शक्तियों को बटोरने का काम और उसे क्रान्ति की नयी उठान के लिये तैयार करने का काम पूरा किया जा सके।

यह काम पूरा हो, इसके पहले जरूरी था कि पार्टी को अवसरवादियों से, मेन्शेविकों से मुक्त किया जाये।

किसी बोल्शेविक को अब संदेह नहीं था कि बोल्शेविकों के लिये, मेन्शेविकों के साथ एक ही पार्टी में रहना असंभव है। स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में, मेन्शेविकों के विश्वासघातक व्यवहार ने सर्वहारा पार्टी को खत्म करने और एक नयी सुधारवादी पार्टी संगठित करने की उनकी कोशिशों ने उनका साथ छोड़ना अनिवार्य कर दिया। मेन्शेविकों के साथ एक ही पार्टी में रहकर किसी न किसी तरह बोल्शेविक उनके व्यवहार की नैतिक जिम्मेदारी मंजूर करते थे। लेकिन, बोल्शेविकों के लिये यह स्वप्न में भी असंभव था कि मेन्शेविकों की खुली गद्दारी की नैतिक जिम्मेदारी लेते जब तक कि वे खुद ही पार्टी और मजदूर वर्ग से ग़द्दारी न करना चाहते। इस तरह, मेन्शेविकों के साथ एक ही पार्टी में एकता का मतलब यह हो रहा था कि मजदूर वर्ग और उसकी पार्टी से ग़द्दारी की जाये। इसलिये, मेन्शेविकों से जो वास्तविक अलगाव था, उसे आखिरी मंजिल तक ले जाना था: बाक़ायदा संगठन में उनसे अलगाव करना और पार्टी से मेन्शेविकों को निकालना।

सिर्फ़ इसी तरह यह मुमकिन था कि सर्वहारा की क्रान्तिकारी पार्टी सही तौर से काम करे, जिसका एक ही प्रोग्राम हो, एक ही कार्यनीति और एक ही वर्ग संगठन हो।

सिर्फ़ इसी तरह यह मुमकिन था कि पार्टी की सच्ची 1⁄4न कि सिर्फ़ ऊपरी1⁄2 एकता क़ायम की जाये, जिसे मेन्शेविकों ने नष्ट कर दिया था।

यह काम छठी आम पार्टी कांफ्रेंस के जरिये पूरा होना था, जिसके लिये बोल्शेविक तैयारी कर रहे थे।

लेकिन, यह समस्या का सिर्फ़ एक पहलू था। मेन्शेविकों से बाक़ायदा अलगाव और बोल्शेविकों द्वारा अलग पार्टी का निर्माण अवश्य ही एक बहुत महत्वपूर्ण राजनीतिक काम था। लेकिन, बोल्शेविकों के सामने एक दूसरा और उससे भी महत्वपूर्ण राजनीतिक काम था। बोल्शेविकों के सामने यही काम न था कि मेन्शेविकों से नाता तोड़ लें और बाक़ायदा अपनी एक अलग पार्टी बना लें। सबसे मुख्य काम यह था कि मेन्शेविकों से नाता तोड़ने के बाद एक नयी पार्टी बनायें, एक नयी तरह की पार्टी बनायें जो पच्छिम की आम सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टियों से भिज्डा हो, जो अवसरवादी लोगों से मुक्त हो और जो सत्ता के लिये संघर्ष में सर्वहारा वर्ग का नेतृत्व कर सकती हो।

बोल्शेविकों से संघर्ष करने में, ऐक्सेलरोद और मार्तिनोव से लेकर मारतोव और त्रात्स्की तक सभी तरह के मेन्शेविक लामुहाला वही हथियार इस्तेमाल करते थे जिन्हें पच्छिमी यूरोप के सोशल-डेमोक्रेटों की टकसाल से उन्होंने उधार लिया था। वे रूस में ऐसी पार्टी चाहते थे जो मसलन जर्मन या फ्रांसीसी सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी से मिलती-जुलती हो। वे बोल्शेविकों से ठीक इसीलिये लड़ते थे कि उन्हें उनमें कोई नयी चीज दिखाई देती थी, कोई असाधारण चीज़ और पच्छिम के सोशल-डेमोक्रेटों से भिज्डा चीज। और, उस समय पच्छिम की सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टियों का हुलिया क्या था? ये पार्टियां तरह-तरह के तत्वों के मेल से बनी थीं। इनमें मार्क्सवादी और अवसरवादी लोग थे, क्रान्ति के दोस्त और दुश्मन थे, पार्टी सिद्धांत के हिमायती और विरोधी थे और ये हिमायती धीरे-धीरे सैद्धांतिक रूप से विरोधियों की बात मानते जाते थे और वस्तुतः उनके अधीन हो गये थे। पच्छिमी यूरोप के सोशल-डेमोक्रेटों से बोल्शेविक पूछते थे: अवसरवादियों से, क्रान्ति से गद्दारी करने वालों से मेल-मिलाप किसके लिये? वे जवाब देते थे: 'पार्टी में शान्ति' के लिये, 'एकता' के लिये। एकता किसके साथ, अवसरवादियों के साथ? वे जवाब देते थे: हां, अवसरवादियों के साथ। यह स्पष्ट था कि इस तरह की पार्टियां क्रान्तिकारी पार्टियां न हो सकती थीं।

बोल्शेविकों से यह छिपा न रहा कि एंगेल्स की मृत्यु के बाद पच्छिमी यूरोप की सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टियां सामाजिक क्रान्ति की पार्टियों से घट कर 'समाज सुधार' की पार्टियां बनने लगी थीं। संगठन के तौर पर, इनमें से हरेक पार्टी प्रमुख शक्ति के बदले अपने पार्लियामेंटरी गुट का पुछल्ला बन चुकी थी। बोल्शेविकांे की जानकारी से यह छिपा न रहा कि इस तरह की पार्टी से सर्वहारा वर्ग का भला नहीं हो सकता, इस तरह की पार्टी क्रान्ति में मजदूर वर्ग का नेतृत्व नहीं कर सकती।

बोल्शेविकों की जानकारी से यह छिपा न रहा कि सर्वहारा वर्ग को ऐसी पार्टी नहीं बल्कि दूसरी तरह की पार्टी चाहिये, एक नयी और वास्तविक मार्क्सवादी पार्टी, जो अवसरवादियों से कभी मेल-मिलाप न करे और पूंजीपतियों के प्रति क्रान्तिकारी हो, जो मजबूती से संगठित और अपनी एकता में अटूट हो, जो सामाजिक क्रान्ति की पार्टी हो, जो सर्वहारा वर्ग की डिक्टेटरशिप की पार्टी हो।

बोल्शेविक यह नयी तरह की पार्टी चाहते थे। और, बोल्शेविकों ने ऐसी पार्टी बनाने के लिये काम किया। 'अर्थवादियों', मेन्शेविकों, त्रात्स्की पंथियों, बहिष्कारवादियों और सभी तरह के भाववादियों, अनुभवसिद्ध आलोचकों के खिलाफ़ संघर्ष का समूचा इतिहास, ऐसी ही पार्टी बनाने का इतिहास था। बोल्शेविक एक नयी पार्टी, एक बोल्शेविक पार्टी बनाना चाहते थे जो उन सब लोगों के लिये आदर्श हो जो एक सच्ची क्रान्तिकारी मार्क्सवादी पार्टी चाहते थे। पुराने इस्क्रा के दिनों से ही, बोल्शेविक ऐसी ही पार्टी बनाने का काम कर रहे थे। उन्होंने इसके लिये जमकर, लगातार और हर चीज के बावजूद काम किया। इस काम में, लेनिन की रचनाओं क्या करें?, दो कार्यनीतियां वगैरह ने एक बुनियादी और फै़सलाकुन पार्ट अदा किया। लेनिन की पुस्तक क्या करें? ने ऐसी पार्टी के लिये सैद्धांतिक तैयारी की। लेनिन की पुस्तक एक क़दम आगे तो दो क़दम पीछे ने ऐसी पार्टी के लिये संगठनात्मक तैयारी की। लेनिन की पुस्तक जनवादी क्रान्ति में सोशल-डेमोक्रेसी की दो कार्यनीतियां ने ऐसी पार्टी के लिये राजनीतिक तैयारी की। और अन्त में, लेनिन की पुस्तक भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना ने ऐसी पार्टी के लिये सिद्धांत सम्बन्धी तैयारी की।

यह बात बेखटके कही जा सकती है कि कभी भी इतिहास में किसी भी राजनीतिक दल ने अपनी पार्टी बनाने के लिये ऐसी भरी-पूरी तैयारी न की थी जैसी बोल्शेविक दल ने की।

इसलिये, बोल्शेविकों द्वारा अपनी पार्टी बनाने के लिये परिस्थितियां पूरी तरह तैयार हो चुकी थीं और पक चुकी थीं।

छठी पार्टी कांफ्रेंस का यह काम था कि मेन्शेविकों को निकाल कर इस पूरे हो चुके काम पर मुहर लगा दे और बाक़ायदा नयी पार्टी, बोल्शेविक पार्टी का निर्माण कर दे।

छठी अखिल रूसी पार्टी कांफ्रेंस जनवरी 1912 में प्राग में हुई। बीस से ऊपर पार्टी-संगठनों के प्रतिनिधि उसमें मौजूद थे। इसलिये, कांफ्रेंस का महत्व एक नियमित पार्टी कांग्रेस जैसा ही था।

कांफ्रेंस के बयान में कहा गया कि पार्टी की टूटी हुई केन्द्रीय मशीन फिर बहाल कर दी गयी है और एक केन्द्रीय समिति स्थापित कर दी गयी है। इसी बयान में कहा गया कि जब से पार्टी ने एक निश्चित संगठन का रूप लिया था, तब से रूसी सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी को कभी इतने कठिन समय से नहीं गुजरना पड़ा जितना प्रतिक्रियावाद के दौर में। तमाम दमन के बावजूद, बाहर से होने वाले कठिन प्रहार और भीतर के अवसरवादियों की गद्दारी और ढुलमुलपन के बावजूद, सर्वहारा वर्ग की पार्टी ने अपना झण्डा और अपना संगठन कायम रखा था।

कांफ्रेंस के बयान में कहा गया:

"न सिर्फ़ सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी का झण्डा, उसका कार्यक्रम और उसकी क्रान्तिकारी परम्परायें सुरक्षित हैं बल्कि उसका संगठन भी सुरक्षित है, जिसे दमन ने कमज़ोर और निर्बल भले बना दिया हो, लेकिन जिसे पूरी तरह से यह नष्ट नहीं कर पाया।"

कांफ्रेंस ने रूस में मजदूर आन्दोलन की नयी उठान और पार्टी काम के पुनर्जीवन के पहले चिन्ह नोट किये।

स्थानीय संगठनों द्वारा पेश की हुई रिपोर्टो पर अपने प्रस्ताव में कांफ्रेंस ने नोट किया कि "हर जगह सोशल-डेमोक्रेटिक मजदूरों के अन्दर जोरदार काम किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य स्थानीय गैर कानूनी सोशल-डेमोक्रेटिक संगठनों और गुटों को मजबूत करना है।"

कांफ्रेंस ने नोट किया कि पीछे हटने के दौर में बोल्शेविक कार्यनीति के सबसे महत्वपूर्ण नियम का लोग सभी जगह पालन कर रहे थे। यह नियम था: क़ानूनी तौर पर चलने वाले विभिज्डा यूनियनों और मजदूर सभाओं में कानूनी काम के साथ गैरकानूनी काम को मिलाना।

प्राग कांफ्रेंस ने पार्टी की एक बोल्शेविक केन्द्रीय समिति चुनी, जिसमें लेनिन, स्तालिन, और्जाेनिकित्से, स्वेर्दलोव, स्पान्दरियान और दूसरे लोग थे। काॅमरेड स्तालिन और स्वेर्दलोव केन्द्रीय समिति में अपनी गैरहाजिरी में चुने गये, क्योंकि वे उस समय निर्वासन में थे। केन्द्रीय समिति के चुने हुए एवजी सदस्यों में काॅमरेड कालिनिन थे।

रूस में क्रान्तिकारी काम का संचालन करने के लिये एक अमली केन्द्र (केन्द्रीय समिति की रूसी ब्यूरो) कायम किया गया। उसके अगुआ काॅमरेड स्तालिन थे और उसमें कामरेड स्वेर्दलोव, स्पान्दरियान, और्जोनिककित्से, कालिनिन शामिल थे।

प्राग कांफ्रेंस ने अवसरवाद के खिलाफ़ बोल्शेविकों के तमाम पिछले संघर्ष का सिंहावलोकन किया और मेन्शेविकों को पार्टी से निकाल देने का फ़ैसला किया।

पार्टी से मेन्शेविकों को निकाल कर, प्राग कांफ्रेंस ने बोल्शेविक पार्टी के स्वतंत्र जीवन का बाक़ायदा श्रीगणेश किया।

मेन्शेविकों को सैद्धांतिक और संगठनात्मक तरीके से परास्त करके और पार्टी से निकाल कर, बोल्शेविकों ने पार्टी के पुराने झण्डे, रू.सो.डे.ले.पा. के झण्डे को क़ायम रखा। यही सबब है कि 1912 तक बोल्शेविक पार्टी अपने को रूसी सोशल-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी ही कहती रही और 'बोल्शेविक' शब्द वह कोष्ठ में जोड़ देती थी।

1912 के आरंभ में प्राग कांफ्रेंस के नतीजों के बारे में, गोर्की को एक पत्र में लेनिन ने लिखा था:

"विसर्जनवादी कीचड़ के बावजूद, आखिर हम पार्टी और उसकी केन्द्रीय समिति को बहाल करने में कामयाब हुए हैं। मुझे उम्मीद है कि हमारे साथ तुम इस बात पर खुश होंगे। (लेनिन ग्रन्थावली, रू. सं., खण्ड 29, पृष्ठ 19)

प्राग कांफ्रेंस के महत्व की चर्चा करते हुए, काॅमरेड स्तालिन ने कहा था:

"हमारी पार्टी के इतिहास में इस कांफ्रेंस का बेहद महत्व है, क्योंकि उसने बोल्शेविकों और मेन्शेविकों के बीच एक सीमा-रेखा खींच दी है और तमाम देश के बोल्शेविक संगठनों को एक संयुक्त बोल्शेविक पार्टी में मिला दिया है।" (सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी 1⁄4बोल्शेविक1⁄2 की 15वीं कांग्रेस की शब्दशः रिपोर्ट, रूसी संस्करण, पृष्ठ 361-62)

मेन्शेविकों को निकालने और बोल्शेविकों की स्वतंत्र पार्टी बनाने के बाद, बोल्शेविक पार्टी और ज्यादा मजबूत और दृढ़ हुई। पार्टी अपनी सफ़ों से अवसरवादी लोगों को निकाल कर मजबूत होती है - बोल्शेविक पार्टी का यह एक सिद्धांत है; उस बोल्शेविक पार्टी का जो दूसरी इन्टरनेशनल की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टियों से बुनियादी तौर से भिज्डा है। हालांकि दूसरी इन्टरनेशनल की पार्टियां अपने को मार्क्सवादी पार्टियां कहती थीं, लेकिन वे दरअसल अपनी सफ़ों में .मार्क्सवाद   के दुश्मनों, खुले अवसरवादियों को बर्दाश्त करती थीं और उन्होंने दूसरी इन्टरनेशनल को उन्हें खराब और तबाह करने दिया था। इसके विपरीत, बोल्शेविकों ने अवसरवादियों के खिलाफ़ जम कर लड़ाई की। सर्वहारा वर्ग की पार्टी से अवसरवाद का कूड़ा-करकट निकाल फेंका और एक ऐसी पार्टी बनाने में कामयाब हुए जो नयी तरह की पार्टी थी, एक लेनिनवादी पार्टी थी, ऐसी पार्टी जिसने आगे चल कर सर्वहारा वर्ग की डिक्टेटरशिप क़ायम की।

अगर सर्वहारा वर्ग की पार्टी की सफ़ों में अवसरवादी बने रहते तो बोल्शेविक पार्टी मैदान में न आ सकती और सर्वहारा वर्ग का नेतृत्व न कर सकती, वह सत्ता पर अधिकार न कर सकती और सर्वहारा वर्ग की डिक्टेटरशिप न क़ायम कर सकती; वह गृह-युद्ध में विजयी न हो सकती और समाजवाद का निर्माण न कर सकती।

प्राग कांफ्रेंस ने फ़ैसला किया कि अल्पतम प्रोग्रम में जो मांगें थीं, उन्हें पार्टी के मुख्य फ़ौरी राजनीतिक नारों के रूप में पेश किया जाये: जनवादी प्रजातंत्र, आठ घण्टे का दिन और तमाम रियासती जमीन का जब्त करना।

इन क्रान्तिकारी नारों पर बोल्शेविकों ने चैथी राज्य दूमा के लिये चुनाव के सिलसिले में अपना आन्दोलन चलाया।

इन नारों ने 1912-'14 सालों में मज़दूर जनता के क्रांतिकारी आन्दोलन की नयी उठान को रास्ता दिखलाया।

सारांश

क्रांतिकारी काम के लिये 1908-'12 के साल बहुत ही कठिन साल थे। क्रान्ति की पराजय के बाद, जब क्रान्तिकारी आन्दोलन मन्द पड़ गया और जनता थकी हुई थी, बोल्शेविकों ने अपनी कार्यनीति बदल दी और ज़ारशाही के खिलाफ़ सीधे संघर्ष के बदले घुमावदार संघर्ष की तरफ बढे। स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद के दौर में जो कठिन परिस्थितियां थीं, उनमें आम जनता से अपना सम्बन्ध बनाये रखने के लिये, बोल्शेविकों ने छोटे से छोटे कानूनी मौके़ का 1⁄4रोगी-सहायक समितियों और टंेड यूनियनों से लेकर दूमा के मंच तक का1⁄2 इस्तेमाल किया। बोल्शेविकों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन की नयी उठान के लिये शक्ति बटोरने में अथक रूप से काम किया।

क्रान्ति की पराजय के बाद कठिन परिस्थितियां सामने आयीं ? विरोधी रुझान टूट-फूट गये। क्रान्ति से निराशा हुई। जो बुद्धिजीवी पार्टी से भाग खडे़ हुए थे 1⁄4बुग्दानोव, बजारोव, वगैरह1⁄2, उन्होंने अधिकाधिक क़ोशिश की कि पार्टी की सैद्धांतिक बुनियादों को दुहरायें। उस समय, पार्टी के अन्दर बोल्शेविक ही ऐसी ताक़त थे जिन्होंने पार्टी के झण्डे को झुकने न दिया, जो पार्टी प्रोग्राम के प्रति वफ़ादार रहे और जिन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांत के आलोचकों के हमलों को खदेड़ दिया। (लेनिन की पुस्तक भौतिकवाद और अनुभविद्धि आलोचना1⁄2। लेनिन के चारों ओर जो बोल्शेविकों का प्रमुख गुट था, वह पार्टी और उसके क्रान्तिकारी उसूलों की इसलिये हिफ़ाजत कर सका कि वह मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा में परिपक्व हो चुका था और क्रान्ति की प्रगति की दिशा को समझ चुका था। बोल्शेविकों के बारे में, लेनिन ने कहा था: "लोग यों ही नहीं कहते कि हम चट्टान की तरह दृढ़ हैं।"

उस समय, मेन्शेविक क्रान्ति से बराबर दूर हटते जा रहे थे। वे विसर्जनवादी हो गये और सर्वहारा वर्ग की गैरकानूनी क्रान्तिकारी पार्टी के विसर्जन की, उसके खात्में की मांग करने लगे। उन्होंने अधिकाधिक पार्टी प्रोग्राम और पार्टी के क्रान्तिकारी उद्देश्यों और नारों को खुल्लमखुल्ला तजना शुरू कर दिया। उन्होंने खुद अपनी सुधारवादी पार्टी संगठित करने की कोशिश की, जिसका नाम मज़दूरों ने 'स्तोलिपिन लेबर पार्टी' रखा था। त्रात्स्की विसर्जनवादियों का समर्थन करता था और धूर्तता से पर्दे की तरह 'पार्टी-एकता' का नारा इस्तेमाल करता था। दरअसल, उसकी एकता का मतलब विसर्जन-वादियों से एकता था।

दूसरी तरफ़ कुछ बोल्शेविक, जो ज़ारशाही का मुकाबिला करने के लिये नये और घुमावदार रास्ते अपनाने की जरूरत महसूस न करते थे, यह मांग करने लगे कि क़ानूनी अवसरों से लाभ न उठाया जाये और राज्य दूमा से मजदूरों के प्रतिनिधियों को वापस बुला लिया जाये। ये बहिष्कारवादी पार्टी को आम जनता से अलग जा पड़ने की तरफ़ ठेल रहे थे। वे क्रान्ति की नयी उठान के लिये शक्तियों को बटोरने के काम में बाधा डाल रहे थे। 'वाम पंथी' लफ़्फाजी को पर्दे की तरह इस्तेमाल करके, विसर्जनवादियों की तरह, बहिष्कारवादियों ने भी तत्व रूप में क्रान्तिकारी संघर्ष तज दिया था।

विसर्जनवादी और बहिष्कारवादी लेनिन के खिलाफ़ एक ही गुट में शामिल हो गये। यह अगस्त गुट कहलाता था और इसका संगठन त्रात्स्की ने किया था।

विसर्जनवादियों और बहिष्कारवादियों के खिलाफ़ संघर्ष में, अगस्त गुट के खिलाफ़ संघर्ष में, बोल्शेविक जीते और गै़रकानूनी सर्वहारा पार्टी की हिफ़ाजत करने में कामयाब हुए।

इस दौर की महत्वपूर्ण घटना (जनवरी 1912 में) रू.सो.डे.ले.पा. की प्राग कांफ्रेंस थी। इस कांफ्रेंस में, मेन्शेविक पार्टी से निकाल दिये गये और एक पार्टी के अन्दर मेन्शेविकों के साथ बोल्शेविकों की ऊपरी एकता सदा के लिये खत्म कर दी गयी। एक राजनीतिक गुट से आगे बढ़ कर, बोल्शेविक बाक़ायदा एक स्वतंत्र पार्टी, रूसी सोशल-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (बोल्शेविक)  बने। प्राग कांफ्रेंस ने एक नयी तरह की पार्टी, लेनिनवाद की पार्टी, बोल्शेविक पार्टी की शुरूआत की।

प्राग कांफ्रेंस में सर्वहारा पार्टी की सफ़ों से जो अवसरवादी, मेन्शेविक निकाले गये, उसका पार्टी और क्रान्ति के अगले विकास पर महत्वपूर्ण और निर्णायक असर पड़ा। अगर बोल्शेविक मज़दूरों के उद्देश्य से ग़द्दारी करने वालों, मेन्शेविक समझौतावादियों को पार्टी से न निकाल देते तो सर्वहारा पार्टी 1917 में सर्वहारा वर्ग की डिक्टेटरशिप के लिये लड़ने को आम जनता को न जगा सकती।

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