अतीक़ अहमद का बेटा असद पढ़ने के लिए लंदन जाना चाहता था। उसको वहां लाॅ कोर्स में दाख़िला भी मिल गया लेकिन वो पढ़ नहीं पाया क्योंकि राज्य चाहता था उसके हाथ में डिग्री नहीं तमंचा आए। सरकार ने उसके ख़िलाफ एक भी आपराधिक मामला न होने के बावजूद पासपोर्ट जारी नहीं किया। जो लड़का देश का बड़ा वकील हो सकता था उसको अपराधी बनाकर मार दिया गया। लोग अक्सर सवाल करते हैं मुसलमान शादी, खाने, और दिखावों पर ख़र्च करते हैं शिक्षा पर नहीं। यह नरेटीव किसने बनाया? ज़ाहिर है, उस राज्य ने जिसकी ज़िम्मेदारी है कि अपने हर नागरिक को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में विफल रहा राज्य क्या कर रहा है? अपनी विफलता का बोझ समुदाय पर मढ़ रहा है। दुख की बात है कि बहुसंख्यक समुदाय का पढ़ा-लिखा और कथित समझदार तबक़ा भी इसका समर्थन कर रहा है। राज्य को क्या करना चाहिए था यह बताने की ज़रूरत नहीं है लेकिन राज्य ने क्या किया, यह बताना ज़रूरी है। पिछले आठ साल के दौरान मौलाना आज़ाद के नाम पर दी जाने वाली छात्रवृत्ति बंद कर दी। वक़्फ काउंसिल से जारी होने वाली छात्रवृत्ति में रोड़े अटकाए गए। मेरिट कम मीन स्कॉलरशिप का तो ख़ैर सबको ही मालूम है। ग्लोकल और जौहर विश्वविद्यालयों की ईंट, जंगले तक सरकार ने चुरा लिए। एएमयू की ग्रांट में कटौती की और मुसलमान इदारों को विदेश में कमा रहे भारतीयों से मिलने वाले चंदे के तमाम रास्ते बंद कर दिए। हर उस इदारे को ईडी, इंकम टैक्स और एफसीआरए के चंगुल में उलझा दिया जो मुसलमान बच्चों को कोचिंग या शैक्षणिक सहायता मुहैया करा रहा था। इतने पर भी बस नहीं चल रहा। सरकारी संस्थानों में दाख़िलों में तमाम अड़ंगे खाते हैं और यही बच्चे किसी निजी संस्थान में जाते हैं तो धर्म और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का शिकार बनते रहे हैं। कहीं कश्मीरी कहकर मारा जाता है, कहीं असमी और बांग्लादेशी कहकर धुना जाता है, कहीं मु-ल्ला, कटु-आ, पाकिस्तानी जैसे सम्मानजनक संबोधनों से नवाज़ा जाता है। इतनी बाधाओं के बावजूद मुसलमान बच्चे पढ़ रहे हैं और अपराधी नहीं बन रहे है तो राज्य और बहुसंख्यक समाज को उनका आभारी होना चाहिए। सब जानते हैं राज्य ने अपने ही देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ खुलेआम युद्ध का ऐलान कर रखा है। इतने शोषण, इतनी नफरत, और इतने भेदभाव के बावजूद मुसलमान बच्चे न तलवारें लहराते घूम रहे हैं, न सरकार द्वारा घोषित युद्ध में हिस्सेदार बन रहे हैं। इसलिए जब कोई लिखता है कि मुसलमान ये नहीं कर रहे, मुसलमान वो नहीं कर रहे, उन्हें ये करना चाहिए, बीजेपी ने इनका क्या बिगाड़ा है, और ये क्यों सरकार का इतना विरोध कर रहे हैं, तो यक़ीन मानिए, दिल से आवाज़ आती है कि इसके गले में टूटे जूतों की माला डाल दें या मुंह पर थूक दें। बस संस्कार यह सब करने की इजाज़त नहीं देते, दूसरा यह दबाव रहता है कि हम ही यह सब करने लगेंगे तो उनपर क्या प्रभाव पड़ेगा जिन्हें पढ़ाते हैं और अच्छा बनने की नसीहत करते हैं।
Zaigham Murtaza
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